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भक्ति आंदोलन Previous Year Questions (PYQs)
Showing solved Previous Year Questions for Chapter: भक्ति आंदोलन
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हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री द्वारा हैदराबाद में बैठी हुई मुद्रा में रामानुज की विश्व की दूसरी सबसे ऊंची प्रतिमा का उद्घाटन किया गया। निम्नलिखित में से कौन सा कथन रामानुज की शिक्षाओं को सही ढंग से प्रस्तुत करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — मोक्ष का सर्वोत्तम साधन भक्ति था।
रामानुज (11वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी) एक प्रमुख वैष्णव दार्शनिक थे जिन्होंने विशिष्टाद्वैत (योग्य अद्वैतवाद) के दर्शन का प्रतिपादन किया। उनकी केंद्रीय शिक्षा इस बात पर बल देती थी कि मोक्ष सर्वोत्तम रूप से एक व्यक्तिगत ईश्वर (विष्णु/नारायण) के प्रति गहन भक्ति और दिव्य कृपा के माध्यम से प्राप्त होता है, न कि केवल ज्ञान या कर्मकांडीय प्रथाओं के माध्यम से।
✅ विकल्प 1 – सही: रामानुज की मूल शिक्षा यह थी कि भक्ति मोक्ष का सर्वोच्च मार्ग है, जो ईश्वर की कृपा से पूरक है।
❌ विकल्प 2 – गलत: यद्यपि रामानुज वेदों का सम्मान करते थे, यह कथन मीमांसा दर्शन या रूढ़िवादी वैदिक दर्शन के विचारों को अधिक सटीक रूप से दर्शाता है, न कि रामानुज की विशिष्ट शिक्षा को।
❌ विकल्प 3 – गलत: परम आनंद के लिए आवश्यक साधन के रूप में तार्किक तर्कों पर बल न्याय दर्शन की विशेषता है, न कि रामानुज के भक्ति-केंद्रित दृष्टिकोण की।
❌ विकल्प 4 – गलत: मोक्ष के प्राथमिक साधन के रूप में ध्यान पतंजलि के योग दर्शन या शंकर के अद्वैत वेदांत के साथ अधिक संरेखित है, न कि रामानुज के भक्ति मार्ग के साथ।
📝 संक्षिप्त नोट्स: रामानुज और विशिष्टाद्वैत दर्शन
- काल: 11वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग 1017-1137 ईस्वी)
- दर्शन: विशिष्टाद्वैत (योग्य अद्वैतवाद) - व्यक्तिगत आत्माएं और विश्व वास्तविक हैं और ब्रह्म के गुण हैं, लेकिन अलग रहते हैं
- मूल शिक्षा: मोक्ष के सर्वोच्च मार्ग के रूप में एक व्यक्तिगत ईश्वर (विष्णु) के प्रति भक्ति
- ईश्वर की अवधारणा: व्यक्तिगत ईश्वर (सगुण ब्रह्म) - विष्णु/नारायण गुणों के साथ, दोनों अतींद्रिय और अंतर्निहित
- मोक्ष का मार्ग: प्रपत्ति (आत्म-समर्पण) और भक्ति, ईश्वर की कृपा (प्रसाद) द्वारा सहायता प्राप्त
- प्रमुख कृतियाँ: श्री भाष्य (ब्रह्म सूत्र पर टीका), गीता भाष्य, वेदार्थ संग्रह
- प्रभाव: दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन को प्रेरित किया; सामाजिक समानता और मंदिर पूजा की पहुंच को बढ़ावा दिया
- शंकर से भिन्नता: शंकर के अद्वैत (निर्गुण ब्रह्म के साथ पूर्ण अद्वैतवाद) के विपरीत, रामानुज ने व्यक्तिगत आत्माओं और भौतिक जगत की वास्तविकता को ईश्वर के वास्तविक गुणों के रूप में स्वीकार किया
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- संत निम्बार्क अकबर के समकालीन थे।
- संत कबीर शेख अहमद सरहिंदी से अत्यधिक प्रभावित थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न तो 1 और न ही 2
दोनों कथनों में इन ऐतिहासिक धार्मिक व्यक्तित्वों की समयसीमा के संबंध में कालानुक्रमिक अशुद्धियाँ हैं। आइए प्रत्येक कथन का मूल्यांकन करें:
❌ कथन 1 – गलत: संत निम्बार्क 12वीं-13वीं शताब्दी में रहते थे (सटीक तिथियाँ विवादित हैं, लेकिन आम तौर पर 1130-1200 ईस्वी के बीच मानी जाती हैं), जबकि अकबर ने बहुत बाद में 1556 से 1605 ईस्वी तक शासन किया, जिससे उनके बीच लगभग 3-4 शताब्दियों का अंतर है।
❌ कथन 2 – गलत: संत कबीर 15वीं शताब्दी में रहते थे (लगभग 1440-1518 ईस्वी), जबकि शेख अहमद सरहिंदी (मुजद्दिद अल्फ सानी) 1564 से 1624 ईस्वी तक जीवित रहे, अर्थात कबीर सरहिंदी से पहले थे और उनसे प्रभावित नहीं हो सकते थे।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मध्यकालीन भक्ति संत और सूफी संत
| धार्मिक व्यक्तित्व | समय अवधि | प्रमुख योगदान |
|---|---|---|
| संत निम्बार्क | 12वीं-13वीं शताब्दी (लगभग 1130-1200 ईस्वी) | द्वैताद्वैत (द्वैतवादी अद्वैतवाद) दर्शन की स्थापना; कृष्ण-राधा उपासना पर बल; निम्बार्क संप्रदाय की स्थापना |
| संत कबीर | 15वीं शताब्दी (लगभग 1440-1518 ईस्वी) | भक्ति-सूफी समन्वय; कर्मकांड और जाति व्यवस्था की आलोचना; दोहों और भजनों की रचना; हिंदू और मुस्लिम दोनों परंपराओं को प्रभावित किया |
| अकबर (मुगल सम्राट) | 1556-1605 ईस्वी | धार्मिक सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध; कला और संस्कृति का संरक्षण; दीन-ए-इलाही को बढ़ावा दिया |
| शेख अहमद सरहिंदी | 1564-1624 ईस्वी | नक्शबंदी सूफी संत; रूढ़िवादी इस्लामी सुधारक; समन्वयवाद का विरोध; मुजद्दिद अल्फ सानी (दूसरे सहस्राब्दी के नवीनीकरणकर्ता) कहलाए |
- कालानुक्रमिक क्रम: निम्बार्क (12वीं-13वीं शती) → कबीर (15वीं शती) → अकबर (16वीं शती) → सरहिंदी (16वीं-17वीं शती)
- निम्बार्क का दर्शन: द्वैताद्वैत या भेदाभेद (भिन्नता और अभिन्नता) - आत्माएं और जगत दोनों ब्रह्म से भिन्न और अभिन्न हैं
- कबीर के प्रभाव: वे रामानंद जैसे पूर्ववर्ती भक्ति संतों और अपने समय में प्रचलित सूफी परंपराओं से प्रभावित थे, न कि सरहिंदी जैसे बाद के व्यक्तित्वों से
- सरहिंदी की स्थिति: उन्होंने अकबर के धार्मिक समन्वयवाद का विरोध किया और जहाँगीर के शासनकाल में रूढ़िवादी इस्लामी प्रथाओं को बहाल करने का कार्य किया
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