UPSC Prelims 2024
भारतीय राजव्यवस्था Previous Year Questions (PYQs)
Explore 17 solved UPSC Prelims 2024 भारतीय राजव्यवस्था questions with detailed step-by-step bilingual solutions, option analysis, and answer keys.
'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- प्रावधान 18वीं लोकसभा से लागू होंगे.
- अधिनियम बनने के बाद यह 15 वर्षों तक लागू रहेगा।
- अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कोटा के भीतर अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण के प्रावधान हैं।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 3 — केवल कथन 2 और 3 सही हैं
नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 (106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम) लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण प्रदान करता है। लेकिन यह आरक्षण 18वीं लोकसभा से लागू नहीं होगा। इसे अगली जनगणना और परिसीमन (Delimitation) के बाद लागू किया जाएगा।
❌ कथन 1 गलत है: आरक्षण 18वीं लोकसभा से लागू नहीं होगा। यह पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने और परिसीमन के बाद लागू होगा।
✅ कथन 2 सही है: यह आरक्षण अधिनियम लागू होने की तिथि से 15 वर्षों तक प्रभावी रहेगा। संसद चाहे तो इस अवधि को आगे बढ़ा सकती है।
✅ कथन 3 सही है: अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
संक्षिप्त नोट्स: नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023
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106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 के रूप में पारित।
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लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण।
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SC/ST आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान।
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लागू होने से पहले जनगणना और परिसीमन आवश्यक।
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संविधान में अनुच्छेद 334A जोड़ा गया।
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आरक्षण की अवधि 15 वर्ष निर्धारित की गई है।
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राज्यसभा और विधान परिषदों पर लागू नहीं।
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राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का उद्देश्य।
लोकसभा में आचार समिति के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- प्रारंभ में यह एक तदर्थ समिति थी।
- केवल लोकसभा का सदस्य ही लोकसभा के किसी सदस्य के अनैतिक आचरण से संबंधित शिकायत कर सकता है।
- यह समिति किसी भी ऐसे मामले पर विचार नहीं कर सकती जो न्यायाधीन हो।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 3 — केवल कथन 1 और 3 सही हैं
लोकसभा की एथिक्स कमेटी (Ethics Committee) सांसदों के अनैतिक आचरण से संबंधित मामलों की जांच करती है और आवश्यक कार्रवाई की सिफारिश करती है। यह पहले एक अस्थायी समिति थी, बाद में स्थायी समिति बनी।
✅ कथन 1 सही है: लोकसभा की एथिक्स कमेटी का गठन 2000 में एक एड-हॉक (अस्थायी) समिति के रूप में हुआ था। इसे 2015 में स्थायी समिति बनाया गया।
❌ कथन 2 गलत है: केवल लोकसभा सदस्य ही शिकायत नहीं कर सकते। कोई भी व्यक्ति शिकायत कर सकता है, लेकिन बाहरी व्यक्ति की शिकायत को किसी लोकसभा सदस्य द्वारा अग्रेषित किया जाना आवश्यक है।
✅ कथन 3 सही है: समिति न्यायालय में विचाराधीन (Sub-Judice) मामलों पर विचार नहीं कर सकती।
संक्षिप्त नोट्स: लोकसभा एथिक्स कमेटी
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2000 में एड-हॉक समिति के रूप में गठित।
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2015 में स्थायी समिति बनी।
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सांसदों के अनैतिक आचरण की जांच करती है।
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संसदीय नैतिकता और आचरण के मानकों को बनाए रखती है।
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दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की सिफारिश कर सकती है।
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आम नागरिक भी शिकायत कर सकते हैं।
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Sub-Judice मामलों की जांच नहीं करती।
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संसद की गरिमा और विश्वसनीयता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
संसद में धन विधेयक के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- अनुच्छेद 109 में धन विधेयक के संबंध में विशेष प्रक्रिया का उल्लेख है।
- धन विधेयक राज्यों की परिषद में पेश नहीं किया जाएगा।
- राज्यसभा या तो विधेयक को मंजूरी दे सकती है या बदलाव का सुझाव दे सकती है लेकिन इसे अस्वीकार नहीं कर सकती।
- राज्यसभा द्वारा सुझाए गए धन विधेयक में संशोधन को लोकसभा द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए।
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Detailed Explanation:
सही उत्तर: विकल्प 3 (1, 2 और 3)
मनी बिल संविधान के अनुच्छेद 110 में बताए गए विषयों जैसे कराधान, सरकारी उधार और भारत की संचित निधि से व्यय आदि से संबंधित होता है। इसे केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है और राज्यसभा की भूमिका सीमित होती है।
✅ कथन 1 सही है: अनुच्छेद 109 मनी बिल के लिए विशेष प्रक्रिया बताता है।
✅ कथन 2 सही है: मनी बिल राज्यसभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
✅ कथन 3 सही है: राज्यसभा केवल सुझाव दे सकती है, मनी बिल को अस्वीकार नहीं कर सकती।
❌ कथन 4 गलत है: लोकसभा पर राज्यसभा के सुझाव मानना अनिवार्य नहीं है।
संक्षिप्त नोट्स: मनी बिल
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अनुच्छेद 110 मनी बिल की परिभाषा देता है।
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मनी बिल केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।
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इसे प्रस्तुत करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक होती है।
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किसी विधेयक को मनी बिल घोषित करने का अधिकार लोकसभा अध्यक्ष के पास होता है।
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राज्यसभा केवल सुझाव दे सकती है और बिल को 14 दिनों के भीतर लौटाना होता है।
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लोकसभा सुझावों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
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यदि राज्यसभा 14 दिनों में बिल वापस नहीं करती, तो बिल पारित माना जाता है।
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मनी बिल के मामले में संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान नहीं है।
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भारत के संविधान के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- नगर पालिकाओं की शक्तियां संविधान के भाग IX A में दी गई हैं।
- आपातकालीन प्रावधान संविधान के भाग XVIII में दिए गए हैं।
- संविधान में संशोधन से संबंधित प्रावधान संविधान के भाग XX में दिए गए हैं
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Detailed Explanation:
सही उत्तर: विकल्प 4 (1, 2 और 3)
भारतीय संविधान विभिन्न भागों (Parts) में विभाजित है, जिनमें अलग-अलग विषयों से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं। तीनों कथन संविधान के सही भागों का उल्लेख करते हैं।
