UPSC Prelims 2021
भारतीय राजव्यवस्था Previous Year Questions (PYQs)
Explore 17 solved UPSC Prelims 2021 भारतीय राजव्यवस्था questions with detailed step-by-step bilingual solutions, option analysis, and answer keys.
भारत में संपत्ति के अधिकार की स्थिति क्या है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — किसी भी व्यक्ति को उपलब्ध कानूनी अधिकार
संपत्ति का अधिकार वर्तमान में अनुच्छेद 300-A के तहत किसी भी व्यक्ति (केवल नागरिकों के लिए नहीं) को उपलब्ध एक संवैधानिक (कानूनी) अधिकार है। यह 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 तक अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 के तहत एक मौलिक अधिकार था, जब तक इसे भाग III से हटाकर भाग XII के तहत अनुच्छेद 300-A के रूप में रखा गया, जो कहता है: "कानून के प्राधिकार के बिना किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा।"
📝 संक्षिप्त नोट्स: संपत्ति का अधिकार — संवैधानिक विकास
| अवधि | स्थिति | संवैधानिक प्रावधान | मुख्य विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| 1950-1978 | मौलिक अधिकार | अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 | • केवल नागरिकों के लिए उपलब्ध • संपत्ति अर्जित करने, धारण करने और निपटान करने का अधिकार • अधिग्रहण के लिए मुआवजा अनिवार्य |
| 1978 के बाद | कानूनी/संवैधानिक अधिकार | अनुच्छेद 300-A (भाग XII) | • किसी भी व्यक्ति (नागरिक और गैर-नागरिक) के लिए उपलब्ध • केवल कानून के प्राधिकार द्वारा वंचन • कोई अनिवार्य मुआवजा खंड नहीं |
- 44वां संशोधन अधिनियम, 1978: अनुच्छेद 19(1)(f) और 31 को हटाया; अनुच्छेद 300-A डाला
- अनुच्छेद 300-A: "कानून के प्राधिकार के बिना किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा"
- महत्व: संपत्ति का अधिकार अभी भी संरक्षित है लेकिन मौलिक अधिकार नहीं; अनुच्छेद 32 के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता
- मुआवजा: सरकार राशि तय करती है; राशि पर न्यायिक समीक्षा नहीं
- लागूता: विदेशियों और कानूनी संस्थाओं सहित सभी व्यक्तियों तक विस्तारित
'निजता का अधिकार' भारत के संविधान के किस अनुच्छेद के तहत संरक्षित है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — अनुच्छेद 21
निजता का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है। ऐतिहासिक निर्णय के.एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ (2017) में, सर्वोच्च न्यायालय की 9-न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से घोषणा की कि निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूल अधिकार का एक अभिन्न अंग है। यह अधिकार संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है, लेकिन न्यायिक व्याख्या के माध्यम से अनुच्छेद 21 में पढ़ा गया है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: निजता का अधिकार
- संवैधानिक आधार: निजता का अधिकार स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है, लेकिन अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत संरक्षित है।
- के.एस. पुट्टस्वामी मामला (2017): 9-न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से निजता को अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग और भाग III के तहत स्वतंत्रता का हिस्सा माना।
- घटक: इसमें सूचनात्मक गोपनीयता, शारीरिक गोपनीयता, निर्णयात्मक गोपनीयता, और संचार की गोपनीयता शामिल हैं।
- पूर्व निर्णय: खड़क सिंह मामले (1964) में निजता को मान्यता दी गई और एम.पी. शर्मा मामले (1954) में इसे मूल अधिकार के रूप में अस्वीकार किया गया; आर. राजगोपाल मामले (1994) में इसे आंशिक रूप से मान्यता दी गई।
- प्रभाव: इस निर्णय ने एम.पी. शर्मा और खड़क सिंह मामलों में 8-न्यायाधीशों की पीठ के निर्णयों को खारिज कर दिया और डेटा संरक्षण कानूनों के लिए संवैधानिक आधार बनाया।
भारतीय राजव्यवस्था में निम्नलिखित में से कौन सी एक अनिवार्य विशेषता है जो यह संकेत करती है कि यह संघीय चरित्र वाली है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा की जाती है।
