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ब्रिटिश शासन का आर्थिक प्रभाव Previous Year Questions (PYQs)
Showing solved Previous Year Questions for Chapter: ब्रिटिश शासन का आर्थिक प्रभाव
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हिल्टन-यंग कमीशन (1926) द्वारा निर्धारित कृत्रिम रूप से निर्धारित रुपया-स्टर्लिंग विनिमय दर को ब्रिटिश सरकार द्वारा निम्नलिखित में से किस कारण से अपनाया गया था?
Detailed Explanation:
हिल्टन-यंग आयोग (1926) ने रुपये और स्टर्लिंग के विनिमय दर को कृत्रिम रूप से 1 शिलिंग 6 पेंस प्रति रुपया पर निर्धारित करने की सिफारिश की थी।
ब्रिटिश सरकार ने इसे मुख्य रूप से होम चार्जेज़ (पेंशन, प्रशासनिक खर्च, ऋण भुगतान आदि) के लिए ब्रिटेन को धन भेजने में सुविधा और भारत की वित्तीय साख बनाए रखने के लिए अपनाया।
इसलिए विकल्प A सही उत्तर है।
| होम चार्जेज़ वे भुगतान थे जो औपनिवेशिक भारत को ब्रिटेन को करने पड़ते थे, जैसे प्रशासनिक खर्च, सेना का खर्च, पेंशन और ऋण पर ब्याज। मजबूत रुपये के कारण ब्रिटेन को स्टर्लिंग भेजने के लिए कम रुपये जुटाने पड़ते थे। हालांकि, इससे भारतीय निर्यातकों को नुकसान हुआ क्योंकि भारतीय वस्तुएँ विदेशी बाजार में महंगी हो गईं। |
कॉर्नवालिस द्वारा राजस्व संग्रह के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- राजस्व संग्रह के रैयतवारी बंदोबस्त के तहत, किसानों को खराब फसल या प्राकृतिक आपदाओं के मामले में राजस्व भुगतान से छूट दी गई थी।
- बंगाल में स्थायी बंदोबस्त के तहत, यदि जमींदार निश्चित तिथि पर या उससे पहले राज्य को अपना राजस्व देने में विफल रहता है, तो उसे उसकी जमींदारी से हटा दिया जाएगा।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ केवल 2
यह प्रश्न ब्रिटिश काल की भूमि-राजस्व व्यवस्थाओं पर आधारित है।
रैयतवाड़ी व्यवस्था में खराब फसल या प्राकृतिक आपदा होने पर कर से स्वतः छूट नहीं मिलती थी।
स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) में जमींदार को तय समय पर राजस्व जमा करना अनिवार्य था; ऐसा न करने पर उसकी जमींदारी नीलाम की जा सकती थी।
❌ कथन I गलत है: रैयतवाड़ी व्यवस्था में खराब फसल होने पर राजस्व भुगतान से कोई स्वचालित छूट नहीं थी।
✅ कथन II सही है: स्थायी बंदोबस्त में समय पर राजस्व न देने पर जमींदारी नीलाम या छीन ली जा सकती थी।
संक्षिप्त नोट्स: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी एवं महालवाड़ी व्यवस्था
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1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस ने बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लागू किया।
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इसमें राजस्व की राशि स्थायी रूप से निश्चित कर दी गई थी।
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सनसेट लॉ के अनुसार समय पर राजस्व न देने पर जमींदारी नीलाम हो सकती थी।
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रैयतवाड़ी व्यवस्था का विकास थॉमस मुनरो और अलेक्जेंडर रीड ने किया।
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इसमें सरकार का समझौता सीधे किसानों (रैयतों) से होता था।
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महालवाड़ी व्यवस्था उत्तर-पश्चिमी प्रांतों, पंजाब और मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों में लागू थी।
