UPSC Prelims 2023 Question Paper
Explore the complete solved question paper for UPSC Prelims 2023 featuring 100 solved questions with bilingual (English & Hindi) explanations, official answer key, and subject weightage breakdown.
निम्नलिखित में से कौन सा कथन किसी देश के 'संविधान' के मुख्य उद्देश्य को सर्वोत्तम रूप से दर्शाता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — यह सरकार की शक्तियों को परिभाषित और सीमित करता है।
संविधान का मुख्य उद्देश्य सरकार की शक्तियों को परिभाषित और सीमित करना है, शासन का एक ऐसा ढांचा स्थापित करना जहां अधिकार मौलिक नियमों और सिद्धांतों द्वारा सीमित हो। यह शक्ति के मनमाने प्रयोग को रोकता है और यह सुनिश्चित करके नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है कि सरकारी कार्य संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहें। जबकि संविधान अन्य उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है—जैसे कानून के लिए उद्देश्य निर्धारित करना, राजनीतिक संस्थाओं का निर्माण करना, और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना—इसका प्राथमिक कार्य राज्य की शक्ति पर स्पष्ट सीमाएं निर्धारित करके सीमित सरकार की स्थापना करना है।
विकल्पों का मूल्यांकन:
❌ विकल्प 1 – गलत: हालांकि संविधान उद्देश्यों (जैसे नीति निदेशक तत्व) को निर्धारित करता है, यह एक द्वितीयक कार्य है, मुख्य उद्देश्य नहीं।
❌ विकल्प 2 – गलत: राजनीतिक कार्यालयों और सरकार का निर्माण एक महत्वपूर्ण कार्य है लेकिन प्राथमिक उद्देश्य नहीं।
✅ विकल्प 3 – सही: सरकारी शक्तियों को परिभाषित और सीमित करना किसी भी संविधान का मौलिक और मुख्य उद्देश्य है।
❌ विकल्प 4 – गलत: सामाजिक न्याय को सुरक्षित करना एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है (प्रस्तावना और नीति निदेशक तत्वों में पाया जाता है) लेकिन यह मुख्य संरचनात्मक उद्देश्य के बजाय एक उद्देश्य का प्रतिनिधित्व करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संविधान का मुख्य उद्देश्य
- प्राथमिक उद्देश्य: संविधान का मुख्य कार्य सरकार की शक्तियों को परिभाषित और सीमित करना है, सीमित सरकार और संवैधानिक शासन के सिद्धांत को स्थापित करना।
- संवैधानिकता: यह अवधारणा कि सरकार को स्थापित कानूनों और सिद्धांतों के ढांचे के भीतर काम करना चाहिए, शक्ति के मनमाने प्रयोग को रोकना।
- शक्तियों का पृथक्करण: संविधान शक्ति की एकाग्रता को रोकने के लिए विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सरकारी अधिकार को विभाजित करता है।
- मौलिक अधिकार: संविधान में अधिकारों को समाहित करके, नागरिकों को सरकारी अतिक्रमण और अधिकार के दुरुपयोग से संरक्षित किया जाता है।
- विधि का शासन: संविधान सुनिश्चित करता है कि सभी सरकारी कार्य स्थापित कानूनी सिद्धांतों और प्रक्रियाओं के अनुरूप होने चाहिए।
- द्वितीयक कार्य: हालांकि महत्वपूर्ण हैं, अन्य उद्देश्य जैसे नीतिगत उद्देश्य निर्धारित करना (नीति निदेशक तत्व), संस्थानों का निर्माण, और सामाजिक लक्ष्यों को बढ़ावा देना, शक्ति को सीमित करने के मुख्य कार्य के पूरक हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत के संविधान के अनुसार, केंद्र सरकार का यह कर्तव्य है कि वह राज्यों को आंतरिक अशांति से बचाए।
- भारत का संविधान राज्यों को निवारक निरोध के लिए रखे गए व्यक्ति को कानूनी सलाहकार प्रदान करने से छूट देता है।
- आतंकवाद निवारण अधिनियम, 2002 के अनुसार, पुलिस के समक्ष अभियुक्त की स्वीकारोक्ति को साक्ष्य के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो
यह प्रश्न राज्य संरक्षण, निवारक निरोध और आतंकवाद-रोधी कानूनों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के ज्ञान की परीक्षा करता है। तीन कथनों में से दो सही हैं जबकि एक POTA के तहत स्वीकारोक्ति की स्वीकार्यता के संबंध में गलत है।
✅ कथन 1 – सही: अनुच्छेद 355 अनिवार्य करता है कि संघ प्रत्येक राज्य को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से बचाएगा, तथा संवैधानिक शासन सुनिश्चित करेगा।
✅ कथन 2 – सही: अनुच्छेद 22(3)(ख) निवारक निरोध के मामलों को अनुच्छेद 22(1) के तहत प्रदत्त अपनी पसंद के विधि व्यवसायी से परामर्श करने और प्रतिरक्षा किए जाने के अधिकार से छूट देता है।
❌ कथन 3 – गलत: POTA 2002 की धारा 32(1) ने पुलिस अधीक्षक या उससे ऊपर के रैंक के पुलिस अधिकारी के समक्ष की गई स्वीकारोक्ति को न्यायालय में साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य बनाने का स्पष्ट प्रावधान किया था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: निवारक निरोध और राज्य संरक्षण पर संवैधानिक प्रावधान
| अनुच्छेद/प्रावधान | मुख्य विशेषताएं |
|---|---|
| अनुच्छेद 355 | राज्यों को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से बचाने का संघ का कर्तव्य; राज्यों में संवैधानिक शासन सुनिश्चित करना |
| अनुच्छेद 22(1) | विधि व्यवसायी से परामर्श करने और प्रतिरक्षा किए जाने का अधिकार; गिरफ्तारी के आधारों से अवगत कराए जाने का अधिकार |
| अनुच्छेद 22(3) | अनुच्छेद 22(1) और 22(2) के अधिकार लागू नहीं होते: (क) शत्रु विदेशियों पर, (ख) निवारक निरोध कानूनों के तहत निरुद्ध व्यक्तियों पर |
| अनुच्छेद 22(4)-(7) | निवारक निरोध के लिए सुरक्षा उपाय: सलाहकार बोर्ड की स्वीकृति के बिना अधिकतम 3 माह; व्यक्ति को आधारों से अवगत कराया जाना; अभ्यावेदन करने का अधिकार |
| POTA 2002 (2004 में निरस्त) |
धारा 32(1) ने पुलिस अधिकारियों (एसपी रैंक और ऊपर) के समक्ष स्वीकारोक्ति को साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य बनाया; विवादास्पद प्रावधान जिसके कारण इसे निरस्त किया गया |
सार रूप में, 'विधि की सम्यक प्रक्रिया' (Due Process of Law) का क्या अर्थ है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत
