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मध्यकालीन इतिहास Previous Year Questions (PYQs)
Solved Previous Year Questions (PYQs) for मध्यकालीन इतिहास in UPSC CSE Prelims in English & Hindi Medium.
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निम्नलिखित में से कौन सा वाक्यांश 'हुंडी' की प्रकृति को परिभाषित करता है, जिसका सामान्यतः हर्ष-पश्चात काल के स्रोतों में उल्लेख किया गया है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — विनिमय पत्र (बिल ऑफ एक्सचेंज)
हर्ष-पश्चात काल में हुंडी एक परक्राम्य वित्तीय साधन था जिसका व्यापक रूप से व्यापारियों द्वारा व्यापार और ऋण लेनदेन के लिए उपयोग किया जाता था। यह एक विनिमय पत्र के रूप में कार्य करता था, जिसमें एक पक्ष दूसरे पक्ष को एक निर्धारित राशि तीसरे पक्ष को तुरंत या भविष्य की तारीख में भुगतान करने के लिए लिखित आदेश जारी करता था। इस प्रणाली ने बड़ी मात्रा में मुद्रा को भौतिक रूप से परिवहन की आवश्यकता के बिना लंबी दूरी के व्यापार को सुविधाजनक बनाया, जिससे यह अधिक सुरक्षित और कुशल हो गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मध्यकालीन भारत में हुंडी प्रणाली
- परिभाषा: हुंडी मध्यकालीन भारत में व्यापार और धन हस्तांतरण के लिए एक वित्तीय साधन के रूप में उपयोग किया जाने वाला एक स्वदेशी विनिमय पत्र था।
- कार्य: यह एक व्यापारी (आहर्ता) से दूसरे (आदेशिती) को एक निर्धारित राशि तीसरे पक्ष (आदाता) को भुगतान करने का लिखित आदेश था, जो नकद रहित लेनदेन को सुविधाजनक बनाता था।
- प्रकार: विभिन्न प्रकार थे जिनमें दर्शनी (दृष्टि पर देय), मुद्दती (निर्दिष्ट अवधि के बाद देय), और शाहजोग (सम्मानित/विश्वसनीय व्यक्ति को देय) शामिल थे।
- उपयोग: व्यापारी समुदायों (जैसे मारवाड़ी, गुजराती) द्वारा प्रेषण, व्यापार वित्तपोषण और लंबी दूरी पर ऋण लेनदेन के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था।
- लाभ: भौतिक नकदी ले जाने के जोखिम को समाप्त किया, लेनदेन लागत को कम किया, और व्यापारियों को ऋण सुविधाएं प्रदान कीं।
- ऐतिहासिक निरंतरता: हुंडी प्रणाली प्राचीन काल से विकसित हुई और औपनिवेशिक काल तक जारी रही, जो भारतीय वाणिज्यिक प्रथाओं की परिष्कृतता को प्रदर्शित करती है।
भारत के इतिहास में निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए:
- राजा भोज के अधीन प्रतिहारों का उदय
- महेंद्रवर्मन-I के अधीन पल्लव शक्ति की स्थापना
- परांतक-I द्वारा चोल शक्ति की स्थापना
- गोपाल द्वारा पाल वंश की स्थापना
उपरोक्त घटनाओं का सही कालानुक्रमिक क्रम क्या है, जो सबसे पहले के समय से शुरू होता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 2-4-1-3
