UPSC CSE Prelims
संसद Previous Year Questions (PYQs)
Showing solved Previous Year Questions for Chapter: संसद
Topic Breakdown: Scroll →
भारत की संसद में सदस्यों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- अतारांकित प्रश्न वे होते हैं जिनका सदस्य सदन में मौखिक उत्तर चाहता है।
- तारांकित प्रश्न वे होते हैं जिनका सदस्य लिखित उत्तर चाहता है।
- अतारांकित प्रश्न पर कोई पूरक प्रश्न नहीं पूछा जा सकता.
उपरोक्त कथनों के आधार पर निम्नलिखित में से कौन सा निष्कर्ष सही है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: विकल्प 3 — केवल एक सही कथन (कथन 3)
कथन 1 — गलत। अतारांकित प्रश्नों का उत्तर लिखित रूप में दिया जाता है — मौखिक नहीं। संबंधित मंत्री द्वारा लिखित उत्तर सदन की मेज पर रखा हुआ माना जाता है।
कथन 2 — गलत। तारांकित प्रश्नों (* से चिह्नित) का उत्तर सदन में मौखिक रूप से दिया जाता है — लिखित नहीं।
कथन 3 — सही। चूँकि अतारांकित प्रश्नों का उत्तर लिखित रूप में दिया जाता है, इसलिए उन पर कोई अनुपूरक प्रश्न नहीं पूछा जा सकता। अनुपूरक प्रश्न केवल निम्न के मौखिक उत्तर के बाद पूछे जा सकते हैं:
- तारांकित प्रश्न
- अल्प सूचना प्रश्न
मुख्य ट्रिक: कथन 1 और 2 एक-दूसरे के बिल्कुल उलटे हैं
भारत की संसद की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- हालांकि इस समिति के सदस्य संसद के दोनों सदनों से चुने जाते हैं, लेकिन इस समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति राज्यसभा के सभापति द्वारा की जाती है।
- बीस सदस्य राज्य सभा द्वारा और दस सदस्य लोकसभा द्वारा चुने जाते हैं।
- केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री को छोड़कर कोई भी मंत्री इस समिति का सदस्य बनने के लिए पात्र नहीं है।
- सदस्यों को उनके कार्यालय में प्रवेश करने की तारीख से दो साल की निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है।
उपरोक्त कथनों के आधार पर निम्नलिखित में से कौन सा निष्कर्ष सही है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: विकल्प 4 — कोई सही कथन नहीं
कथन 1 — गलत। अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है — राज्यसभा सभापति द्वारा नहीं।
कथन 2 — गलत। संरचना उल्टी है:
- 20 सदस्य → लोकसभा द्वारा निर्वाचित
- 10 सदस्य → राज्यसभा द्वारा निर्वाचित
कथन 3 — गलत। कोई भी मंत्री सदस्य बनने के लिए पात्र नहीं है — कोई अपवाद नहीं, यहाँ तक कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री के लिए भी नहीं। यदि निर्वाचन के बाद कोई सदस्य मंत्री बनता है, तो वह तत्काल सदस्यता खो देता है।
कथन 4 — गलत। कार्यकाल एक वर्ष से अधिक नहीं होता — दो वर्ष नहीं। इसे PAC, प्राक्कलन समिति की तरह वार्षिक रूप से पुनर्गठित किया जाता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
I. लोक सभा के विघटन पर, अध्यक्ष विघटन के बाद लोक सभा की पहली बैठक से ठीक पहले तक अपना कार्यालय खाली नहीं करेगा।
II. भारत के संविधान के प्रावधानों के अनुसार, लोक सभा के एक सदस्य को अध्यक्ष के रूप में चुने जाने पर तुरंत अपने राजनीतिक दल से इस्तीफा देना होगा।
III. लोक सभा के अध्यक्ष को लोक सभा के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित एक प्रस्ताव द्वारा उसके कार्यालय से हटाया जा सकता है, बशर्ते कि कोई भी प्रस्ताव तब तक पेश नहीं किया जाएगा जब तक कि प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के इरादे से कम से कम चौदह दिन का नोटिस न दिया गया हो।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
लोकसभा भंग होने के बाद भी स्पीकर अपने पद पर बने रहते हैं और नई लोकसभा की पहली बैठक से ठीक पहले पद छोड़ते हैं। साथ ही, स्पीकर को हटाने के लिए लोकसभा में 14 दिन की पूर्व सूचना के साथ बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है।
लेकिन संविधान में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि स्पीकर बनने पर सदस्य को अपनी राजनीतिक पार्टी से इस्तीफा देना होगा। यह केवल निष्पक्षता की एक परंपरा है।
अन्य कथन क्यों गलत हैं:
| कथन | स्थिति | कारण |
|---|---|---|
| I | ✅ सही | लोकसभा भंग होने के बाद भी स्पीकर पद पर बने रहते हैं। |
| II | ❌ गलत | पार्टी से इस्तीफा देना संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है। |
| III | ✅ सही | 14 दिन की सूचना और सदन के बहुमत से हटाया जा सकता है। |
📝 संक्षिप्त नोट्स: लोकसभा अध्यक्ष (Speaker)
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| संबंधित अनुच्छेद | अनुच्छेद 93 एवं 94 |
| चुनाव | लोकसभा के सदस्य करते हैं |
| कार्यकाल | नई लोकसभा की पहली बैठक तक जारी रहता है |
| हटाने की प्रक्रिया | सदन के बहुमत से |
| पूर्व सूचना | 14 दिन |
| पार्टी छोड़ना | संविधान में अनिवार्य नहीं |
त्वरित तथ्य:
लोकसभा अध्यक्ष से निष्पक्ष रहने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन भारतीय संविधान उन्हें पार्टी सदस्यता छोड़ने के लिए बाध्य नहीं करता।
🧐 Not Sure What to Study Next?
