UPSC Prelims 2018
भारतीय राजव्यवस्था Previous Year Questions (PYQs)
Explore 15 solved UPSC Prelims 2018 भारतीय राजव्यवस्था questions with detailed step-by-step bilingual solutions, option analysis, and answer keys.
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए
- खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 ने खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 को प्रतिस्थापित किया।
- भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवाओं के प्रभार में है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 ने खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 सहित कई खाद्य-संबंधित कानूनों को समेकित किया और भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए एक एकीकृत नियामक ढांचा तैयार किया। हालांकि, FSSAI स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त सांविधिक निकाय के रूप में अपने स्वयं के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के साथ कार्य करता है, न कि महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवाओं के अधीन।
✅ कथन 1 – सही: खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 ने खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 को प्रतिस्थापित किया और FSSAI को खाद्य सुरक्षा के लिए नोडल नियामक निकाय के रूप में स्थापित किया।
❌ कथन 2 – गलत: FSSAI अपने स्वयं के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के साथ एक स्वायत्त सांविधिक प्राधिकरण है, महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवाओं के प्रभार में नहीं है, हालांकि यह स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र के तहत कार्य करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में खाद्य सुरक्षा नियामक ढांचा
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम | 2006 में अधिनियमित; 2011 से परिचालित |
| प्रतिस्थापित अधिनियम | खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम (1954), फल उत्पाद आदेश (1955), मांस खाद्य उत्पाद आदेश (1973), वनस्पति तेल उत्पाद आदेश (1947), खाद्य तेल पैकेजिंग आदेश (1988), सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टेड ऑयल आदेश (1967), दूध और दुग्ध उत्पाद आदेश (1992) |
| FSSAI की स्थिति | स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन स्वायत्त सांविधिक निकाय |
| नेतृत्व | अध्यक्ष (अंशकालिक) और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (पूर्णकालिक) |
| मुख्य कार्य | खाद्य व्यवसायों का लाइसेंसिंग और पंजीकरण, निगरानी और सर्विलांस, खाद्य सुरक्षा मानक निर्धारित करना, उपभोक्ता जागरूकता |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत की संसद भारत के संविधान की नौवीं अनुसूची में किसी विशेष कानून को रख सकती है।
- नौवीं अनुसूची में रखे गए कानून की वैधता की किसी भी न्यायालय द्वारा जांच नहीं की जा सकती है और उस पर कोई निर्णय नहीं दिया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
भारत की संसद वास्तव में संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से नौवीं अनुसूची में कानूनों को रख सकती है ताकि उन्हें न्यायिक समीक्षा से बचाया जा सके। हालांकि, यह सुरक्षा पूर्ण नहीं है—I.R. Coelho निर्णय (2007) के बाद, 24 अप्रैल, 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में रखे गए कानूनों को चुनौती दी जा सकती है यदि वे संविधान की आधारभूत संरचना का उल्लंघन करते हैं।
✅ कथन 1 – सही: संसद के पास संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से नौवीं अनुसूची में कानूनों को रखने की शक्ति है, जैसा कि पहली बार प्रथम संशोधन अधिनियम, 1951 के माध्यम से किया गया था।
❌ कथन 2 – गलत: नौवीं अनुसूची के कानूनों की वैधता की न्यायालयों द्वारा जांच की जा सकती है यदि वे आधारभूत संरचना सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं, विशेष रूप से 24 अप्रैल, 1973 के बाद जोड़े गए कानून (केशवानंद भारती और I.R. Coelho मामलों के अनुसार)।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संविधान की नौवीं अनुसूची
- परिचय: प्रथम संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ी गई, ताकि भूमि सुधार और अन्य कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाया जा सके।
- उद्देश्य: नौवीं अनुसूची में रखे गए कानूनों को भाग III के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दिए जाने से संरक्षित किया गया है।
- केशवानंद भारती मामला (1973): आधारभूत संरचना सिद्धांत की स्थापना की, जिसने संसद की संशोधन शक्ति को सीमित किया।
- I.R. Coelho मामला (2007): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि 24 अप्रैल, 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में रखे गए कानून न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकते हैं यदि वे संविधान की आधारभूत संरचना का उल्लंघन करते हैं।
- वर्तमान स्थिति: नौवीं अनुसूची में वर्तमान में 284 अधिनियम और विनियम हैं (103वें संशोधन तक संशोधित)।
