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मध्यकालीन इतिहास Previous Year Questions (PYQs)
Solved Previous Year Questions (PYQs) for मध्यकालीन इतिहास in UPSC CSE Prelims in English & Hindi Medium.
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प्राचीन भारत में निम्नलिखित शासकों में से किसने 'मत्तविलास', 'विचित्राचित्त' और 'गुणभारा' की उपाधियाँ धारण की थीं?
Detailed Explanation:
✅ महेंद्रवर्मन प्रथम पल्लव वंश के प्रसिद्ध शासक थे, जो कला, साहित्य और स्थापत्य के संरक्षक माने जाते हैं।
उन्होंने ‘मत्तविलास’, ‘विचित्रचित्त’ और ‘गुणभारा’ जैसी उपाधियाँ धारण की थीं। उन्होंने ‘मत्तविलास प्रहसन’ नामक संस्कृत नाटक की भी रचना की थी।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
| विकल्प | कारण |
|---|---|
| सिंहविष्णु | पल्लव शासक थे, लेकिन इन उपाधियों से नहीं जाने जाते थे। |
| नरसिंहवर्मन प्रथम | पुलकेशिन द्वितीय को हराने के लिए प्रसिद्ध थे, पर इन उपाधियों से नहीं जुड़े हैं। |
| सिंहवर्मन | प्रारम्भिक पल्लव शासक थे, इन उपाधियों से प्रसिद्ध नहीं थे। |
📝 संक्षिप्त नोट्स: महेंद्रवर्मन प्रथम
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| वंश | पल्लव |
| काल | 7वीं शताब्दी ईस्वी |
| राजधानी | कांचीपुरम |
| प्रमुख उपाधियाँ | मत्तविलास, विचित्रचित्त, गुणभारा |
| रचना | मत्तविलास प्रहसन |
| योगदान | शैलकृत (Rock-cut) मंदिर वास्तुकला को बढ़ावा दिया |
त्वरित तथ्य:
दक्षिण भारत में शैलकृत मंदिर स्थापत्य की शुरुआत महेंद्रवर्मन प्रथम के समय से मानी जाती है।
मध्यकालीन भारत के निम्नलिखित शासकों में से किसने पुर्तगालियों को भटकल में एक किला बनाने की अनुमति दी थी?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ कृष्णदेवराय
विजयनगर साम्राज्य के महान शासक कृष्णदेवराय ने पुर्तगालियों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे। 1510 में उन्होंने पुर्तगाली गवर्नर अल्फोंसो द अल्बुकर्क को भटकल में एक किला बनाने की अनुमति दी। इससे व्यापारिक और सामरिक संबंध मजबूत हुए।
✅ कृष्णदेवराय सही हैं: उन्होंने व्यापार और सहयोग बढ़ाने के लिए पुर्तगालियों को भटकल में किला बनाने की अनुमति दी।
❌ नरसिंह सालुव गलत हैं: उनके शासनकाल में पुर्तगालियों का प्रभाव अभी प्रारंभिक अवस्था में था।
❌ मुहम्मद शाह III गलत हैं: उनके शासनकाल में पुर्तगाली भारत नहीं पहुंचे थे; वे 1498 में आए।
❌ यूसुफ आदिल शाह गलत हैं: उनके और पुर्तगालियों के बीच विशेषकर गोवा को लेकर संघर्षपूर्ण संबंध थे।
संक्षिप्त नोट्स: विजयनगर साम्राज्य और पुर्तगाली
-
1498 में वास्को-दा-गामा कालीकट पहुंचा।
-
कृष्णदेवराय (1509–1529) तुलुव वंश के सबसे महान शासक थे।
-
1510 में अल्फोंसो द अल्बुकर्क ने गोवा पर कब्जा किया।
-
भटकल कर्नाटक तट का एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था।
-
विजयनगर पुर्तगालियों से घोड़े, हथियार और विलासिता की वस्तुएँ प्राप्त करता था।
-
कृष्णदेवराय ने अमुक्तमाल्यदा नामक तेलुगु ग्रंथ की रचना की।
-
उनके शासनकाल में विजयनगर साम्राज्य अपनी चरम शक्ति पर पहुंचा।
-
1565 के तालीकोटा युद्ध के बाद साम्राज्य का पतन शुरू हुआ।
निम्नलिखित राजवंशों पर विचार कीजिए:
- होयसल
- गहड़वाल
- काकतीय
- यादव
उपर्युक्त में से कितने राजवंशों ने आठवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ में अपने राज्यों की स्थापना की?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कोई नहीं
