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भू-आकृति विज्ञान Previous Year Questions (PYQs)
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दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (आरईई) और महत्वपूर्ण खनिजों के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और अंतरिक्ष अन्वेषण सहित आधुनिक तकनीकी नवाचार बड़े पैमाने पर दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (आरईई) का उपयोग करते हैं।
- आरईई के खनन में चीन की हिस्सेदारी भारत के बाद सबसे अधिक है।
- भारत सरकार ने महत्वपूर्ण खनिज क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए एक मजबूत ढांचा स्थापित करने के लिए 2025 में नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (एनसीएमएम) लॉन्च किया।
- दुर्लभ पृथ्वी तत्व 13 धात्विक तत्वों का एक समूह है।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
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कथन 1 सही है: रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) का उपयोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, अंतरिक्ष अनुसंधान, इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में व्यापक रूप से होता है।
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कथन 2 गलत है: REE उत्पादन में चीन पहले स्थान पर है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका दूसरे स्थान पर है। भारत दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक नहीं है।
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कथन 3 सही है: भारत सरकार ने जनवरी 2025 में नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) शुरू किया, जिसका उद्देश्य महत्वपूर्ण खनिजों में आत्मनिर्भरता बढ़ाना है।
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कथन 4 गलत है: रेयर अर्थ एलिमेंट्स की संख्या 17 है, जिसमें 15 लैंथेनाइड्स के साथ स्कैंडियम और यट्रियम शामिल हैं।
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अतः कथन 1 और 3 सही हैं, इसलिए सही उत्तर (A) 1 and 3 only है।
रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) और क्रिटिकल मिनरल्स
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REEs 17 धात्विक तत्वों का समूह है, जो आधुनिक तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और रक्षा उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
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क्रिटिकल मिनरल्स वे खनिज हैं जो आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं तथा जिनकी आपूर्ति सीमित होती है।
तुंगुराहुआ ज्वालामुखी, जिसे 2025 में यूनेस्को द्वारा ग्लोबल जियोपार्क घोषित किया गया था, निम्नलिखित में से किस देश में स्थित है?
Detailed Explanation:
तुंगुराहुआ क्या है?
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| अर्थ | "आग का गला" (क्विचुआ भाषा) |
| प्रकार | अत्यधिक सक्रिय स्ट्रैटोवोल्केनो |
| स्थान | कॉर्डिलेरा ओरिएंटल, मध्य एंडीज, इक्वाडोर |
| UNESCO दर्जा | वैश्विक जियोपार्क — अप्रैल 2025 |
| क्षेत्रफल | 2,300+ वर्ग किमी |
| भूगर्भीय इतिहास | 41.7 करोड़ वर्ष |
| राष्ट्रीय उद्यान | सांगाय राष्ट्रीय उद्यान के भीतर |
❌ अन्य विकल्प गलत क्यों?
