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जनजातीय, किसान एवं जनविद्रोह Previous Year Questions (PYQs)
Showing solved Previous Year Questions for Chapter: जनजातीय, किसान एवं जनविद्रोह
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एका आंदोलन और बारदोली सत्याग्रह के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
बारडोली सत्याग्रह (1928), जिसका नेतृत्व Vallabhbhai Patel ने किया था, ब्रिटिश सरकार द्वारा भूमि राजस्व में 22% वृद्धि के विरोध में चलाया गया था।
एका आंदोलन (1921–22), जिसका नेतृत्व Madari Pasi ने किया, अवध के किसानों का अत्यधिक लगान, अवैध वसूली और जमींदारों के शोषण के खिलाफ आंदोलन था।
इसलिए विकल्प C सही उत्तर है।
| एका आंदोलन अवध क्षेत्र का किसान आंदोलन था, जिसका उद्देश्य किसानों को अत्यधिक किराये और शोषण से राहत दिलाना था। |
| बारडोली सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अहिंसक किसान आंदोलन था। इसकी सफलता के बाद वल्लभभाई पटेल को "सरदार" की उपाधि मिली। |
भारत के इतिहास के संदर्भ में, उलगुलान या महान उथल-पुथल निम्नलिखित में से किस घटना का विवरण है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — बिरसा मुंडा का 1899-1900 का विद्रोह
"उलगुलान" शब्द जिसका अर्थ है "महान उथल-पुथल", विशेष रूप से छोटानागपुर क्षेत्र की मुंडा जनजातियों के बीच 1899-1900 के दौरान बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए विद्रोह को संदर्भित करता है। यह विद्रोह ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन और शोषणकारी जागीरदारी प्रणाली के खिलाफ था, जिसने मुंडाओं की पारंपरिक सामूहिक भूमि स्वामित्व प्रणाली को नष्ट कर दिया था। बिरसा मुंडा ने "अबुआ राज सेतेर जाना, महारानी राज टुंडु जाना" (रानी का राज समाप्त हो और हमारा राज स्थापित हो) की घोषणा की, जिससे यह स्वशासन और आदिवासी अधिकारों की बहाली का आंदोलन बन गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में प्रमुख आदिवासी विद्रोह
| विद्रोह | वर्ष | नेता | क्षेत्र | प्रमुख विशेषताएं |
|---|---|---|---|---|
| उलगुलान (महान उथल-पुथल) | 1899-1900 | बिरसा मुंडा | छोटानागपुर (झारखंड) | ब्रिटिश और जागीरदारी प्रणाली के विरुद्ध; मुंडा राज की घोषणा |
| संथाल विद्रोह | 1855-56 | सिद्धू-कान्हू | राजमहल पहाड़ियां (बिहार-बंगाल) | जमींदारों और साहूकारों के विरुद्ध |
| कोल विद्रोह | 1831-32 | बुद्धो भगत | छोटानागपुर | बाहरी लोगों को भूमि हस्तांतरण के विरुद्ध |
| खोंड विद्रोह | 1846-55 | चक्र बिसोई | ओडिशा पहाड़ियां | नरबलि दमन और भूमि अलगाव के विरुद्ध |
| रम्पा विद्रोह | 1922-24 | अल्लूरी सीताराम राजू | आंध्र प्रदेश | वन कानूनों और बेगार के विरुद्ध |
संथाल विद्रोह के शांत होने के बाद, औपनिवेशिक सरकार द्वारा क्या उपाय किए गए थे?
- 'संथाल परगना' नामक क्षेत्र बनाए गए।
- एक संथाल के लिए भूमि को गैर-संथाल को हस्तांतरित करना अवैध हो गया।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद, औपनिवेशिक सरकार ने क्षेत्र को शांत करने और कुछ शिकायतों को दूर करने के लिए प्रशासनिक और कानूनी उपाय किए। दोनों कथन ब्रिटिश प्रशासन द्वारा अपनाए गए उपायों को सही ढंग से दर्शाते हैं।
✅ कथन 1 – सही: संथाल समुदाय को अधिक प्रत्यक्ष रूप से अलग करने और शासन करने के लिए 1855 में संथाल परगना जिले को एक अलग प्रशासनिक इकाई के रूप में बनाया गया था।
✅ कथन 2 – सही: 1876 के संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम ने संथालों के लिए गैर-संथालों (बाहरी लोगों/दिकुओं) को भूमि हस्तांतरित करना अवैध बना दिया, जिससे उन्हें साहूकारों और जमींदारों द्वारा शोषण से बचाया गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संथाल विद्रोह (1855-56)
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| नेता | सिद्धू, कान्हू, चाँद और भैरव मुर्मू |
| क्षेत्र | राजमहल पहाड़ियाँ (वर्तमान झारखंड) |
| कारण | जमींदारों, साहूकारों (दिकुओं) द्वारा शोषण, उत्पीड़नकारी राजस्व नीतियाँ, भूमि हस्तांतरण |
| प्रकृति | ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता की घोषणा करते हुए और संथाल शासन स्थापित करते हुए सशस्त्र विद्रोह |
| दमन | ब्रिटिश सेना द्वारा क्रूरतापूर्वक दबाया गया; हजारों संथाल मारे गए |
| विद्रोह के बाद के उपाय | • संथाल परगना जिले का निर्माण (1855) • संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (1876) - गैर-संथालों को भूमि हस्तांतरण प्रतिबंधित • गैर-विनियमन प्रशासनिक प्रणाली की शुरुआत |
| महत्व | पहले संगठित आदिवासी प्रतिरोधों में से एक; बाद के आदिवासी आंदोलनों को प्रेरित किया |
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1929 के व्यापार विवाद अधिनियम (Trade Disputes Act) ने किसके लिए प्रावधान किया -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न्यायाधिकरणों की एक प्रणाली और हड़तालों पर प्रतिबंध।
1929 के व्यापार विवाद अधिनियम को ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा भारत में औद्योगिक विवादों को विनियमित करने के लिए अधिनियमित किया गया था। इसने नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच संघर्षों की जांच और मध्यस्थता के लिए जांच न्यायालयों और सुलह बोर्डों (न्यायाधिकरणों) के माध्यम से एक औपचारिक तंत्र स्थापित किया। महत्वपूर्ण रूप से, अधिनियम ने हड़तालों पर कठोर प्रतिबंध लगाए: इसने सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं (रेलवे, डाक सेवाएं, जल आपूर्ति, आदि) में 14 दिनों की पूर्व सूचना के बिना हड़तालों पर प्रतिबंध लगा दिया, और आम हड़तालों और राजनीतिक हड़तालों को अवैध घोषित कर दिया। यह कानून मुख्य रूप से बढ़ते ट्रेड यूनियन आंदोलन को नियंत्रित करने और बड़े पैमाने पर श्रम अशांति को रोकने के उद्देश्य से था जो ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दे सकती थी।
बंगाल में तेभागा किसान आंदोलन की मांग थी:
Detailed Explanation:
तेभागा आंदोलन (1946-47) बंगाल में किसान सभा के नेतृत्व में एक किसान आंदोलन था।
मुख्य मांग थी जमींदारों का हिस्सा आधे (50%) से घटाकर एक-तिहाई (33%) करना, जिससे बटाईदार (बरगादार) फसल का दो-तिहाई हिस्सा रख सकें।