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केंद्र-राज्य संबंध Previous Year Questions (PYQs)
Showing solved Previous Year Questions for Chapter: केंद्र-राज्य संबंध
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भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित पर विचार करें:
I. अंतरराज्यीय परिषद
II. राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद
III. आंचलिक परिषदें
उपरोक्त में से कितने भारत के संविधान के प्रावधानों के अनुसार स्थापित किए गए थे?
Detailed Explanation:
दिए गए तीन निकायों में से केवल अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) का उल्लेख संविधान में किया गया है।
✅ कथन I: अंतर-राज्य परिषद — सही
-
इसका प्रावधान अनुच्छेद 263 में है।
-
यह केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय बढ़ाने का कार्य करती है।
❌ कथन II: राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद — गलत
-
इसकी स्थापना 1998 में कार्यपालिका के आदेश (Executive Order) से हुई थी।
-
इसका उल्लेख संविधान में नहीं है।
❌ कथन III: क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils) — गलत
-
इनकी स्थापना States Reorganisation Act, 1956 के तहत हुई।
-
ये वैधानिक (Statutory) निकाय हैं, संवैधानिक नहीं।
अतः केवल एक निकाय संविधान के प्रावधानों के अनुसार स्थापित किया गया है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
कथन I: भारत में, राज्य सरकारों के पास लघु खनिजों के निष्कर्षण के संबंध में रियायतें देने के लिए नियम बनाने की कोई शक्ति नहीं है, भले ही ऐसे खनिज उनके क्षेत्रों में स्थित हों।
कथन II: भारत में, केंद्र सरकार के पास संबंधित कानून के तहत लघु खनिजों को अधिसूचित करने की शक्ति है।
उपरोक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
खनिज और खदान (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR Act) के तहत राज्य सरकारों को लघु खनिजों (Minor Minerals) के लिए पट्टे और अन्य रियायतों से संबंधित नियम बनाने का अधिकार है।
वहीं केंद्र सरकार यह निर्धारित करती है कि कौन-से खनिज लघु खनिज (Minor Minerals) की श्रेणी में आएंगे।
कथन सही/गलत क्यों हैं:
| कथन | स्थिति | कारण |
|---|---|---|
| I | ❌ गलत | राज्य सरकारों को लघु खनिजों के लिए रियायत संबंधी नियम बनाने का अधिकार है। |
| II | ✅ सही | केंद्र सरकार लघु खनिजों की अधिसूचना जारी करती है। |
याद रखने की ट्रिक:
"वर्गीकरण केंद्र का, नियमन राज्य का।" → केंद्र खनिज को Minor Mineral घोषित करता है, राज्य उसके उपयोग और खनन को नियंत्रित करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लघु खनिज (Minor Minerals)
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| संबंधित कानून | MMDR Act, 1957 |
| वर्गीकरण का अधिकार | केंद्र सरकार |
| रियायत/पट्टा नियम | राज्य सरकार |
| उदाहरण | रेत, बजरी, मिट्टी, साधारण पत्थर |
| उपयोग | निर्माण कार्य और स्थानीय खनन |
त्वरित तथ्य:
लघु खनिजों का प्रशासन मुख्य रूप से राज्य सरकारें करती हैं, लेकिन उन्हें "लघु खनिज" घोषित करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होता है।
भारत के संविधान के अनुसार निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: विकल्प 3 (Inter-State quarantine is a Union subject under the Union List)
संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) में विषयों का विभाजन संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में किया गया है। जिन विषयों का प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है, उन्हें सामान्यतः संघ सूची में रखा जाता है।
❌ विकल्प 1 गलत है: अंतर-राज्यीय व्यापार और वाणिज्य संघ सूची का विषय है, राज्य सूची का नहीं।
❌ विकल्प 2 गलत है: अंतर-राज्यीय प्रवासन (Inter-State Migration) संघ सूची के अंतर्गत आता है।
✅ विकल्प 3 सही है: Inter-State Quarantine संघ सूची (Entry 81) का विषय है क्योंकि राज्यों की सीमाओं के पार रोग नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय आवश्यक होता है।
❌ विकल्प 4 गलत है: Corporation Tax केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाता है और यह संघ सूची का विषय है।
संक्षिप्त नोट्स: संविधान की सातवीं अनुसूची
-
सातवीं अनुसूची केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का विभाजन करती है।
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इसमें संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची शामिल हैं।
-
संघ सूची में लगभग 100 विषय हैं जो राष्ट्रीय महत्व के हैं।
