UPSC CSE Prelims
भारतीय राजव्यवस्था Previous Year Questions (PYQs)
Solved Previous Year Questions (PYQs) for भारतीय राजव्यवस्था in UPSC CSE Prelims in English & Hindi Medium.
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निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
I. यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या लोक सभा का कोई सदस्य दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का विषय बन गया है, तो केंद्रीय मंत्रिपरिषद की राय के अनुसार राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होगा।
II. भारत के संविधान में 'राजनीतिक दल' शब्द का कोई उल्लेख नहीं है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
दोनों कथन सही नहीं हैं। दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के तहत सांसद की अयोग्यता का निर्णय लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) या राज्यसभा सभापति (Chairman) करते हैं, राष्ट्रपति नहीं।
इसके अलावा, "Political Party" शब्द संविधान की दसवीं अनुसूची में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है।
कथन गलत क्यों हैं:
| कथन | स्थिति | कारण |
|---|---|---|
| I | ❌ गलत | अयोग्यता का निर्णय स्पीकर/चेयरमैन लेते हैं, राष्ट्रपति नहीं। |
| II | ❌ गलत | "Political Party" शब्द दसवीं अनुसूची में मौजूद है। |
📝 संक्षिप्त नोट्स: दल-बदल विरोधी कानून
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| जोड़ा गया | 52वाँ संविधान संशोधन, 1985 |
| संबंधित प्रावधान | दसवीं अनुसूची |
| निर्णय लेने वाला | लोकसभा अध्यक्ष / राज्यसभा सभापति |
| उद्देश्य | राजनीतिक दल-बदल को रोकना |
| अयोग्यता का आधार | पार्टी छोड़ना या व्हिप का उल्लंघन |
त्वरित तथ्य:
दल-बदल विरोधी कानून का उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा बार-बार पार्टी बदलने से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता को रोकना है।
लोकपाल के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
I. लोकपाल की शक्तियाँ भारत के लोक सेवकों पर लागू होती हैं, लेकिन भारत के बाहर तैनात भारतीय लोक सेवकों पर नहीं।
II. अध्यक्ष या सदस्य संसद का सदस्य या किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विधानमंडल का सदस्य नहीं होगा, और केवल भारत के मुख्य न्यायाधीश, चाहे मौजूदा या सेवानिवृत्त हों, को इसका अध्यक्ष होना चाहिए।
III. जैसा भी मामला हो, अध्यक्ष या सदस्य के रूप में पदभार ग्रहण करने की तिथि पर अध्यक्ष या सदस्य पैंतालीस वर्ष से कम आयु का व्यक्ति नहीं होगा।
IV. लोकपाल भारत के मौजूदा प्रधान मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच नहीं कर सकता।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के तहत लोकपाल एक राष्ट्रीय भ्रष्टाचार-निरोधक संस्था है। यह सार्वजनिक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कर सकता है, और कुछ शर्तों के साथ प्रधानमंत्री भी इसके दायरे में आते हैं।
केवल कथन III सही है क्योंकि लोकपाल का अध्यक्ष या सदस्य बनने के लिए व्यक्ति की आयु कम से कम 45 वर्ष होनी चाहिए।
अन्य कथन गलत क्यों हैं:
| कथन | स्थिति | कारण |
|---|---|---|
| I | ❌ गलत | लोकपाल का अधिकार क्षेत्र विदेश में तैनात भारतीय लोक सेवकों पर भी लागू होता है। |
| II | ❌ गलत | केवल CJI ही अध्यक्ष नहीं बन सकते; पूर्व न्यायाधीश या प्रतिष्ठित व्यक्ति भी नियुक्त हो सकते हैं। |
| III | ✅ सही | अध्यक्ष या सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 45 वर्ष है। |
| IV | ❌ गलत | लोकपाल कुछ शर्तों और सुरक्षा प्रावधानों के साथ वर्तमान प्रधानमंत्री की भी जांच कर सकता है। |
📝 संक्षिप्त नोट्स: लोकपाल
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 |
| उद्देश्य | भ्रष्टाचार की जांच |
| न्यूनतम आयु | 45 वर्ष |
| अधिकार क्षेत्र | सार्वजनिक सेवक एवं कुछ मामलों में प्रधानमंत्री |
| अध्यक्ष | पूर्व CJI, सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश या प्रतिष्ठित व्यक्ति |
| सदस्य | न्यायिक एवं गैर-न्यायिक सदस्य |
त्वरित तथ्य:
लोकपाल में एक अध्यक्ष और अधिकतम 8 सदस्य हो सकते हैं, जिनमें कम से कम 50% सदस्य SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक या महिलाओं में से होते हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
कथन I: भारत में, राज्य सरकारों के पास लघु खनिजों के निष्कर्षण के संबंध में रियायतें देने के लिए नियम बनाने की कोई शक्ति नहीं है, भले ही ऐसे खनिज उनके क्षेत्रों में स्थित हों।
कथन II: भारत में, केंद्र सरकार के पास संबंधित कानून के तहत लघु खनिजों को अधिसूचित करने की शक्ति है।
