UPSC Prelims 2018 Question Paper
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18वीं सदी के मध्य में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बंगाल से निर्यात की जाने वाली मुख्य वस्तुएँ थीं -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कपास, रेशम, शोरा और अफीम
18वीं सदी के मध्य में, बंगाल मुगल साम्राज्य का सबसे समृद्ध प्रांत था और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक संचालन का प्राथमिक केंद्र था। इस अवधि के दौरान बंगाल से मुख्य निर्यात वस्तुएँ कपास और रेशम के वस्त्र (बंगाल के विश्व-प्रसिद्ध मलमल और रेशमी कपड़े), शोरा (यूरोपीय युद्धों के दौरान बारूद निर्माण के लिए आवश्यक), और अफीम (मुख्य रूप से चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया को निर्यात) थीं। ये चार वस्तुएँ बंगाल से कंपनी के अत्यधिक लाभकारी व्यापार की रीढ़ थीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: बंगाल से ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार (18वीं सदी के मध्य)
- कपास और रेशम के वस्त्र: बंगाल के उत्कृष्ट मलमल, रेशमी कपड़े और अन्य वस्त्र यूरोपीय और एशियाई बाजारों में सबसे मूल्यवान निर्यात थे। मुर्शिदाबाद, ढाका और कासिमबाजार जैसे शहर प्रमुख वस्त्र केंद्र थे।
- शोरा (पोटैशियम नाइट्रेट): बारूद उत्पादन में प्रयुक्त एक महत्वपूर्ण रणनीतिक वस्तु। बंगाल 18वीं सदी के बार-बार होने वाले युद्धों के दौरान यूरोप की अधिकांश शोरा आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। कंपनी का शोरा व्यापार पर वस्तुतः एकाधिकार था।
- अफीम: मुख्य रूप से बिहार और बंगाल में उत्पादित, अफीम चीन के साथ व्यापार के लिए तेजी से महत्वपूर्ण हो गई। यद्यपि कंपनी ने 1773 में अपना अफीम एकाधिकार औपचारिक किया, लेकिन यह मध्य-सदी तक पहले से ही एक महत्वपूर्ण निर्यात था।
- व्यापार की दिशा: भारत कीमती धातुओं (सोना, चाँदी, ताँबा) का शुद्ध आयातक था क्योंकि यूरोपीय लोग भारतीय वस्तुओं के लिए सिक्कों से भुगतान करते थे। इससे विकल्प 3 गलत हो जाता है—धातुएँ भारत से बाहर नहीं, बल्कि भारत में आती थीं।
- अन्य वस्तुएँ: चीनी और नील का भी निर्यात किया जाता था लेकिन वे चार मुख्य वस्तुओं जितने प्रभावी नहीं थे। कच्ची कपास (विकल्प 1) 19वीं सदी में औद्योगीकरण के दौरान अधिक महत्वपूर्ण हो गई।
भारत में औपनिवेशिक शासन के दौरान शैक्षणिक संस्थानों के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| संस्थान | संस्थापक |
|---|---|
| 1. बनारस में संस्कृत कॉलेज | विलियम जोन्स |
| 2. कलकत्ता मदरसा | वारेन हेस्टिंग्स |
| 3. फोर्ट विलियम कॉलेज | आर्थर वेलेस्ली |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत में स्थापित शैक्षणिक संस्थानों और उनके संबंधित संस्थापकों के ज्ञान का परीक्षण करता है। दिए गए विकल्पों में केवल कलकत्ता मदरसा और वारेन हेस्टिंग्स का युग्म सही है।
❌ युग्म 1 – गलत: बनारस में संस्कृत कॉलेज की स्थापना 1791 में जोनाथन डंकन ने की थी, विलियम जोन्स ने नहीं।
✅ युग्म 2 – सही: कलकत्ता मदरसा की स्थापना 1781 में वारेन हेस्टिंग्स ने अरबी, फारसी और इस्लामी कानून के अध्ययन के लिए की थी।
❌ युग्म 3 – गलत: फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना 1800 में लॉर्ड वेलेस्ली (रिचर्ड वेलेस्ली) ने की थी, आर्थर वेलेस्ली (ड्यूक ऑफ वेलिंगटन) ने नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: औपनिवेशिक शासन के दौरान शैक्षणिक संस्थान
| संस्थान | वर्ष | संस्थापक | उद्देश्य |
|---|---|---|---|
| कलकत्ता मदरसा | 1781 | वारेन हेस्टिंग्स | अरबी, फारसी और इस्लामी कानून का अध्ययन |
| संस्कृत कॉलेज, बनारस | 1791 | जोनाथन डंकन | हिंदू कानून और संस्कृत साहित्य का अध्ययन |
| फोर्ट विलियम कॉलेज | 1800 | लॉर्ड वेलेस्ली (रिचर्ड) | भारतीय भाषाओं और रीति-रिवाजों में ब्रिटिश सिविल सेवकों का प्रशिक्षण |
| हिंदू कॉलेज, कलकत्ता | 1817 | डेविड हेयर, राजा राम मोहन राय | पश्चिमी शिक्षा और विज्ञान |
| संस्कृत कॉलेज, कलकत्ता | 1824 | ब्रिटिश सरकार | संस्कृत और हिंदू दर्शन का अध्ययन |
वुड्स डिस्पैच के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन से कथन सत्य हैं?