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राज्य सूची में स्थानीय और क्षेत्रीय महत्व के विषय रखे गए हैं।
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समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
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समवर्ती सूची में टकराव होने पर केंद्रीय कानून को प्राथमिकता मिलती है।
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अंतर-राज्यीय व्यापार, प्रवासन, क्वारंटीन, नागरिकता, रक्षा और कॉरपोरेशन टैक्स संघ सूची के विषय हैं।
-
यह व्यवस्था मुख्य रूप से अनुच्छेद 246 और 246A पर आधारित है।
Tagging (from Tagging.csv):
| Field | Tag |
|---|---|
| Subject | Indian Polity |
| Chapter | Federalism |
| Topic | Seventh Schedule and Distribution of Powers |
Secondary Tag (only if relevant):
| Field | Tag |
|---|---|
| Subject | Indian Polity |
| Chapter | Constitution of India |
| Topic | Union, State and Concurrent Lists |
Difficulty Level: 🟢 Easy
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निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
कथन-I: भारत में, कारागार राज्य सरकारों द्वारा प्रबंधित किए जाते हैं जिनके पास कारागारों के दैनिक प्रशासन के लिए अपने स्वयं के नियम और विनियम हैं।
कथन-II: भारत में, कारागार कारागार अधिनियम, 1894 द्वारा शासित होते हैं जिसने स्पष्ट रूप से कारागारों के विषय को प्रांतीय सरकारों के नियंत्रण में रखा।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — कथन-I और कथन-II दोनों सही हैं और कथन-II, कथन-I की सही व्याख्या है
कारागार भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-II (राज्य सूची) के अंतर्गत एक राज्य विषय है, जो राज्य सरकारों को अपने स्वयं के नियमों और विनियमों के साथ कारागारों का प्रबंधन करने की शक्ति प्रदान करता है। कारागार अधिनियम, 1894, जो भारत में कारागारों को नियंत्रित करता है, ने स्पष्ट रूप से कारागारों का नियंत्रण प्रांतीय सरकारों (अब राज्य सरकारों) को सौंपा, इस प्रकार यह व्याख्या करता है कि राज्यों के पास यह प्रशासनिक अधिकार क्यों है।
✅ कथन-I – सही: कारागार राज्य सरकारों द्वारा प्रबंधित किए जाते हैं क्योंकि यह सातवीं अनुसूची की सूची-II की प्रविष्टि 4 के अंतर्गत एक राज्य विषय है, जो राज्यों को कारागार प्रशासन के लिए अपने स्वयं के नियम और विनियम बनाने की अनुमति देता है।
✅ कथन-II – सही: कारागार अधिनियम, 1894, भारत में कारागारों को नियंत्रित करने वाला प्राथमिक कानून, ने स्पष्ट रूप से कारागारों को प्रांतीय सरकारों (अब राज्य सरकारों) के नियंत्रण में रखा, और कथन-II सही तरीके से कथन-I के संवैधानिक आधार की व्याख्या करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में कारागार प्रशासन
- विधायी ढांचा: कारागार अधिनियम, 1894 भारत में कारागारों को नियंत्रित करने वाला सबसे पुराना और प्राथमिक केंद्रीय कानून है, हालांकि इसे राज्यों द्वारा लागू किया जाता है।
- संवैधानिक स्थिति: 'कारागार' सातवीं अनुसूची की सूची-II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 4 के अंतर्गत आता है, जो इसे विशेष रूप से एक राज्य विषय बनाता है।
- राज्य प्राधिकार: प्रत्येक राज्य का अपना कारागार मैनुअल और कारागार अधिनियम, 1894 के तहत बनाए गए नियम हैं, जिससे राज्यों में कारागार प्रशासन में भिन्नता होती है।
- केंद्रीय भूमिका: केंद्र सरकार मॉडल कारागार मैनुअल (2016) और पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो (BPR&D) के माध्यम से मार्गदर्शन प्रदान करती है, लेकिन इसका कोई प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है।
- न्यायिक निरीक्षण: सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों (जैसे सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन मामले में) ने कारागार की स्थितियों और कैदियों के अधिकारों में महत्वपूर्ण सुधार किया है।
- हाल के विकास: मॉडल कारागार और सुधार सेवा अधिनियम, 2023 का प्रस्ताव औपनिवेशिक युग के कारागार अधिनियम, 1894 को बदलने के लिए किया गया है, जिसमें पुनर्वास और सुधार पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
भारतीय राजव्यवस्था में निम्नलिखित में से कौन सी एक अनिवार्य विशेषता है जो यह संकेत करती है कि यह संघीय चरित्र वाली है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा की जाती है।