सही कालानुक्रमिक क्रम महेंद्रवर्मन-I द्वारा पल्लव शक्ति की स्थापना (लगभग 600-630 ई.) से शुरू होता है, इसके बाद गोपाल द्वारा पाल वंश की स्थापना (लगभग 750 ई.), फिर प्रतिहारों में राजा भोज का उदय (836-885 ई.), और अंत में परांतक-I द्वारा चोल शक्ति की स्थापना (907-955 ई.) होती है। यह व्यवस्था भारतीय इतिहास में प्रारंभिक मध्यकाल से मध्यकाल तक प्रमुख क्षेत्रीय राजवंशों की कालिक प्रगति को दर्शाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रारंभिक मध्यकालीन राजवंशों का कालक्रम
| राजवंश | क्षेत्र | उल्लिखित शासक | काल | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|---|---|
| पल्लव | दक्षिण भारत (तमिलनाडु) | महेंद्रवर्मन-I | 600-630 ई. | रॉक-कट वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध; कला और साहित्य के संरक्षक; चोलों से पहले |
| पाल | पूर्वी भारत (बंगाल, बिहार) | गोपाल (संस्थापक) | 750-770 ई. | बौद्ध धर्म के संरक्षक; नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का उत्कर्ष; 12वीं शताब्दी तक शासन |
| प्रतिहार | उत्तर भारत (मालवा, राजस्थान) | राजा भोज | 836-885 ई. | त्रिपक्षीय संघर्ष का हिस्सा; अरब आक्रमणों का प्रतिरोध; भोज के अधीन चरमोत्कर्ष |
| चोल | दक्षिण भारत (तमिलनाडु) | परांतक-I | 907-955 ई. | साम्राज्यवादी चोलों की शुरुआत विजयालय से; परांतक-I ने साम्राज्य का विस्तार किया; बाद में राजराज और राजेंद्र के अधीन शिखर पर पहुंचे |
निम्नलिखित में से किस मुगल सम्राट ने चित्रित पांडुलिपियों से जोर को एल्बम और व्यक्तिगत चित्रों की ओर स्थानांतरित किया?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — जहाँगीर
जहाँगीर (शासनकाल 1605-1627) ने मुगल चित्रकला के जोर को चित्रित पांडुलिपियों से एल्बम (मुरक्का) और व्यक्तिगत चित्रों की ओर स्थानांतरित किया। उन्हें प्रकृतिवादी कला में गहरी व्यक्तिगत रुचि थी और उन्होंने मंसूर (वनस्पति और जीव-जंतुओं के लिए प्रसिद्ध), अबुल हसन और उस्ताद मंसूर जैसे महान कलाकारों को संरक्षण दिया, जो चित्रांकन और यथार्थवादी अध्ययन में विशेषज्ञ थे। इसने बड़े पैमाने की पांडुलिपि चित्रण के बजाय अधिक परिष्कृत, विस्तृत व्यक्तिगत चित्रों और एल्बम प्रारूप में संकलन की ओर संक्रमण को चिह्नित किया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मुगल चित्रकला परंपराएँ
| सम्राट | कलात्मक जोर | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|
| हुमायूँ | फारसी शैली की शुरुआत | फारसी कलाकार मीर सैयद अली और अब्दुस समद को लाए; मुगल चित्रकला की नींव रखी |
| अकबर | चित्रित पांडुलिपियाँ | हम्ज़ानामा, रज़्मनामा, अकबरनामा को संरक्षण दिया; बड़े पैमाने पर कथा चित्रण; हिंदू-फारसी संश्लेषण |
| जहाँगीर | चित्र और एल्बम (मुरक्का) | प्रकृतिवाद पर जोर, व्यक्तिगत चित्र, वनस्पति-जीव अध्ययन; मंसूर, अबुल हसन, बिचित्र जैसे कलाकार |
| शाहजहाँ | औपचारिक दरबारी दृश्य | परिष्कृत लालित्य, वास्तुकला सटीकता, औपचारिक दरबार दृश्य; जहाँगीर की तुलना में कम प्रकृतिवाद |
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निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- संत निम्बार्क अकबर के समकालीन थे।