सूचीबद्ध राजवंशों में से किसी ने भी आठवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ (701-800 ईस्वी) में अपने राज्यों की स्थापना नहीं की। होयसल राजवंश की स्थापना लगभग 1006 ईस्वी में हुई, गहड़वाल राजवंश की स्थापना लगभग 1089 ईस्वी में हुई, काकतीय राजवंश ने लगभग 1163 ईस्वी में प्रमुखता प्राप्त की (यद्यपि वे 1000 ईस्वी के आसपास सामंतों के रूप में अस्तित्व में थे), और यादव राजवंश की स्थापना लगभग 850 ईस्वी में हुई। इनमें से सबसे प्रारंभिक (यादव) भी आठवीं शताब्दी के प्रारंभिक समय-सीमा के बाहर आता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख मध्यकालीन भारतीय राजवंशों की समयरेखा
| राजवंश | स्थापना काल | क्षेत्र | मुख्य जानकारी |
|---|---|---|---|
| होयसल | 1006 ईस्वी | कर्नाटक (द्वारसमुद्र) | नृप काम द्वारा स्थापित; विष्णुवर्धन और बल्लाल द्वितीय के अधीन चरम पर पहुंचा |
| गहड़वाल | 1089 ईस्वी | कन्नौज और वाराणसी | चंद्रदेव द्वारा स्थापित; वर्तमान उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों पर शासन किया |
| काकतीय | 1163 ईस्वी (स्वतंत्रता) | वारंगल (तेलंगाना) | प्रारंभ में पश्चिमी चालुक्यों के सामंत; प्रोल द्वितीय ने स्वतंत्रता की घोषणा की |
| यादव | 850 ईस्वी (सामंतों के रूप में) 1187 ईस्वी (स्वतंत्रता) |
देवगिरि (महाराष्ट्र) | सेउना राजवंश के नाम से भी जाना जाता है; भिल्लम पंचम के अधीन स्वतंत्रता प्राप्त की |
आठवीं शताब्दी के प्रारंभ का संदर्भ:
आठवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ में, भारत में प्रमुख शक्तियाँ थीं:
- पाल राजवंश – गोपाल द्वारा लगभग 750 ईस्वी में बंगाल और बिहार में स्थापित
- प्रतिहार राजवंश – 8वीं शताब्दी में मालवा और राजस्थान में प्रमुखता प्राप्त की
- राष्ट्रकूट राजवंश – दंतिदुर्ग द्वारा लगभग 753 ईस्वी में दक्कन में स्थापित
इन तीन राजवंशों ने 8वीं-10वीं शताब्दी के दौरान कन्नौज पर नियंत्रण के लिए प्रसिद्ध त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया।
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मध्यकालीन गुजरात के निम्नलिखित शासकों में से किसने पुर्तगालियों को दीव सौंपा?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — बहादुर शाह
गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने 1535 में मुगल सम्राट हुमायूँ के विरुद्ध पुर्तगाली सैन्य सहायता के बदले में पुर्तगालियों को दीव सौंप दिया। पश्चिमी तट पर स्थित यह रणनीतिक बंदरगाह शहर एक महत्वपूर्ण पुर्तगाली व्यापारिक और सैन्य चौकी बन गया, जो भारत में यूरोपीय औपनिवेशिक विस्तार के एक महत्वपूर्ण चरण को चिह्नित करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: गुजरात में पुर्तगाली
- बहादुर शाह (1526–1537): गुजरात के अंतिम महत्वपूर्ण स्वतंत्र सुल्तान जिन्होंने हुमायूँ से मुगल दबाव का सामना किया।
- बेसिन की संधि (1534): बहादुर शाह ने मुगलों के विरुद्ध सैन्य समर्थन के बदले में पुर्तगालियों को बेसिन देने पर सहमति व्यक्त की।
- दीव का समर्पण (1535): बहादुर शाह ने हुमायूँ के विस्तारित मुगल साम्राज्य के विरुद्ध नौसैनिक और सैन्य सहायता सुरक्षित करने के लिए पुर्तगालियों को दीव सौंप दिया।
- पुर्तगाली रणनीति: पुर्तगालियों का उद्देश्य समुद्री व्यापार मार्गों पर प्रभुत्व के लिए भारत के पश्चिमी तट पर रणनीतिक बंदरगाहों को नियंत्रित करना था।
- बहादुर शाह की मृत्यु (1537): पुर्तगालियों के साथ बातचीत के दौरान रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई, संभवतः एक पुर्तगाली जहाज पर हत्या की गई।
- पुर्तगाली नियंत्रण: दीव 1961 तक पुर्तगाली नियंत्रण में रहा, जब इसे गोवा और दमन के साथ भारत द्वारा विलय कर लिया गया।
विजयनगर साम्राज्य के निम्नलिखित शासकों में से किसने तुंगभद्रा नदी पर एक विशाल बांध और नदी से राजधानी शहर तक कई किलोमीटर लंबी नहर-सह-जलसेतु का निर्माण करवाया?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — देवराय प्रथम
