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भारत के धर्म Previous Year Questions (PYQs)
Showing solved Previous Year Questions for Chapter: भारत के धर्म
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भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित ग्रंथों पर विचार कीजिए:
- Nettipakarana
- Parishishtaparvan
- Avadanashataka
- Trishashtilakshana Mahapurana
उपर्युक्त में से कौन-से जैन ग्रंथ हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 4
दिए गए ग्रंथों में से केवल परिशिष्टपर्वन और त्रिषष्टिलक्षण महापुराण जैन ग्रंथ हैं। नेत्तिपकरण थेरवाद बौद्ध शास्त्र है, जबकि अवदानशतक बौद्ध किंवदंतियों का संग्रह है।
❌ कथन 1 – गलत: नेत्तिपकरण थेरवाद परंपरा का एक बौद्ध शास्त्र है जो पाली कैनन की व्याख्या के लिए मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है।
✅ कथन 2 – सही: परिशिष्टपर्वन (स्थविरावलीचरित्र) हेमचंद्र द्वारा लिखित 12वीं सदी का एक जैन ग्रंथ है, जो प्रारंभिक जैन आचार्यों का ऐतिहासिक विवरण प्रदान करता है।
❌ कथन 3 – गलत: अवदानशतक संस्कृत में एक सौ बौद्ध किंवदंतियों (अवदान) का संग्रह है जो पूर्व जन्मों और कार्यों का विवरण देता है।
✅ कथन 4 – सही: त्रिषष्टिलक्षण महापुराण (महापुराण) दिगंबर भिक्षुओं जिनसेन और गुणभद्र द्वारा 9वीं सदी में रचित एक प्रमुख जैन ग्रंथ है, जो 63 शलाकापुरुषों के जीवन का विवरण देता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: धार्मिक ग्रंथों का वर्गीकरण
| ग्रंथ | धर्म | लेखक/काल | मुख्य विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| नेत्तिपकरण | बौद्ध (थेरवाद) | उत्तर-कैननिकल काल | पाली कैनन की व्याख्या के लिए मार्गदर्शक |
| परिशिष्टपर्वन | जैन | हेमचंद्र (12वीं सदी) | जैन आचार्यों का ऐतिहासिक विवरण; बड़े कार्य का परिशिष्ट |
| अवदानशतक | बौद्ध | संस्कृत साहित्य | 100 बौद्ध किंवदंतियों (अवदान) का संग्रह |
| त्रिषष्टिलक्षण महापुराण | जैन (दिगंबर) | जिनसेन और गुणभद्र (9वीं सदी) | 63 शलाकापुरुषों (महापुरुषों) के जीवन का विवरण |
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
ऐतिहासिक व्यक्ति - के रूप में जाने जाते हैं
- आर्यदेव - जैन विद्वान
- दिङ्नाग - बौद्ध विद्वान
- नाथमुनि - वैष्णव विद्वान
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल दो युग्म
यह प्रश्न ऐतिहासिक भारतीय विद्वानों और उनकी दार्शनिक परंपराओं के ज्ञान की परीक्षा करता है। दिए गए तीन युग्मों में से दो सही सुमेलित हैं जबकि एक गलत है।
❌ युग्म 1 – गलत: आर्यदेव एक बौद्ध दार्शनिक और माध्यमक विद्वान थे, जैन विद्वान नहीं। वे नागार्जुन के शिष्य थे और नालंदा मठ से जुड़े थे।
✅ युग्म 2 – सही: दिङ्नाग वास्तव में एक बौद्ध विद्वान थे जो बौद्ध तर्कशास्त्र (प्रमाण) और ज्ञानमीमांसा में अपने अग्रणी कार्य के लिए प्रसिद्ध थे, जिन्होंने धर्मकीर्ति जैसे बाद के दार्शनिकों को प्रभावित किया।
✅ युग्म 3 – सही: नाथमुनि एक वैष्णव विद्वान थे जिन्होंने श्री वैष्णव परंपरा को पुनर्जीवित किया और नालायिरा दिव्य प्रबंधम का संकलन किया, जो तमिल भक्ति स्तोत्रों का संग्रह है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख भारतीय दार्शनिक विद्वान
| विद्वान | परंपरा | कालखंड | प्रमुख योगदान |
|---|---|---|---|
| आर्यदेव | बौद्ध (माध्यमक) | दूसरी-तीसरी शताब्दी ईस्वी | नागार्जुन के शिष्य; चतुःशतक (चार सौ श्लोक) लिखे; शून्यवाद का प्रचार किया |
| दिङ्नाग | बौद्ध (योगाचार) | पाँचवीं-छठी शताब्दी ईस्वी | बौद्ध तर्कशास्त्र के संस्थापक; प्रमाणसमुच्चय लिखा; प्रमाण सिद्धांत की स्थापना की |
| नाथमुनि | वैष्णव (श्री वैष्णव) | नौवीं-दसवीं शताब्दी ईस्वी | श्री वैष्णव परंपरा को पुनर्जीवित किया; दिव्य प्रबंधम का संकलन किया; यामुनाचार्य के दादा |