'विधि की सम्यक प्रक्रिया' (Due Process of Law) की अवधारणा मूल रूप से यह सुनिश्चित करती है कि किसी व्यक्ति को जीवन या स्वतंत्रता से वंचित करने की कोई भी प्रक्रिया निष्पक्ष, न्यायसंगत और तर्कसंगत होनी चाहिए तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करनी चाहिए। अमेरिकी संविधान से ली गई इस अवधारणा को ऐतिहासिक मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) निर्णय के माध्यम से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में पढ़ा गया, जिससे इसे केवल 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' से आगे बढ़ाकर वास्तविक और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता तक विस्तारित किया गया।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
❌ विकल्प 2 – गलत: 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' अनुच्छेद 21 का शाब्दिक रूप है, जो केवल यह आवश्यक करता है कि एक कानून अस्तित्व में हो, भले ही वह अनुचित हो; सम्यक प्रक्रिया निष्पक्षता और तर्कसंगतता की मांग करती है।
❌ विकल्प 3 – गलत: यद्यपि विधि का निष्पक्ष अनुप्रयोग सम्यक प्रक्रिया का एक तत्व है, यह पूर्ण सार को नहीं दर्शाता, जिसमें वास्तविक निष्पक्षता, प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन शामिल है।
❌ विकल्प 4 – गलत: विधि के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) एक अलग संवैधानिक गारंटी है और सम्यक प्रक्रिया की अवधारणा से भिन्न है, हालांकि दोनों न्याय सुनिश्चित करने में एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विधि की सम्यक प्रक्रिया बनाम विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया
| पहलू | विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया | विधि की सम्यक प्रक्रिया |
|---|---|---|
| उत्पत्ति | ब्रिटिश कानूनी परंपरा | अमेरिकी संविधान (5वां और 14वां संशोधन) |
| विस्तार | केवल वैध रूप से अधिनियमित कानून के अस्तित्व की आवश्यकता | कानून का निष्पक्ष, न्यायसंगत और तर्कसंगत होना आवश्यक |
| न्यायिक समीक्षा | केवल यह जांचने तक सीमित कि कानून मौजूद है या नहीं | वास्तविक और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की जांच तक विस्तारित |
| भारतीय संदर्भ | मूल अनुच्छेद 21 की शब्दावली | मेनका गांधी (1978) के बाद अनुच्छेद 21 में पढ़ा गया |
| संरक्षण | केवल मनमानी कार्यकारी कार्रवाई के विरुद्ध | मनमानी विधायी और कार्यकारी कार्रवाई के विरुद्ध |
- प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत: सुनवाई का अधिकार (audi alteram partem), निष्पक्ष निर्णयकर्ता (nemo judex in causa sua), और तर्कसंगत निर्णय शामिल हैं
- अनुच्छेद 21 का विकास: प्रारंभ में ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) में संकीर्ण रूप से व्याख्यायित, बाद में मेनका गांधी में विस्तारित
- वास्तविक सम्यक प्रक्रिया: कानून स्वयं निष्पक्ष और तर्कसंगत होना चाहिए, न केवल प्रक्रिया
- प्रक्रियात्मक सम्यक प्रक्रिया: प्रवर्तन का तरीका निष्पक्ष प्रक्रियाओं का पालन करना चाहिए
- अनुच्छेद 14 के साथ एकीकरण: मेनका गांधी के बाद, अनुच्छेद 14, 19 और 21 को व्यापक संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए एक साथ पढ़ा जाता है
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भारत के राष्ट्रपति के निर्वाचन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- संसद के किसी भी सदन या राज्यों की विधानसभाओं में नामांकित सदस्य भी निर्वाचक मंडल में शामिल होने के पात्र हैं।
- निर्वाचित विधानसभा सीटों की संख्या जितनी अधिक होगी, उस राज्य के प्रत्येक विधायक के मत का मूल्य उतना ही अधिक होगा।
- मध्य प्रदेश के प्रत्येक विधायक के मत का मूल्य केरल की तुलना में अधिक है।
- पुडुचेरी के प्रत्येक विधायक के मत का मूल्य अरुणाचल प्रदेश की तुलना में अधिक है क्योंकि पुडुचेरी में कुल जनसंख्या और कुल निर्वाचित सीटों की संख्या का अनुपात अरुणाचल प्रदेश की तुलना में अधिक है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल एक
भारत के राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित चार कथनों में से केवल कथन 4 सही है। कथन 1 गलत है क्योंकि नामांकित सदस्य निर्वाचक मंडल का हिस्सा नहीं होते हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि विधानसभा सीटों की अधिक संख्या वास्तव में प्रत्येक विधायक के मत के मूल्य को कम करती है (क्योंकि यह हर में है)। कथन 3 गलत है क्योंकि केरल के विधायकों का मत मूल्य (152) मध्य प्रदेश के विधायकों (131) से अधिक है।
❌ कथन 1 – गलत: राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचक मंडल में केवल संसद और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं; नामांकित सदस्य मतदान के पात्र नहीं हैं।
❌ कथन 2 – गलत: विधायक के मत का मूल्य = (राज्य की जनसंख्या ÷ निर्वाचित विधायकों की संख्या) ÷ 1000। हर में निर्वाचित सीटों की अधिक संख्या वास्तव में मत मूल्य को बढ़ाती नहीं, बल्कि घटाती है।
❌ कथन 3 – गलत: 1971 की जनगणना के आधार पर, मध्य प्रदेश के प्रत्येक विधायक का मत मूल्य 131 है, जबकि केरल का 152 है। इसलिए, केरल के विधायकों का मत मूल्य मध्य प्रदेश के विधायकों से अधिक है।
✅ कथन 4 – सही: पुडुचेरी के प्रत्येक विधायक का मत मूल्य (16) वास्तव में अरुणाचल प्रदेश (8) से अधिक है क्योंकि पुडुचेरी में जनसंख्या और निर्वाचित सीटों का अनुपात अधिक है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: राष्ट्रपति निर्वाचन - निर्वाचक मंडल
- निर्वाचक मंडल की संरचना (अनुच्छेद 54): लोकसभा, राज्यसभा और राज्य विधानसभाओं (दिल्ली NCT और पुडुचेरी सहित) के निर्वाचित सदस्य। नामांकित सदस्यों और विधान परिषदों के सदस्यों को बाहर रखा गया है।
- विधायक के मत का मूल्य: सूत्र = (1971 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल जनसंख्या ÷ निर्वाचित विधायकों की कुल संख्या) ÷ 1000
- सांसद के मत का मूल्य: सूत्र = (सभी राज्यों के सभी विधायकों के मतों का कुल मूल्य ÷ दोनों सदनों में निर्वाचित सांसदों की कुल संख्या)
- निर्वाचन की प्रकृति: एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से अप्रत्यक्ष निर्वाचन
- मुख्य बहिष्करण: नामांकित सांसद और विधायक, विधान पार्षद, और वर्तमान में जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश
| राज्य/केंद्र शासित प्रदेश | प्रति विधायक मत मूल्य (उदाहरण) |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश | 208 (सर्वाधिक) |
| केरल | 152 |
| मध्य प्रदेश | 131 |
| पुडुचेरी | 16 |
| अरुणाचल प्रदेश | 8 |
| सिक्किम | 7 (न्यूनतम) |
