UPSC Prelims 2021 Question Paper
Explore the complete solved question paper for UPSC Prelims 2021 featuring 100 solved questions with bilingual (English & Hindi) explanations, official answer key, and subject weightage breakdown.
'वाटर क्रेडिट' के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह जल और स्वच्छता क्षेत्र में सूक्ष्म वित्त उपकरणों का उपयोग करता है।
- यह विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक के तत्वावधान में शुरू की गई एक वैश्विक पहल है।
- इसका उद्देश्य गरीब लोगों को सब्सिडी पर निर्भर हुए बिना अपनी जल आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम बनाना है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
वाटर क्रेडिट, Water.org की एक पहल है जो सूक्ष्म वित्त उपकरणों का उपयोग करके व्यक्तियों को छोटे ऋणों के माध्यम से जल और स्वच्छता समाधानों तक पहुँच प्रदान करती है, जिससे वे सब्सिडी पर निर्भर हुए बिना अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। यह WHO या विश्व बैंक की पहल नहीं है।
✅ कथन 1 – सही: वाटर क्रेडिट जल और स्वच्छता क्षेत्र में सूक्ष्म वित्त सिद्धांतों को लागू करता है, व्यक्तियों और परिवारों को जल और स्वच्छता बुनियादी ढांचे के लिए छोटे ऋण प्रदान करता है।
❌ कथन 2 – गलत: वाटर क्रेडिट, Water.org की एक पहल है जो एक अंतर्राष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है, न कि WHO और विश्व बैंक के तत्वावधान में शुरू की गई वैश्विक पहल।
✅ कथन 3 – सही: यह कार्यक्रम गरीब लोगों को किफायती वित्तपोषण के माध्यम से जल और स्वच्छता तक पहुँच प्रदान करने, सब्सिडी पर उनकी निर्भरता कम करने और सतत समाधानों को सक्षम बनाने का उद्देश्य रखता है।
भारत में नियोजित आकस्मिक श्रमिकों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- सभी आकस्मिक श्रमिक कर्मचारी भविष्य निधि कवरेज के हकदार हैं।
- सभी आकस्मिक श्रमिक नियमित कार्य घंटे और ओवरटाइम भुगतान के हकदार हैं।
- सरकार एक अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट कर सकती है कि कोई प्रतिष्ठान या उद्योग केवल अपने बैंक खाते के माध्यम से ही मजदूरी का भुगतान करेगा।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 2 और 3
यह प्रश्न भारत में आकस्मिक श्रमिकों पर लागू श्रम कानूनों और अधिकारों के ज्ञान का परीक्षण करता है। कथन 1 गलत है क्योंकि ईपीएफ कवरेज सभी आकस्मिक श्रमिकों के लिए स्वचालित नहीं है, जबकि कथन 2 और 3 सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और मजदूरी भुगतान विनियमों के आधार पर सही हैं।
❌ कथन 1 – गलत: सभी आकस्मिक श्रमिक स्वचालित रूप से कर्मचारी भविष्य निधि कवरेज के हकदार नहीं हैं। ईपीएफ कवरेज 20 या अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों पर लागू होता है, और आकस्मिक श्रमिकों को नियमितीकरण और ईपीएफ लाभों के लिए अर्हता प्राप्त करने हेतु निरंतर सेवा (एक वर्ष में कम से कम 240 दिन या 5-दिवसीय सप्ताह कार्यालयों के लिए 206 दिन) प्रदान करनी होगी।
✅ कथन 2 – सही: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि आकस्मिक श्रमिक नियमित कार्य घंटे और ओवरटाइम भुगतान के हकदार हैं क्योंकि वे ईपीएफ अधिनियम सहित विभिन्न श्रम कानूनों के तहत 'कर्मचारी' की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं, जो कर्मचारियों को व्यापक रूप से प्रतिष्ठान के कार्य में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लगे लोगों को शामिल करने के लिए परिभाषित करता है।
✅ कथन 3 – सही: मजदूरी भुगतान अधिनियम और संबंधित विनियमों के तहत, सरकार अधिसूचनाएं जारी कर सकती है जिनमें यह अनिवार्य किया जा सकता है कि विशिष्ट प्रतिष्ठानों या उद्योगों को पारदर्शिता सुनिश्चित करने और शोषण को रोकने के लिए केवल बैंक खातों के माध्यम से ही मजदूरी का भुगतान करना होगा।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में आकस्मिक श्रमिकों के अधिकार
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| ईपीएफ कवरेज | 20+ कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों पर लागू; आकस्मिक श्रमिकों को नियमितीकरण और ईपीएफ लाभों के लिए 240 दिन (5-दिवसीय सप्ताह के लिए 206) की निरंतर सेवा की आवश्यकता है |
| कार्य घंटे और ओवरटाइम | आकस्मिक श्रमिक श्रम कानूनों के अनुसार सामान्य कार्य घंटे और ओवरटाइम भुगतान के हकदार हैं; सर्वोच्च न्यायालय ने 'कर्मचारी' के रूप में उनकी स्थिति की पुष्टि की है |
| मजदूरी भुगतान | सरकार पारदर्शिता के लिए मजदूरी भुगतान अधिनियम के तहत बैंक खातों के माध्यम से भुगतान को अनिवार्य कर सकती है |
| नियमितीकरण योजना | आकस्मिक श्रमिक (अस्थायी दर्जा प्रदान करना और नियमितीकरण) योजना, 1993 अस्थायी दर्जा और अंततः नियमितीकरण का प्रावधान करती है |
| कर्मचारी की परिभाषा | ईपीएफ अधिनियम की धारा 2(f) 'कर्मचारी' को व्यापक रूप से परिभाषित करती है जिसमें प्रतिष्ठान के कार्य में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लगे लोग शामिल हैं |
प्रेशर कुकर में, भोजन को जिस तापमान पर पकाया जाता है वह मुख्य रूप से निम्नलिखित में से किस पर निर्भर करता है?
- ढक्कन में छेद का क्षेत्रफल।
- लौ का तापमान
- ढक्कन का भार
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
प्रेशर कुकर में, खाना पकाने का तापमान आंतरिक दबाव पर निर्भर करता है, जो पानी के क्वथनांक को निर्धारित करता है। ढक्कन में छेद का क्षेत्रफल और ढक्कन का भार यह नियंत्रित करते हैं कि कुकर के अंदर कितना दबाव बनता है, जिससे खाना पकाने का तापमान नियंत्रित होता है। लौ का तापमान केवल गर्म होने की दर को प्रभावित करता है, अधिकतम तापमान को नहीं।
✅ कथन 1 – सही: ढक्कन में छेद का आकार भाप की निकासी को नियंत्रित करता है; एक बड़ा छेद अधिक भाप को बाहर निकलने देता है, जिससे आंतरिक दबाव कम होता है और खाना पकाने का तापमान कम हो जाता है।
❌ कथन 2 – गलत: लौ का तापमान केवल गर्म होने की दर को प्रभावित करता है, अंतिम खाना पकाने के तापमान को नहीं, जो कुकर के आंतरिक दबाव द्वारा निर्धारित होता है।
✅ कथन 3 – सही: ढक्कन पर भारी वजन को उठाने के लिए अधिक आंतरिक दबाव की आवश्यकता होती है, जिससे भाप केवल तभी बाहर निकलती है जब उच्च दबाव प्राप्त हो जाता है, जो क्वथनांक को बढ़ाता है और इस प्रकार खाना पकाने का तापमान बढ़ता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रेशर कुकर तंत्र
- सिद्धांत: प्रेशर कुकर इस सिद्धांत पर काम करते हैं कि दबाव बढ़ाने से पानी का क्वथनांक 100°C से ऊपर बढ़ जाता है।
- सामान्य क्वथनांक: वायुमंडलीय दबाव (1 atm) पर, पानी 100°C पर उबलता है।
- प्रेशर कुकर में: दबाव 15 psi (लगभग 2 atm) तक पहुंच सकता है, जिससे क्वथनांक लगभग 121°C तक बढ़ जाता है।
- दबाव नियमन: वेंट पर वजन (रेगुलेटर) अधिकतम दबाव को नियंत्रित करता है और जब दबाव एक सीमा से अधिक हो जाता है तो भाप को बाहर निकलने देता है।
- वेंट छेद का आकार: वेंट छेद का क्षेत्रफल यह निर्धारित करता है कि भाप कितनी आसानी से बाहर निकल सकती है, जो दबाव निर्माण को प्रभावित करता है।
- खाना पकाने का समय: बढ़े हुए दबाव के कारण उच्च तापमान खाना पकाने के समय को महत्वपूर्ण रूप से कम कर देता है।
- लौ की भूमिका: लौ की तीव्रता प्रभावित करती है कि कुकर कितनी जल्दी संचालन दबाव तक पहुंचता है, अंतिम खाना पकाने के तापमान को नहीं।
🧐 Not Sure What to Study Next?