एक स्वतंत्र न्यायपालिका संघवाद की एक परिभाषित विशेषता है क्योंकि यह शक्तियों के विभाजन और संविधान की व्याख्या के संबंध में संघ और राज्यों के बीच विवादों को हल करने के लिए एक निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में कार्य करती है। एक संघीय व्यवस्था में, न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि दोनों स्तर की सरकारें अपनी संवैधानिक सीमाओं के भीतर संचालित होती हैं, जिससे संघीय संतुलन बना रहता है।
आइए प्रत्येक विकल्प का मूल्यांकन करें:
✅ विकल्प 1 – सही: एक स्वतंत्र न्यायपालिका संघवाद के लिए आवश्यक है क्योंकि यह केंद्र-राज्य विवादों को हल करती है और शक्तियों के संवैधानिक वितरण की रक्षा करती है, संघीय संरचना के संरक्षक के रूप में कार्य करती है।
❌ विकल्प 2 – गलत: संघीय विधायिका में घटक इकाइयों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का होना संघीय और हस्तांतरित शक्तियों वाली एकात्मक प्रणालियों दोनों में सामान्य है; यह विशेष रूप से एक संघीय विशेषता नहीं है।
❌ विकल्प 3 – गलत: संघीय मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति एक राजनीतिक घटना है, न कि संवैधानिक विशेषता जो संघवाद को परिभाषित करती है।
❌ विकल्प 4 – गलत: जबकि न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय मौलिक अधिकार लोकतंत्र और विधि के शासन के लिए महत्वपूर्ण हैं, वे संघीय और एकात्मक दोनों राज्यों में मौजूद हैं और संघवाद के विशेष संकेतक नहीं हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संघवाद की आवश्यक विशेषताएं
- दोहरी राजव्यवस्था: केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण जिसमें प्रत्येक के अधिकार के अलग क्षेत्र होते हैं।
- लिखित संविधान: एक सर्वोच्च लिखित संविधान जो शक्तियों को सीमांकित करता है और आसानी से एकतरफा संशोधित नहीं किया जा सकता।
- स्वतंत्र न्यायपालिका: संविधान की व्याख्या करने और केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का निर्णय करने के लिए एक निष्पक्ष न्यायपालिका।
- कठोर संविधान: संघीय संरचना को मनमाने परिवर्तनों से बचाने के लिए विशेष प्रक्रियाओं की आवश्यकता वाली संशोधन प्रक्रिया।
- द्विसदनीयता: एक द्विसदनीय विधायिका जहां उच्च सदन घटक इकाइयों का प्रतिनिधित्व करता है (जैसे राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है)।
- संविधान की सर्वोच्चता: सरकार के दोनों स्तर संविधान से अधिकार प्राप्त करते हैं और संविधान द्वारा बाध्य हैं।
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भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यहाँ केवल एक नागरिकता और एक अधिवास है।
- केवल जन्म से नागरिक ही राज्य का प्रमुख बन सकता है।
- एक बार नागरिकता प्रदान किए जाने के बाद, किसी विदेशी को किसी भी परिस्थिति में इससे वंचित नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
भारत में नागरिकता और अधिवास की एकीकृत व्यवस्था है, उन संघीय व्यवस्थाओं के विपरीत जो राज्य-स्तरीय अधिवास को मान्यता देती हैं। हालाँकि, कोई भी भारतीय नागरिक (चाहे जन्म से हो या देशीयकरण द्वारा) राष्ट्रपति बन सकता है, और धोखाधड़ी या अवफादारी जैसी विशिष्ट परिस्थितियों में नागरिकता से वंचित किया जा सकता है।
✅ कथन 1 – सही: संविधान का अनुच्छेद 5 'भारत के क्षेत्र में अधिवास' का उल्लेख करता है, और सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदीप जैन बनाम भारत संघ (1984) में यह निर्णय दिया कि भारत में केवल एक अधिवास है—भारत का अधिवास—और अलग राज्य अधिवास को मान्यता नहीं दी गई है। इसी प्रकार, पूरे देश के लिए केवल एक नागरिकता है।
❌ कथन 2 – गलत: अनुच्छेद 58 किसी भी भारतीय नागरिक को राष्ट्रपति पद के लिए पात्र बनाता है, चाहे वह जन्म से नागरिक हो या देशीयकरण द्वारा। अमेरिका के विपरीत, जहाँ राष्ट्रपति पद के लिए स्वाभाविक रूप से जन्मे नागरिक की आवश्यकता होती है, भारत यह अंतर नहीं करता है।