- संत कबीर शेख अहमद सरहिंदी से अत्यधिक प्रभावित थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न तो 1 और न ही 2
दोनों कथनों में इन ऐतिहासिक धार्मिक व्यक्तित्वों की समयसीमा के संबंध में कालानुक्रमिक अशुद्धियाँ हैं। आइए प्रत्येक कथन का मूल्यांकन करें:
❌ कथन 1 – गलत: संत निम्बार्क 12वीं-13वीं शताब्दी में रहते थे (सटीक तिथियाँ विवादित हैं, लेकिन आम तौर पर 1130-1200 ईस्वी के बीच मानी जाती हैं), जबकि अकबर ने बहुत बाद में 1556 से 1605 ईस्वी तक शासन किया, जिससे उनके बीच लगभग 3-4 शताब्दियों का अंतर है।
❌ कथन 2 – गलत: संत कबीर 15वीं शताब्दी में रहते थे (लगभग 1440-1518 ईस्वी), जबकि शेख अहमद सरहिंदी (मुजद्दिद अल्फ सानी) 1564 से 1624 ईस्वी तक जीवित रहे, अर्थात कबीर सरहिंदी से पहले थे और उनसे प्रभावित नहीं हो सकते थे।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मध्यकालीन भक्ति संत और सूफी संत
| धार्मिक व्यक्तित्व | समय अवधि | प्रमुख योगदान |
|---|---|---|
| संत निम्बार्क | 12वीं-13वीं शताब्दी (लगभग 1130-1200 ईस्वी) | द्वैताद्वैत (द्वैतवादी अद्वैतवाद) दर्शन की स्थापना; कृष्ण-राधा उपासना पर बल; निम्बार्क संप्रदाय की स्थापना |
| संत कबीर | 15वीं शताब्दी (लगभग 1440-1518 ईस्वी) | भक्ति-सूफी समन्वय; कर्मकांड और जाति व्यवस्था की आलोचना; दोहों और भजनों की रचना; हिंदू और मुस्लिम दोनों परंपराओं को प्रभावित किया |
| अकबर (मुगल सम्राट) | 1556-1605 ईस्वी | धार्मिक सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध; कला और संस्कृति का संरक्षण; दीन-ए-इलाही को बढ़ावा दिया |
| शेख अहमद सरहिंदी | 1564-1624 ईस्वी | नक्शबंदी सूफी संत; रूढ़िवादी इस्लामी सुधारक; समन्वयवाद का विरोध; मुजद्दिद अल्फ सानी (दूसरे सहस्राब्दी के नवीनीकरणकर्ता) कहलाए |
- कालानुक्रमिक क्रम: निम्बार्क (12वीं-13वीं शती) → कबीर (15वीं शती) → अकबर (16वीं शती) → सरहिंदी (16वीं-17वीं शती)
- निम्बार्क का दर्शन: द्वैताद्वैत या भेदाभेद (भिन्नता और अभिन्नता) - आत्माएं और जगत दोनों ब्रह्म से भिन्न और अभिन्न हैं
- कबीर के प्रभाव: वे रामानंद जैसे पूर्ववर्ती भक्ति संतों और अपने समय में प्रचलित सूफी परंपराओं से प्रभावित थे, न कि सरहिंदी जैसे बाद के व्यक्तित्वों से
- सरहिंदी की स्थिति: उन्होंने अकबर के धार्मिक समन्वयवाद का विरोध किया और जहाँगीर के शासनकाल में रूढ़िवादी इस्लामी प्रथाओं को बहाल करने का कार्य किया
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- दिल्ली सल्तनत के राजस्व प्रशासन में, राजस्व संग्रह का प्रभारी 'आमिल' के रूप में जाना जाता था।
- दिल्ली के सुल्तानों की इक्ता प्रणाली एक प्राचीन स्वदेशी संस्था थी।
- 'मीर बख्शी' का पद दिल्ली के खिलजी सुल्तानों के शासनकाल के दौरान अस्तित्व में आया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
यह प्रश्न दिल्ली सल्तनत काल के प्रशासनिक संस्थानों के ज्ञान की परीक्षा करता है। राजस्व संग्रहकर्ता के रूप में आमिल के संबंध में केवल पहला कथन ऐतिहासिक रूप से सटीक है, जबकि इक्ता प्रणाली के स्वदेशी मूल और खिलजी काल में मीर बख्शी की स्थापना के दावे गलत हैं।