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इसमें राजस्व निर्धारण गांव या महाल के आधार पर किया जाता था।
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ब्रिटिश राजस्व व्यवस्थाओं के कारण किसानों पर अधिक कर बोझ पड़ा और ग्रामीण संकट बढ़ा।
भारत में नील की खेती 20वीं सदी की शुरुआत में गिरावट आई क्योंकि
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — नए आविष्कारों के कारण विश्व बाजार में इसकी अलाभकारिता
20वीं सदी की शुरुआत तक भारत में नील की खेती में गिरावट मुख्य रूप से जर्मनी में सिंथेटिक रंगों के आविष्कार (1880 के दशक) के कारण हुई, जो प्राकृतिक नील की तुलना में सस्ते, उत्पादन में आसान और गुणवत्ता में अधिक सुसंगत थे। इससे प्राकृतिक नील की वैश्विक मांग में गिरावट आई, जिससे भारत में बागान मालिकों के लिए इसकी खेती आर्थिक रूप से अव्यवहार्य हो गई। यद्यपि किसान प्रतिरोध (विशेष रूप से 1859-60 का नील विद्रोह) पहले हुआ था, गिरावट का निर्णायक कारक सिंथेटिक विकल्पों के कारण आर्थिक अप्रचलन था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में नील की खेती
- औपनिवेशिक नील प्रणाली: यूरोपीय बागान मालिकों ने तिनकठिया प्रणाली (भूमि का 3/20वां हिस्सा) और उत्पीड़क अनुबंधों के माध्यम से भारतीय किसानों को अपनी भूमि पर नील उगाने के लिए मजबूर किया।
- नील विद्रोह (1859-60): बंगाल में शोषक बागान मालिकों के खिलाफ किसान विद्रोह, जिसे मिशनरियों और बंगाली बुद्धिजीवियों का समर्थन मिला; सरकारी जांच (नील आयोग, 1860) की गई।
- चंपारण सत्याग्रह (1917): बिहार में नील बागान मालिकों के खिलाफ भारत में गांधी का पहला प्रमुख आंदोलन, जिसने तिनकठिया प्रणाली को समाप्त करने के लिए मजबूर किया।
- सिंथेटिक रंग (1880 के दशक): जर्मन रसायनज्ञ एडॉल्फ वॉन बेयर ने कृत्रिम रूप से नील का संश्लेषण किया; 1897 में BASF द्वारा वाणिज्यिक उत्पादन शुरू हुआ।
- आर्थिक प्रभाव: 1913 तक, सिंथेटिक नील बाजार में हावी हो गया; प्राकृतिक नील की खेती अलाभकारी हो गई और 1920 के दशक तक वस्तुतः समाप्त हो गई।
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निम्नलिखित में से कौन सा कथन उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत पर औद्योगिक क्रांति के प्रभाव की सही व्याख्या करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — भारतीय हस्तशिल्प बर्बाद हो गए
19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप सस्ते मशीन-निर्मित सामानों का बड़े पैमाने पर उत्पादन हुआ, जिसने भारतीय बाजारों को भर दिया। इसके फलस्वरूप भारत के परंपरागत कुटीर और हस्तशिल्प उद्योगों, विशेष रूप से वस्त्र उद्योग का विऔद्योगीकरण और विनाश हुआ, क्योंकि वे ब्रिटिश आयात के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके।
✅ कथन 1 – सही: ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के कारण सस्ते मशीन-निर्मित सामानों ने अनुचित प्रतिस्पर्धा के माध्यम से पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को नष्ट कर दिया।
❌ कथन 2 – गलत: 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारतीय वस्त्र उद्योग में बड़ी संख्या में मशीनें नहीं लगाई गईं; आयातित मशीनरी वाली आधुनिक मिलें केवल 1850 के दशक में बॉम्बे और अहमदाबाद जैसे शहरों में उभरनी शुरू हुईं।