| देश | उनका उल्लेखनीय ज्वालामुखी | गलत क्यों |
|---|---|---|
| पेरू | Ubinas | एंडीज साझा करता है पर तुंगुराहुआ यहाँ नहीं |
| बोलीविया | — | कोई संबंध नहीं |
| कोलंबिया | Nevado del Ruiz | एंडीज में है पर अलग देश |
रिवीजन टिप: चारों देश एंडीज साझा करते हैं — जाल यह है कि कोई भी एंडीय ज्वालामुखी इनमें से किसी भी देश में हो सकता है। तुंगुराहुआ = इक्वाडोर याद रखें।
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
कथन I: चट्टानों पर पानी के प्रभाव के संदर्भ में, चाक को बहुत पारगम्य चट्टान के रूप में जाना जाता है जबकि मिट्टी को काफी अभेद्य या कम से कम पारगम्य चट्टान के रूप में जाना जाता है।
कथन II: चाक छिद्रपूर्ण है और इसलिए पानी को अवशोषित कर सकता है।
कथन III: मिट्टी बिल्कुल भी छिद्रपूर्ण नहीं है।
उपरोक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 3
चॉक (Chalk) और क्ले (Clay) में मुख्य अंतर पारगम्यता (Permeability) का होता है। चॉक में अनेक जुड़े हुए छिद्र होते हैं, जिनसे पानी आसानी से गुजर सकता है। क्ले में भी छिद्र होते हैं, लेकिन वे बहुत छोटे होते हैं और आपस में कम जुड़े होते हैं, इसलिए पानी का प्रवाह बहुत धीमा रहता है। इसलिए कथन II सही है और कथन I की व्याख्या करता है, जबकि कथन III गलत है।
✅ कथन I सही है: चॉक एक अत्यधिक पारगम्य चट्टान है, जबकि क्ले बहुत कम पारगम्य होती है।
✅ कथन II सही है: चॉक छिद्रयुक्त (Porous) होती है और पानी को अवशोषित तथा प्रवाहित कर सकती है।
❌ कथन III गलत है: क्ले बिल्कुल भी अछिद्रयुक्त नहीं है; इसमें छिद्र होते हैं, लेकिन वे बहुत छोटे होते हैं जिससे पानी आसानी से नहीं गुजर पाता।
संक्षिप्त नोट्स: Porosity और Permeability
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Porosity (रंध्रता) का अर्थ है चट्टान या मिट्टी में छिद्रों की मात्रा।
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Permeability (पारगम्यता) का अर्थ है पानी का उन छिद्रों से गुजरने की क्षमता।
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कोई पदार्थ छिद्रयुक्त लेकिन अपारगम्य हो सकता है।
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चॉक छिद्रयुक्त और पारगम्य दोनों होती है।
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क्ले छिद्रयुक्त होती है, लेकिन लगभग अपारगम्य होती है।
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भूजल का संचय सामान्यतः Aquifers में होता है।
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सैंडस्टोन और चॉक महत्वपूर्ण जलभृत (Aquifer) चट्टानें हैं।
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निम्नलिखित में से कौन महाद्वीपीय बहाव की घटना का प्रमाण है?
मैं. ब्राज़ील तट की प्राचीन चट्टानों की बेल्ट पश्चिमी अफ़्रीका की चट्टानों से मेल खाती है।
द्वितीय. घाना के सोने के भंडार ब्राजील के पठार से प्राप्त हुए हैं, जब दोनों महाद्वीप एक-दूसरे के बगल में स्थित थे।
III. भारत से तलछट की गोंडवाना प्रणाली दक्षिणी गोलार्ध के छह अलग-अलग भूभागों में अपने समकक्षों के रूप में जानी जाती है।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके सही उत्तर चुनें।
