UPSC Prelims 2023
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी Previous Year Questions (PYQs)
Explore 12 solved UPSC Prelims 2023 विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी questions with detailed step-by-step bilingual solutions, option analysis, and answer keys.
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- कार्बन फाइबर का उपयोग ऑटोमोबाइल और विमानों में प्रयुक्त घटकों के निर्माण में किया जाता है।
- कार्बन फाइबर का एक बार उपयोग करने के बाद पुनर्चक्रण नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
कार्बन फाइबर का व्यापक रूप से ऑटोमोबाइल और विमानों के घटकों के निर्माण में उपयोग किया जाता है क्योंकि इनमें असाधारण शक्ति-से-वजन अनुपात, उच्च कठोरता और हल्के गुण होते हैं। कथन 1 सही है क्योंकि ये सामग्री एयरोस्पेस और ऑटोमोटिव उद्योगों में वजन कम करने और ईंधन दक्षता में सुधार के लिए महत्वपूर्ण हैं।
✅ कथन 1 – सही: कार्बन फाइबर वास्तव में अपने बेहतर यांत्रिक गुणों और हल्के स्वभाव के कारण ऑटोमोबाइल और विमान घटकों के निर्माण में उपयोग किए जाते हैं।
❌ कथन 2 – गलत: कार्बन फाइबर का पुनर्चक्रण विभिन्न विधियों जैसे यांत्रिक पुनर्चक्रण (छोटे टुकड़ों में तोड़ना), रासायनिक पुनर्चक्रण (फाइबर निकालने के लिए राल को घोलना), और थर्मल पुनर्चक्रण (फाइबर पुनर्प्राप्त करने के लिए पायरोलिसिस) के माध्यम से किया जा सकता है, हालांकि प्रौद्योगिकी अभी विकसित हो रही है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कार्बन फाइबर
- संरचना: कार्बन परमाणुओं की लंबी श्रृंखलाओं से युक्त कार्बनिक बहुलकों से बने होते हैं जो क्रिस्टलीय संरेखण में बंधे होते हैं
- मुख्य गुण: उच्च तन्य शक्ति, कम वजन (स्टील से 5 गुना हल्का), उच्च कठोरता, उच्च तापमान सहनशीलता, कम थर्मल विस्तार, और रासायनिक प्रतिरोध
- निर्माण प्रक्रिया: पॉलीएक्रिलोनिट्राइल (PAN), पिच, या रेयान जैसी पूर्ववर्ती सामग्रियों के उच्च तापमान (1000-3000°C) पर कार्बनीकरण के माध्यम से उत्पादित
- अनुप्रयोग: एयरोस्पेस (विमान फ्यूजलेज, पंख), ऑटोमोटिव (रेसिंग कारें, लक्जरी वाहन), खेल उपकरण (साइकिल, टेनिस रैकेट), पवन टरबाइन ब्लेड, और चिकित्सा उपकरण
- पुनर्चक्रण विधियाँ: यांत्रिक (काटना/पीसना), थर्मल/पायरोलिसिस (450-700°C पर राल को जलाना), रासायनिक (विलायकों का उपयोग करके सॉल्वोलिसिस), और इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रियाएं
- चुनौतियाँ: उच्च उत्पादन लागत, भंगुरता (कम प्रभाव प्रतिरोध), धातुओं की तुलना में पुनर्चक्रण में कठिनाई, और विशेष निर्माण आवश्यकताएं
- पर्यावरणीय विचार: जबकि पहले पुनर्चक्रण क्षमता सीमित थी, आधुनिक पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकियाँ कार्बन फाइबर कंपोजिट को अधिक टिकाऊ बना रही हैं और पुनर्प्राप्त फाइबर मूल गुणों का 90-95% बनाए रखते हैं
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- बैलिस्टिक मिसाइलें अपनी पूरी उड़ान के दौरान सबसोनिक गति पर जेट-संचालित होती हैं, जबकि क्रूज मिसाइलें केवल उड़ान के प्रारंभिक चरण में रॉकेट-संचालित होती हैं।
- अग्नि-V एक मध्यम दूरी की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जबकि ब्रह्मोस एक ठोस-ईंधन वाली अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न तो 1 और न ही 2
दोनों कथन बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों की मौलिक विशेषताओं के साथ-साथ अग्नि-V और ब्रह्मोस मिसाइलों के विशिष्ट प्रकारों का गलत वर्णन करते हैं। आइए प्रत्येक कथन का मूल्यांकन करें:
❌ कथन 1 – गलत: कथन प्रणोदन विशेषताओं को गलत तरीके से अदल-बदल करता है। बैलिस्टिक मिसाइलें रॉकेट-संचालित होती हैं और सुपरसोनिक या हाइपरसोनिक गति से ऊंचे, चापाकार बैलिस्टिक पथ का अनुसरण करती हैं, जबकि क्रूज मिसाइलें जेट-संचालित होती हैं, वायुगतिकीय उत्थापन का उपयोग करते हुए कम ऊंचाई पर उड़ती हैं, और सबसोनिक, सुपरसोनिक, या हाइपरसोनिक हो सकती हैं।
❌ कथन 2 – गलत: कथन दोनों मिसाइलों का गलत वर्णन करता है। अग्नि-V एक ठोस-ईंधन वाली अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) है जिसकी सीमा 5,000 किमी से अधिक है, जो महाद्वीपों में लक्ष्यों पर वार करने में सक्षम है। ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (बैलिस्टिक मिसाइल नहीं) है जिसे भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है, जिसकी सीमा लगभग 450-600 किमी है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: बैलिस्टिक बनाम क्रूज मिसाइलें