| धर्मकीर्ति | बौद्ध | सातवीं शताब्दी ईस्वी | दिङ्नाग के तर्कशास्त्र को विकसित किया; प्रमाणवार्तिक लिखा |
| रामानुज | वैष्णव | ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी ईस्वी | विशिष्टाद्वैत का प्रतिपादन किया; श्री वैष्णव दर्शन को व्यवस्थित किया |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- सेंट फ्रांसिस जेवियर जेसुइट ऑर्डर के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
- सेंट फ्रांसिस जेवियर की मृत्यु गोवा में हुई थी और वहां उनके लिए एक चर्च समर्पित है।
- सेंट फ्रांसिस जेवियर का पर्व प्रत्येक वर्ष गोवा में मनाया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न सेंट फ्रांसिस जेवियर के बारे में ज्ञान का परीक्षण करता है, जो गोवा में ईसाई धर्म से जुड़े एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं। कथन 1 और 3 सही हैं, जबकि कथन 2 में उनकी मृत्यु के स्थान के बारे में तथ्यात्मक त्रुटि है।
✅ कथन 1 – सही: सेंट फ्रांसिस जेवियर वास्तव में 1534 में इग्नेशियस ऑफ लोयोला के साथ सोसाइटी ऑफ जीसस (जेसुइट ऑर्डर) के सात संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
❌ कथन 2 – गलत: सेंट फ्रांसिस जेवियर की मृत्यु गोवा में नहीं हुई थी; उनकी मृत्यु 1552 में चीन के तट पर शांगचुआन द्वीप (सैंसियन) पर हुई थी। हालांकि, गोवा में बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस में उनके पार्थिव अवशेष रखे गए हैं और यह उन्हें समर्पित है।
✅ कथन 3 – सही: सेंट फ्रांसिस जेवियर का पर्व (गोएन्चो साईब) प्रतिवर्ष 3 दिसंबर को गोवा में मनाया जाता है, और हर दस वर्ष में उनके शरीर को सार्वजनिक दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सेंट फ्रांसिस जेवियर और गोवा में ईसाई धर्म
- सेंट फ्रांसिस जेवियर (1506-1552): स्पेनिश जेसुइट मिशनरी और 1534 में सोसाइटी ऑफ जीसस (जेसुइट ऑर्डर) के सह-संस्थापक।
- भारत में मिशन: 1542 में गोवा पहुंचे और दक्षिण भारत में व्यापक रूप से काम किया, हजारों लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया।
- मृत्यु: 1552 में चीन में प्रवेश करने का प्रयास करते समय शांगचुआन द्वीप (चीन तट से दूर) पर मृत्यु हुई।
- बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस: ओल्ड गोवा में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, 1605 में निर्मित, सेंट फ्रांसिस जेवियर के पवित्र अवशेषों को रखता है।
- सेंट फ्रांसिस जेवियर का पर्व: प्रतिवर्ष 3 दिसंबर को मनाया जाता है; संत के शरीर को हर 10 वर्ष में एक बार सार्वजनिक दर्शन (एक्सपोज़िशन) के लिए प्रदर्शित किया जाता है।
- विरासत: गोवा के संरक्षक संत और एशिया में सबसे प्रभावशाली ईसाई मिशनरियों में से एक।
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भारत में धार्मिक प्रथाओं के संदर्भ में, "स्थानकवासी" संप्रदाय किससे संबंधित है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — जैन धर्म
स्थानकवासी संप्रदाय जैन धर्म के भीतर एक सुधारवादी उप-संप्रदाय है जो 17वीं शताब्दी में मूर्ति पूजा और मंदिर अनुष्ठानों के विरोध में उभरा। 'स्थानकवासी' नाम का शाब्दिक अर्थ है 'जो हॉल में निवास करते हैं' (स्थानक), जो सुसज्जित मंदिरों के बजाय सरल प्रार्थना कक्षों में पूजा करने की उनकी प्रथा को संदर्भित करता है। यह संप्रदाय कर्मकांडी पूजा के बजाय तपस्या, शास्त्रीय अध्ययन और आध्यात्मिक अनुशासन पर जोर देता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख जैन संप्रदाय
| संप्रदाय | प्रमुख विशेषताएँ | उत्पत्ति काल |
|---|---|---|