- अनुदान-सहायता प्रणाली की शुरुआत की गई थी।
- विश्वविद्यालयों की स्थापना की सिफारिश की गई थी।
- शिक्षा के सभी स्तरों पर शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी की सिफारिश की गई थी।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 2
वुड्स डिस्पैच (1854) को भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्ना कार्टा माना जाता है। इसने निजी शैक्षणिक संस्थानों को प्रोत्साहित करने के लिए अनुदान-सहायता प्रणाली की शुरुआत की और प्रेसीडेंसी नगरों में विश्वविद्यालयों की स्थापना की सिफारिश की, लेकिन शिक्षा के सभी स्तरों पर अंग्रेजी को अनिवार्य नहीं बनाया।
✅ कथन 1 – सही: डिस्पैच ने निजी स्कूलों को समर्थन देने के लिए अनुदान-सहायता प्रणाली की शुरुआत की, जिससे सीमित सरकारी संसाधनों के साथ शैक्षिक अवसरों का विस्तार हुआ।
✅ कथन 2 – सही: इसने बम्बई, कलकत्ता और मद्रास में लंदन विश्वविद्यालय के मॉडल पर विश्वविद्यालयों की स्थापना की सिफारिश की, ताकि उपाधियाँ प्रदान की जा सकें और उच्च शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सके।
❌ कथन 3 – गलत: डिस्पैच ने एक स्तरीय भाषा नीति की वकालत की—प्राथमिक शिक्षा के लिए स्थानीय भाषाएँ, माध्यमिक शिक्षा के लिए अंग्रेजी और स्थानीय भाषाएँ दोनों, और उच्च शिक्षा के लिए मुख्य रूप से अंग्रेजी, न कि सभी स्तरों पर अंग्रेजी।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वुड्स डिस्पैच (1854)
| पहलू | सिफारिश |
|---|---|
| वैकल्पिक नाम | भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्ना कार्टा |
| अनुदान-सहायता प्रणाली | सरकारी स्कूलों के साथ-साथ निजी शैक्षणिक संस्थानों को समर्थन देने के लिए शुरू की गई |
| विश्वविद्यालय | बम्बई, कलकत्ता और मद्रास में स्थापना की सिफारिश (लंदन विश्वविद्यालय के मॉडल पर) |
| भाषा नीति | प्राथमिक: स्थानीय भाषा; माध्यमिक: अंग्रेजी और स्थानीय भाषा; उच्च: मुख्य रूप से अंग्रेजी |
| शिक्षा विभाग | प्रत्येक प्रांत में अलग शिक्षा विभाग के निर्माण की सिफारिश |
| शिक्षक प्रशिक्षण | शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण स्कूलों की स्थापना की वकालत |
| फोकस | जन शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर जोर |
| महिला शिक्षा | महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित किया गया |
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1920 में, निम्नलिखित में से किसने अपना नाम बदलकर "स्वराज्य सभा" कर दिया?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — अखिल भारतीय होम रूल लीग
1920 में, अखिल भारतीय होम रूल लीग ने बाल गंगाधर तिलक के उत्तराधिकारी के नेतृत्व में अपना नाम बदलकर स्वराज्य सभा कर दिया। यह स्वराज (स्व-शासन) प्राप्त करने के लक्ष्य की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव को चिह्नित करता है और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के बदलते राजनीतिक परिदृश्य के साथ संरेखित था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: होम रूल आंदोलन और संबंधित संगठन
| संगठन | संस्थापक/नेता | वर्ष | मुख्य फोकस |
|---|---|---|---|
| अखिल भारतीय होम रूल लीग | बाल गंगाधर तिलक | 1916 | ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्व-शासन; 1920 में स्वराज्य सभा में नाम परिवर्तित |
| होम रूल लीग (एनी बेसेंट) | एनी बेसेंट | 1916 | डोमिनियन दर्जा और स्व-शासन |
| हिन्दू महासभा | मदन मोहन मालवीय | 1915 | हिन्दू पहचान और अधिकारों की रक्षा |
| दक्षिण भारतीय लिबरल फेडरेशन (जस्टिस पार्टी) | सी. एन. मुदलियार, टी. एम. नायर | 1916 | तमिलनाडु में गैर-ब्राह्मण प्रतिनिधित्व |
| द सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी | गोपाल कृष्ण गोखले | 1905 | सामाजिक सुधार, शिक्षा और राष्ट्रीय सेवा |
संथाल विद्रोह के शांत होने के बाद, औपनिवेशिक सरकार द्वारा क्या उपाय किए गए थे?
- 'संथाल परगना' नामक क्षेत्र बनाए गए।
- एक संथाल के लिए भूमि को गैर-संथाल को हस्तांतरित करना अवैध हो गया।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद, औपनिवेशिक सरकार ने क्षेत्र को शांत करने और कुछ शिकायतों को दूर करने के लिए प्रशासनिक और कानूनी उपाय किए। दोनों कथन ब्रिटिश प्रशासन द्वारा अपनाए गए उपायों को सही ढंग से दर्शाते हैं।
✅ कथन 1 – सही: संथाल समुदाय को अधिक प्रत्यक्ष रूप से अलग करने और शासन करने के लिए 1855 में संथाल परगना जिले को एक अलग प्रशासनिक इकाई के रूप में बनाया गया था।
✅ कथन 2 – सही: 1876 के संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम ने संथालों के लिए गैर-संथालों (बाहरी लोगों/दिकुओं) को भूमि हस्तांतरित करना अवैध बना दिया, जिससे उन्हें साहूकारों और जमींदारों द्वारा शोषण से बचाया गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संथाल विद्रोह (1855-56)
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| नेता | सिद्धू, कान्हू, चाँद और भैरव मुर्मू |
| क्षेत्र | राजमहल पहाड़ियाँ (वर्तमान झारखंड) |
| कारण | जमींदारों, साहूकारों (दिकुओं) द्वारा शोषण, उत्पीड़नकारी राजस्व नीतियाँ, भूमि हस्तांतरण |
| प्रकृति | ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता की घोषणा करते हुए और संथाल शासन स्थापित करते हुए सशस्त्र विद्रोह |
| दमन | ब्रिटिश सेना द्वारा क्रूरतापूर्वक दबाया गया; हजारों संथाल मारे गए |
| विद्रोह के बाद के उपाय | • संथाल परगना जिले का निर्माण (1855) • संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (1876) - गैर-संथालों को भूमि हस्तांतरण प्रतिबंधित • गैर-विनियमन प्रशासनिक प्रणाली की शुरुआत |