निम्नलिखित में से कौन सा समुद्र तल में बार-बार गिरावट का सबसे अच्छा उदाहरण है, जिससे वर्तमान में व्यापक दलदली भूमि का निर्माण हुआ है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कच्छ का रण
कच्छ का रण समुद्र तल में बार-बार गिरावट से व्यापक दलदली भूमि के निर्माण का सबसे अच्छा उदाहरण है। भूगर्भीय साक्ष्य बताते हैं कि गुजरात में स्थित यह विशाल नमकीन दलदल कभी अरब सागर का उथला विस्तार था, लेकिन विवर्तनिक गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र तल में बार-बार गिरावट आई, जिससे नमकीन पदार्थों का जमाव हुआ और वर्तमान मौसमी दलदली भूमि का निर्माण हुआ। मानसून के दौरान, यह पानी से भर जाता है और एक उथली झील बन जाती है, और गर्मियों में, यह सूखकर विस्तृत सफेद नमक के मैदानों में बदल जाता है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
विकल्प 1 – भितरकणिका मैंग्रोव: यह ओडिशा में एक डेल्टाई मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र है जो नदी की तलछट जमाव से बना है, समुद्र तल में बार-बार गिरावट से नहीं।
विकल्प 2 – मरक्कनम नमक के खेत: ये तमिलनाडु में तटीय नमक उत्पादन क्षेत्र हैं, जो नमक निष्कर्षण के लिए मानवीय हस्तक्षेप से बनाए गए हैं, प्राकृतिक समुद्र तल प्रतिगमन से नहीं।
विकल्प 3 – नौपाड़ा दलदल: यह आंध्र प्रदेश में एक मीठे पानी का आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र है, जो समुद्र तल परिवर्तन से असंबंधित है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कच्छ के रण का निर्माण
- स्थान: उत्तर-पश्चिमी गुजरात, पाकिस्तान तक विस्तारित; थार मरुस्थल क्षेत्र का हिस्सा
- प्रकार: ग्रेट रण (बड़ा, उत्तरी) और लिटिल रण (छोटा, दक्षिणी)
- भूगर्भीय इतिहास: कभी अरब सागर का हिस्सा था; प्लीस्टोसीन युग के दौरान विवर्तनिक उत्थान और समुद्र तल के उतार-चढ़ाव ने इसे समुद्र से अलग कर दिया
- मौसमी परिवर्तन: मानसून के दौरान जलमग्न (जून-सितंबर); गर्मियों में नमक की परत वाले रेगिस्तान में सूख जाता है
- पारिस्थितिक महत्व: लिटिल रण में जंगली गधा अभयारण्य; राजहंस के लिए प्रजनन स्थल; अनूठी लवणरागी (नमक-सहिष्णु) वनस्पति
- आर्थिक महत्व: प्रमुख नमक उत्पादन क्षेत्र; अगरिया समुदाय द्वारा पारंपरिक नमक खेती
- सांस्कृतिक विरासत: रण उत्सव महोत्सव के लिए प्रसिद्ध; कच्छी समुदायों के पारंपरिक हस्तशिल्प
निम्नलिखित में से कौन सा कांगो बेसिन का हिस्सा है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — कैमरून
कांगो बेसिन मध्य अफ्रीका में स्थित एक विशाल अवसादी बेसिन है जो कांगो नदी के चारों ओर केंद्रित है। यह मुख्य रूप से छह देशों में फैला है: कैमरून, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, कांगो गणराज्य, भूमध्यरेखीय गिनी और गैबॉन। दिए गए विकल्पों में से केवल कैमरून ही कांगो बेसिन का हिस्सा है, जबकि नाइजीरिया इसके पश्चिम में स्थित है, और दक्षिण सूडान तथा युगांडा बेसिन के पूर्व में स्थित हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कांगो बेसिन
- स्थान: मध्य अफ्रीका, पश्चिम भूमध्यरेखीय अफ्रीका क्षेत्र में
- मुख्य विशेषता: कांगो नदी का अवसादी बेसिन, क्षेत्रफल के हिसाब से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा नदी बेसिन
- देश: छह मुख्य देश — कैमरून, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, कांगो गणराज्य, भूमध्यरेखीय गिनी और गैबॉन
- महत्व: विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षावन (अमेज़न के बाद), वैश्विक जलवायु नियमन के लिए महत्वपूर्ण
- जैव विविधता: 10,000 से अधिक पादप प्रजातियों, 1,000 पक्षी प्रजातियों और 400 स्तनपायी प्रजातियों का घर, जिनमें गोरिल्ला, चिंपांजी और वन हाथी शामिल हैं
- जलवायु: वर्ष भर उच्च वर्षा के साथ भूमध्यरेखीय जलवायु
भारत में कोयला आधारित तापीय विद्युत संयंत्रों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- इनमें से कोई भी समुद्री जल का उपयोग नहीं करता है।
- इनमें से कोई भी जल-तनाव वाले जिले में स्थापित नहीं है।
- इनमें से कोई भी निजी स्वामित्व वाला नहीं है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कोई नहीं
भारत में कोयला आधारित तापीय विद्युत संयंत्रों के संबंध में तीनों कथन गलत हैं। कुछ संयंत्र शीतलन के लिए समुद्री जल का उपयोग करते हैं (जैसे मुंद्रा), कई जल-तनाव वाले जिलों में स्थित हैं, और बड़ी संख्या में निजी स्वामित्व वाले हैं।
❌ कथन 1 – गलत: मुंद्रा तापीय विद्युत संयंत्र कच्छ की खाड़ी से समुद्री जल का उपयोग बंद-चक्र शीतलन प्रणाली में करता है, और सहायक प्रणालियों के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस संयंत्रों से शुद्ध समुद्री जल का भी उपयोग करता है।
❌ कथन 2 – गलत: WRI के शोध के अनुसार, भारत के 40% तापीय विद्युत संयंत्र जल-तनाव वाले क्षेत्रों में स्थित हैं, जिनमें से 20 सबसे बड़ी तापीय उपयोगिताओं में से 14 ने 2013-2016 के बीच जल की कमी के कारण बंद का अनुभव किया।
❌ कथन 3 – गलत: भारत के 269 तापीय विद्युत संयंत्रों में से 138 सार्वजनिक स्वामित्व वाले हैं जबकि 131 निजी स्वामित्व वाले हैं, जो महत्वपूर्ण निजी क्षेत्र की भागीदारी को दर्शाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में कोयला आधारित तापीय विद्युत संयंत्र
- शीतलन जल स्रोत: जबकि अधिकांश संयंत्र नदियों या जलाशयों से मीठे पानी का उपयोग करते हैं, तटीय संयंत्र जैसे मुंद्रा (गुजरात) मीठे पानी के संसाधनों के संरक्षण के लिए समुद्री जल शीतलन प्रणालियों का उपयोग करते हैं।
- जल तनाव की चुनौती: 40% तापीय संयंत्र जल-तनाव वाले क्षेत्रों में हैं, जो जल की कमी की अवधि के दौरान परिचालन व्यवधान और मजबूर बंद का कारण बनते हैं।
- स्वामित्व संरचना: कुल 269 संयंत्र - 138 सार्वजनिक क्षेत्र (केंद्रीय/राज्य उपयोगिताएँ जैसे NTPC, राज्य Gencos) और 131 निजी क्षेत्र (अडानी पावर, टाटा पावर, रिलायंस पावर, आदि)।
- क्षमता वितरण: तापीय ऊर्जा भारत की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता का लगभग 50-55% योगदान करती है।
- पर्यावरणीय चिंताएँ: उच्च जल खपत (3-5 लीटर प्रति kWh), तापीय प्रदूषण, और उत्सर्जन स्थिरता के लिए जल प्रबंधन को महत्वपूर्ण बनाते हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