उपरोक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
खनिज और खदान (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR Act) के तहत राज्य सरकारों को लघु खनिजों (Minor Minerals) के लिए पट्टे और अन्य रियायतों से संबंधित नियम बनाने का अधिकार है।
वहीं केंद्र सरकार यह निर्धारित करती है कि कौन-से खनिज लघु खनिज (Minor Minerals) की श्रेणी में आएंगे।
कथन सही/गलत क्यों हैं:
| कथन | स्थिति | कारण |
|---|---|---|
| I | ❌ गलत | राज्य सरकारों को लघु खनिजों के लिए रियायत संबंधी नियम बनाने का अधिकार है। |
| II | ✅ सही | केंद्र सरकार लघु खनिजों की अधिसूचना जारी करती है। |
याद रखने की ट्रिक:
"वर्गीकरण केंद्र का, नियमन राज्य का।" → केंद्र खनिज को Minor Mineral घोषित करता है, राज्य उसके उपयोग और खनन को नियंत्रित करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लघु खनिज (Minor Minerals)
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| संबंधित कानून | MMDR Act, 1957 |
| वर्गीकरण का अधिकार | केंद्र सरकार |
| रियायत/पट्टा नियम | राज्य सरकार |
| उदाहरण | रेत, बजरी, मिट्टी, साधारण पत्थर |
| उपयोग | निर्माण कार्य और स्थानीय खनन |
त्वरित तथ्य:
लघु खनिजों का प्रशासन मुख्य रूप से राज्य सरकारें करती हैं, लेकिन उन्हें "लघु खनिज" घोषित करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होता है।
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निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
I. लोक सभा के विघटन पर, अध्यक्ष विघटन के बाद लोक सभा की पहली बैठक से ठीक पहले तक अपना कार्यालय खाली नहीं करेगा।
II. भारत के संविधान के प्रावधानों के अनुसार, लोक सभा के एक सदस्य को अध्यक्ष के रूप में चुने जाने पर तुरंत अपने राजनीतिक दल से इस्तीफा देना होगा।
III. लोक सभा के अध्यक्ष को लोक सभा के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित एक प्रस्ताव द्वारा उसके कार्यालय से हटाया जा सकता है, बशर्ते कि कोई भी प्रस्ताव तब तक पेश नहीं किया जाएगा जब तक कि प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के इरादे से कम से कम चौदह दिन का नोटिस न दिया गया हो।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
लोकसभा भंग होने के बाद भी स्पीकर अपने पद पर बने रहते हैं और नई लोकसभा की पहली बैठक से ठीक पहले पद छोड़ते हैं। साथ ही, स्पीकर को हटाने के लिए लोकसभा में 14 दिन की पूर्व सूचना के साथ बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है।
लेकिन संविधान में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि स्पीकर बनने पर सदस्य को अपनी राजनीतिक पार्टी से इस्तीफा देना होगा। यह केवल निष्पक्षता की एक परंपरा है।
अन्य कथन क्यों गलत हैं:
| कथन | स्थिति | कारण |
|---|---|---|
| I | ✅ सही | लोकसभा भंग होने के बाद भी स्पीकर पद पर बने रहते हैं। |
| II | ❌ गलत | पार्टी से इस्तीफा देना संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है। |
| III | ✅ सही | 14 दिन की सूचना और सदन के बहुमत से हटाया जा सकता है। |
📝 संक्षिप्त नोट्स: लोकसभा अध्यक्ष (Speaker)
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| संबंधित अनुच्छेद | अनुच्छेद 93 एवं 94 |
| चुनाव | लोकसभा के सदस्य करते हैं |
| कार्यकाल | नई लोकसभा की पहली बैठक तक जारी रहता है |
| हटाने की प्रक्रिया | सदन के बहुमत से |
| पूर्व सूचना | 14 दिन |
| पार्टी छोड़ना | संविधान में अनिवार्य नहीं |
त्वरित तथ्य:
लोकसभा अध्यक्ष से निष्पक्ष रहने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन भारतीय संविधान उन्हें पार्टी सदस्यता छोड़ने के लिए बाध्य नहीं करता।
भारत सरकार के संदर्भ में निम्नलिखित जानकारी पर विचार करें:
With reference to the Government of India, consider the following information:
| संगठन | इसके कुछ कार्य | अंतर्गत काम करता है |
|---|---|---|
| Directorate of Enforcement | Enforcement of the Fugitive Economic Offenders Act, 2018 | Internal Security Division-I, Ministry of Home Affairs |
| Directorate of Revenue Intelligence | Enforces the provisions of the Customs Act, 1962 | Department of Revenue, Ministry of Finance |
| Directorate General of Systems and Data Management | Carrying out big data analytics to assist tax officers for better policy and nabbing tax evaders | Department of Revenue, Ministry of Finance |
In how many of the above rows is the information correctly matched?
उपरोक्त पंक्तियों में से कितनी पंक्तियों में जानकारी सही ढंग से मेल खाती है?