✅ कथन 1 सही है: भाग IX-A (अनुच्छेद 243P से 243ZG) नगरपालिकाओं से संबंधित है। इसे 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया था।
✅ कथन 2 सही है: भाग XVIII (अनुच्छेद 352 से 360) में आपातकालीन प्रावधान दिए गए हैं।
✅ कथन 3 सही है: भाग XX में अनुच्छेद 368 है, जो संविधान संशोधन की शक्ति और प्रक्रिया बताता है।
संक्षिप्त नोट्स: भारतीय संविधान के भाग
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भाग IX-A नगरपालिकाओं और शहरी स्थानीय स्वशासन से संबंधित है।
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74वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने नगर निकायों को संवैधानिक दर्जा दिया।
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भाग XVIII (अनुच्छेद 352–360) में आपातकालीन प्रावधान हैं।
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भारत में तीन प्रकार के आपातकाल हैं—राष्ट्रीय, राज्य (राष्ट्रपति शासन) और वित्तीय आपातकाल।
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भाग XX में अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन की प्रक्रिया बताता है।
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संविधान में संशोधन साधारण बहुमत, विशेष बहुमत या विशेष बहुमत + राज्यों की स्वीकृति से किया जा सकता है।
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केशवानंद भारती मामला (1973) ने मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) स्थापित किया।
भारत के संविधान के अनुसार निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: विकल्प 3 (Inter-State quarantine is a Union subject under the Union List)
संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) में विषयों का विभाजन संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में किया गया है। जिन विषयों का प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है, उन्हें सामान्यतः संघ सूची में रखा जाता है।
❌ विकल्प 1 गलत है: अंतर-राज्यीय व्यापार और वाणिज्य संघ सूची का विषय है, राज्य सूची का नहीं।
❌ विकल्प 2 गलत है: अंतर-राज्यीय प्रवासन (Inter-State Migration) संघ सूची के अंतर्गत आता है।
✅ विकल्प 3 सही है: Inter-State Quarantine संघ सूची (Entry 81) का विषय है क्योंकि राज्यों की सीमाओं के पार रोग नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय आवश्यक होता है।
❌ विकल्प 4 गलत है: Corporation Tax केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाता है और यह संघ सूची का विषय है।
संक्षिप्त नोट्स: संविधान की सातवीं अनुसूची
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सातवीं अनुसूची केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का विभाजन करती है।
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इसमें संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची शामिल हैं।
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संघ सूची में लगभग 100 विषय हैं जो राष्ट्रीय महत्व के हैं।
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राज्य सूची में स्थानीय और क्षेत्रीय महत्व के विषय रखे गए हैं।
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समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
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समवर्ती सूची में टकराव होने पर केंद्रीय कानून को प्राथमिकता मिलती है।
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अंतर-राज्यीय व्यापार, प्रवासन, क्वारंटीन, नागरिकता, रक्षा और कॉरपोरेशन टैक्स संघ सूची के विषय हैं।
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यह व्यवस्था मुख्य रूप से अनुच्छेद 246 और 246A पर आधारित है।
Tagging (from Tagging.csv):
| Field | Tag |
|---|---|
| Subject | Indian Polity |
| Chapter | Federalism |
| Topic | Seventh Schedule and Distribution of Powers |
Secondary Tag (only if relevant):
| Field | Tag |
|---|---|
| Subject | Indian Polity |
| Chapter | Constitution of India |
| Topic | Union, State and Concurrent Lists |
Difficulty Level: 🟢 Easy
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कार्यभार संभालने से पहले संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष कौन थे?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: विकल्प 4 (डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा)
भारत की संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी। उस समय स्थायी अध्यक्ष का चुनाव नहीं हुआ था, इसलिए डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष (Provisional President) बनाया गया। बाद में 11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष चुने गए।
✅ डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा सही हैं: वे संविधान सभा के प्रथम एवं अस्थायी अध्यक्ष थे।
❌ सी. राजगोपालाचारी: वे भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल थे, संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष नहीं।
❌ डॉ. बी.आर. आंबेडकर: वे प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष थे।
❌ टी.टी. कृष्णमाचारी: वे संविधान सभा के सदस्य थे, लेकिन अस्थायी अध्यक्ष नहीं थे।
संक्षिप्त नोट्स: भारतीय संविधान सभा
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संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई।
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डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा इसके अस्थायी अध्यक्ष थे।
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डॉ. राजेंद्र प्रसाद 11 दिसंबर 1946 को स्थायी अध्यक्ष बने।
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डॉ. बी.आर. आंबेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे।
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प्रारूप समिति का गठन 29 अगस्त 1947 को हुआ।
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संविधान को 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत किया गया।
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संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
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संविधान निर्माण में लगभग 2 वर्ष 11 माह 18 दिन लगे।
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- यह राज्य का राज्यपाल है जो उस राज्य के किसी भी समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता देता है और घोषित करता है।
- किसी समुदाय को किसी राज्य में अनुसूचित जनजाति के रूप में घोषित करने की आवश्यकता नहीं है कि दूसरे राज्य में भी ऐसा हो।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: विकल्प 2 (केवल 2)
संविधान में अनुसूचित जनजातियों (STs) की पहचान के लिए विशेष प्रक्रिया दी गई है। किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति घोषित करने का अधिकार भारत के राष्ट्रपति के पास होता है और यह मान्यता अलग-अलग राज्यों में भिन्न हो सकती है।
❌ कथन 1 गलत है: किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति घोषित करने का अधिकार राज्यपाल को नहीं बल्कि भारत के राष्ट्रपति को अनुच्छेद 342 के तहत प्राप्त है।
✅ कथन 2 सही है: कोई समुदाय एक राज्य में अनुसूचित जनजाति हो सकता है, लेकिन दूसरे राज्य में नहीं, क्योंकि सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं।