Get a personalised study plan based on your goals, time and revision needs.
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- एडेनोवायरस में एकल-रज्जुक DNA जीनोम होता है जबकि रेट्रोवायरस में द्विरज्जुक DNA जीनोम होता है।
- सामान्य जुकाम कभी-कभी एडेनोवायरस के कारण होता है जबकि AIDS एक रेट्रोवायरस के कारण होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
कथन 1 गलत है क्योंकि एडेनोवायरस में द्विरज्जुक DNA जीनोम होता है, न कि एकल-रज्जुक DNA। रेट्रोवायरस में एकल-रज्जुक RNA जीनोम होता है (द्विरज्जुक DNA नहीं), जिसे वे रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज का उपयोग करके DNA में परिवर्तित करते हैं। कथन 2 सही है क्योंकि एडेनोवायरस सामान्य जुकाम का एक आम कारण है, और AIDS वास्तव में HIV के कारण होता है, जो एक रेट्रोवायरस है।
❌ कथन 1 – गलत: एडेनोवायरस में द्विरज्जुक DNA जीनोम होता है; रेट्रोवायरस में एकल-रज्जुक RNA जीनोम होता है, न कि द्विरज्जुक DNA।
✅ कथन 2 – सही: सामान्य जुकाम एडेनोवायरस के कारण हो सकता है, और AIDS, HIV के कारण होता है, जो एक रेट्रोवायरस है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वायरल जीनोम के प्रकार
| वायरस प्रकार | जीनोम संरचना | उदाहरण | मुख्य विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| एडेनोवायरस | द्विरज्जुक DNA (dsDNA) | सामान्य जुकाम, नेत्रश्लेष्मला शोथ | आवरणहीन, बीस फलकी संरचना |
| रेट्रोवायरस | एकल-रज्जुक RNA (ssRNA) | HIV (AIDS), HTLV | RNA को DNA में बदलने के लिए रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज का उपयोग करते हैं |
| ऑर्थोमिक्सोवायरस | एकल-रज्जुक RNA (ssRNA) | इन्फ्लूएंजा वायरस | आवरणयुक्त, खंडित जीनोम |
| हर्पीसवायरस | द्विरज्जुक DNA (dsDNA) | हर्पीज सिम्प्लेक्स, वैरीसेला-जोस्टर | आवरणयुक्त, बड़ा जीनोम, सुप्तावस्था |
- DNA वायरस: आमतौर पर केन्द्रक में मेजबान कोशिका की मशीनरी का उपयोग करके प्रतिकृति बनाते हैं (अपवाद: पॉक्सवायरस कोशिकाद्रव्य में प्रतिकृति बनाते हैं)
- RNA वायरस: अधिकांश कोशिकाद्रव्य में प्रतिकृति बनाते हैं; अपना स्वयं का RNA पॉलीमरेज रखते हैं
- रेट्रोवायरस: रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज एंजाइम रखने में अद्वितीय जो RNA टेम्पलेट से DNA संश्लेषित करता है
- सामान्य जुकाम के कारण: राइनोवायरस (सबसे आम), कोरोनावायरस, एडेनोवायरस, और अन्य
- HIV वर्गीकरण: रेट्रोविरिडे परिवार का लेंटीवायरस जीनस; CD4+ T कोशिकाओं को लक्षित करता है
खगोलीय दूरियों को प्रकाश-वर्ष में मापने का निम्नलिखित में से कौन सा एक कारण है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — प्रकाश की गति हमेशा समान रहती है।
खगोलीय दूरियों को प्रकाश-वर्ष में मापा जाता है क्योंकि निर्वात में प्रकाश की गति एक सार्वभौमिक स्थिरांक है (लगभग 299,792 किमी/सेकंड)। यह स्थिर प्रकृति इसे अंतरिक्ष में विशाल दूरियों को मापने के लिए एक विश्वसनीय और मानकीकृत इकाई बनाती है। एक प्रकाश-वर्ष उस दूरी को दर्शाता है जो प्रकाश एक वर्ष में तय करता है, जो ब्रह्मांडीय दूरियों के लिए एक व्यावहारिक पैमाना प्रदान करता है।
❌ कथन A – गलत: तारकीय पिंडों के बीच की दूरियाँ कक्षीय गति, तारकीय विकास और आकाशगंगीय गतिविधियों के कारण बदलती रहती हैं; यह प्रकाश-वर्ष को इकाई के रूप में उपयोग करने का कारण नहीं है।
❌ कथन B – गलत: जबकि गुरुत्वाकर्षण मौलिक है, तारकीय पिंडों के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव द्रव्यमान और दूरी परिवर्तन के साथ भिन्न होते हैं; इसका प्रकाश-वर्ष को दूरी इकाई के रूप में चुनने से कोई संबंध नहीं है।
❌ कथन C – गलत: प्रकाश हमेशा सीधी रेखा में यात्रा नहीं करता है; यह आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत द्वारा पूर्वानुमानित गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग के कारण विशाल वस्तुओं के चारों ओर मुड़ जाता है।
✅ कथन D – सही: निर्वात में प्रकाश की गति लगभग 3 × 10⁸ मी/से पर स्थिर रहती है, जो इसे खगोलीय दूरियों को मापने के लिए एक आदर्श मानक बनाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: खगोलीय दूरी माप
- प्रकाश-वर्ष: निर्वात में प्रकाश द्वारा एक वर्ष में तय की गई दूरी (लगभग 9.46 ट्रिलियन किलोमीटर या 5.88 ट्रिलियन मील)।
- खगोलीय इकाई (AU): पृथ्वी से सूर्य की औसत दूरी (लगभग 150 मिलियन किमी); सौर मंडल के भीतर दूरियों को मापने के लिए उपयोग की जाती है।
- पार्सेक: खगोलीय दूरियों के लिए एक अन्य इकाई, जो लगभग 3.26 प्रकाश-वर्ष के बराबर है; पेशेवर खगोलविदों द्वारा आमतौर पर उपयोग की जाती है।
- प्रकाश की गति (c): एक मौलिक भौतिक स्थिरांक जो निर्वात में 299,792,458 मीटर प्रति सेकंड के बराबर है; प्रेक्षक की गति या स्रोत की गति की परवाह किए बिना स्थिर रहती है।
- गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग: गुरुत्वाकर्षण के कारण विशाल वस्तुओं के चारों ओर प्रकाश का मुड़ना, आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत द्वारा पूर्वानुमानित और आकाशगंगाओं और ब्लैक होल के चारों ओर देखा गया।