Detailed Explanation:
❌ पंक्ति 1 गलत है: प्रवर्तन निदेशालय (ED) Fugitive Economic Offenders Act, 2018 को लागू करता है, लेकिन यह गृह मंत्रालय के नहीं बल्कि वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अंतर्गत कार्य करता है।
✅ पंक्ति 2 सही है: राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) Customs Act, 1962 के प्रावधानों को लागू करता है और वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अंतर्गत कार्य करता है।
❌ पंक्ति 3 गलत है: DGSDM का मुख्य कार्य CBIC की IT प्रणालियों का संचालन और रखरखाव है। कर चोरी पकड़ने के लिए Big Data Analytics का कार्य DGARM करता है।
अतः केवल एक पंक्ति सही मिलान है।
अन्य पंक्तियाँ गलत क्यों हैं:
| पंक्ति | कारण |
|---|---|
| पंक्ति 1 | ED गृह मंत्रालय नहीं, बल्कि वित्त मंत्रालय के अधीन है |
| पंक्ति 3 | बिग डेटा एनालिटिक्स DGARM का कार्य है, DGSDM का नहीं |
निम्नलिखित गतिविधियों पर विचार करें:
I. कच्चे तेल का उत्पादन
II. पेट्रोलियम उत्पादों का शोधन, भंडारण और वितरण
III. पेट्रोलियम उत्पादों का विपणन और बिक्री
IV. प्राकृतिक गैस का उत्पादन
उपरोक्त में से कितनी गतिविधियाँ हमारे देश में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड द्वारा विनियमित हैं?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 2 (केवल दो)
Petroleum and Natural Gas Regulatory Board (PNGRB) मुख्य रूप से पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस क्षेत्र की डाउनस्ट्रीम गतिविधियों को नियंत्रित करता है। यह कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन जैसी अपस्ट्रीम गतिविधियों को नियंत्रित नहीं करता।
❌ गतिविधि I: कच्चे तेल का उत्पादन – PNGRB द्वारा विनियमित नहीं
यह एक अपस्ट्रीम गतिविधि है, जिसका नियमन मंत्रालय और Directorate General of Hydrocarbons द्वारा किया जाता है।
✅ गतिविधि II: पेट्रोलियम उत्पादों का परिशोधन, भंडारण और वितरण – विनियमित
PNGRB भंडारण, परिवहन और वितरण से संबंधित गतिविधियों का नियमन करता है।
✅ गतिविधि III: पेट्रोलियम उत्पादों का विपणन और बिक्री – विनियमित
PNGRB विपणन के लिए संस्थाओं को अनुमति देता है और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है।
❌ गतिविधि IV: प्राकृतिक गैस का उत्पादन – PNGRB द्वारा विनियमित नहीं
यह भी एक अपस्ट्रीम गतिविधि है और PNGRB के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
अतः केवल II और III गतिविधियां PNGRB द्वारा विनियमित होती हैं।
संक्षिप्त नोट्स: पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड (PNGRB)
-
PNGRB की स्थापना PNGRB Act, 2006 के तहत हुई।
-
यह पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के डाउनस्ट्रीम क्षेत्र का नियमन करता है।
-
इसका उद्देश्य निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना है।
-
यह पाइपलाइन, सिटी गैस वितरण, भंडारण और परिवहन को नियंत्रित करता है।
-
यह अन्वेषण (Exploration) और उत्पादन (Production) को नियंत्रित नहीं करता।
-
अपस्ट्रीम गतिविधियों की देखरेख DGH और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय करते हैं।
-
यह उपभोक्ता हितों की रक्षा और ऊर्जा अवसंरचना में निवेश को बढ़ावा देता है।
भारत के 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
I. इसने शैक्षिक परिणामों को बढ़ाने के लिए राज्यों को प्रोत्साहित करने के लिए वर्ष 2022-23 से वर्ष 2025-26 तक ₹4,800 करोड़ के अनुदान की सिफारिश की है।
II. केंद्रीय करों की शुद्ध आय का 45% राज्यों के साथ साझा किया जाना है।
III. कृषि सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए सभी राज्यों के लिए प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन के रूप में ₹45,000 करोड़ रखे जाने हैं।
IV. इसने राजकोषीय प्रदर्शन को पुरस्कृत करने के लिए कर प्रयास मानदंड को फिर से प्रस्तुत किया।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके सही उत्तर चुनें।
Detailed Explanation:
Correct Answer: ✅ Option 3 (I, III and IV)
The Fifteenth Finance Commission recommended several performance-based grants and incentives to improve governance, education, agriculture, and fiscal discipline among States.
✅ Statement I is Correct: The Commission recommended ₹4,800 crore during 2022–23 to 2025–26 to incentivize States for improving educational outcomes.
❌ Statement II is Incorrect: The Commission recommended that 41% of the net proceeds of Union taxes be devolved to States, not 45%.
✅ Statement III is Correct: A ₹45,000 crore performance-based incentive fund was proposed to encourage States to undertake agricultural reforms.