- सीमा: जबकि नौवीं अनुसूची सुरक्षा प्रदान करती है, यह पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है—आधारभूत संरचना का सिद्धांत मनमाने कानूनों के खिलाफ संवैधानिक सुरक्षा के रूप में कार्य करता है।
यदि भारत के राष्ट्रपति किसी विशेष राज्य के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत प्रदान की गई अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं, तो -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — उस राज्य के विधानमंडल की शक्तियां संसद द्वारा या संसद के प्राधिकार के अधीन प्रयोग की जाएंगी।
जब राष्ट्रपति किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता के कारण अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू करते हैं, तो राज्य विधानमंडल की विधायी शक्तियां संसद को हस्तांतरित हो जाती हैं। इस अवधि के दौरान संसद उस राज्य के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त कर लेती है, जिससे शासन की निरंतरता सुनिश्चित होती है।
❌ विकल्प 1 – गलत: अनुच्छेद 356 के तहत राज्य विधानसभा स्वतः भंग नहीं होती; इसे निलंबित अवस्था में रखा जा सकता है या बाद में एक अलग उद्घोषणा द्वारा भंग किया जा सकता है।
✅ विकल्प 2 – सही: अनुच्छेद 356 स्पष्ट रूप से प्रावधान करता है कि राष्ट्रपति शासन के दौरान संसद राज्य की विधायी शक्तियों का प्रयोग करेगी।
❌ विकल्प 3 – गलत: अनुच्छेद 356 के तहत अनुच्छेद 19 (भाषण, आवागमन जैसे मौलिक अधिकार) निलंबित नहीं होता; ऐसा निलंबन केवल अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान होता है।
❌ विकल्प 4 – गलत: राष्ट्रपति सीधे कानून नहीं बनाते; राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य के लिए विधायी शक्तियों का प्रयोग संसद करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अनुच्छेद 356 - राष्ट्रपति शासन
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 356 - राष्ट्रपति शासन (राज्य आपातकाल) |
| आधार | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता; संविधान के अनुसार शासन नहीं चलाया जा सकता |
| विधायी शक्तियां | राज्य विधानमंडल की शक्तियां संसद को हस्तांतरित; संसद राज्य के लिए कानून बना सकती है |
| कार्यकारी शक्तियां | राज्यपाल राष्ट्रपति की ओर से राज्य का प्रशासन चलाता है; मंत्रिपरिषद बर्खास्त |
| राज्य विधानसभा | निलंबित अवस्था में रखी जा सकती है या भंग की जा सकती है (स्वचालित विघटन नहीं) |
| अवधि | प्रारंभ में 6 माह; हर 6 माह में संसदीय अनुमोदन से अधिकतम 3 वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है |
| मौलिक अधिकार | अनुच्छेद 19 के अधिकार निलंबित नहीं होते (अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल के विपरीत) |
| न्यायिक समीक्षा | एस.आर. बोम्मई मामले (1994) के बाद न्यायिक समीक्षा के अधीन - राष्ट्रपति की व्यक्तिगत संतुष्टि को चुनौती दी जा सकती है |
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निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- विधान सभा के अध्यक्ष को अपना पद रिक्त करना होगा यदि वह सभा का सदस्य नहीं रहता/रहती है।
- जब भी विधान सभा भंग की जाती है, अध्यक्ष को तुरंत अपना पद रिक्त करना होगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
राज्य विधान सभा के अध्यक्ष को अपना पद रिक्त करना होता है यदि वे सभा के सदस्य नहीं रहते हैं (अनुच्छेद 179)। हालांकि, जब सभा भंग होती है, तो अध्यक्ष तुरंत पद रिक्त नहीं करते बल्कि नवगठित सभा द्वारा नए अध्यक्ष के चुने जाने तक पद पर बने रहते हैं, जिससे प्रशासनिक निरंतरता सुनिश्चित होती है।
✅ कथन 1 – सही: संविधान का अनुच्छेद 179 स्पष्ट रूप से अनिवार्य करता है कि अध्यक्ष को अपना पद रिक्त करना होगा यदि वह विधान सभा का सदस्य नहीं रहता है।
❌ कथन 2 – गलत: सभा के विघटन पर, अध्यक्ष तुरंत पद रिक्त नहीं करते हैं बल्कि नई सभा की पहली बैठक तक पद पर बने रहते हैं जब एक नया अध्यक्ष चुना जाता है, जिससे विधायी प्रशासन में निरंतरता सुनिश्चित होती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: राज्य विधान सभा के अध्यक्ष
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 178 (अध्यक्ष और उपाध्यक्ष) और अनुच्छेद 179 (पद का रिक्त होना) |
| चुनाव | विधान सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से चुना जाता है |
| पद का रिक्त होना | • यदि सभा का सदस्य नहीं रहता है • यदि उपाध्यक्ष को लिखित रूप से त्यागपत्र देता है • यदि सभी सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव द्वारा हटाया जाता है |
| विघटन पर | अध्यक्ष नई सभा की पहली बैठक से ठीक पहले तक पद पर बने रहते हैं |
| हटाने की प्रक्रिया | तत्कालीन सभी सदस्यों के बहुमत से प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए; 14 दिन का नोटिस आवश्यक |
| भूमिका | सभा की कार्यवाही की अध्यक्षता करना; व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखना; अयोग्यता मामलों पर निर्णय (दसवीं अनुसूची के तहत) |
निम्नलिखित में से कौन से "विधि के शासन" की मुख्य विशेषताएं मानी जाती हैं?