| विशेषता | बैलिस्टिक मिसाइलें | क्रूज मिसाइलें |
|---|---|---|
| प्रणोदन | रॉकेट-संचालित (प्रारंभिक बूस्ट चरण) | जेट-संचालित (वायु-श्वसन इंजन) पूरी उड़ान के दौरान |
| प्रक्षेपवक्र | ऊंचा, चापाकार बैलिस्टिक पथ; वायुमंडल से बाहर निकलता है और पुनः प्रवेश करता है | कम-ऊंचाई, वायुगतिकीय उत्थापन का उपयोग करते हुए भूभाग की आकृति का अनुसरण करता है |
| गति | सुपरसोनिक से हाइपरसोनिक | सबसोनिक, सुपरसोनिक, या हाइपरसोनिक |
| मार्गदर्शन | केवल बूस्ट चरण के दौरान निर्देशित; मुक्त-पतन अवरोहण | पूरी उड़ान के दौरान निरंतर निर्देशित |
| सीमा श्रेणियां | लघु (< 1,000 किमी), मध्यम (1,000-3,000 किमी), मध्यवर्ती (3,000-5,500 किमी), अंतरमहाद्वीपीय (> 5,500 किमी) | सामरिक (< 300 किमी), मध्यम (300-1,000 किमी), लंबी दूरी (> 1,000 किमी) |
| भारतीय उदाहरण | अग्नि श्रृंखला (I, II, III, IV, V), पृथ्वी श्रृंखला | ब्रह्मोस, निर्भय |
- अग्नि-V: भारत की सबसे लंबी दूरी की ICBM जिसकी मारक सीमा 5,000 किमी से अधिक है, तीन-चरणीय ठोस-ईंधन वाली मिसाइल, परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम, भारत की रणनीतिक प्रतिरोध क्षमता को बढ़ाती है।
- ब्रह्मोस: विश्व की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (मैक 2.8-3), भारत (DRDO) और रूस (NPO Mashinostroyeniya) के बीच संयुक्त उद्यम, भूमि, समुद्र, वायु और पनडुब्बी से प्रक्षेपित प्रकारों में उपलब्ध।
- पता लगाने में कठिनाई: क्रूज मिसाइलें कम उड़ती हैं और रडार द्वारा पता लगाना कठिन होता है, जबकि बैलिस्टिक मिसाइलों के प्रक्षेपण के बाद अनुमानित प्रक्षेपवक्र होते हैं लेकिन उच्च गति के कारण रोकना कठिन होता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- कुछ मशरूम में औषधीय गुण होते हैं।
- कुछ मशरूम में मनोसक्रिय गुण होते हैं।
- कुछ मशरूम में कीटनाशक गुण होते हैं।
- कुछ मशरूम में जैव-दीप्तिमान गुण होते हैं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — सभी चार
मशरूम के गुणों के बारे में सभी चार कथन वैज्ञानिक रूप से सटीक हैं। मशरूम जैविक गुणों की उल्लेखनीय विविधता प्रदर्शित करते हैं जो औषधीय, मनोरंजक, कृषि और पारिस्थितिक संदर्भों में प्रलेखित और उपयोग किए गए हैं।
✅ कथन 1 – सही: औषधीय मशरूम जैसे रेशी (Ganoderma lucidum), टर्की टेल (Trametes versicolor), और लायन्स मेन (Hericium erinaceus) में जैव-सक्रिय यौगिक होते हैं जिनमें प्रतिरक्षा-मॉड्यूलेटिंग, सूजन-रोधी और न्यूरोप्रोटेक्टिव गुण होते हैं।
✅ कथन 2 – सही: साइलोसाइबिन युक्त मनोसक्रिय मशरूम (जैसे Psilocybe cubensis) मतिभ्रमी प्रभाव उत्पन्न करते हैं और अवसाद और PTSD के उपचार में चिकित्सीय अनुप्रयोगों के लिए शोधित किए जा रहे हैं।
✅ कथन 3 – सही: कीटनाशक मशरूम जैसे Metarhizium anisopliae और Beauveria bassiana कीड़ों के लिए विषैले यौगिक उत्पन्न करते हैं और कृषि में जैविक कीट नियंत्रण एजेंट के रूप में उपयोग किए जाते हैं।
✅ कथन 4 – सही: जैव-दीप्तिमान मशरूम जैसे Mycena chlorophos और Panellus stipticus ल्यूसिफेरिन और ल्यूसिफेरेज से जुड़ी एंजाइमेटिक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से प्रकाश उत्पन्न करते हैं, जो अंधेरे वन वातावरण में प्राकृतिक चमक पैदा करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मशरूम के गुण
| गुण | उदाहरण | प्रमुख अनुप्रयोग/यौगिक |
|---|---|---|
| औषधीय | रेशी, टर्की टेल, लायन्स मेन, कॉर्डिसेप्स, चागा | पॉलीसैकेराइड्स (बीटा-ग्लूकन्स), ट्राइटरपीन; प्रतिरक्षा समर्थन, संज्ञानात्मक वृद्धि, कैंसर-रोधी शोध |
| मनोसक्रिय | Psilocybe cubensis, Psilocybe semilanceata | साइलोसाइबिन और साइलोसिन; मतिभ्रमी प्रभाव, मानसिक स्वास्थ्य विकारों के लिए चिकित्सीय शोध |
| कीटनाशक | Metarhizium anisopliae, Beauveria bassiana | एंटोमोपैथोजेनिक कवक; जैविक कीट नियंत्रण, कीट-विषैले यौगिक उत्पन्न करता है |
| जैव-दीप्तिमान | Mycena chlorophos, Panellus stipticus, Omphalotus olearius | ल्यूसिफेरिन-ल्यूसिफेरेज प्रणाली; हरी रोशनी उत्पन्न करता है, बीजाणु प्रसार में पारिस्थितिक भूमिका |
🧐 Not Sure What to Study Next?