✅ Statement IV is Correct: The Commission reintroduced the Tax Effort Criterion to reward States that mobilize their own tax revenues more effectively relative to their economic capacity.
Short Notes: Fifteenth Finance Commission
-
The 15th Finance Commission was chaired by N. K. Singh.
-
Its recommendations covered the period 2021–26.
-
It recommended 41% tax devolution to States.
-
Introduced performance-based incentives in sectors like education, agriculture, and power reforms.
-
Recommended ₹45,000 crore for agricultural reform-linked incentives.
-
Reintroduced the Tax Effort criterion in the devolution formula.
-
Finance Commissions are constituted under Article 280 of the Indian Constitution.
भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित जोड़ियों पर विचार करें:
| Organization | Union Ministry |
|---|---|
| I. The National Automotive Board | Ministry of Commerce and Industry |
| II. The Coir Board | Ministry of Heavy Industries |
| III. The National Centre for Trade Information | Ministry of Micro, Small and Medium Enterprises |
उपरोक्त जोड़े में से कितने जोड़े सही ढंग से सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
यह प्रश्न विभिन्न संगठनों और उनके संबंधित मंत्रालयों के बारे में है। तीनों जोड़े गलत मिलान किए गए हैं।
❌ युग्म I गलत है: National Automotive Board भारी उद्योग मंत्रालय (Ministry of Heavy Industries) के अंतर्गत कार्य करता है, न कि वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत।
❌ युग्म II गलत है: Coir Board सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME Ministry) के अंतर्गत कार्य करता है, न कि भारी उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत।
❌ युग्म III गलत है: National Centre for Trade Information वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय से संबद्ध है, न कि MSME मंत्रालय से।
संक्षिप्त नोट्स: महत्वपूर्ण बोर्ड एवं संगठन
-
National Automotive Board (NAB), भारी उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।
-
NAB भारत की ऑटोमोबाइल नीतियों के क्रियान्वयन में सहायता करता है।
-
Coir Board की स्थापना 1953 के Coir Industry Act के तहत हुई थी।
-
Coir Board, MSME मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
-
National Centre for Trade Information (NCTI), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय से संबद्ध है।
-
NCTI व्यापार एवं निर्यात संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने में सहायता करता है।
निम्नलिखित जोड़ियों पर विचार करें:
राज्य - विवरण
I. अरुणाचल प्रदेश: राजधानी का नाम एक किले के नाम पर रखा गया है, और राज्य में दो राष्ट्रीय उद्यान हैं।
II. नागालैंड: राज्य एक संवैधानिक संशोधन अधिनियम के आधार पर अस्तित्व में आया।
III. त्रिपुरा: प्रारंभ में एक भाग 'सी' राज्य, यह 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के साथ एक केंद्र प्रशासित क्षेत्र बन गया और बाद में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ।
उपरोक्त जोड़े में से कितने जोड़े सही ढंग से सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 3 (तीनों)
तीनों युग्म सही रूप से मेल खाते हैं। यह प्रश्न पूर्वोत्तर राज्यों के राजधानी, राष्ट्रीय उद्यान और राज्य गठन के इतिहास से संबंधित तथ्यों की जाँच करता है।
✅ युग्म I सही है: अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर का नाम ऐतिहासिक ईटा किले (Ita Fort) पर रखा गया है। राज्य में दो राष्ट्रीय उद्यान—नामदाफा और मौलिंग—स्थित हैं।
✅ युग्म II सही है: नागालैंड 1 दिसंबर 1963 को राज्य बना। इसका गठन State of Nagaland Act, 1962 के माध्यम से हुआ।
✅ युग्म III सही है: त्रिपुरा पहले Part 'C' State था, 1956 में केंद्र शासित प्रदेश बना और 21 जनवरी 1972 को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त किया।
संक्षिप्त नोट्स: पूर्वोत्तर राज्य – गठन एवं विशेषताएँ
-
अरुणाचल प्रदेश को 1987 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
-
ईटा किला ईटानगर नाम का आधार है।
-
नामदाफा राष्ट्रीय उद्यान भारत के सबसे बड़े संरक्षित क्षेत्रों में से एक है।
-
नागालैंड 1963 में भारत का 16वाँ राज्य बना।
-
त्रिपुरा एक रियासत थी जिसने 1949 में भारत में विलय किया।
-
त्रिपुरा और मणिपुर को 1972 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
-