| दिगंबर | आकाश-वस्त्र (नग्न) साधु; मानते हैं कि महिलाएं सीधे मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं; अधिक कठोर अभ्यास | प्राचीन विभाजन (लगभग 300 ईसा पूर्व) |
| श्वेतांबर | सफेद वस्त्र धारण करने वाले साधु; स्वीकार करते हैं कि महिलाएं मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं; मुख-आवरण का उपयोग करते हैं | प्राचीन विभाजन (लगभग 300 ईसा पूर्व) |
| स्थानकवासी | मूर्ति पूजा को अस्वीकार करते हैं; सरल कक्षों (स्थानकों) में पूजा करते हैं; ध्यान और शास्त्रों पर जोर देते हैं; श्वेतांबर का उप-संप्रदाय | 17वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग 1653 में उभरा) |
| तेरापंथी | और अधिक सुधारवादी संप्रदाय; एक आचार्य के अधीन केंद्रीकृत नेतृत्व; कठोर अहिंसा; स्थानकवासी का उप-संप्रदाय | 18वीं शताब्दी ईस्वी (1760) |
- स्थानकवासी आंदोलन की स्थापना गुजरात में लवजी नामक एक व्यापारी द्वारा मूर्तिपूजक (मूर्ति-पूजा करने वाली) परंपरा के विरोध में की गई थी।
- स्थानकवासी और तेरापंथी दोनों संप्रदाय बाहरी कर्मकांड के बजाय आंतरिक आध्यात्मिकता पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- ये सुधारवादी आंदोलन महावीर की मूल शिक्षाओं और जैन सिद्धांतों के कठोर पालन पर जोर देते हैं।
भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- सौत्रान्तिक और सम्मितीय जैन धर्म के सम्प्रदाय थे।
- सर्वास्तिवादिन का मत था कि परिघटनाओं के घटक पूर्णतः क्षणिक नहीं थे, बल्कि गुप्त रूप में सदैव विद्यमान थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न बौद्ध दार्शनिक सम्प्रदायों के ज्ञान का परीक्षण करता है, न कि जैन धर्म या रंगमंच का। कथन 1 गलत तरीके से सौत्रान्तिक और सम्मितीय को जैन सम्प्रदाय बताता है जबकि वे वास्तव में बौद्ध सम्प्रदाय थे। कथन 2 सर्वास्तिवाद के सिद्धांत का सही वर्णन करता है जो धर्मों के भूत, वर्तमान और भविष्य में स्थायी अस्तित्व की बात करता है।
❌ कथन 1 – गलत: सौत्रान्तिक और सम्मितीय बौद्ध दार्शनिक सम्प्रदाय थे, जैन सम्प्रदाय नहीं; सौत्रान्तिक अभिधर्म की तुलना में सूत्रों पर जोर देते थे, जबकि सम्मितीय आत्मा (पुद्गल) के अस्तित्व को मानते थे।
✅ कथन 2 – सही: सर्वास्तिवादिन "सर्वम् अस्ति" (सब कुछ अस्तित्व में है) के सिद्धांत को मानते थे, यह विश्वास करते हुए कि धर्म (परिघटनाओं के घटक) पूर्णतः क्षणिक होने के बजाय तीनों कालों में गुप्त रूप में स्थायी रूप से विद्यमान थे।
भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- बोधिसत्व की अवधारणा बौद्ध धर्म के हीनयान संप्रदाय के लिए केंद्रीय है।
- बोधिसत्व एक करुणामय व्यक्ति है जो ज्ञान प्राप्ति के मार्ग पर है।
- बोधिसत्व सभी संवेदनशील प्राणियों को उनके मार्ग पर मदद करने के लिए अपनी स्वयं की मुक्ति प्राप्त करने में देरी करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 3
❌ कथन 1 – गलत: बोधिसत्व की अवधारणा महायान बौद्ध धर्म के लिए केंद्रीय है, हीनयान (थेरवाद) के लिए नहीं। हीनयान अर्हत आदर्श पर जोर देता है—जो व्यक्तिगत मुक्ति (निर्वाण) प्राप्त करता है। इसके विपरीत, महायान सभी प्राणियों के प्रति करुणामय सेवा के बोधिसत्व मार्ग का उत्सव मनाता है।
✅ कथन 2 – सही: बोधिसत्व वह प्राणी है जिसने ज्ञान के गुण विकसित किए हैं लेकिन असीम करुणा से विशेषता रखता है। वे सभी संवेदनशील प्राणियों के कल्याण के लिए सक्रिय रूप से काम करते हुए पूर्ण बुद्धत्व के मार्ग पर हैं।
✅ कथन 3 – सही: बोधिसत्व की परिभाषित विशेषता यह प्रतिज्ञा है कि वह सभी संवेदनशील प्राणियों के मुक्त होने तक अंतिम निर्वाण में प्रवेश में देरी करेगा। यह निःस्वार्थ प्रतिबद्धता बोधिसत्व आदर्श को अर्हत आदर्श से अलग करती है, जो इसे महायान बौद्ध धर्म की आधारशिला बनाती है।
निम्नलिखित में से कौन से राज्य बुद्ध के जीवन से संबद्ध थे?