| महत्व | पहले संगठित आदिवासी प्रतिरोधों में से एक; बाद के आदिवासी आंदोलनों को प्रेरित किया |
भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा स्थापित संघ में, अवशिष्ट शक्तियाँ किसे दी गई थीं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — गवर्नर जनरल
भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत, अवशिष्ट शक्तियाँ (जो संघीय, प्रांतीय या समवर्ती सूची में शामिल नहीं थीं) गवर्नर जनरल में निहित थीं। उन्हें यह निर्णय लेने का अधिकार था कि ऐसे विषयों पर कौन सा विधानमंडल शक्ति का प्रयोग करेगा। यह 1935 अधिनियम की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी जो वर्तमान संविधान से भिन्न थी, जहाँ अनुच्छेद 248 के तहत अवशिष्ट शक्तियाँ संघ की संसद में निहित हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत सरकार अधिनियम, 1935 - विधायी शक्तियाँ
| विशेषता | भारत सरकार अधिनियम, 1935 | भारत का संविधान (1950) |
|---|---|---|
| विधायी सूचियाँ | तीन सूचियाँ: संघीय, प्रांतीय, समवर्ती | तीन सूचियाँ: संघ, राज्य, समवर्ती |
| अवशिष्ट शक्तियाँ | गवर्नर जनरल में निहित | संघ की संसद में निहित (अनुच्छेद 248) |
| संघीय सूची | 59 विषय (केंद्र) | संघ सूची: प्रारंभ में 97 विषय |
| प्रांतीय सूची | 54 विषय (प्रांत) | राज्य सूची: प्रारंभ में 66 विषय |
| समवर्ती सूची | 36 विषय (दोनों) | समवर्ती सूची: प्रारंभ में 47 विषय |
| संघ की प्रकृति | संघीय प्रणाली प्रस्तावित (पूर्णतः लागू नहीं हुई) | सशक्त केंद्र के साथ अर्ध-संघीय |
चम्पारण सत्याग्रह का निम्नलिखित में से कौन सा एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — भारत के राष्ट्रीय आंदोलन से किसान असंतोष का जुड़ना
चम्पारण सत्याग्रह (1917) भारत में महात्मा गांधी का सत्याग्रह का पहला बड़ा प्रयोग था, जो बिहार में नील की खेती करने वाले किसानों की शिकायतों को संबोधित करता था जिन्हें यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा दमनकारी तिनकठिया प्रथा के तहत शोषित किया जा रहा था। इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि इसने किसानों के मुद्दों को भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा में ला दिया, इसे एक शहरी, कुलीन वर्ग के संघर्ष से एक जन-आधारित आंदोलन में बदल दिया जिसमें ग्रामीण कृषक जनता शामिल हो गई। यह स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने अहिंसक प्रतिरोध की शक्ति का प्रदर्शन किया और राष्ट्रीय स्तर पर गांधी के नेतृत्व को स्थापित किया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: चम्पारण सत्याग्रह (1917)
- स्थान: चम्पारण जिला, बिहार
- मुद्दा: तिनकठिया प्रथा जो किसानों को उनकी भूमि के 3/20 भाग पर नील की खेती करने के लिए बाध्य करती थी; यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा शोषण
- नेतृत्व: महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी और ब्रज किशोर प्रसाद द्वारा समर्थित
- विधि: भारत में सत्याग्रह (अहिंसक सविनय अवज्ञा) का पहला उपयोग
- परिणाम: तिनकठिया प्रथा का उन्मूलन; जमींदारों को किसानों को धन वापस करना पड़ा
- महत्व: किसान शिकायतों से जुड़कर राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आधारित संघर्ष में बदल दिया; गांधी के जन नेतृत्व की स्थापना की
- प्रभाव: अहिंसक तरीकों की प्रभावशीलता का प्रदर्शन किया; पूरे भारत में भविष्य के किसान आंदोलनों को प्रेरित किया
उन्होंने मैज़िनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी और श्रीकृष्ण की जीवनियाँ लिखीं; कुछ समय अमेरिका में रहे, और केंद्रीय विधानसभा के लिए भी चुने गए। वे थे
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — लाला लाजपत राय
लाला लाजपत राय एक प्रमुख राष्ट्रवादी नेता थे जिन्होंने भारतीय युवाओं को देशभक्ति और त्याग के आदर्शों से प्रेरित करने के लिए मैज़िनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी और श्रीकृष्ण की जीवनियाँ लिखीं। वे 1914 से 1920 तक संयुक्त राज्य अमेरिका में रहे, जहाँ उन्होंने न्यूयॉर्क में भारतीय होम रूल लीग ऑफ अमेरिका (1917) की स्थापना की, और बाद में 1923 में स्वराज पार्टी के सदस्य के रूप में केंद्रीय विधान सभा के लिए चुने गए।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लाला लाजपत राय
- उपनाम: 'पंजाब केसरी' (पंजाब का शेर) और उग्रवादी लाल-बाल-पाल त्रिमूर्ति के सदस्य (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल)
- साहित्यिक योगदान: मैज़िनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी और श्रीकृष्ण की जीवनियाँ लिखीं; 'यंग इंडिया' (1916) और 'अनहैप्पी इंडिया' (1928) की रचना की
- अमेरिका प्रवास (1914-1920): न्यूयॉर्क में भारतीय होम रूल लीग ऑफ अमेरिका (1917) की स्थापना की; भारत की स्वतंत्रता के लिए अभियान चलाया
- राजनीतिक कैरियर: 1923 में स्वराज पार्टी के सदस्य के रूप में केंद्रीय विधान सभा के लिए चुने गए; साइमन कमीशन का विरोध किया
- शहादत: लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध का नेतृत्व किया (1928); लाठीचार्ज में घायल हुए और 17 नवंबर 1928 को मृत्यु हो गई
- विरासत: उनकी मृत्यु ने स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी; भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को प्रेरित किया
निम्नलिखित में से कौन सी घटना सबसे पहले घटित हुई?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — दीनबंधु मित्र ने नीलदर्पण लिखा।
दी गई घटनाओं में से, दीनबंधु मित्र का नाटक नीलदर्पण (द इंडिगो मिरर) 1858-59 में लिखा गया था, जो इसे सबसे पहली घटना बनाता है। इस नाटक ने बंगाल में ब्रिटिश बागान मालिकों द्वारा नील किसानों के क्रूर शोषण को नाटकीय रूप से चित्रित किया और उनकी दुर्दशा के बारे में जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