संक्षिप्त नोट्स: अनुसूचित जनजातियाँ (STs)
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अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजातियों से संबंधित है।
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अनुसूचित जनजातियों की सूची राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित की जाती है।
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इस सूची में परिवर्तन केवल संसद कानून बनाकर कर सकती है।
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ST का दर्जा राज्य-विशिष्ट होता है।
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संविधान शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में STs को विशेष संरक्षण देता है।
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लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों में STs के लिए आरक्षण है।
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पाँचवीं अनुसूची अधिकांश राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित है।
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छठी अनुसूची पूर्वोत्तर भारत के कुछ जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त परिषदों का प्रावधान करती है।
दिसंबर 2023 तक भारत सरकार ने कितने परिसीमन आयोग का गठन किया है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: विकल्प 4 (चार)
भारत सरकार ने दिसंबर 2023 तक कुल चार परिसीमन आयोग (Delimitation Commissions) गठित किए हैं—1952, 1963, 1973 और 2002 में। इनका उद्देश्य जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है ताकि प्रतिनिधित्व संतुलित रहे।
✅ परिसीमन आयोग 1952: स्वतंत्रता के बाद पहली जनगणना के आधार पर गठित किया गया।
✅ परिसीमन आयोग 1963: 1961 की जनगणना के आधार पर गठित किया गया।
✅ परिसीमन आयोग 1973: 1971 की जनगणना के आधार पर गठित किया गया।
✅ परिसीमन आयोग 2002: 2001 की जनगणना के आधार पर गठित किया गया, जिसकी सिफारिशें 2008 में लागू हुईं।
संक्षिप्त नोट्स: परिसीमन आयोग
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परिसीमन का अर्थ है निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण।
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इसका गठन राष्ट्रपति द्वारा संसद के कानून के तहत किया जाता है।
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परिसीमन आयोग 1952, 1963, 1973 और 2002 में गठित हुए।
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आयोग में सामान्यतः सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्यों के राज्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होते हैं।
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आयोग के आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है।
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42वें संविधान संशोधन (1976) ने जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण पर रोक लगाई थी।
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84वें संविधान संशोधन (2001) ने इस रोक को 2026 तक बढ़ाया।
-
नवीनतम परिसीमन 2001 की जनगणना पर आधारित था और 2008 में लागू हुआ।
भारत के संविधान के निम्नलिखित में से किस अनुच्छेद के तहत भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को रखा है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ D. अनुच्छेद 21
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में निजता के अधिकार (Right to Privacy) को मौलिक अधिकार घोषित किया। न्यायालय ने कहा कि यह अनुच्छेद 21 में दिए गए जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है।
✅ अनुच्छेद 21 सही है: निजता का अधिकार, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत माना गया है।
❌ अनुच्छेद 15 गलत है: यह भेदभाव के निषेध से संबंधित है।
❌ अनुच्छेद 16 गलत है: यह सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता से संबंधित है।
❌ अनुच्छेद 19 गलत है: यह विभिन्न स्वतंत्रताओं की गारंटी देता है, लेकिन निजता का अधिकार विशेष रूप से अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त है।
संक्षिप्त नोट्स: निजता का अधिकार (Right to Privacy)
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पुट्टस्वामी निर्णय (2017) ने निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया।
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यह अधिकार अनुच्छेद 21 से जुड़ा हुआ है।
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फैसला 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने दिया था।
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निजता में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और डेटा गोपनीयता शामिल हैं।
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इस निर्णय ने पुराने फैसलों को निरस्त किया जिनमें निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया था।
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निजता का अधिकार पूर्ण (Absolute) नहीं है; उचित कानून द्वारा सीमित किया जा सकता है।
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यह निर्णय भारत के डेटा संरक्षण कानूनों की संवैधानिक नींव बना।
उत्तर पूर्वी परिषद (एनईसी) की स्थापना उत्तर पूर्वी परिषद अधिनियम, 1971 द्वारा की गई थी। 2002 में एनईसी अधिनियम में संशोधन के बाद, परिषद में निम्नलिखित में से कौन से सदस्य शामिल हैं?
- संविधान राज्य के राज्यपाल
- घटक राज्य के मुख्यमंत्री
- तीन सदस्यों को भारत के राष्ट्रपति द्वारा नामांकित किया जाएगा
- भारत के गृह मंत्री
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके सही उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ A. 1, 2 और 3 केवल
North Eastern Council (NEC) की स्थापना North Eastern Council Act, 1971 के तहत हुई थी। 2002 के संशोधन के बाद परिषद में सभी सदस्य राज्यों के राज्यपाल, मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा नामित तीन सदस्य शामिल किए गए। गृह मंत्री को इस संशोधन के तहत वैधानिक सदस्य नहीं बनाया गया था।
✅ कथन 1 सही है: सभी उत्तर-पूर्वी राज्यों के राज्यपाल NEC के सदस्य होते हैं।
✅ कथन 2 सही है: सभी सदस्य राज्यों के मुख्यमंत्री NEC के सदस्य होते हैं।
✅ कथन 3 सही है: 2002 संशोधन के बाद राष्ट्रपति द्वारा नामित तीन सदस्य परिषद में शामिल किए गए।
❌ कथन 4 गलत है: गृह मंत्री 2002 संशोधन के अनुसार परिषद के वैधानिक सदस्य नहीं हैं।
संक्षिप्त नोट्स: उत्तर पूर्वी परिषद (NEC)
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NEC की स्थापना 1971 में हुई थी।
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यह उत्तर-पूर्व क्षेत्र की योजना और सलाहकारी संस्था है।
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NEC में 8 उत्तर-पूर्वी राज्य शामिल हैं।
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2002 संशोधन ने परिषद की भूमिका को और मजबूत किया।
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परिषद में राज्यपाल, मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा नामित 3 सदस्य होते हैं।
-
NEC, विकास मंत्रालय (DoNER Ministry) के अंतर्गत कार्य करती है।
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इसका मुख्य उद्देश्य संपर्क, आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देना है।
संविधान (71वां संशोधन) अधिनियम, 1992 ने संविधान की आठवीं अनुसूची में निम्नलिखित में से कौन सी भाषाओं को शामिल करने के लिए संशोधन किया?
