UPSC Prelims 2018 Question Paper
Explore the complete solved question paper for UPSC Prelims 2018 featuring 100 solved questions with bilingual (English & Hindi) explanations, official answer key, and subject weightage breakdown.
निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए:
- भारत के किसी राज्य में पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार का गठन।
- भारत के तत्कालीन सबसे बड़े बैंक, 'इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया' का नाम बदलकर 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया' कर दिया गया।
- एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण किया गया और यह राष्ट्रीय वाहक बन गया।
- गोआ स्वतंत्र भारत का हिस्सा बन गया।
उपर्युक्त घटनाओं का सही कालानुक्रमिक क्रम निम्नलिखित में से कौन सा है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — 3 - 2 - 1 - 4
इन ऐतिहासिक घटनाओं का सही कालानुक्रमिक क्रम उनकी घटना की तिथियों द्वारा निर्धारित होता है: एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण (1953), इम्पीरियल बैंक का नाम बदलकर SBI (1955), केरल में पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार (1957), और गोवा का भारत में एकीकरण (1961)।
कालानुक्रमिक विश्लेषण:
घटना 3 – एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण (1953): एयर कॉर्पोरेशन अधिनियम, 1953 के बाद एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण किया गया, जब भारत सरकार ने टाटा समूह से बहुमत हिस्सेदारी अधिग्रहित की और इसे राष्ट्रीय वाहक बनाया।
घटना 2 – इम्पीरियल बैंक का नाम बदलकर SBI (1955): गोरेवाला समिति की सिफारिशों के आधार पर, भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम पारित किया गया, और 1 जुलाई, 1955 को इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया का आधिकारिक रूप से नाम बदलकर भारतीय स्टेट बैंक कर दिया गया।
घटना 1 – पहली कम्युनिस्ट सरकार (1957): 1957 के केरल विधानसभा चुनावों में, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने बहुमत जीता, और ई.एम.एस. नंबूदरीपाद ने सरकार बनाई, जो किसी भी भारतीय राज्य में पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार थी।
घटना 4 – गोवा का एकीकरण (1961): 19 दिसंबर, 1961 को ऑपरेशन विजय के माध्यम से गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराया गया और बाद में 12वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1962 द्वारा इसे केंद्र शासित प्रदेश के रूप में भारत में शामिल किया गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: स्वतंत्रता के बाद के मील के पत्थर (1950-60 का दशक)
| वर्ष | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 1953 | एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण | एयर कॉर्पोरेशन अधिनियम, 1953; राष्ट्रीय वाहक की स्थापना |
| 1955 | भारतीय स्टेट बैंक का गठन | इम्पीरियल बैंक का नाम बदला गया; गोरेवाला समिति (अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति) की सिफारिशों के आधार पर |
| 1957 | पहली कम्युनिस्ट सरकार | केरल - ई.एम.एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में CPI; विश्वभर में पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार |
| 1961 | गोवा मुक्ति | ऑपरेशन विजय (19 दिसंबर); पुर्तगाली शासन के 451 वर्षों का अंत |
| 1962 | गोवा का संवैधानिक एकीकरण | 12वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम; केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा |
| 1987 | गोवा को राज्य का दर्जा | गोवा भारत का 25वां राज्य बना (30 मई) |
भारत द्वारा अनिवासी संस्थाओं द्वारा प्रदान की जाने वाली ऑनलाइन विज्ञापन सेवाओं पर 6% समकारी कर (इक्वलाइजेशन टैक्स) लगाने के निर्णय के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- इसे आयकर अधिनियम के एक भाग के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- भारत में विज्ञापन सेवाएं प्रदान करने वाली अनिवासी संस्थाएं "दोहरे कराधान परिहार समझौतों" के तहत अपने गृह देश में कर क्रेडिट का दावा कर सकती हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग करके सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — कोई नहीं
ऑनलाइन विज्ञापन सेवाओं पर भारत के 6% समकारी कर से संबंधित दोनों कथन गलत हैं।
❌ कथन 1 – गलत: समकारी कर वित्त अधिनियम, 2016 के तहत एक पृथक कर के रूप में प्रस्तुत किया गया था, न कि आयकर अधिनियम, 1961 के एक भाग के रूप में।
❌ कथन 2 – गलत: चूंकि समकारी कर को आयकर के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है बल्कि निर्दिष्ट लेनदेन पर एक पृथक कर के रूप में लगाया गया है, इसलिए अनिवासी संस्थाएं दोहरे कराधान परिहार समझौतों (DTAAs) के तहत अपने गृह देश में कर क्रेडिट का दावा नहीं कर सकती हैं, जो आमतौर पर केवल आयकर पर लागू होते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: समकारी कर
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| प्रस्तावना | वित्त अधिनियम, 2016 (1 जून, 2016 से प्रभावी) |
| कानूनी ढांचा | पृथक कर, आयकर अधिनियम, 1961 का हिस्सा नहीं |
| प्रारंभिक दर और दायरा | अनिवासी संस्थाओं द्वारा ऑनलाइन विज्ञापन सेवाओं और संबंधित सेवाओं पर 6% |
| विस्तार (2020) | वार्षिक रूप से ₹2 करोड़ से अधिक के ई-कॉमर्स लेनदेन पर 2% कर |
| सीमा | लागू जब वार्षिक भुगतान ₹1 लाख से अधिक हो (विज्ञापन सेवाओं के लिए) |
| DTAA की प्रयोज्यता | DTAAs के तहत कोई कर क्रेडिट उपलब्ध नहीं क्योंकि यह आयकर नहीं है |
| उद्देश्य | डिजिटल अर्थव्यवस्था लेनदेन पर कर जहां सेवा प्रदाता का भारत में कोई स्थायी प्रतिष्ठान नहीं है |
| हालिया विकास | ऑनलाइन विज्ञापनों पर 6% कर 1 अप्रैल, 2025 से समाप्त |
यदि सरकार द्वारा जनता को कोई वस्तु निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती है, तो
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — अवसर लागत उत्पाद के उपभोक्ताओं से कर देने वाली जनता को हस्तांतरित हो जाती है।
जब सरकार किसी वस्तु को निःशुल्क प्रदान करती है, तो अवसर लागत समाप्त नहीं होती—यह केवल प्रत्यक्ष उपभोक्ताओं से कर देने वाली जनता को हस्तांतरित हो जाती है। निःशुल्क वस्तु प्रदान करने के लिए उपयोग किए गए संसाधनों का वित्तपोषण कराधान के माध्यम से होता है, जिसका अर्थ है कि करदाता उन संसाधनों के वैकल्पिक उपयोग के त्याग का भार वहन करते हैं। इस प्रकार, जबकि उपभोक्ता प्रत्यक्ष रूप से भुगतान नहीं करते हैं, समाज समग्र रूप से कराधान के माध्यम से अवसर लागत वहन करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अवसर लागत
- परिभाषा: अवसर लागत वह मूल्य है जो किसी विकल्प को चुनते समय छोड़े गए अगले सर्वश्रेष्ठ विकल्प का होता है। यह दर्शाता है कि संसाधनों को एक उपयोग के लिए आवंटित करने पर क्या छोड़ा जाता है।
- सार्वभौमिक सिद्धांत: अवसर लागत सभी आर्थिक निर्णयों में मौजूद होती है, चाहे वे व्यक्तियों, फर्मों या सरकारों द्वारा लिए गए हों, क्योंकि संसाधन दुर्लभ हैं और उनके वैकल्पिक उपयोग हैं।
- निःशुल्क वस्तुएं बनाम आर्थिक वस्तुएं: वास्तविक निःशुल्क वस्तुओं (जैसे हवा) की कोई अवसर लागत नहीं होती क्योंकि वे प्रचुर मात्रा में हैं। हालांकि, सरकार द्वारा "निःशुल्क" प्रदान की गई वस्तुएं वास्तविक संसाधन लागत वाली आर्थिक वस्तुएं हैं।
- सरकारी प्रावधान: जब सरकारें वस्तुओं या सेवाओं को निःशुल्क प्रदान करती हैं, तो वे कर राजस्व या उधार ली गई निधि का उपयोग करती हैं। इस प्रकार अवसर लागत करदाताओं को हस्तांतरित हो जाती है जो उन संसाधनों का कहीं और उपयोग कर सकते थे।
- उदाहरण: यदि सरकार किसानों को मुफ्त बिजली प्रदान करती है, तो लागत सब्सिडी के माध्यम से सभी करदाताओं द्वारा वहन की जाती है, जो वैकल्पिक सार्वजनिक व्यय (जैसे स्वास्थ्य सेवा या शिक्षा) की अवसर लागत को दर्शाती है।
- नीतिगत निहितार्थ: सार्वजनिक नीतियों की वास्तविक लागत का मूल्यांकन करने और अर्थव्यवस्था में कुशल संसाधन आवंटन सुनिश्चित करने के लिए अवसर लागत को समझना महत्वपूर्ण है।
🧐 Not Sure What to Study Next?