विजयनगर साम्राज्य के देवराय प्रथम (शासनकाल 1406-1422 ई.) ने लगभग 1410 ई. में तुंगभद्रा नदी पर एक विशाल बांध/बैराज का निर्माण करवाया और राजधानी विजयनगर तक पानी लाने के लिए 24 किमी लंबी नहर-सह-जलसेतु का निर्माण करवाया। इस स्मारकीय सिंचाई परियोजना ने साम्राज्य में अपार समृद्धि लाई, जैसा कि पुर्तगाली यात्री फर्नाओ नूनिश (नूनिज) द्वारा दर्ज किया गया है, जिन्होंने देवराय प्रथम की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का विस्तृत विवरण दिया। ये जल-विज्ञान कार्य विजयनगर साम्राज्य की उन्नत इंजीनियरिंग क्षमताओं के प्रमाण हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विजयनगर साम्राज्य - प्रमुख शासक और योगदान
| शासक | वंश | काल | प्रमुख योगदान |
|---|---|---|---|
| हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम | संगम | 1336-1377 ई. | विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक |
| देवराय प्रथम | संगम | 1406-1422 ई. | तुंगभद्रा बांध और 24 किमी जलसेतु; सैन्य सुधार; मुस्लिम तीरंदाजों की नियुक्ति |
| देवराय द्वितीय | संगम | 1422-1446 ई. | संगम वंश का महानतम शासक; गजपतियों को पराजित किया; अब्दुर रज्जाक की यात्रा |
| कृष्णदेवराय | तुलुव | 1509-1529 ई. | विजयनगर का महानतम शासक; बहमनियों को पराजित किया; हजारा राम मंदिर निर्माण; अष्टदिग्गजों का संरक्षण |
| अच्युतराय | तुलुव | 1529-1542 ई. | कृष्णदेवराय के भाई; मंदिर निर्माण |
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| राजा | राजवंश |
| 1. नन्नुक | चंदेल |
| 2. जयशक्ति | परमार |
| 3. नागभट द्वितीय | गुर्जर-प्रतिहार |
| 4. भोज | राष्ट्रकूट |
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो युग्म
यह प्रश्न भारतीय मध्यकालीन राजवंशों और उनके शासकों के ज्ञान का परीक्षण करता है। दिए गए चार युग्मों में से केवल युग्म 1 (नन्नुक-चंदेल) और युग्म 3 (नागभट द्वितीय-गुर्जर-प्रतिहार) सही सुमेलित हैं, जबकि युग्म 2 और 4 में गलत राजवंश संबद्धता है।
✅ युग्म 1 – सही: नन्नुक 9वीं शताब्दी ईस्वी में चंदेल राजवंश के संस्थापक थे, जिन्होंने बुंदेलखंड क्षेत्र पर शासन किया।
❌ युग्म 2 – गलत: जयशक्ति चंदेल राजवंश (वह कीर्तिवर्मन के पुत्र थे) से संबंधित थे, परमार राजवंश से नहीं।
✅ युग्म 3 – सही: नागभट द्वितीय (लगभग 805-833 ईस्वी) गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के एक प्रमुख शासक थे जिन्होंने अरब आक्रमणों के खिलाफ सफलतापूर्वक रक्षा की।
❌ युग्म 4 – गलत: भोज (लगभग 1010-1055 ईस्वी) मालवा के परमार राजवंश के सबसे प्रतिष्ठित शासक थे, राष्ट्रकूट राजवंश के नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख मध्यकालीन भारतीय राजवंश
| राजवंश | काल | राजधानी/क्षेत्र | उल्लेखनीय शासक |
|---|---|---|---|
| चंदेल | 9वीं-13वीं शताब्दी ईस्वी | खजुराहो, बुंदेलखंड | नन्नुक (संस्थापक), यशोवर्मन, धंग, विद्याधर |
| परमार | 9वीं-14वीं शताब्दी ईस्वी | धार/धारा, मालवा | उपेन्द्र (संस्थापक), भोज, सिंधुराज |
| गुर्जर-प्रतिहार | 6वीं-11वीं शताब्दी ईस्वी | कन्नौज | नागभट प्रथम, नागभट द्वितीय, मिहिर भोज, महेन्द्रपाल प्रथम |
| राष्ट्रकूट | 6वीं-10वीं शताब्दी ईस्वी | मान्यखेत (दक्कन) | दन्तिदुर्ग, कृष्ण प्रथम, गोविंद तृतीय, अमोघवर्ष प्रथम, कृष्ण तृतीय |
मध्यकालीन भारत में, "फणम" शब्द का अर्थ था:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — सिक्के
मध्यकालीन भारत में "फणम" शब्द एक स्वर्ण या रजत सिक्के को संदर्भित करता था जो दक्षिण भारत में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था, विशेष रूप से विजयनगर साम्राज्य, मदुरै के नायक और विभिन्न दक्कन राज्यों जैसे क्षेत्रों में। यह एक छोटी मूल्यवर्ग की मुद्रा थी जिसका उपयोग मध्यकाल से लेकर 19वीं शताब्दी तक व्यापार और वाणिज्य में व्यापक रूप से किया जाता था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मध्यकालीन भारतीय मुद्रा