'ACE2' शब्द किस संदर्भ में चर्चा में है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — विषाणुजनित रोगों का प्रसार
ACE2 (एंजियोटेंसिन-कन्वर्टिंग एंजाइम 2) मानव कोशिका सतहों पर पाया जाने वाला एक प्रोटीन रिसेप्टर है जो COVID-19 महामारी के दौरान व्यापक रूप से चर्चा में आया। SARS-CoV-2 वायरस मानव कोशिकाओं में प्रवेश के लिए ACE2 का उपयोग अपने प्राथमिक प्रवेश बिंदु के रूप में करता है, अपने स्पाइक प्रोटीन के माध्यम से इस रिसेप्टर से जुड़कर फेफड़ों, हृदय, गुर्दे और अन्य अंगों में कोशिकाओं को संक्रमित करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: ACE2 रिसेप्टर
- पूर्ण रूप: एंजियोटेंसिन-कन्वर्टिंग एंजाइम 2
- सामान्य कार्य: ACE2 एक एंजाइम है जो एंजियोटेंसिन II को एंजियोटेंसिन (1-7) में परिवर्तित करके रक्तचाप और हृदय संवहनी कार्य को विनियमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है
- स्थान: फेफड़ों (एल्वियोलर कोशिकाओं), हृदय, गुर्दे, आंतों और रक्त वाहिकाओं सहित कई अंगों में कोशिका सतहों पर पाया जाता है
- COVID-19 में भूमिका: कोशिकीय रिसेप्टर के रूप में कार्य करता है जिससे SARS-CoV-2 स्पाइक प्रोटीन कोशिकाओं में वायरल प्रवेश के लिए जुड़ता है
- अनुसंधान महत्व: वायरल प्रवेश को रोकने के लिए घुलनशील ACE2, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और लघु अणु अवरोधकों सहित चिकित्सीय हस्तक्षेपों का लक्ष्य
- पूर्व कनेक्शन: मूल SARS-CoV वायरस (2003) ने भी अपने रिसेप्टर के रूप में ACE2 का उपयोग किया था, जो इसे कोरोनावायरस संक्रमणों में एक ज्ञात कमजोरी बनाता है
वंशानुगत रोगों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- माता-पिता से संतान में माइटोकॉन्ड्रियल रोगों के संचरण को माइटोकॉन्ड्रियल प्रतिस्थापन चिकित्सा द्वारा अंडे के इन विट्रो निषेचन से पहले या बाद में रोका जा सकता है।
- एक बच्चा माइटोकॉन्ड्रियल रोगों को पूरी तरह से माता से प्राप्त करता है और पिता से नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
माइटोकॉन्ड्रियल प्रतिस्थापन चिकित्सा (MRT) एक प्रजनन तकनीक है जो माता से संतान में माइटोकॉन्ड्रियल रोगों के संचरण को रोकने के लिए डिज़ाइन की गई है, जिसमें दोषपूर्ण माइटोकॉन्ड्रिया को स्वस्थ दाता माइटोकॉन्ड्रिया से प्रतिस्थापित किया जाता है, या तो इन विट्रो निषेचन से पहले या बाद में। माइटोकॉन्ड्रियल DNA विशेष रूप से मातृ वंश के माध्यम से विरासत में मिलता है, क्योंकि शुक्राणु में मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया आमतौर पर निषेचन के बाद नष्ट हो जाते हैं, जिससे बच्चे के लिए पिता से माइटोकॉन्ड्रियल रोग विरासत में लेना असंभव हो जाता है।
✅ कथन 1 – सही: MRT को निषेचन से पहले (मातृ स्पिंडल स्थानांतरण का उपयोग करके) या निषेचन के बाद (प्रोन्यूक्लियर स्थानांतरण का उपयोग करके) माइटोकॉन्ड्रियल रोग संचरण को रोकने के लिए किया जा सकता है।
✅ कथन 2 – सही: माइटोकॉन्ड्रियल DNA पूरी तरह से माता से विरासत में मिलता है, क्योंकि केवल अंडा ही भ्रूण को माइटोकॉन्ड्रिया प्रदान करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: माइटोकॉन्ड्रियल वंशानुक्रम और प्रतिस्थापन चिकित्सा
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| माइटोकॉन्ड्रियल DNA (mtDNA) | माइटोकॉन्ड्रिया में उपस्थित वृत्ताकार DNA; कोशिकीय ऊर्जा उत्पादन के लिए आवश्यक 37 जीन को एनकोड करता है; विशेष रूप से माता से विरासत में मिलता है |
| माइटोकॉन्ड्रियल रोग | mtDNA में उत्परिवर्तन के कारण होते हैं; कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पादन को प्रभावित करते हैं; उदाहरणों में MELAS सिंड्रोम, लेह सिंड्रोम और लेबर की वंशानुगत ऑप्टिक न्यूरोपैथी शामिल हैं |
| मातृ वंशानुक्रम | शुक्राणु माइटोकॉन्ड्रिया निषेचन के बाद नष्ट हो जाते हैं; केवल अंडे के माइटोकॉन्ड्रिया भ्रूण में योगदान करते हैं; इस प्रकार, mtDNA केवल माता से आता है |
| माइटोकॉन्ड्रियल प्रतिस्थापन चिकित्सा (MRT) | माइटोकॉन्ड्रियल रोगों के संचरण को रोकने की तकनीक; दोषपूर्ण माइटोकॉन्ड्रिया को स्वस्थ दाता माइटोकॉन्ड्रिया से प्रतिस्थापित करना शामिल है |
| MRT तकनीकें | मातृ स्पिंडल स्थानांतरण: निषेचन से पहले - माता के अंडे से नाभिक को स्वस्थ माइटोकॉन्ड्रिया वाले एन्यूक्लिएटेड दाता अंडे में स्थानांतरित किया जाता है प्रोन्यूक्लियर स्थानांतरण: निषेचन के बाद - निषेचित अंडे से प्रोन्यूक्लियाई को एन्यूक्लिएटेड दाता भ्रूण में स्थानांतरित किया जाता है |
| तीन-माता-पिता शिशु | MRT के माध्यम से जन्म लेने वाले बच्चे में तीन लोगों से आनुवंशिक सामग्री होती है: दोनों माता-पिता से परमाणु DNA और दाता से mtDNA |
| नैतिक और कानूनी स्थिति | यूके 2015 में MRT को वैध बनाने वाला पहला देश बना; नैतिक निहितार्थों के संबंध में कई देशों में बहस जारी है |
सड़क प्रकाश व्यवस्था के संदर्भ में, सोडियम लैंप LED लैंप से किस प्रकार भिन्न हैं?