Get a personalised study plan based on your goals, time and revision needs.
भारत की संसद के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत के राष्ट्रपति द्वारा सदन का सत्रावसान मंत्रिपरिषद की सलाह की आवश्यकता के बिना किया जाता है।
- सदन का सत्रावसान सामान्यतः सदन के अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद किया जाता है लेकिन भारत के राष्ट्रपति द्वारा सत्र में बैठे सदन का सत्रावसान करने पर कोई रोक नहीं है।
- लोकसभा का विघटन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है जो असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर, मंत्रिपरिषद की सलाह पर ऐसा करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 2 और 3
सत्रावसान और विघटन भारत के राष्ट्रपति द्वारा संसद के संबंध में प्रयोग की जाने वाली दो भिन्न शक्तियाँ हैं। जबकि सत्रावसान सामान्यतः अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद किया जाता है, राष्ट्रपति तकनीकी रूप से सत्र के दौरान भी सदन का सत्रावसान कर सकते हैं, और यह शक्ति मंत्रिपरिषद की सलाह पर प्रयोग की जाती है। लोकसभा के विघटन के लिए भी राष्ट्रपति को असाधारण राजनीतिक परिस्थितियों को छोड़कर मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना आवश्यक है।
❌ कथन 1 – गलत: अनुच्छेद 85(2) के तहत, राष्ट्रपति सदनों का सत्रावसान केवल मंत्रिपरिषद (विशेष रूप से प्रधानमंत्री या मंत्रिमंडल) की सलाह पर करते हैं, स्वतंत्र रूप से नहीं।
✅ कथन 2 – सही: यद्यपि सत्रावसान सामान्यतः अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद होता है, राष्ट्रपति को सत्र में बैठे सदन का सत्रावसान करने से रोकने के लिए कोई संवैधानिक रोक नहीं है।
✅ कथन 3 – सही: राष्ट्रपति लोकसभा का विघटन मंत्रिपरिषद की सलाह पर करते हैं, दुर्लभ परिस्थितियों जैसे त्रिशंकु संसद, अविश्वास प्रस्ताव, या संवैधानिक संकट को छोड़कर।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संसद का सत्रावसान और विघटन
- स्थगन: संसद की बैठक का अस्थायी निलंबन अगली बैठक तक, पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) द्वारा निर्णीत।
- अनिश्चितकालीन स्थगन: अगली बैठक की तारीख तय किए बिना अनिश्चितकालीन स्थगन; सत्र समाप्त करता है लेकिन औपचारिक रूप से नहीं।
- सत्रावसान: अनुच्छेद 85(2) के तहत राष्ट्रपति द्वारा सत्र की औपचारिक समाप्ति, मंत्रिपरिषद की सलाह पर की जाती है; समितियों के सभी लंबित कार्य समाप्त होते हैं लेकिन सदन में लंबित विधेयक नहीं।
- विघटन: केवल लोकसभा पर लागू, राज्यसभा पर नहीं; पूरे सदन को समाप्त कर देता है, नए चुनाव आवश्यक; सभी लंबित विधेयक (राज्यसभा या संयुक्त बैठक में लंबित को छोड़कर) व्यपगत हो जाते हैं।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 85 सत्र, सत्रावसान और विघटन से संबंधित है; अनुच्छेद 352-360 आपातकालीन प्रावधानों से संबंधित हैं जो संसदीय कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं।
- राष्ट्रपति की भूमिका: राष्ट्रपति संसद को आहूत, सत्रावसान और विघटन करते हैं, लेकिन अनुच्छेद 74 के अनुसार मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करते हैं।
- मंत्रिपरिषद की सलाह का अपवाद: त्रिशंकु संसदों या राजनीतिक संकटों में, राष्ट्रपति विघटन मामलों में विवेक का प्रयोग कर सकते हैं, हालांकि यह संवैधानिक रूप से विवादास्पद बना रहता है।
भारतीय संसद के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- लोक सभा में लंबित विधेयक उसके विघटन पर व्यपगत हो जाता है।
- लोक सभा द्वारा पारित और राज्य सभा में लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है।
- एक विधेयक जिसके संबंध में भारत के राष्ट्रपति ने सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — 1 और 2
जब लोक सभा का विघटन होता है, तो लोक सभा में लंबित विधेयक और लोक सभा द्वारा पारित लेकिन राज्य सभा में लंबित विधेयक स्वतः व्यपगत हो जाते हैं। हालांकि, जिस विधेयक के संबंध में राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, वह लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होता है, क्योंकि संयुक्त बैठक की प्रक्रिया मान्य रहती है।
✅ कथन 1 (लोक सभा में लंबित विधेयक) – सही: लोक सभा में लंबित विधेयक उसके विघटन पर स्वतः व्यपगत हो जाता है क्योंकि विघटन उस सदन में सभी लंबित विधायी कार्यों को समाप्त कर देता है।
✅ कथन 2 (लोक सभा द्वारा पारित, राज्य सभा में लंबित विधेयक) – सही: लोक सभा द्वारा पारित लेकिन राज्य सभा में लंबित विधेयक भी लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है, क्योंकि इसे लोक सभा से उत्पन्न विधेयक माना जाता है।
❌ कथन 3 (संयुक्त बैठक के लिए सूचित विधेयक) – गलत: जिस विधेयक के संबंध में राष्ट्रपति ने सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, वह लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होता है और नई लोक सभा के गठन के बाद संयुक्त बैठक में लिया जा सकता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संसद में विधेयकों का व्यपगत होना