कथन-I: भारत में यूरेनियम के भंडार होने के बावजूद, वह अपनी अधिकांश बिजली उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भर है।
कथन-II: बिजली उत्पादन के लिए कम से कम 60% तक संवर्धित यूरेनियम की आवश्यकता होती है।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — कथन-I सही है लेकिन कथन-II गलत है
भारत में वास्तव में घरेलू यूरेनियम भंडार हैं लेकिन बिजली उत्पादन के लिए कोयले पर भारी निर्भरता है (कुल क्षमता का लगभग 70%)। हालांकि, कथन-II तथ्यात्मक रूप से गलत है क्योंकि वाणिज्यिक परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को 60% तक संवर्धित यूरेनियम की आवश्यकता नहीं होती है।
✅ कथन-I – सही: भारत में झारखंड (सिंहभूम), आंध्र प्रदेश (तुम्मलापल्ले) और अन्य क्षेत्रों में यूरेनियम भंडार हैं, फिर भी कोयला इसकी प्रचुरता, कम लागत और स्थापित बुनियादी ढांचे के कारण बिजली उत्पादन का प्रमुख स्रोत बना हुआ है।
❌ कथन-II – गलत: 60% या अधिक तक संवर्धित यूरेनियम को अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (HEU) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है और इसका उपयोग अनुसंधान रिएक्टरों या परमाणु हथियारों के लिए किया जाता है, वाणिज्यिक बिजली उत्पादन के लिए नहीं। भारत के PHWRs प्राकृतिक यूरेनियम (0.7% U-235) का उपयोग करते हैं, जबकि विश्व स्तर पर अधिकांश वाणिज्यिक लाइट वाटर रिएक्टर केवल 3-5% U-235 तक संवर्धित निम्न संवर्धित यूरेनियम (LEU) का उपयोग करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: परमाणु ईंधन संवर्धन स्तर
| संवर्धन स्तर | U-235 प्रतिशत | प्राथमिक उपयोग |
|---|---|---|
| प्राकृतिक यूरेनियम | 0.7% | भारत के PHWRs (दाबित भारी जल रिएक्टर) |
| निम्न संवर्धित यूरेनियम (LEU) | 3-5% | विश्व स्तर पर वाणिज्यिक लाइट वाटर रिएक्टर (LWRs) |
| अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (HEU) | 20-90% | अनुसंधान रिएक्टर, नौसैनिक प्रणोदन |
| हथियार-ग्रेड यूरेनियम | ≥90% | परमाणु हथियार |
- भारत का परमाणु कार्यक्रम: PHWRs में प्राकृतिक यूरेनियम से शुरू होने वाले स्वदेशी तीन-चरणीय कार्यक्रम का उपयोग करता है
- कोयले का प्रभुत्व: भारत के कोयला भंडार (विश्व में 4वें सबसे बड़े) और कम पूंजी लागत इसे पर्यावरणीय चिंताओं के बावजूद पसंदीदा बनाती है
- यूरेनियम स्रोत: झारखंड (जादूगोड़ा), आंध्र प्रदेश (तुम्मलापल्ले - विश्व के सबसे बड़े में से एक), मेघालय, राजस्थान
- परमाणु क्षमता: भारत की कुल बिजली का केवल ~3% परमाणु ऊर्जा से आता है (2023 तक)
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- अमरकंटक पहाड़ियां विंध्य और सह्याद्री श्रेणियों के संगम पर स्थित हैं।
- बिलिगिरिरंगन पहाड़ियां सतपुड़ा श्रेणी के पूर्वी सिरे का निर्माण करती हैं।
- शेषाचलम पहाड़ियां पश्चिमी घाट के दक्षिणतम भाग का निर्माण करती हैं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कोई नहीं
तीनों कथन इन पहाड़ी श्रेणियों के स्थान और वर्गीकरण के संबंध में भौगोलिक अशुद्धियां रखते हैं। प्रत्येक कथन संबंधित पहाड़ियों के संगम बिंदु या श्रेणी संबद्धता को गलत तरीके से पहचानता है।
❌ कथन 1 – गलत: अमरकंटक पहाड़ियां विंध्य, सतपुड़ा और मैकाल श्रेणियों के संगम पर हैं, न कि विंध्य और सह्याद्री श्रेणियों के।
❌ कथन 2 – गलत: बिलिगिरिरंगन पहाड़ियां दक्षिण-पश्चिमी कर्नाटक में पूर्वी और पश्चिमी घाट के संधिस्थल पर स्थित हैं, सतपुड़ा श्रेणी का भाग नहीं हैं।
❌ कथन 3 – गलत: शेषाचलम पहाड़ियां (तिरुमला पहाड़ियां) आंध्र प्रदेश में पूर्वी घाट का भाग हैं, पश्चिमी घाट का दक्षिणतम भाग नहीं हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत की प्रमुख पहाड़ी श्रेणियां
| पहाड़ी श्रेणी | स्थान | संबद्ध पर्वत प्रणाली | महत्व |
|---|---|---|---|
| अमरकंटक पहाड़ियां | मध्य प्रदेश (अनूपपुर जिला) | विंध्य, सतपुड़ा और मैकाल श्रेणियों का संधिस्थल | नर्मदा, सोन और जोहिला नदियों का उद्गम |
| बिलिगिरिरंगन (BR) पहाड़ियां | कर्नाटक-तमिलनाडु सीमा | पूर्वी और पश्चिमी घाट का संधिस्थल | BRT वन्यजीव अभयारण्य; जैव विविधता हॉटस्पॉट |
| शेषाचलम पहाड़ियां (तिरुमला) | आंध्र प्रदेश (तिरुपति जिला) | पूर्वी घाट का भाग | तिरुपति मंदिर के लिए प्रसिद्ध; लाल चंदन का आवास |
| सह्याद्री श्रेणी | पश्चिमी भारत (महाराष्ट्र से केरल) | पश्चिमी घाट का दूसरा नाम | यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल; उच्च जैव विविधता |
| सतपुड़ा श्रेणी | मध्य भारत (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र) | नर्मदा और ताप्ती के बीच स्वतंत्र श्रेणी | पूर्व-पश्चिम उन्मुख; खनिजों में समृद्ध |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- झेलम नदी वुलर झील से होकर गुजरती है।
- कृष्णा नदी सीधे कोल्लेरु झील को पोषित करती है।
- गंडक नदी की विसर्पण क्रिया से कंवर झील का निर्माण हुआ।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल एक
यह प्रश्न भारतीय नदियों और उनसे संबंधित झीलों के ज्ञान की परीक्षा करता है। दिए गए तीन कथनों में से केवल झेलम नदी और वुलर झील के बारे में कथन सही है, जबकि अन्य दो कथनों में संबंधित झीलों के निर्माण और पोषण तंत्र के संदर्भ में तथ्यात्मक त्रुटियां हैं।
✅ कथन 1 – सही: झेलम नदी, जो कश्मीर घाटी में वेरीनाग झरने से निकलती है, वुलर झील (एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झीलों में से एक) से होकर गुजरती है और फिर बारामूला की ओर आगे बढ़ती है।
❌ कथन 2 – गलत: कोल्लेरु झील कृष्णा और गोदावरी के डेल्टाओं के बीच स्थित है लेकिन यह कृष्णा नदी द्वारा सीधे पोषित नहीं होती है; इसे बुडामेरु और तम्मिलेरु जैसी मौसमी धाराओं से जल प्राप्त होता है, जो स्वतंत्र सहायक नदियां हैं।
❌ कथन 3 – गलत: बिहार में कंवर झील (काबरताल) बूढ़ी गंडक नदी की विसर्पण क्रिया से बनी एक गोखुर झील है, न कि मुख्य गंडक नदी से—ये दो अलग नदी प्रणालियां हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: महत्वपूर्ण भारतीय झीलें और संबंधित नदियां
| झील | राज्य/स्थान | संबंधित नदी/निर्माण | प्रकार |
|---|---|---|---|
| वुलर झील | जम्मू और कश्मीर | झेलम नदी इससे होकर गुजरती है | मीठे पानी की झील (विवर्तनिक उत्पत्ति) |