- फणम: एक स्वर्ण/रजत सिक्का जो मुख्य रूप से दक्षिण भारत में उपयोग किया जाता था (विजयनगर साम्राज्य, मदुरै नायक, त्रावणकोर, मैसूर); कुछ क्षेत्रों में ब्रिटिश काल तक जारी रहा
- टंका: दिल्ली सल्तनत के इल्तुतमिश द्वारा प्रस्तुत रजत सिक्का; उत्तर भारत में मानक मुद्रा बन गया
- जीतल: दिल्ली सल्तनत काल में छोटे लेनदेन के लिए उपयोग किया जाने वाला ताम्र सिक्का
- हून: विभिन्न क्षेत्रीय राज्यों में उपयोग किया जाने वाला छोटा ताम्र सिक्का; 1 टंका = 48 जीतल या कई हून
- पगोडा (वराह): दक्षिण भारत, विशेष रूप से विजयनगर साम्राज्य का स्वर्ण सिक्का; हिंदू देवताओं की छवि वाला
- रुपया: शेरशाह सूरी (1540-1545) द्वारा प्रस्तुत रजत सिक्का; अकबर द्वारा मानकीकृत; आधुनिक रुपये की नींव बना
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत पर पहला मंगोल आक्रमण जलाल-उद-दीन खिलजी के शासनकाल में हुआ था।
- अला-उद-दीन खिलजी के शासनकाल के दौरान, एक मंगोल सेना दिल्ली तक पहुंची और शहर को घेर लिया।
- मुहम्मद-बिन-तुगलक ने अपने राज्य के उत्तर-पश्चिम के कुछ हिस्से अस्थायी रूप से मंगोलों से खो दिए।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न दिल्ली सल्तनत काल के दौरान मंगोल आक्रमणों के ज्ञान का परीक्षण करता है। केवल कथन 2 सही है, क्योंकि 1303 ई. में दिल्ली की मंगोल घेराबंदी अला-उद-दीन खिलजी के शासनकाल में हुई थी, जबकि अन्य कथनों में समयरेखा और शासकों के संबंध में तथ्यात्मक त्रुटियाँ हैं।
❌ कथन 1 – गलत: भारत पर पहला मंगोल आक्रमण 1221 ई. में चंगेज खान के अधीन इल्तुतमिश (1211-1236 ई.) के शासनकाल में हुआ था, जलाल-उद-दीन खिलजी (1290-1296 ई.) के शासनकाल में नहीं।
✅ कथन 2 – सही: 1303 ई. में, अला-उद-दीन खिलजी के शासनकाल (1296-1316 ई.) के दौरान, तारघी के नेतृत्व में एक विशाल मंगोल सेना ने दिल्ली को घेर लिया, जिससे सुल्तान को कई महीनों तक सीरी किले में शरण लेनी पड़ी।
❌ कथन 3 – गलत: मुहम्मद-बिन-तुगलक (1325-1351 ई.) ने अपने शासनकाल की शुरुआत में मंगोल आक्रमणों को सफलतापूर्वक विफल किया और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों को कभी नहीं खोया; बल्कि, उन्होंने मंगोल क्षेत्रों के खिलाफ एक महत्वाकांक्षी खुरासान अभियान की योजना भी बनाई।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत पर मंगोल आक्रमण (13वीं-14वीं शताब्दी)
| वर्ष/काल | शासक | घटना |
|---|---|---|
| 1221 ई. | इल्तुतमिश | ख्वारिज्म शाह का पीछा करते हुए चंगेज खान के अधीन पहला मंगोल आक्रमण; सिंधु तक पहुंचने के बाद मंगोल वापस लौट गए |
| 1241 ई. | रजिया सुल्तान | पंजाब और लाहौर पर मंगोल छापे |
| 1279-1290 ई. | बलबन | कई मंगोल आक्रमण; बलबन ने उत्तर-पश्चिमी सीमा को मजबूत किया और मजबूत सैन्य उपस्थिति स्थापित की |
| 1292 ई. | जलाल-उद-दीन खिलजी | अब्दुल्लाह के नेतृत्व में मंगोल आक्रमण को पराजित किया; मंगोल कैदियों पर दया दिखाई (उन्हें दिल्ली के पास 'नव मुसलमानों' के रूप में बसाया) |
| 1299-1308 ई. | अला-उद-दीन खिलजी | बार-बार मंगोल आक्रमण; 1303 ई. में तारघी की सेना द्वारा दिल्ली की घेराबंदी; अला-उद-दीन ने बाद में मंगोलों को निर्णायक रूप से कुचल दिया |
| 1327-1328 ई. | मुहम्मद-बिन-तुगलक | तरमाशिरीन के नेतृत्व में मंगोल आक्रमण को पराजित किया; उत्तर-पश्चिमी सीमाओं को प्रभावी ढंग से सुरक्षित किया |
- अला-उद-दीन खिलजी के प्रति-उपाय: सीरी किले का निर्माण, 4,75,000 घुड़सवारों की बड़ी स्थायी सेना बनाए रखी, गाजी मलिक (बाद में गयासुद्दीन तुगलक) को सीमा गवर्नर नियुक्त किया
- प्रभाव: मंगोल खतरे ने दिल्ली सल्तनत की सैन्य नीतियों, किलेबंदी रणनीतियों और आर्थिक सुधारों (विशेष रूप से अला-उद-दीन के मूल्य नियंत्रण और सैन्य सुधारों) को आकार दिया