- लोक सभा में लंबित विधेयक: लोक सभा में लंबित सभी विधेयक उसके विघटन पर व्यपगत हो जाते हैं, सिवाय उन विधेयकों के जो पहले से पारित होकर राज्य सभा को भेजे गए हों या राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित हों।
- लोक सभा द्वारा पारित विधेयक: लोक सभा द्वारा पारित लेकिन राज्य सभा में लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाते हैं।
- केवल राज्य सभा में लंबित विधेयक: केवल राज्य सभा में उत्पन्न और लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होते हैं, क्योंकि राज्य सभा एक स्थायी सदन है।
- संयुक्त बैठक के लिए सूचित विधेयक: जिन विधेयकों के संबंध में राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, वे व्यपगत नहीं होते हैं और लोक सभा के पुनर्गठन के बाद संयुक्त बैठक में लिए जा सकते हैं।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित विधेयक: दोनों सदनों द्वारा पारित और राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होते हैं।
- संवैधानिक विधेयक: किसी भी चरण में लंबित विधेयक, जिसमें संविधान संशोधन विधेयक भी शामिल हैं, सामान्य विधेयकों के समान व्यपगत होने के नियमों का पालन करते हैं।
- राज्य सभा स्थायी सदन के रूप में: राज्य सभा एक स्थायी निकाय है और कभी विघटित नहीं होती है, अतः केवल इसमें उत्पन्न और रहने वाले विधेयक लोक सभा के विघटन के कारण व्यपगत नहीं होते हैं।
| विधेयक का प्रकार | चरण | लोक सभा के विघटन का प्रभाव |
|---|---|---|
| लोक सभा में लंबित विधेयक | लोक सभा में कोई भी चरण | व्यपगत हो जाता है |
| लोक सभा द्वारा पारित विधेयक | राज्य सभा में लंबित | व्यपगत हो जाता है |
| राज्य सभा में उत्पन्न विधेयक | केवल राज्य सभा में लंबित | व्यपगत नहीं होता है |
| दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक | राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित | व्यपगत नहीं होता है |
| संयुक्त बैठक के लिए सूचित विधेयक | राष्ट्रपति की सूचना के बाद | व्यपगत नहीं होता है |
| राष्ट्रपति द्वारा लौटाया गया विधेयक | लोक सभा में पुनर्विचार के लिए लंबित | व्यपगत हो जाता है |
लोक सभा के अध्यक्ष के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
जब लोक सभा के अध्यक्ष को हटाने के किसी प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा हो, तब
- वह पीठासीन नहीं होंगे।
- उन्हें बोलने का अधिकार नहीं होगा।
- वे पहली बार में उस प्रस्ताव पर मतदान करने के हकदार नहीं होंगे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 96 अध्यक्ष के हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान उनके आचरण को नियंत्रित करता है। अध्यक्ष को ऐसी कार्यवाही के दौरान सदन की अध्यक्षता करने से रोका जाता है, लेकिन वे एक सदस्य के रूप में अपने सभी अन्य अधिकार बनाए रखते हैं, जिसमें बोलने और पहली बार मतदान करने का अधिकार शामिल है।
✅ कथन 1 (पीठासीन प्रतिबंध) – सही: अनुच्छेद 96(1) के तहत, अध्यक्ष उनके हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान सदन की अध्यक्षता नहीं करेंगे, भले ही वे उपस्थित हों।
❌ कथन 2 (बोलने का अधिकार) – गलत: अनुच्छेद 96(2) के तहत, अध्यक्ष हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान सदन की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार बनाए रखते हैं।
❌ कथन 3 (मतदान अधिकार) – गलत: अनुच्छेद 96(2) के अनुसार, अध्यक्ष प्रस्ताव पर पहली बार में मतदान करने के हकदार हैं; वे केवल इस परिदृश्य में निर्णायक मत (बराबरी तोड़ने के लिए दूसरा मत) खो देते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लोक सभा के अध्यक्ष और हटाने की प्रक्रिया
- चुनाव: अध्यक्ष को लोक सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से चुना जाता है, आमतौर पर बहुमत दल से, नए सदन के गठन के तुरंत बाद।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 93-96 लोक सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से संबंधित हैं, जिसमें उनका चुनाव, हटाना और शक्तियां शामिल हैं।
- हटाने की प्रक्रिया: हटाने के प्रस्ताव के लिए 14 दिन की सूचना आवश्यक है और इसे सदन के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित किया जाना चाहिए (न कि केवल उपस्थित और मतदान करने वाले)।
- पीठासीन प्रतिबंध (अनुच्छेद 96(1)): हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान, अध्यक्ष अध्यक्षता नहीं कर सकते लेकिन सदन में उपस्थित रह सकते हैं।
- सदस्य अधिकार (अनुच्छेद 96(2)): अध्यक्ष कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार बनाए रखते हैं, और पहली बार में मतदान कर सकते हैं लेकिन अपने स्वयं के हटाने के प्रस्ताव पर निर्णायक मत का प्रयोग नहीं कर सकते।
- निष्पक्षता की अपेक्षा: चुनाव के बाद, अध्यक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी राजनीतिक पार्टी से संबंध तोड़ें और सदन की कार्यवाही संचालित करने में निष्पक्षता बनाए रखें।
- शक्तियां और कार्य: अध्यक्ष सदन में व्यवस्था बनाए रखते हैं, विशेषाधिकार के प्रश्नों पर निर्णय लेते हैं, धन विधेयकों को प्रमाणित करते हैं, और विभिन्न प्रशासनिक और अनुशासनात्मक शक्तियों का प्रयोग करते हैं।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 93-96 |