- कोंकणी
- मणिपुरी
- नेपाली
- मैथिली
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — 1, 2 और 3
71वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में तीन भाषाओं को जोड़ा: कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली। इससे अनुसूचित भाषाओं की कुल संख्या 15 से बढ़कर 18 हो गई। मैथिली इस संशोधन का हिस्सा नहीं थी; इसे बाद में 92वें संशोधन अधिनियम, 2003 के माध्यम से बोडो, डोगरी और संथाली के साथ जोड़ा गया था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: आठवीं अनुसूची और भाषाओं का संशोधन
- आठवीं अनुसूची का अवलोकन: संविधान की आठवीं अनुसूची में भारत द्वारा मान्यता प्राप्त आधिकारिक भाषाओं की सूची है। मूल रूप से, 1950 में जब संविधान लागू हुआ तो इसमें 14 भाषाएं शामिल थीं। इन भाषाओं को संवैधानिक मान्यता, विकास के लिए सरकारी सहायता प्राप्त है और इनका उपयोग संसदीय कार्यवाही और प्रतियोगी परीक्षाओं में किया जा सकता है।
- 21वां संशोधन अधिनियम, 1967: यह आठवीं अनुसूची में पहला संशोधन था, जिसमें विभाजन के दौरान विस्थापित सिंधी भाषी समुदाय की भाषाई पहचान को मान्यता देने के लिए सिंधी को 15वीं भाषा के रूप में जोड़ा गया।
- 71वां संशोधन अधिनियम, 1992: तीन भाषाएं जोड़ी गईं - कोंकणी (गोवा और पड़ोसी राज्यों में बोली जाने वाली), मणिपुरी या मैतेई (मणिपुर की आधिकारिक भाषा), और नेपाली (सिक्किम, दार्जिलिंग और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में बोली जाने वाली) - जिससे कुल संख्या 18 भाषाओं तक पहुंच गई।
- 92वां संशोधन अधिनियम, 2003: चार भाषाएं जोड़ी गईं - बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली - जिससे वर्तमान में कुल 22 अनुसूचित भाषाएं हो गईं, जो भारत की विशाल भाषाई विविधता को मान्यता देती हैं।
- अनुसूचित भाषाओं का महत्व: आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं को आधिकारिक भाषा आयोगों में प्रतिनिधित्व का अधिकार है, इनका उपयोग यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में किया जा सकता है, और इन्हें उनके विकास और प्रचार के लिए सरकारी सहायता प्राप्त होती है।
- शास्त्रीय भाषाएं: छह भाषाओं को अलग से 'शास्त्रीय भाषा' का दर्जा दिया गया है - तमिल (2004), संस्कृत (2005), कन्नड़ (2008), तेलुगु (2008), मलयालम (2013), और ओडिया (2014)। यह दर्जा अनुसूचित भाषा के दर्जे से अलग है और प्राचीन साहित्यिक विरासत को मान्यता देता है।
- समावेशन के मानदंड: हालांकि कोई निश्चित संवैधानिक मानदंड मौजूद नहीं है, लेकिन आम तौर पर महत्वपूर्ण संख्या में बोलने वाले, समृद्ध साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक महत्व वाली भाषाओं पर विचार किया जाता है। तुलु, भोजपुरी और राजस्थानी सहित कई भाषाओं की समावेशन की मांग जारी है।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 344 आधिकारिक भाषाओं पर एक आयोग और संसद की एक समिति के गठन का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 351 संघ को हिंदी को बढ़ावा देने और इसके संवर्धन के लिए संस्कृत और अन्य आठवीं अनुसूची की भाषाओं से शब्द लेने का निर्देश देता है।
| संशोधन अधिनियम | वर्ष | जोड़ी गई भाषाएं | कुल भाषाएं |
|---|---|---|---|
| मूल संविधान | 1950 | असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उर्दू | 14 |
| 21वां संशोधन | 1967 | सिंधी | 15 |
| 71वां संशोधन | 1992 | कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली | 18 |
| 92वां संशोधन | 2003 | बोडो, डोगरी, मैथिली, संथाली | 22 |
भारत के संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार, संसद निम्नलिखित तरीकों से संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन कर सकती है:
- परिवर्धन (Addition)
- परिवर्तन (Variation)
- निरसन (Repeal)
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग करके सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 368 संसद को तीन विशिष्ट तरीकों से संविधान में संशोधन करने की व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है: परिवर्धन (नए प्रावधानों को जोड़ना), परिवर्तन (मौजूदा प्रावधानों को संशोधित करना), और निरसन (प्रावधानों को हटाना)। यह लचीलापन सुनिश्चित करता है कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ बना रहे जो संवैधानिक निरंतरता बनाए रखते हुए बदलती सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आवश्यकताओं के अनुकूल हो सके।
✅ कथन 1 (परिवर्धन) – सही: संसद संविधान में नए प्रावधान जोड़ सकती है, जैसे 93वें संशोधन अधिनियम, 2005 के माध्यम से अनुच्छेद 15(5) का समावेश, जो शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की अनुमति देता है।
✅ कथन 2 (परिवर्तन) – सही: संसद मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों को संशोधित कर सकती है, जैसा कि 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रदर्शित किया गया, जिसने प्रस्तावना और विभिन्न अन्य अनुच्छेदों में परिवर्तन किए।
✅ कथन 3 (निरसन) – सही: संसद संवैधानिक प्रावधानों को पूरी तरह से हटा सकती है, जैसा कि 26वें संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा उदाहरित है, जिसने रियासतों के पूर्व शासकों के लिए प्रिवी पर्स को समाप्त कर दिया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अनुच्छेद 368 के तहत संवैधानिक संशोधन शक्तियाँ