| कोल्लेरु झील | आंध्र प्रदेश | कृष्णा-गोदावरी डेल्टाओं के बीच; बुडामेरु, तम्मिलेरु धाराओं द्वारा पोषित | मीठे पानी की झील |
| कंवर झील (काबरताल) | बिहार (बेगूसराय) | बूढ़ी गंडक नदी की गोखुर झील | गोखुर झील (रामसर स्थल) |
| सांभर झील | राजस्थान | अस्थायी नदी प्रणालियां | खारे पानी की झील (भारत में सबसे बड़ी) |
| चिल्का झील | ओडिशा | बंगाल की खाड़ी से जुड़ा लैगून | खारे पानी का लैगून |
| लोकटक झील | मणिपुर | मणिपुर नदी; फुमदियों (तैरते द्वीप) के लिए प्रसिद्ध | मीठे पानी की झील |
निम्नलिखित देशों पर विचार कीजिए:
- बुल्गारिया
- चेक गणराज्य
- हंगरी
- लातविया
- लिथुआनिया
- रोमानिया
उपर्युक्त में से कितने देश यूक्रेन के साथ स्थलीय सीमा साझा करते हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल दो
सूचीबद्ध छह देशों में से केवल हंगरी और रोमानिया ही यूक्रेन के साथ स्थलीय सीमा साझा करते हैं। हंगरी यूक्रेन के दक्षिण-पश्चिम में सीमा बनाता है, जबकि रोमानिया दक्षिण में सीमा साझा करता है। अन्य चार देश—बुल्गारिया, चेक गणराज्य, लातविया और लिथुआनिया—यूक्रेन के साथ प्रत्यक्ष स्थलीय सीमा साझा नहीं करते हैं।
देशवार विश्लेषण:
✅ हंगरी – सीमा साझा करता है: यूक्रेन के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है और एक साझा स्थलीय सीमा है।
✅ रोमानिया – सीमा साझा करता है: यूक्रेन के दक्षिण/दक्षिण-पश्चिम में स्थित है और एक महत्वपूर्ण स्थलीय सीमा है।
❌ बुल्गारिया – कोई सीमा नहीं: रोमानिया के दक्षिण में स्थित है; रोमानिया द्वारा यूक्रेन से अलग है।
❌ चेक गणराज्य – कोई सीमा नहीं: मध्य यूरोप में स्थित है, यूक्रेन के पश्चिम में, कोई प्रत्यक्ष सीमा नहीं है।
❌ लातविया – कोई सीमा नहीं: बाल्टिक क्षेत्र में स्थित है, यूक्रेन के उत्तर में, बेलारूस द्वारा अलग है।
❌ लिथुआनिया – कोई सीमा नहीं: बाल्टिक क्षेत्र में स्थित है, यूक्रेन के उत्तर-पश्चिम में, बेलारूस द्वारा अलग है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: यूक्रेन की स्थलीय सीमाएँ
| पड़ोसी देश | दिशा | सीमा की लंबाई (लगभग) |
|---|---|---|
| रूस | पूर्व और उत्तर-पूर्व | ~2,295 किमी (सबसे लंबी) |
| बेलारूस | उत्तर | ~1,084 किमी |
| पोलैंड | पश्चिम | ~535 किमी |
| स्लोवाकिया | पश्चिम | ~97 किमी (सबसे छोटी) |
| हंगरी | दक्षिण-पश्चिम | ~128 किमी |
| रोमानिया | दक्षिण/दक्षिण-पश्चिम | ~601 किमी |
| मोल्दोवा | दक्षिण | ~1,202 किमी |
- यूक्रेन कुल सात देशों के साथ स्थलीय सीमा साझा करता है।
- दी गई सूची में से केवल हंगरी और रोमानिया ही यूक्रेन के पड़ोसी हैं।
- चेक गणराज्य निकट है लेकिन स्लोवाकिया द्वारा अलग है।
- बाल्टिक राज्य (लातविया, लिथुआनिया) बेलारूस द्वारा अलग हैं।
- बुल्गारिया रोमानिया के दक्षिण में स्थित है और यूक्रेन तक सीधी पहुंच नहीं है।
पृथ्वी के वायुमंडल के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — अवरक्त तरंगें जलवाष्प द्वारा बड़े पैमाने पर अवशोषित होती हैं जो निचले वायुमंडल में संकेंद्रित है।
जलवाष्प, क्षोभमंडल (निचला वायुमंडल) में संकेंद्रित एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस होने के कारण, पृथ्वी की सतह से उत्सर्जित अवरक्त विकिरण को प्रभावी रूप से अवशोषित करती है। यह अवशोषण पृथ्वी पर ग्रीनहाउस प्रभाव और तापमान नियमन के लिए महत्वपूर्ण है।
❌ विकल्प 1 – गलत: भूमध्य रेखा ध्रुवों की तुलना में लगभग 2.5 गुना अधिक सूर्यातप प्राप्त करती है, 10 गुना नहीं। यह अंतर आपतन कोण और पृथ्वी की वक्रता के कारण है।
❌ विकल्प 2 – गलत: दृश्य प्रकाश सूर्यातप का लगभग 44%, अवरक्त लगभग 49%, और पराबैंगनी लगभग 7% बनाता है। अवरक्त सूर्यातप का दो-तिहाई भाग नहीं बनाता।
✅ विकल्प 3 – सही: निचले वायुमंडल (क्षोभमंडल) में जलवाष्प अवरक्त विकिरण का प्राथमिक अवशोषक है, जो इसे सही कथन बनाता है।
❌ विकल्प 4 – गलत: अवरक्त तरंगों की तरंगदैर्ध्य दृश्य प्रकाश (700 nm से 1 mm) से अधिक होती है और ये दृश्य स्पेक्ट्रम (380-700 nm) का भाग नहीं हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सौर विकिरण और वायुमंडल
- सूर्यातप संरचना: पराबैंगनी किरणें (7%), दृश्य प्रकाश (44%), अवरक्त किरणें (49%)
- वायुमंडलीय अवशोषण: ओजोन समताप मंडल में अधिकांश UV विकिरण को अवशोषित करता है; जलवाष्प और CO₂ क्षोभमंडल में अवरक्त विकिरण को अवशोषित करते हैं
- अक्षांशीय विविधता: भूमध्यरेखीय क्षेत्र आपतन कोण के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों की तुलना में 2-2.5 गुना अधिक सूर्यातप प्राप्त करते हैं
- ग्रीनहाउस गैसें: जलवाष्प (सबसे महत्वपूर्ण), CO₂, मीथेन, और ओजोन बाहर जाने वाले पार्थिव अवरक्त विकिरण को अवशोषित करती हैं
- विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम: दृश्य प्रकाश (380-700 nm), अवरक्त (700 nm-1 mm), छोटी तरंगदैर्ध्य में अधिक ऊर्जा होती है
निम्नलिखित वृक्षों पर विचार कीजिए:
- कटहल (Artocarpus heterophyllus)
- महुआ (Madhuca indica)
- सागौन (Tectona grandis)
उपर्युक्त में से कितने पर्णपाती वृक्ष हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो
उल्लिखित तीन वृक्षों में से केवल महुआ (Madhuca indica) और सागौन (Tectona grandis) पर्णपाती वृक्ष हैं जो शुष्क मौसम में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। कटहल एक सदाबहार वृक्ष है जो पूरे वर्ष अपनी पत्तियाँ बनाए रखता है।
❌ कटहल (Artocarpus heterophyllus) – सदाबहार: यह उष्णकटिबंधीय वृक्ष पश्चिमी घाट का मूल निवासी है और पूरे वर्ष हरा-भरा रहता है, जो उच्च वर्षा क्षेत्रों के सदाबहार वनों का विशिष्ट लक्षण है।
✅ महुआ (Madhuca indica) – पर्णपाती: मध्य और उत्तरी भारत के उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों में पाया जाता है, यह फरवरी-अप्रैल (शुष्क मौसम) में पत्तियाँ गिरा देता है।
✅ सागौन (Tectona grandis) – पर्णपाती: भारत के उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों की प्रमुख प्रजाति, यह नमी संरक्षण के लिए शुष्क महीनों में पत्तियाँ गिरा देता है और इमारती लकड़ी के लिए अत्यधिक मूल्यवान है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पर्णपाती बनाम सदाबहार वृक्ष