📝 संक्षिप्त नोट्स: 19वीं सदी की सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाओं का कालक्रम
| घटना | वर्ष | महत्व |
|---|---|---|
| दीनबंधु मित्र द्वारा नीलदर्पण | 1858-59 | ब्रिटिश बागान मालिकों द्वारा नील किसानों के उत्पीड़न को उजागर करने वाला बंगाली नाटक; किसानों के प्रति व्यापक सहानुभूति उत्पन्न हुई |
| सत्येंद्रनाथ टैगोर ने ICS उत्तीर्ण किया | 1863 | भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में सफल होने वाले पहले भारतीय, ब्रिटिश एकाधिकार को तोड़ा |
| स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा आर्य समाज | 1875 | बंबई में स्थापित; "वेदों की ओर वापसी" पर जोर देने वाला और मूर्तिपूजा का विरोध करने वाला वैदिक सुधार आंदोलन |
| बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा आनंदमठ | 1882 | संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर आधारित प्रसिद्ध बंगाली उपन्यास; देशभक्ति गीत "वंदे मातरम्" शामिल है |
निम्नलिखित में से किस विदेशी यात्री ने भारत के हीरों और हीरे की खानों के बारे में विस्तार से चर्चा की?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — ज्यां-बैप्टिस्ट टैवर्नियर
ज्यां-बैप्टिस्ट टैवर्नियर (1605–1689) एक फ्रांसीसी रत्न व्यापारी और यात्री थे जिन्होंने 1630 और 1668 के बीच भारत की छह यात्राएं कीं। वे विशेष रूप से भारतीय हीरे की खानों, विशेषकर प्रसिद्ध गोलकोंडा की खानों और हीरे के व्यापार के अपने विस्तृत विवरण के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी कृति ट्रैवल्स इन इंडिया में दिए गए यात्रियों में भारत में हीरों और उनके खनन के बारे में सबसे विस्तृत विवरण प्रदान किया गया है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
• फ्रांस्वा बर्नियर मुख्य रूप से एक चिकित्सक थे और उन्होंने मुगल राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था के बारे में लिखा, लेकिन विशेष रूप से हीरों के बारे में नहीं।
• ज्यां दे थेवेनो ने भारत की यात्रा की लेकिन उनके विवरण सामान्य अवलोकनों पर केंद्रित थे न कि विस्तृत हीरा व्यापार विवरण पर।
• अबे बार्थेलेमी कैरे एक दूत थे जिनके लेखन धार्मिक और राजनयिक मामलों से संबंधित थे न कि हीरों से।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मध्यकालीन भारत में यूरोपीय यात्री
| यात्री | काल | मुख्य फोकस/योगदान |
|---|---|---|
| ज्यां-बैप्टिस्ट टैवर्नियर | 1605–1689 | रत्न व्यापारी; हीरे की खानों (गोलकोंडा) और हीरे के व्यापार का विस्तृत विवरण |
| फ्रांस्वा बर्नियर | 1625–1688 | औरंगजेब के चिकित्सक; मुगल प्रशासन, भूमि राजस्व प्रणाली और समाज पर लेखन |
| ज्यां दे थेवेनो | 1633–1667 | भारतीय संस्कृति, रीति-रिवाजों और भूगोल पर सामान्य अवलोकन |
| अबे बार्थेलेमी कैरे | 17वीं शताब्दी के अंत | फ्रांसीसी दूत; धार्मिक और राजनयिक मामलों पर केंद्रित |
| निकोलाओ मनूची | 1653–1717 | इतालवी; स्टोरिया दो मोगोर - मुगल दरबार के जीवन का विस्तृत विवरण |
'परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह' (Nuclear Suppliers Group) का सदस्य बनने के किसी देश के लिए क्या परिणाम/परिणाम है/हैं?
- इसे नवीनतम और सबसे कुशल परमाणु प्रौद्योगिकियों तक पहुंच प्राप्त होगी।
- यह स्वतः ही "परमाणु अप्रसार संधि (NPT)" का सदस्य बन जाता है।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) एक बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्था है जो शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु सामग्री, उपकरण और प्रौद्योगिकी की आपूर्ति को विनियमित करती है। सदस्यता उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकियों तक पहुंच प्रदान करती है और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु वाणिज्य को सुगम बनाती है, लेकिन यह स्वतः NPT सदस्यता प्रदान नहीं करती है।
✅ कथन 1 – सही: NSG सदस्य नवीनतम और सबसे कुशल परमाणु प्रौद्योगिकियों तक पहुंच प्राप्त करते हैं क्योंकि यह समूह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए सदस्य देशों के बीच परमाणु सामग्री, उपकरण और प्रौद्योगिकी में व्यापार को सुगम बनाता है।
❌ कथन 2 – गलत: NSG सदस्यता स्वतः किसी देश को NPT का सदस्य नहीं बनाती; ये अलग-अलग ढांचे हैं जिनके भिन्न सदस्यता मानदंड और उद्देश्य हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG)
- गठन: 1975 में भारत के 1974 के परमाणु परीक्षण (पोखरण-I) के जवाब में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए स्थापित।
- मुख्यालय: वियना, ऑस्ट्रिया (प्रशासनिक रूप से IAEA के अंतर्गत)।
- सदस्य: अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान सहित 48 देश।
- उद्देश्य: परमाणु हथियारों के लिए उनके उपयोग को रोकने के लिए परमाणु सामग्री, उपकरण और प्रौद्योगिकी के निर्यात को नियंत्रित करना।
- दिशानिर्देश: दो सेट – भाग 1 (परमाणु सामग्री और उपकरणों की ट्रिगर सूची) और भाग 2 (दोहरे उपयोग की वस्तुएं)।
- निर्णय-निर्माण: सर्वसम्मति के आधार पर संचालित; नई सदस्यता के लिए सभी सदस्यों को सहमत होना आवश्यक है।
- भारत की स्थिति: अमेरिकी समर्थन के बावजूद सदस्य नहीं; चीन भारत की गैर-NPT स्थिति का हवाला देते हुए प्रमुख अवरोधक रहा है।
- भारत-NSG छूट (2008): भारत को NSG सदस्य या NPT हस्ताक्षरकर्ता बने बिना परमाणु व्यापार की अनुमति देने वाली विशेष छूट प्राप्त हुई।
निम्नलिखित देशों पर विचार कीजिए:
- ऑस्ट्रेलिया
- कनाडा
- चीन
- भारत
- जापान
- संयुक्त राज्य अमेरिका