- बस्तियाँ: कुछ मंगोल समूहों को धर्मांतरित कर भारत में बसाया गया ('नव मुसलमान' या नव-मुसलमान कहलाए), हालांकि विद्रोह की आशंका के कारण अला-उद-दीन ने बाद में कई का नरसंहार किया
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन "कुलहदरान" के नाम से जाने जाते थे?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — सैय्यद
सैय्यदों को मुस्लिम समाज में पैगंबर मुहम्मद की पुत्री फातिमा के वंशज के रूप में सम्मानित किया जाता था। दिल्ली सल्तनत काल के दौरान, वे 'कुलह' नामक एक विशिष्ट नुकीली टोपी पहनते थे, जिससे उन्हें 'कुलहदरान' (टोपी पहनने वाले) की उपाधि मिली। 1398 में तैमूर के विनाशकारी भारत आक्रमण के दौरान भी, उसने सामान्य नरसंहार की नीति के बावजूद विशेष रूप से सैय्यदों के जीवन को बख्शा, जो इस्लामी समाज में उनकी विशेष स्थिति को प्रदर्शित करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: दिल्ली सल्तनत में सामाजिक वर्ग
- सैय्यद (कुलहदरान): पैगंबर मुहम्मद से फातिमा के माध्यम से वंश का दावा; नुकीली टोपी (कुलह) पहनते थे; विशेष विशेषाधिकार और सम्मान का आनंद लेते थे; तैमूर के आक्रमण के दौरान भी सुरक्षित रहे
- शेख: अरब मुसलमान और उनके वंशज जो भारत में बस गए; सामाजिक पदानुक्रम में उच्च माने जाते थे
- क़लन्दर: मुस्लिम भिक्षु रहस्यवादी जिन्होंने पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं को अस्वीकार किया; अक्सर भटकते हुए तपस्वी
- उलेमा: इस्लामी विद्वान और धार्मिक नेता जो शरिया कानून की व्याख्या करते थे
- खुद्दाम: तुर्की कुलीन जिन्होंने प्रारंभिक दिल्ली सल्तनत में शासक वर्ग का गठन किया
- सामाजिक पदानुक्रम: सैय्यद और शेख → विदेशी मुसलमान (तुर्क, अफगान, फारसी) → भारतीय मुसलमान (धर्मांतरित) → गैर-मुसलमान
"योगवासिष्ठ" का फारसी में अनुवाद निज़ामुद्दीन पानीपती द्वारा किसके शासनकाल में किया गया था:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — अकबर
निज़ामुद्दीन पानीपती, एक फारसी विद्वान, ने सम्राट अकबर (1556-1605) के शासनकाल के दौरान "योगवासिष्ठ" का फारसी में अनुवाद किया। यह अनुवाद अकबर की महत्वाकांक्षी सांस्कृतिक नीति का हिस्सा था, जिसमें संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद को बढ़ावा दिया गया, जो मुगल साम्राज्य की प्रशासनिक भाषा थी। अकबर के दरबार में महाभारत (रज़्मनामा के रूप में), रामायण और विभिन्न अन्य धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों का अनुवाद हुआ, जिससे बौद्धिक आदान-प्रदान और धार्मिक सद्भाव को सुविधा मिली।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अकबर के शासनकाल में अनुवाद
- मकतब खाना (अनुवाद ब्यूरो): अकबर द्वारा संस्कृत, अरबी, ग्रीक और अन्य भाषाओं के कार्यों को फारसी में अनुवाद करने के लिए स्थापित किया गया।
- योगवासिष्ठ: ऋषि वसिष्ठ और राजकुमार राम के बीच संवाद के रूप में एक दार्शनिक ग्रंथ, जिसका अनुवाद निज़ामुद्दीन पानीपती ने किया।
- रज़्मनामा: महाभारत का फारसी अनुवाद 1589 में पूरा हुआ, जिसमें बदायूंनी और फैजी जैसे विद्वानों का योगदान था।
- रामायण: अकबर के संरक्षण में "रामायण" के रूप में फारसी में अनुवादित।
- अथर्व वेद: हाजी इब्राहिम सरहिंदी द्वारा अनुवादित।
- अकबर की दृष्टि: ये अनुवाद उनकी सुल्ह-ए-कुल (सार्वभौमिक शांति) और बौद्धिक समन्वयवाद की नीति को दर्शाते थे।
हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री द्वारा हैदराबाद में बैठी हुई मुद्रा में रामानुज की विश्व की दूसरी सबसे ऊंची प्रतिमा का उद्घाटन किया गया। निम्नलिखित में से कौन सा कथन रामानुज की शिक्षाओं को सही ढंग से प्रस्तुत करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — मोक्ष का सर्वोत्तम साधन भक्ति था।