पूर्वोत्तर क्षेत्र को "सेवन सिस्टर्स" के नाम से जाना जाता है।
भारतीय राजनीति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
I. किसी राज्य का राज्यपाल अपने कार्यालय की शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग और प्रदर्शन के लिए किसी भी अदालत के प्रति जवाबदेह नहीं है।
II. राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान उनके खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जाएगी या जारी नहीं रखी जाएगी।
III. राज्य विधानमंडल के सदस्य सदन के भीतर कही गई किसी भी बात के संबंध में किसी भी अदालत में किसी भी कार्यवाही के लिए उत्तरदायी नहीं हैं।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
✅ कथन I सही है: अनुच्छेद 361(1) के अनुसार राज्यपाल अपने पद के अधिकारों और कर्तव्यों के निर्वहन के लिए किसी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
✅ कथन II सही है: अनुच्छेद 361(2) के अनुसार राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान उसके विरुद्ध कोई आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं की जा सकती।
✅ कथन III सही है: अनुच्छेद 194(2) राज्य विधानमंडल के सदस्यों को सदन के भीतर कही गई बातों या दिए गए मत के संबंध में न्यायालयी कार्यवाही से संरक्षण देता है।
अतः तीनों कथन सही हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संवैधानिक प्रतिरक्षा एवं विशेषाधिकार
| प्रावधान | विवरण |
|---|---|
| अनुच्छेद 361(1) | राष्ट्रपति/राज्यपाल आधिकारिक कार्यों के लिए न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं |
| अनुच्छेद 361(2) | कार्यकाल में आपराधिक कार्यवाही नहीं |
| अनुच्छेद 361(3) | कार्यकाल में गिरफ्तारी या कारावास नहीं |
| अनुच्छेद 194(2) | राज्य विधायकों को भाषण एवं मतदान पर विशेषाधिकार |
| अनुच्छेद 105(2) | सांसदों के लिए समान विशेषाधिकार |
त्वरित तथ्य:
अनुच्छेद 361 के तहत मिलने वाली सुरक्षा स्थायी नहीं होती। पद छोड़ने के बाद आपराधिक कार्यवाही की जा सकती है।
भारत के संविधान के अंतर्गत निम्नलिखित विषयों पर विचार करें:
I. सूची I-संघ सूची, सातवीं अनुसूची में
II. किसी राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार
III. राज्यपाल कार्यालय की स्थितियाँ
उपरोक्त में से किससे संबंधित संवैधानिक संशोधन के लिए, विधेयक को भारत के राष्ट्रपति की सहमति के लिए प्रस्तुत करने से पहले कम से कम आधे राज्यों की विधानमंडलों द्वारा अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है?
Detailed Explanation:
✅ कथन I सही है: सातवीं अनुसूची की संघ सूची (Union List) में बदलाव केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के बंटवारे को प्रभावित करता है। इसलिए ऐसे संशोधन के लिए कम-से-कम आधे राज्यों की स्वीकृति आवश्यक होती है।
✅ कथन II सही है: राज्य की कार्यपालिका शक्ति की सीमा में परिवर्तन भी संघीय ढांचे को प्रभावित करता है, इसलिए इसके लिए भी राज्यों की पुष्टि आवश्यक होती है।
❌ कथन III गलत है: राज्यपाल के पद की शर्तों में संशोधन के लिए राज्यों की पुष्टि आवश्यक नहीं होती। संसद विशेष बहुमत से इसे संशोधित कर सकती है।
इसलिए केवल I और II सही हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: राज्य अनुमोदन वाले संवैधानिक संशोधन
| प्रावधान | राज्य अनुमोदन |
|---|---|
| राष्ट्रपति का निर्वाचन | ✅ आवश्यक |
| संघ और राज्यों की कार्यपालिका शक्ति | ✅ आवश्यक |
| सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय | ✅ आवश्यक |
| सातवीं अनुसूची | ✅ आवश्यक |
| संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व | ✅ आवश्यक |
| अनुच्छेद 368 | ✅ आवश्यक |
| राज्यपाल के पद की शर्तें | ❌ आवश्यक नहीं |
त्वरित तथ्य:
अनुच्छेद 368 के अनुसार संघीय ढांचे से जुड़े संशोधनों के लिए कम-से-कम आधे राज्यों की स्वीकृति आवश्यक होती है।
भारत की संसद के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत के राष्ट्रपति द्वारा सदन का सत्रावसान मंत्रिपरिषद की सलाह की आवश्यकता के बिना किया जाता है।
- सदन का सत्रावसान सामान्यतः सदन के अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद किया जाता है लेकिन भारत के राष्ट्रपति द्वारा सत्र में बैठे सदन का सत्रावसान करने पर कोई रोक नहीं है।
- लोकसभा का विघटन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है जो असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर, मंत्रिपरिषद की सलाह पर ऐसा करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 2 और 3