उपर्युक्त में से कौन से ASEAN के 'मुक्त-व्यापार साझेदार' हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1, 3, 4 और 5
ASEAN ने छह विशिष्ट संवाद भागीदारों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTAs) स्थापित किए हैं: चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, भारत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड। दिए गए विकल्पों में से, ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत और जापान ASEAN के मुक्त-व्यापार साझेदार हैं, जबकि कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका केवल औपचारिक FTA के बिना संवाद भागीदार हैं।
✅ कथन 1 – सही: ऑस्ट्रेलिया ASEAN-ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार क्षेत्र (AANZFTA) के माध्यम से ASEAN का मुक्त-व्यापार साझेदार है।
❌ कथन 2 – गलत: कनाडा ASEAN का एक संवाद भागीदार है लेकिन इस समूह के साथ कोई औपचारिक मुक्त व्यापार समझौता नहीं है।
✅ कथन 3 – सही: चीन ASEAN-चीन मुक्त व्यापार क्षेत्र (ACFTA) के माध्यम से ASEAN का मुक्त-व्यापार साझेदार है।
✅ कथन 4 – सही: भारत ASEAN-भारत मुक्त व्यापार क्षेत्र (AIFTA) के माध्यम से ASEAN का मुक्त-व्यापार साझेदार है।
✅ कथन 5 – सही: जापान ASEAN-जापान व्यापक आर्थिक साझेदारी (AJCEP) के माध्यम से ASEAN का मुक्त-व्यापार साझेदार है।
❌ कथन 6 – गलत: संयुक्त राज्य अमेरिका 1977 से ASEAN का एक संवाद भागीदार रहा है, लेकिन ASEAN समूह के साथ कोई मुक्त व्यापार समझौता नहीं है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: ASEAN मुक्त व्यापार समझौते
| साझेदार देश/क्षेत्र | FTA का नाम | लागू होने का वर्ष |
|---|---|---|
| चीन | ASEAN-चीन FTA (ACFTA) | 2010 |
| जापान | ASEAN-जापान व्यापक आर्थिक साझेदारी (AJCEP) | 2008 |
| दक्षिण कोरिया | ASEAN-कोरिया FTA (AKFTA) | 2007 |
| भारत | ASEAN-भारत FTA (AIFTA) | 2010 |
| ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड | ASEAN-ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड FTA (AANZFTA) | 2010 |
| हांगकांग | ASEAN-हांगकांग FTA | 2019 |
- ASEAN के 11 संवाद भागीदार हैं जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, यूरोपीय संघ, रूस और यूके शामिल हैं, लेकिन सभी के पास FTA नहीं हैं।
- 2020 में हस्ताक्षरित क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) में ASEAN और पांच FTA साझेदार (चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड) शामिल हैं।
- संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा रणनीतिक साझेदार बने हुए हैं लेकिन एक समूह के रूप में ASEAN के साथ व्यापक व्यापार समझौते के बिना।
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| शहर | कभी-कभी समाचारों में उल्लिखित देश |
|---|---|
| 1. अलेप्पो | सीरिया |
| 2. किर्कुक | यमन |
| 3. मोसुल | फिलिस्तीन |
| 4. मजार-ए-शरीफ | अफगानिस्तान |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — 1 और 4
यह प्रश्न उन शहरों के भौगोलिक स्थानों के ज्ञान का परीक्षण करता है जो संघर्षों और भू-राजनीतिक विकास के कारण समाचारों में रहे हैं। दिए गए युग्मों में से केवल अलेप्पो (सीरिया) और मजार-ए-शरीफ (अफगानिस्तान) ही अपने संबंधित देशों के साथ सही ढंग से सुमेलित हैं।
✅ युग्म 1 – सही: अलेप्पो वास्तव में सीरिया का एक प्रमुख शहर है, जो सीरियाई गृहयुद्ध के कारण व्यापक रूप से समाचारों में रहा है।
❌ युग्म 2 – गलत: किर्कुक इराक में स्थित है (यमन में नहीं); यह उत्तरी इराक में एक महत्वपूर्ण तेल-समृद्ध शहर है।
❌ युग्म 3 – गलत: मोसुल इराक में स्थित है (फिलिस्तीन में नहीं); यह आईएसआईएस गढ़ के रूप में अपनी मुक्ति तक समाचारों में प्रमुखता से रहा।
✅ युग्म 4 – सही: मजार-ए-शरीफ उज्बेकिस्तान सीमा के निकट उत्तरी अफगानिस्तान का एक प्रमुख शहर है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पश्चिम एशिया और अफगानिस्तान में संघर्ष क्षेत्र
| शहर | देश | महत्व |
|---|---|---|
| अलेप्पो | सीरिया | सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान तबाह हुआ प्रमुख शहर; ऐतिहासिक सांस्कृतिक केंद्र |
| किर्कुक | इराक | उत्तरी इराक में तेल-समृद्ध शहर; कुर्दिश दावों के साथ विवादित क्षेत्र |
| मोसुल | इराक | इराक का दूसरा सबसे बड़ा शहर; पूर्व आईएसआईएस गढ़ (2014-2017) |
| मजार-ए-शरीफ | अफगानिस्तान | चौथा सबसे बड़ा शहर; उत्तरी अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र |
| सना | यमन | यमन की राजधानी; यमन गृहयुद्ध का केंद्र |
"दो-राज्य समाधान" शब्द कभी-कभी समाचारों में किसके मामलों के संदर्भ में उल्लिखित होता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — इज़राइल
"दो-राज्य समाधान" शब्द विशेष रूप से इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष के संदर्भ में उपयोग किया जाता है। यह जॉर्डन नदी के पश्चिम में इज़राइल राज्य के साथ-साथ एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के प्रस्ताव को संदर्भित करता है। यह दशकों पुराने इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष को सुलझाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत ढांचा रहा है, जिसका उद्देश्य दोनों लोगों के लिए शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष और दो-राज्य समाधान
- दो-राज्य समाधान: इज़राइल के साथ-साथ एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के निर्माण से संबंधित शांति के लिए प्रस्तावित ढांचा, जो 1967 से पूर्व की सीमाओं पर आधारित है और पारस्परिक रूप से सहमत भूमि विनिमय के साथ है।