- पर्णपाती वृक्ष: वे वृक्ष जो मौसमी रूप से अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं, आमतौर पर शुष्क मौसम में जल संरक्षण के लिए। स्पष्ट आर्द्र और शुष्क अवधि वाली मानसूनी जलवायु में सामान्य।
- सदाबहार वृक्ष: वे वृक्ष जो पूरे वर्ष पत्तियाँ बनाए रखते हैं, निरंतर वर्षा और गंभीर शुष्क अवधि रहित क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- भारत में उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन: इन्हें मानसून वन भी कहा जाता है, ये भारत में सबसे व्यापक वन प्रकार हैं, जो 100-200 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में फैले हैं।
- प्रमुख पर्णपाती प्रजातियाँ: सागौन, साल, शीशम, चंदन, महुआ, कुसुम, अर्जुन, शहतूत।
- प्रमुख सदाबहार प्रजातियाँ: शीशम, महोगनी, आबनूस, कटहल, जामुन, बाँस।
- सागौन (Tectona grandis): व्यावसायिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण पर्णपाती वृक्ष; मध्यम वर्षा के साथ अच्छी जल-निकासी वाली मिट्टी में पनपता है; फर्नीचर और जहाज निर्माण में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
भारत की संपर्क परियोजनाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
गोल्डन क्वाड्रिलेटरल परियोजना के तहत पूर्व-पश्चिम गलियारा डिब्रूगढ़ और सूरत को जोड़ता है।
त्रिपक्षीय राजमार्ग मणिपुर में मोरेह और म्यांमार के माध्यम से थाईलैंड में चियांग माई को जोड़ता है।
बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारा उत्तर प्रदेश में वाराणसी को चीन में कुनमिंग से जोड़ता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कोई नहीं
तीनों कथनों में भारत की प्रमुख संपर्क परियोजनाओं के संबंध में तथ्यात्मक त्रुटियाँ हैं। प्रत्येक कथन संबंधित गलियारे/राजमार्ग के टर्मिनल बिंदुओं या मार्ग की गलत पहचान करता है।
❌ कथन 1 – गलत: NHDP के तहत पूर्व-पश्चिम गलियारा सिलचर (असम) को पोरबंदर (गुजरात) से जोड़ता है, न कि डिब्रूगढ़ को सूरत से।
❌ कथन 2 – गलत: त्रिपक्षीय राजमार्ग मोरेह (मणिपुर) को म्यांमार के माध्यम से थाईलैंड में माई सोत से जोड़ता है, न कि चियांग माई से।
❌ कथन 3 – गलत: BCIM आर्थिक गलियारा कुनमिंग (चीन) को कोलकाता (भारत) से जोड़ता है, न कि वाराणसी से।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत की प्रमुख संपर्क परियोजनाएँ
| परियोजना/गलियारा | मार्ग/टर्मिनल बिंदु | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|
| गोल्डन क्वाड्रिलेटरल (GQ) | दिल्ली-मुंबई-चेन्नई-कोलकाता को जोड़ता है | 5,846 किमी; NHDP चरण I के तहत 2001 में शुरू |
| उत्तर-दक्षिण गलियारा | श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) से कन्याकुमारी (तमिलनाडु) | 4,076 किमी; NHDP चरण II का हिस्सा |
| पूर्व-पश्चिम गलियारा | सिलचर (असम) से पोरबंदर (गुजरात) | 3,640 किमी; NHDP चरण II का हिस्सा |
| त्रिपक्षीय राजमार्ग | मोरेह (मणिपुर) - माई सोत (थाईलैंड) म्यांमार के माध्यम से | 1,360 किमी; भारत-आसियान संपर्क को बढ़ावा |
| BCIM गलियारा | कुनमिंग (चीन) - कोलकाता (भारत) म्यांमार और बांग्लादेश के माध्यम से | 2,800 किमी; प्रस्तावित आर्थिक गलियारा |
| कलादान मल्टीमॉडल परियोजना | सितवे बंदरगाह (म्यांमार) से मिजोरम (भारत) | म्यांमार के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत को जोड़ता है |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
कथन-I : उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों की मिट्टी पोषक तत्वों से समृद्ध होती है।
कथन-II : उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों के उच्च तापमान और नमी के कारण मिट्टी में मृत कार्बनिक पदार्थ शीघ्रता से विघटित हो जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कथन I गलत है लेकिन कथन II सही है
यह प्रश्न उष्णकटिबंधीय वर्षा वन की मिट्टी की विशेषताओं और पोषक चक्र की समझ का परीक्षण करता है। कथन I गलत रूप से दावा करता है कि उष्णकटिबंधीय वर्षा वन की मिट्टी पोषक तत्वों से समृद्ध होती है, जबकि वास्तव में भारी वर्षा द्वारा तीव्र निक्षालन के कारण वे पोषक तत्वों से गरीब होती हैं। कथन II सही ढंग से बताता है कि उच्च तापमान और नमी कार्बनिक पदार्थ के अपघटन को तेज करते हैं।
❌ कथन I – गलत: उष्णकटिबंधीय वर्षा वन की मिट्टी वास्तव में पोषक तत्वों से गरीब (समृद्ध नहीं) होती है क्योंकि भारी वर्षा तीव्र निक्षालन का कारण बनती है, जो मिट्टी में जमा होने से पहले पोषक तत्वों को बहा देती है।
✅ कथन II – सही: उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में उच्च तापमान और नमी बैक्टीरिया और कवक द्वारा मृत कार्बनिक पदार्थ के तीव्र अपघटन के लिए आदर्श परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं, जो पोषक तत्वों को शीघ्रता से पारिस्थितिकी तंत्र में वापस पुनर्चक्रित करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: उष्णकटिबंधीय वर्षा वन की मिट्टी और पोषक चक्र
- मिट्टी की विशेषताएँ: उष्णकटिबंधीय वर्षा वन की मिट्टी सामान्यतः पोषक तत्वों से गरीब, अम्लीय और कम उर्वरता वाली होती है, फिर भी घनी वनस्पति का समर्थन करती है।
- तीव्र निक्षालन: भारी वर्षा (वार्षिक 2000-10000 मिमी) ऊपरी मिट्टी से घुलनशील पोषक तत्वों को बहा देती है, उनके संचय को रोकती है।
- पोषक विरोधाभास: खराब मिट्टी के बावजूद, वर्षा वन घनी वृद्धि का समर्थन करते हैं क्योंकि पोषक तत्व मिट्टी के बजाय जैव भार (जीवित पौधों और जीवों) में बंद होते हैं।
- तीव्र अपघटन: उच्च तापमान (25-30°C) और आर्द्रता (>80%) अपघटकों द्वारा कुछ सप्ताहों के भीतर कार्बनिक पदार्थ के शीघ्र टूटने की सुविधा देते हैं।
- बंद पोषक चक्र: अपघटन से मुक्त पोषक तत्वों को पौधों की जड़ों और माइकोराइजल कवक द्वारा तुरंत अवशोषित कर लिया जाता है, निक्षालन के माध्यम से हानि को रोकते हुए।
- उथली जड़ प्रणाली: अधिकांश वर्षा वन के पेड़ों में उथली, फैली हुई जड़ें होती हैं जो निक्षालित होने से पहले पोषक तत्वों को शीघ्रता से ग्रहण करती हैं।
- कृषि निहितार्थ: जब वर्षा वनों को कृषि के लिए साफ किया जाता है, तो पतली पोषक परत शीघ्रता से समाप्त हो जाती है, जिससे 2-3 वर्षों के भीतर भूमि बंजर हो जाती है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