Get a personalised study plan based on your goals, time and revision needs.
निम्नलिखित क्रियाओं पर विचार कीजिए:
- कार दुर्घटना/टक्कर का पता लगाना जिसके परिणामस्वरूप एयरबैग लगभग तात्क्षणिक रूप से तैनात हो जाते हैं
- लैपटॉप के जमीन की ओर आकस्मिक मुक्त गिरावट का पता लगाना जिसके परिणामस्वरूप हार्ड ड्राइव तुरंत बंद हो जाती है
- स्मार्टफोन के झुकाव का पता लगाना जिसके परिणामस्वरूप पोर्ट्रेट और लैंडस्केप मोड के बीच डिस्प्ले घूमता है
उपर्युक्त में से कितनी क्रियाओं में एक्सेलेरोमीटर के कार्य की आवश्यकता होती है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — सभी तीन
एक्सेलेरोमीटर एक सेंसर है जो त्वरण बलों को मापता है, जिसमें वेग में परिवर्तन, अचानक गतिविधियाँ और अभिविन्यास (झुकाव) में परिवर्तन शामिल हैं। प्रश्न में वर्णित सभी तीन क्रियाओं के लिए त्वरण परिवर्तन या अभिविन्यास परिवर्तन का पता लगाने की आवश्यकता होती है, जिससे एक्सेलेरोमीटर उनके कार्य के लिए आवश्यक हो जाता है।
✅ क्रिया 1 – कार दुर्घटना का पता लगाना: एक्सेलेरोमीटर टक्कर के दौरान तेजी से मंदन का पता लगाते हैं, जो क्रैश डिटेक्शन सिस्टम के माध्यम से तत्काल एयरबैग तैनाती को ट्रिगर करता है।
✅ क्रिया 2 – लैपटॉप मुक्त गिरावट का पता लगाना: एक्सेलेरोमीटर मुक्त गिरावट के विशिष्ट त्वरण पैटर्न (शून्य के निकट प्रतिरोध) को महसूस करते हैं, प्रभाव पर क्षति को रोकने के लिए तुरंत हार्ड ड्राइव हेड्स को पार्क कर देते हैं।
✅ क्रिया 3 – स्मार्टफोन झुकाव का पता लगाना: एक्सेलेरोमीटर गुरुत्वाकर्षण के सापेक्ष डिवाइस के अभिविन्यास की निरंतर निगरानी करते हैं, जो पोर्ट्रेट और लैंडस्केप मोड के बीच स्वचालित डिस्प्ले रोटेशन को सक्षम बनाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: एक्सेलेरोमीटर अनुप्रयोग
- परिभाषा: एक्सेलेरोमीटर एक इलेक्ट्रो-मैकेनिकल उपकरण है जो त्वरण बलों को मापता है, दोनों स्थिर (गुरुत्वाकर्षण) और गतिशील (गति, कंपन, झटका)।
- कार्य सिद्धांत: यह त्वरण के अधीन होने पर स्प्रिंग्स पर एक प्रूफ मास के विस्थापन को मापकर वेग, झुकाव, घूर्णन और कंपन में परिवर्तन का पता लगाता है।
- प्रकार: MEMS (माइक्रो-इलेक्ट्रो-मैकेनिकल सिस्टम) एक्सेलेरोमीटर उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स में सबसे अधिक उपयोग किए जाते हैं क्योंकि इनका आकार छोटा और ऊर्जा खपत कम होती है।
- ऑटोमोटिव सुरक्षा: एयरबैग तैनाती प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक स्थिरता नियंत्रण (ESC), एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (ABS), और रोलओवर डिटेक्शन में उपयोग किया जाता है।
- उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स: स्मार्टफोन (स्क्रीन रोटेशन, कदम गिनना, जेस्चर पहचान), लैपटॉप (हार्ड ड्राइव सुरक्षा), गेमिंग कंट्रोलर (मोशन सेंसिंग), और फिटनेस ट्रैकर।
- औद्योगिक अनुप्रयोग: मशीनरी में कंपन निगरानी, भवनों और पुलों की संरचनात्मक स्वास्थ्य निगरानी, और भूकंपीय गतिविधि का पता लगाना।
- विमानन और नेविगेशन: जड़त्वीय नेविगेशन सिस्टम, उड़ान स्थिरीकरण, और ड्रोन अभिविन्यास नियंत्रण।
'वोलबाकिया विधि' कभी-कभी निम्नलिखित में से किसके संदर्भ में चर्चा में आती है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — मच्छरों द्वारा फैलाई जाने वाली वायरल बीमारियों को नियंत्रित करना