Get a personalised study plan based on your goals, time and revision needs.
भारत ने भौगोलिक संकेतक वस्तुएं (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 को किसके प्रति अपने दायित्वों का अनुपालन करने के लिए अधिनियमित किया?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — WTO
भारत ने भौगोलिक संकेतक वस्तुएं (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 को WTO के TRIPS (व्यापार-संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकार) समझौते के तहत अपने दायित्वों का अनुपालन करने के लिए अधिनियमित किया। TRIPS सभी WTO सदस्य देशों को भौगोलिक संकेतकों के लिए कानूनी संरक्षण प्रदान करने का आदेश देता है, जो विशिष्ट भौगोलिक स्थानों से उत्पन्न होने वाले उत्पादों की पहचान करते हैं जिनकी गुणवत्ता या प्रतिष्ठा मूलतः उस मूल के कारण होती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में भौगोलिक संकेतक
- GI अधिनियम, 1999: WTO ढांचे के तहत TRIPS समझौते (अनुच्छेद 22-24) का अनुपालन करने के लिए अधिनियमित
- परिभाषा: GI वस्तुओं की पहचान एक विशिष्ट क्षेत्र से उत्पन्न होने के रूप में करता है जहां गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य विशेषताएं मूलतः भौगोलिक मूल के कारण होती हैं
- अवधि: GI पंजीकरण 10 वर्षों के लिए वैध है और इसे अनिश्चित काल तक नवीनीकृत किया जा सकता है
- उदाहरण: दार्जिलिंग चाय (पहला भारतीय GI), बासमती चावल, कांचीपुरम सिल्क, तिरुपति लड्डू, कश्मीर पश्मीना
- प्राधिकरण: उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के तहत पेटेंट, डिजाइन और ट्रेडमार्क के नियंत्रक महानिदेशक GI पंजीकरण का प्रशासन करते हैं
- लाभ: अनधिकृत उपयोग के खिलाफ कानूनी संरक्षण, ग्रामीण और कृषि विकास को बढ़ावा, पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण
निम्नलिखित में से कौन भारत में सभी एटीएम को जोड़ता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया
नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) नेशनल फाइनेंशियल स्विच (NFS) का संचालन करता है, जो भारत में साझा एटीएम का सबसे बड़ा नेटवर्क है। NFS सभी बैंकों के एटीएम को जोड़ता है, जिससे ग्राहक नकद निकासी और अन्य बैंकिंग सेवाओं के लिए किसी भी बैंक के एटीएम का उपयोग कर सकते हैं, जो देशभर में निर्बाध अंतर-बैंक एटीएम लेनदेन को सुविधाजनक बनाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI)
- स्थापना: NPCI को 2008 में भारत में खुदरा भुगतान और निपटान प्रणालियों के संचालन के लिए एक छत्र संगठन के रूप में निगमित किया गया था।
- स्वामित्व: यह भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 के प्रावधानों के तहत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) की एक पहल है।
- नेशनल फाइनेंशियल स्विच (NFS): 2004 में लॉन्च किया गया, NFS भारत में साझा एटीएम का सबसे बड़ा नेटवर्क है, जो बैंकों में 1 लाख से अधिक एटीएम को जोड़ता है।
- प्रमुख सेवाएं: NPCI कई भुगतान प्रणालियों का संचालन करता है जिनमें UPI (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस), IMPS (तत्काल भुगतान सेवा), RuPay कार्ड योजना, BHIM, AePS (आधार सक्षम भुगतान प्रणाली), और NFS शामिल हैं।
- UPI: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस NPCI की प्रमुख रियल-टाइम भुगतान प्रणाली है जिसने भारत में डिजिटल भुगतान में क्रांति ला दी है।
- RuPay: भारत का अपना घरेलू कार्ड भुगतान नेटवर्क, जो Visa और Mastercard के साथ प्रतिस्पर्धा करता है, 2012 में NPCI द्वारा लॉन्च किया गया।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए
- राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) समीक्षा समिति रिपोर्ट ने 2023 तक सामान्य (संयुक्त) सरकार के लिए GDP के 60% के ऋण-से-GDP अनुपात की अनुशंसा की है, जिसमें केंद्र सरकार के लिए 40% और राज्य सरकारों के लिए 20% शामिल है।
- केंद्र सरकार पर GDP के 21% के घरेलू दायित्व हैं जबकि राज्य सरकारों पर GDP के 49% के घरेलू दायित्व हैं।
- भारत के संविधान के अनुसार, यदि किसी राज्य पर केंद्र सरकार के प्रति कोई बकाया देनदारी है, तो उस राज्य के लिए कोई भी ऋण लेने से पहले केंद्र सरकार की सहमति लेना अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न राजकोषीय संघवाद, FRBM समीक्षा समिति की अनुशंसाओं और राज्यों की उधारी से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के ज्ञान का परीक्षण करता है। कथन 1 सही रूप से FRBM समिति के ऋण-से-GDP लक्ष्यों को दर्शाता है, और कथन 3 अनुच्छेद 293 के प्रावधानों का सटीक वर्णन करता है, जबकि कथन 2 घरेलू देनदारियों के लिए गलत आंकड़े प्रदान करता है।
✅ कथन 1 – सही: FRBM समीक्षा समिति (एन.के. सिंह समिति, 2017) ने 2023 तक संयुक्त ऋण-से-GDP अनुपात 60% की अनुशंसा की, जिसमें केंद्र के लिए 40% और राज्यों के लिए 20% शामिल है, ताकि राजकोषीय स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
❌ कथन 2 – गलत: केंद्र सरकार की घरेलू देनदारियां GDP के लगभग 46.1% थीं (2016-17), 21% नहीं, जबकि राज्य सरकारों की देनदारियां GDP के लगभग 23.2% थीं, 49% नहीं — आंकड़े उलटे और गलत हैं।
✅ कथन 3 – सही: संविधान का अनुच्छेद 293(3) अनिवार्य करता है कि यदि किसी राज्य पर केंद्र के प्रति बकाया देनदारी है तो कोई भी ऋण लेने के लिए उसे केंद्र सरकार की सहमति लेनी होगी।
📝 संक्षिप्त नोट्स: राजकोषीय उत्तरदायित्व और राज्य उधारी