| चुनाव विधि | लोक सभा सदस्यों द्वारा अपने में से चुने जाते हैं |
| हटाने की सूचना अवधि | 14 दिन |
| हटाने के लिए आवश्यक बहुमत | सदन के सभी तत्कालीन सदस्यों का बहुमत |
| हटाने के दौरान पीठासीन | अध्यक्षता नहीं कर सकते (अनुच्छेद 96(1)) |
| हटाने के दौरान बोलने का अधिकार | हां, बनाए रखा गया (अनुच्छेद 96(2)) |
| हटाने के दौरान मतदान अधिकार | पहली बार में मतदान कर सकते हैं, निर्णायक मत नहीं (अनुच्छेद 96(2)) |
| कार्यकाल | आमतौर पर सदन के पूर्ण कार्यकाल (5 वर्ष) तक जारी रहता है |
संघ बजट के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- संघ वित्त मंत्री राष्ट्रपति की ओर से संसद के दोनों सदनों के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत करते हैं।
- संघ स्तर पर, भारत के राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना किसी अनुदान की मांग नहीं की जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
संघ बजट के संबंध में दोनों कथन सही हैं। भारत का संविधान यह अनिवार्य करता है कि राष्ट्रपति वार्षिक वित्तीय विवरण को संसद के समक्ष रखवाते हैं, जो व्यवहार में संघ वित्त मंत्री द्वारा किया जाता है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना संघ स्तर पर किसी अनुदान की मांग नहीं की जा सकती, जो सार्वजनिक व्यय पर कार्यकारी नियंत्रण सुनिश्चित करता है।
✅ कथन 1 (बजट की प्रस्तुति) – सही: अनुच्छेद 112 के तहत, राष्ट्रपति वार्षिक वित्तीय विवरण (संघ बजट) को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं, जिसे व्यवहार में संघ वित्त मंत्री राष्ट्रपति की ओर से प्रस्तुत करते हैं।
✅ कथन 2 (अनुदान की मांग) – सही: अनुच्छेद 113(3) स्पष्ट रूप से प्रावधान करता है कि भारत के राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना किसी अनुदान की मांग नहीं की जाएगी, जो भारत की संचित निधि से व्यय प्रस्तावों पर कार्यकारी नियंत्रण सुनिश्चित करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संघ बजट और वित्तीय प्रक्रिया
- वार्षिक वित्तीय विवरण (अनुच्छेद 112): राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए संसद के दोनों सदनों के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण (संघ बजट) रखवाते हैं, जिसमें अनुमानित प्राप्तियां और व्यय दिखाया जाता है।
- बजट की विषय-वस्तु: बजट व्यय को (क) भारत की संचित निधि पर भारित (गैर-मतदेय), और (ख) भारत की संचित निधि से किया गया (संसद द्वारा मतदेय) के रूप में अलग करता है।
- अनुदान की मांग (अनुच्छेद 113): संचित निधि से व्यय के लिए अनुदान की मांगों के माध्यम से संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता होती है। राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना ऐसी कोई मांग नहीं की जा सकती।
- विनियोग विधेयक (अनुच्छेद 114): अनुदानों के मतदान के बाद, स्वीकृत व्यय को पूरा करने के लिए संचित निधि से धन की निकासी को प्राधिकृत करने हेतु विनियोग विधेयक पेश किया जाता है।
- वित्त विधेयक (अनुच्छेद 110): सरकार के वित्तीय प्रस्तावों को प्रभावी करने के लिए कराधान और अन्य वित्तीय मामलों के प्रावधानों वाला धन विधेयक पेश किया जाता है।
- लेखानुदान (अनुच्छेद 116): मुख्य बजट मांगों के मतदान तक संसद वित्तीय वर्ष के एक भाग के लिए अग्रिम अनुदान कर सकती है।
- गिलोटिन: एक प्रक्रियात्मक साधन जिसमें चर्चा के लिए निर्धारित अंतिम दिन शेष सभी अनुदान मांगों को एक साथ मतदान के लिए रखा जाता है, जो निर्धारित समय के भीतर बजट पारित करना सुनिश्चित करता है।
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद | उद्देश्य | आवश्यक संसदीय कार्रवाई |
|---|---|---|---|
| वार्षिक वित्तीय विवरण | अनुच्छेद 112 | बजट अनुमानों की प्रस्तुति | चर्चा (कोई मतदान नहीं) |
| अनुदान की मांग | अनुच्छेद 113 | व्यय का अनुमोदन | मतदान आवश्यक (राष्ट्रपति की सिफारिश पर) |
| विनियोग विधेयक | अनुच्छेद 114 | धन निकासी का प्राधिकरण | मतदान आवश्यक |
| वित्त विधेयक | अनुच्छेद 110 | कर प्रस्तावों का कार्यान्वयन | मतदान आवश्यक (धन विधेयक) |
| लेखानुदान | अनुच्छेद 116 | वर्ष के भाग के लिए अग्रिम अनुदान | मतदान आवश्यक |
| भारित व्यय | अनुच्छेद 112(3) | गैर-मतदेय वैधानिक भुगतान | केवल चर्चा (कोई मतदान नहीं) |
संसद में धन विधेयक के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- अनुच्छेद 109 में धन विधेयक के संबंध में विशेष प्रक्रिया का उल्लेख है।
- धन विधेयक राज्यों की परिषद में पेश नहीं किया जाएगा।
- राज्यसभा या तो विधेयक को मंजूरी दे सकती है या बदलाव का सुझाव दे सकती है लेकिन इसे अस्वीकार नहीं कर सकती।
- राज्यसभा द्वारा सुझाए गए धन विधेयक में संशोधन को लोकसभा द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
सही उत्तर: विकल्प 3 (1, 2 और 3)
मनी बिल संविधान के अनुच्छेद 110 में बताए गए विषयों जैसे कराधान, सरकारी उधार और भारत की संचित निधि से व्यय आदि से संबंधित होता है। इसे केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है और राज्यसभा की भूमिका सीमित होती है।