- सोडियम लैंप 360 डिग्री में प्रकाश उत्पन्न करते हैं लेकिन LED लैंप के मामले में ऐसा नहीं है।
- सड़क-रोशनी के रूप में, सोडियम लैंप की आयु LED लैंप की तुलना में अधिक होती है।
- सोडियम लैंप से दृश्य प्रकाश का स्पेक्ट्रम लगभग एकवर्णी होता है जबकि LED लैंप सड़क प्रकाश व्यवस्था में महत्वपूर्ण रंग लाभ प्रदान करते हैं।
नीचे दिए गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनें
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 3
यह प्रश्न सड़क प्रकाश व्यवस्था में उपयोग किए जाने वाले पारंपरिक सोडियम लैंप और आधुनिक LED लैंप की तुलना करता है। कथन 1 सही रूप से पहचानता है कि सोडियम लैंप सर्वदिशात्मक रूप से (360 डिग्री) प्रकाश उत्सर्जित करते हैं, जबकि LED दिशात्मक होते हैं, जिससे प्रकाश की बर्बादी कम होती है। कथन 3 सही रूप से नोट करता है कि सोडियम लैंप लगभग एकवर्णी पीला प्रकाश उत्पन्न करते हैं, जबकि LED बेहतर रंग प्रतिपादन और स्पेक्ट्रम विविधता प्रदान करते हैं।
✅ कथन 1 – सही: सोडियम लैंप सभी दिशाओं में प्रकाश उत्सर्जित करते हैं (360 डिग्री), जबकि LED लैंप दिशात्मक होते हैं और आवश्यक स्थान पर प्रकाश केंद्रित करते हैं, जिससे दक्षता में सुधार होता है।
❌ कथन 2 – गलत: LED लैंप की आयु (50,000-100,000 घंटे) सोडियम लैंप (15,000-24,000 घंटे) की तुलना में काफी अधिक होती है।
✅ कथन 3 – सही: सोडियम लैंप एकवर्णी पीला-नारंगी प्रकाश (संकीर्ण स्पेक्ट्रम) उत्पन्न करते हैं, जबकि LED लैंप सड़क प्रकाश व्यवस्था के लिए बेहतर रंग प्रतिपादन सूचकांक (CRI) के साथ व्यापक स्पेक्ट्रम प्रदान करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सड़क प्रकाश प्रौद्योगिकियाँ
| पैरामीटर | सोडियम लैंप (HPS/LPS) | LED लैंप |
|---|---|---|
| प्रकाश वितरण | सर्वदिशात्मक (360°) - परावर्तक की आवश्यकता | दिशात्मक - केंद्रित किरण |
| आयु | 15,000-24,000 घंटे | 50,000-100,000 घंटे |
| प्रकाश स्पेक्ट्रम | एकवर्णी (पीला-नारंगी) | पूर्ण स्पेक्ट्रम, समायोज्य |
| रंग प्रतिपादन सूचकांक (CRI) | निम्न (20-25) | उच्च (70-90+) |
| ऊर्जा दक्षता | मध्यम (80-140 lm/W) | उच्च (100-200 lm/W) |
| वार्म-अप समय | कई मिनट | तत्काल चालू/बंद |
| पर्यावरणीय प्रभाव | पारा/सोडियम युक्त | कोई हानिकारक पदार्थ नहीं |
निम्नलिखित में से किसका उपयोग प्राकृतिक मच्छर विकर्षक (mosquito repellent) तैयार करने में किया जाता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — लेमनग्रास
लेमनग्रास (जिसे सिट्रोनेला घास के नाम से भी जाना जाता है) का व्यापक रूप से प्राकृतिक मच्छर विकर्षक तैयार करने में उपयोग किया जाता है क्योंकि इसमें तीव्र नींबू जैसी गंध होती है। लेमनग्रास से निकाले गए आवश्यक तेल में सिट्रोनेला तेल होता है, जो मच्छरों को दूर भगाने में अत्यधिक प्रभावी है। अध्ययनों से पता चला है कि लेमनग्रास का तेल मच्छरों की कुछ प्रजातियों के 95% तक को दूर भगा सकता है या मार सकता है, जिसका प्रभाव लगभग 2-3 घंटे तक रहता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्राकृतिक मच्छर विकर्षक
- लेमनग्रास (Cymbopogon): इसमें सिट्रोनेला तेल होता है, जो सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला प्राकृतिक मच्छर विकर्षक है; मच्छरों की कई प्रजातियों के खिलाफ प्रभावी
- क्रियाविधि: तीव्र नींबू की गंध मानव गंध और कार्बन डाइऑक्साइड को छिपा देती है, जिससे मच्छरों के लिए अपने लक्ष्य को खोजना मुश्किल हो जाता है
- सिट्रोनेला तेल: लेमनग्रास की पत्तियों से निकाला जाता है; मोमबत्तियों, स्प्रे, लोशन और अगरबत्ती में उपयोग किया जाता है
- प्रभाव की अवधि: आमतौर पर 2-3 घंटे तक रहता है; विस्तारित सुरक्षा के लिए पुनः उपयोग की आवश्यकता होती है
- अन्य प्राकृतिक विकर्षक: नीम का तेल, नीलगिरी का तेल, लैवेंडर, तुलसी और गेंदा में भी मच्छर विकर्षक गुण होते हैं
- सुरक्षा: प्राकृतिक विकर्षक आमतौर पर DEET जैसे रासायनिक विकल्पों की तुलना में अधिक सुरक्षित होते हैं, कम दुष्प्रभावों के साथ
'रीकॉम्बिनेंट वेक्टर वैक्सीन' के संबंध में हाल के विकास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- इन टीकों के विकास में आनुवंशिक अभियांत्रिकी (जेनेटिक इंजीनियरिंग) लागू की जाती है।
- जीवाणु और विषाणु को वाहक (वेक्टर) के रूप में उपयोग किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
रीकॉम्बिनेंट वेक्टर वैक्सीन आनुवंशिक अभियांत्रिकी का उपयोग करके रोगजनक जीन को हानिरहित वाहक जीवों (वेक्टर) में डालते हैं, जो फिर इन जीनों को मानव कोशिकाओं में पहुँचाते हैं ताकि प्रतिजन (एंटीजन) उत्पन्न हो और प्रतिरक्षा उत्पन्न हो। विषाणु (जैसे कोविशील्ड में एडेनोवायरस) और जीवाणु (जैसे क्षीण साल्मोनेला या BCG) दोनों इन टीकों में वेक्टर के रूप में काम कर सकते हैं।
✅ कथन 1 – सही: आनुवंशिक अभियांत्रिकी रीकॉम्बिनेंट वेक्टर वैक्सीन के विकास के लिए आवश्यक है, जिसमें रोगजनक प्रतिजन जीन को वेक्टर की आनुवंशिक सामग्री में डाला जाता है।
✅ कथन 2 – सही: प्रतिजन पहुँचाने के लिए जीवाणु (जैसे साल्मोनेला, BCG) और विषाणु (जैसे एडेनोवायरस, VSV) दोनों को वेक्टर के रूप में उपयोग किया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: रीकॉम्बिनेंट वेक्टर वैक्सीन
- प्रौद्योगिकी: रोगजनक प्रतिजन को कूटबद्ध करने वाले जीनों को हानिरहित विषाणु या जीवाणु वेक्टर में डालने के लिए आनुवंशिक अभियांत्रिकी का उपयोग करती है
- क्रियाविधि: वेक्टर आनुवंशिक सामग्री को मेजबान कोशिकाओं में पहुँचाते हैं, जो फिर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को ट्रिगर करने वाले प्रतिजन उत्पन्न करते हैं
- विषाणु वेक्टर: एडेनोवायरस (कोविशील्ड/स्पुतनिक V), वेसिकुलर स्टोमैटाइटिस वायरस (इबोला वैक्सीन - एर्वेबो), संशोधित वैक्सीनिया एन्कारा (MVA)
- जीवाणु वेक्टर: क्षीण साल्मोनेला टाइफीम्यूरियम, माइकोबैक्टीरियम बोविस (BCG), लिस्टेरिया मोनोसाइटोजेन्स उपभेद
- लाभ: मजबूत कोशिकीय और ह्यूमरल प्रतिरक्षा, कोई जीवित रोगजनक उपयोग नहीं, स्केलेबल उत्पादन