- FRBM अधिनियम, 2003: संस्थागत तंत्र के माध्यम से राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करने और राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए अधिनियमित किया गया।
- FRBM समीक्षा समिति (2017): एन.के. सिंह की अध्यक्षता में; 2023 तक सामान्य सरकार के लिए 60% के ऋण-से-GDP अनुपात (40% केंद्र + 20% राज्य) की अनुशंसा की, और संरचनात्मक सुधारों, मंदी या राष्ट्रीय आपदा के दौरान विचलन के लिए एक पलायन खंड प्रस्तुत किया।
- अनुच्छेद 293(1): राज्य सरकारों को राज्य की संचित निधि की सुरक्षा पर भारत के भीतर उधार लेने का अधिकार देता है, जो राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित सीमाओं के अधीन है।
- अनुच्छेद 293(3): यदि किसी राज्य पर केंद्र के प्रति बकाया देनदारी है तो कोई भी ऋण लेने से पहले केंद्र सरकार की सहमति लेना आवश्यक है, जो राजकोषीय प्रबंधन में समन्वय सुनिश्चित करता है।
- अनुच्छेद 292: केंद्र सरकार को भारत की संचित निधि की सुरक्षा पर उधार लेने का अधिकार देता है, जो संसद द्वारा निर्धारित सीमाओं के अधीन है।
- राजकोषीय घाटा: सरकार के कुल राजस्व और कुल व्यय के बीच का अंतर; FRBM लक्ष्य केंद्र के लिए GDP के 3% को लक्षित करते हैं।
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग के शासन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए
- भारत सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पूंजी का निवेश पिछले दशक में लगातार बढ़ा है।
- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को व्यवस्थित करने के लिए, सहयोगी बैंकों का मूल भारतीय स्टेट बैंक के साथ विलय किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 2
यह प्रश्न भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग सुधारों के बारे में कथनों का मूल्यांकन करता है। कथन 1 गलत है क्योंकि पूंजी निवेश स्थिर नहीं रहा है बल्कि आवश्यकता-आधारित और छिटपुट रहा है। कथन 2 सही है क्योंकि SBI सहयोगी बैंकों का मूल भारतीय स्टेट बैंक के साथ विलय वास्तव में एक सुधार उपाय के रूप में किया गया था।
❌ कथन 1 – गलत: सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पूंजी निवेश पिछले दशक में स्थिर नहीं रहा है। यह छिटपुट और आवश्यकता-आधारित रहा है, विशेष रूप से कुछ वर्षों में (विशेषकर 2017 के बाद) जब बैंकों को उच्च NPA का सामना करना पड़ा, पुनर्पूंजीकरण बांडों के माध्यम से महत्वपूर्ण निवेश के साथ, न कि पूरे दशक में स्थिर वृद्धि।
✅ कथन 2 – सही: सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग सुधारों के भाग के रूप में, पांच सहयोगी बैंकों और भारतीय महिला बैंक का भारतीय स्टेट बैंक के साथ विलय 2017 में पूरा किया गया, जिससे एक मजबूत बैंकिंग इकाई का निर्माण हुआ और परिचालन दक्षता में सुधार हुआ।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग सुधार
- बैंक पुनर्पूंजीकरण: सरकार बजटीय समर्थन और पुनर्पूंजीकरण बांडों के माध्यम से PSB में पूंजी निवेश करती है ताकि उनके पूंजी आधार को मजबूत किया जा सके और Basel III मानदंडों को पूरा किया जा सके।
- SBI विलय (2017): पांच सहयोगी बैंकों (स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला) और भारतीय महिला बैंक का SBI के साथ विलय किया गया, जिससे बेहतर वैश्विक रैंकिंग के साथ भारत का सबसे बड़ा बैंक बना।
- अन्य PSB विलय: 2019-20 में, 10 PSB को 4 बैंकों में समेकित किया गया, जिससे PSB की कुल संख्या 27 (2017 में) से घटकर 12 (2020 तक) हो गई।
- 4R रणनीति: PSB को मजबूत करने के लिए पहचान (NPA की), समाधान (IBC के माध्यम से), पुनर्पूंजीकरण, और सुधार।
- शीघ्र सुधारात्मक कार्रवाई (PCA): RBI द्वारा पूंजी पर्याप्तता, परिसंपत्ति गुणवत्ता और लाभप्रदता मानकों के आधार पर कमजोर बैंकों की निगरानी के लिए ढांचा।
- बैंक बोर्ड ब्यूरो: 2016 में PSB में पारदर्शी बोर्ड नियुक्तियों और प्रदर्शन मूल्यांकन के माध्यम से शासन और व्यावसायिकता में सुधार के लिए स्थापित।
निम्नलिखित वस्तुओं पर विचार कीजिए:
- छिलके निकाले गए अनाज
- पके हुए मुर्गी के अंडे
- संसाधित और डिब्बाबंद मछली
- विज्ञापन सामग्री युक्त समाचार पत्र
उपर्युक्त में से कौन सी वस्तु/वस्तुएं GST (वस्तु एवं सेवा कर) के अंतर्गत छूट प्राप्त है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — केवल 1, 2 और 4
यह प्रश्न विभिन्न वस्तुओं पर GST छूट के ज्ञान का परीक्षण करता है। वस्तु 1 (छिलके निकाले गए अनाज), 2 (पके हुए मुर्गी के अंडे), और 4 (विज्ञापन युक्त समाचार पत्र) GST के अंतर्गत छूट प्राप्त हैं, जबकि वस्तु 3 (संसाधित और डिब्बाबंद मछली) एक मूल्य-वर्धित उत्पाद के रूप में कर योग्य है।
✅ कथन 1 – सही: छिलके निकाले गए अनाज (HSN 1104) GST से छूट प्राप्त हैं जब वे ब्रांडेड इकाई कंटेनरों में नहीं बेचे जाते, जिससे बुनियादी खाद्य पदार्थ सस्ते रहते हैं।
✅ कथन 2 – सही: पक्षियों के अंडे (पके हुए मुर्गी के अंडे सहित) HSN 0407 के तहत विशेष रूप से छूट प्राप्त हैं, चाहे वे ताजे हों, संरक्षित हों या पके हुए हों।
❌ कथन 3 – गलत: जबकि ताजी मछली GST-मुक्त है, संसाधित और डिब्बाबंद मछली (HSN 1604) एक मूल्य-वर्धित उत्पाद है जो 5% की दर से GST के अधीन है।
✅ कथन 4 – सही: समाचार पत्र, पत्रिकाएं और सामयिक पत्रिकाएं (HSN 4902) GST से छूट प्राप्त हैं, चाहे उनमें विज्ञापन सामग्री हो या नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: आवश्यक वस्तुओं पर GST छूट
- शून्य-दर बनाम छूट: शून्य-दर आपूर्ति इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुमति देती है, जबकि छूट प्राप्त आपूर्ति नहीं देती; अधिकांश खाद्य वस्तुएं छूट श्रेणी में आती हैं।