✅ कथन 1 सही है: अनुच्छेद 109 मनी बिल के लिए विशेष प्रक्रिया बताता है।
✅ कथन 2 सही है: मनी बिल राज्यसभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
✅ कथन 3 सही है: राज्यसभा केवल सुझाव दे सकती है, मनी बिल को अस्वीकार नहीं कर सकती।
❌ कथन 4 गलत है: लोकसभा पर राज्यसभा के सुझाव मानना अनिवार्य नहीं है।
संक्षिप्त नोट्स: मनी बिल
-
अनुच्छेद 110 मनी बिल की परिभाषा देता है।
-
मनी बिल केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।
-
इसे प्रस्तुत करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक होती है।
-
किसी विधेयक को मनी बिल घोषित करने का अधिकार लोकसभा अध्यक्ष के पास होता है।
-
राज्यसभा केवल सुझाव दे सकती है और बिल को 14 दिनों के भीतर लौटाना होता है।
-
लोकसभा सुझावों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
-
यदि राज्यसभा 14 दिनों में बिल वापस नहीं करती, तो बिल पारित माना जाता है।
-
मनी बिल के मामले में संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान नहीं है।
लोकसभा में आचार समिति के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- प्रारंभ में यह एक तदर्थ समिति थी।
- केवल लोकसभा का सदस्य ही लोकसभा के किसी सदस्य के अनैतिक आचरण से संबंधित शिकायत कर सकता है।
- यह समिति किसी भी ऐसे मामले पर विचार नहीं कर सकती जो न्यायाधीन हो।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 3 — केवल कथन 1 और 3 सही हैं
लोकसभा की एथिक्स कमेटी (Ethics Committee) सांसदों के अनैतिक आचरण से संबंधित मामलों की जांच करती है और आवश्यक कार्रवाई की सिफारिश करती है। यह पहले एक अस्थायी समिति थी, बाद में स्थायी समिति बनी।
✅ कथन 1 सही है: लोकसभा की एथिक्स कमेटी का गठन 2000 में एक एड-हॉक (अस्थायी) समिति के रूप में हुआ था। इसे 2015 में स्थायी समिति बनाया गया।
❌ कथन 2 गलत है: केवल लोकसभा सदस्य ही शिकायत नहीं कर सकते। कोई भी व्यक्ति शिकायत कर सकता है, लेकिन बाहरी व्यक्ति की शिकायत को किसी लोकसभा सदस्य द्वारा अग्रेषित किया जाना आवश्यक है।
✅ कथन 3 सही है: समिति न्यायालय में विचाराधीन (Sub-Judice) मामलों पर विचार नहीं कर सकती।
संक्षिप्त नोट्स: लोकसभा एथिक्स कमेटी
-
2000 में एड-हॉक समिति के रूप में गठित।
-
2015 में स्थायी समिति बनी।
-
सांसदों के अनैतिक आचरण की जांच करती है।
-
संसदीय नैतिकता और आचरण के मानकों को बनाए रखती है।
-
दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की सिफारिश कर सकती है।
-
आम नागरिक भी शिकायत कर सकते हैं।
-
Sub-Judice मामलों की जांच नहीं करती।
-
संसद की गरिमा और विश्वसनीयता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारतीय संसद में वित्त विधेयक और धन विधेयक के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- जब लोकसभा वित्त विधेयक को राज्यसभा में भेजती है, तो वह विधेयक में संशोधन कर सकती है या इसे अस्वीकार कर सकती है।
- जब लोकसभा धन विधेयक को राज्यसभा में भेजती है, तो वह विधेयक में संशोधन या अस्वीकार नहीं कर सकती है, वह केवल सिफारिशें कर सकती है।
- लोकसभा और राज्यसभा के बीच असहमति की स्थिति में, धन विधेयक के लिए कोई संयुक्त बैठक नहीं होती है, लेकिन वित्त विधेयक के लिए संयुक्त बैठक आवश्यक हो जाती है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो
यह प्रश्न वित्त विधेयकों और धन विधेयकों के लिए संसदीय प्रक्रियाओं की समझ का परीक्षण करता है। तीन कथनों में से दो सही हैं (कथन 1 और 2), जबकि कथन 3 गलत है क्योंकि वित्त विधेयकों के लिए संयुक्त बैठक अनिवार्य नहीं बल्कि विवेकाधीन है।
✅ कथन 1 – सही: वित्त विधेयक (अनुच्छेद 117 के अंतर्गत श्रेणी I) सामान्य विधायी प्रक्रिया का अनुसरण करता है, इसलिए राज्यसभा इसमें संशोधन या अस्वीकार कर सकती है।
✅ कथन 2 – सही: धन विधेयक (अनुच्छेद 110) को राज्यसभा द्वारा अस्वीकार या संशोधित नहीं किया जा सकता; यह केवल 14 दिनों के भीतर सिफारिशें कर सकती है।
❌ कथन 3 – गलत: धन विधेयकों के लिए संयुक्त बैठक उपलब्ध नहीं है (सही), लेकिन यह वित्त विधेयकों के लिए "आवश्यक" (अनिवार्य) नहीं है—अनुच्छेद 108 के तहत, राष्ट्रपति अपने विवेकाधिकार से संयुक्त बैठक बुला "सकते हैं"।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वित्त विधेयक बनाम धन विधेयक
| पहलू | धन विधेयक (अनुच्छेद 110) | वित्त विधेयक (अनुच्छेद 117) |
|---|---|---|
| प्रस्तुति | केवल लोकसभा में | केवल लोकसभा में |
| राज्यसभा की शक्तियाँ | संशोधन या अस्वीकार नहीं कर सकती; केवल 14 दिनों के भीतर सिफारिश कर सकती है | संशोधन या अस्वीकार कर सकती है (सामान्य विधायी प्रक्रिया) |
| संयुक्त बैठक | प्रदान नहीं की गई (अनुच्छेद 108 लागू नहीं होता) | अनुच्छेद 108 के तहत अनुमति है (विवेकाधीन, अनिवार्य नहीं) |
| राष्ट्रपति की स्वीकृति | अनिवार्य | अनिवार्य |
| प्रमाणन | अध्यक्ष द्वारा धन विधेयक के रूप में प्रमाणित | विशेष प्रमाणन की आवश्यकता नहीं |
| दायरा | विशेष रूप से अनुच्छेद 110 के तहत मामलों से संबंधित (कराधान, संचित निधि, आदि) | अनुच्छेद 110 से परे प्रावधान शामिल; सामान्य कानून प्रावधान शामिल हो सकते हैं |
निम्नलिखित में से कौन सी लोकसभा की विशिष्ट शक्ति/शक्तियाँ है/हैं?