❌ कथन 3 – गलत: 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में देश के कई हिस्सों में रेलवे लाइनें नहीं बिछाई गईं; पहली रेलवे लाइन (बॉम्बे-ठाणे) का उद्घाटन केवल 1853 में हुआ, और महत्वपूर्ण विस्तार केवल शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुआ।
❌ कथन 4 – गलत: ब्रिटिश आयात पर भारी शुल्क नहीं लगाया गया; बल्कि, ब्रिटिश सामानों को भारतीय बाजारों में शुल्क-मुक्त या कम शुल्क की सुविधा प्राप्त थी, जबकि भारतीय सामानों को ब्रिटेन में उच्च टैरिफ का सामना करना पड़ता था, जिससे असमान व्यापार संबंध बने।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत पर औद्योगिक क्रांति का आर्थिक प्रभाव
| पहलू | भारत पर प्रभाव (19वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध) |
|---|---|
| विऔद्योगीकरण | पारंपरिक हस्तशिल्प और कुटीर उद्योग (विशेषकर वस्त्र) सस्ते ब्रिटिश मशीन-निर्मित सामानों की प्रतिस्पर्धा के कारण नष्ट हो गए |
| व्यापार नीति | असमान व्यापार: ब्रिटिश सामान शुल्क-मुक्त या कम शुल्क के साथ भारत में प्रवेश करते थे, जबकि भारतीय निर्यात को ब्रिटेन में उच्च टैरिफ का सामना करना पड़ता था |
| धन का निष्कासन | भारत से कच्चा माल सस्ते दामों पर निर्यात; तैयार माल ऊंची कीमतों पर आयात, जिससे आर्थिक निष्कासन हुआ |
| औद्योगिक विकास | इस अवधि में भारत में न्यूनतम मशीनीकरण; पहली आधुनिक वस्त्र मिलें केवल 1850 के दशक में उभरीं (बॉम्बे, अहमदाबाद) |
| बुनियादी ढांचा | रेलवे विकास की शुरुआत केवल 1853 में हुई (बॉम्बे-ठाणे लाइन); बड़ा विस्तार 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुआ |
| शिल्पकार वर्ग | लाखों बुनकरों, कताई करने वालों और शिल्पकारों ने अपनी आजीविका खो दी और कृषि की ओर मुड़ने को मजबूर हुए, जिससे ग्रामीण गरीबी बढ़ी |
18वीं सदी के मध्य में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बंगाल से निर्यात की जाने वाली मुख्य वस्तुएँ थीं -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कपास, रेशम, शोरा और अफीम
18वीं सदी के मध्य में, बंगाल मुगल साम्राज्य का सबसे समृद्ध प्रांत था और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक संचालन का प्राथमिक केंद्र था। इस अवधि के दौरान बंगाल से मुख्य निर्यात वस्तुएँ कपास और रेशम के वस्त्र (बंगाल के विश्व-प्रसिद्ध मलमल और रेशमी कपड़े), शोरा (यूरोपीय युद्धों के दौरान बारूद निर्माण के लिए आवश्यक), और अफीम (मुख्य रूप से चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया को निर्यात) थीं। ये चार वस्तुएँ बंगाल से कंपनी के अत्यधिक लाभकारी व्यापार की रीढ़ थीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: बंगाल से ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार (18वीं सदी के मध्य)
- कपास और रेशम के वस्त्र: बंगाल के उत्कृष्ट मलमल, रेशमी कपड़े और अन्य वस्त्र यूरोपीय और एशियाई बाजारों में सबसे मूल्यवान निर्यात थे। मुर्शिदाबाद, ढाका और कासिमबाजार जैसे शहर प्रमुख वस्त्र केंद्र थे।
- शोरा (पोटैशियम नाइट्रेट): बारूद उत्पादन में प्रयुक्त एक महत्वपूर्ण रणनीतिक वस्तु। बंगाल 18वीं सदी के बार-बार होने वाले युद्धों के दौरान यूरोप की अधिकांश शोरा आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। कंपनी का शोरा व्यापार पर वस्तुतः एकाधिकार था।