- शक्तियों का सीमांकन
- कानून के समक्ष समानता
- सरकार के प्रति लोगों की जवाबदेही
- स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1, 2 और 4
विधि का शासन एक मूलभूत सिद्धांत है जो सुनिश्चित करता है कि राज्य सहित सभी व्यक्ति और संस्थाएं सार्वजनिक रूप से ज्ञात, समान रूप से लागू कानूनों के तहत जवाबदेह हैं। यह सरकारी शक्तियों के सीमांकन, कानून के समक्ष समानता और नागरिक स्वतंत्रता की सुरक्षा पर बल देता है, जबकि लोगों की सरकार के प्रति जवाबदेही के बजाय सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही पर केंद्रित है।
✅ कथन 1 – सही: शक्तियों का सीमांकन एक मुख्य विशेषता है जो सुनिश्चित करती है कि कोई भी प्राधिकरण कानून से ऊपर नहीं है और शक्ति के मनमाने प्रयोग को रोकता है।
✅ कथन 2 – सही: कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) एक मूलभूत सिद्धांत है जो सुनिश्चित करता है कि स्थिति की परवाह किए बिना सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाए।
❌ कथन 3 – गलत: विधि का शासन सरकार की जनता और कानूनी ढांचे के प्रति जवाबदेही पर केंद्रित है, न कि सरकार के प्रति लोगों की जवाबदेही पर।
✅ कथन 4 – सही: स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार विधि के शासन के तहत संरक्षित हैं, जो मनमानी राज्य कार्रवाई से व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विधि का शासन
- उत्पत्ति: ए.वी. डायसी, एक ब्रिटिश न्यायविद द्वारा विकसित अवधारणा, जो मनमानी शक्ति पर कानून की सर्वोच्चता पर बल देती है।
- मुख्य सिद्धांत: (i) मनमानी शक्ति पर कानून की सर्वोच्चता; (ii) कानून के समक्ष समानता; (iii) कानूनी भावना की प्रधानता और सामान्य कानून के माध्यम से अधिकारों की सुरक्षा।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण), अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार)।
- भारत में अनुप्रयोग: ब्रिटिश विधि के शासन के विपरीत, भारतीय संविधान निवारक निरोध और कुछ आपातकालीन प्रावधानों का प्रावधान करता है जो अस्थायी रूप से अधिकारों को प्रतिबंधित कर सकते हैं।
- न्यायिक समीक्षा: न्यायालय मनमानी कार्यकारी और विधायी कार्रवाइयों को रद्द कर सकते हैं, विधि के शासन के पालन को सुनिश्चित करते हुए।
- जवाबदेही: सरकार और उसके अधिकारी कानून के प्रति जवाबदेह हैं; उच्चतम अधिकारियों सहित कोई भी कानून से ऊपर नहीं है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- किसी राज्य के राज्यपाल के विरुद्ध उसके पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में कोई आपराधिक कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी।
- किसी राज्य के राज्यपाल की उपलब्धियाँ और भत्ते उसके पदावधि के दौरान कम नहीं किए जाएंगे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
राज्य के राज्यपाल के लिए संवैधानिक प्रावधानों से संबंधित दोनों कथन सही हैं। अनुच्छेद 361 राज्यपाल को उनके पदावधि के दौरान आपराधिक कार्यवाही से उन्मुक्ति प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 158 यह सुनिश्चित करता है कि उनकी उपलब्धियाँ और भत्ते उनके पदावधि के दौरान कम नहीं किए जा सकते।
✅ कथन 1 – सही: अनुच्छेद 361 राज्यपाल को उनके पदावधि के दौरान किसी भी न्यायालय में आपराधिक कार्यवाही से उन्मुक्ति प्रदान करता है, हालांकि दो महीने के पूर्व नोटिस के साथ नागरिक कार्यवाही संस्थित की जा सकती है।
✅ कथन 2 – सही: अनुच्छेद 158 यह अनिवार्य करता है कि राज्यपाल की उपलब्धियाँ और भत्ते उनके पदावधि के दौरान कम नहीं किए जाएंगे, जिससे वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: राज्यपाल के लिए संवैधानिक प्रावधान
| अनुच्छेद | प्रावधान | विवरण |
|---|---|---|
| अनुच्छेद 153 | राज्यों के राज्यपाल | प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। एक व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। |
| अनुच्छेद 154 | कार्यपालिका शक्ति | राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित है और इसका प्रयोग वह प्रत्यक्ष रूप से या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है। |
| अनुच्छेद 158 | पद की शर्तें | राज्यपाल संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं होगा। उपलब्धियाँ और भत्ते पदावधि के दौरान कम नहीं किए जा सकते। |
| अनुच्छेद 361 | उन्मुक्ति | राज्यपाल अपनी शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग के लिए किसी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं है। पदावधि के दौरान आपराधिक कार्यवाही से उन्मुक्ति। 2 महीने के नोटिस के साथ नागरिक कार्यवाही की अनुमति। |
| अनुच्छेद 155 | नियुक्ति | राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर के तहत वारंट द्वारा की जाती है। |