Detailed Explanation:
तीनों कथन महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत (Continental Drift Theory) के पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। विभिन्न महाद्वीपों में समान चट्टानें, खनिज निक्षेप और अवसादी संरचनाएँ यह दर्शाती हैं कि ये भूभाग कभी एक साथ जुड़े हुए थे।
✅ कथन I सही है: ब्राज़ील और पश्चिमी अफ्रीका की प्राचीन चट्टानों की आयु और संरचना में समानता मिलती है, जो उनके पहले जुड़े होने का संकेत देती है।
✅ कथन II सही है: घाना में स्वर्ण के प्लेसर निक्षेप मिलते हैं, जबकि उनके मूल स्रोत ब्राज़ील में पाए जाते हैं। यह दोनों भूभागों के पूर्व संबंध का प्रमाण है।
✅ कथन III सही है: भारत की गोंडवाना अवसादी शृंखला के समान अवसाद अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका, मेडागास्कर और फॉकलैंड द्वीपों में भी मिलते हैं।
रिवीजन नोट्स: Continental Drift Theory
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1912 में अल्फ्रेड वेगेनर ने यह सिद्धांत दिया।
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सभी महाद्वीप पहले पैंजिया का हिस्सा थे।
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समान चट्टानें महाद्वीपों के पूर्व जुड़ाव का प्रमाण हैं।
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समान खनिज निक्षेप भी इसका समर्थन करते हैं।
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गोंडवाना अवसाद कई दक्षिणी गोलार्ध के भूभागों में पाए जाते हैं।
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भूवैज्ञानिक प्रमाण इस सिद्धांत के सबसे मजबूत आधार हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
कथन-I: वर्षा चट्टानों के अपक्षय के कारणों में से एक है। कथन-II: वर्षा जल में कार्बन डाइऑक्साइड विलयन में होती है। कथन-III: वर्षा जल में वायुमंडलीय ऑक्सीजन होती है।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — कथन-II और कथन-III दोनों सही हैं और दोनों कथन-I की व्याख्या करते हैं
वर्षा अपक्षय का एक महत्वपूर्ण कारक है, विशेष रूप से रासायनिक अपक्षय का। वर्षा जल वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके दुर्बल कार्बोनिक अम्ल बनाता है, और वायुमंडलीय ऑक्सीजन को भी घोलता है। ये दोनों विलीन गैसें रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से चट्टान खनिजों को तोड़ने में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं।
✅ कथन I – सही: वर्षा प्रभाव और रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से भौतिक और रासायनिक दोनों प्रकार का अपक्षय करती है।
✅ कथन II – सही: वर्षा जल वायुमंडलीय CO₂ को घोलता है, जो कार्बोनिक अम्ल (H₂CO₃) बनाता है जो चट्टानों का रासायनिक अपक्षय करता है।
✅ कथन III – सही: वर्षा जल में विलीन वायुमंडलीय ऑक्सीजन होती है जो खनिजों का ऑक्सीकरण करती है, जो रासायनिक अपक्षय का एक रूप है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वर्षा जल द्वारा रासायनिक अपक्षय