❌ कथन 3 – गलत: नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 10 के तहत, सरकार किसी व्यक्ति को नागरिकता से वंचित कर सकती है यदि यह धोखाधड़ी, गलत प्रस्तुतिकरण, या तथ्यों को छिपाने से प्राप्त की गई थी, या यदि नागरिक ने भारत के संविधान के प्रति अवफादारी दिखाई है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में नागरिकता
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 5-11 संविधान के प्रारंभ में नागरिकता से संबंधित हैं। संविधान का भाग II। |
| एकल नागरिकता | भारत एकल नागरिकता (संघ नागरिकता) का पालन करता है, अमेरिका के विपरीत जिसमें दोहरी नागरिकता (संघीय और राज्य) है। |
| अधिवास | केवल एक अधिवास—भारत का अधिवास। अलग राज्य अधिवास को मान्यता नहीं (प्रदीप जैन बनाम भारत संघ, 1984)। |
| राष्ट्रपति के लिए पात्रता | अनुच्छेद 58: कोई भी भारतीय नागरिक (जन्म, वंश, पंजीकरण, या देशीयकरण द्वारा) राष्ट्रपति बन सकता है। स्वाभाविक रूप से जन्मे नागरिकों पर कोई प्रतिबंध नहीं। |
| नागरिकता का अधिग्रहण | जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीयकरण, और क्षेत्र के समावेश द्वारा (नागरिकता अधिनियम, 1955)। |
| नागरिकता का नुकसान | त्याग, समाप्ति, और वंचित करने द्वारा। धोखाधड़ी से प्राप्त या अवफादारी के कारण वंचित करना संभव (धारा 10, नागरिकता अधिनियम)। |
| नागरिकता संशोधन | नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 पाकिस्तान, अफगानिस्तान, और बांग्लादेश से सताए गए अल्पसंख्यकों (मुसलमानों को छोड़कर) को नागरिकता प्रदान करता है। |
26 जनवरी 1950 को भारत की सटीक संवैधानिक स्थिति क्या थी?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — एक सम्प्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य
भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, और मूल प्रस्तावना (1949 में अपनाई गई) में भारत को "सम्प्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य" के रूप में वर्णित किया गया था। "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्द बाद में 1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के माध्यम से आपातकाल की अवधि के दौरान जोड़े गए थे। इसलिए, 26 जनवरी 1950 को भारत की संवैधानिक स्थिति समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्दों के बिना ठीक "एक सम्प्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य" थी।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रस्तावना का विकास
| घटक | मूल प्रस्तावना (1950) | 42वें संशोधन के बाद (1976) |
|---|---|---|
| संवैधानिक स्थिति | सम्प्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य | सम्प्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य |
| अपनाने की तिथि | 26 नवंबर 1949 | 18 दिसंबर 1976 (संशोधन) |
| प्रभावी होने की तिथि | 26 जनवरी 1950 | 3 जनवरी 1977 |
| जोड़े गए मुख्य शब्द | — | समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता |
| संदर्भ | स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माण | इंदिरा गांधी के तहत आपातकाल की अवधि |
- प्रस्तावना भारत को राज्यों के संघ के रूप में घोषित करती है, पारंपरिक अर्थ में संघ नहीं।
- "सम्प्रभु" का अर्थ है कि भारत बाहरी नियंत्रण से मुक्त है और सर्वोच्च अधिकार रखता है।
- "लोकतांत्रिक" दर्शाता है कि सरकार अपना अधिकार जनता की इच्छा से प्राप्त करती है।
- "गणराज्य" इंगित करता है कि राज्य का प्रमुख निर्वाचित है, वंशानुगत नहीं।
- 42वें संशोधन ने "राष्ट्र की एकता" को "राष्ट्र की एकता और अखंडता" में भी बदल दिया।
भारतीय न्यायपालिका के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
भारत के उच्चतम न्यायालय के किसी भी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा भारत के राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने के लिए वापस बुलाया जा सकता है।
भारत में एक उच्च न्यायालय को अपने स्वयं के निर्णय की समीक्षा करने की शक्ति प्राप्त है जैसा कि उच्चतम न्यायालय के पास है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