- अनुच्छेद 368: संसद को संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन करने की प्रक्रिया और शक्ति प्रदान करता है, जिससे यह न तो अत्यधिक कठोर और न ही अत्यधिक लचीला बनता है।
- संशोधन की तीन विधियाँ: परिवर्धन (नए अनुच्छेद/खंड जोड़ना), परिवर्तन (मौजूदा प्रावधानों को संशोधित करना), और निरसन (प्रावधानों को पूरी तरह हटाना)।
- संशोधन प्रक्रिया: संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3) की आवश्यकता होती है; कुछ संशोधनों के लिए कम से कम आधे राज्य विधानमंडलों द्वारा अनुसमर्थन भी आवश्यक है।
- मूल संरचना सिद्धांत: केशवानंद भारती मामले (1973) में स्थापित, संसद की संशोधन शक्ति को सीमित करता है—कुछ मौलिक विशेषताओं को बदला या नष्ट नहीं किया जा सकता।
- संशोधनों के प्रकार: साधारण बहुमत संशोधन (जैसे राज्यों का निर्माण/समाप्ति), विशेष बहुमत संशोधन (अधिकांश प्रावधान), और विशेष बहुमत प्लस राज्य अनुसमर्थन (संघीय प्रावधान, प्रतिनिधित्व, आदि)।
- उल्लेखनीय संशोधन: 42वाँ संशोधन (लघु संविधान), 44वाँ संशोधन (आपातकाल के दौरान सीमित किए गए कुछ अधिकार बहाल किए), 73वें और 74वें संशोधन (स्थानीय स्वशासन), 101वाँ संशोधन (जीएसटी)।
| संशोधन का प्रकार | आवश्यक बहुमत | राज्य अनुसमर्थन | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| साधारण बहुमत | उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत | आवश्यक नहीं | नए राज्यों का निर्माण, नागरिकता प्रावधान |
| विशेष बहुमत | कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित और मतदान करने वाले 2/3 | आवश्यक नहीं | मौलिक अधिकार, निदेशक तत्व |
| विशेष बहुमत + राज्य अनुसमर्थन | संसद में विशेष बहुमत | कम से कम आधे राज्यों द्वारा अनुसमर्थन आवश्यक | राष्ट्रपति का निर्वाचन, संघ-राज्य शक्ति वितरण, संसद में प्रतिनिधित्व |
प्रतिषेध रिट (Writ of Prohibition) सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों द्वारा जारी किया जाने वाला एक आदेश है:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — निचली अदालत को किसी मामले में कार्यवाही जारी रखने से प्रतिषेधित करता है।
प्रतिषेध रिट सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों द्वारा निचली अदालतों या न्यायाधिकरणों को उन मामलों में कार्यवाही जारी रखने से रोकने के लिए जारी की जाती है जहां उनके पास अधिकार क्षेत्र नहीं है या वे कानून के विपरीत कार्य कर रहे हैं। यह एक निवारक उपाय है, जो अंतिम निर्णय लेने से पहले निचली अदालत को अपने अधिकार से अधिक कार्य करने से रोकता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रतिषेध रिट
- परिभाषा: उच्च न्यायालयों (सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय) द्वारा निचली अदालतों या न्यायाधिकरणों को उन मामलों में कार्यवाही रोकने के लिए जारी किया गया न्यायिक आदेश जहां निचली अदालत अपने अधिकार क्षेत्र से अधिक कार्य कर रही है।
- प्रकृति: यह एक निवारक रिट है, अर्थात यह निचली अदालत द्वारा निर्णय लेने से पहले कार्यवाही को रोकती है, परमादेश (Certiorari) के विपरीत जो निर्णय के बाद जारी की जाती है।
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 32 (सर्वोच्च न्यायालय) और अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) के तहत, मौलिक अधिकारों और अन्य उद्देश्यों के लिए प्रतिषेध सहित रिट जारी की जा सकती हैं।
- दायरा: यह केवल न्यायिक और अर्ध-न्यायिक निकायों पर लागू होती है, प्रशासनिक अधिकारियों या विधायी निकायों पर नहीं।
- उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि न्यायालय और न्यायाधिकरण अपने कानूनी अधिकार क्षेत्र के भीतर काम करें और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन न करें।
- अन्य रिट से तुलना: जबकि प्रतिषेध भविष्य की कार्रवाई को रोकता है, परमादेश पिछले निर्णयों को रद्द करता है। परमादेश कर्तव्य के निष्पादन को बाध्य करता है, जबकि बंदी प्रत्यक्षीकरण व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित है।
- उदाहरण: यदि कोई सिविल न्यायालय किसी ऐसे मामले की सुनवाई शुरू करता है जो कानूनी रूप से आपराधिक अधिकार क्षेत्र में आता है, तो प्रतिषेध रिट कार्यवाही को रोक सकती है।
| रिट का प्रकार | उद्देश्य | कब जारी की जाती है | किसके खिलाफ |
|---|---|---|---|
| प्रतिषेध | अधिकार क्षेत्र की अधिकता को रोकना | निर्णय से पहले (निवारक) | निचली अदालतें/न्यायाधिकरण |
| परमादेश | अवैध आदेशों को रद्द करना | निर्णय के बाद (उपचारात्मक) | निचली अदालतें/न्यायाधिकरण |
| परमादेश | कर्तव्य के निष्पादन को बाध्य करना | जब कर्तव्य का पालन नहीं किया जाता | सार्वजनिक अधिकारी/निकाय |
| बंदी प्रत्यक्षीकरण | व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा | अवैध हिरासत | हिरासत में रखने वाला प्राधिकरण |
| अधिकार पृच्छा | पद के अतिक्रमण की जांच | पद का अवैध कब्ज़ा | पद धारण करने वाला व्यक्ति |
संघ बजट के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- संघ वित्त मंत्री राष्ट्रपति की ओर से संसद के दोनों सदनों के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत करते हैं।