वोलबाकिया विधि एक जैविक हस्तक्षेप है जो मच्छर जनित वायरल रोगों, विशेष रूप से डेंगू, जीका, चिकनगुनिया और पीत ज्वर को नियंत्रित करने के लिए वोलबाकिया बैक्टीरिया का उपयोग करती है। जब वोलबाकिया को एडीज एजिप्टी मच्छरों में प्रवेश कराया जाता है (जो स्वाभाविक रूप से इसे नहीं रखते), तो यह मच्छर की इन वायरस को मनुष्यों में संचारित करने की क्षमता को कम कर देता है। इसके अतिरिक्त, वोलबाकिया मातृ संचरण के माध्यम से मच्छर आबादी में फैलता है, जिससे यह एक आत्मनिर्भर और पर्यावरण-अनुकूल रोग नियंत्रण दृष्टिकोण बन जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वेक्टर नियंत्रण के लिए वोलबाकिया विधि
- वोलबाकिया क्या है: एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला जीवाणु जो लगभग 60% कीट प्रजातियों में पाया जाता है, लेकिन एडीज एजिप्टी या एडीज एल्बोपिक्टस मच्छरों में नहीं।
- तंत्र: जब एडीज मच्छरों में प्रवेश कराया जाता है, तो वोलबाकिया वायरस प्रतिकृति में हस्तक्षेप करता है, डेंगू, जीका, चिकनगुनिया और पीत ज्वर वायरस के लिए वेक्टर क्षमता को कम करता है।
- आत्मनिर्भर: वोलबाकिया मातृ रूप से विरासत में मिलता है; संक्रमित मादाएं अपनी संतानों को बैक्टीरिया पारित करती हैं, जिससे मच्छर आबादी में इसकी निरंतरता सुनिश्चित होती है।
- साइटोप्लाज्मिक असंगति: असंक्रमित मादाओं द्वारा वोलबाकिया-संक्रमित नरों के साथ संभोग से उत्पादित अंडे नहीं फूटते, जिससे वोलबाकिया-वाहक मच्छरों को प्रजनन लाभ मिलता है।
- कार्यान्वयन: ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, ब्राजील, कोलंबिया और भारत (पुणे और दिल्ली में पायलट परियोजनाएं) जैसे देशों में विश्व मच्छर कार्यक्रम द्वारा सफलतापूर्वक तैनात किया गया।
- लाभ: मनुष्यों और पर्यावरण के लिए सुरक्षित, लंबी अवधि में लागत प्रभावी, आनुवंशिक संशोधन शामिल नहीं, और एक साथ कई बीमारियों को लक्षित करता है।
'माइक्रोसैटेलाइट DNA' का उपयोग निम्नलिखित में से किस मामले में किया जाता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — विभिन्न जीव-जंतु प्रजातियों के बीच विकासवादी संबंधों का अध्ययन करना
माइक्रोसैटेलाइट DNA, जिसे शॉर्ट टेंडम रिपीट्स (STRs) के रूप में भी जाना जाता है, अत्यधिक बहुरूपी DNA अनुक्रम हैं जो व्यक्तियों और जनसंख्याओं के बीच महत्वपूर्ण भिन्नता दर्शाते हैं। ये भिन्नताएं इन्हें विभिन्न जीव-जंतु प्रजातियों के बीच विकासवादी संबंधों, जनसंख्या आनुवंशिकी और फाइलोजेनेटिक अध्ययनों के लिए उत्कृष्ट आनुवंशिक मार्कर बनाती हैं। उच्च उत्परिवर्तन दर और दोहराए गए अनुक्रमों की संख्या में परिवर्तनशीलता शोधकर्ताओं को आनुवंशिक वंशावली का पता लगाने और विकासवादी विचलन पैटर्न को समझने में सक्षम बनाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: माइक्रोसैटेलाइट DNA (शॉर्ट टेंडम रिपीट्स)
- परिभाषा: माइक्रोसैटेलाइट छोटे दोहराए जाने वाले DNA अनुक्रम (सामान्यतः 1-6 बेस पेयर) हैं जो संपूर्ण जीनोम में टेंडम सरणियों में दोहराए जाते हैं।
- बहुरूपता: व्यक्तियों के बीच दोहराव की संख्या में अत्यधिक परिवर्तनशील, जो उन्हें पहचान और विविधता अध्ययन के लिए उपयोगी आनुवंशिक मार्कर बनाता है।
- विकासवादी जीवविज्ञान में अनुप्रयोग: आनुवंशिक विविधता, जनसंख्या संरचना, जीन प्रवाह और प्रजातियों के बीच फाइलोजेनेटिक संबंधों का अध्ययन करने के लिए उपयोग किया जाता है।
- अन्य अनुप्रयोग: DNA फिंगरप्रिंटिंग, पितृत्व परीक्षण, फोरेंसिक विश्लेषण, संरक्षण आनुवंशिकी और प्रजनन कार्यक्रम।
- लाभ: सह-प्रभावी वंशानुक्रम, उच्च उत्परिवर्तन दर, जीनोम में प्रचुरता और PCR का उपयोग करके प्रवर्धन में आसानी।
- संबंधित नहीं: स्टेम सेल रूपांतरण, क्लोनल प्रवर्धन तकनीकों या प्रत्यक्ष दवा प्रभावकारिता परीक्षण से (इनमें विभिन्न आणविक तकनीकें शामिल हैं)।
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
अंतरिक्ष में वस्तुएँ: विवरण