✅ कथन 1 – सही: 'आमिल' दिल्ली सल्तनत के क्षेत्रीय प्रभागों (इक्ता या प्रांतों) में राजस्व संग्रह के लिए जिम्मेदार अधिकारी था।
❌ कथन 2 – गलत: इक्ता प्रणाली एक स्वदेशी संस्था नहीं थी बल्कि फारसी/अरब प्रशासनिक मॉडल से उधार ली गई थी और दिल्ली सुल्तानों द्वारा भारत में लागू की गई थी।
❌ कथन 3 – गलत: 'मीर बख्शी' (सैन्य विभाग का प्रमुख) का पद खिलजी सल्तनत के दौरान नहीं, बल्कि अकबर के अधीन मुगल काल में अस्तित्व में आया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: दिल्ली सल्तनत की राजस्व और प्रशासनिक प्रणाली
| पद/प्रणाली | कार्य | काल/उत्पत्ति |
|---|---|---|
| आमिल | प्रांतीय/इक्ता स्तर पर राजस्व संग्रहकर्ता | दिल्ली सल्तनत |
| इक्ता प्रणाली | भूमि आवंटन प्रणाली जहाँ सैन्य कमांडरों को वेतन के बदले राजस्व अधिकार मिलते थे | फारसी/अरब मूल, प्रारंभिक सुल्तानों द्वारा लागू |
| दीवान-ए-विजारत | केंद्रीय वित्त विभाग | दिल्ली सल्तनत |
| मीर बख्शी | सैन्य विभाग का प्रमुख, सेना के रिकॉर्ड बनाए रखता था | मुगल काल (अकबर का शासन) |
| बरीद | खुफिया अधिकारी/समाचार संवाददाता | दिल्ली सल्तनत (विशेष रूप से अलाउद्दीन खिलजी) |
- खिलजी वंश का योगदान: अलाउद्दीन खिलजी ने कड़े मूल्य नियंत्रण (बाजार विनियमन), सैन्य सुधारों और कुशल खुफिया नेटवर्क के साथ राजस्व प्रशासन को मजबूत किया।
- राजस्व निर्धारण: भू-राजस्व आय का मुख्य स्रोत था; विभिन्न सुल्तानों के अधीन निर्धारण विधियाँ भिन्न थीं।
- इक्तादार/मुक्ति: इक्ता धारक जो अपने आवंटन से राजस्व एकत्र करते थे और सैनिक बनाए रखते थे।
मुगल भारत के संदर्भ में, जागीरदार और जमींदार के बीच क्या अंतर है/हैं?
- जागीरदार न्यायिक और पुलिस कर्तव्यों के बदले भूमि आवंटन के धारक थे, जबकि जमींदार राजस्व संग्रह के अलावा किसी अन्य कर्तव्य को निभाने के दायित्व के बिना राजस्व अधिकारों के धारक थे।
- जागीरदारों को भूमि आवंटन वंशानुगत थे और जमींदारों के राजस्व अधिकार वंशानुगत नहीं थे।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न तो 1 और न ही 2
दोनों कथन मुगल भारत में जागीरदारों और जमींदारों की गलत विशेषताएं प्रस्तुत करते हैं। जागीरदार मनसबदार थे जिन्हें सैन्य और प्रशासनिक सेवाओं के लिए वेतन के रूप में भूमि आवंटन (जागीर) प्राप्त होता था—न कि न्यायिक/पुलिस कर्तव्यों के लिए—और ये आवंटन आमतौर पर गैर-वंशानुगत थे। जमींदार, मुख्य रूप से राजस्व संग्रहकर्ता होने के साथ-साथ सैन्य दायित्व भी रखते थे और उनके अधिकार आम तौर पर वंशानुगत थे, जो कथनों के दावों के विपरीत है।
❌ कथन 1 – गलत: जागीरदार सैन्य/प्रशासनिक सेवाओं (न्यायिक/पुलिस कर्तव्यों के नहीं) के बदले में भूमि आवंटन रखते थे, और जमींदारों के राजस्व संग्रह से परे दायित्व थे, जिसमें सैन्य सेवा प्रदान करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना शामिल था।
