भारत के संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार, संसद निम्नलिखित तरीकों से संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन कर सकती है:
- परिवर्धन (Addition)
- परिवर्तन (Variation)
- निरसन (Repeal)
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग करके सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 368 संसद को तीन विशिष्ट तरीकों से संविधान में संशोधन करने की व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है: परिवर्धन (नए प्रावधानों को जोड़ना), परिवर्तन (मौजूदा प्रावधानों को संशोधित करना), और निरसन (प्रावधानों को हटाना)। यह लचीलापन सुनिश्चित करता है कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ बना रहे जो संवैधानिक निरंतरता बनाए रखते हुए बदलती सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आवश्यकताओं के अनुकूल हो सके।
✅ कथन 1 (परिवर्धन) – सही: संसद संविधान में नए प्रावधान जोड़ सकती है, जैसे 93वें संशोधन अधिनियम, 2005 के माध्यम से अनुच्छेद 15(5) का समावेश, जो शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की अनुमति देता है।
✅ कथन 2 (परिवर्तन) – सही: संसद मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों को संशोधित कर सकती है, जैसा कि 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रदर्शित किया गया, जिसने प्रस्तावना और विभिन्न अन्य अनुच्छेदों में परिवर्तन किए।
✅ कथन 3 (निरसन) – सही: संसद संवैधानिक प्रावधानों को पूरी तरह से हटा सकती है, जैसा कि 26वें संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा उदाहरित है, जिसने रियासतों के पूर्व शासकों के लिए प्रिवी पर्स को समाप्त कर दिया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अनुच्छेद 368 के तहत संवैधानिक संशोधन शक्तियाँ
- अनुच्छेद 368: संसद को संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन करने की प्रक्रिया और शक्ति प्रदान करता है, जिससे यह न तो अत्यधिक कठोर और न ही अत्यधिक लचीला बनता है।
- संशोधन की तीन विधियाँ: परिवर्धन (नए अनुच्छेद/खंड जोड़ना), परिवर्तन (मौजूदा प्रावधानों को संशोधित करना), और निरसन (प्रावधानों को पूरी तरह हटाना)।
- संशोधन प्रक्रिया: संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3) की आवश्यकता होती है; कुछ संशोधनों के लिए कम से कम आधे राज्य विधानमंडलों द्वारा अनुसमर्थन भी आवश्यक है।
- मूल संरचना सिद्धांत: केशवानंद भारती मामले (1973) में स्थापित, संसद की संशोधन शक्ति को सीमित करता है—कुछ मौलिक विशेषताओं को बदला या नष्ट नहीं किया जा सकता।
- संशोधनों के प्रकार: साधारण बहुमत संशोधन (जैसे राज्यों का निर्माण/समाप्ति), विशेष बहुमत संशोधन (अधिकांश प्रावधान), और विशेष बहुमत प्लस राज्य अनुसमर्थन (संघीय प्रावधान, प्रतिनिधित्व, आदि)।
- उल्लेखनीय संशोधन: 42वाँ संशोधन (लघु संविधान), 44वाँ संशोधन (आपातकाल के दौरान सीमित किए गए कुछ अधिकार बहाल किए), 73वें और 74वें संशोधन (स्थानीय स्वशासन), 101वाँ संशोधन (जीएसटी)।
| संशोधन का प्रकार | आवश्यक बहुमत | राज्य अनुसमर्थन | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| साधारण बहुमत | उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत | आवश्यक नहीं | नए राज्यों का निर्माण, नागरिकता प्रावधान |
| विशेष बहुमत | कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित और मतदान करने वाले 2/3 | आवश्यक नहीं | मौलिक अधिकार, निदेशक तत्व |
| विशेष बहुमत + राज्य अनुसमर्थन | संसद में विशेष बहुमत | कम से कम आधे राज्यों द्वारा अनुसमर्थन आवश्यक | राष्ट्रपति का निर्वाचन, संघ-राज्य शक्ति वितरण, संसद में प्रतिनिधित्व |
Question 2 of 4 संशोधन प्रक्रिया
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