- सेफीड्स: अंतरिक्ष में धूल और गैस के विशाल बादल
- नीहारिकाएँ: तारे जो आवधिक रूप से चमकते और मंद होते हैं
- पल्सर: न्यूट्रॉन तारे जो तब बनते हैं जब विशाल तारों का ईंधन समाप्त हो जाता है और वे संकुचित हो जाते हैं
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल एक
यह प्रश्न खगोलीय पिंडों और उनकी सही परिभाषाओं के ज्ञान की परीक्षा करता है। दिए गए तीन युग्मों में से केवल तीसरा युग्म (पल्सर) सही सुमेलित है, जबकि पहले दो युग्मों के विवरण उलट दिए गए हैं।
❌ युग्म 1 – गलत: सेफीड्स धूल और गैस के विशाल बादल नहीं हैं; वे वास्तव में स्पंदनशील तारे हैं जो आवधिक रूप से चमकते और मंद होते हैं, जो उन्हें खगोल विज्ञान में महत्वपूर्ण दूरी मापक बनाता है।
❌ युग्म 2 – गलत: नीहारिकाएँ वे तारे नहीं हैं जो आवधिक रूप से चमकते और मंद होते हैं; वे अंतरिक्ष में धूल और गैस के विशाल बादल हैं जहाँ तारे जन्म लेते हैं या मृत तारों के अवशेष होते हैं।
✅ युग्म 3 – सही: पल्सर वास्तव में तेजी से घूमने वाले न्यूट्रॉन तारे हैं जो तब बनते हैं जब विशाल तारों का परमाणु ईंधन समाप्त हो जाता है और वे सुपरनोवा विस्फोटों में संकुचित हो जाते हैं, नियमित विकिरण स्पंद उत्सर्जित करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: खगोलीय पिंड
| खगोलीय पिंड | सही विवरण | प्रमुख विशेषताएँ |
|---|---|---|
| सेफीड्स | स्पंदनशील परिवर्ती तारे जो आवधिक रूप से चमकते और मंद होते हैं | आवर्त-चमक संबंध उन्हें ब्रह्मांडीय दूरी मापने के लिए 'मानक मोमबत्तियाँ' बनाता है; डेल्टा सेफी के नाम पर |
| नीहारिकाएँ | अंतरिक्ष में धूल और गैस के विशाल बादल | उत्सर्जन, परावर्तन, या अंधकार नीहारिकाएँ हो सकती हैं; तारा निर्माण स्थल (तारकीय नर्सरी) या मरते तारों के अवशेष |
| पल्सर | तेजी से घूमने वाले न्यूट्रॉन तारे | विद्युत चुम्बकीय विकिरण के नियमित स्पंद उत्सर्जित करते हैं; सुपरनोवा विस्फोटों से बनते हैं; अत्यधिक घने (एक चम्मच का वजन अरबों टन) |
| क्वासर | अत्यंत चमकीले सक्रिय गैलेक्टिक नाभिक | अति विशाल ब्लैक होल द्वारा संचालित; ब्रह्मांड में सबसे दूर और चमकीली वस्तुओं में से |
| सुपरनोवा | विशाल तारों की विस्फोटक मृत्यु | संक्षिप्त रूप से पूरी आकाशगंगाओं को पार कर सकते हैं; भारी तत्व बनाते और फैलाते हैं; न्यूट्रॉन तारे या ब्लैक होल छोड़ते हैं |
'एरियल मेटाजेनोमिक्स' निम्नलिखित में से किस स्थिति को सर्वोत्तम रूप से संदर्भित करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — एक आवास में हवा से DNA नमूनों को एक साथ एकत्र करना
एरियल मेटाजेनोमिक्स एक अत्याधुनिक तकनीक है जिसमें विशेष फिल्टर या वैक्यूम सिस्टम का उपयोग करके सीधे हवा से पर्यावरणीय DNA (e-DNA) एकत्र किया जाता है। जीव लगातार श्वास, त्वचा कोशिकाओं, फर, पराग, बीजाणुओं और अन्य जैविक कणों के माध्यम से अपने आसपास के वातावरण में आनुवंशिक सामग्री छोड़ते हैं, जिसे हवा के नमूनों से एकत्र किया जा सकता है। यह विधि शोधकर्ताओं को भौतिक घुसपैठ के बिना एक विशिष्ट आवास में एक साथ कई प्रजातियों—जिनमें जानवर, पौधे, कवक और सूक्ष्मजीव शामिल हैं—की पहचान और निगरानी करने की अनुमति देती है, जो इसे जैव विविधता मूल्यांकन के लिए एक शक्तिशाली गैर-आक्रामक उपकरण बनाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मेटाजेनोमिक्स और पर्यावरणीय DNA
- मेटाजेनोमिक्स: प्रयोगशाला संस्कृतियों में व्यक्तिगत जीवों को अलग किए बिना पर्यावरणीय नमूनों (मिट्टी, पानी, हवा) से सीधे प्राप्त आनुवंशिक सामग्री का अध्ययन।
- पर्यावरणीय DNA (e-DNA): जीवों द्वारा त्वचा कोशिकाओं, बलगम, मल, युग्मकों और अन्य जैविक सामग्रियों के माध्यम से अपने पर्यावरण में छोड़ी गई आनुवंशिक सामग्री।