❌ कथन 2 – गलत: जागीर आवंटन आम तौर पर गैर-वंशानुगत थे और स्थानीय सत्ता-स्थापन को रोकने के लिए जागीरदारों को बार-बार स्थानांतरित किया जाता था, जबकि जमींदारी अधिकार पारंपरिक सामाजिक स्थिति के आधार पर आम तौर पर वंशानुगत थे।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मुगल भारत में जागीरदारी और जमींदारी प्रणालियाँ
| विशेषता | जागीरदार | जमींदार |
|---|---|---|
| परिभाषा | नकद वेतन के बदले भूमि (जागीर) आवंटित मनसबदार | राजस्व संग्रह अधिकारों वाले वंशानुगत भूमि मध्यस्थ |
| आवंटन की प्रकृति | गैर-वंशानुगत, स्थानांतरणीय | वंशानुगत, पारंपरिक अधिकारों पर आधारित |
| प्राथमिक कार्य | राज्य को सैन्य और प्रशासनिक सेवा | राजस्व संग्रह और स्थानीय प्रशासन |
| दायित्व | सैनिक रखना, सैन्य सेवा प्रदान करना | राजस्व एकत्र करना, सैन्य दस्ते (सवार) प्रदान करना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना |
| स्थानांतरण नीति | स्थानीय शक्ति समेकन को रोकने के लिए बार-बार स्थानांतरित | अपने पैतृक क्षेत्रों में बने रहते थे |
| भूमि के साथ संबंध | कोई स्वामित्व अधिकार नहीं, केवल राजस्व संग्रह अधिकार | पारंपरिक अधिकारों के साथ मध्यवर्ती स्वामित्व |
मियां तानसेन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — तानसेन की उपाधि उन्हें सम्राट अकबर द्वारा दी गई थी
यह कथन गलत है क्योंकि 'तानसेन' की उपाधि उन्हें ग्वालियर के राजा विक्रमजीत (विक्रमादित्य के नाम से भी जाने जाते हैं) द्वारा दी गई थी, सम्राट अकबर द्वारा नहीं। उनका मूल नाम रामतनु पांडे था। अकबर के दरबार में शामिल होने से पहले, तानसेन बांधवगढ़ (रीवा) के राजा रामचंद्र के दरबार में दरबारी संगीतकार के रूप में सेवा करते थे।
✅ कथन 2 – सही: तानसेन ने हिंदू देवी-देवताओं को समर्पित अनेक ध्रुपदों की रचना की, जो उनकी भक्ति और संगीत कौशल को दर्शाता है।
✅ कथन 3 – सही: एक दरबारी संगीतकार के रूप में, तानसेन ने अपने संरक्षकों की प्रशंसा में गीत रचे, जिनमें सम्राट अकबर भी शामिल थे, जो दरबारी संगीतकारों के लिए एक सामान्य प्रथा थी।
✅ कथन 4 – सही: तानसेन को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में कई रागों को बनाने और लोकप्रिय बनाने का श्रेय दिया जाता है, जिनमें राग दरबारी कानड़ा, मियां की मल्हार और मियां की टोडी शामिल हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मियां तानसेन
- मूल नाम: रामतनु पांडे (बाद में ग्वालियर के राजा विक्रमजीत द्वारा 'तानसेन' की उपाधि दी गई)
- प्रारंभिक करियर: अकबर के दरबार में शामिल होने से पहले बांधवगढ़ (रीवा) के राजा रामचंद्र के दरबारी संगीतकार
- नवरत्न: सम्राट अकबर के दरबार के नौ रत्नों (नवरत्नों) में से एक
- संगीत योगदान: ध्रुपद शैली में महारत हासिल की और उसे लोकप्रिय बनाया; दरबारी कानड़ा, मियां की मल्हार, मियां की टोडी और मियां की सारंग सहित कई रागों की रचना का श्रेय
- गुरु: ग्वालियर घराने के स्वामी हरिदास से संगीत की शिक्षा ली