| अनुच्छेद 156 | पदावधि | राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत 5 वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करता है, लेकिन उत्तराधिकारी के पदभार ग्रहण करने तक जारी रह सकता है। |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- आधार कार्ड का उपयोग नागरिकता या अधिवास के प्रमाण के रूप में किया जा सकता है।
- एक बार जारी होने के बाद, आधार संख्या को जारीकर्ता प्राधिकरण द्वारा निष्क्रिय या हटाया नहीं जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — उपर्युक्त में से कोई नहीं
आधार से संबंधित दोनों कथन गलत हैं। आधार अधिनियम स्पष्ट रूप से यह बताता है कि आधार केवल पहचान और निवास का प्रमाण है, नागरिकता या अधिवास का नहीं। इसके अतिरिक्त, UIDAI के पास विशिष्ट परिस्थितियों में आधार संख्याओं को निष्क्रिय या हटाने का अधिकार है, जिससे कथन 2 भी गलत हो जाता है।
❌ कथन 1 – गलत: आधार कार्ड का उपयोग नागरिकता या अधिवास के प्रमाण के रूप में नहीं किया जा सकता है; आधार अधिनियम, 2016 के अनुसार यह केवल पहचान और निवास के प्रमाण के रूप में काम करता है।
❌ कथन 2 – गलत: UIDAI आधार संख्याओं को अस्थायी रूप से निष्क्रिय कर सकता है और कुछ मामलों में उन्हें डेटाबेस से स्थायी रूप से हटा सकता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: आधार - प्रमुख कानूनी प्रावधान
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| कानूनी आधार | आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाओं की लक्षित डिलीवरी) अधिनियम, 2016 |
| उद्देश्य | केवल पहचान और निवास का प्रमाण; नागरिकता या अधिवास का प्रमाण नहीं |
| जारीकर्ता प्राधिकरण | भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI), इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत सांविधिक प्राधिकरण |
| संवैधानिक वैधता | के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2018) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कुछ प्रतिबंधों के साथ बरकरार रखा गया |
| निष्क्रियण/हटाना | UIDAI विशिष्ट परिस्थितियों जैसे दोहरे नामांकन, गलत जानकारी, या सुरक्षा चिंताओं के तहत आधार संख्याओं को निष्क्रिय (अस्थायी रूप से) या हटा (स्थायी रूप से) सकता है |
| स्वैच्छिक प्रकृति | SC ने फैसला दिया कि आधार को बैंक खातों, मोबाइल कनेक्शन, स्कूल में प्रवेश के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता; केवल PAN, आयकर रिटर्न दाखिल करने और कल्याणकारी योजनाओं के लिए अनिवार्य |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के अनुसार, किसी राज्य में शिक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र होने के लिए, एक व्यक्ति को संबंधित राज्य शिक्षक शिक्षा परिषद द्वारा निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं प्राप्त करने की आवश्यकता होगी।
- RTE अधिनियम के अनुसार, प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ाने के लिए, एक उम्मीदवार को राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद के दिशानिर्देशों के अनुसार आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करनी आवश्यक है।
- भारत में, 90% से अधिक शिक्षक शिक्षा संस्थान सीधे राज्य सरकारों के अधीन हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009, शिक्षकों के लिए विशिष्ट योग्यताएं और पात्रता मानदंड अनिवार्य करता है। कथन 2 एकमात्र सही कथन है क्योंकि यह प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ाने के लिए NCTE दिशानिर्देशों के अनुसार आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) उत्तीर्ण करने की आवश्यकता को सटीक रूप से दर्शाता है।
❌ कथन 1 – गलत: शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यताएं राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा निर्धारित की जाती हैं, न कि राज्य शिक्षक शिक्षा परिषदों द्वारा। NCTE राष्ट्रीय प्राधिकरण है जो पूरे भारत में समान मानक निर्धारित करता है।
✅ कथन 2 – सही: RTE अधिनियम के अनुसार, उम्मीदवारों को प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा I से V) में पढ़ाने के लिए पात्र होने के लिए NCTE दिशानिर्देशों के अनुसार आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) उत्तीर्ण करनी होगी।
❌ कथन 3 – गलत: उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण (AISHE) 2019-20 के अनुसार, भारत में लगभग 67% शिक्षक शिक्षा संस्थान निजी रूप से प्रबंधित हैं, जबकि केवल लगभग 33% सरकारी संचालित हैं। यह इस दावे के विपरीत है कि 90% से अधिक सीधे राज्य सरकारों के अधीन हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: शिक्षा का अधिकार अधिनियम और शिक्षक पात्रता
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| RTE अधिनियम का अधिनियमन | 2009 में अधिनियमित, 1 अप्रैल 2010 को लागू हुआ |
| संवैधानिक आधार | अनुच्छेद 21A - 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार |
| NCTE की भूमिका | शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यताएं निर्धारित करता है; NCTE अधिनियम, 1993 के तहत स्थापित |
| TET आवश्यकता | कक्षा I-VIII में पढ़ाने के लिए अनिवार्य; NCTE दिशानिर्देशों के अनुसार राज्यों द्वारा आयोजित |
| शिक्षक शिक्षा संस्थान | ~67% निजी, ~33% सरकारी संचालित (AISHE 2019-20) |
| न्यूनतम योग्यताएं | उच्च माध्यमिक + प्रारंभिक शिक्षा में 2 वर्षीय डिप्लोमा (D.El.Ed) या प्राथमिक शिक्षकों के लिए B.Ed |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- प्रथम लोकसभा में, विपक्ष में सबसे बड़ी एकल पार्टी स्वतंत्र पार्टी थी।
- लोकसभा में, "विपक्ष के नेता" को पहली बार 1969 में मान्यता दी गई थी।
- लोकसभा में, यदि किसी पार्टी के पास न्यूनतम 75 सदस्य नहीं हैं, तो उसके नेता को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
केवल कथन 2 सही है। लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद को पहली बार 1969 में औपचारिक रूप से मान्यता दी गई थी। अन्य दो कथनों में प्रथम लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी और विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता के लिए आवश्यक न्यूनतम संख्या के संबंध में तथ्यात्मक त्रुटियाँ हैं।
❌ कथन 1 – गलत: प्रथम लोकसभा (1952) में, सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) थी जिसके पास 16 सीटें थीं, न कि स्वतंत्र पार्टी (जिसका गठन केवल 1959 में हुआ था)।
✅ कथन 2 – सही: लोकसभा में विपक्ष के नेता को पहली बार 1969 में औपचारिक रूप से मान्यता दी गई थी जब संसद में विपक्ष के नेताओं के वेतन और भत्ते अधिनियम, 1977 के तहत इस पद को वैधानिक मान्यता दी गई (1969 से पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ)।
❌ कथन 3 – गलत: विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता के लिए न्यूनतम आवश्यकता 75 सदस्य नहीं बल्कि सदन की कुल शक्ति का 10% है, जो वर्तमान लोकसभा में 55 सदस्य (545 का 10%) है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विपक्ष के नेता
- वैधानिक मान्यता: विपक्ष के नेता के पद को संसद में विपक्ष के नेताओं के वेतन और भत्ते अधिनियम, 1977 के माध्यम से वैधानिक मान्यता दी गई थी।
- प्रथम मान्यता (लोकसभा): कांग्रेस (O) के राम सुभग सिंह 1969 में औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त प्रथम विपक्ष के नेता थे।
- न्यूनतम संख्या की आवश्यकता: किसी पार्टी के नेता को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने के लिए पार्टी के पास सदन की कुल सदस्यता का कम से कम 10% (वर्तमान में लोकसभा में 55 सदस्य) होना चाहिए।
- संवैधानिक स्थिति: यद्यपि संविधान में उल्लिखित नहीं है, विपक्ष के नेता एक महत्वपूर्ण पद धारण करते हैं और CEC, CVC, लोकपाल आदि जैसी नियुक्तियों में परामर्श लिया जाता है।
- वेतन और भत्ते: विपक्ष के नेता को केंद्रीय मंत्री के समकक्ष वेतन और भत्ते प्राप्त होते हैं।
भारत के राष्ट्रपति के चुनाव के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- प्रत्येक विधायक के मत का मूल्य राज्य-दर-राज्य भिन्न होता है।
- लोकसभा के सांसदों के मत का मूल्य राज्यसभा के सांसदों के मत के मूल्य से अधिक है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1
प्रत्येक विधायक के मत का मूल्य राज्य-दर-राज्य भिन्न होता है क्योंकि इसकी गणना राज्य की जनसंख्या को उस राज्य में निर्वाचित विधायकों की संख्या से विभाजित करके की जाती है। हालांकि, राष्ट्रपति चुनाव में सभी सांसदों (लोकसभा और राज्यसभा दोनों) का मतदान मूल्य समान होता है, जिससे कथन 2 गलत हो जाता है।
✅ कथन 1 – सही: विधायक के मत का मूल्य (राज्य की जनसंख्या ÷ विधायकों की संख्या ÷ 1000) के रूप में गणना की जाती है, जो जनसंख्या और विधानसभा की संख्या के आधार पर राज्यों में भिन्न होता है।
❌ कथन 2 – गलत: राष्ट्रपति चुनाव में सभी सांसदों का मतदान मूल्य समान है; लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदस्यों के लिए मूल्य समान है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत के राष्ट्रपति का चुनाव
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| चुनाव की विधि | संसद और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बने निर्वाचक मंडल के माध्यम से अप्रत्यक्ष चुनाव (अनुच्छेद 54) |
| विधायक के मत का मूल्य | सूत्र: (राज्य की जनसंख्या ÷ निर्वाचित विधायकों की कुल संख्या ÷ 1000) जनसंख्या और विधानसभा की संख्या के आधार पर राज्य-दर-राज्य भिन्न होता है |
| सांसद के मत का मूल्य | सूत्र: (सभी विधायकों के मतों का कुल मूल्य ÷ निर्वाचित सांसदों की कुल संख्या) लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदस्यों के लिए समान |
| मतदान की प्रणाली | आनुपातिक प्रतिनिधित्व के साथ एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (अनुच्छेद 55) |