एक स्वतंत्र न्यायपालिका संघवाद की एक परिभाषित विशेषता है क्योंकि यह शक्तियों के विभाजन और संविधान की व्याख्या के संबंध में संघ और राज्यों के बीच विवादों को हल करने के लिए एक निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में कार्य करती है। एक संघीय व्यवस्था में, न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि दोनों स्तर की सरकारें अपनी संवैधानिक सीमाओं के भीतर संचालित होती हैं, जिससे संघीय संतुलन बना रहता है।
आइए प्रत्येक विकल्प का मूल्यांकन करें:
✅ विकल्प 1 – सही: एक स्वतंत्र न्यायपालिका संघवाद के लिए आवश्यक है क्योंकि यह केंद्र-राज्य विवादों को हल करती है और शक्तियों के संवैधानिक वितरण की रक्षा करती है, संघीय संरचना के संरक्षक के रूप में कार्य करती है।
❌ विकल्प 2 – गलत: संघीय विधायिका में घटक इकाइयों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का होना संघीय और हस्तांतरित शक्तियों वाली एकात्मक प्रणालियों दोनों में सामान्य है; यह विशेष रूप से एक संघीय विशेषता नहीं है।
❌ विकल्प 3 – गलत: संघीय मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति एक राजनीतिक घटना है, न कि संवैधानिक विशेषता जो संघवाद को परिभाषित करती है।
❌ विकल्प 4 – गलत: जबकि न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय मौलिक अधिकार लोकतंत्र और विधि के शासन के लिए महत्वपूर्ण हैं, वे संघीय और एकात्मक दोनों राज्यों में मौजूद हैं और संघवाद के विशेष संकेतक नहीं हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संघवाद की आवश्यक विशेषताएं
- दोहरी राजव्यवस्था: केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण जिसमें प्रत्येक के अधिकार के अलग क्षेत्र होते हैं।
- लिखित संविधान: एक सर्वोच्च लिखित संविधान जो शक्तियों को सीमांकित करता है और आसानी से एकतरफा संशोधित नहीं किया जा सकता।
- स्वतंत्र न्यायपालिका: संविधान की व्याख्या करने और केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का निर्णय करने के लिए एक निष्पक्ष न्यायपालिका।
- कठोर संविधान: संघीय संरचना को मनमाने परिवर्तनों से बचाने के लिए विशेष प्रक्रियाओं की आवश्यकता वाली संशोधन प्रक्रिया।
- द्विसदनीयता: एक द्विसदनीय विधायिका जहां उच्च सदन घटक इकाइयों का प्रतिनिधित्व करता है (जैसे राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है)।
- संविधान की सर्वोच्चता: सरकार के दोनों स्तर संविधान से अधिकार प्राप्त करते हैं और संविधान द्वारा बाध्य हैं।
भारत में लघु खनिजों के प्रबंधन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- देश में प्रचलित कानून के अनुसार रेत एक 'लघु खनिज' है।
- राज्य सरकारों को लघु खनिजों के खनन पट्टे देने की शक्ति है, लेकिन लघु खनिजों के अनुदान से संबंधित नियम बनाने की शक्तियाँ केंद्र सरकार के पास हैं।
- राज्य सरकारों को लघु खनिजों के अवैध खनन को रोकने के लिए नियम बनाने की शक्ति है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न भारत में लघु खनिजों को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक और कानूनी संरचना, विशेष रूप से MMDR अधिनियम, 1957 के तहत केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन की समझ का परीक्षण करता है।
✅ कथन 1 – सही: खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 3(e) के तहत रेत को 'लघु खनिज' के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसमें बजरी, मिट्टी, संगमरमर और चूना पत्थर जैसे अन्य खनिज भी शामिल हैं।
❌ कथन 2 – गलत: लघु खनिजों के अनुदान से संबंधित नियम बनाने की शक्ति केंद्र सरकार के पास नहीं बल्कि राज्य सरकारों के पास है। MMDR अधिनियम की धारा 15 राज्य सरकारों को लघु खनिजों के संबंध में उत्खनन पट्टे, खनन पट्टे और अन्य खनिज रियायतों के अनुदान को विनियमित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार देती है।
✅ कथन 3 – सही: राज्य सरकारों को MMDR अधिनियम की धारा 15 के तहत लघु खनिजों के अवैध खनन को रोकने के लिए नियम बनाने की शक्ति है, जिसमें विनियमन, प्रवर्तन और अनधिकृत उत्खनन की रोकथाम के उपाय शामिल हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में लघु खनिज प्रबंधन
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| कानूनी ढांचा | खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR अधिनियम) |
| वर्गीकरण | खनिजों को प्रमुख खनिज (अनुसूची 1) और लघु खनिज (अनुसूची 2) में वर्गीकृत किया गया है |
| लघु खनिजों के उदाहरण | रेत, बजरी, मिट्टी, संगमरमर, चूना पत्थर, लेटराइट, कंकड़, मुरुम |
| केंद्र सरकार की शक्तियाँ | प्रमुख खनिजों का विनियमन; अनुसूचियों में संशोधन की शक्ति; समग्र नीति ढांचा |