- कार्बोनीकरण: वर्षा जल में CO₂ कार्बोनिक अम्ल (H₂CO₃) बनाती है, जो कार्बोनेट चट्टानों (चूना पत्थर, संगमरमर) और फेल्डस्पार के साथ अभिक्रिया करके उन्हें समय के साथ घोलती है।
- ऑक्सीकरण: वर्षा जल में विलीन ऑक्सीजन लौह युक्त खनिजों (जैसे ऑलिवीन, पाइरॉक्सीन) के साथ अभिक्रिया करके जंग जैसा अपघटन करती है, जो चट्टान संरचना को कमजोर करती है।
- जल-अपघटन: जल के अणु सिलिकेट खनिजों (फेल्डस्पार, अभ्रक) के साथ अभिक्रिया करके मृत्तिका खनिज बनाते हैं, जो चट्टान विखंडन में योगदान देते हैं।
- विलयन: वर्षा जल सीधे घुलनशील खनिजों जैसे हैलाइट और जिप्सम को बिना अतिरिक्त रासायनिक अभिक्रिया के घोल सकता है।
- pH कारक: प्राकृतिक वर्षा जल का pH विलीन CO₂ के कारण लगभग 5.6 होता है; अम्ल वर्षा (pH < 5.0) अपक्षय दर को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाती है।
- दर कारक: अपक्षय दर वर्षा की तीव्रता, तापमान, चट्टान संरचना और वनस्पति आवरण पर निर्भर करती है जो अपक्षय को बढ़ा या घटा सकते हैं।
- भौतिक प्रभाव: रासायनिक क्रिया के अलावा, भारी वर्षा वर्षा बूंदों के प्रभाव और ठंडे जलवायु में हिम विदारण के माध्यम से यांत्रिक अपक्षय करती है।
निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
- पायरोक्लास्टिक मलबा
- राख और धूल
- नाइट्रोजन यौगिक
- सल्फर यौगिक
उपर्युक्त में से कितने ज्वालामुखी विस्फोट के उत्पाद हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — सभी चार
सूचीबद्ध सभी चार मद—पायरोक्लास्टिक मलबा, राख और धूल, नाइट्रोजन यौगिक, और सल्फर यौगिक—ज्वालामुखी विस्फोट के उत्पाद हैं। ज्वालामुखी विस्फोट ठोस पदार्थ (पायरोक्लास्टिक मलबा, राख) और विभिन्न गैसें (नाइट्रोजन और सल्फर यौगिक) दोनों का उत्सर्जन करते हैं जो महत्वपूर्ण पर्यावरणीय प्रभाव डाल सकते हैं।
✅ कथन 1 – सही: पायरोक्लास्टिक मलबे में विस्फोट के दौरान निकाले गए राख, प्यूमिस, सिंडर और ज्वालामुखी बम जैसे खंडित पदार्थ शामिल हैं।
✅ कथन 2 – सही: राख और धूल विस्फोटक ज्वालामुखी गतिविधि के दौरान उत्पन्न ज्वालामुखी चट्टान और कांच के सूक्ष्म कण हैं।
✅ कथन 3 – सही: अमोनिया (NH₃) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ) जैसे नाइट्रोजन यौगिक ज्वालामुखी गैसों से निकलते हैं।
✅ कथन 4 – सही: सल्फर यौगिक, विशेष रूप से सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) और हाइड्रोजन सल्फाइड (H₂S), प्रमुख ज्वालामुखी गैसें हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: ज्वालामुखी विस्फोट के उत्पाद
| उत्पाद प्रकार | उदाहरण | विशेषताएँ |
|---|---|---|
| पायरोक्लास्टिक पदार्थ | ज्वालामुखी बम, लैपिली, राख, प्यूमिस, स्कोरिया | विस्फोट के दौरान निकाले गए ठोस खंड; आकार सूक्ष्म राख से लेकर बड़े बम तक |
| ज्वालामुखी गैसें | जल वाष्प (H₂O), CO₂, SO₂, H₂S, HCl, HF | जल वाष्प ज्वालामुखी गैसों का 60-90% होता है; SO₂ अम्लीय वर्षा में योगदान करता है |
| नाइट्रोजन यौगिक | N₂, NH₃, नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ) | छोटी मात्रा में निकलते हैं; वायुमंडल में विभिन्न यौगिक बनाने के लिए प्रतिक्रिया कर सकते हैं |