यह प्रश्न भारतीय संविधान के अंतर्गत न्यायिक प्रावधानों की समझ का परीक्षण करता है। कथन 1 अनुच्छेद 128 के अनुसार सही है, जबकि कथन 2 गलत है क्योंकि उच्च न्यायालयों के पास अनुच्छेद 137 के समतुल्य कोई स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान नहीं है जो उच्चतम न्यायालय को समीक्षा शक्ति प्रदान करता है।
✅ कथन 1 – सही: अनुच्छेद 128 भारत के मुख्य न्यायाधीश को भारत के राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उच्चतम न्यायालय के किसी भी सेवानिवृत्त न्यायाधीश (या योग्य सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश) को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने का अनुरोध करने का अधिकार देता है।
❌ कथन 2 – गलत: यद्यपि उच्च न्यायालयों के पास अपने स्वयं के निर्णयों की समीक्षा करने की शक्ति है, लेकिन यह शक्ति उच्चतम न्यायालय के समतुल्य नहीं है। उच्चतम न्यायालय की समीक्षा शक्ति अनुच्छेद 137 के अंतर्गत स्पष्ट रूप से प्रदान की गई है, जबकि उच्च न्यायालय अपनी समीक्षा शक्ति अनुच्छेद 215 के अंतर्गत अभिलेख न्यायालय के रूप में अपनी अंतर्निहित शक्तियों से प्राप्त करते हैं, न कि किसी स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान से। दोनों के बीच समीक्षा शक्तियों के स्रोत और दायरे में अंतर है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: न्यायिक शक्तियाँ - समीक्षा और तदर्थ न्यायाधीश
| प्रावधान | अनुच्छेद | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| उच्चतम न्यायालय के तदर्थ न्यायाधीश | अनुच्छेद 128 | • CJI सेवानिवृत्त SC न्यायाधीशों या योग्य सेवानिवृत्त HC न्यायाधीशों को SC न्यायाधीश के रूप में बैठने का अनुरोध कर सकते हैं • राष्ट्रपति की पूर्व सहमति आवश्यक है • ऐसे न्यायाधीशों को कार्यरत SC न्यायाधीश की सभी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं |
| समीक्षा शक्ति - उच्चतम न्यायालय | अनुच्छेद 137 | • समीक्षा के लिए स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान • SC अपने द्वारा दिए गए किसी भी निर्णय या आदेश की समीक्षा कर सकता है • कानून के प्रावधानों और अनुच्छेद 145 के अंतर्गत बनाए गए नियमों के अधीन |
| समीक्षा शक्ति - उच्च न्यायालय | अनुच्छेद 215 | • अनुच्छेद 137 जैसा कोई स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान नहीं • अभिलेख न्यायालय के रूप में अंतर्निहित शक्तियों से प्राप्त • उच्चतम न्यायालय की तुलना में सीमित दायरा • CPC प्रावधानों और अंतर्निहित शक्तियों पर आधारित |
| अभिलेख न्यायालय | अनुच्छेद 129 और 215 | • SC और HC दोनों अभिलेख न्यायालय हैं • अवमानना के लिए दंडित कर सकते हैं • उनके अभिलेखों का साक्ष्य मूल्य है |
निम्नलिखित में से कौन सा 'राज्य' शब्द को सर्वोत्तम रूप से परिभाषित करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — व्यक्तियों का एक समुदाय जो स्थायी रूप से एक निश्चित क्षेत्र में निवास कर रहा है, बाहरी नियंत्रण से स्वतंत्र है और एक संगठित सरकार रखता है।
यह विकल्प राजनीति विज्ञान में मान्यता प्राप्त राज्य के चार आवश्यक तत्वों को समाहित करता है: (1) जनसंख्या (व्यक्तियों का समुदाय), (2) क्षेत्र (निश्चित भौगोलिक क्षेत्र), (3) सरकार (संगठित शासन प्रणाली), और (4) संप्रभुता (बाहरी नियंत्रण से स्वतंत्रता)। ये शास्त्रीय तत्व हैं जो राज्य को अन्य राजनीतिक इकाइयों से अलग करते हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
• विकल्प 2 कानून और व्यवस्था बनाए रखने और प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा जैसे कार्यों पर केंद्रित है, जो राज्य के उद्देश्य हैं लेकिन इसकी मूल परिभाषा का हिस्सा नहीं हैं।
• विकल्प 3 संस्कृति और परंपरा पर जोर देता है, जो राजनीतिक सिद्धांत में राज्य की आवश्यक परिभाषात्मक विशेषताएं नहीं हैं।
• विकल्प 4 विशिष्ट संस्थागत विशेषताओं (केंद्रीय प्राधिकरण के प्रति जवाबदेह कार्यपालिका, स्वतंत्र न्यायपालिका) का उल्लेख करता है जो विशेष प्रकार की सरकारों की विशेषताएं हैं, सभी राज्यों के सार्वभौमिक तत्व नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: राज्य के चार आवश्यक तत्व