सत्रावसान और विघटन भारत के राष्ट्रपति द्वारा संसद के संबंध में प्रयोग की जाने वाली दो भिन्न शक्तियाँ हैं। जबकि सत्रावसान सामान्यतः अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद किया जाता है, राष्ट्रपति तकनीकी रूप से सत्र के दौरान भी सदन का सत्रावसान कर सकते हैं, और यह शक्ति मंत्रिपरिषद की सलाह पर प्रयोग की जाती है। लोकसभा के विघटन के लिए भी राष्ट्रपति को असाधारण राजनीतिक परिस्थितियों को छोड़कर मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना आवश्यक है।
❌ कथन 1 – गलत: अनुच्छेद 85(2) के तहत, राष्ट्रपति सदनों का सत्रावसान केवल मंत्रिपरिषद (विशेष रूप से प्रधानमंत्री या मंत्रिमंडल) की सलाह पर करते हैं, स्वतंत्र रूप से नहीं।
✅ कथन 2 – सही: यद्यपि सत्रावसान सामान्यतः अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद होता है, राष्ट्रपति को सत्र में बैठे सदन का सत्रावसान करने से रोकने के लिए कोई संवैधानिक रोक नहीं है।
✅ कथन 3 – सही: राष्ट्रपति लोकसभा का विघटन मंत्रिपरिषद की सलाह पर करते हैं, दुर्लभ परिस्थितियों जैसे त्रिशंकु संसद, अविश्वास प्रस्ताव, या संवैधानिक संकट को छोड़कर।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संसद का सत्रावसान और विघटन
- स्थगन: संसद की बैठक का अस्थायी निलंबन अगली बैठक तक, पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) द्वारा निर्णीत।
- अनिश्चितकालीन स्थगन: अगली बैठक की तारीख तय किए बिना अनिश्चितकालीन स्थगन; सत्र समाप्त करता है लेकिन औपचारिक रूप से नहीं।
- सत्रावसान: अनुच्छेद 85(2) के तहत राष्ट्रपति द्वारा सत्र की औपचारिक समाप्ति, मंत्रिपरिषद की सलाह पर की जाती है; समितियों के सभी लंबित कार्य समाप्त होते हैं लेकिन सदन में लंबित विधेयक नहीं।
- विघटन: केवल लोकसभा पर लागू, राज्यसभा पर नहीं; पूरे सदन को समाप्त कर देता है, नए चुनाव आवश्यक; सभी लंबित विधेयक (राज्यसभा या संयुक्त बैठक में लंबित को छोड़कर) व्यपगत हो जाते हैं।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 85 सत्र, सत्रावसान और विघटन से संबंधित है; अनुच्छेद 352-360 आपातकालीन प्रावधानों से संबंधित हैं जो संसदीय कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं।
- राष्ट्रपति की भूमिका: राष्ट्रपति संसद को आहूत, सत्रावसान और विघटन करते हैं, लेकिन अनुच्छेद 74 के अनुसार मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करते हैं।
- मंत्रिपरिषद की सलाह का अपवाद: त्रिशंकु संसदों या राजनीतिक संकटों में, राष्ट्रपति विघटन मामलों में विवेक का प्रयोग कर सकते हैं, हालांकि यह संवैधानिक रूप से विवादास्पद बना रहता है।
भारतीय संसद के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- लोक सभा में लंबित विधेयक उसके विघटन पर व्यपगत हो जाता है।
- लोक सभा द्वारा पारित और राज्य सभा में लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है।
- एक विधेयक जिसके संबंध में भारत के राष्ट्रपति ने सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — 1 और 2
जब लोक सभा का विघटन होता है, तो लोक सभा में लंबित विधेयक और लोक सभा द्वारा पारित लेकिन राज्य सभा में लंबित विधेयक स्वतः व्यपगत हो जाते हैं। हालांकि, जिस विधेयक के संबंध में राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, वह लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होता है, क्योंकि संयुक्त बैठक की प्रक्रिया मान्य रहती है।
✅ कथन 1 (लोक सभा में लंबित विधेयक) – सही: लोक सभा में लंबित विधेयक उसके विघटन पर स्वतः व्यपगत हो जाता है क्योंकि विघटन उस सदन में सभी लंबित विधायी कार्यों को समाप्त कर देता है।
✅ कथन 2 (लोक सभा द्वारा पारित, राज्य सभा में लंबित विधेयक) – सही: लोक सभा द्वारा पारित लेकिन राज्य सभा में लंबित विधेयक भी लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है, क्योंकि इसे लोक सभा से उत्पन्न विधेयक माना जाता है।
❌ कथन 3 (संयुक्त बैठक के लिए सूचित विधेयक) – गलत: जिस विधेयक के संबंध में राष्ट्रपति ने सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, वह लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होता है और नई लोक सभा के गठन के बाद संयुक्त बैठक में लिया जा सकता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संसद में विधेयकों का व्यपगत होना
- लोक सभा में लंबित विधेयक: लोक सभा में लंबित सभी विधेयक उसके विघटन पर व्यपगत हो जाते हैं, सिवाय उन विधेयकों के जो पहले से पारित होकर राज्य सभा को भेजे गए हों या राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित हों।
- लोक सभा द्वारा पारित विधेयक: लोक सभा द्वारा पारित लेकिन राज्य सभा में लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाते हैं।
