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संवैधानिक एवं राजनीतिक समसामयिकी Previous Year Questions (PYQs)
Showing solved Previous Year Questions for Chapter: संवैधानिक एवं राजनीतिक समसामयिकी
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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के तहत शून्य प्रथम सूचना रिपोर्ट (जीरो एफआईआर) के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- जीरो एफआईआर किसी पुलिस स्टेशन में दर्ज की जा सकती है, भले ही संज्ञेय/गैर-संज्ञेय अपराध का स्थान उस पुलिस स्टेशन के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर हो।
- उस पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी, जहां जीरो एफआईआर दर्ज की गई है, सक्षम प्राधिकारी की अनुमति से प्रारंभिक जांच शुरू कर सकता है।
- जीरो एफआईआर के तहत, सूचना देने वाले को इलेक्ट्रॉनिक रूप से जानकारी प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
कथन 1 — सही। BNSS, 2023 की धारा 173(1) के तहत, संज्ञेय अपराधों के लिए किसी भी पुलिस थाने में Zero FIR दर्ज की जा सकती है, भले ही वह क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर हो।
कथन 2 — गलत। BNSS की धारा 173(3) के तहत प्रारंभिक जाँच की अनुमति है, लेकिन यह Zero FIR से विशेष रूप से जुड़ी नहीं है। यह 3 से 7 वर्ष की सजा वाले संज्ञेय अपराधों पर लागू होती है और सक्षम प्राधिकरण की पूर्व अनुमति आवश्यक है।
कथन 3 — गलत। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना देना अनिवार्य नहीं है। धारा 173(1) सूचना मौखिक रूप से या इलेक्ट्रॉनिक संचार द्वारा देने की अनुमति देती है — यह एक विकल्प है, दायित्व नहीं।
'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- प्रावधान 18वीं लोकसभा से लागू होंगे.
- अधिनियम बनने के बाद यह 15 वर्षों तक लागू रहेगा।
- अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कोटा के भीतर अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण के प्रावधान हैं।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 3 — केवल कथन 2 और 3 सही हैं
नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 (106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम) लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण प्रदान करता है। लेकिन यह आरक्षण 18वीं लोकसभा से लागू नहीं होगा। इसे अगली जनगणना और परिसीमन (Delimitation) के बाद लागू किया जाएगा।
❌ कथन 1 गलत है: आरक्षण 18वीं लोकसभा से लागू नहीं होगा। यह पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने और परिसीमन के बाद लागू होगा।
✅ कथन 2 सही है: यह आरक्षण अधिनियम लागू होने की तिथि से 15 वर्षों तक प्रभावी रहेगा। संसद चाहे तो इस अवधि को आगे बढ़ा सकती है।
✅ कथन 3 सही है: अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
संक्षिप्त नोट्स: नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023
-
106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 के रूप में पारित।
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लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण।
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SC/ST आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान।
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लागू होने से पहले जनगणना और परिसीमन आवश्यक।
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संविधान में अनुच्छेद 334A जोड़ा गया।
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आरक्षण की अवधि 15 वर्ष निर्धारित की गई है।
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राज्यसभा और विधान परिषदों पर लागू नहीं।
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राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का उद्देश्य।
भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
कार्रवाई : वह अधिनियम जिसके अंतर्गत यह आता है
- पुलिस या सैन्य वर्दी का अनधिकृत पहनना : द ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923
- जानबूझकर भ्रमित करना या किसी पुलिस अधिकारी या सैन्य अधिकारी के साथ हस्तक्षेप करना जब वे अपने कर्तव्यों में लगे हों: द इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872
- उत्सव में गोलीबारी जो दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है : द आर्म्स (अमेंडमेंट) एक्ट, 2019
उपर्युक्त युग्मों में से कितने सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो
यह प्रश्न कानून प्रवर्तन और सार्वजनिक सुरक्षा से संबंधित विभिन्न अधिनियमों के ज्ञान का परीक्षण करता है। तीन युग्मों में से दो सही सुमेलित हैं जबकि एक युग्म गलत अधिनियम के साथ अपराध को जोड़ता है।
✅ युग्म 1 – सही: द ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 वास्तव में धारा 7 के तहत नौसेना, सैन्य, वायु सेना, पुलिस, या अन्य आधिकारिक वर्दी के अनधिकृत पहनने को प्रतिबंधित करता है।
❌ युग्म 2 – गलत: जानबूझकर किसी पुलिस अधिकारी या सैन्य अधिकारी को भ्रमित करना या हस्तक्षेप करना द ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 (धारा 6) के अंतर्गत आता है, न कि द इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 के अंतर्गत।
✅ युग्म 3 – सही: द आर्म्स (अमेंडमेंट) एक्ट, 2019 स्पष्ट रूप से उत्सव में गोलीबारी के खिलाफ प्रावधान शामिल करता है जो मानव जीवन या दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 और शस्त्र अधिनियम
| अधिनियम | मुख्य प्रावधान |
|---|---|
| आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 |
|
| शस्त्र (संशोधन) अधिनियम, 2019 |
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भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- न्यायिक हिरासत का अर्थ है कि आरोपी संबंधित मजिस्ट्रेट की हिरासत में है और ऐसे आरोपी को जेल में नहीं, बल्कि पुलिस स्टेशन में बंद रखा जाता है।
- न्यायिक हिरासत के दौरान, मामले के प्रभारी पुलिस अधिकारी को न्यायालय की स्वीकृति के बिना संदिग्ध से पूछताछ करने की अनुमति नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न भारतीय दंड प्रक्रिया के तहत न्यायिक हिरासत और पुलिस हिरासत के बीच अंतर की समझ का परीक्षण करता है। कथन 1 न्यायिक हिरासत का गलत वर्णन करता है, जबकि कथन 2 न्यायिक हिरासत के दौरान पूछताछ प्रतिबंधों की सही व्याख्या करता है।
❌ कथन 1 – गलत: न्यायिक हिरासत का अर्थ है कि आरोपी संबंधित मजिस्ट्रेट की हिरासत में है और उसे पुलिस स्टेशन में नहीं, बल्कि जेल में बंद रखा जाता है। पुलिस हिरासत में आरोपी को पुलिस स्टेशन लॉकअप में रखा जाता है।
✅ कथन 2 – सही: न्यायिक हिरासत के दौरान, प्रभारी पुलिस अधिकारी न्यायालय की स्वीकृति के बिना संदिग्ध से पूछताछ नहीं कर सकता। न्यायालय आवश्यक समझे जाने पर पूछताछ की अनुमति दे सकता है, लेकिन ऐसी अनुमति अनिवार्य है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पुलिस हिरासत बनाम न्यायिक हिरासत
| पहलू | पुलिस हिरासत | न्यायिक हिरासत |
|---|---|---|
| हिरासत प्राधिकरण | आरोपी पुलिस की भौतिक हिरासत में | आरोपी संबंधित मजिस्ट्रेट की हिरासत में |
| स्थान | पुलिस स्टेशन लॉकअप | जेल |
| पूछताछ अधिकार | पुलिस स्वतंत्र रूप से पूछताछ कर सकती है | पुलिस न्यायालय की अनुमति के बिना पूछताछ नहीं कर सकती |
| अधिकतम अवधि | जांच के दौरान 15 दिन (कुल) | मुकदमा पूर्ण होने या जमानत तक विस्तारित हो सकता है |
| कानूनी प्रावधान | धारा 167, सीआरपीसी | धारा 167, सीआरपीसी |
भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- जब कोई कैदी पर्याप्त मामला बनाता है, तो पैरोल को ऐसे कैदी को अस्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि यह उसके अधिकार का विषय बन जाता है।
- राज्य सरकारों के पास पैरोल पर कैदियों की रिहाई के अपने स्वयं के नियम हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न भारत में पैरोल प्रावधानों की समझ का परीक्षण करता है। जबकि कैदी पैरोल के लिए आवेदन कर सकते हैं, यह एक स्वचालित अधिकार नहीं है बल्कि अधिकारियों द्वारा दी जाने वाली विवेकाधीन राहत है। राज्य सरकारें केंद्रीय जेल कानून के ढांचे के भीतर अपने स्वयं के पैरोल नियम बनाती हैं।
❌ कथन 1 – गलत: पैरोल अधिकार का विषय नहीं है बल्कि जेल अधिकारियों द्वारा दिया जाने वाला एक विवेकाधीन विशेषाधिकार है। भले ही कोई कैदी पर्याप्त मामला बनाए, अधिकारियों के पास सुरक्षा चिंताओं, अपराध की प्रकृति और कैदी के आचरण सहित विभिन्न कारकों के आधार पर पैरोल अस्वीकार करने का विवेक रहता है।
✅ कथन 2 – सही: राज्य सरकारों ने जेल अधिनियम, 1894 और कैदी अधिनियम, 1900 के व्यापक ढांचे के भीतर पैरोल पर कैदियों की रिहाई के अपने स्वयं के नियम बनाए हैं, क्योंकि जेल और कानून-व्यवस्था सातवीं अनुसूची के तहत राज्य विषय हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में पैरोल और फरलो
- पैरोल: विशिष्ट आधारों (पारिवारिक आपात स्थिति, चिकित्सा मुद्दों आदि) पर दी जाने वाली अस्थायी रिहाई, जो एक विवेकाधीन विशेषाधिकार है, अधिकार नहीं।
- फरलो: दीर्घकालिक कैदियों को पारिवारिक संबंध बनाए रखने और संस्थागतकरण को रोकने के लिए अधिकार के रूप में दी जाने वाली आवधिक रिहाई।
- कानूनी ढांचा: केंद्रीय स्तर पर जेल अधिनियम, 1894 और कैदी अधिनियम, 1900 द्वारा शासित; राज्य विस्तृत नियम बनाते हैं।
- जेल राज्य विषय के रूप में: सातवीं अनुसूची की सूची II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 4 के तहत, राज्यों को अपने स्वयं के पैरोल नियम बनाने की अनुमति देता है।
- न्यायिक स्थिति: सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि पैरोल विवेकाधीन है और आधार स्थापित होने पर भी इसे अस्वीकार किया जा सकता है (हरियाणा राज्य बनाम मोहिंदर सिंह, 2000)।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- आधार मेटाडेटा को तीन महीने से अधिक समय तक संग्रहीत नहीं किया जा सकता है।
- राज्य आधार डेटा साझा करने के लिए निजी निगमों के साथ कोई अनुबंध नहीं कर सकता है।
- बीमा उत्पाद प्राप्त करने के लिए आधार अनिवार्य है।
- भारत की संचित निधि से वित्त पोषित लाभ प्राप्त करने के लिए आधार अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 4
सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के आधार निर्णय ने धारा 57 को निरस्त कर दिया (निजी संस्थाओं को आधार का उपयोग करने से रोकना) और धारा 7 को बरकरार रखा (भारत की संचित निधि से वित्त पोषित कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार की अनुमति)। न्यायालय ने यह भी निर्णय दिया कि मेटाडेटा संग्रहण छह महीने तक सीमित है, तीन नहीं, और बीमा जैसी सेवाओं के लिए आधार को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता है।
❌ कथन 1 – गलत: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार आधार मेटाडेटा को छह महीने तक संग्रहीत किया जा सकता है, तीन महीने नहीं।
✅ कथन 2 – सही: धारा 57 को निरस्त कर दिया गया, जिससे राज्य को आधार डेटा साझा करने के लिए निजी निगमों के साथ अनुबंध करने से रोक दिया गया।
❌ कथन 3 – गलत: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि बीमा उत्पादों या अन्य वित्तीय सेवाओं के लिए आधार अनिवार्य नहीं है।
✅ कथन 4 – सही: धारा 7 को बरकरार रखा गया, जिससे भारत की संचित निधि से वित्त पोषित लाभों के लिए आधार अनिवार्य हो गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सर्वोच्च न्यायालय का आधार निर्णय (2018)