- छूट प्राप्त खाद्य वस्तुएं: ताजी सब्जियां, फल, दूध, दही, लस्सी, गैर-ब्रांडेड अनाज, ताजी मछली/मांस, गुड़, शहद और अंडे GST से मुक्त हैं।
- कर योग्य खाद्य वस्तुएं: संसाधित, पैकेज्ड या ब्रांडेड खाद्य पदार्थ GST आकर्षित करते हैं; संसाधित मछली/मांस उत्पाद (5%), आइसक्रीम (18%), और ब्रांडेड पैकेज्ड खाद्य पदार्थ (5-18%) कर योग्य हैं।
- मुद्रित मीडिया: सभी समाचार पत्र, पत्रिकाएं और सामयिक पत्रिकाएं HSN 4902 के तहत छूट प्राप्त हैं, जो विज्ञापन सामग्री की परवाह किए बिना सूचना तक सस्ती पहुंच सुनिश्चित करती हैं।
- HSN वर्गीकरण: हार्मोनाइज्ड सिस्टम ऑफ नोमेनक्लेचर (HSN) कोड GST लागू होने का निर्धारण करते हैं; समान उत्पादों पर प्रसंस्करण स्तर के आधार पर अलग-अलग कर उपचार हो सकता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- पिछले पांच वर्षों में आयातित खाद्य तेलों की मात्रा खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन से अधिक है।
- सरकार एक विशेष मामले के रूप में सभी आयातित खाद्य तेलों पर कोई सीमा शुल्क नहीं लगाती है।
ऊपर दिए गए दो कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
यह प्रश्न भारत की खाद्य तेल अर्थव्यवस्था के बारे में ज्ञान की परीक्षा करता है। कथन 1 आयातित खाद्य तेलों पर भारत की भारी निर्भरता को सही रूप से पहचानता है, जबकि कथन 2 गलत तरीके से दावा करता है कि आयातित खाद्य तेलों पर कोई सीमा शुल्क नहीं लगाया जाता है।
✅ कथन 1 – सही: भारत खाद्य तेलों का विश्व का सबसे बड़ा आयातक है, हाल के वर्षों में आयात कुल खपत का 60-65% है, जो घरेलू उत्पादन (35-40%) से काफी अधिक है।
❌ कथन 2 – गलत: भारत सरकार आयातित खाद्य तेलों पर सीमा शुल्क लगाती है (जिसमें मूल सीमा शुल्क और कृषि अवसंरचना और विकास उपकर शामिल हैं), जिन्हें घरेलू तिलहन किसानों की रक्षा और कीमतों के प्रबंधन के लिए समय-समय पर समायोजित किया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में खाद्य तेल
- आयात निर्भरता: भारत अपनी खाद्य तेल आवश्यकताओं का लगभग 60-65% आयात करता है, जो इसे खाद्य तेलों का विश्व का सबसे बड़ा आयातक बनाता है।
- प्रमुख स्रोत: पाम तेल (इंडोनेशिया और मलेशिया से), सोयाबीन तेल, और सूरजमुखी तेल प्रमुख आयात हैं।
- घरेलू उत्पादन: भारत मुख्य रूप से मूंगफली का तेल, सरसों का तेल, और पाम तेल की छोटी मात्रा का उत्पादन करता है, जो खपत का 35-40% है।
- सीमा शुल्क नीति: सरकार उपभोक्ता कीमतों और किसानों के हितों को संतुलित करने के लिए आयातित खाद्य तेलों पर सीमा शुल्क को समय-समय पर संशोधित करती है। शुल्क में मूल सीमा शुल्क (BCD) और कृषि अवसंरचना और विकास उपकर (AIDC) शामिल हैं।
- प्रमुख तिलहन: भारत में उगाए जाने वाले प्रमुख तिलहनों में मूंगफली, राई-सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, कुसुम, और तिल शामिल हैं।
- सरकारी पहल: तिलहन और तेल पाम पर राष्ट्रीय मिशन (NMOOP) का उद्देश्य घरेलू उत्पादन बढ़ाना और आयात निर्भरता को कम करना है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: मानव पूंजी निर्माण को एक अवधारणा के रूप में एक प्रक्रिया के संदर्भ में बेहतर ढंग से समझाया जाता है, जो सक्षम बनाती है
- किसी देश के व्यक्तियों को अधिक पूंजी संचित करने के लिए।
- देश के लोगों के ज्ञान, कौशल स्तर और क्षमताओं में वृद्धि करने के लिए।
- मूर्त संपत्ति के संचय के लिए।
- अमूर्त संपत्ति के संचय के लिए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 4
मानव पूंजी निर्माण से तात्पर्य शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल में निवेश के माध्यम से लोगों की उत्पादक क्षमताओं को बढ़ाने की प्रक्रिया से है। यह एक अमूर्त संपत्ति है जो कार्यबल के ज्ञान और क्षमताओं को बढ़ाती है, जिससे आर्थिक विकास में योगदान होता है।
✅ कथन 1 – गलत: मानव पूंजी निर्माण लोगों के कौशल और ज्ञान को विकसित करने पर केंद्रित है, भौतिक या वित्तीय पूंजी संचित करने पर नहीं।
✅ कथन 2 – सही: यह कथन मानव पूंजी निर्माण को लोगों के ज्ञान, कौशल और क्षमताओं को बढ़ाने की प्रक्रिया के रूप में सटीक रूप से परिभाषित करता है।
✅ कथन 3 – गलत: मूर्त संपत्ति भूमि और भवन जैसी भौतिक संपत्ति को संदर्भित करती है, जबकि मानव पूंजी अमूर्त है।
✅ कथन 4 – सही: मानव पूंजी वास्तव में एक अमूर्त संपत्ति है क्योंकि यह लोगों में निहित कौशल, ज्ञान और स्वास्थ्य के भंडार का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका आर्थिक मूल्य तो है लेकिन भौतिक रूप नहीं है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मानव पूंजी निर्माण
- परिभाषा: आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण शिक्षा, कौशल और अनुभव वाले व्यक्तियों की संख्या प्राप्त करने और बढ़ाने की प्रक्रिया।
- घटक: शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशिक्षण, प्रवासन और सूचना।
- प्रकृति: अमूर्त संपत्ति जिसे भौतिक रूप से छुआ नहीं जा सकता लेकिन जिसका अपार आर्थिक मूल्य है।
- निवेश स्रोत: शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारी व्यय, प्रशिक्षण पर निजी खर्च, और कौशल विकास में व्यक्तिगत निवेश।
- लाभ: उत्पादकता बढ़ाता है, नवाचार को बढ़ावा देता है, गरीबी कम करता है, और आर्थिक विकास को गति देता है।
- भौतिक पूंजी से अंतर: भौतिक पूंजी मूर्त संपत्ति (मशीनरी, भवन) को संदर्भित करती है, जबकि मानव पूंजी लोगों के कौशल और ज्ञान को संदर्भित करती है।