| सल्फर यौगिक | SO₂, H₂S, मौलिक सल्फर | SO₂ एक प्रमुख ज्वालामुखी गैस है जो श्वसन समस्याओं और पर्यावरणीय प्रभावों का कारण बनती है |
- पर्यावरणीय प्रभाव: ज्वालामुखी राख हवाई यात्रा को बाधित कर सकती है, फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है, और जल आपूर्ति को दूषित कर सकती है; सल्फर डाइऑक्साइड अम्लीय वर्षा में योगदान करता है और स्ट्रैटोस्फीयर में एरोसोल बनाकर वैश्विक जलवायु को प्रभावित कर सकता है।
- टेफ्रा: आकार या संरचना की परवाह किए बिना, विस्फोट के दौरान निकाले गए सभी पायरोक्लास्टिक पदार्थों के लिए सामान्य शब्द।
- ज्वालामुखी शीतकाल: महत्वपूर्ण राख और SO₂ निकालने वाले बड़े विस्फोट सूर्य के प्रकाश को अवरुद्ध कर सकते हैं, जिससे पृथ्वी की सतह अस्थायी रूप से ठंडी हो जाती है।
- स्वास्थ्य खतरे: सूक्ष्म ज्वालामुखी राख श्वसन समस्याओं का कारण बन सकती है; उच्च सांद्रता में SO₂ और H₂S जैसी गैसें विषाक्त होती हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भूकम्पलेखी में, P तरंगें S तरंगों की तुलना में पहले रिकॉर्ड की जाती हैं।
- P तरंगों में, व्यक्तिगत कण तरंग संचरण की दिशा में आगे-पीछे कंपन करते हैं जबकि S तरंगों में, कण तरंग संचरण की दिशा के समकोण पर ऊपर-नीचे कंपन करते हैं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
भूकंपीय तरंगों के संबंध में दोनों कथन सही हैं। P तरंगें (प्राथमिक तरंगें) S तरंगों (द्वितीयक तरंगों) की तुलना में तेज गति से यात्रा करती हैं और इसलिए भूकम्पलेखी द्वारा पहले रिकॉर्ड की जाती हैं। दोनों तरंग प्रकार अपनी कण गति विशेषताओं में भी मूल रूप से भिन्न हैं।
✅ कथन 1 – सही: P तरंगें वास्तव में भूकम्पलेखी पर S तरंगों की तुलना में पहले रिकॉर्ड की जाती हैं क्योंकि ये सबसे तेज भूकंपीय तरंगें हैं, जो पृथ्वी की भूपर्पटी में 5-8 किमी/सेकंड की गति से यात्रा करती हैं जबकि S तरंगें 3-4.5 किमी/सेकंड की गति से यात्रा करती हैं।
✅ कथन 2 – सही: P तरंगें संपीड़न/अनुदैर्ध्य तरंगें हैं जहाँ कण तरंग संचरण की दिशा के समानांतर कंपन करते हैं (आगे-पीछे गति), जबकि S तरंगें अपरूपण/अनुप्रस्थ तरंगें हैं जहाँ कण तरंग संचरण की दिशा के लंबवत कंपन करते हैं (ऊपर-नीचे या बाएं-दाएं गति)।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भूकंपीय तरंगें
| विशेषता | P तरंगें (प्राथमिक) | S तरंगें (द्वितीयक) |
|---|---|---|
| गति | सबसे तेज (भूपर्पटी में 5-8 किमी/सेकंड) | धीमी (भूपर्पटी में 3-4.5 किमी/सेकंड) |
| आगमन समय | सबसे पहले पहुँचती हैं | दूसरी पहुँचती हैं |
| तरंग प्रकार | अनुदैर्ध्य/संपीड़न | अनुप्रस्थ/अपरूपण |
| कण गति | तरंग दिशा के समानांतर (धक्का-खिंचाव) | तरंग दिशा के लंबवत (ऊपर-नीचे/बाएं-दाएं) |
| माध्यम | ठोस, तरल और गैसों में यात्रा करती हैं | केवल ठोस में यात्रा करती हैं |
| विनाशकारी शक्ति | कम विनाशकारी | अधिक विनाशकारी |
निम्नलिखित में से किस एक जैव-भू-रासायनिक चक्र के मामले में, चट्टानों का अपक्षय चक्र में प्रवेश करने के लिए पोषक तत्व की रिहाई का मुख्य स्रोत है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — फॉस्फोरस चक्र