- संघ स्तर पर, भारत के राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना किसी अनुदान की मांग नहीं की जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
संघ बजट के संबंध में दोनों कथन सही हैं। भारत का संविधान यह अनिवार्य करता है कि राष्ट्रपति वार्षिक वित्तीय विवरण को संसद के समक्ष रखवाते हैं, जो व्यवहार में संघ वित्त मंत्री द्वारा किया जाता है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना संघ स्तर पर किसी अनुदान की मांग नहीं की जा सकती, जो सार्वजनिक व्यय पर कार्यकारी नियंत्रण सुनिश्चित करता है।
✅ कथन 1 (बजट की प्रस्तुति) – सही: अनुच्छेद 112 के तहत, राष्ट्रपति वार्षिक वित्तीय विवरण (संघ बजट) को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं, जिसे व्यवहार में संघ वित्त मंत्री राष्ट्रपति की ओर से प्रस्तुत करते हैं।
✅ कथन 2 (अनुदान की मांग) – सही: अनुच्छेद 113(3) स्पष्ट रूप से प्रावधान करता है कि भारत के राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना किसी अनुदान की मांग नहीं की जाएगी, जो भारत की संचित निधि से व्यय प्रस्तावों पर कार्यकारी नियंत्रण सुनिश्चित करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संघ बजट और वित्तीय प्रक्रिया
- वार्षिक वित्तीय विवरण (अनुच्छेद 112): राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए संसद के दोनों सदनों के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण (संघ बजट) रखवाते हैं, जिसमें अनुमानित प्राप्तियां और व्यय दिखाया जाता है।
- बजट की विषय-वस्तु: बजट व्यय को (क) भारत की संचित निधि पर भारित (गैर-मतदेय), और (ख) भारत की संचित निधि से किया गया (संसद द्वारा मतदेय) के रूप में अलग करता है।
- अनुदान की मांग (अनुच्छेद 113): संचित निधि से व्यय के लिए अनुदान की मांगों के माध्यम से संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता होती है। राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना ऐसी कोई मांग नहीं की जा सकती।
- विनियोग विधेयक (अनुच्छेद 114): अनुदानों के मतदान के बाद, स्वीकृत व्यय को पूरा करने के लिए संचित निधि से धन की निकासी को प्राधिकृत करने हेतु विनियोग विधेयक पेश किया जाता है।
- वित्त विधेयक (अनुच्छेद 110): सरकार के वित्तीय प्रस्तावों को प्रभावी करने के लिए कराधान और अन्य वित्तीय मामलों के प्रावधानों वाला धन विधेयक पेश किया जाता है।
- लेखानुदान (अनुच्छेद 116): मुख्य बजट मांगों के मतदान तक संसद वित्तीय वर्ष के एक भाग के लिए अग्रिम अनुदान कर सकती है।
- गिलोटिन: एक प्रक्रियात्मक साधन जिसमें चर्चा के लिए निर्धारित अंतिम दिन शेष सभी अनुदान मांगों को एक साथ मतदान के लिए रखा जाता है, जो निर्धारित समय के भीतर बजट पारित करना सुनिश्चित करता है।
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद | उद्देश्य | आवश्यक संसदीय कार्रवाई |
|---|---|---|---|
| वार्षिक वित्तीय विवरण | अनुच्छेद 112 | बजट अनुमानों की प्रस्तुति | चर्चा (कोई मतदान नहीं) |
| अनुदान की मांग | अनुच्छेद 113 | व्यय का अनुमोदन | मतदान आवश्यक (राष्ट्रपति की सिफारिश पर) |
| विनियोग विधेयक | अनुच्छेद 114 | धन निकासी का प्राधिकरण | मतदान आवश्यक |
| वित्त विधेयक | अनुच्छेद 110 | कर प्रस्तावों का कार्यान्वयन | मतदान आवश्यक (धन विधेयक) |
| लेखानुदान | अनुच्छेद 116 | वर्ष के भाग के लिए अग्रिम अनुदान | मतदान आवश्यक |
| भारित व्यय | अनुच्छेद 112(3) | गैर-मतदेय वैधानिक भुगतान | केवल चर्चा (कोई मतदान नहीं) |
लोक सभा के अध्यक्ष के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
जब लोक सभा के अध्यक्ष को हटाने के किसी प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा हो, तब
- वह पीठासीन नहीं होंगे।
- उन्हें बोलने का अधिकार नहीं होगा।
- वे पहली बार में उस प्रस्ताव पर मतदान करने के हकदार नहीं होंगे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 96 अध्यक्ष के हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान उनके आचरण को नियंत्रित करता है। अध्यक्ष को ऐसी कार्यवाही के दौरान सदन की अध्यक्षता करने से रोका जाता है, लेकिन वे एक सदस्य के रूप में अपने सभी अन्य अधिकार बनाए रखते हैं, जिसमें बोलने और पहली बार मतदान करने का अधिकार शामिल है।
✅ कथन 1 (पीठासीन प्रतिबंध) – सही: अनुच्छेद 96(1) के तहत, अध्यक्ष उनके हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान सदन की अध्यक्षता नहीं करेंगे, भले ही वे उपस्थित हों।
❌ कथन 2 (बोलने का अधिकार) – गलत: अनुच्छेद 96(2) के तहत, अध्यक्ष हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान सदन की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार बनाए रखते हैं।
❌ कथन 3 (मतदान अधिकार) – गलत: अनुच्छेद 96(2) के अनुसार, अध्यक्ष प्रस्ताव पर पहली बार में मतदान करने के हकदार हैं; वे केवल इस परिदृश्य में निर्णायक मत (बराबरी तोड़ने के लिए दूसरा मत) खो देते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लोक सभा के अध्यक्ष और हटाने की प्रक्रिया