कथन-I: महाद्वीपों और महासागरों के बीच तापमान का अंतर शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में अधिक होता है।
कथन-II: जल की विशिष्ट ऊष्मा स्थल सतह की तुलना में अधिक होती है।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कथन-I गलत है लेकिन कथन-II सही है
कथन-I में दावा किया गया है कि महाद्वीपों और महासागरों के बीच तापमान का अंतर ग्रीष्म ऋतु में अधिक होता है, जो गलत है। वास्तव में, यह अंतर शीत ऋतु में अधिक होता है क्योंकि स्थल तेजी से ठंडा होता है जबकि महासागर ऊष्मा को बनाए रखते हैं, जिससे बड़ा तापमान अंतर उत्पन्न होता है। ग्रीष्म ऋतु में, स्थल और महासागर दोनों गर्म होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप तापमान का अंतर कम होता है।
❌ कथन-I – गलत: महाद्वीपों और महासागरों के बीच तापमान का अंतर ग्रीष्म ऋतु में नहीं बल्कि शीत ऋतु में अधिक होता है, क्योंकि स्थल शीत ऋतु में तेजी से ऊष्मा खो देता है जबकि महासागर अपेक्षाकृत गर्म बने रहते हैं।
✅ कथन-II – सही: जल की विशिष्ट ऊष्मा धारिता स्थल की तुलना में अधिक होती है, जिसका अर्थ है कि यह धीरे-धीरे गर्म और ठंडा होता है, जो तापमान पर महासागरों के नियामक प्रभाव की व्याख्या करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: स्थल और जल का विभेदी तापन
- विशिष्ट ऊष्मा धारिता: जल की विशिष्ट ऊष्मा धारिता स्थल की तुलना में लगभग 4 गुना अधिक होती है, जिससे इसके तापमान को बदलने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
- ग्रीष्म ऋतु का पैटर्न: स्थल तेजी से गर्म होता है और महासागरों से अधिक गर्म हो जाता है; तापमान अंतर मध्यम होता है (सामान्यतः 5-10°C)।
- शीत ऋतु का पैटर्न: स्थल तेजी से ठंडा होता है और महासागरों की तुलना में बहुत अधिक ठंडा हो जाता है; तापमान अंतर बड़ा होता है (20-30°C से अधिक हो सकता है), जिससे अधिकतम अंतर उत्पन्न होता है।
- महाद्वीपीयता प्रभाव: महासागरों से दूर के क्षेत्र नियामक महासागरीय प्रभाव की कमी के कारण चरम तापमान भिन्नता का अनुभव करते हैं।
- सामुद्रिक जलवायु: तटीय क्षेत्रों में महासागरीय प्रभाव के कारण वार्षिक तापमान परिसर छोटा होता है।
- मानसून का निर्माण: स्थल और महासागर के बीच विभेदी तापन मानसूनी परिसंचरण को संचालित करता है, विशेष रूप से शीत ऋतु में जब अंतर अधिकतम होता है।
विश्व के लगभग तीन-चौथाई कोबाल्ट, जो इलेक्ट्रिक मोटर वाहनों के लिए बैटरी के निर्माण हेतु आवश्यक धातु है, का उत्पादन किसके द्वारा किया जाता है
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य
कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) विश्व का प्रमुख कोबाल्ट उत्पादक है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 70% हिस्सा रखता है और विश्व के ज्ञात कोबाल्ट भंडार का आधा हिस्सा अपने पास रखता है। कोबाल्ट एक महत्वपूर्ण खनिज है जो इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में उपयोग की जाने वाली रिचार्जेबल बैटरी के निर्माण के लिए आवश्यक है, जिससे स्वच्छ ऊर्जा की ओर वैश्विक संक्रमण के लिए DRC का वर्चस्व रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वैश्विक कोबाल्ट उत्पादन और रणनीतिक महत्व
- प्राथमिक उपयोग: कोबाल्ट इलेक्ट्रिक वाहनों, स्मार्टफोन, लैपटॉप और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में लिथियम-आयन बैटरी के साथ-साथ सुपरएलॉय, उत्प्रेरक, चुंबक और रंगद्रव्य में महत्वपूर्ण है।
- शीर्ष उत्पादक: कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (70%), इंडोनेशिया, रूस, ऑस्ट्रेलिया और मेडागास्कर विश्व स्तर पर शीर्ष पांच कोबाल्ट उत्पादक देश हैं।
- DRC का वर्चस्व: DRC के पास विश्व के ज्ञात कोबाल्ट भंडार का लगभग 50% है और यह वैश्विक उत्पादन का तीन-चौथाई हिस्सा रखता है, जिससे यह स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन गया है।
- रणनीतिक खनिज की स्थिति: भारत सहित कई सरकारों ने भविष्य की प्रौद्योगिकियों और ऊर्जा सुरक्षा के लिए इसके महत्व के कारण कोबाल्ट को एक महत्वपूर्ण खनिज के रूप में वर्गीकृत किया है।
- भारतीय संदर्भ: ओडिशा और झारखंड में कोबाल्ट के छोटे भंडार मौजूद हैं, हालांकि भारत अपनी कोबाल्ट आवश्यकताओं के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है।
- भू-राजनीतिक चिंताएं: एक ही देश में कोबाल्ट उत्पादन का केंद्रीकरण आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियों, नैतिक खनन प्रथाओं और वैश्विक बाजार में मूल्य अस्थिरता के बारे में चिंताएं बढ़ाता है।
भारत के कुछ तटीय क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध इल्मेनाइट और रुटाइल, निम्नलिखित में से किसके समृद्ध स्रोत हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — टाइटेनियम
इल्मेनाइट (FeTiO₃) और रुटाइल (TiO₂) टाइटेनियम युक्त खनिज हैं जो भारत के तटीय समुद्री रेत निक्षेपों में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ये खनिज टाइटेनियम के समृद्ध स्रोत हैं और इन्हें टाइटेनियम डाइऑक्साइड निकालने के लिए संसाधित किया जाता है, जिसे आगे परिष्कृत करके धात्विक टाइटेनियम का उत्पादन किया जाता है जिसका उपयोग एयरोस्पेस, चिकित्सा और औद्योगिक अनुप्रयोगों में होता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत के समुद्री रेत खनिज
- भारी खनिज: भारत में समुद्री रेत में सात प्रमुख भारी खनिज होते हैं—इल्मेनाइट, ल्यूकोक्सीन, रुटाइल, जिरकॉन, सिलिमेनाइट, गार्नेट और मोनाजाइट।
- टाइटेनियम खनिज: इल्मेनाइट (FeTiO₃) और रुटाइल (TiO₂) टाइटेनियम के प्राथमिक स्रोत हैं; ल्यूकोक्सीन उच्च TiO₂ सामग्री वाला इल्मेनाइट का परिवर्तित रूप है।
- प्रमुख तटीय निक्षेप: केरल, तमिलनाडु, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटों पर पाए जाते हैं, विशेष रूप से चावरा, मानावलकुरिची और छत्रपुर जैसे क्षेत्रों में।
- टाइटेनियम के उपयोग: उच्च शक्ति-से-भार अनुपात और संक्षारण प्रतिरोध के लिए जाना जाता है; एयरोस्पेस घटकों, चिकित्सा प्रत्यारोपण, वर्णक (TiO₂), और रक्षा अनुप्रयोगों में उपयोग किया जाता है।
- अन्य आर्थिक खनिज: जिरकॉन (जिरकोनियम स्रोत), मोनाजाइट (थोरियम और दुर्लभ मृदा), गार्नेट (अपघर्षक), और सिलिमेनाइट (अपवर्तक)।