- उदाहरण: COVID-19 वैक्सीन (एस्ट्राजेनेका/कोविशील्ड, J&J, स्पुतनिक V), इबोला वैक्सीन (एर्वेबो), प्रायोगिक TB और मलेरिया वैक्सीन
बॉलगार्ड I और बॉलगार्ड II प्रौद्योगिकियों का उल्लेख किस संदर्भ में किया जाता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — आनुवंशिक रूप से संशोधित फसल पौधों का विकास करना।
बॉलगार्ड I और बॉलगार्ड II जैव प्रौद्योगिकी उत्पाद हैं जो कीट प्रतिरोधी आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) कपास पौधों के निर्माण के लिए विकसित किए गए हैं। ये प्रौद्योगिकियां बैसिलस थुरिंजिएन्सिस (Bt) बैक्टीरिया से जीन का उपयोग करती हैं जो कीटनाशक प्रोटीन उत्पन्न करते हैं जो कपास के पौधों को बॉलवर्म और अन्य लेपिडोप्टेरन कीटों से बचाते हैं, जिससे रासायनिक कीटनाशकों की आवश्यकता कम हो जाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: Bt कपास प्रौद्योगिकियां
| विशेषता | बॉलगार्ड I | बॉलगार्ड II |
|---|---|---|
| शुरुआत का वर्ष | 2002 (भारत की पहली अनुमोदित GM फसल) | 2006 |
| उपयोग किए गए Bt जीन | एकल जीन (Cry1Ac) | दो जीन (Cry1Ac और Cry2Ab) |
| लक्षित कीट | मुख्य रूप से अमेरिकन बॉलवर्म (हेलिकोवर्पा आर्मिजेरा) | व्यापक स्पेक्ट्रम: अमेरिकन बॉलवर्म, स्पोडोप्टेरा प्रजातियां, और अन्य लेपिडोप्टेरन कैटरपिलर |
| तंत्र | Bt जीन विशिष्ट कीटों के लिए विषाक्त कीटनाशक प्रोटीन उत्पन्न करता है | द्वि-जीन प्रौद्योगिकी बढ़ी हुई और व्यापक प्रतिरोधकता प्रदान करती है |
| लाभ | कीटनाशक उपयोग में कमी, उत्पादन में वृद्धि | बेहतर कीट प्रतिरोध, विलंबित प्रतिरोध विकास, उच्च प्रभावकारिता |
जल किसी भी अन्य तरल पदार्थ की तुलना में अधिक पदार्थों को घोल सकता है क्योंकि
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — यह प्रकृति में द्विध्रुवीय है
जल को "सार्वभौमिक विलायक" के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह द्विध्रुवीय (ध्रुवीय) प्रकृति का है। जल के अणुओं की एक मुड़ी हुई संरचना होती है जिसमें हाइड्रोजन परमाणुओं पर आंशिक धनात्मक आवेश और ऑक्सीजन परमाणु पर आंशिक ऋणात्मक आवेश होता है, जो एक द्विध्रुव बनाता है। यह ध्रुवीयता जल के अणुओं को आयनों और अन्य ध्रुवीय अणुओं के साथ स्थिरवैद्युत आकर्षण के माध्यम से घेरने और अन्योन्यक्रिया करने में सक्षम बनाती है, उन्हें प्रभावी रूप से अलग करके घोल देती है। द्विध्रुवीय प्रकृति मूल कारण है कि जल किसी भी अन्य तरल पदार्थ की तुलना में अधिक पदार्थों को घोल सकता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विलायक के रूप में जल के गुण
- द्विध्रुवीय/ध्रुवीय प्रकृति: जल की एक मुड़ी हुई आणविक संरचना होती है (H-O-H कोण ~104.5°) जिसमें ऑक्सीजन अधिक विद्युतऋणात्मक होती है, जो आंशिक आवेश (H पर δ+, O पर δ-) बनाती है।
- सार्वभौमिक विलायक: जल आयनिक यौगिकों (जैसे लवण) को जल के अणुओं से आयनों को घेरकर (हाइड्रेशन) और ध्रुवीय सहसंयोजक यौगिकों को हाइड्रोजन बंधन के माध्यम से घोलता है।
- हाइड्रोजन बंधन: ध्रुवीय प्रकृति जल के अणुओं को एक-दूसरे के साथ और विलेय कणों के साथ हाइड्रोजन बंधन बनाने की अनुमति देती है, जो विघटन को सुगम बनाती है।
- उच्च परावैद्युत स्थिरांक: जल में एक उच्च परावैद्युत स्थिरांक (~80) होता है, जो घुले हुए आयनों के बीच स्थिरवैद्युत आकर्षण को कम करता है, उन्हें विलयन में अलग रखता है।
- विलायक गुणों से संबंधित नहीं: अच्छा ऊष्मा चालक, उच्च विशिष्ट ऊष्मा, और हाइड्रोजन का ऑक्साइड होना जल के गुण हैं लेकिन इसकी असाधारण विलायक क्षमताओं के प्राथमिक कारण नहीं हैं।
निम्नलिखित में से किनकी ऐसी प्रजातियाँ हैं जो अन्य जीवों के साथ सहजीवी संबंध स्थापित कर सकती हैं?
1. नाइडेरियन (Cnidarians)
2. कवक (Fungi)
3. प्रोटोजोआ (Protozoa)
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
तीनों समूह—नाइडेरियन, कवक और प्रोटोजोआ—में ऐसी प्रजातियाँ हैं जो अन्य जीवों के साथ सहजीवी संबंध स्थापित करने में सक्षम हैं। यह प्रकृति में विभिन्न वर्गीकरण समूहों में सहजीविता की व्यापक उपस्थिति को प्रदर्शित करता है।
✅ कथन 1 – सही: कोरल जैसे नाइडेरियन ज़ूज़ैन्थेली (प्रकाश संश्लेषक शैवाल) के साथ सहजीवी संबंध बनाते हैं, जो प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्र के लिए आवश्यक है।
✅ कथन 2 – सही: कवक विविध सहजीवी संबंध बनाते हैं जिनमें पादप जड़ों के साथ माइकोराइजा और शैवाल या सायनोबैक्टीरिया के साथ लाइकेन शामिल हैं।
✅ कथन 3 – सही: प्रोटोजोआ सहजीवी संबंध स्थापित करते हैं, जैसे दीमक की आंत में रहने वाले जो सेल्युलोज पचाने में मदद करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विभिन्न जीवों में सहजीवी संबंध
| जीव समूह | सहजीविता का उदाहरण | प्रकार | लाभ |
|---|---|---|---|
| नाइडेरियन | कोरल-ज़ूज़ैन्थेली | सहोपकारिता | शैवाल को आश्रय मिलता है; कोरल को प्रकाश संश्लेषण से पोषक तत्व मिलते हैं |
| कवक | माइकोराइजा (कवक-पादप जड़ें) | सहोपकारिता | कवक को कार्बोहाइड्रेट मिलता है; पादप को बेहतर पोषक अवशोषण मिलता है |
| कवक | लाइकेन (कवक-शैवाल/सायनोबैक्टीरिया) | सहोपकारिता | शैवाल भोजन बनाते हैं; कवक संरचना और सुरक्षा प्रदान करता है |
| प्रोटोजोआ | दीमक की आंत में प्रोटोजोआ | सहोपकारिता | प्रोटोजोआ को आवास मिलता है; दीमक सेल्युलोज पचाते हैं |
| प्रोटोजोआ | जुगाली करने वाले पशुओं की आंत में प्रोटोजोआ | सहोपकारिता | शाकाहारी जीवों में पादप सामग्री को तोड़ने में मदद करते हैं |
- सहोपकारिता: दोनों जीव संबंध से लाभान्वित होते हैं
- सहजीविता: विभिन्न प्रजातियों के बीच निकट और दीर्घकालिक जैविक अंतःक्रिया
- ज़ूज़ैन्थेली: एककोशिकीय डाइनोफ्लैजिलेट जो कोरल विरंजन अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हैं
- पारिस्थितिक महत्व: सहजीवी संबंध पारिस्थितिकी तंत्र के कार्य और जैव विविधता के लिए मूलभूत हैं
प्रकृति में, निम्नलिखित में से कौन सा/से बिना मिट्टी की सतह पर जीवित रहते हुए पाए जाने की सबसे अधिक संभावना है?