- धार्मिक संबद्धता: एक हिंदू ब्राह्मण के रूप में जन्मे, बाद में इस्लाम में परिवर्तित हुए (हालांकि यह विद्वानों द्वारा विवादित है)
- विरासत: उनका मकबरा ग्वालियर, मध्य प्रदेश में स्थित है, और उनके सम्मान में वहां वार्षिक संगीत समारोह (तानसेन समारोह) आयोजित किया जाता है
निम्नलिखित में से किस विदेशी यात्री ने भारत के हीरों और हीरे की खानों के बारे में विस्तार से चर्चा की?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — ज्यां-बैप्टिस्ट टैवर्नियर
ज्यां-बैप्टिस्ट टैवर्नियर (1605–1689) एक फ्रांसीसी रत्न व्यापारी और यात्री थे जिन्होंने 1630 और 1668 के बीच भारत की छह यात्राएं कीं। वे विशेष रूप से भारतीय हीरे की खानों, विशेषकर प्रसिद्ध गोलकोंडा की खानों और हीरे के व्यापार के अपने विस्तृत विवरण के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी कृति ट्रैवल्स इन इंडिया में दिए गए यात्रियों में भारत में हीरों और उनके खनन के बारे में सबसे विस्तृत विवरण प्रदान किया गया है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
• फ्रांस्वा बर्नियर मुख्य रूप से एक चिकित्सक थे और उन्होंने मुगल राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था के बारे में लिखा, लेकिन विशेष रूप से हीरों के बारे में नहीं।
• ज्यां दे थेवेनो ने भारत की यात्रा की लेकिन उनके विवरण सामान्य अवलोकनों पर केंद्रित थे न कि विस्तृत हीरा व्यापार विवरण पर।
• अबे बार्थेलेमी कैरे एक दूत थे जिनके लेखन धार्मिक और राजनयिक मामलों से संबंधित थे न कि हीरों से।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मध्यकालीन भारत में यूरोपीय यात्री
| यात्री | काल | मुख्य फोकस/योगदान |
|---|---|---|
| ज्यां-बैप्टिस्ट टैवर्नियर | 1605–1689 | रत्न व्यापारी; हीरे की खानों (गोलकोंडा) और हीरे के व्यापार का विस्तृत विवरण |
| फ्रांस्वा बर्नियर | 1625–1688 | औरंगजेब के चिकित्सक; मुगल प्रशासन, भूमि राजस्व प्रणाली और समाज पर लेखन |
| ज्यां दे थेवेनो | 1633–1667 | भारतीय संस्कृति, रीति-रिवाजों और भूगोल पर सामान्य अवलोकन |
| अबे बार्थेलेमी कैरे | 17वीं शताब्दी के अंत | फ्रांसीसी दूत; धार्मिक और राजनयिक मामलों पर केंद्रित |
| निकोलाओ मनूची | 1653–1717 | इतालवी; स्टोरिया दो मोगोर - मुगल दरबार के जीवन का विस्तृत विवरण |
काकतीय साम्राज्य में निम्नलिखित में से कौन सा एक अत्यंत महत्वपूर्ण बंदरगाह था?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — मोटुपल्ली
मोटुपल्ली काकतीय साम्राज्य का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह था, जो वर्तमान आंध्र प्रदेश के तट पर स्थित था। राजा गणपति देव ने लगभग 1245 ईस्वी में प्रसिद्ध मोटुपल्ली अभिलेख (अभय शासनम) जारी किया, जो विदेशी व्यापारियों के लिए सुरक्षा का एक चार्टर था, जिसमें उनकी सुरक्षा की गारंटी दी गई और समुद्री व्यापार को बढ़ावा देने के लिए उचित सीमा शुल्क स्थापित किए गए। वेनिस के यात्री मार्को पोलो ने रानी रुद्रमा देवी के शासनकाल के दौरान इस बंदरगाह का दौरा किया (इसे 'मुतफिली' के रूप में संदर्भित करते हुए) और साम्राज्य की समृद्धि का दस्तावेजीकरण किया, विशेष रूप से उत्कृष्ट मलमल और हीरों के व्यापार का उल्लेख किया।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