- एरियल मेटाजेनोमिक्स: विशेष रूप से किसी आवास में जैव विविधता का आकलन करने के लिए वायु निस्पंदन प्रणालियों का उपयोग करके वायुजनित कणों से DNA एकत्र करने पर केंद्रित है।
- अनुप्रयोग: गैर-आक्रामक जैव विविधता निगरानी, दुर्लभ या मायावी प्रजातियों का पता लगाना, रोग वाहकों को ट्रैक करना, और पारिस्थितिकी तंत्र स्वास्थ्य का अध्ययन करना।
- लाभ: कई टैक्सा का एक साथ पता लगाना, दृश्य अवलोकन या भौतिक कैप्चर की आवश्यकता नहीं, बड़े पैमाने के सर्वेक्षणों के लिए समय और लागत कुशल।
निम्नलिखित में से किस देश की अपनी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — जापान
जापान QZSS (क्वासी-ज़ेनिथ सैटेलाइट सिस्टम) संचालित करता है, जो एक क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है जिसे एशिया-ओशिनिया क्षेत्र, विशेष रूप से जापान में GPS कवरेज और सटीकता को बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। दिए गए विकल्पों में से केवल जापान की अपनी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विश्वव्यापी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणालियाँ
- वैश्विक नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS): चार परिचालन प्रणालियाँ - GPS (अमेरिका), GLONASS (रूस), Galileo (यूरोपीय संघ), और BeiDou (चीन) - विश्वव्यापी कवरेज प्रदान करती हैं।
- क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम: NavIC/IRNSS (भारत) भारतीय उपमहाद्वीप और आसपास के 1,500 किमी तक के क्षेत्र को कवर करता है; QZSS (जापान) एशिया-ओशिनिया क्षेत्र में GPS संकेतों को बढ़ाता है।
- GPS (अमेरिका): 24+ उपग्रहों के साथ पहला परिचालन GNSS, 1978 में लॉन्च किया गया, 1995 से पूर्ण रूप से परिचालन।
- GLONASS (रूस): सोवियत युग के दौरान विकसित, 24+ उपग्रहों के साथ 2011 से पूर्ण रूप से परिचालन।
- Galileo (EU): उच्च-सटीक स्थिति निर्धारण प्रदान करने वाली यूरोपीय प्रणाली, 2016 में परिचालन हुई।
- BeiDou (चीन): 35 उपग्रहों के साथ 2020 में वैश्विक कवरेज पूर्ण किया, क्षेत्रीय और वैश्विक दोनों उपयोगकर्ताओं को सेवा प्रदान करता है।
- NavIC (भारत): 7 उपग्रहों के साथ भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली, 2018 से परिचालन, 20 मीटर से बेहतर स्थिति सटीकता प्रदान करती है।
- QZSS (जापान): क्वासी-ज़ेनिथ कक्षाओं में उपग्रहों के साथ क्वासी-ज़ेनिथ सैटेलाइट सिस्टम, जापान और पड़ोसी क्षेत्रों में उन्नत स्थिति निर्धारण प्रदान करता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- कुछ सूक्ष्मजीव जल के क्वथनांक से अधिक तापमान वाले वातावरण में वृद्धि कर सकते हैं।
- कुछ सूक्ष्मजीव जल के हिमांक से नीचे तापमान वाले वातावरण में वृद्धि कर सकते हैं।
- कुछ सूक्ष्मजीव 3 से कम pH वाले अत्यधिक अम्लीय वातावरण में वृद्धि कर सकते हैं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — सभी तीन
तीनों कथन सही हैं क्योंकि एक्सट्रीमोफाइल्स (चरम परिस्थितियों के अनुकूल सूक्ष्मजीव) ऐसे वातावरण में जीवित रह सकते हैं और पनप सकते हैं जो अधिकांश जीवन रूपों के लिए घातक होंगे। इनमें क्वथनांक से ऊपर और हिमांक से नीचे चरम तापमान के साथ-साथ अत्यधिक अम्लीय परिस्थितियाँ शामिल हैं।
✅ कथन 1 – सही: हाइपरथर्मोफाइल्स जैसे Pyrolobus fumarii 100°C (जल का क्वथनांक) से अधिक तापमान में पनप सकते हैं, जो अक्सर हाइड्रोथर्मल वेंट्स में 113°C तक के तापमान में पाए जाते हैं।
✅ कथन 2 – सही: साइक्रोफाइल्स (क्रायोफाइल्स) शीत-प्रेमी सूक्ष्मजीव हैं जो -20°C से +10°C तक के तापमान में वृद्धि करने में सक्षम हैं, जो जल के हिमांक (0°C) से काफी नीचे है।