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| 1. जनसंख्या | व्यक्तियों का समुदाय; कोई न्यूनतम या अधिकतम संख्या निर्दिष्ट नहीं; राज्य के अस्तित्व के लिए आवश्यक |
| 2. क्षेत्र | मान्यता प्राप्त सीमाओं के साथ निश्चित भौगोलिक क्षेत्र; भूमि, जल और वायु क्षेत्र शामिल |
| 3. सरकार | संगठित राजनीतिक प्राधिकरण जो कानून बनाता और लागू करता है; व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक |
| 4. संप्रभुता | क्षेत्र के भीतर सर्वोच्च अधिकार; बाहरी नियंत्रण से स्वतंत्रता (आंतरिक और बाहरी संप्रभुता) |
- आंतरिक संप्रभुता: अपने क्षेत्र के भीतर सभी व्यक्तियों और संघों पर राज्य का सर्वोच्च अधिकार
- बाहरी संप्रभुता: अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में अन्य राज्यों द्वारा नियंत्रण से स्वतंत्रता
- इन चार तत्वों को मोंटेवीडियो सम्मेलन (1933) में राज्यों के अधिकारों और कर्तव्यों पर औपचारिक रूप दिया गया
- राज्य को अन्य राज्यों से मान्यता मिल सकती है, लेकिन मान्यता राज्य का आवश्यक तत्व नहीं है
हमने ब्रिटिश मॉडल पर आधारित संसदीय लोकतंत्र को अपनाया, लेकिन हमारा मॉडल उस मॉडल से कैसे भिन्न है?
1. जहाँ तक विधान का संबंध है, ब्रिटिश संसद सर्वोच्च या संप्रभु है, लेकिन भारत में, संसद की विधायी शक्ति सीमित है।
2. भारत में, संसद के किसी अधिनियम के संशोधन की संवैधानिकता से संबंधित मामलों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधान पीठ को भेजा जाता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
भारत ने ब्रिटिश मॉडल से संसदीय प्रणाली को अपनाया लेकिन महत्वपूर्ण संशोधन किए। सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि जहाँ ब्रिटिश संसद पूर्ण संप्रभुता का आनंद लेती है, वहीं भारतीय संसद संवैधानिक सीमाओं के भीतर काम करती है, जो संविधान को संसद के बजाय सर्वोच्च बनाती है।
✅ कथन 1 – सही: ब्रिटिश संसद असीमित विधायी शक्तियों के साथ सर्वोच्च और संप्रभु है, जबकि भारत में, संसद का विधायी अधिकार संविधान द्वारा सीमित है। न्यायपालिका संसदीय कानूनों को रद्द कर सकती है यदि वे संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं, जो संसद पर संविधान की सर्वोच्चता स्थापित करता है।
✅ कथन 2 – सही: भारत में, संसदीय अधिनियमों या संवैधानिक संशोधनों की संवैधानिकता से संबंधित मामलों को सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ को भेजा जाता है। यह न्यायिक समीक्षा तंत्र, जो ब्रिटिश प्रणाली में अनुपस्थित है, यह सुनिश्चित करता है कि सभी विधान संवैधानिक सिद्धांतों और मूल ढांचे के अनुरूप हों।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संसदीय लोकतंत्र — ब्रिटिश बनाम भारतीय मॉडल
| विशेषता | ब्रिटिश मॉडल | भारतीय मॉडल |
|---|---|---|
| संप्रभुता | संसदीय संप्रभुता — संसद सर्वोच्च है | संवैधानिक संप्रभुता — संविधान सर्वोच्च है |
| विधायी शक्ति | असीमित; संसद कोई भी कानून बना/हटा सकती है | संविधान द्वारा सीमित; न्यायिक समीक्षा के अधीन |
| न्यायिक समीक्षा | संसदीय कानून की कोई न्यायिक समीक्षा नहीं | सर्वोच्च न्यायालय असंवैधानिक कानूनों की समीक्षा और रद्द कर सकता है |
| लिखित संविधान | अलिखित/असंहिताबद्ध संविधान | लिखित और सर्वोच्च संविधान |
| संवैधानिक संशोधन | सरल विधायी प्रक्रिया; कोई विशेष प्रक्रिया नहीं | अनुच्छेद 368 के तहत विशेष प्रक्रिया; मूल ढांचे के सिद्धांत के अधीन |
| संघीय संरचना | एकात्मक प्रणाली | शक्तियों के वितरण के साथ संघीय प्रणाली |
- मूल ढांचा सिद्धांत: केशवानंद भारती मामले (1973) में स्थापित, यह संविधान की मूल विशेषताओं की रक्षा करके संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति को सीमित करता है
- संविधान पीठ: कम से कम 5 सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से मिलकर बनती है; संवैधानिक व्याख्या के महत्वपूर्ण प्रश्नों से जुड़े मामलों की सुनवाई करती है