• काकीनाडा बहुत बाद में, औपनिवेशिक काल के दौरान प्रमुख हुआ।
• मछलीपट्टनम (मसूलीपट्टनम) ने कुतुब शाही और बाद में यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के अधीन महत्व प्राप्त किया, काकतीय काल में नहीं।
• नेल्लूरु मुख्य रूप से एक आंतरिक प्रशासनिक केंद्र था, काकतीय शासन के दौरान एक प्रमुख बंदरगाह नहीं था।
मध्यकालीन भारत के आर्थिक इतिहास के संदर्भ में, 'अरघट्टा' शब्द किसे संदर्भित करता है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — भूमि की सिंचाई में उपयोग किया जाने वाला जल-चक्र
अरघट्टा एक पारंपरिक जल-उत्तोलन उपकरण था जो मध्यकालीन भारत में सिंचाई के उद्देश्य से व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था। इसमें एक बड़ा पहिया होता था जिसके किनारे पर घड़े या बाल्टियाँ लगी होती थीं, जिन्हें पशु शक्ति (आमतौर पर बैल या सांड) द्वारा घुमाया जाता था। जैसे ही पहिया घूमता था, घड़े कुएं या जल स्रोत में उतरते थे, पानी से भर जाते थे, और फिर ऊपर उठकर पानी को सिंचाई नहर या नाली में खाली कर देते थे जो इसे कृषि खेतों में वितरित करती थी। यह प्रतिभाशाली तंत्र, जिसे फारसी चक्र या रहट के नाम से भी जाना जाता है, ने कुएं के पानी पर निर्भर क्षेत्रों में कुशल सिंचाई को सक्षम बनाकर कृषि उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि की।
विजयनगर के शासक कृष्ण देव की कराधान प्रणाली के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भूमि पर कर की दर भूमि की गुणवत्ता के आधार पर निर्धारित की गई थी।
- कार्यशालाओं के निजी मालिक उद्योग कर देते थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
✅ कथन 1 – सही: कृष्ण देव राय के प्रशासन ने एक व्यवस्थित भू-राजस्व प्रणाली लागू की थी जिसमें कर की दरें भूमि की गुणवत्ता, उर्वरता और सिंचाई सुविधाओं के अनुसार भिन्न थीं। अधिक उत्पादक और अच्छी तरह से सिंचित भूमि पर उच्च दरों पर कर लगाया जाता था, जबकि कम उपजाऊ भूमि पर कम शुल्क लगता था। यह विभेदक कराधान समानता सुनिश्चित करता था और राजस्व संग्रह को अधिकतम करता था।
✅ कथन 2 – सही: कृष्ण देव राय के अधीन विजयनगर साम्राज्य ने कृषि से परे विभिन्न आर्थिक गतिविधियों पर कर लगाया। कार्यशालाओं और औद्योगिक प्रतिष्ठानों के निजी मालिक विशिष्ट उद्योग कर (वरि-वसूली या व्यावसायिक कर) देते थे। कारीगरों, बुनकरों, लुहारों और अन्य शिल्पकारों पर ये शुल्क राज्य के गैर-कृषि राजस्व का एक महत्वपूर्ण घटक थे।
भारतीय इतिहास के मध्यकाल में बंजारे आम तौर पर थे -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — व्यापारी