फॉस्फोरस चक्र जैव-भू-रासायनिक चक्रों में अद्वितीय है क्योंकि इसमें गैसीय चरण का अभाव है और यह मुख्य रूप से फॉस्फेट-युक्त चट्टानों के अपक्षय पर अपने मुख्य स्रोत के रूप में निर्भर करता है। भूवैज्ञानिक अपक्षय प्रक्रियाएं समय के साथ इन चट्टानों को तोड़ती हैं, फॉस्फेट आयनों (PO₄³⁻) को मिट्टी और पानी में छोड़ती हैं, जिन्हें फिर पौधे अवशोषित करते हैं और खाद्य श्रृंखला के माध्यम से आगे बढ़ते हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
• कार्बन चक्र: मुख्य रूप से श्वसन, दहन और ज्वालामुखी गतिविधि से वायुमंडलीय CO₂ द्वारा संचालित होता है, न कि चट्टानों के अपक्षय से।
• नाइट्रोजन चक्र: वायुमंडलीय नाइट्रोजन पर निर्भर करता है जिसमें बैक्टीरिया द्वारा स्थिरीकरण मुख्य प्रक्रिया है, न कि चट्टानों का अपक्षय।
• सल्फर चक्र: मुख्य स्रोतों में ज्वालामुखी विस्फोट, सड़ते हुए कार्बनिक पदार्थ और जीवाश्म ईंधन दहन शामिल हैं, मुख्य रूप से चट्टानों का अपक्षय नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: जैव-भू-रासायनिक चक्र
| चक्र | पोषक तत्व का मुख्य स्रोत | मुख्य विशेषताएं |
|---|---|---|
| फॉस्फोरस चक्र | फॉस्फेट चट्टानों का अपक्षय | कोई गैसीय चरण नहीं; सबसे धीमा चक्र; जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में सीमित पोषक तत्व |
| कार्बन चक्र | वायुमंडलीय CO₂ | प्रकाश संश्लेषण, श्वसन, दहन शामिल; गैसीय चरण है |
| नाइट्रोजन चक्र | वायुमंडलीय N₂ | बैक्टीरिया द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण; नाइट्रीकरण, विनाइट्रीकरण शामिल |
| सल्फर चक्र | ज्वालामुखी गतिविधि, जीवाश्म ईंधन | वायुमंडलीय SO₂ शामिल; अम्लीय वर्षा का निर्माण |
| जल चक्र | महासागर, जल निकाय | वाष्पीकरण, संघनन, वर्षण प्रक्रियाएं |
निम्नलिखित खनिजों पर विचार कीजिए:
- बेंटोनाइट
- क्रोमाइट
- काइनाइट
- सिलिमेनाइट
भारत में, उपर्युक्त में से किसे/किन्हें आधिकारिक रूप से प्रमुख खनिज के रूप में नामित किया गया है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — केवल 2, 3 और 4
भारत में, प्रमुख खनिज वे हैं जो खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट हैं। बेंटोनाइट को लघु खनिज के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जबकि क्रोमाइट, काइनाइट और सिलिमेनाइट सभी प्रमुख खनिज हैं।
1. बेंटोनाइट – लघु खनिज: बेंटोनाइट एक मृत्तिका खनिज है जिसका उपयोग ड्रिलिंग मड, फाउंड्री रेत और सिविल इंजीनियरिंग अनुप्रयोगों में किया जाता है। यह लघु खनिजों के अंतर्गत सूचीबद्ध है।
2. क्रोमाइट – प्रमुख खनिज ✅: क्रोमाइट क्रोमियम का एकमात्र अयस्क है और स्टेनलेस स्टील तथा विभिन्न मिश्र धातुओं के निर्माण के लिए आवश्यक है। यह एक प्रमुख खनिज है।
3. काइनाइट – प्रमुख खनिज ✅: काइनाइट एक दुर्दम्य खनिज है जिसका उपयोग सिरेमिक और उच्च तापमान औद्योगिक अनुप्रयोगों में किया जाता है। इसे प्रमुख खनिज के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
4. सिलिमेनाइट – प्रमुख खनिज ✅: सिलिमेनाइट एक अन्य दुर्दम्य खनिज है जिसके धातुकर्म और औद्योगिक भट्टियों में अनुप्रयोग हैं। यह एक प्रमुख खनिज है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में प्रमुख बनाम लघु खनिज