- आपातकाल की घोषणा का अनुसमर्थन करना
- मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करना
- भारत के राष्ट्रपति को महाभियोग लगाना
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
प्रश्न लोकसभा की विशिष्ट शक्तियों के बारे में पूछता है। दिए गए तीन कथनों में से केवल मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करने की शक्ति लोकसभा के लिए विशिष्ट है, क्योंकि मंत्रिपरिषद अनुच्छेद 75(3) के तहत केवल लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।
❌ कथन 1 – गलत: आपातकाल की घोषणा का अनुसमर्थन करने की शक्ति लोकसभा के लिए विशिष्ट नहीं है; संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) को अनुच्छेद 352 के अनुसार आपातकाल की घोषणा के जारी होने के एक महीने के भीतर इसे अनुमोदित करना होता है।
✅ कथन 2 – सही: मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करना लोकसभा की विशिष्ट शक्ति है, क्योंकि मंत्रिपरिषद केवल लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है (अनुच्छेद 75(3)), और राज्यसभा के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है।
❌ कथन 3 – गलत: राष्ट्रपति पर महाभियोग लोकसभा की विशिष्ट शक्ति नहीं है; अनुच्छेद 61 के तहत संसद का कोई भी सदन महाभियोग प्रक्रिया शुरू कर सकता है, और आरोप को विशेष बहुमत के साथ दोनों सदनों द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लोकसभा की विशिष्ट शक्तियाँ
- अविश्वास प्रस्ताव: केवल लोकसभा मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है (अनुच्छेद 75(3)); राज्यसभा ऐसा नहीं कर सकती।
- धन विधेयक: धन विधेयक केवल लोकसभा में पेश किए जा सकते हैं (अनुच्छेद 110); राज्यसभा केवल 14 दिनों के भीतर संशोधन की सिफारिश कर सकती है।
- अनुदान मांगें: केवल लोकसभा को अनुदान मांगों पर मतदान करने और वार्षिक बजट पारित करने की शक्ति है।
- सदन का विश्वास: मंत्रिपरिषद तभी तक पद पर रहती है जब तक उसे लोकसभा का विश्वास प्राप्त है।
- कार्यपालिका पर नियंत्रण: सामूहिक उत्तरदायित्व प्रावधानों के माध्यम से कार्यपालिका पर प्राथमिक नियंत्रण लोकसभा के पास है।
| शक्ति | लोकसभा (विशिष्ट) | राज्यसभा (विशिष्ट) | दोनों सदन |
|---|---|---|---|
| अविश्वास प्रस्ताव | ✓ | ✗ | ✗ |
| धन विधेयक | ✓ (पेश करना और पारित करना) | ✗ | ✗ |
| राष्ट्रपति पर महाभियोग | ✗ | ✗ | ✓ |
| आपातकाल का अनुसमर्थन | ✗ | ✗ | ✓ |
| उपराष्ट्रपति को हटाना | ✗ | ✓ (पहल) | ✓ (सहमति) |
| अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन/समाप्ति | ✗ | ✓ (संकल्प) | ✗ |
लोकसभा के उपसभापति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- लोकसभा में प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों के अनुसार, उपसभापति का निर्वाचन ऐसी तिथि को होगा जो सभापति निर्धारित करे।
- यह एक अनिवार्य प्रावधान है कि लोकसभा के उपसभापति के रूप में किसी उम्मीदवार का चुनाव या तो मुख्य विपक्षी दल या सत्तारूढ़ दल से होगा।
- सदन की बैठक की अध्यक्षता करते समय उपसभापति के पास सभापति के समान ही शक्तियां होती हैं और उनके निर्णयों के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती।
- उपसभापति की नियुक्ति के संबंध में सुस्थापित संसदीय प्रथा यह है कि प्रस्ताव सभापति द्वारा प्रस्तुत किया जाता है और प्रधानमंत्री द्वारा विधिवत समर्थन किया जाता है।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न लोकसभा के उपसभापति के पद के संवैधानिक और प्रक्रियात्मक पहलुओं का परीक्षण करता है। कथन 1 और 3 उपसभापति की चुनाव प्रक्रिया और शक्तियों के संबंध में सही हैं, जबकि कथन 2 और 4 गलत हैं क्योंकि वे अस्तित्वहीन अनिवार्य प्रावधानों और प्रथाओं का संदर्भ देते हैं।
✅ कथन 1 – सही: लोकसभा में प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों के अनुसार, उपसभापति के चुनाव की तिथि सभापति द्वारा निर्धारित की जाती है, जबकि सभापति के चुनाव की तिथि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है।
❌ कथन 2 – गलत: कोई अनिवार्य संवैधानिक या वैधानिक प्रावधान नहीं है कि उपसभापति विपक्ष या सत्तारूढ़ दल से होना चाहिए; यह केवल एक परंपरा (हमेशा नहीं निभाई जाती) है कि यह पद विपक्ष को प्रदान किया जाता है।
✅ कथन 3 – सही: सदन की अध्यक्षता करते समय, उपसभापति को सभापति के समान शक्तियां और गरिमा प्राप्त होती है, और उस अवधि के दौरान उनके निर्णयों के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती।