- चुनाव: अध्यक्ष को लोक सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से चुना जाता है, आमतौर पर बहुमत दल से, नए सदन के गठन के तुरंत बाद।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 93-96 लोक सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से संबंधित हैं, जिसमें उनका चुनाव, हटाना और शक्तियां शामिल हैं।
- हटाने की प्रक्रिया: हटाने के प्रस्ताव के लिए 14 दिन की सूचना आवश्यक है और इसे सदन के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित किया जाना चाहिए (न कि केवल उपस्थित और मतदान करने वाले)।
- पीठासीन प्रतिबंध (अनुच्छेद 96(1)): हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान, अध्यक्ष अध्यक्षता नहीं कर सकते लेकिन सदन में उपस्थित रह सकते हैं।
- सदस्य अधिकार (अनुच्छेद 96(2)): अध्यक्ष कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार बनाए रखते हैं, और पहली बार में मतदान कर सकते हैं लेकिन अपने स्वयं के हटाने के प्रस्ताव पर निर्णायक मत का प्रयोग नहीं कर सकते।
- निष्पक्षता की अपेक्षा: चुनाव के बाद, अध्यक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी राजनीतिक पार्टी से संबंध तोड़ें और सदन की कार्यवाही संचालित करने में निष्पक्षता बनाए रखें।
- शक्तियां और कार्य: अध्यक्ष सदन में व्यवस्था बनाए रखते हैं, विशेषाधिकार के प्रश्नों पर निर्णय लेते हैं, धन विधेयकों को प्रमाणित करते हैं, और विभिन्न प्रशासनिक और अनुशासनात्मक शक्तियों का प्रयोग करते हैं।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 93-96 |
| चुनाव विधि | लोक सभा सदस्यों द्वारा अपने में से चुने जाते हैं |
| हटाने की सूचना अवधि | 14 दिन |
| हटाने के लिए आवश्यक बहुमत | सदन के सभी तत्कालीन सदस्यों का बहुमत |
| हटाने के दौरान पीठासीन | अध्यक्षता नहीं कर सकते (अनुच्छेद 96(1)) |
| हटाने के दौरान बोलने का अधिकार | हां, बनाए रखा गया (अनुच्छेद 96(2)) |
| हटाने के दौरान मतदान अधिकार | पहली बार में मतदान कर सकते हैं, निर्णायक मत नहीं (अनुच्छेद 96(2)) |
| कार्यकाल | आमतौर पर सदन के पूर्ण कार्यकाल (5 वर्ष) तक जारी रहता है |
भारतीय संसद के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- लोक सभा में लंबित विधेयक उसके विघटन पर व्यपगत हो जाता है।
- लोक सभा द्वारा पारित और राज्य सभा में लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है।
- एक विधेयक जिसके संबंध में भारत के राष्ट्रपति ने सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — 1 और 2
जब लोक सभा का विघटन होता है, तो लोक सभा में लंबित विधेयक और लोक सभा द्वारा पारित लेकिन राज्य सभा में लंबित विधेयक स्वतः व्यपगत हो जाते हैं। हालांकि, जिस विधेयक के संबंध में राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, वह लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होता है, क्योंकि संयुक्त बैठक की प्रक्रिया मान्य रहती है।
✅ कथन 1 (लोक सभा में लंबित विधेयक) – सही: लोक सभा में लंबित विधेयक उसके विघटन पर स्वतः व्यपगत हो जाता है क्योंकि विघटन उस सदन में सभी लंबित विधायी कार्यों को समाप्त कर देता है।
✅ कथन 2 (लोक सभा द्वारा पारित, राज्य सभा में लंबित विधेयक) – सही: लोक सभा द्वारा पारित लेकिन राज्य सभा में लंबित विधेयक भी लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है, क्योंकि इसे लोक सभा से उत्पन्न विधेयक माना जाता है।
❌ कथन 3 (संयुक्त बैठक के लिए सूचित विधेयक) – गलत: जिस विधेयक के संबंध में राष्ट्रपति ने सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, वह लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होता है और नई लोक सभा के गठन के बाद संयुक्त बैठक में लिया जा सकता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संसद में विधेयकों का व्यपगत होना
- लोक सभा में लंबित विधेयक: लोक सभा में लंबित सभी विधेयक उसके विघटन पर व्यपगत हो जाते हैं, सिवाय उन विधेयकों के जो पहले से पारित होकर राज्य सभा को भेजे गए हों या राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित हों।
- लोक सभा द्वारा पारित विधेयक: लोक सभा द्वारा पारित लेकिन राज्य सभा में लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाते हैं।
- केवल राज्य सभा में लंबित विधेयक: केवल राज्य सभा में उत्पन्न और लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होते हैं, क्योंकि राज्य सभा एक स्थायी सदन है।
- संयुक्त बैठक के लिए सूचित विधेयक: जिन विधेयकों के संबंध में राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, वे व्यपगत नहीं होते हैं और लोक सभा के पुनर्गठन के बाद संयुक्त बैठक में लिए जा सकते हैं।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित विधेयक: दोनों सदनों द्वारा पारित और राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होते हैं।
- संवैधानिक विधेयक: किसी भी चरण में लंबित विधेयक, जिसमें संविधान संशोधन विधेयक भी शामिल हैं, सामान्य विधेयकों के समान व्यपगत होने के नियमों का पालन करते हैं।
- राज्य सभा स्थायी सदन के रूप में: राज्य सभा एक स्थायी निकाय है और कभी विघटित नहीं होती है, अतः केवल इसमें उत्पन्न और रहने वाले विधेयक लोक सभा के विघटन के कारण व्यपगत नहीं होते हैं।
| विधेयक का प्रकार | चरण | लोक सभा के विघटन का प्रभाव |
|---|---|---|
| लोक सभा में लंबित विधेयक | लोक सभा में कोई भी चरण | व्यपगत हो जाता है |