- अवन्ति
- गान्धार
- कोसल
- मगध
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए
Detailed Explanation:
❌ कथन 1 (अवन्ति) – गलत: अवन्ति राज्य (राजधानी उज्जैन) का बुद्ध के जीवन से कोई सीधा संबंध नहीं था; बौद्ध धर्म यहाँ बाद में मौर्य काल में फैला।
❌ कथन 2 (गान्धार) – गलत: गान्धार बुद्ध के समय के सदियों बाद कुषाणों के अधीन (पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वी) बौद्ध कला केंद्र बना; उनके जीवन की घटनाओं से कोई संबंध नहीं।
✅ कथन 3 (कोसल) – सही: कोसल राज्य में कपिलवस्तु (बुद्ध का जन्मस्थान, यद्यपि लुम्बिनी तकनीकी रूप से शाक्य क्षेत्र में) और श्रावस्ती शामिल थे जहाँ बुद्ध ने अनेक वर्षाकाल शिक्षा देते हुए बिताए।
✅ कथन 4 (मगध) – सही: मगध बुद्ध की धर्म-प्रचार गतिविधियों का केंद्र था; उन्होंने बोधगया में ज्ञान प्राप्त किया, सारनाथ (मगध के निकट) में पहला उपदेश दिया, राजा बिम्बिसार के संरक्षण में राजगृह में वर्ष बिताए और कुशीनगर में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।
निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन जैन सिद्धांत पर लागू होता है/होते हैं?
- कर्म को नष्ट करने का सबसे निश्चित तरीका तपस्या करना है।
- प्रत्येक वस्तु, यहां तक कि सबसे छोटे कण की भी आत्मा होती है।
- कर्म आत्मा का अभिशाप है और इसे समाप्त किया जाना चाहिए।
नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करके सही उत्तर चुनें
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: जैन सिद्धांत में निर्जरा (कर्म का विनाश) तपस्या (तप) और संयम के माध्यम से प्राप्त होता है, जो आत्मा से संचित कार्मिक कणों को हटाने में मदद करता है।
✅ कथन 2 – सही: जैन धर्म सार्वभौमिक जीववाद में विश्वास करता है – पत्थर, जल, अग्नि और वायु सहित प्रत्येक वस्तु में आत्मा (जीव) होती है, जिससे सबसे छोटा कण भी जीवित इकाई बन जाता है।
✅ कथन 3 – सही: कर्म को सूक्ष्म पदार्थ के रूप में देखा जाता है जो आत्मा को बांधता है और उसके अनंत ज्ञान और आनंद के प्राकृतिक गुणों को अवरुद्ध करता है; मोक्ष के लिए कार्मिक बंधन का पूर्ण उन्मूलन आवश्यक है।
तीनों कथन सही हैं।
निम्नलिखित में से कौन सा बौद्ध धर्म में निर्वाण की अवधारणा का सबसे अच्छा वर्णन करता है?
Detailed Explanation:
बौद्ध धर्म में निर्वाण का शाब्दिक अर्थ "बुझना" या "विलोपन" है, जो इच्छा (तृष्णा), घृणा और अज्ञानता की ज्वाला के विलोपन को दर्शाता है।
यह दुख (दुक्ख) की समाप्ति और पुनर्जन्म के चक्र (संसार) के अंत का प्रतिनिधित्व करता है, जो तब प्राप्त होता है जब सभी लालसाएं और आसक्तियां समाप्त हो जाती हैं, न कि आत्म का विनाश या केवल आनंद की स्थिति।
प्राचीन भारत के इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों में समान था/थे?
- तपस्या और भोग की चरम सीमाओं से बचना
- वेदों के अधिकार के प्रति उदासीनता
- अनुष्ठानों की प्रभावकारिता से इनकार
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
❌ कथन 1 – गलत: बौद्ध धर्म ने मध्यम मार्ग (मध्यमा मार्ग) की वकालत की जो विलासिता और कठोर तपस्या दोनों चरम सीमाओं से बचता है, लेकिन जैन धर्म ने आध्यात्मिक मुक्ति के लिए अत्यधिक संयम और कठोर तपस्या पर जोर दिया।
✅ कथन 2 – सही: बौद्ध और जैन धर्म दोनों ने वेदों के अधिकार को अस्वीकार किया और उन्हें परम धार्मिक ग्रंथ नहीं माना, जिससे वे नास्तिक परंपराओं के रूप में चिह्नित हुए।
✅ कथन 3 – सही: दोनों परंपराओं ने वैदिक अनुष्ठानों और यज्ञों की प्रभावकारिता से इनकार किया, और मुक्ति प्राप्त करने के लिए व्यक्तिगत नैतिक आचरण, सही ज्ञान और मानसिक अनुशासन पर जोर दिया।