❌ कथन 4 – गलत: कोई सुस्थापित संसदीय प्रथा नहीं है कि उपसभापति के लिए प्रस्ताव सभापति द्वारा प्रस्तुत किया जाए और प्रधानमंत्री द्वारा समर्थन किया जाए; उपसभापति का चुनाव सदन द्वारा सदस्यों द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव के माध्यम से किया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लोकसभा के उपसभापति
- चुनाव: सभापति के चुनाव के बाद लोकसभा सदस्यों द्वारा निर्वाचित; तिथि सभापति द्वारा निर्धारित (राष्ट्रपति द्वारा नहीं)।
- कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं: संविधान में उपसभापति के पद का विशेष रूप से उल्लेख नहीं है; यह प्रक्रिया नियमों के तहत बनाया गया है।
- परंपरा (अनिवार्य नहीं): आमतौर पर एक परंपरा के रूप में विपक्षी दल को प्रदान किया जाता है, लेकिन कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।
- शक्तियां: अध्यक्षता करते समय सभापति के समान शक्तियां प्राप्त होती हैं; अनुपस्थिति में सभापति के कर्तव्यों का निर्वहन करता है।
- हटाना: लोकसभा के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है; 14 दिन की सूचना आवश्यक।
- पद की समाप्ति: सदस्य न रहने पर, त्यागपत्र देने पर, या हटाए जाने पर पद खाली हो जाता है।
- कोई अपील नहीं: सदन की अध्यक्षता करते समय उपसभापति द्वारा दिए गए निर्णयों के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती।
राज्यसभा को लोकसभा के साथ समान शक्तियाँ प्राप्त हैं:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — संविधान में संशोधन करने में
राज्यसभा और लोकसभा को अनुच्छेद 368 के तहत संवैधानिक संशोधनों के मामले में समान शक्तियाँ प्राप्त हैं। किसी भी संवैधानिक संशोधन के वैध होने के लिए, इसे संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (कुल सदस्यता के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई) से पारित होना आवश्यक है। इसके विपरीत, राज्यसभा की अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन (केवल अनुशंसात्मक भूमिका), सरकार को हटाने (केवल लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर सकती है), और कटौती प्रस्ताव पारित करने (विशेष रूप से धन मामलों पर लोकसभा का विशेषाधिकार) के मामलों में सीमित या कोई शक्तियाँ नहीं हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: राज्यसभा बनाम लोकसभा की शक्तियाँ
| मामला | राज्यसभा की शक्तियाँ | लोकसभा की शक्तियाँ |
|---|---|---|
| संवैधानिक संशोधन (अनुच्छेद 368) | समान शक्तियाँ - विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक | समान शक्तियाँ - विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक |
| धन विधेयक (अनुच्छेद 109) | केवल संशोधन की अनुशंसा कर सकती है (14 दिन); लोकसभा स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है | प्रस्तुत करने की विशेष शक्ति; अंतिम अधिकार |
| सरकार को हटाना (अविश्वास प्रस्ताव) | अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं कर सकती | अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत और पारित कर सकती है |
| कटौती प्रस्ताव (बजट) | कटौती प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं कर सकती | कटौती प्रस्ताव प्रस्तुत करने का विशेष अधिकार |
| अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन (अनुच्छेद 312) | सृजन के समर्थन में 2/3 बहुमत से संकल्प पारित करना आवश्यक | तत्पश्चात संसद कानून द्वारा सेवा का सृजन करती है |
| राष्ट्रपति का महाभियोग | समान शक्तियाँ - विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक | समान शक्तियाँ - कोई भी सदन शुरुआत कर सकता है |
| साधारण विधेयक | समान शक्तियाँ (धन विधेयक को छोड़कर) | समान शक्तियाँ (धन विधेयक को छोड़कर) |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत का राष्ट्रपति संसद के सत्र को ऐसे स्थान पर बुला सकता है जो वह उचित समझे।
- भारत के संविधान में संसद के तीन सत्रों का प्रावधान है, लेकिन तीनों सत्र आयोजित करना अनिवार्य नहीं है।
- संसद के लिए एक वर्ष में बैठकों की कोई न्यूनतम संख्या निर्धारित नहीं है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 85(1) राष्ट्रपति को संसद को ऐसे समय और स्थान पर बुलाने का अधिकार देता है जो वह उचित समझे। कथन 3 सही है क्योंकि न तो संविधान और न ही प्रक्रिया के नियम संसद के लिए बैठकों की न्यूनतम संख्या निर्धारित करते हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि संविधान स्पष्ट रूप से तीन सत्रों का प्रावधान नहीं करता; यह केवल यह अनिवार्य करता है कि सत्रों के बीच का अंतराल छह महीने से अधिक नहीं होना चाहिए।