✅ कथन 3 – सही: एसिडोफाइल्स जैसे Picrophilus oshimae 3 से कम pH वाले अत्यधिक अम्लीय वातावरण में पनपते हैं, कुछ प्रजातियाँ 0 के करीब pH स्तर पर भी जीवित रहती हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: एक्सट्रीमोफाइल्स
| एक्सट्रीमोफाइल का प्रकार | चरम स्थिति | उदाहरण | आवास |
|---|---|---|---|
| हाइपरथर्मोफाइल्स | 80-100°C से अधिक तापमान | Pyrolobus fumarii, Thermococcus | हाइड्रोथर्मल वेंट्स, गर्म झरने |
| साइक्रोफाइल्स | 15°C से कम तापमान (अक्सर -20°C से +10°C) | Psychrobacter, Colwellia | आर्कटिक बर्फ, गहरे समुद्री जल |
| एसिडोफाइल्स | 3 से कम pH | Picrophilus oshimae, Acidithiobacillus | अम्ल खदान जल निकासी, ज्वालामुखी क्षेत्र |
| अल्कलीफाइल्स | 9 से अधिक pH | Bacillus alcalophilus | सोडा झीलें, क्षारीय मिट्टी |
| हैलोफाइल्स | उच्च नमक सांद्रता | Halobacterium, Dunaliella | नमक झीलें, नमक दलदल |
| बैरोफाइल्स (पीजोफाइल्स) | उच्च दबाव | Moritella, Shewanella | गहरे समुद्री खाइयाँ |
भारत में कोयला आधारित तापीय विद्युत संयंत्रों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- इनमें से कोई भी समुद्री जल का उपयोग नहीं करता है।
- इनमें से कोई भी जल-तनाव वाले जिले में स्थापित नहीं है।
- इनमें से कोई भी निजी स्वामित्व वाला नहीं है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कोई नहीं
भारत में कोयला आधारित तापीय विद्युत संयंत्रों के संबंध में तीनों कथन गलत हैं। कुछ संयंत्र शीतलन के लिए समुद्री जल का उपयोग करते हैं (जैसे मुंद्रा), कई जल-तनाव वाले जिलों में स्थित हैं, और बड़ी संख्या में निजी स्वामित्व वाले हैं।
❌ कथन 1 – गलत: मुंद्रा तापीय विद्युत संयंत्र कच्छ की खाड़ी से समुद्री जल का उपयोग बंद-चक्र शीतलन प्रणाली में करता है, और सहायक प्रणालियों के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस संयंत्रों से शुद्ध समुद्री जल का भी उपयोग करता है।
❌ कथन 2 – गलत: WRI के शोध के अनुसार, भारत के 40% तापीय विद्युत संयंत्र जल-तनाव वाले क्षेत्रों में स्थित हैं, जिनमें से 20 सबसे बड़ी तापीय उपयोगिताओं में से 14 ने 2013-2016 के बीच जल की कमी के कारण बंद का अनुभव किया।
❌ कथन 3 – गलत: भारत के 269 तापीय विद्युत संयंत्रों में से 138 सार्वजनिक स्वामित्व वाले हैं जबकि 131 निजी स्वामित्व वाले हैं, जो महत्वपूर्ण निजी क्षेत्र की भागीदारी को दर्शाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में कोयला आधारित तापीय विद्युत संयंत्र
- शीतलन जल स्रोत: जबकि अधिकांश संयंत्र नदियों या जलाशयों से मीठे पानी का उपयोग करते हैं, तटीय संयंत्र जैसे मुंद्रा (गुजरात) मीठे पानी के संसाधनों के संरक्षण के लिए समुद्री जल शीतलन प्रणालियों का उपयोग करते हैं।
- जल तनाव की चुनौती: 40% तापीय संयंत्र जल-तनाव वाले क्षेत्रों में हैं, जो जल की कमी की अवधि के दौरान परिचालन व्यवधान और मजबूर बंद का कारण बनते हैं।
- स्वामित्व संरचना: कुल 269 संयंत्र - 138 सार्वजनिक क्षेत्र (केंद्रीय/राज्य उपयोगिताएँ जैसे NTPC, राज्य Gencos) और 131 निजी क्षेत्र (अडानी पावर, टाटा पावर, रिलायंस पावर, आदि)।
- क्षमता वितरण: तापीय ऊर्जा भारत की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता का लगभग 50-55% योगदान करती है।
- पर्यावरणीय चिंताएँ: उच्च जल खपत (3-5 लीटर प्रति kWh), तापीय प्रदूषण, और उत्सर्जन स्थिरता के लिए जल प्रबंधन को महत्वपूर्ण बनाते हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