- प्रमुख मुद्दे: अंतिम स्थिति वार्ताओं में सीमाएं, सुरक्षा व्यवस्था, यरूशलम की स्थिति, फिलिस्तीनी शरणार्थियों की वापसी का अधिकार, और वेस्ट बैंक में इज़राइली बस्तियां शामिल हैं।
- ओस्लो समझौते (1993): इज़राइल और फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के बीच ऐतिहासिक समझौते जिन्होंने फिलिस्तीनी प्राधिकरण की स्थापना की और दो-राज्य समाधान की नींव रखी।
- अंतरराष्ट्रीय समर्थन: संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ, और अरब लीग ने ऐतिहासिक रूप से शांति के व्यवहार्य मार्ग के रूप में दो-राज्य समाधान का समर्थन किया है।
- प्रमुख बाधाएं: वेस्ट बैंक में निरंतर इज़राइली बस्ती विस्तार, फिलिस्तीनी एकता का अभाव (हमास बनाम फतह), सुरक्षा चिंताएं, और यरूशलम पर प्रतिस्पर्धी दावे।
- वर्तमान स्थिति: शांति प्रक्रिया वर्षों से रुकी हुई है, बस्तियों के विस्तार और राजनीतिक परिवर्तनों के कारण दो-राज्य समाधान की व्यवहार्यता के बारे में बढ़ती संदेह के साथ।
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| समाचारों में कभी-कभी उल्लिखित क्षेत्र | देश |
|---|---|
| 1. कैटेलोनिया | स्पेन |
| 2. क्रीमिया | हंगरी |
| 3. मिंडानाओ | फिलीपींस |
| 4. ओरोमिया | नाइजीरिया |
उपर्युक्त में से कौन-से युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न अंतर्राष्ट्रीय समाचारों में अक्सर आने वाले क्षेत्रों के भौगोलिक ज्ञान का परीक्षण करता है। केवल युग्म 1 और 3 सही सुमेलित हैं, जबकि क्रीमिया यूक्रेन से संबंधित है (हंगरी से नहीं) और ओरोमिया इथियोपिया से संबंधित है (नाइजीरिया से नहीं)।
✅ युग्म 1 – सही: कैटेलोनिया उत्तर-पूर्वी स्पेन में एक स्वायत्त समुदाय है, जो अपने स्वतंत्रता आंदोलन और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है।
❌ युग्म 2 – गलत: क्रीमिया काला सागर तट पर स्थित एक प्रायद्वीप है, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यूक्रेन के हिस्से के रूप में मान्यता प्राप्त है (2014 में रूस द्वारा विलय किया गया), हंगरी से नहीं।
✅ युग्म 3 – सही: मिंडानाओ फिलीपींस का दूसरा सबसे बड़ा द्वीप है, जो बांग्सामोरो शांति प्रक्रिया और सुरक्षा मुद्दों के कारण अक्सर समाचारों में रहता है।
❌ युग्म 4 – गलत: ओरोमिया इथियोपिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय राज्य है (ओरोमो लोगों का घर), नाइजीरिया का नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अंतर्राष्ट्रीय समाचारों में क्षेत्र
| क्षेत्र | देश | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| कैटेलोनिया | स्पेन | स्वायत्त समुदाय; 2017 में स्वतंत्रता जनमत संग्रह; विशिष्ट भाषा और संस्कृति |
| क्रीमिया | यूक्रेन (विवादित) | 2014 में रूस द्वारा विलय; रणनीतिक काला सागर प्रायद्वीप; अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध |
| मिंडानाओ | फिलीपींस | दूसरा सबसे बड़ा द्वीप; मुस्लिम-बहुल क्षेत्र; बांग्सामोरो स्वायत्त क्षेत्र; शांति प्रक्रिया |
| ओरोमिया | इथियोपिया | सबसे बड़ा क्षेत्रीय राज्य; ओरोमो जातीय समूह का घर (इथियोपिया में सबसे बड़ा); अदीस अबाबा इसके भीतर स्थित |
| अन्य उल्लेखनीय क्षेत्र | ||
| शिनजियांग | चीन | उइगर स्वायत्त क्षेत्र; मानवाधिकार चिंताएं |
| कश्मीर | भारत (विवादित) | विवादित क्षेत्र; अनुच्छेद 370 निरसन (2019) |
| कुर्दिस्तान | इराक/सीरिया/तुर्की/ईरान | कुर्द स्वायत्त क्षेत्र; स्वतंत्रता की आकांक्षाएं |
हाल ही में, निम्नलिखित में से किन देशों में लाखों लोग या तो गंभीर अकाल/तीव्र कुपोषण से पीड़ित हुए हैं या युद्ध/जातीय संघर्षों के कारण भुखमरी से मर गए हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — यमन और दक्षिण सूडान
यमन और दक्षिण सूडान ने लंबे समय तक चले सशस्त्र संघर्षों के कारण गंभीर मानवीय संकट का अनुभव किया है, जिसमें लाखों लोग तीव्र कुपोषण और भुखमरी से पीड़ित हुए हैं। यमन में, 2014 में शुरू हुआ गृहयुद्ध और हौथी विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के हस्तक्षेप ने एक विनाशकारी मानवीय स्थिति पैदा की, जिसमें नाकाबंदी ने खाद्य और चिकित्सा आपूर्ति को प्रतिबंधित कर व्यापक अकाल की स्थिति पैदा की। दक्षिण सूडान में, 2013 में सरकार और विपक्षी बलों के बीच भड़का गृहयुद्ध ने लाखों लोगों को विस्थापित किया, कृषि को बाधित किया, और फरवरी 2017 में संयुक्त राष्ट्र ने देश के कुछ हिस्सों में अकाल की घोषणा की, जो छह वर्षों में कहीं भी घोषित पहला अकाल था।
अन्य विकल्प प्रश्न में वर्णित गंभीरता और हालिया स्थिति से मेल नहीं खाते। अंगोला और जाम्बिया ने हाल ही में ऐसे संकटों का सामना नहीं किया है; मोरक्को और ट्यूनीशिया अपेक्षाकृत स्थिर रहे हैं; वेनेजुएला ने आर्थिक पतन और खाद्य की कमी का सामना किया है, लेकिन कोलंबिया ने इसी तरह की युद्ध-प्रेरित अकाल की स्थिति का अनुभव नहीं किया है।
भारतीय संदर्भ में, 'अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA)' के साथ 'अतिरिक्त प्रोटोकॉल (Additional Protocol)' की पुष्टि करने का क्या निहितार्थ है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — नागरिक परमाणु रिएक्टर IAEA सुरक्षा उपायों के अंतर्गत आते हैं।
अतिरिक्त प्रोटोकॉल एक कानूनी दस्तावेज है जो अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को सूचना और स्थानों तक बढ़ी हुई पहुंच प्रदान करता है ताकि यह सत्यापित किया जा सके कि परमाणु सामग्री का उपयोग विशेष रूप से शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाता है। अतिरिक्त प्रोटोकॉल की पुष्टि करके, भारत ने अपनी नागरिक परमाणु सुविधाओं को IAEA सुरक्षा उपायों के अंतर्गत रखने की प्रतिबद्धता जताई, जिससे यह सत्यापन संभव हो सके कि इन सुविधाओं में परमाणु सामग्री को सैन्य उपयोग के लिए मोड़ा नहीं जा रहा है।