✅ कथन 1 – सही: अनुच्छेद 85(1) राष्ट्रपति को संसद के प्रत्येक सदन को ऐसे समय और स्थान पर बुलाने का अधिकार देता है जो वह उचित समझे।
❌ कथन 2 – गलत: संविधान तीन सत्रों का प्रावधान नहीं करता; यह केवल यह अनिवार्य करता है कि सत्रों के बीच छह महीने का अंतराल नहीं होना चाहिए (अनुच्छेद 85)। तीन सत्रों (बजट, मानसून, शीतकालीन) की प्रथा परंपरा पर आधारित है, संवैधानिक प्रावधान पर नहीं।
✅ कथन 3 – सही: संसद के लिए एक वर्ष में बैठकों की न्यूनतम संख्या के लिए कोई संवैधानिक या प्रक्रियात्मक आवश्यकता नहीं है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संसदीय सत्र
- अनुच्छेद 85(1): राष्ट्रपति संसद के प्रत्येक सदन को ऐसे समय और स्थान पर बुलाते हैं जो वह उचित समझें।
- अनुच्छेद 85(2): राष्ट्रपति समय-समय पर सदनों का सत्रावसान कर सकते हैं।
- छह महीने का नियम: दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतराल छह महीने से अधिक नहीं हो सकता (अनुच्छेद 85)।
- परंपरा द्वारा सत्र: परंपरागत रूप से तीन सत्र आयोजित होते हैं—बजट सत्र (फरवरी-मई), मानसून सत्र (जुलाई-अगस्त), और शीतकालीन सत्र (नवंबर-दिसंबर)।
- कोई न्यूनतम दिन नहीं: संविधान न्यूनतम बैठक दिनों या प्रति वर्ष सत्रों की संख्या निर्धारित नहीं करता।
- कोरम: कार्यवाही संचालित करने के लिए कुल सदस्यों का दसवां हिस्सा आवश्यक है (अनुच्छेद 100)।
भारत में, निम्नलिखित में से कौन दूरसंचार, बीमा, बिजली आदि जैसे क्षेत्रों में स्वतंत्र नियामकों की समीक्षा करता है?
- संसद द्वारा गठित तदर्थ समितियाँ
- संसदीय विभाग संबंधित स्थायी समितियाँ
- वित्त आयोग
- वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग
- नीति आयोग
नीचे दिए गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर का चयन कीजिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — 1 और 2
भारत में, दूरसंचार, बीमा और बिजली जैसे क्षेत्रों में स्वतंत्र नियामकों की समीक्षा मुख्य रूप से संसदीय तंत्र द्वारा की जाती है। तदर्थ समितियाँ (संयुक्त संसदीय समितियों सहित) नियामक निकायों की विशिष्ट जांच या समीक्षा के लिए गठित की जाती हैं, जबकि विभाग संबंधित स्थायी समितियाँ (DRSCs) अपने संबंधित मंत्रालयों के अधीन आने वाले नियामकों की वार्षिक रिपोर्ट, बजट और प्रदर्शन की नियमित रूप से जांच करती हैं, जिससे कार्यकारी जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
✅ कथन 1 – सही: तदर्थ समितियाँ, जिनमें संयुक्त संसदीय समितियाँ (JPCs) शामिल हैं, विशिष्ट नियामक निकायों की समीक्षा या उनके कामकाज में अनियमितताओं की जांच के लिए संसद द्वारा स्थापित की जाती हैं।
✅ कथन 2 – सही: संसदीय विभाग संबंधित स्थायी समितियाँ (DRSCs) अपने संबंधित मंत्रालयों के अधीन आने वाले स्वतंत्र नियामकों के प्रदर्शन, वार्षिक रिपोर्ट और बजट आवंटन की व्यवस्थित रूप से समीक्षा करती हैं।
❌ कथन 3 – गलत: वित्त आयोग (अनुच्छेद 280) मुख्य रूप से संघ और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण से संबंधित है, न कि क्षेत्रीय नियामकों की समीक्षा से।
❌ कथन 4 – गलत: वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (FSLRC) वित्तीय क्षेत्र में कानूनी सुधारों की सिफारिश करने के लिए बनाया गया एक अस्थायी निकाय था; यह नियामकों की निरंतर समीक्षा नहीं करता है।
❌ कथन 5 – गलत: नीति आयोग एक नीति थिंक टैंक है जो रणनीतिक सलाह प्रदान करता है लेकिन स्वतंत्र नियामकों की औपचारिक रूप से समीक्षा या निगरानी करने का वैधानिक अधिकार नहीं रखता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: नियामकों की संसदीय निगरानी
- तदर्थ समितियाँ: विशिष्ट उद्देश्यों के लिए स्थापित अस्थायी संसदीय समितियाँ, जैसे कि विशेष संस्थानों या नियामकों की कार्यप्रणाली की जांच या अनियमितताओं की जांच (उदा. JPCs)।
- विभाग संबंधित स्थायी समितियाँ (DRSCs): 24 स्थायी समितियाँ (लोकसभा के लिए 16, राज्यसभा के लिए 8) जो मंत्रालयों और उनके संबद्ध नियामकों के विधेयकों, बजट और वार्षिक रिपोर्टों की जांच करती हैं।
- संसदीय जवाबदेही: स्वतंत्र नियामक, स्वायत्तता के बावजूद, समिति जांच, प्रश्नों और बहसों के माध्यम से संसद के प्रति जवाबदेह रहते हैं।
- नियामकों के उदाहरण: TRAI (दूरसंचार), IRDAI (बीमा), SEBI (प्रतिभूति), CERC (बिजली), आदि।
- वित्त आयोग: संवैधानिक निकाय (अनुच्छेद 280) जो राजकोषीय संघवाद पर केंद्रित है—केंद्र और राज्यों के बीच करों और अनुदानों का वितरण।
- नीति आयोग: योजना आयोग की जगह लेने वाला नीति आयोग; रणनीतिक इनपुट प्रदान करता है लेकिन नियामक निरीक्षण का कोई जनादेश नहीं है।