- केवल राज्य सभा में लंबित विधेयक: केवल राज्य सभा में उत्पन्न और लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होते हैं, क्योंकि राज्य सभा एक स्थायी सदन है।
- संयुक्त बैठक के लिए सूचित विधेयक: जिन विधेयकों के संबंध में राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे की सूचना दी है, वे व्यपगत नहीं होते हैं और लोक सभा के पुनर्गठन के बाद संयुक्त बैठक में लिए जा सकते हैं।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित विधेयक: दोनों सदनों द्वारा पारित और राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होते हैं।
- संवैधानिक विधेयक: किसी भी चरण में लंबित विधेयक, जिसमें संविधान संशोधन विधेयक भी शामिल हैं, सामान्य विधेयकों के समान व्यपगत होने के नियमों का पालन करते हैं।
- राज्य सभा स्थायी सदन के रूप में: राज्य सभा एक स्थायी निकाय है और कभी विघटित नहीं होती है, अतः केवल इसमें उत्पन्न और रहने वाले विधेयक लोक सभा के विघटन के कारण व्यपगत नहीं होते हैं।
| विधेयक का प्रकार | चरण | लोक सभा के विघटन का प्रभाव |
|---|---|---|
| लोक सभा में लंबित विधेयक | लोक सभा में कोई भी चरण | व्यपगत हो जाता है |
| लोक सभा द्वारा पारित विधेयक | राज्य सभा में लंबित | व्यपगत हो जाता है |
| राज्य सभा में उत्पन्न विधेयक | केवल राज्य सभा में लंबित | व्यपगत नहीं होता है |
| दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक | राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित | व्यपगत नहीं होता है |
| संयुक्त बैठक के लिए सूचित विधेयक | राष्ट्रपति की सूचना के बाद | व्यपगत नहीं होता है |
| राष्ट्रपति द्वारा लौटाया गया विधेयक | लोक सभा में पुनर्विचार के लिए लंबित | व्यपगत हो जाता है |
लोक सभा के अध्यक्ष के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
जब लोक सभा के अध्यक्ष को हटाने के किसी प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा हो, तब
- वह पीठासीन नहीं होंगे।
- उन्हें बोलने का अधिकार नहीं होगा।
- वे पहली बार में उस प्रस्ताव पर मतदान करने के हकदार नहीं होंगे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 96 अध्यक्ष के हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान उनके आचरण को नियंत्रित करता है। अध्यक्ष को ऐसी कार्यवाही के दौरान सदन की अध्यक्षता करने से रोका जाता है, लेकिन वे एक सदस्य के रूप में अपने सभी अन्य अधिकार बनाए रखते हैं, जिसमें बोलने और पहली बार मतदान करने का अधिकार शामिल है।
✅ कथन 1 (पीठासीन प्रतिबंध) – सही: अनुच्छेद 96(1) के तहत, अध्यक्ष उनके हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान सदन की अध्यक्षता नहीं करेंगे, भले ही वे उपस्थित हों।
❌ कथन 2 (बोलने का अधिकार) – गलत: अनुच्छेद 96(2) के तहत, अध्यक्ष हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान सदन की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार बनाए रखते हैं।
❌ कथन 3 (मतदान अधिकार) – गलत: अनुच्छेद 96(2) के अनुसार, अध्यक्ष प्रस्ताव पर पहली बार में मतदान करने के हकदार हैं; वे केवल इस परिदृश्य में निर्णायक मत (बराबरी तोड़ने के लिए दूसरा मत) खो देते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लोक सभा के अध्यक्ष और हटाने की प्रक्रिया
- चुनाव: अध्यक्ष को लोक सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से चुना जाता है, आमतौर पर बहुमत दल से, नए सदन के गठन के तुरंत बाद।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 93-96 लोक सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से संबंधित हैं, जिसमें उनका चुनाव, हटाना और शक्तियां शामिल हैं।
- हटाने की प्रक्रिया: हटाने के प्रस्ताव के लिए 14 दिन की सूचना आवश्यक है और इसे सदन के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित किया जाना चाहिए (न कि केवल उपस्थित और मतदान करने वाले)।
- पीठासीन प्रतिबंध (अनुच्छेद 96(1)): हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान, अध्यक्ष अध्यक्षता नहीं कर सकते लेकिन सदन में उपस्थित रह सकते हैं।
- सदस्य अधिकार (अनुच्छेद 96(2)): अध्यक्ष कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार बनाए रखते हैं, और पहली बार में मतदान कर सकते हैं लेकिन अपने स्वयं के हटाने के प्रस्ताव पर निर्णायक मत का प्रयोग नहीं कर सकते।
- निष्पक्षता की अपेक्षा: चुनाव के बाद, अध्यक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी राजनीतिक पार्टी से संबंध तोड़ें और सदन की कार्यवाही संचालित करने में निष्पक्षता बनाए रखें।