| निर्वाचक मंडल | केवल निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं; संसद और राज्य विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य मतदान नहीं कर सकते |
निम्नलिखित में से कौन सा कथन कानून और स्वतंत्रता के बीच सबसे उपयुक्त संबंध को दर्शाता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — यदि कोई कानून नहीं है, तो कोई स्वतंत्रता नहीं है।
यह कथन कानून और स्वतंत्रता के बीच सबसे उपयुक्त संबंध को दर्शाता है। स्वतंत्रता का अर्थ पूर्ण स्वतंत्रता नहीं है बल्कि कानून के ढांचे के भीतर स्वतंत्रता है। कानूनों के बिना, समाज अराजकता में उतर जाएगा जहां शक्तिशाली कमजोरों पर हावी होंगे और व्यक्तिगत अधिकारों की कोई सुरक्षा नहीं होगी। कानून वह संरचना प्रदान करते हैं जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करती है, समानता सुनिश्चित करती है और एक व्यक्ति की स्वतंत्रता को दूसरे की स्वतंत्रता पर अतिक्रमण करने से रोकती है। सच्ची स्वतंत्रता केवल तभी अस्तित्व में रहती है जब इसे कानून द्वारा विनियमित और संरक्षित किया जाता है।
❌ विकल्प 1 – गलत: अधिक कानूनों का अर्थ आवश्यक रूप से कम स्वतंत्रता नहीं है; सुनियोजित कानून वास्तव में शोषण को रोककर और न्याय सुनिश्चित करके स्वतंत्रता की रक्षा और वृद्धि करते हैं।
✅ विकल्प 2 – सही: कानून स्वतंत्रता की नींव हैं, वह ढांचा प्रदान करते हैं जिसके भीतर अराजकता में न उतरते हुए स्वतंत्रता का प्रयोग किया जा सकता है।
❌ विकल्प 3 – गलत: जबकि कानून निर्माण में लोकतांत्रिक भागीदारी महत्वपूर्ण है, स्वतंत्रता तब भी अस्तित्व में रह सकती है जब कानून सभी लोगों द्वारा सीधे न बनाकर प्रतिनिधि तंत्र के माध्यम से बनाए जाते हैं।
❌ विकल्प 4 – गलत: कानूनों में बार-बार परिवर्तन स्वाभाविक रूप से स्वतंत्रता को खतरे में नहीं डालते; महत्वपूर्ण यह है कि कानूनों की सामग्री और उद्देश्य क्या है, न कि उनके परिवर्तन की आवृत्ति।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कानून और स्वतंत्रता
- पूरक संबंध: कानून और स्वतंत्रता विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं; कानून स्वतंत्रता के विकास के लिए परिस्थितियां बनाता है।
- विधि का शासन: विधि के शासन का सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि स्वतंत्रता को कानूनी ढांचे के माध्यम से संरक्षित किया जाता है जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है।
- नकारात्मक बनाम सकारात्मक स्वतंत्रता: कानून नकारात्मक स्वतंत्रता (हस्तक्षेप से मुक्ति) को स्वच्छंदता में बदलने से रोकते हैं और सकारात्मक स्वतंत्रता (क्षमता प्राप्त करने की स्वतंत्रता) को सक्षम बनाते हैं।
- संवैधानिक सुरक्षा उपाय: संवैधानिक प्रावधान और मौलिक अधिकार स्वतंत्रता के दायरे को परिभाषित करते हैं जबकि कानून उनके प्रवर्तन के लिए तंत्र प्रदान करते हैं।
- सामाजिक अनुबंध सिद्धांत: हॉब्स, लॉक और रूसो जैसे विचारकों ने इस बात पर बल दिया कि व्यक्ति कानून के माध्यम से अपनी शेष स्वतंत्रताओं की सुरक्षा के बदले में राज्य को कुछ स्वतंत्रताएं समर्पित करते हैं।
- संतुलन: चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि कानून न्यायपूर्ण और आनुपातिक हों, उत्पीड़न के साधन बने बिना स्वतंत्रता की रक्षा करें।
"रूल ऑफ लॉ इंडेक्स" निम्नलिखित में से किसके द्वारा जारी किया जाता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट
रूल ऑफ लॉ इंडेक्स वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट (WJP) द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित किया जाता है, जो एक स्वतंत्र, बहुविषयक संगठन है जो विश्वभर में कानून के शासन को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहा है। यह सूचकांक आठ प्राथमिक कारकों के आधार पर देशों में कानून के शासन का अनुभव और धारणा को मापता है: सरकारी शक्तियों पर अंकुश, भ्रष्टाचार की अनुपस्थिति, खुली सरकार, मौलिक अधिकार, व्यवस्था और सुरक्षा, नियामक प्रवर्तन, नागरिक न्याय, और आपराधिक न्याय।
📝 संक्षिप्त नोट्स: रूल ऑफ लॉ इंडेक्स
- प्रकाशक: वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट (WJP) - एक स्वतंत्र, गैर-लाभकारी संगठन जिसकी स्थापना 2006 में हुई थी
- आवृत्ति: 2011 से प्रतिवर्ष प्रकाशित
- कवरेज: विश्वभर में 140+ देशों और क्षेत्राधिकारों में कानून के शासन को मापता है
- कार्यप्रणाली: घरेलू सर्वेक्षणों और विशेषज्ञ प्रश्नावली पर आधारित
- आठ कारक: (1) सरकारी शक्तियों पर अंकुश, (2) भ्रष्टाचार की अनुपस्थिति, (3) खुली सरकार, (4) मौलिक अधिकार, (5) व्यवस्था और सुरक्षा, (6) नियामक प्रवर्तन, (7) नागरिक न्याय, (8) आपराधिक न्याय
- भारत का प्रदर्शन: भारत आमतौर पर मूल्यांकन किए गए देशों के बीच मध्य श्रेणी में रैंक करता है, जिसमें खुली सरकार में मजबूती है और नागरिक और आपराधिक न्याय वितरण में सुधार की आवश्यकता वाले क्षेत्र हैं