- फर्न (Fern)
- लाइकेन (Lichen)
- मॉस (Moss)
- मशरूम (Mushroom)
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 2 और 3
लाइकेन और मॉस बिना मिट्टी के नंगी सतहों पर जीवित रहने के लिए विशिष्ट रूप से अनुकूलित हैं। लाइकेन, कवक और शैवाल/सायनोबैक्टीरिया के सहजीवी संघ होने के कारण, हवा और बारिश से सीधे पोषक तत्व अवशोषित करके चट्टानों और पेड़ की छाल पर उपनिवेश स्थापित कर सकते हैं। मॉस, हालांकि अनाहारी पादप हैं, विशेष संरचनाएं रखते हैं जो उन्हें मिट्टी की आवश्यकता के बिना अपने तत्काल वातावरण से पानी और पोषक तत्व अवशोषित करने में सक्षम बनाती हैं।
जीवों का विश्लेषण:
1. फर्न – मिट्टी के बिना जीवित नहीं रह सकता: फर्न संवहनी पादप हैं जिन्हें अपनी जड़ों को स्थिर करने और अपनी सुविकसित जड़ प्रणाली के माध्यम से पानी अवशोषित करने के लिए मिट्टी की आवश्यकता होती है।
2. लाइकेन – ✅ मिट्टी के बिना जीवित रह सकता है: लाइकेन सहजीवी जीव हैं (कवक + शैवाल/सायनोबैक्टीरिया) जो हवा और वर्षा से सीधे पोषक तत्व प्राप्त करते हैं, चट्टानों, छाल और अन्य नंगी सतहों पर पनपते हैं।
3. मॉस – ✅ मिट्टी के बिना जीवित रह सकता है: मॉस ब्रायोफाइट्स (अनाहारी पादप) हैं जिनमें राइजॉइड होते हैं जो नंगी सतहों से जुड़ सकते हैं और वातावरण से सीधे पानी और खनिज अवशोषित कर सकते हैं।
4. मशरूम – मिट्टी के बिना जीवित नहीं रह सकता: मशरूम कवक के फलन निकाय हैं जिन्हें माइसेलियम को बढ़ने और फलन संरचनाओं का उत्पादन करने के लिए कार्बनिक सब्सट्रेट (सड़ता हुआ पदार्थ, पोषक तत्वों से भरपूर मिट्टी) की आवश्यकता होती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मिट्टी के बिना जीवित रहने वाले जीव
| जीव | प्रकार | नंगी सतह पर जीवन | मुख्य विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| फर्न | संवहनी पादप (टेरिडोफाइट) | नहीं | जड़ स्थिरता के लिए मिट्टी की आवश्यकता; सच्ची जड़ें, तने और पत्तियां होती हैं |
| लाइकेन | सहजीवी संघ | हां | कवक + शैवाल/सायनोबैक्टीरिया; हवा से पोषक तत्व अवशोषित; वायु गुणवत्ता का संकेतक |
| मॉस | अनाहारी पादप (ब्रायोफाइट) | हां | राइजॉइड होते हैं (सच्ची जड़ें नहीं); सीधे पानी अवशोषित; चट्टानों, छाल पर उग सकता है |
| मशरूम | कवक का फलन निकाय | नहीं | माइसेलियम के लिए कार्बनिक सब्सट्रेट की आवश्यकता; कार्बनिक पदार्थ को विघटित करता है |
- लाइकेन पारिस्थितिक उत्तराधिकार में अग्रणी प्रजातियां हैं, नंगी चट्टानों का उपनिवेश करती हैं और समय के साथ उन्हें मिट्टी में अपक्षयित करती हैं।
- जैव-संकेतक के रूप में लाइकेन: SO₂, NOₓ और भारी धातुओं जैसे वायु प्रदूषकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील; अनुपस्थिति खराब वायु गुणवत्ता को इंगित करती है।
- मॉस बीजाणुओं के माध्यम से प्रजनन करते हैं और निषेचन के लिए नमी की आवश्यकता होती है लेकिन शुष्क परिस्थितियों में निर्जलीकरण से बच सकते हैं।
- ब्रायोफाइट्स (मॉस, लिवरवॉर्ट्स, हॉर्नवॉर्ट्स) में संवहनी ऊतकों (जाइलम और फ्लोएम) का अभाव होता है लेकिन विभिन्न सब्सट्रेट पर नम, छायादार वातावरण में पनप सकते हैं।
- फर्न मॉस की तुलना में अधिक उन्नत हैं, जिनमें संवहनी ऊतक होते हैं, लेकिन फिर भी इष्टतम वृद्धि के लिए नम स्थितियों और मिट्टी की आवश्यकता होती है।
निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
- जीवाणु (Bacteria)
- कवक (Fungi)
- विषाणु (Virus)
उपर्युक्त में से किसे कृत्रिम/संश्लेषित माध्यम में संवर्धित किया जा सकता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 2
जीवाणु और कवक को कृत्रिम/संश्लेषित माध्यम में संवर्धित किया जा सकता है क्योंकि उनके पास स्वतंत्र वृद्धि और प्रजनन के लिए पूर्ण कोशिकीय तंत्र होता है। विषाणु, अनिवार्य अंतःकोशिकीय परजीवी होने के कारण, कोशिकीय तंत्र से रहित होते हैं और केवल जीवित परपोषी कोशिकाओं के अंदर ही प्रतिकृति बना सकते हैं, जिससे वे संश्लेषित माध्यम में वृद्धि करने में असमर्थ होते हैं।
✅ कथन 1 (जीवाणु) – सही: जीवाणु को विभिन्न कृत्रिम माध्यम जैसे पोषक अगार, पोषक शोरबा और अन्य विशिष्ट माध्यम में संवर्धित किया जा सकता है क्योंकि वे पूर्ण उपापचयी तंत्र वाले आत्मनिर्भर जीव हैं।
✅ कथन 2 (कवक) – सही: कवक को कृत्रिम माध्यम जैसे पोटैटो डेक्सट्रोज अगार (PDA), सैबोराउड डेक्सट्रोज अगार और ज़ैपेक डॉक्स अगार में संवर्धित किया जा सकता है, क्योंकि वे वृद्धि के लिए स्वतंत्र रूप से पोषक तत्वों का उपयोग कर सकते हैं।
❌ कथन 3 (विषाणु) – गलत: विषाणु को कृत्रिम/संश्लेषित माध्यम में संवर्धित नहीं किया जा सकता क्योंकि वे अकोशिकीय हैं और प्रतिकृति के लिए जीवित परपोषी कोशिकाओं (भ्रूणित अंडे, कोशिका संवर्धन, या जीवित जीव) की आवश्यकता होती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सूक्ष्मजीव संवर्धन विधियाँ
| सूक्ष्मजीव | संवर्धन विधि | माध्यम/विधियों के उदाहरण | कारण |
|---|---|---|---|
| जीवाणु | कृत्रिम/संश्लेषित माध्यम | पोषक अगार, मैकॉन्की अगार, रक्त अगार, पोषक शोरबा | पूर्ण कोशिकीय तंत्र; आवश्यक अणुओं को संश्लेषित कर सकते हैं |
| कवक | कृत्रिम/संश्लेषित माध्यम | पोटैटो डेक्सट्रोज अगार (PDA), सैबोराउड डेक्सट्रोज अगार, ज़ैपेक डॉक्स अगार | पूर्ण उपापचयी मार्गों वाली यूकैरियोटिक कोशिकाएँ |