- अनुच्छेद 13: मौलिक अधिकारों के साथ असंगत कानूनों को शून्य घोषित करता है, न्यायिक समीक्षा स्थापित करता है
- विधि का शासन: दोनों मॉडल विधि के शासन का पालन करते हैं, लेकिन भारत में संवैधानिक सर्वोच्चता के कारण इसका अनुप्रयोग भिन्न है
एक ऐसा कानून जो कार्यपालिका या प्रशासनिक प्राधिकरण को कानून के अनुप्रयोग के मामले में अनियंत्रित और असीमित विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है, भारत के संविधान के निम्नलिखित में से किस अनुच्छेद का उल्लंघन करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — अनुच्छेद 14
एक ऐसा कानून जो कार्यपालिका को अनियंत्रित और असीमित विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है, संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है, जो विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। ऐसी मनमानी शक्ति निष्पक्षता और युक्तियुक्तता के सिद्धांत का उल्लंघन करती है, क्योंकि यह बिना किसी मार्गदर्शक सिद्धांतों के कानून के भेदभावपूर्ण अनुप्रयोग की अनुमति देती है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
• अनुच्छेद 28 शैक्षिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थिति की स्वतंत्रता से संबंधित है।
• अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों का अधिकार प्रदान करता है और नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है।
• अनुच्छेद 44 राज्य की नीति का एक निदेशक सिद्धांत है जो राज्य को नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुरक्षित करने का निर्देश देता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अनुच्छेद 14 और मनमानेपन का सिद्धांत
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| अनुच्छेद 14 | भारत के राज्यक्षेत्र में सभी व्यक्तियों को विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है |
| विधि के समक्ष समता | नकारात्मक अवधारणा - विशेष विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति; ब्रिटिश मूल (डायसी द्वारा विधि का शासन) |
| विधियों का समान संरक्षण | सकारात्मक अवधारणा - समान परिस्थितियों में समान व्यवहार; अमेरिकी मूल (14वां संशोधन) |
| मनमानेपन का सिद्धांत | मनमानी शक्ति अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है क्योंकि यह समता को नकारती है। अनियंत्रित विवेक = कानूनी निरंकुशता |
| युक्तियुक्त वर्गीकरण | अनुमत यदि बोधगम्य विभेदक पर आधारित हो जिसका अभीष्ट उद्देश्य से तर्कसंगत संबंध हो |
| प्रमुख मामले | ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1974) - मनमानापन समता का विलोम है; मेनका गांधी मामला (1978) |
निम्नलिखित में से कौन सा कारक उदार लोकतंत्र में स्वतंत्रता की सर्वोत्तम सुरक्षा का निर्माण करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — शक्तियों का पृथक्करण
शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सरकारी अधिकार को विभाजित करता है, उदार लोकतंत्र में स्वतंत्रता की सर्वोत्तम सुरक्षा का निर्माण करता है। यह पृथक्करण किसी एक शाखा में शक्ति के केंद्रीकरण को रोकता है और सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक अंग दूसरों पर नियंत्रण और संतुलन के रूप में कार्य करता है, जिससे व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रताओं को मनमानी राज्य कार्रवाई से बचाया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: शक्तियों का पृथक्करण
- मूल सिद्धांत: सरकारी शक्तियों का तीन स्वतंत्र अंगों में विभाजन—विधायिका (कानून बनाती है), कार्यपालिका (कानून लागू करती है), और न्यायपालिका (कानून की व्याख्या करती है)।
- उत्पत्ति: फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू द्वारा उनकी कृति 'द स्पिरिट ऑफ लॉज' (1748) में राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए आवश्यक के रूप में प्रतिपादित।