- निष्कर्षण विधि: समुद्री रेत खनन में ड्रेजिंग शामिल है, जिसके बाद भारी खनिजों को केंद्रित करने के लिए गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय पृथक्करण किया जाता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भूकम्पलेखी में, P तरंगें S तरंगों की तुलना में पहले रिकॉर्ड की जाती हैं।
- P तरंगों में, व्यक्तिगत कण तरंग संचरण की दिशा में आगे-पीछे कंपन करते हैं जबकि S तरंगों में, कण तरंग संचरण की दिशा के समकोण पर ऊपर-नीचे कंपन करते हैं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
भूकंपीय तरंगों के संबंध में दोनों कथन सही हैं। P तरंगें (प्राथमिक तरंगें) S तरंगों (द्वितीयक तरंगों) की तुलना में तेज गति से यात्रा करती हैं और इसलिए भूकम्पलेखी द्वारा पहले रिकॉर्ड की जाती हैं। दोनों तरंग प्रकार अपनी कण गति विशेषताओं में भी मूल रूप से भिन्न हैं।
✅ कथन 1 – सही: P तरंगें वास्तव में भूकम्पलेखी पर S तरंगों की तुलना में पहले रिकॉर्ड की जाती हैं क्योंकि ये सबसे तेज भूकंपीय तरंगें हैं, जो पृथ्वी की भूपर्पटी में 5-8 किमी/सेकंड की गति से यात्रा करती हैं जबकि S तरंगें 3-4.5 किमी/सेकंड की गति से यात्रा करती हैं।
✅ कथन 2 – सही: P तरंगें संपीड़न/अनुदैर्ध्य तरंगें हैं जहाँ कण तरंग संचरण की दिशा के समानांतर कंपन करते हैं (आगे-पीछे गति), जबकि S तरंगें अपरूपण/अनुप्रस्थ तरंगें हैं जहाँ कण तरंग संचरण की दिशा के लंबवत कंपन करते हैं (ऊपर-नीचे या बाएं-दाएं गति)।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भूकंपीय तरंगें
| विशेषता | P तरंगें (प्राथमिक) | S तरंगें (द्वितीयक) |
|---|---|---|
| गति | सबसे तेज (भूपर्पटी में 5-8 किमी/सेकंड) | धीमी (भूपर्पटी में 3-4.5 किमी/सेकंड) |
| आगमन समय | सबसे पहले पहुँचती हैं | दूसरी पहुँचती हैं |
| तरंग प्रकार | अनुदैर्ध्य/संपीड़न | अनुप्रस्थ/अपरूपण |
| कण गति | तरंग दिशा के समानांतर (धक्का-खिंचाव) | तरंग दिशा के लंबवत (ऊपर-नीचे/बाएं-दाएं) |
| माध्यम | ठोस, तरल और गैसों में यात्रा करती हैं | केवल ठोस में यात्रा करती हैं |
| विनाशकारी शक्ति | कम विनाशकारी | अधिक विनाशकारी |
हरित हाइड्रोजन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- इसका उपयोग आंतरिक दहन के लिए सीधे ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
- इसे प्राकृतिक गैस के साथ मिलाकर ऊष्मा या विद्युत उत्पादन के लिए ईंधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
- इसका उपयोग वाहनों को चलाने के लिए हाइड्रोजन ईंधन सेल में किया जा सकता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — सभी तीन
हरित हाइड्रोजन, जो इलेक्ट्रोलिसिस के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से उत्पादित होता है, एक बहुमुखी स्वच्छ ईंधन है जिसका उपयोग कई तरीकों से किया जा सकता है। इसके अनुप्रयोगों से संबंधित सभी तीन कथन सही हैं।
✅ कथन 1 – सही: हरित हाइड्रोजन का उपयोग संशोधित आंतरिक दहन इंजनों में सीधे ईंधन के रूप में किया जा सकता है, जो पारंपरिक जीवाश्म ईंधन का स्थान ले सकता है।
✅ कथन 2 – सही: हरित हाइड्रोजन को प्राकृतिक गैस (मौजूदा पाइपलाइनों में 20% तक) के साथ मिलाया जा सकता है और ऊष्मा, विद्युत उत्पादन और औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए उपयोग किया जा सकता है।
✅ कथन 3 – सही: हरित हाइड्रोजन का उपयोग हाइड्रोजन ईंधन सेल में विद्युत वाहनों को चलाने के लिए बिजली उत्पन्न करने में किया जाता है, जो शून्य-उत्सर्जन परिवहन प्रदान करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: हरित हाइड्रोजन
- परिभाषा: नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन, जल) का उपयोग करके जल के इलेक्ट्रोलिसिस के माध्यम से उत्पादित हाइड्रोजन, जिसके परिणामस्वरूप शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है।
- उत्पादन विधि: इलेक्ट्रोलाइज़र में नवीकरणीय स्रोतों से विद्युत का उपयोग करके जल (H₂O) को हाइड्रोजन (H₂) और ऑक्सीजन (O₂) में विभाजित किया जाता है।
- रंग कोडिंग: हरित (नवीकरणीय ऊर्जा), ग्रे (कार्बन कैप्चर के बिना जीवाश्म ईंधन), नीला (कार्बन कैप्चर के साथ जीवाश्म ईंधन), भूरा/काला (कोयला)।
- अनुप्रयोग: परिवहन (ईंधन सेल वाहन), औद्योगिक प्रक्रियाएं (इस्पात, अमोनिया उत्पादन), ऊर्जा भंडारण, विद्युत उत्पादन और ऊष्मा।
- भारत की पहल: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (2023) जिसका लक्ष्य 2030 तक 5 MMT वार्षिक उत्पादन है; भारत को हरित हाइड्रोजन उत्पादन और निर्यात के लिए वैश्विक केंद्र बनाने पर ध्यान।
- लाभ: उपयोग के स्थान पर शून्य उत्सर्जन, उच्च ऊर्जा घनत्व, दीर्घकालिक भंडारण क्षमता, और विभिन्न क्षेत्रों में बहुमुखी अनुप्रयोग।
- चुनौतियां: उच्च उत्पादन लागत, ऊर्जा-गहन इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया, भंडारण और परिवहन बुनियादी ढांचे की आवश्यकताएं, और नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार की आवश्यकता।
UPSC Prelims 2023 Questions Paper - Subject-wise Question Distribution
पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
16 Qs (16%)भारतीय अर्थव्यवस्था
15 Qs (15%)भारतीय राजव्यवस्था
14 Qs (14%)विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
12 Qs (12%)अंतरराष्ट्रीय संबंध
11 Qs (11%)विश्व भूगोल
9 Qs (9%)समसामयिकी
6 Qs (6%)भारतीय कला और संस्कृति
4 Qs (4%)भारत का भूगोल
4 Qs (4%)मध्यकालीन इतिहास
3 Qs (3%)प्राचीन इतिहास
3 Qs (3%)आधुनिक इतिहास
3 Qs (3%)UPSC Prelims 2023 Question Paper - FAQs & Analysis
Q1 How many total questions were asked in UPSC Prelims 2023?
Q2 What is the subject-wise question breakdown for UPSC Prelims 2023?
- पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी: 16 questions (16%)
- भारतीय अर्थव्यवस्था: 15 questions (15%)
- भारतीय राजव्यवस्था: 14 questions (14%)
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: 12 questions (12%)
- अंतरराष्ट्रीय संबंध: 11 questions (11%)
- विश्व भूगोल: 9 questions (9%)
- समसामयिकी: 6 questions (6%)
- भारतीय कला और संस्कृति: 4 questions (4%)
- भारत का भूगोल: 4 questions (4%)
- मध्यकालीन इतिहास: 3 questions (3%)
- प्राचीन इतिहास: 3 questions (3%)
- आधुनिक इतिहास: 3 questions (3%)