✅ विकल्प 1 – सही: अतिरिक्त प्रोटोकॉल की पुष्टि से नागरिक परमाणु रिएक्टर IAEA सुरक्षा उपायों के अंतर्गत आते हैं, जो परमाणु सामग्री के शांतिपूर्ण उपयोग का अंतर्राष्ट्रीय सत्यापन सुनिश्चित करता है।
❌ विकल्प 2 – गलत: भारत नागरिक और सैन्य परमाणु कार्यक्रमों के बीच स्पष्ट पृथक्करण बनाए रखता है; सैन्य प्रतिष्ठान IAEA निरीक्षण के दायरे से बाहर रहते हैं।
❌ विकल्प 3 – गलत: यद्यपि अतिरिक्त प्रोटोकॉल भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के बाद वैश्विक परमाणु व्यवस्था में भारत के एकीकरण का हिस्सा था, यह स्वचालित रूप से NSG से यूरेनियम खरीदने का विशेषाधिकार प्रदान नहीं करता है; अलग द्विपक्षीय समझौते आवश्यक हैं।
❌ विकल्प 4 – गलत: NSG सदस्यता के लिए एक अलग सर्वसम्मति-आधारित प्रवेश प्रक्रिया की आवश्यकता होती है और अतिरिक्त प्रोटोकॉल की पुष्टि करने पर यह स्वचालित नहीं है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: IAEA अतिरिक्त प्रोटोकॉल और भारत
- IAEA अतिरिक्त प्रोटोकॉल: परमाणु अप्रसार और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए IAEA को विस्तारित पहुंच अधिकार प्रदान करने वाला कानूनी दस्तावेज।
- भारत का दृष्टिकोण: भारत ने 2009 में अतिरिक्त प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए, जो 25 जुलाई 2014 को प्रभावी हुआ।
- नागरिक-सैन्य पृथक्करण: भारत एक पृथक्करण योजना का पालन करता है जहां नामित नागरिक सुविधाएं IAEA सुरक्षा उपायों के अंतर्गत आती हैं, जबकि सामरिक/सैन्य सुविधाएं बाहर रहती हैं।
- भारत-अमेरिका परमाणु समझौता (2008): NPT के हस्ताक्षरकर्ता न होने के बावजूद भारत को नागरिक परमाणु प्रौद्योगिकी और ईंधन तक पहुंच सक्षम की; अतिरिक्त प्रोटोकॉल इस ढांचे का हिस्सा था।
- NSG छूट (2008): परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह ने भारत को परमाणु व्यापार की अनुमति देते हुए विशेष छूट प्रदान की; हालांकि, भारत अभी तक NSG सदस्य नहीं है।
- IAEA सुरक्षा उपाय: घोषित नागरिक सुविधाओं पर लागू होते हैं, नियमित निरीक्षण और निगरानी के माध्यम से यह सुनिश्चित करते हैं कि परमाणु सामग्री को हथियार उद्देश्यों के लिए मोड़ा नहीं जा रहा है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए
- खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 ने खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 को प्रतिस्थापित किया।
- भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवाओं के प्रभार में है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 ने खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 सहित कई खाद्य-संबंधित कानूनों को समेकित किया और भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए एक एकीकृत नियामक ढांचा तैयार किया। हालांकि, FSSAI स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त सांविधिक निकाय के रूप में अपने स्वयं के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के साथ कार्य करता है, न कि महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवाओं के अधीन।
✅ कथन 1 – सही: खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 ने खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 को प्रतिस्थापित किया और FSSAI को खाद्य सुरक्षा के लिए नोडल नियामक निकाय के रूप में स्थापित किया।
❌ कथन 2 – गलत: FSSAI अपने स्वयं के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के साथ एक स्वायत्त सांविधिक प्राधिकरण है, महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवाओं के प्रभार में नहीं है, हालांकि यह स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र के तहत कार्य करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में खाद्य सुरक्षा नियामक ढांचा
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम | 2006 में अधिनियमित; 2011 से परिचालित |
| प्रतिस्थापित अधिनियम | खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम (1954), फल उत्पाद आदेश (1955), मांस खाद्य उत्पाद आदेश (1973), वनस्पति तेल उत्पाद आदेश (1947), खाद्य तेल पैकेजिंग आदेश (1988), सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टेड ऑयल आदेश (1967), दूध और दुग्ध उत्पाद आदेश (1992) |
| FSSAI की स्थिति | स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन स्वायत्त सांविधिक निकाय |
| नेतृत्व | अध्यक्ष (अंशकालिक) और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (पूर्णकालिक) |
| मुख्य कार्य | खाद्य व्यवसायों का लाइसेंसिंग और पंजीकरण, निगरानी और सर्विलांस, खाद्य सुरक्षा मानक निर्धारित करना, उपभोक्ता जागरूकता |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत की संसद भारत के संविधान की नौवीं अनुसूची में किसी विशेष कानून को रख सकती है।
- नौवीं अनुसूची में रखे गए कानून की वैधता की किसी भी न्यायालय द्वारा जांच नहीं की जा सकती है और उस पर कोई निर्णय नहीं दिया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
भारत की संसद वास्तव में संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से नौवीं अनुसूची में कानूनों को रख सकती है ताकि उन्हें न्यायिक समीक्षा से बचाया जा सके। हालांकि, यह सुरक्षा पूर्ण नहीं है—I.R. Coelho निर्णय (2007) के बाद, 24 अप्रैल, 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में रखे गए कानूनों को चुनौती दी जा सकती है यदि वे संविधान की आधारभूत संरचना का उल्लंघन करते हैं।