रामानुज (11वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी) एक प्रमुख वैष्णव दार्शनिक थे जिन्होंने विशिष्टाद्वैत (योग्य अद्वैतवाद) के दर्शन का प्रतिपादन किया। उनकी केंद्रीय शिक्षा इस बात पर बल देती थी कि मोक्ष सर्वोत्तम रूप से एक व्यक्तिगत ईश्वर (विष्णु/नारायण) के प्रति गहन भक्ति और दिव्य कृपा के माध्यम से प्राप्त होता है, न कि केवल ज्ञान या कर्मकांडीय प्रथाओं के माध्यम से।
✅ विकल्प 1 – सही: रामानुज की मूल शिक्षा यह थी कि भक्ति मोक्ष का सर्वोच्च मार्ग है, जो ईश्वर की कृपा से पूरक है।
❌ विकल्प 2 – गलत: यद्यपि रामानुज वेदों का सम्मान करते थे, यह कथन मीमांसा दर्शन या रूढ़िवादी वैदिक दर्शन के विचारों को अधिक सटीक रूप से दर्शाता है, न कि रामानुज की विशिष्ट शिक्षा को।
❌ विकल्प 3 – गलत: परम आनंद के लिए आवश्यक साधन के रूप में तार्किक तर्कों पर बल न्याय दर्शन की विशेषता है, न कि रामानुज के भक्ति-केंद्रित दृष्टिकोण की।
❌ विकल्प 4 – गलत: मोक्ष के प्राथमिक साधन के रूप में ध्यान पतंजलि के योग दर्शन या शंकर के अद्वैत वेदांत के साथ अधिक संरेखित है, न कि रामानुज के भक्ति मार्ग के साथ।
📝 संक्षिप्त नोट्स: रामानुज और विशिष्टाद्वैत दर्शन
- काल: 11वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग 1017-1137 ईस्वी)
- दर्शन: विशिष्टाद्वैत (योग्य अद्वैतवाद) - व्यक्तिगत आत्माएं और विश्व वास्तविक हैं और ब्रह्म के गुण हैं, लेकिन अलग रहते हैं
- मूल शिक्षा: मोक्ष के सर्वोच्च मार्ग के रूप में एक व्यक्तिगत ईश्वर (विष्णु) के प्रति भक्ति
- ईश्वर की अवधारणा: व्यक्तिगत ईश्वर (सगुण ब्रह्म) - विष्णु/नारायण गुणों के साथ, दोनों अतींद्रिय और अंतर्निहित
- मोक्ष का मार्ग: प्रपत्ति (आत्म-समर्पण) और भक्ति, ईश्वर की कृपा (प्रसाद) द्वारा सहायता प्राप्त
- प्रमुख कृतियाँ: श्री भाष्य (ब्रह्म सूत्र पर टीका), गीता भाष्य, वेदार्थ संग्रह
- प्रभाव: दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन को प्रेरित किया; सामाजिक समानता और मंदिर पूजा की पहुंच को बढ़ावा दिया
- शंकर से भिन्नता: शंकर के अद्वैत (निर्गुण ब्रह्म के साथ पूर्ण अद्वैतवाद) के विपरीत, रामानुज ने व्यक्तिगत आत्माओं और भौतिक जगत की वास्तविकता को ईश्वर के वास्तविक गुणों के रूप में स्वीकार किया
पुर्तगाली लेखक नूनिज के अनुसार, विजयनगर साम्राज्य की महिलाएं निम्नलिखित में से किन क्षेत्रों में विशेषज्ञ थीं?
कुश्ती
ज्योतिष
लेखांकन
भविष्यवाणी
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2, 3 और 4
पुर्तगाली इतिहासकार फर्नाओ नूनिज, जो कृष्णदेवराय के शासनकाल के दौरान विजयनगर साम्राज्य गए थे, के अनुसार शाही परिवार की महिलाओं को विविध व्यावसायिक भूमिकाओं में प्रशिक्षित और नियोजित किया गया था। उनके विवरणों में विशेष रूप से कुश्ती, ज्योतिष, लेखांकन और भविष्यवाणी में उनकी विशेषज्ञता का उल्लेख है, जो साम्राज्य में महिलाओं की शिक्षा और व्यावसायिक भागीदारी के प्रति प्रगतिशील दृष्टिकोण को उजागर करता है।
✅ कथन 1 – सही: महिलाएं कुश्ती और युद्ध कलाओं में कुशल थीं, शाही महल में रक्षक और योद्धा के रूप में सेवा करती थीं।
✅ कथन 2 – सही: महिलाएं ज्योतिष का अभ्यास करती थीं और शाही दरबार में ज्योतिषी के रूप में नियोजित थीं।
✅ कथन 3 – सही: महिलाओं को लेखांकन में प्रशिक्षित किया जाता था और वे महल प्रशासन में वित्तीय रिकॉर्ड का प्रबंधन करती थीं।
✅ कथन 4 – सही: महिलाएं शाही दरबार में भविष्यवाणी (भविष्य कथन) और भाग्य बताने का अभ्यास करती थीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विजयनगर साम्राज्य में महिलाएं
- विदेशी विवरण: पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पेस, फर्नाओ नूनिज और इतालवी निकोलो डे कोंटी ने विजयनगर में महिलाओं की स्थिति का विस्तृत विवरण दिया।