| विषाणु | केवल जीवित परपोषी कोशिकाएँ | कोशिका संवर्धन, भ्रूणित अंडे, जीवित जंतु/पादप | अनिवार्य अंतःकोशिकीय परजीवी; उपापचयी तंत्र की कमी |
- कृत्रिम माध्यम: जीवित कोशिकाओं के बिना प्रयोगशाला में तैयार रासायनिक रूप से परिभाषित या जटिल माध्यम
- जीवाणु संवर्धन: विशिष्ट तापमान और pH पर ठोस (अगार प्लेट्स) या तरल (शोरबा) माध्यम पर बढ़ सकते हैं
- कवक संवर्धन: जीवाणु की तुलना में थोड़ा अम्लीय pH और लंबी ऊष्मायन अवधि की आवश्यकता होती है
- विषाणु संवर्धन: ऊतक संवर्धन, भ्रूणित मुर्गी के अंडे, या प्रायोगिक जंतुओं की आवश्यकता होती है
- मुख्य अंतर: विषाणु अकोशिकीय हैं और प्रतिकृति के लिए पूरी तरह से परपोषी कोशिका के राइबोसोम, एंजाइम और न्यूक्लियोटाइड पर निर्भर हैं
औपनिवेशिक भारत के संदर्भ में, शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों को किस रूप में याद किया जाता है
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — भारतीय राष्ट्रीय सेना के अधिकारी
शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के वरिष्ठ अधिकारी थे, जिसे आजाद हिंद फौज के नाम से भी जाना जाता है, जिसका नेतृत्व नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने किया था। उन्हें 1945-46 के ऐतिहासिक लाल किला परीक्षण (INA परीक्षण) के लिए प्रसिद्ध रूप से याद किया जाता है, जहाँ अंग्रेजों द्वारा उन पर 'सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने' के आरोप में सैन्य न्यायालय में मुकदमा चलाया गया था। इन परीक्षणों ने पूरे भारत में बड़े पैमाने पर राष्ट्रवादी प्रदर्शनों को जन्म दिया और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गया, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भूलाभाई देसाई, तेज बहादुर सप्रू और जवाहरलाल नेहरू जैसे कानूनी विद्वानों वाली एक INA रक्षा समिति का गठन किया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लाल किला परीक्षण और INA
- भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA): 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा दक्षिण पूर्व एशिया में भारतीय युद्ध बंदियों और प्रवासियों से ब्रिटिश शासन से लड़ने के लिए गठित।
- लाल किला परीक्षण (नवंबर 1945 - मई 1946): दिल्ली के लाल किले में INA अधिकारियों का सैन्य न्यायालय। पहले मुकदमे में तीन अधिकारी थे जो विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व करते थे - शाहनवाज खान (मुस्लिम), प्रेम कुमार सहगल (हिंदू), और गुरबख्श सिंह ढिल्लों (सिख)।
- आरोप: सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ना, हत्या और हत्या में सहयोग।
- सार्वजनिक प्रतिक्रिया: पूरे भारत में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन, हड़तालें और विरोध; हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों को राष्ट्रवादी उत्साह में एकजुट किया।
- रक्षा समिति: भूलाभाई देसाई के नेतृत्व में; इसमें तेज बहादुर सप्रू, जवाहरलाल नेहरू और कैलाश नाथ काटजू शामिल थे।
- परिणाम: तीनों को आजीवन निर्वासन की सजा सुनाई गई, लेकिन सार्वजनिक दबाव के कारण कमांडर-इन-चीफ ने सजा माफ कर दी। परीक्षणों ने भारत छोड़ने के ब्रिटिश निर्णय को तेज किया।
- विरासत: INA परीक्षणों ने प्रदर्शित किया कि अंग्रेज अब भारतीय सशस्त्र बलों की वफादारी पर भरोसा नहीं कर सकते थे और स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
भारतीय इतिहास में 8 अगस्त 1942 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा भारत छोड़ो प्रस्ताव को अपनाया गया।
8 अगस्त 1942 को, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) ने बॉम्बे में ऐतिहासिक भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया, जिसने महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक चरण था, जिसमें भारत से तत्काल ब्रिटिश वापसी की मांग की गई थी।
✅ विकल्प 1 – सही: 8 अगस्त 1942 को बॉम्बे (अब मुंबई) में AICC द्वारा भारत छोड़ो प्रस्ताव वास्तव में अपनाया गया था।
❌ विकल्प 2 – गलत: वायसराय की कार्यकारी परिषद का विस्तार 1940 के अगस्त प्रस्ताव का हिस्सा था, 8 अगस्त 1942 से संबंधित नहीं।
❌ विकल्प 3 – गलत: कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने द्वितीय विश्व युद्ध के प्रकोप के बाद अक्टूबर-नवंबर 1939 में सात प्रांतों में इस्तीफा दिया था, 1942 में नहीं।
❌ विकल्प 4 – गलत: डोमिनियन दर्जे का प्रस्ताव करने वाला क्रिप्स मिशन मार्च 1942 में आया था, 8 अगस्त 1942 को नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| तिथि | 8 अगस्त 1942 (प्रस्ताव अपनाया गया) |
| स्थान | बॉम्बे (गोवालिया टैंक मैदान) |
| नेता | महात्मा गांधी |
| नारा | "करो या मरो" |
| मुख्य मांग | भारत में ब्रिटिश शासन का तत्काल अंत |
| सरकारी प्रतिक्रिया | 9 अगस्त 1942 को शीर्ष कांग्रेस नेताओं की तत्काल गिरफ्तारी |
| चरित्र | व्यापक हिंसा और तोड़फोड़ के साथ स्वतःस्फूर्त जन आंदोलन |
| समानांतर सरकारें | बलिया (उत्तर प्रदेश), सतारा (महाराष्ट्र), मिदनापुर (बंगाल) में स्थापित |
सत्रहवीं शताब्दी की पहली तिमाही में, निम्नलिखित में से किसमें/किन में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की फैक्ट्री/फैक्ट्रियां स्थित थी/थीं?