धन विधेयक के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — धन विधेयक भारत की आकस्मिकता निधि से धन के विनियोग से संबंधित होता है।
यह कथन गलत है क्योंकि भारत की आकस्मिकता निधि, जो अनुच्छेद 267 के तहत स्थापित है, अप्रत्याशित व्यय को पूरा करने के लिए राष्ट्रपति के निपटान में होती है। इस निधि से निकासी धन विधेयक द्वारा शासित नहीं होती है बल्कि बाद में संसद द्वारा पारित विनियोग विधेयक के माध्यम से नियमित की जाती है।
✅ कथन 1 – सही: अनुच्छेद 110(1)(a) स्पष्ट रूप से कहता है कि धन विधेयक में किसी कर के अधिरोपण, उन्मूलन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन से संबंधित प्रावधान होते हैं।
✅ कथन 2 – सही: अनुच्छेद 110(1)(c) प्रावधान करता है कि धन विधेयक में भारत की संचित निधि या भारत की आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा से संबंधित प्रावधान हो सकते हैं।
❌ कथन 3 – गलत: आकस्मिकता निधि से धन का विनियोग धन विधेयक द्वारा शासित नहीं होता है; यह राष्ट्रपति के निपटान में होता है और बाद में विनियोग विधेयक के माध्यम से नियमित किया जाता है।
✅ कथन 4 – सही: अनुच्छेद 110(1)(d) कहता है कि भारत सरकार द्वारा धन उधार लेने या गारंटी देने से संबंधित प्रावधान धन विधेयक के दायरे में आते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: धन विधेयक (अनुच्छेद 110)
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक प्रावधान | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 110 धन विधेयक को परिभाषित करता है |
| दायरा (अनुच्छेद 110(1)) | (a) किसी कर का अधिरोपण, उन्मूलन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन (b) भारत सरकार द्वारा धन उधार लेने या गारंटी देने का विनियमन (c) भारत की संचित निधि/आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा (d) भारत की संचित निधि से धन का विनियोग (e) संचित निधि पर भारित व्यय की घोषणा (f) संचित निधि/लोक लेखा में धन की प्राप्ति (g) इन मामलों से संबंधित कोई आनुषंगिक मामला |
| प्रमाणीकरण | लोकसभा अध्यक्ष प्रमाणित करते हैं कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं (अंतिम और निर्णायक) |
| प्रस्तुति | केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है (राज्यसभा में नहीं) |
| राज्यसभा की भूमिका | केवल 14 दिनों के भीतर सिफारिशें कर सकती है; लोकसभा उन्हें स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है |
| राष्ट्रपति की स्वीकृति | आवश्यक है, लेकिन राष्ट्रपति स्वीकृति रोक नहीं सकते (साधारण विधेयकों के विपरीत) |
| आकस्मिकता निधि | अनुच्छेद 267 के तहत स्थापित; अप्रत्याशित व्यय के लिए राष्ट्रपति के निपटान में; निकासी बाद में विनियोग विधेयक द्वारा नियमित की जाती है (धन विधेयक द्वारा नहीं) |
भारत की संसद के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सी संसदीय समिति इस बात की जांच करती है और सदन को रिपोर्ट करती है कि क्या संविधान द्वारा प्रदत्त या संसद द्वारा प्रत्यायोजित विनियम, नियम, उप-नियम, उप-विधियां आदि बनाने की शक्तियों का कार्यपालिका द्वारा ऐसे प्रत्यायोजन के दायरे में उचित रूप से प्रयोग किया जा रहा है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — अधीनस्थ विधान समिति
अधीनस्थ विधान समिति (CSL) को विशेष रूप से यह जांच करने और संसद को रिपोर्ट करने का अधिदेश प्राप्त है कि क्या विनियम, नियम, उप-नियम, उप-विधियां आदि बनाने की शक्तियां, जो संविधान द्वारा प्रदत्त या संसद द्वारा प्रत्यायोजित हैं, कार्यपालिका द्वारा ऐसे प्रत्यायोजन के दायरे में उचित रूप से प्रयोग की जा रही हैं। यह समिति सुनिश्चित करती है कि कार्यपालिका अपने प्रत्यायोजित अधिकार से अधिक न जाए और सभी अधीनस्थ विधान मूल अधिनियम और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हों।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
❌ विकल्प 1 – सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति: यह समिति संसद में मंत्रियों द्वारा दिए गए आश्वासनों, वादों और प्रतिबद्धताओं के कार्यान्वयन को ट्रैक करती है, न कि अधीनस्थ विधान को।
❌ विकल्प 3 – नियम समिति: यह समिति सदन में प्रक्रिया और कार्य संचालन को विनियमित करने के लिए नियमों को बनाने और संशोधित करने से संबंधित है।
❌ विकल्प 4 – कार्य मंत्रणा समिति: यह समिति सदन में सरकारी और अन्य कार्यों की चर्चा के लिए समय आवंटित करती है और प्रत्यायोजित विधान की जांच नहीं करती।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संसदीय समितियां
| समिति | प्राथमिक कार्य |
|---|---|
| अधीनस्थ विधान समिति | यह जांच करती है कि क्या प्रत्यायोजित शक्तियां (नियम, विनियम, उप-विधियां बनाने के लिए) संवैधानिक और वैधानिक सीमाओं के भीतर कार्यपालिका द्वारा उचित रूप से प्रयोग की जा रही हैं |
| सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति | संसद में मंत्रियों द्वारा दिए गए आश्वासनों, वादों और प्रतिबद्धताओं के कार्यान्वयन की निगरानी करती है |
| नियम समिति | सदन में प्रक्रिया और कार्य संचालन को विनियमित करने वाले नियमों को बनाती और संशोधित करती है |
| कार्य मंत्रणा समिति | सदन में विधायी और अन्य कार्यों की चर्चा के लिए समय आवंटित करती है |
| याचिका समिति | सामान्य जनहित के मामलों पर नागरिकों की याचिकाओं और अभ्यावेदन की जांच करती है |
निजता के अधिकार को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के एक अंतर्निहित भाग के रूप में संरक्षित किया गया है। भारत के संविधान में निम्नलिखित में से कौन सा उपरोक्त कथन को सही और उचित रूप से इंगित करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — अनुच्छेद 21 और भाग III में गारंटीकृत स्वतंत्रताएं
निजता के अधिकार को ऐतिहासिक के.एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ (2017) के निर्णय में अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के एक अंतर्निहित भाग के रूप में मान्यता दी गई थी। यह अधिकार संविधान के भाग III में गारंटीकृत अन्य मौलिक स्वतंत्रताओं के साथ संरक्षित है, जो अनुच्छेद 21 और भाग III को निजता संरक्षण के लिए सही संवैधानिक आधार बनाता है।
❌ विकल्प 1 – गलत: अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है लेकिन सीधे निजता से संबंधित नहीं है; 42वें संशोधन में 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द और अन्य मामलों से संबंधित था, विशेष रूप से निजता से नहीं।
❌ विकल्प 2 – गलत: अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और निजता से कोई संबंध नहीं है; नीति निदेशक तत्व गैर-न्यायसंगत दिशानिर्देश हैं, प्रवर्तनीय मौलिक अधिकार नहीं।
✅ विकल्प 3 – सही: अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (पुट्टस्वामी निर्णय के अनुसार निजता सहित) की रक्षा करता है, और भाग III में अनुच्छेद 19 के तहत स्वतंत्रताओं सहित सभी मौलिक अधिकार शामिल हैं।
❌ विकल्प 4 – गलत: अनुच्छेद 24 खतरनाक कार्यों में बच्चों के रोजगार को प्रतिबंधित करता है और निजता से असंबंधित है; 44वें संशोधन में मौलिक अधिकारों और आपातकालीन प्रावधानों से संबंधित था लेकिन विशेष रूप से निजता से नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: निजता का अधिकार और अनुच्छेद 21
- के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017): 9 न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से माना कि निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 और संविधान के भाग III के तहत संरक्षित एक मौलिक अधिकार है।
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देता है; व्यापक रूप से निजता के अधिकार, शिक्षा के अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार, शीघ्र सुनवाई के अधिकार आदि विभिन्न अधिकारों को शामिल करने के लिए व्याख्यायित किया गया है।
- भाग III – मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 12-35 शामिल हैं जो समानता (अनुच्छेद 14), स्वतंत्रताओं (अनुच्छेद 19), जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21), सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों, और संवैधानिक उपचारों (अनुच्छेद 32) सहित सभी मौलिक अधिकारों को कवर करते हैं।
- निजता के घटक: शारीरिक अखंडता, सूचनात्मक आत्म-निर्णय, और अकेले रहने का अधिकार शामिल हैं; मनमाने राज्य की कार्रवाई और निजी घुसपैठ के खिलाफ सुरक्षा करता है।
- अनुच्छेद 19: भाषण, सभा, आवागमन सहित छह स्वतंत्रताओं की गारंटी देता है, जो अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार के पूरक हैं।
UPSC Prelims 2018 - भारतीय राजव्यवस्था Chapter-wise Distribution
संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
3 Qs (20%)संसद
3 Qs (20%)राज्य सरकार
2 Qs (13.3%)संघीय कार्यपालिका
1 Qs (6.7%)संवैधानिक एवं राजनीतिक समसामयिकी
1 Qs (6.7%)अधिकार एवं सुशासन
1 Qs (6.7%)आपातकालीन उपबंध
1 Qs (6.7%)संविधान संशोधन
1 Qs (6.7%)गैर-संवैधानिक निकाय
1 Qs (6.7%)मौलिक अधिकार
1 Qs (6.7%)UPSC Prelims 2018 - भारतीय राजव्यवस्था Questions FAQs
Q1 How many भारतीय राजव्यवस्था questions were asked in UPSC Prelims 2018?
Q2 What is the chapter-wise question distribution for भारतीय राजव्यवस्था in UPSC Prelims 2018?
- संविधान की प्रमुख विशेषताएँ: 3 questions (20%)
- संसद: 3 questions (20%)
- राज्य सरकार: 2 questions (13.3%)
- संघीय कार्यपालिका: 1 questions (6.7%)
- संवैधानिक एवं राजनीतिक समसामयिकी: 1 questions (6.7%)
- अधिकार एवं सुशासन: 1 questions (6.7%)
- आपातकालीन उपबंध: 1 questions (6.7%)
- संविधान संशोधन: 1 questions (6.7%)
- गैर-संवैधानिक निकाय: 1 questions (6.7%)
- मौलिक अधिकार: 1 questions (6.7%)