निम्नलिखित में से कौन सा कथन वैध मुद्रा (legal tender money) के अर्थ का सही वर्णन करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — वह मुद्रा जिसे लेनदार अपने दावों के निपटान में स्वीकार करने के लिए बाध्य है
वैध मुद्रा भुगतान का कोई भी रूप है जो कानून द्वारा मान्यता प्राप्त है और जिसे लेनदार ऋण या वित्तीय दायित्व के निपटान के लिए स्वीकार करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है। वैध मुद्रा की परिभाषित विशेषता लेनदार पर कानूनी बाध्यता है—यदि कोई देनदार दावे के निपटान के लिए वैध मुद्रा प्रस्तुत करता है, तो लेनदार इसे अस्वीकार नहीं कर सकता और बाद में ऋण के भुगतान न करने के लिए मुकदमा नहीं कर सकता।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
❌ विकल्प 1 – गलत: यह 'वैध मुद्रा' को कानूनी कार्यवाही में उपयोग की जाने वाली मुद्रा के रूप में गलत व्याख्या करता है, जो सही परिभाषा नहीं है।
❌ विकल्प 3 – गलत: चेक, ड्राफ्ट और विनिमय पत्र 'विश्वासपूर्ण मुद्रा' हैं जिनकी स्वीकृति पक्षों के बीच विश्वास पर निर्भर करती है; लेनदार उन्हें स्वीकार करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं और नकद भुगतान पर जोर दे सकते हैं।
❌ विकल्प 4 – गलत: वैध मुद्रा में धात्विक सिक्के और कागजी मुद्रा नोट दोनों शामिल हैं; इसे केवल धात्विक मुद्रा के रूप में परिभाषित करना अपूर्ण है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वैध मुद्रा
- परिभाषा: वैध मुद्रा भुगतान का वह रूप है जिसे किसी क्षेत्राधिकार में ऋण और दायित्वों के निपटान के लिए कानून द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए।
- भारत में: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी मुद्रा नोट और भारत सरकार द्वारा जारी सिक्के भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 और सिक्का अधिनियम, 2011 के तहत वैध मुद्रा हैं।
- कानूनी बाध्यता: लेनदार ऋण निपटान के लिए प्रस्तुत वैध मुद्रा को अस्वीकार नहीं कर सकता; अस्वीकृति के परिणामस्वरूप देनदार दायित्व से मुक्त हो सकता है।
- सिक्कों पर सीमाएं: सिक्का अधिनियम, 2011 के तहत, सिक्के केवल निश्चित सीमाओं तक वैध मुद्रा हैं (जैसे, ₹10 और उससे कम मूल्य के सिक्कों के लिए ₹1,000)।
- बैंक मुद्रा बनाम वैध मुद्रा: चेक, ड्राफ्ट और विनिमय पत्र वैध मुद्रा नहीं हैं क्योंकि उनकी स्वीकृति स्वैच्छिक है और पारस्परिक विश्वास (विश्वासपूर्ण मुद्रा) पर आधारित है।
- विमुद्रीकरण का प्रभाव: जब मुद्रा का विमुद्रीकरण किया जाता है (जैसे 2016 में), वे नोट निर्दिष्ट तिथि से वैध मुद्रा नहीं रहते।
निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
- सुपारी
- जौ
- कॉफी
- रागी (फिंगर मिलेट)
- मूंगफली
- तिल
- हल्दी
आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने उपर्युक्त में से किनके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2, 4, 5 और 6
आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) 22 अनिवार्य फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की घोषणा करती है, जिसमें अनाज, दालें, तिलहन और वाणिज्यिक फसलें शामिल हैं। दिए गए विकल्पों में से केवल जौ (अनाज), रागी (अनाज), मूंगफली (तिलहन), और तिल (तिलहन) MSP व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं। सुपारी, कॉफी और हल्दी बागान/मसाला फसलें हैं जो MSP सूची में शामिल नहीं हैं।
✅ कथन 1 (सुपारी) – गलत: सुपारी एक बागान फसल है और MSP के लिए 22 अनिवार्य फसलों में शामिल नहीं है।
✅ कथन 2 (जौ) – सही: जौ सात अनाजों में से एक है जिसके लिए MSP की घोषणा की जाती है।
✅ कथन 3 (कॉफी) – गलत: कॉफी एक बागान/पेय फसल है जो MSP के अंतर्गत नहीं आती।
✅ कथन 4 (रागी) – सही: रागी (फिंगर मिलेट) एक अनाज है जो MSP सूची में शामिल है।
✅ कथन 5 (मूंगफली) – सही: मूंगफली सात तिलहनों में से एक है जो MSP के अंतर्गत आता है।
✅ कथन 6 (तिल) – सही: तिल एक तिलहन है जिसके लिए MSP की घोषणा की जाती है।
✅ कथन 7 (हल्दी) – गलत: हल्दी एक मसाला फसल है जो MSP के लिए 22 अनिवार्य फसलों में शामिल नहीं है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) फसलें
| श्रेणी | MSP के अंतर्गत आने वाली फसलें | कुल |
|---|---|---|
| अनाज | धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजरा, जौ, रागी | 7 |
| दालें | चना, तुअर (अरहर), मूंग, उड़द, मसूर | 5 |
| तिलहन | मूंगफली, रेपसीड-सरसों, सोयाबीन, तिल, सूरजमुखी, कुसुम, नाइजरसीड | 7 |
| वाणिज्यिक फसलें | कोपरा, कपास (मध्यम रेशा और लंबे रेशा), गन्ना (FRP) | 3 |
| कुल फसलें | 22 + गन्ना (FRP) | |
- CCEA की भूमिका: आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर MSP की घोषणा करती है।
- बाहर की गई फसलें: बागान फसलें (कॉफी, चाय, रबर, सुपारी), मसाले (हल्दी, इलायची), और अधिकांश बागवानी फसलें MSP के अंतर्गत नहीं आती हैं।
- MSP का उद्देश्य: किसानों को सुनिश्चित मूल्य प्रदान करना और मूल्य उतार-चढ़ाव से उनकी रक्षा करना, उनकी उपज के लिए न्यूनतम पारिश्रमिक सुनिश्चित करना।
एक उच्च बचत अर्थव्यवस्था होने के बावजूद, पूंजी निर्माण के परिणामस्वरूप उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हो सकती है, इसका कारण है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — उच्च पूंजी-उत्पादन अनुपात