1. ब्रोच
2. चिकाकोल
3. त्रिचिनोपोली
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
यह प्रश्न 17वीं शताब्दी की पहली तिमाही (1600-1625) में स्थापित प्रारंभिक अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की फैक्ट्रियों के ज्ञान का परीक्षण करता है। उल्लिखित तीन स्थानों में से केवल ब्रोच में इस अवधि के दौरान एक कार्यशील अंग्रेजी फैक्ट्री थी।
✅ कथन 1 – सही: ब्रोच (भरूच, गुजरात) को 1616-1617 में एक अंग्रेजी फैक्ट्री के रूप में स्थापित किया गया था, जो सूरत फैक्ट्री (1613) की स्थापना के तुरंत बाद था, जिससे यह पश्चिमी तट पर प्रारंभिक व्यापारिक केंद्रों में से एक बन गया।
❌ कथन 2 – गलत: चिकाकोल (श्रीकाकुलम, आंध्र प्रदेश) 17वीं शताब्दी की पहली तिमाही में अंग्रेजी फैक्ट्री नहीं थी; पूर्वी तट पर अंग्रेजी उपस्थिति मुख्य रूप से मसूलीपट्टनम (1611 में स्थापित) में थी।
❌ कथन 3 – गलत: त्रिचिनोपोली (तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु) में 17वीं शताब्दी की शुरुआत में अंग्रेजी फैक्ट्री नहीं थी; यह केवल 18वीं शताब्दी के मध्य में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच कर्नाटक युद्धों के दौरान रणनीतिक महत्व प्राप्त किया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रारंभिक अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की फैक्ट्रियां (17वीं शताब्दी)
| काल | फैक्ट्री/स्थान | स्थापना वर्ष | महत्व |
|---|---|---|---|
| पहली तिमाही (1600-1625) | सूरत | 1613 | भारत में पहली स्थायी अंग्रेजी फैक्ट्री; मुगल व्यापार का प्रवेश द्वार |
| मसूलीपट्टनम | 1611 | पूर्वी तट पर पहली अंग्रेजी फैक्ट्री; वस्त्र व्यापार केंद्र | |
| अहमदाबाद | 1618 | महत्वपूर्ण वस्त्र विनिर्माण केंद्र | |
| ब्रोच (भरूच) | 1616-1617 | पश्चिमी तट की फैक्ट्री; वस्त्र और नील का व्यापार | |
| दूसरी तिमाही (1625-1650) | आर्मागन | 1626 | दक्षिण-पूर्वी तट पर पहली फैक्ट्री (वर्तमान चेन्नई के पास) |
| बालासोर | 1633 | पूर्वी तट; बंगाल व्यापार तक पहुंच | |
| फोर्ट सेंट जॉर्ज (मद्रास) | 1639 | कोरोमंडल तट पर प्रमुख किलेबंद बस्ती | |
| बाद में (1650 के बाद) | हुगली/कलकत्ता | 1651/1690 | बंगाल तक पहुंच; फोर्ट विलियम 1696 में स्थापित |
आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — रवींद्रनाथ टैगोर ने यहां राष्ट्रगान का बंगाली से अंग्रेजी में अनुवाद किया।
आंध्र प्रदेश का मदनपल्ले भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखता है क्योंकि यहां रवींद्रनाथ टैगोर ने 'जन गण मन' का बंगाली से अंग्रेजी में अनुवाद किया था। फरवरी 1919 में मदनपल्ले के बेसेंट थियोसोफिकल कॉलेज में अपने प्रवास के दौरान, टैगोर ने "द मॉर्निंग सॉन्ग ऑफ इंडिया" शीर्षक से अनुवाद प्रस्तुत किया।
❌ विकल्प 1 – गलत: पिंगली वेंकय्या ने तिरंगे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की रूपरेखा तैयार की लेकिन इसे बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में INC सत्र में महात्मा गांधी को प्रस्तुत किया, मदनपल्ले में नहीं।
❌ विकल्प 2 – गलत: पट्टाभि सीतारमैया आंध्र प्रदेश में एक प्रमुख नेता थे और कांग्रेस अध्यक्ष रहे, लेकिन उन्होंने मदनपल्ले से भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया।
✅ विकल्प 3 – सही: रवींद्रनाथ टैगोर ने 1919 में मदनपल्ले में अपने प्रवास के दौरान जन गण मन का बंगाली से अंग्रेजी में "द मॉर्निंग सॉन्ग ऑफ इंडिया" के रूप में अनुवाद किया।
❌ विकल्प 4 – गलत: थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना न्यूयॉर्क (1875) में हुई थी और इसका अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय अड्यार, चेन्नई (1882) में स्थानांतरित किया गया, मदनपल्ले में नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: जन गण मन और राष्ट्रीय प्रतीक
- रचना: जन गण मन मूल रूप से 1911 में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा बंगाली में रचित किया गया था।
- पहला प्रदर्शन: इसे पहली बार 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता सत्र में गाया गया था।
- अंग्रेजी अनुवाद: टैगोर ने फरवरी 1919 में आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले में इसका अंग्रेजी में "द मॉर्निंग सॉन्ग ऑफ इंडिया" के रूप में अनुवाद किया।
- राष्ट्रगान के रूप में अंगीकरण: संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को जन गण मन को भारत के राष्ट्रगान के रूप में अपनाया।
- अवधि: पूर्ण संस्करण में पांच छंद हैं; संक्षिप्त संस्करण का आधिकारिक बजाने का समय लगभग 52 सेकंड है।
- नोबेल पुरस्कार: रवींद्रनाथ टैगोर को 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया, वे यह सम्मान पाने वाले पहले गैर-यूरोपीय बने।
निम्नलिखित में से कौन हिंदू फीमेल स्कूल के सचिव के रूप में जुड़े थे, जिसे बाद में बेथ्यून फीमेल स्कूल के नाम से जाना गया?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — ईश्वर चंद्र विद्यासागर
ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने हिंदू फीमेल स्कूल (1849 में स्थापित) के सचिव के रूप में कार्य किया, जिसे बाद में इसके संस्थापक जे.ई.डी. बेथ्यून के सम्मान में बेथ्यून फीमेल स्कूल का नाम दिया गया। विद्यासागर ने बंगाल में महिला शिक्षा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारत में महिला उच्च शिक्षा के लिए इस अग्रणी संस्थान के प्रशासन और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: समाज सुधारक और महिला शिक्षा
| सुधारक | महिला शिक्षा और समाज सुधार में प्रमुख योगदान |
|---|---|
| ईश्वर चंद्र विद्यासागर | • हिंदू फीमेल स्कूल (बाद में बेथ्यून फीमेल स्कूल, 1849) के सचिव • विधवा पुनर्विवाह की वकालत से हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 • बालिका शिक्षा को बढ़ावा दिया और महिलाओं के लिए विद्यालय खोले • कुलीन बहुविवाह और बाल विवाह का विरोध किया |
| एनी बेसेंट | • सेंट्रल हिंदू कॉलेज, बनारस (1898) की स्थापना, बीएचयू की नींव • सेंट्रल हिंदू स्कूल फॉर गर्ल्स, वाराणसी की स्थापना • आईएनसी की पहली महिला अध्यक्ष (1917, कलकत्ता अधिवेशन) • तिलक के साथ ऑल इंडिया होम रूल लीग की स्थापना (1916) |
| देबेंद्रनाथ टैगोर | • तत्त्वबोधिनी सभा (1839) की स्थापना • आदि ब्रह्म समाज का नेतृत्व • ब्रह्म आंदोलन के माध्यम से तर्कवाद और समाज सुधार को बढ़ावा |
| सरोजिनी नायडू | • आईएनसी की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष (1925, कानपुर अधिवेशन) • गांधी द्वारा चुनी गई नमक सत्याग्रह की नेता (1930) • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में गांधी के साथ • प्लेग महामारी सेवा के लिए कैसर-ए-हिंद पदक से सम्मानित |
UPSC Prelims 2021 Questions Paper - Subject-wise Question Distribution
पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
18 Qs (18%)भारतीय राजव्यवस्था
17 Qs (17%)भारतीय अर्थव्यवस्था
15 Qs (15%)विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
11 Qs (11%)विश्व भूगोल
7 Qs (7%)आधुनिक इतिहास
7 Qs (7%)समसामयिकी
6 Qs (6%)भारत का भूगोल
5 Qs (5%)भारतीय कला और संस्कृति
5 Qs (5%)मध्यकालीन इतिहास
4 Qs (4%)प्राचीन इतिहास
4 Qs (4%)अंतरराष्ट्रीय संबंध
1 Qs (1%)UPSC Prelims 2021 Question Paper - FAQs & Analysis
Q1 How many total questions were asked in UPSC Prelims 2021?
Q2 What is the subject-wise question breakdown for UPSC Prelims 2021?
- पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी: 18 questions (18%)
- भारतीय राजव्यवस्था: 17 questions (17%)
- भारतीय अर्थव्यवस्था: 15 questions (15%)
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: 11 questions (11%)
- विश्व भूगोल: 7 questions (7%)
- आधुनिक इतिहास: 7 questions (7%)
- समसामयिकी: 6 questions (6%)
- भारत का भूगोल: 5 questions (5%)
- भारतीय कला और संस्कृति: 5 questions (5%)
- मध्यकालीन इतिहास: 4 questions (4%)
- प्राचीन इतिहास: 4 questions (4%)
- अंतरराष्ट्रीय संबंध: 1 questions (1%)