✅ कथन 1 – सही: संसद के पास संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से नौवीं अनुसूची में कानूनों को रखने की शक्ति है, जैसा कि पहली बार प्रथम संशोधन अधिनियम, 1951 के माध्यम से किया गया था।
❌ कथन 2 – गलत: नौवीं अनुसूची के कानूनों की वैधता की न्यायालयों द्वारा जांच की जा सकती है यदि वे आधारभूत संरचना सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं, विशेष रूप से 24 अप्रैल, 1973 के बाद जोड़े गए कानून (केशवानंद भारती और I.R. Coelho मामलों के अनुसार)।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संविधान की नौवीं अनुसूची
- परिचय: प्रथम संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ी गई, ताकि भूमि सुधार और अन्य कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाया जा सके।
- उद्देश्य: नौवीं अनुसूची में रखे गए कानूनों को भाग III के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दिए जाने से संरक्षित किया गया है।
- केशवानंद भारती मामला (1973): आधारभूत संरचना सिद्धांत की स्थापना की, जिसने संसद की संशोधन शक्ति को सीमित किया।
- I.R. Coelho मामला (2007): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि 24 अप्रैल, 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में रखे गए कानून न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकते हैं यदि वे संविधान की आधारभूत संरचना का उल्लंघन करते हैं।
- वर्तमान स्थिति: नौवीं अनुसूची में वर्तमान में 284 अधिनियम और विनियम हैं (103वें संशोधन तक संशोधित)।
- सीमा: जबकि नौवीं अनुसूची सुरक्षा प्रदान करती है, यह पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है—आधारभूत संरचना का सिद्धांत मनमाने कानूनों के खिलाफ संवैधानिक सुरक्षा के रूप में कार्य करता है।
यदि भारत के राष्ट्रपति किसी विशेष राज्य के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत प्रदान की गई अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं, तो -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — उस राज्य के विधानमंडल की शक्तियां संसद द्वारा या संसद के प्राधिकार के अधीन प्रयोग की जाएंगी।
जब राष्ट्रपति किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता के कारण अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू करते हैं, तो राज्य विधानमंडल की विधायी शक्तियां संसद को हस्तांतरित हो जाती हैं। इस अवधि के दौरान संसद उस राज्य के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त कर लेती है, जिससे शासन की निरंतरता सुनिश्चित होती है।
❌ विकल्प 1 – गलत: अनुच्छेद 356 के तहत राज्य विधानसभा स्वतः भंग नहीं होती; इसे निलंबित अवस्था में रखा जा सकता है या बाद में एक अलग उद्घोषणा द्वारा भंग किया जा सकता है।
✅ विकल्प 2 – सही: अनुच्छेद 356 स्पष्ट रूप से प्रावधान करता है कि राष्ट्रपति शासन के दौरान संसद राज्य की विधायी शक्तियों का प्रयोग करेगी।
❌ विकल्प 3 – गलत: अनुच्छेद 356 के तहत अनुच्छेद 19 (भाषण, आवागमन जैसे मौलिक अधिकार) निलंबित नहीं होता; ऐसा निलंबन केवल अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान होता है।
❌ विकल्प 4 – गलत: राष्ट्रपति सीधे कानून नहीं बनाते; राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य के लिए विधायी शक्तियों का प्रयोग संसद करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अनुच्छेद 356 - राष्ट्रपति शासन
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 356 - राष्ट्रपति शासन (राज्य आपातकाल) |
| आधार | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता; संविधान के अनुसार शासन नहीं चलाया जा सकता |
| विधायी शक्तियां | राज्य विधानमंडल की शक्तियां संसद को हस्तांतरित; संसद राज्य के लिए कानून बना सकती है |
| कार्यकारी शक्तियां | राज्यपाल राष्ट्रपति की ओर से राज्य का प्रशासन चलाता है; मंत्रिपरिषद बर्खास्त |
| राज्य विधानसभा | निलंबित अवस्था में रखी जा सकती है या भंग की जा सकती है (स्वचालित विघटन नहीं) |
| अवधि | प्रारंभ में 6 माह; हर 6 माह में संसदीय अनुमोदन से अधिकतम 3 वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है |
| मौलिक अधिकार | अनुच्छेद 19 के अधिकार निलंबित नहीं होते (अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल के विपरीत) |
| न्यायिक समीक्षा | एस.आर. बोम्मई मामले (1994) के बाद न्यायिक समीक्षा के अधीन - राष्ट्रपति की व्यक्तिगत संतुष्टि को चुनौती दी जा सकती है |
UPSC Prelims 2018 Questions Paper - Subject-wise Question Distribution
भारतीय अर्थव्यवस्था
18 Qs (18%)भारतीय राजव्यवस्था
15 Qs (15%)पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
14 Qs (14%)आधुनिक इतिहास
13 Qs (13%)विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
12 Qs (12%)अंतरराष्ट्रीय संबंध
8 Qs (8%)भारतीय कला और संस्कृति
7 Qs (7%)समसामयिकी
4 Qs (4%)भारत का भूगोल
4 Qs (4%)विश्व भूगोल
4 Qs (4%)मध्यकालीन इतिहास
1 Qs (1%)UPSC Prelims 2018 Question Paper - FAQs & Analysis
Q1 How many total questions were asked in UPSC Prelims 2018?
Q2 What is the subject-wise question breakdown for UPSC Prelims 2018?
- भारतीय अर्थव्यवस्था: 18 questions (18%)
- भारतीय राजव्यवस्था: 15 questions (15%)
- पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी: 14 questions (14%)
- आधुनिक इतिहास: 13 questions (13%)
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: 12 questions (12%)
- अंतरराष्ट्रीय संबंध: 8 questions (8%)
- भारतीय कला और संस्कृति: 7 questions (7%)
- समसामयिकी: 4 questions (4%)
- भारत का भूगोल: 4 questions (4%)
- विश्व भूगोल: 4 questions (4%)
- मध्यकालीन इतिहास: 1 questions (1%)