यहाँ तक कि जब किसी अर्थव्यवस्था में उच्च बचत के कारण पर्याप्त पूंजी निर्माण होता है, यदि पूंजी-उत्पादन अनुपात (COR) उच्च है, तो इसका मतलब है कि उत्पादन की प्रत्येक इकाई के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है, जिसके परिणामस्वरूप निवेश का GDP वृद्धि में अकुशल रूपांतरण होता है। यह अक्षमता तकनीकी पिछड़ेपन, खराब बुनियादी ढांचे, अपर्याप्त कौशल स्तर या संसाधनों के गलत आवंटन से उत्पन्न हो सकती है, जो निवेश को कम उत्पादक बनाती है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
• कमजोर प्रशासनिक तंत्र कार्यान्वयन दक्षता को प्रभावित करता है लेकिन सीधे पूंजी-उत्पादन संबंध को परिभाषित नहीं करता।
• निरक्षरता मानव पूंजी की गुणवत्ता को प्रभावित करती है लेकिन यह मुख्य कारण नहीं है कि पूंजी निर्माण आनुपातिक उत्पादन उत्पन्न करने में विफल क्यों रहता है।
• उच्च जनसंख्या घनत्व रोजगार की चुनौतियां पैदा कर सकता है लेकिन सीधे यह नहीं बताता कि निवेशित पूंजी सीमित उत्पादन क्यों पैदा करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पूंजी-उत्पादन अनुपात और आर्थिक विकास
- पूंजी निर्माण: किसी दिए गए अवधि के दौरान अर्थव्यवस्था में पूंजीगत वस्तुओं (मशीनरी, भवन, बुनियादी ढांचा) के मौजूदा स्टॉक में शुद्ध वृद्धि।
- पूंजी-उत्पादन अनुपात (COR): उत्पादन की एक इकाई का उत्पादन करने के लिए आवश्यक पूंजी की मात्रा को मापता है। सूत्र: COR = पूंजी स्टॉक / उत्पादन (GDP)
- निम्न COR: पूंजी के कुशल उपयोग को दर्शाता है — प्रत्येक उत्पादन इकाई के लिए कम पूंजी की आवश्यकता (तीव्र विकास के लिए वांछनीय)
- उच्च COR: पूंजी के अकुशल उपयोग को दर्शाता है — प्रत्येक उत्पादन इकाई के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता (उच्च निवेश के बावजूद विकास धीमा करता है)
- वृद्धिशील पूंजी-उत्पादन अनुपात (ICOR): अतिरिक्त उत्पादन इकाई के लिए आवश्यक अतिरिक्त पूंजी को मापता है। विकास मॉडल और योजना में उपयोग किया जाता है।
- उच्च COR के कारण: तकनीकी अप्रचलन, खराब बुनियादी ढांचा, कौशल अंतराल, पूंजी-गहन लेकिन कम-उत्पादकता वाले क्षेत्र, नौकरशाही देरी, और क्षमता का कम उपयोग।
- नीतिगत निहितार्थ: केवल बचत और निवेश बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; निरंतर आर्थिक विकास के लिए पूंजी उपयोग की उत्पादकता और दक्षता में सुधार करना महत्वपूर्ण है।
प्रसिद्ध चित्रकारी "बनी ठनी" किससे संबंधित है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — किशनगढ़ शैली
"बनी ठनी" राजस्थान की किशनगढ़ शैली की 18वीं शताब्दी की एक प्रतिष्ठित चित्रकारी है, जिसे भारतीय 'मोनालिसा' के रूप में जाना जाता है। यह लम्बी विशेषताओं और सुंदर लालित्य वाली एक महिला को दर्शाती है, जिसे दैवीय प्रेमिका राधा या कवयित्री-गायिका बनी ठनी स्वयं का प्रतिनिधित्व माना जाता है। यह चित्रकारी राजा सावंत सिंह के संरक्षण में किशनगढ़ कला की रोमांटिक और भक्तिमय विषय-वस्तु का प्रतीक है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: राजस्थानी लघु चित्रकला की शैलियाँ
| शैली | काल | प्रमुख विशेषताएँ | प्रसिद्ध कृतियाँ/विषय |
|---|---|---|---|
| किशनगढ़ | 18वीं शताब्दी | लम्बी आँखें और चेहरे, सुंदर लालित्य, रोमांटिक विषय, राधा-कृष्ण भक्ति | बनी ठनी, राधा-कृष्ण श्रृंखला |
| बूंदी | 17वीं-18वीं शताब्दी | गहरे रंग, शिकार दृश्य, राजसी जीवन, हरियाली, गतिशील रचना | रागमाला श्रृंखला, चौगान खिलाड़ी |
| जयपुर | 18वीं-19वीं शताब्दी | मुगल प्रभाव, चित्र, दरबारी दृश्य, जीवंत रंग | गीत गोविंद श्रृंखला, राजसी चित्र |
| कांगड़ा | 18वीं-19वीं शताब्दी | कोमल रंग, गीतात्मक विषय, नाजुक विशेषताएँ, प्राकृतिक परिदृश्य, पहाड़ी शैली | गीत गोविंद, भागवत पुराण, नायिका भेद |
- मेवाड़ शैली: सबसे प्रारंभिक राजस्थानी शैलियों में से एक, गहरे रंगों और रामायण तथा भागवत पुराण जैसे धार्मिक विषयों के लिए प्रसिद्ध।
- मारवाड़ (जोधपुर) शैली: शासकों के चित्रों, गहरी रूपरेखाओं और लोक कला के प्रभावों के लिए जानी जाती है।
- बीकानेर शैली: मजबूत मुगल प्रभाव, सूक्ष्म विवरण और दरबारी दृश्य।
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन एक भावी बुद्ध है, जो संसार को बचाने के लिए अभी आना बाकी है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — मैत्रेय
बौद्ध परंपरा में मैत्रेय को भावी बुद्ध के रूप में मान्यता प्राप्त है जो पृथ्वी पर शुद्ध धर्म की शिक्षा देने के लिए तब प्रकट होंगे जब गौतम बुद्ध की शिक्षाएं पूरी तरह से भुला दी जाएंगी। अवलोकितेश्वर (जिन्हें लोकेश्वर या पद्मपाणि के नाम से भी जाना जाता है) महायान बौद्ध धर्म में एक करुणामय बोधिसत्व हैं, लेकिन उन्हें संसार को बचाने के लिए नियत भावी बुद्ध नहीं माना जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख बौद्ध व्यक्तित्व
| व्यक्तित्व | विवरण |
|---|---|
| मैत्रेय | भावी बुद्ध जो भविष्य में धर्म की शिक्षा देने के लिए प्रकट होंगे; वर्तमान में तुषित स्वर्ग में निवास करते हैं |
| अवलोकितेश्वर | महायान बौद्ध धर्म में करुणा के बोधिसत्व; सभी बुद्धों की करुणा का प्रतीक हैं |
| लोकेश्वर | अवलोकितेश्वर का दूसरा नाम, जिसका अर्थ है "विश्व के स्वामी" |
| पद्मपाणि | अवलोकितेश्वर का रूप जो कमल (पद्म) धारण करते हैं; अजंता की गुफा चित्रों में चित्रित |
| गौतम बुद्ध | वर्तमान युग के ऐतिहासिक बुद्ध; बोधगया में ज्ञान प्राप्त किया |
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| शिल्प | विरासत |
|---|---|
| 1. पुथुक्कुली शॉल | तमिलनाडु |
| 2. सुजनी कढ़ाई | महाराष्ट्र |
| 3. उप्पाडा जामदानी साड़ियाँ | कर्नाटक |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
यह प्रश्न पारंपरिक भारतीय शिल्पों और उनके भौगोलिक मूल के ज्ञान का परीक्षण करता है। केवल पहला युग्म सही रूप से सुमेलित है, जबकि अन्य दो युग्म शिल्पों को गलत राज्यों से जोड़ते हैं।