| प्रावधान/पहलू | सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय |
|---|---|
| संवैधानिक वैधता | आधार अधिनियम को संवैधानिक रूप से वैध माना गया |
| धारा 7 | बरकरार रखा गया – भारत की संचित निधि से वित्त पोषित कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार अनिवार्य किया जा सकता है |
| धारा 57 | निरस्त कर दिया गया – निजी संस्थाएं सत्यापन के लिए आधार की मांग नहीं कर सकती हैं |
| मेटाडेटा संग्रहण | 6 महीने तक सीमित (पहले का प्रावधान 5 वर्षों की अनुमति देता था) |
| बैंकिंग सेवाएं | बैंक खाता खोलने के लिए अनिवार्य नहीं |
| मोबाइल सिम कार्ड | मोबाइल कनेक्शन प्राप्त करने के लिए अनिवार्य नहीं |
| स्कूल प्रवेश | स्कूल प्रवेश के लिए अनिवार्य नहीं |
| निजता का अधिकार | मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त; सुरक्षा उपायों के साथ आधार निजता का उल्लंघन नहीं करता है |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के अनुसार, किसी राज्य में शिक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र होने के लिए, एक व्यक्ति को संबंधित राज्य शिक्षक शिक्षा परिषद द्वारा निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं प्राप्त करने की आवश्यकता होगी।
- RTE अधिनियम के अनुसार, प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ाने के लिए, एक उम्मीदवार को राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद के दिशानिर्देशों के अनुसार आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करनी आवश्यक है।
- भारत में, 90% से अधिक शिक्षक शिक्षा संस्थान सीधे राज्य सरकारों के अधीन हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009, शिक्षकों के लिए विशिष्ट योग्यताएं और पात्रता मानदंड अनिवार्य करता है। कथन 2 एकमात्र सही कथन है क्योंकि यह प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ाने के लिए NCTE दिशानिर्देशों के अनुसार आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) उत्तीर्ण करने की आवश्यकता को सटीक रूप से दर्शाता है।
❌ कथन 1 – गलत: शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यताएं राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा निर्धारित की जाती हैं, न कि राज्य शिक्षक शिक्षा परिषदों द्वारा। NCTE राष्ट्रीय प्राधिकरण है जो पूरे भारत में समान मानक निर्धारित करता है।
✅ कथन 2 – सही: RTE अधिनियम के अनुसार, उम्मीदवारों को प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा I से V) में पढ़ाने के लिए पात्र होने के लिए NCTE दिशानिर्देशों के अनुसार आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) उत्तीर्ण करनी होगी।
❌ कथन 3 – गलत: उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण (AISHE) 2019-20 के अनुसार, भारत में लगभग 67% शिक्षक शिक्षा संस्थान निजी रूप से प्रबंधित हैं, जबकि केवल लगभग 33% सरकारी संचालित हैं। यह इस दावे के विपरीत है कि 90% से अधिक सीधे राज्य सरकारों के अधीन हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: शिक्षा का अधिकार अधिनियम और शिक्षक पात्रता
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| RTE अधिनियम का अधिनियमन | 2009 में अधिनियमित, 1 अप्रैल 2010 को लागू हुआ |
| संवैधानिक आधार | अनुच्छेद 21A - 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार |
| NCTE की भूमिका | शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यताएं निर्धारित करता है; NCTE अधिनियम, 1993 के तहत स्थापित |
| TET आवश्यकता | कक्षा I-VIII में पढ़ाने के लिए अनिवार्य; NCTE दिशानिर्देशों के अनुसार राज्यों द्वारा आयोजित |
| शिक्षक शिक्षा संस्थान | ~67% निजी, ~33% सरकारी संचालित (AISHE 2019-20) |
| न्यूनतम योग्यताएं | उच्च माध्यमिक + प्रारंभिक शिक्षा में 2 वर्षीय डिप्लोमा (D.El.Ed) या प्राथमिक शिक्षकों के लिए B.Ed |