- शाही रोजगार: महिलाएं शाही परिवार में रक्षक, पहलवान, लेखाकार, ज्योतिषी, संगीतकार और नर्तकियों सहित विभिन्न व्यावसायिक क्षमताओं में सेवा करती थीं।
- साहित्यिक संरक्षण: कृष्णदेवराय ने महिला कवियों और लेखिकाओं को संरक्षण दिया; इस अवधि के दौरान कई महिलाओं ने तेलुगु और संस्कृत साहित्य में योगदान दिया।
- सैन्य भूमिकाएं: महिलाओं को युद्ध कला और धनुर्विद्या में प्रशिक्षित किया जाता था; कुछ रानियों और शाही महिलाओं के अंगरक्षक के रूप में सेवा करती थीं।
- आर्थिक स्वतंत्रता: महिलाएं व्यापार में लगी रहती थीं, संपत्ति की मालिक थीं और उत्तराधिकार अधिकार रखती थीं, जो उनकी आर्थिक शक्ति को दर्शाता है।
- सामाजिक स्थिति: कुछ क्षेत्रों में प्रगतिशील भूमिकाओं के बावजूद, साम्राज्य में सती प्रथा और विधवा पुनर्विवाह पर प्रतिबंध जैसी प्रथाएं भी मौजूद थीं।
मध्यकालीन भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा आकार के आरोही क्रम में सही अनुक्रम है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — परगना- सरकार- सूबा
मध्यकालीन भारत में, विशेष रूप से मुगल काल के दौरान, प्रशासनिक विभाजन पदानुक्रमित रूप से संगठित थे, जिसमें परगना सबसे छोटी इकाई थी जिसमें गांवों का एक समूह शामिल था, सरकार एक मध्य-स्तरीय विभाजन (जिला) था जो कई परगनों को मिलाकर बना था, और सूबा सबसे बड़ा प्रांतीय विभाजन था जो कई सरकारों को शामिल करता था। परगना → सरकार → सूबा का यह आरोही क्रम जमीनी स्तर के गांव समूह स्तर से प्रांतीय स्तर तक की प्रशासनिक संरचना को दर्शाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मुगल प्रशासनिक विभाजन
| प्रशासनिक इकाई | विवरण | समकक्ष आधुनिक शब्द |
|---|---|---|
| परगना | गांवों के एक समूह से मिलकर बनी सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई (आमतौर पर 100-150 गांव) | उप-जिला/तहसील |
| सरकार | कई परगनों को मिलाकर बना मध्य-स्तरीय विभाजन | जिला |
| सूबा | सुबेदार (गवर्नर) के नेतृत्व में सबसे बड़ा प्रांतीय विभाजन, जो कई सरकारों को शामिल करता है | प्रांत/राज्य |
| साम्राज्य स्तर | अकबर ने अपने साम्राज्य को 15 सूबों में विभाजित किया (बाद में औरंगजेब के अधीन 21 तक विस्तारित) | केंद्रीय प्रशासन |
- राजस्व प्रशासन: परगना स्तर पर, प्रमुख अधिकारी शिकदार (कानून और व्यवस्था), अमीन (भूमि राजस्व मूल्यांकन), और मुंसिफ (अभिलेख और लेखा) थे।
- प्रांतीय शासन: प्रत्येक सूबा का नेतृत्व एक सुबेदार/सिपहसालार (गवर्नर) करता था जो सैन्य और नागरिक प्रशासन के लिए जिम्मेदार था।
- वित्तीय नियंत्रण: सूबा स्तर पर दीवान (वित्त मंत्री) राजस्व संग्रह और वित्तीय मामलों का प्रबंधन सुबेदार से स्वतंत्र रूप से करता था ताकि नियंत्रण और संतुलन सुनिश्चित हो सके।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
इल्तुतमिश के शासनकाल के दौरान चंगेज़ खान भगोड़े ख्वारिज्म राजकुमार का पीछा करते हुए सिंधु तक पहुंचा था।
मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल के दौरान तैमूर ने मुल्तान पर कब्जा किया और सिंधु को पार किया।
विजयनगर साम्राज्य के देवराय द्वितीय के शासनकाल के दौरान वास्को डी गामा केरल के तट पर पहुंचा था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
यह प्रश्न तीन ऐतिहासिक घटनाओं और उनसे संबंधित शासकों की कालानुक्रमिक सटीकता की परीक्षा करता है। केवल पहला कथन घटना को शासक के शासनकाल के साथ सही ढंग से मिलाता है, जबकि अन्य दो में शासक या समयरेखा के संबंध में तथ्यात्मक त्रुटियां हैं।
✅ कथन 1 – सही: 1221 में, चंगेज़ खान ने ख्वारिज्मियन राजकुमार जलाल-उद-दीन मंगबर्नी का पीछा करते हुए इल्तुतमिश के शासनकाल के दौरान सिंधु तक पहुंचा। इल्तुतमिश ने समझदारी से शरण देने से इनकार कर दिया, दिल्ली सल्तनत पर मंगोल आक्रमण से बचा लिया।