✅ युग्म 1 – सही: पुथुक्कुली शॉल वास्तव में तमिलनाडु के नीलगिरि पहाड़ियों में तोडा जनजाति द्वारा पारंपरिक रूप से बनाए गए कढ़ाईदार वस्त्र हैं।
❌ युग्म 2 – गलत: सुजनी कढ़ाई बिहार (विशेष रूप से भुसुरा गाँव) का पारंपरिक शिल्प है, महाराष्ट्र का नहीं।
❌ युग्म 3 – गलत: उप्पाडा जामदानी साड़ियाँ आंध्र प्रदेश के उप्पाडा की प्रसिद्ध रेशमी साड़ियाँ हैं, कर्नाटक की नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पारंपरिक भारतीय शिल्प और उनके राज्य
| शिल्प | राज्य | प्रमुख विशेषताएँ |
|---|---|---|
| पुथुक्कुली शॉल | तमिलनाडु | तोडा जनजाति द्वारा कढ़ाईदार वस्त्र, नीलगिरि पहाड़ियाँ |
| सुजनी कढ़ाई | बिहार | पारंपरिक रनिंग स्टिच कढ़ाई, भुसुरा गाँव में उत्पन्न |
| उप्पाडा जामदानी साड़ियाँ | आंध्र प्रदेश | जटिल बुनाई वाली पारदर्शी रेशमी साड़ियाँ, जीआई टैग प्राप्त |
| पैठणी साड़ियाँ | महाराष्ट्र | सोने/चाँदी के जरी काम वाली रेशमी साड़ियाँ |
| इलकल साड़ियाँ | कर्नाटक | विशिष्ट बॉर्डर डिजाइन के साथ कपास-रेशम मिश्रण |
| चंदेरी कपड़ा | मध्य प्रदेश | रेशम और सुनहरी जरी के साथ हल्का कपड़ा |
भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- फतेहपुर सीकरी में बुलंद दरवाजा और खानकाह के निर्माण में सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया था।
- लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा और रूमी दरवाजा के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का उपयोग किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — कोई नहीं
इन ऐतिहासिक स्मारकों के निर्माण में उपयोग की गई सामग्रियों के संबंध में दोनों कथन गलत हैं।
❌ कथन 1 – गलत: फतेहपुर सीकरी में बुलंद दरवाजा और खानकाह का निर्माण मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर से किया गया था, सफेद संगमरमर से नहीं। हालांकि कुछ सजावटी तत्वों में सफेद संगमरमर की जड़ाई का काम हो सकता है, लेकिन प्रमुख सामग्री लाल बलुआ पत्थर है जो फतेहपुर सीकरी में मुगल वास्तुकला की विशेषता है।
❌ कथन 2 – गलत: लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण मुख्य रूप से लखौरी ईंटों, चूने के मोर्टार और स्टुको प्लास्टर से किया गया था, न कि लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से। रूमी दरवाजा भी इसी प्रकार ईंटों और चूने के प्लास्टर से बना है। ये संरचनाएं अवधी स्थापत्य शैली का उदाहरण हैं जो पत्थर के बजाय ईंट निर्माण पर निर्भर थी।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मुगल और अवधी स्थापत्य सामग्री
| स्मारक | स्थान | प्रमुख सामग्री | काल/शासक |
|---|---|---|---|
| बुलंद दरवाजा | फतेहपुर सीकरी | संगमरमर की जड़ाई के साथ लाल बलुआ पत्थर | अकबर (1571-1585) |
| खानकाह (सलीम चिश्ती का मकबरा) | फतेहपुर सीकरी | सफेद संगमरमर | अकबर (1580-81) |
| बड़ा इमामबाड़ा | लखनऊ | लखौरी ईंटें, चूने का मोर्टार, स्टुको | आसफ-उद-दौला (1784) |
| रूमी दरवाजा | लखनऊ | ईंटें और चूने का प्लास्टर | आसफ-उद-दौला (1784) |
| ताजमहल | आगरा | सफेद संगमरमर | शाहजहाँ (1632-1653) |
| लाल किला | दिल्ली | लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर | शाहजहाँ (1639-1648) |
भारत में धार्मिक प्रथाओं के संदर्भ में, "स्थानकवासी" संप्रदाय किससे संबंधित है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — जैन धर्म
स्थानकवासी संप्रदाय जैन धर्म के भीतर एक सुधारवादी उप-संप्रदाय है जो 17वीं शताब्दी में मूर्ति पूजा और मंदिर अनुष्ठानों के विरोध में उभरा। 'स्थानकवासी' नाम का शाब्दिक अर्थ है 'जो हॉल में निवास करते हैं' (स्थानक), जो सुसज्जित मंदिरों के बजाय सरल प्रार्थना कक्षों में पूजा करने की उनकी प्रथा को संदर्भित करता है। यह संप्रदाय कर्मकांडी पूजा के बजाय तपस्या, शास्त्रीय अध्ययन और आध्यात्मिक अनुशासन पर जोर देता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख जैन संप्रदाय
| संप्रदाय | प्रमुख विशेषताएँ | उत्पत्ति काल |
|---|---|---|
| दिगंबर | आकाश-वस्त्र (नग्न) साधु; मानते हैं कि महिलाएं सीधे मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं; अधिक कठोर अभ्यास | प्राचीन विभाजन (लगभग 300 ईसा पूर्व) |
| श्वेतांबर | सफेद वस्त्र धारण करने वाले साधु; स्वीकार करते हैं कि महिलाएं मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं; मुख-आवरण का उपयोग करते हैं | प्राचीन विभाजन (लगभग 300 ईसा पूर्व) |
| स्थानकवासी | मूर्ति पूजा को अस्वीकार करते हैं; सरल कक्षों (स्थानकों) में पूजा करते हैं; ध्यान और शास्त्रों पर जोर देते हैं; श्वेतांबर का उप-संप्रदाय | 17वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग 1653 में उभरा) |
| तेरापंथी | और अधिक सुधारवादी संप्रदाय; एक आचार्य के अधीन केंद्रीकृत नेतृत्व; कठोर अहिंसा; स्थानकवासी का उप-संप्रदाय | 18वीं शताब्दी ईस्वी (1760) |
- स्थानकवासी आंदोलन की स्थापना गुजरात में लवजी नामक एक व्यापारी द्वारा मूर्तिपूजक (मूर्ति-पूजा करने वाली) परंपरा के विरोध में की गई थी।
- स्थानकवासी और तेरापंथी दोनों संप्रदाय बाहरी कर्मकांड के बजाय आंतरिक आध्यात्मिकता पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- ये सुधारवादी आंदोलन महावीर की मूल शिक्षाओं और जैन सिद्धांतों के कठोर पालन पर जोर देते हैं।
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| परंपरा | राज्य |
|---|---|
| 1. चापचार कुट महोत्सव | मिजोरम |