- अफीम: मुख्य रूप से बिहार और बंगाल में उत्पादित, अफीम चीन के साथ व्यापार के लिए तेजी से महत्वपूर्ण हो गई। यद्यपि कंपनी ने 1773 में अपना अफीम एकाधिकार औपचारिक किया, लेकिन यह मध्य-सदी तक पहले से ही एक महत्वपूर्ण निर्यात था।
- व्यापार की दिशा: भारत कीमती धातुओं (सोना, चाँदी, ताँबा) का शुद्ध आयातक था क्योंकि यूरोपीय लोग भारतीय वस्तुओं के लिए सिक्कों से भुगतान करते थे। इससे विकल्प 3 गलत हो जाता है—धातुएँ भारत से बाहर नहीं, बल्कि भारत में आती थीं।
- अन्य वस्तुएँ: चीनी और नील का भी निर्यात किया जाता था लेकिन वे चार मुख्य वस्तुओं जितने प्रभावी नहीं थे। कच्ची कपास (विकल्प 1) 19वीं सदी में औद्योगीकरण के दौरान अधिक महत्वपूर्ण हो गई।
आर्थिक रूप से, 19वीं शताब्दी में भारत में ब्रिटिश शासन के परिणामों में से एक था -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — भारतीय कृषि का व्यावसायीकरण
19वीं शताब्दी में भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति ने जानबूझकर पारंपरिक निर्वाह कृषि को वाणिज्यिक कृषि में परिवर्तित कर दिया, जो नील, कपास, चाय और अफीम जैसी नकदी फसलों पर केंद्रित थी, ताकि ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल के रूप में सेवा की जा सके। इस व्यावसायीकरण ने भारतीय कृषि को वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में एकीकृत करके ब्रिटिश साम्राज्य के आर्थिक हितों की सेवा की, जबकि साथ ही पारंपरिक हस्तशिल्प को नष्ट किया और भारत में औद्योगिक विकास को रोका।
❌ विकल्प 1 – गलत: ब्रिटिश नीतियों के कारण भारतीय हस्तशिल्प में भारी गिरावट आई जो मशीन-निर्मित वस्तुओं का पक्ष लेती थी, जिससे निर्यात में कमी आई।
❌ विकल्प 2 – गलत: 19वीं शताब्दी में भारतीय स्वामित्व वाले कारखानों में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई; ब्रिटिश नीतियों ने भारतीय औद्योगीकरण को सक्रिय रूप से हतोत्साहित किया।
✅ विकल्प 3 – सही: कृषि का व्यावसायीकरण कच्चे माल निकालने के लिए ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण का प्रत्यक्ष परिणाम था।
❌ विकल्प 4 – गलत: 19वीं शताब्दी में भारत में तेजी से शहरी विकास के बजाय विऔद्योगीकरण और ग्रामीणीकरण देखा गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन का आर्थिक प्रभाव
| पहलू | प्रभाव |
|---|---|
| कृषि का व्यावसायीकरण | खाद्य फसलों से नकदी फसलों (नील, कपास, चाय, अफीम) में बदलाव; किसानों को वाणिज्यिक फसलें उगाने के लिए मजबूर किया गया; भूमि राजस्व की मांग में वृद्धि; अकालों के प्रति संवेदनशीलता पैदा की |
| विऔद्योगीकरण | पारंपरिक हस्तशिल्प और कारीगर उद्योगों का विनाश; भारतीय वस्त्रों को ब्रिटिश मशीन-निर्मित वस्तुओं द्वारा प्रतिस्थापित किया गया; कारीगरों ने अपनी आजीविका खो दी |
| धन का निष्कासन | भारत से ब्रिटेन में संसाधनों का व्यवस्थित स्थानांतरण; संबंधित आयात के बिना निर्यात अधिशेष; गृह शुल्क और श्रद्धांजलि भुगतान |
| भूमि राजस्व प्रणालियाँ | स्थायी बंदोबस्त (1793), रैयतवाड़ी, महलवाड़ी प्रणालियाँ; उच्च राजस्व मांगों के कारण किसानों का कर्ज बढ़ा; साहूकारों और अनुपस्थित जमींदारी का विकास |
| बुनियादी ढांचे का विकास | रेलवे मुख्य रूप से कच्चे माल निष्कर्षण और सैनिकों की आवाजाही के लिए बनाई गई; सीमित औद्योगिक विकास; निर्यात व्यापार के लिए बंदरगाहों का विकास |
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में रैयतवाड़ी बंदोबस्त की शुरुआत के साथ निम्नलिखित में से कौन संबद्ध था/थे?