| पहलू | प्रमुख खनिज | लघु खनिज |
|---|---|---|
| कानूनी ढांचा | MMDR अधिनियम, 1957 की प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट | MMDR अधिनियम, 1957 की द्वितीय अनुसूची में निर्दिष्ट |
| नियामक प्राधिकरण | केंद्र सरकार | राज्य सरकार |
| उदाहरण | क्रोमाइट, काइनाइट, सिलिमेनाइट, कोयला, लौह अयस्क, मैंगनीज, सोना, हीरा | बेंटोनाइट, चूना पत्थर (सीमेंट को छोड़कर), निर्माण पत्थर, बजरी, रेत, मिट्टी |
| रणनीतिक महत्व | उच्च आर्थिक और औद्योगिक महत्व | स्थानीय महत्व, निर्माण सामग्री |
| संख्या | 64 खनिज सूचीबद्ध | राज्य अधिसूचना के अनुसार भिन्न |
- दुर्दम्य खनिज: काइनाइट और सिलिमेनाइट एल्यूमीनियम सिलिकेट खनिज हैं जिनमें उच्च ऊष्मा प्रतिरोध होता है, जो दुर्दम्य (ऊष्मा-प्रतिरोधी) सामग्री के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- भारत में क्रोमाइट: भारत में महत्वपूर्ण क्रोमाइट भंडार हैं, मुख्य रूप से ओडिशा में (राष्ट्रीय भंडार का लगभग 98%)।
- MMDR संशोधन 2015: प्रमुख खनिजों के लिए नीलामी तंत्र के माध्यम से खनिज आवंटन में अधिक पारदर्शिता प्रदान की गई।
निम्नलिखित में से किस घटना ने जीवों के विकास को प्रभावित किया होगा?
- महाद्वीपीय विस्थापन
- हिमनदीय चक्र
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: महाद्वीपीय विस्थापन ने लाखों वर्षों में भू-भागों को अलग किया, भौगोलिक बाधाएं बनाईं जिससे जनसंख्या अलग हुई और अपस्थानिक जाति-उद्भवन हुआ (जैसे मेडागास्कर और ऑस्ट्रेलिया में अद्वितीय प्रजातियां)।
✅ कथन 2 – सही: हिमनदीय चक्रों ने बर्फ की चादरों के विस्तार और संकुचन को बार-बार जन्म दिया, समुद्र स्तर और आवासों को बदला, और विकासात्मक अनुकूलन, प्रवास और विलुप्ति को प्रेरित किया (जैसे हिम युग के विशाल जीव का विकास)।
निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
- विद्युत चुम्बकीय विकिरण
- भू-तापीय ऊर्जा
- गुरुत्वाकर्षण बल
- प्लेट संचलन
- पृथ्वी का घूर्णन
- पृथ्वी की परिक्रमा
उपर्युक्त में से कौन-से पृथ्वी की सतह पर गतिशील परिवर्तन लाने के लिए उत्तरदायी हैं?
Detailed Explanation:
विद्युत चुम्बकीय विकिरण (सौर ऊर्जा) मौसम प्रणालियों, महासागरीय धाराओं और प्रकाश संश्लेषण को संचालित करता है, जिससे सतह पर गतिशील परिवर्तन होते हैं।
भू-तापीय ऊर्जा पृथ्वी के आंतरिक भाग से ज्वालामुखी, गर्म झरनों और गीजर को ऊर्जा देती है, जो भू-आकृतियों को बदलती है।
गुरुत्वाकर्षण बल (चंद्रमा और सूर्य) महासागरीय ज्वार उत्पन्न करता है, जिससे तटीय अपरदन और निक्षेपण होता है।
प्लेट संचलन से पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी और महाद्वीपीय विस्थापन होता है, जो पृथ्वी की सतह को पुनर्आकारित करता है।
पृथ्वी का घूर्णन कोरिओलिस प्रभाव उत्पन्न करता है, जो पवन पैटर्न, महासागरीय धाराओं और चक्रवात निर्माण को प्रभावित करता है।
पृथ्वी की परिक्रमा सूर्य के चारों ओर मौसमी विविधताएं उत्पन्न करती है, जो तापमान, वर्षा और अपक्षयन दर को प्रभावित करती है।
सभी छह बल मिलकर पृथ्वी की सतह पर निरंतर गतिशील परिवर्तन लाते हैं।