| 2. खोंगजोम परबा गाथागीत | मणिपुर |
| 3. थांग-टा नृत्य | सिक्किम |
उपर्युक्त में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — 1 और 2
यह प्रश्न पूर्वोत्तर भारत की पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं और उनसे संबंधित राज्यों के ज्ञान का परीक्षण करता है। युग्म 1 और 2 सही सुमेलित हैं, जबकि युग्म 3 में थांग-टा को मणिपुर के बजाय गलती से सिक्किम से जोड़ा गया है।
✅ युग्म 1 – सही: चापचार कुट मिजोरम के मिजो लोगों द्वारा मनाया जाने वाला एक जीवंत वसंत उत्सव है, जो झूम खेती (स्लैश-एंड-बर्न खेती) के पूर्ण होने का प्रतीक है।
✅ युग्म 2 – सही: खोंगजोम परबा एक अनुष्ठानिक गाथागीत प्रदर्शन है जो 1891 के एंग्लो-मणिपुरी युद्ध, विशेष रूप से खोंगजोम की लड़ाई की याद दिलाता है जहां मणिपुरी सैनिकों ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।
❌ युग्म 3 – गलत: थांग-टा मणिपुर की एक पारंपरिक मार्शल आर्ट है, सिक्किम की नहीं। यह सशस्त्र ('थांग' - तलवार/भाला) और निहत्थे ('टा' - हाथों से लड़ाई) युद्ध तकनीकों को जोड़ता है और मणिपुरी संस्कृति का अभिन्न अंग है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक परंपराएँ
| राज्य | सांस्कृतिक परंपरा | विवरण |
|---|---|---|
| मिजोरम | चापचार कुट | झूम संचालन के अंत का जश्न मनाने वाला वसंत उत्सव; बांस नृत्य प्रस्तुत करता है |
| मणिपुर | खोंगजोम परबा | खोंगजोम की लड़ाई (1891) का वर्णन करने वाला गाथागीत-नाटक; वार्षिक रूप से प्रस्तुत किया जाता है |
| मणिपुर | थांग-टा | तलवारबाजी और निहत्थे युद्ध को संयोजित करने वाली मार्शल आर्ट |
| मणिपुर | रास लीला | भगवान कृष्ण के जीवन को दर्शाने वाला शास्त्रीय नृत्य-नाटक |
| सिक्किम | लोसार | भूटिया और लेप्चा समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला तिब्बती नव वर्ष |
भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- अधिकांश त्यागराज कृतियाँ भगवान कृष्ण की प्रशंसा में भक्ति गीत हैं।
- त्यागराज ने कई नए रागों की रचना की।
- अन्नमाचार्य और त्यागराज समकालीन हैं।
- अन्नमाचार्य के कीर्तन भगवान वेंकटेश्वर की प्रशंसा में भक्ति गीत हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 4
यह प्रश्न दो प्रमुख कर्नाटक संगीत संगीतकारों और उनके योगदान के ज्ञान का परीक्षण करता है। त्यागराज की रचनात्मक नवीनताओं और अन्नमाचार्य की भक्ति केंद्रितता के संबंध में केवल कथन 2 और 4 तथ्यात्मक रूप से सही हैं।
❌ कथन 1 – गलत: त्यागराज की अधिकांश कृतियाँ भगवान राम की प्रशंसा में भक्ति रचनाएँ हैं, भगवान कृष्ण की नहीं।
✅ कथन 2 – सही: त्यागराज को कई नए रागों की रचना और अपनी नवीन रचनाओं से कर्नाटक संगीत को समृद्ध करने का श्रेय दिया जाता है।
❌ कथन 3 – गलत: अन्नमाचार्य (1408-1503 ई.) और त्यागराज (1767-1847 ई.) समकालीन नहीं थे; वे लगभग तीन शताब्दियों के अंतराल पर जीवित रहे।
✅ कथन 4 – सही: अन्नमाचार्य के कीर्तन मुख्य रूप से तिरुपति के भगवान वेंकटेश्वर (बालाजी) की प्रशंसा में भक्ति गीत हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कर्नाटक संगीत के संत संगीतकार
| संगीतकार | काल | देवता | प्रमुख योगदान |
|---|---|---|---|
| अन्नमाचार्य | 1408-1503 ई. (15वीं शताब्दी) | भगवान वेंकटेश्वर (तिरुपति) | 32,000 से अधिक संकीर्तनों की रचना; संकीर्तन नामक गीत रचने वाले प्रथम ज्ञात भारतीय संगीतकार माने जाते हैं; कर्नाटक भक्ति संगीत के अग्रदूत |
| त्यागराज | 1767-1847 ई. (18वीं-19वीं शताब्दी) | भगवान राम | कर्नाटक संगीत की त्रिमूर्ति का हिस्सा (मुथुस्वामी दीक्षितर और श्यामा शास्त्री के साथ); नए रागों की रचना की; 700 से अधिक कृतियों की रचना; उनके पंचरत्न कृतियाँ उत्कृष्ट कृतियाँ मानी जाती हैं |
| मुथुस्वामी दीक्षितर | 1775-1835 ई. | विभिन्न देवता | संस्कृत में रचनाओं के लिए प्रसिद्ध; जटिल रागों की खोज की; त्रिमूर्ति में से एक |
| श्यामा शास्त्री | 1762-1827 ई. | देवी (मुख्य रूप से कामाक्षी) | लयबद्ध पैटर्न के मास्टर; मुख्य रूप से तेलुगु में रचना की; त्रिमूर्ति में से एक |
| पुरंदर दास | 1484-1564 ई. | भगवान कृष्ण (विट्ठल) | कर्नाटक संगीत के पिता; शिक्षण पद्धति को व्यवस्थित किया; 475,000 से अधिक गीतों की रचना की |
UPSC Prelims 2018 Questions Paper - Subject-wise Question Distribution
भारतीय अर्थव्यवस्था
18 Qs (18%)भारतीय राजव्यवस्था
15 Qs (15%)पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
14 Qs (14%)आधुनिक इतिहास
13 Qs (13%)विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
12 Qs (12%)अंतरराष्ट्रीय संबंध
8 Qs (8%)भारतीय कला और संस्कृति
7 Qs (7%)समसामयिकी
4 Qs (4%)भारत का भूगोल
4 Qs (4%)विश्व भूगोल
4 Qs (4%)मध्यकालीन इतिहास
1 Qs (1%)UPSC Prelims 2018 Question Paper - FAQs & Analysis
Q1 How many total questions were asked in UPSC Prelims 2018?
Q2 What is the subject-wise question breakdown for UPSC Prelims 2018?
- भारतीय अर्थव्यवस्था: 18 questions (18%)
- भारतीय राजव्यवस्था: 15 questions (15%)
- पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी: 14 questions (14%)
- आधुनिक इतिहास: 13 questions (13%)
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: 12 questions (12%)
- अंतरराष्ट्रीय संबंध: 8 questions (8%)
- भारतीय कला और संस्कृति: 7 questions (7%)
- समसामयिकी: 4 questions (4%)
- भारत का भूगोल: 4 questions (4%)
- विश्व भूगोल: 4 questions (4%)
- मध्यकालीन इतिहास: 1 questions (1%)