❌ कथन 2 – गलत: तैमूर ने 1398 में नासिर-उद-दीन महमूद शाह तुगलक (अंतिम तुगलक शासक) के शासनकाल के दौरान भारत पर आक्रमण किया, न कि मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में जो 1351 में मर गया था। तैमूर के पोते पीर मुहम्मद ने तैमूर के सिंधु पार करने से पहले मुल्तान पर कब्जा किया था।
❌ कथन 3 – गलत: वास्को डी गामा 1498 में सालुवा वंश के इम्मादी नरसिम्हा राय के शासनकाल के दौरान कालीकट पहुंचा। संगम वंश के देवराय द्वितीय ने 1422-1446 तक शासन किया, पुर्तगालियों के आगमन से 50 वर्ष से अधिक पहले।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मध्यकालीन भारतीय शासक और प्रमुख घटनाएँ
| घटना | वर्ष | शासक/वंश | महत्व |
|---|---|---|---|
| चंगेज़ खान का सिंधु तक पहुंचना | 1221 | इल्तुतमिश (दिल्ली सल्तनत) | ख्वारिज्मियन राजकुमार का पीछा; इल्तुतमिश ने शरण देने से इनकार किया, आक्रमण से बचा |
| तैमूर का आक्रमण | 1398 | नासिर-उद-दीन महमूद (अंतिम तुगलक) | दिल्ली को लूटा; दिल्ली सल्तनत को काफी कमजोर किया |
| वास्को डी गामा का भारत आगमन | 1498 | इम्मादी नरसिम्हा (विजयनगर-सालुवा) | यूरोप से भारत तक पहला समुद्री मार्ग स्थापित |
| देवराय द्वितीय का शासनकाल | 1422-1446 | विजयनगर (संगम वंश) | स्वर्णिम काल; बहमनी सल्तनत को पराजित किया |
| मुहम्मद बिन तुगलक का शासनकाल | 1325-1351 | दिल्ली सल्तनत (तुगलक) | प्रायोगिक नीतियों और राजधानी स्थानांतरण के लिए जाना जाता है |
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- आरकाट की निज़ामत हैदराबाद राज्य से उभरी।
- मैसूर साम्राज्य विजयनगर साम्राज्य से उभरा।
- रोहिलखंड साम्राज्य अहमद शाह दुर्रानी द्वारा अधिकृत क्षेत्रों से बना था।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न भारतीय इतिास में विभिन्न प्रांतीय साम्राज्यों के उद्भव के बारे में ज्ञान का परीक्षण करता है। केवल कथन 2 सही है, क्योंकि मैसूर साम्राज्य वास्तव में 1565 में विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद उभरा।
❌ कथन 1 – गलत: आरकाट की निज़ामत (कर्नाटक) औरंगजेब द्वारा दक्कन सूबेदार के अधीन एक उपखंड के रूप में स्थापित की गई थी। यद्यपि यह प्रशासनिक रूप से हैदराबाद के निज़ाम के अधीन थी, लेकिन यह हैदराबाद राज्य से उभरी नहीं थी; बल्कि, दोनों मुगल प्रशासनिक इकाइयाँ थीं।
✅ कथन 2 – सही: मैसूर साम्राज्य विजयनगर साम्राज्य से उभरा। तालीकोटा के युद्ध (1565) के बाद, वोडेयार वंश, जो विजयनगर के अधीन अधीनस्थ सरदार थे, ने मैसूर में अपना स्वतंत्र साम्राज्य स्थापित किया।
❌ कथन 3 – गलत: रोहिलखंड साम्राज्य रोहिल्ला अफगानों द्वारा बनाया गया था जो 18वीं शताब्दी में भारत आए थे। अली मुहम्मद खान ने नादिर शाह के आक्रमण (1739) के बाद उत्पन्न शक्ति शून्यता का लाभ उठाकर इस साम्राज्य की स्थापना की, न कि अहमद शाह दुर्रानी द्वारा सीधे अधिकृत क्षेत्रों से।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मुगल और विजयनगर साम्राज्यों के उत्तराधिकारी राज्य
| साम्राज्य/राज्य | मूल/मूल राज्य | संस्थापक/वंश | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|---|
| मैसूर साम्राज्य | विजयनगर साम्राज्य | वोडेयार वंश (1399) | 1565 के बाद स्वतंत्र हुआ; हैदर अली और टीपू सुल्तान ने बाद में शासन किया (1761-1799) |
| आरकाट की निज़ामत (कर्नाटक) | मुगल दक्कन प्रांत | औरंगजेब द्वारा स्थापित (1692) | हैदराबाद के निज़ाम की कानूनी निर्भरता; राजधानी आरकाट में |
| रोहिलखंड | अफगान प्रवास | अली मुहम्मद खान (1721) | नादिर शाह के आक्रमण के बाद बना; वर्तमान उत्तर प्रदेश में स्थित |
| हैदराबाद राज्य | मुगल साम्राज्य | निज़ाम-उल-मुल्क आसफ जाह प्रथम (1724) | मुगलों के पतन के बाद स्वतंत्र; सबसे बड़ी रियासत |