| लोक सभा द्वारा पारित विधेयक | राज्य सभा में लंबित | व्यपगत हो जाता है |
| राज्य सभा में उत्पन्न विधेयक | केवल राज्य सभा में लंबित | व्यपगत नहीं होता है |
| दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक | राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित | व्यपगत नहीं होता है |
| संयुक्त बैठक के लिए सूचित विधेयक | राष्ट्रपति की सूचना के बाद | व्यपगत नहीं होता है |
| राष्ट्रपति द्वारा लौटाया गया विधेयक | लोक सभा में पुनर्विचार के लिए लंबित | व्यपगत हो जाता है |
भारत की संसद के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत के राष्ट्रपति द्वारा सदन का सत्रावसान मंत्रिपरिषद की सलाह की आवश्यकता के बिना किया जाता है।
- सदन का सत्रावसान सामान्यतः सदन के अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद किया जाता है लेकिन भारत के राष्ट्रपति द्वारा सत्र में बैठे सदन का सत्रावसान करने पर कोई रोक नहीं है।
- लोकसभा का विघटन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है जो असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर, मंत्रिपरिषद की सलाह पर ऐसा करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 2 और 3
सत्रावसान और विघटन भारत के राष्ट्रपति द्वारा संसद के संबंध में प्रयोग की जाने वाली दो भिन्न शक्तियाँ हैं। जबकि सत्रावसान सामान्यतः अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद किया जाता है, राष्ट्रपति तकनीकी रूप से सत्र के दौरान भी सदन का सत्रावसान कर सकते हैं, और यह शक्ति मंत्रिपरिषद की सलाह पर प्रयोग की जाती है। लोकसभा के विघटन के लिए भी राष्ट्रपति को असाधारण राजनीतिक परिस्थितियों को छोड़कर मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना आवश्यक है।
❌ कथन 1 – गलत: अनुच्छेद 85(2) के तहत, राष्ट्रपति सदनों का सत्रावसान केवल मंत्रिपरिषद (विशेष रूप से प्रधानमंत्री या मंत्रिमंडल) की सलाह पर करते हैं, स्वतंत्र रूप से नहीं।
✅ कथन 2 – सही: यद्यपि सत्रावसान सामान्यतः अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद होता है, राष्ट्रपति को सत्र में बैठे सदन का सत्रावसान करने से रोकने के लिए कोई संवैधानिक रोक नहीं है।
✅ कथन 3 – सही: राष्ट्रपति लोकसभा का विघटन मंत्रिपरिषद की सलाह पर करते हैं, दुर्लभ परिस्थितियों जैसे त्रिशंकु संसद, अविश्वास प्रस्ताव, या संवैधानिक संकट को छोड़कर।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संसद का सत्रावसान और विघटन
- स्थगन: संसद की बैठक का अस्थायी निलंबन अगली बैठक तक, पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) द्वारा निर्णीत।
- अनिश्चितकालीन स्थगन: अगली बैठक की तारीख तय किए बिना अनिश्चितकालीन स्थगन; सत्र समाप्त करता है लेकिन औपचारिक रूप से नहीं।
- सत्रावसान: अनुच्छेद 85(2) के तहत राष्ट्रपति द्वारा सत्र की औपचारिक समाप्ति, मंत्रिपरिषद की सलाह पर की जाती है; समितियों के सभी लंबित कार्य समाप्त होते हैं लेकिन सदन में लंबित विधेयक नहीं।
- विघटन: केवल लोकसभा पर लागू, राज्यसभा पर नहीं; पूरे सदन को समाप्त कर देता है, नए चुनाव आवश्यक; सभी लंबित विधेयक (राज्यसभा या संयुक्त बैठक में लंबित को छोड़कर) व्यपगत हो जाते हैं।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 85 सत्र, सत्रावसान और विघटन से संबंधित है; अनुच्छेद 352-360 आपातकालीन प्रावधानों से संबंधित हैं जो संसदीय कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं।
- राष्ट्रपति की भूमिका: राष्ट्रपति संसद को आहूत, सत्रावसान और विघटन करते हैं, लेकिन अनुच्छेद 74 के अनुसार मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करते हैं।
- मंत्रिपरिषद की सलाह का अपवाद: त्रिशंकु संसदों या राजनीतिक संकटों में, राष्ट्रपति विघटन मामलों में विवेक का प्रयोग कर सकते हैं, हालांकि यह संवैधानिक रूप से विवादास्पद बना रहता है।
UPSC Prelims 2024 - भारतीय राजव्यवस्था Chapter-wise Distribution
संसद
6 Qs (35.3%)संविधान संशोधन
2 Qs (11.8%)संवैधानिक एवं राजनीतिक समसामयिकी
1 Qs (5.9%)उच्चतम न्यायालय
1 Qs (5.9%)गैर-संवैधानिक निकाय
1 Qs (5.9%)मौलिक अधिकार
1 Qs (5.9%)निर्वाचन एवं चुनाव प्रणाली
1 Qs (5.9%)विशेष संवैधानिक प्रावधान
1 Qs (5.9%)संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1 Qs (5.9%)केंद्र-राज्य संबंध
1 Qs (5.9%)स्थानीय स्वशासन
1 Qs (5.9%)UPSC Prelims 2024 - भारतीय राजव्यवस्था Questions FAQs
Q1 How many भारतीय राजव्यवस्था questions were asked in UPSC Prelims 2024?
Q2 What is the chapter-wise question distribution for भारतीय राजव्यवस्था in UPSC Prelims 2024?
- संसद: 6 questions (35.3%)
- संविधान संशोधन: 2 questions (11.8%)
- संवैधानिक एवं राजनीतिक समसामयिकी: 1 questions (5.9%)
- उच्चतम न्यायालय: 1 questions (5.9%)
- गैर-संवैधानिक निकाय: 1 questions (5.9%)
- मौलिक अधिकार: 1 questions (5.9%)
- निर्वाचन एवं चुनाव प्रणाली: 1 questions (5.9%)
- विशेष संवैधानिक प्रावधान: 1 questions (5.9%)
- संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1 questions (5.9%)
- केंद्र-राज्य संबंध: 1 questions (5.9%)
- स्थानीय स्वशासन: 1 questions (5.9%)