- शक्तियां और कार्य: अध्यक्ष सदन में व्यवस्था बनाए रखते हैं, विशेषाधिकार के प्रश्नों पर निर्णय लेते हैं, धन विधेयकों को प्रमाणित करते हैं, और विभिन्न प्रशासनिक और अनुशासनात्मक शक्तियों का प्रयोग करते हैं।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 93-96 |
| चुनाव विधि | लोक सभा सदस्यों द्वारा अपने में से चुने जाते हैं |
| हटाने की सूचना अवधि | 14 दिन |
| हटाने के लिए आवश्यक बहुमत | सदन के सभी तत्कालीन सदस्यों का बहुमत |
| हटाने के दौरान पीठासीन | अध्यक्षता नहीं कर सकते (अनुच्छेद 96(1)) |
| हटाने के दौरान बोलने का अधिकार | हां, बनाए रखा गया (अनुच्छेद 96(2)) |
| हटाने के दौरान मतदान अधिकार | पहली बार में मतदान कर सकते हैं, निर्णायक मत नहीं (अनुच्छेद 96(2)) |
| कार्यकाल | आमतौर पर सदन के पूर्ण कार्यकाल (5 वर्ष) तक जारी रहता है |
संघ बजट के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- संघ वित्त मंत्री राष्ट्रपति की ओर से संसद के दोनों सदनों के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत करते हैं।
- संघ स्तर पर, भारत के राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना किसी अनुदान की मांग नहीं की जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
संघ बजट के संबंध में दोनों कथन सही हैं। भारत का संविधान यह अनिवार्य करता है कि राष्ट्रपति वार्षिक वित्तीय विवरण को संसद के समक्ष रखवाते हैं, जो व्यवहार में संघ वित्त मंत्री द्वारा किया जाता है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना संघ स्तर पर किसी अनुदान की मांग नहीं की जा सकती, जो सार्वजनिक व्यय पर कार्यकारी नियंत्रण सुनिश्चित करता है।
✅ कथन 1 (बजट की प्रस्तुति) – सही: अनुच्छेद 112 के तहत, राष्ट्रपति वार्षिक वित्तीय विवरण (संघ बजट) को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं, जिसे व्यवहार में संघ वित्त मंत्री राष्ट्रपति की ओर से प्रस्तुत करते हैं।
✅ कथन 2 (अनुदान की मांग) – सही: अनुच्छेद 113(3) स्पष्ट रूप से प्रावधान करता है कि भारत के राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना किसी अनुदान की मांग नहीं की जाएगी, जो भारत की संचित निधि से व्यय प्रस्तावों पर कार्यकारी नियंत्रण सुनिश्चित करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संघ बजट और वित्तीय प्रक्रिया
- वार्षिक वित्तीय विवरण (अनुच्छेद 112): राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए संसद के दोनों सदनों के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण (संघ बजट) रखवाते हैं, जिसमें अनुमानित प्राप्तियां और व्यय दिखाया जाता है।
- बजट की विषय-वस्तु: बजट व्यय को (क) भारत की संचित निधि पर भारित (गैर-मतदेय), और (ख) भारत की संचित निधि से किया गया (संसद द्वारा मतदेय) के रूप में अलग करता है।
- अनुदान की मांग (अनुच्छेद 113): संचित निधि से व्यय के लिए अनुदान की मांगों के माध्यम से संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता होती है। राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना ऐसी कोई मांग नहीं की जा सकती।
- विनियोग विधेयक (अनुच्छेद 114): अनुदानों के मतदान के बाद, स्वीकृत व्यय को पूरा करने के लिए संचित निधि से धन की निकासी को प्राधिकृत करने हेतु विनियोग विधेयक पेश किया जाता है।
- वित्त विधेयक (अनुच्छेद 110): सरकार के वित्तीय प्रस्तावों को प्रभावी करने के लिए कराधान और अन्य वित्तीय मामलों के प्रावधानों वाला धन विधेयक पेश किया जाता है।
- लेखानुदान (अनुच्छेद 116): मुख्य बजट मांगों के मतदान तक संसद वित्तीय वर्ष के एक भाग के लिए अग्रिम अनुदान कर सकती है।
- गिलोटिन: एक प्रक्रियात्मक साधन जिसमें चर्चा के लिए निर्धारित अंतिम दिन शेष सभी अनुदान मांगों को एक साथ मतदान के लिए रखा जाता है, जो निर्धारित समय के भीतर बजट पारित करना सुनिश्चित करता है।
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद | उद्देश्य | आवश्यक संसदीय कार्रवाई |
|---|---|---|---|
| वार्षिक वित्तीय विवरण | अनुच्छेद 112 | बजट अनुमानों की प्रस्तुति | चर्चा (कोई मतदान नहीं) |
| अनुदान की मांग | अनुच्छेद 113 | व्यय का अनुमोदन | मतदान आवश्यक (राष्ट्रपति की सिफारिश पर) |
| विनियोग विधेयक | अनुच्छेद 114 | धन निकासी का प्राधिकरण | मतदान आवश्यक |
| वित्त विधेयक | अनुच्छेद 110 | कर प्रस्तावों का कार्यान्वयन | मतदान आवश्यक (धन विधेयक) |
| लेखानुदान | अनुच्छेद 116 | वर्ष के भाग के लिए अग्रिम अनुदान | मतदान आवश्यक |
| भारित व्यय | अनुच्छेद 112(3) | गैर-मतदेय वैधानिक भुगतान | केवल चर्चा (कोई मतदान नहीं) |