| राज्य सरकार की शक्तियाँ | लघु खनिजों के लिए खनन पट्टे प्रदान करना; उत्खनन, पट्टे और परिवहन के लिए नियम बनाना; अवैध खनन को रोकना; रॉयल्टी और कर लगाना |
| संवैधानिक आधार | प्रविष्टि 23 (सूची II - राज्य सूची) सूची I के प्रावधानों के अधीन खानों और खनिज विकास के विनियमन और विकास को शामिल करती है |
| 2015 संशोधन | MMDR संशोधन अधिनियम, 2015 ने राज्यों को लघु खनिज प्रशासन में अधिक स्वायत्तता प्रदान की |
निम्नलिखित में से किसने सुझाव दिया कि राज्यपाल राज्य के बाहर का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति होना चाहिए और तीव्र राजनीतिक संबंधों के बिना एक निष्पक्ष व्यक्ति होना चाहिए या हाल के अतीत में राजनीति में भाग नहीं लिया होना चाहिए?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — सरकारिया आयोग 1983
सरकारिया आयोग (1983-88) की स्थापना केंद्र-राज्य संबंधों की जांच के लिए की गई थी और इसने राज्यपाल की नियुक्ति के संबंध में विशिष्ट सिफारिशें कीं। इसने सुझाव दिया कि राज्यपाल राज्य के बाहर का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति होना चाहिए, तीव्र राजनीतिक संबंधों के बिना एक निष्पक्ष व्यक्ति होना चाहिए, और हाल के अतीत में सक्रिय राजनीति में भाग नहीं लिया होना चाहिए। इस सिफारिश का उद्देश्य राज्य प्रशासन में राज्यपाल की तटस्थता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विभिन्न आयोगों द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति पर सिफारिशें
| आयोग/समिति | वर्ष | राज्यपाल पर प्रमुख सिफारिशें |
|---|---|---|
| प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग | 1966 | प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित; राज्यपाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर विशिष्ट सिफारिशें नहीं कीं |
| राजमन्नार समिति | 1969 | केंद्र-राज्य संबंधों पर तमिलनाडु समिति; राज्यपाल के पद को समाप्त करने का सुझाव दिया |
| सरकारिया आयोग | 1983-88 | • राज्य के बाहर का प्रतिष्ठित व्यक्ति • तीव्र राजनीतिक संबंधों के बिना निष्पक्ष व्यक्ति • हाल ही में सक्रिय राजनीति में भाग नहीं लिया होना चाहिए • नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री से परामर्श • पांच वर्ष का कार्यकाल सुरक्षा |
| संविधान के कार्यकरण की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) | 2000-02 | • पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल • केवल महाभियोग जैसी प्रक्रिया के माध्यम से हटाना • राज्य के मुख्यमंत्री और अध्यक्ष के परामर्श से नियुक्त किया जाना चाहिए |
| पुंछी आयोग | 2007-10 | • सरकारिया आयोग की सिफारिशों का समर्थन किया • सुझाव दिया कि राज्यपाल नियुक्ति वाले राज्य का नहीं होना चाहिए • प्रधानमंत्री, अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता सहित समिति के माध्यम से नियुक्ति |
भारत की संसद को राज्य सूची की किसी भी मद पर राष्ट्रीय हित में कानून बनाने की शक्ति प्राप्त होती है, यदि इस आशय का प्रस्ताव पारित किया जाता है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — राज्य सभा द्वारा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 249 के तहत संसद को राज्य सूची के किसी भी विषय पर कानून बनाने की शक्ति मिलती है यदि राज्य सभा एक प्रस्ताव पारित करके यह घोषित करती है कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है। इस प्रस्ताव के लिए राज्य सभा में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। एक बार पारित होने के बाद, संसद को उस विषय पर एक वर्ष के लिए कानून बनाने की शक्ति मिलती है, जिसे एक और ऐसा प्रस्ताव पारित करके बढ़ाया जा सकता है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि राज्यों के विधायी क्षेत्र का सम्मान किया जाए और साथ ही राष्ट्रीय आपातकाल या तत्काल राष्ट्रीय महत्व के मामलों में लचीलापन बना रहे।
संसद किसी अंतरराष्ट्रीय संधि को लागू करने के लिए संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग के लिए कोई भी कानून बना सकती है
Detailed Explanation:
संविधान के अनुच्छेद 253 के तहत संसद को अधिकार है कि वह संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग के लिए अंतरराष्ट्रीय संधियों, समझौतों या सम्मेलनों को लागू करने के लिए कानून बना सके।
यह शक्ति किसी भी राज्य की सहमति के बिना प्रयोग की जाती है, क्योंकि यह भारत के अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने के लिए संसद की विधायी क्षमता के अंतर्गत आती है। यह उन पाँच असाधारण परिस्थितियों में से एक है जिनमें संसद राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकती है।