- लॉर्ड कॉर्नवालिस
- अलेक्जेंडर रीड
- थॉमस मुनरो
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 2 और 3
रैयतवाड़ी बंदोबस्त ब्रिटिश भारत में एक भू-राजस्व प्रणाली थी जिसमें सीधे कृषकों (रैयतों) के साथ बंदोबस्त किया जाता था। अलेक्जेंडर रीड ने पहली बार 1792 में मद्रास प्रेसीडेंसी के बारामहल जिले में इस प्रणाली को प्रायोगिक रूप से शुरू किया, और थॉमस मुनरो ने बाद में इसे परिष्कृत किया और मद्रास प्रेसीडेंसी में विस्तारित किया, जिससे वे इस प्रणाली के प्रमुख वास्तुकार बने।
❌ कथन 1 – गलत: लॉर्ड कॉर्नवालिस ने 1793 में बंगाल और बिहार में स्थायी बंदोबस्त (जमींदारी प्रणाली) की शुरुआत की, रैयतवाड़ी बंदोबस्त की नहीं।
✅ कथन 2 – सही: कैप्टन अलेक्जेंडर रीड ने तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद 1792 में बारामहल जिले (मद्रास प्रेसीडेंसी) में पहली बार रैयतवाड़ी प्रणाली शुरू की।
✅ कथन 3 – सही: थॉमस मुनरो ने रैयतवाड़ी प्रणाली को परिष्कृत और अधिकांश मद्रास प्रेसीडेंसी में विस्तारित किया और बाद में मद्रास के गवर्नर (1820–1827) बने, इस भू-राजस्व प्रणाली के प्रमुख वास्तुकार के रूप में स्थापित हुए।
निम्नलिखित में से कौन भारत में उपनिवेशवाद का/के आर्थिक आलोचक था/थे?
- दादाभाई नौरोजी
- सुब्रमण्यम अय्यर
- आर.सी. दत्त
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: दादाभाई नौरोजी, जिन्हें 'भारत का ग्रैंड ओल्ड मैन' कहा जाता है, ने 'धन के निष्कासन' सिद्धांत की शुरुआत की और 'पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया' (1901) लिखी, जिसमें बताया कि ब्रिटिश नीतियों ने भारत को गरीब बनाया।
✅ कथन 2 – सही: जी. सुब्रमण्यम अय्यर, 'द हिंदू' के सह-संस्थापक, ने 'सम इकोनॉमिक एस्पेक्ट्स ऑफ ब्रिटिश रूल इन इंडिया' (1903) लिखी, जिसमें औपनिवेशिक आर्थिक शोषण और ठहराव की आलोचना की।
✅ कथन 3 – सही: आर.सी. दत्त, सेवानिवृत्त ICS अधिकारी, ने 'द इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया' (1902, 1904) लिखी, जिसमें ब्रिटिश भू-राजस्व प्रणाली और व्यापार नीतियों के नकारात्मक प्रभाव का दस्तावेजीकरण किया।
रैयतवाड़ी बंदोबस्त के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- किराया सीधे किसानों द्वारा सरकार को दिया जाता था।
- सरकार ने रैयतों को पट्टे दिए।
- भूमि पर कर लगाने से पहले उनका सर्वेक्षण और निर्धारण किया गया था।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: रैयतवाड़ी बंदोबस्त के तहत, किसान (रैयत) भूमि राजस्व सीधे सरकार को देते थे, जमींदारों जैसे बिचौलियों को समाप्त करते हुए।
✅ कथन 2 – सही: सरकार ने रैयतों को पट्टे (भूमि स्वामित्व दस्तावेज) जारी किए, उन्हें भूमि के मालिक के रूप में मान्यता दी।
✅ कथन 3 – सही: कराधान से पहले भूमि का सर्वेक्षण और निर्धारण व्यक्तिगत रूप से किया गया था, दरें मिट्टी की गुणवत्ता और फसल के प्रकार के आधार पर भिन्न होती थीं।