बंजारे मध्यकाल में खानाबदोश व्यापारिक समुदाय थे जो नमक, अनाज और मवेशियों जैसे सामान को बैलगाड़ी के काफिलों (जिन्हें टांडा कहा जाता था) द्वारा लंबी दूरी तक ले जाते थे। वे भारतीय उपमहाद्वीप के आंतरिक व्यापार नेटवर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, उत्पादन केंद्रों और बाजारों के बीच माल की आवाजाही करते थे, और विशेष रूप से सैन्य अभियानों के दौरान सेनाओं की आपूर्ति में महत्वपूर्ण थे।
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| मध्यकालीन भारतीय राज्य | वर्तमान क्षेत्र |
|---|---|
| 1. चम्पक | मध्य भारत |
| 2. दुर्गर | जम्मू |
| 3. कुलूत | मालाबार |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
Detailed Explanation:
❌ युग्म 1 – गलत: चम्पक (चम्बा) वर्तमान हिमाचल प्रदेश में स्थित था, मध्य भारत में नहीं।
✅ युग्म 2 – सही: दुर्गर वर्तमान जम्मू क्षेत्र से मेल खाता है।
❌ युग्म 3 – गलत: कुलूत (कुल्लू) वर्तमान हिमाचल प्रदेश (कुल्लू घाटी) में स्थित था, मालाबार में नहीं; मालाबार भारत के दक्षिण-पश्चिमी तटीय क्षेत्र को संदर्भित करता है।
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से सामंती व्यवस्था के आवश्यक मूलभूत तत्व है/हैं?
- एक अत्यंत सशक्त केंद्रीकृत राजनीतिक सत्ता और एक अत्यंत दुर्बल प्रांतीय या स्थानीय राजनीतिक सत्ता
- भूमि के नियंत्रण और स्वामित्व पर आधारित प्रशासनिक संरचना का उद्भव
- सामंत और उसके अधिपति के बीच स्वामी-जागीरदार संबंध का सृजन
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
❌ कथन 1 – गलत: सामंतवाद की विशेषता कमजोर केंद्रीय सत्ता है जिसमें शक्ति क्षेत्रीय सामंतों के बीच विकेंद्रित होती है, न कि सशक्त केंद्रीकरण।
✅ कथन 2 – सही: भूमि नियंत्रण सामंतवाद की आर्थिक नींव है, जहां प्रशासनिक शक्ति औपचारिक नौकरशाही संरचनाओं के बजाय भूमि के स्वामित्व और नियंत्रण से प्राप्त होती है।
✅ कथन 3 – सही: स्वामी-जागीरदार संबंध एक परिभाषित विशेषता है, जिसमें सैन्य सेवा, निष्ठा और राजस्व के बदले भूमि अनुदान (जागीर) शामिल है, जो दायित्वों का पदानुक्रमित पिरामिड बनाता है।
निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
बाबर के भारत आगमन के परिणामस्वरूप:
- उपमहाद्वीप में बारूद की शुरुआत हुई
- क्षेत्र की स्थापत्य कला में मेहराब और गुंबद की शुरुआत हुई
- क्षेत्र में तैमूरी वंश की स्थापना हुई
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
❌ कथन 1 – गलत: बारूद भारत में 14वीं शताब्दी के मध्य से दिल्ली सल्तनत काल में पहले से ज्ञात था; बाबर ने बारूद नहीं, बल्कि बेहतर क्षेत्रीय तोपखाना प्रौद्योगिकी की शुरुआत की।
❌ कथन 2 – गलत: मेहराब और गुंबद की शुरुआत 13वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के तुर्कों द्वारा हुई थी; अलाई दरवाजा और कुतुब मीनार परिसर जैसे उदाहरण बाबर के आगमन से पहले के हैं।
✅ कथन 3 – सही: बाबर तैमूर के प्रत्यक्ष वंशज थे और उन्होंने इब्राहिम लोदी के विरुद्ध पानीपत की प्रथम लड़ाई (1526) में विजय के बाद भारत में तैमूरी वंश (मुगल साम्राज्य) की स्थापना की।