कथन-I: भारत में यूरेनियम के भंडार होने के बावजूद, वह अपनी अधिकांश बिजली उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भर है।
कथन-II: बिजली उत्पादन के लिए कम से कम 60% तक संवर्धित यूरेनियम की आवश्यकता होती है।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — कथन-I सही है लेकिन कथन-II गलत है
भारत में वास्तव में घरेलू यूरेनियम भंडार हैं लेकिन बिजली उत्पादन के लिए कोयले पर भारी निर्भरता है (कुल क्षमता का लगभग 70%)। हालांकि, कथन-II तथ्यात्मक रूप से गलत है क्योंकि वाणिज्यिक परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को 60% तक संवर्धित यूरेनियम की आवश्यकता नहीं होती है।
✅ कथन-I – सही: भारत में झारखंड (सिंहभूम), आंध्र प्रदेश (तुम्मलापल्ले) और अन्य क्षेत्रों में यूरेनियम भंडार हैं, फिर भी कोयला इसकी प्रचुरता, कम लागत और स्थापित बुनियादी ढांचे के कारण बिजली उत्पादन का प्रमुख स्रोत बना हुआ है।
❌ कथन-II – गलत: 60% या अधिक तक संवर्धित यूरेनियम को अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (HEU) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है और इसका उपयोग अनुसंधान रिएक्टरों या परमाणु हथियारों के लिए किया जाता है, वाणिज्यिक बिजली उत्पादन के लिए नहीं। भारत के PHWRs प्राकृतिक यूरेनियम (0.7% U-235) का उपयोग करते हैं, जबकि विश्व स्तर पर अधिकांश वाणिज्यिक लाइट वाटर रिएक्टर केवल 3-5% U-235 तक संवर्धित निम्न संवर्धित यूरेनियम (LEU) का उपयोग करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: परमाणु ईंधन संवर्धन स्तर
| संवर्धन स्तर | U-235 प्रतिशत | प्राथमिक उपयोग |
|---|---|---|
| प्राकृतिक यूरेनियम | 0.7% | भारत के PHWRs (दाबित भारी जल रिएक्टर) |
| निम्न संवर्धित यूरेनियम (LEU) | 3-5% | विश्व स्तर पर वाणिज्यिक लाइट वाटर रिएक्टर (LWRs) |
| अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (HEU) | 20-90% | अनुसंधान रिएक्टर, नौसैनिक प्रणोदन |
| हथियार-ग्रेड यूरेनियम | ≥90% | परमाणु हथियार |
- भारत का परमाणु कार्यक्रम: PHWRs में प्राकृतिक यूरेनियम से शुरू होने वाले स्वदेशी तीन-चरणीय कार्यक्रम का उपयोग करता है
- कोयले का प्रभुत्व: भारत के कोयला भंडार (विश्व में 4वें सबसे बड़े) और कम पूंजी लागत इसे पर्यावरणीय चिंताओं के बावजूद पसंदीदा बनाती है
- यूरेनियम स्रोत: झारखंड (जादूगोड़ा), आंध्र प्रदेश (तुम्मलापल्ले - विश्व के सबसे बड़े में से एक), मेघालय, राजस्थान
- परमाणु क्षमता: भारत की कुल बिजली का केवल ~3% परमाणु ऊर्जा से आता है (2023 तक)
UPSC Prelims 2023 - विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी Chapter-wise Distribution
जैव प्रौद्योगिकी
4 Qs (33.3%)ऊर्जा प्रौद्योगिकी
2 Qs (16.7%)अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी
2 Qs (16.7%)भौतिकी एवं अनुप्रयुक्त प्रौद्योगिकी
2 Qs (16.7%)रक्षा प्रौद्योगिकी
1 Qs (8.3%)मानव स्वास्थ्य एवं रोग
1 Qs (8.3%)UPSC Prelims 2023 - विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी Questions FAQs
Q1 How many विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी questions were asked in UPSC Prelims 2023?
Q2 What is the chapter-wise question distribution for विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी in UPSC Prelims 2023?
- जैव प्रौद्योगिकी: 4 questions (33.3%)
- ऊर्जा प्रौद्योगिकी: 2 questions (16.7%)
- अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी: 2 questions (16.7%)
- भौतिकी एवं अनुप्रयुक्त प्रौद्योगिकी: 2 questions (16.7%)
- रक्षा प्रौद्योगिकी: 1 questions (8.3%)
- मानव स्वास्थ्य एवं रोग: 1 questions (8.3%)