- भारतीय संदर्भ: भारत कठोर पृथक्करण के बजाय नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली का पालन करता है। कार्यात्मक पृथक्करण मौजूद है, लेकिन काफी ओवरलैप है (जैसे, मंत्रिपरिषद विधायिका और कार्यपालिका दोनों का हिस्सा है)।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 50 (कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण), 53 (राष्ट्रपति में निहित कार्यकारी शक्ति), 74 (राष्ट्रपति की सहायता के लिए मंत्रिपरिषद), और 121/211 (विधायिका में न्यायिक आचरण पर चर्चा पर प्रतिबंध)।
- नियंत्रण और संतुलन: विधायिका अविश्वास प्रस्ताव और वित्तीय नियंत्रण के माध्यम से कार्यपालिका को नियंत्रित करती है; न्यायपालिका न्यायिक समीक्षा के माध्यम से कार्यकारी कार्यों और विधायी अधिनियमों की समीक्षा करती है; कार्यपालिका न्यायाधीशों की नियुक्ति करती है और न्यायालय के निर्णयों को लागू करती है।
- सर्वोत्तम सुरक्षा क्यों: यह सुनिश्चित करके अत्याचार को रोकता है कि कोई एक अंग सर्वशक्तिशाली न बने; अधिकार वितरित करके व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है; पारस्परिक निगरानी के माध्यम से जवाबदेही सक्षम करता है।
भारतीय संविधान के अंतर्गत, धन का संकेन्द्रण किसका उल्लंघन करता है:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — राज्य की नीति के निदेशक तत्व
धन का संकेन्द्रण राज्य की नीति के निदेशक तत्वों का उल्लंघन करता है, विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 39(ख) और 39(ग) का। अनुच्छेद 39(ख) राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देता है कि समुदाय के भौतिक संसाधनों के स्वामित्व और नियंत्रण का वितरण इस प्रकार हो कि वह सामान्य हित को सर्वोत्तम रूप से पूरा करे, जबकि अनुच्छेद 39(ग) यह अनिवार्य करता है कि आर्थिक व्यवस्था का संचालन इस प्रकार न हो कि धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेन्द्रण हो। ये प्रावधान आर्थिक असमानता को रोकने और वितरणात्मक न्याय सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक आधार बनाते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: राज्य की नीति के निदेशक तत्व (DPSP) - आर्थिक न्याय
- अनुच्छेद 39(ख): राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देता है कि भौतिक संसाधनों के स्वामित्व और नियंत्रण का वितरण सामान्य हित को पूरा करे और कुछ हाथों में संकेन्द्रण को रोके।
- अनुच्छेद 39(ग): सुनिश्चित करता है कि आर्थिक व्यवस्था से धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के अहित में संकेन्द्रण न हो।
- अनुच्छेद 38: राज्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय से ओतप्रोत सामाजिक व्यवस्था को सुरक्षित करके लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने और असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा।
- अनुच्छेद 39क: समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करता है ताकि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण न्याय के अवसर न छिनें।
- प्रकृति: DPSP न्यायोचित नहीं हैं (न्यायालयों द्वारा लागू नहीं किये जा सकते) लेकिन अनुच्छेद 37 के अनुसार शासन में मौलिक हैं।
- उद्देश्य: आर्थिक लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना।
भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- जब कोई कैदी पर्याप्त मामला बनाता है, तो पैरोल को ऐसे कैदी को अस्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि यह उसके अधिकार का विषय बन जाता है।
- राज्य सरकारों के पास पैरोल पर कैदियों की रिहाई के अपने स्वयं के नियम हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न भारत में पैरोल प्रावधानों की समझ का परीक्षण करता है। जबकि कैदी पैरोल के लिए आवेदन कर सकते हैं, यह एक स्वचालित अधिकार नहीं है बल्कि अधिकारियों द्वारा दी जाने वाली विवेकाधीन राहत है। राज्य सरकारें केंद्रीय जेल कानून के ढांचे के भीतर अपने स्वयं के पैरोल नियम बनाती हैं।
❌ कथन 1 – गलत: पैरोल अधिकार का विषय नहीं है बल्कि जेल अधिकारियों द्वारा दिया जाने वाला एक विवेकाधीन विशेषाधिकार है। भले ही कोई कैदी पर्याप्त मामला बनाए, अधिकारियों के पास सुरक्षा चिंताओं, अपराध की प्रकृति और कैदी के आचरण सहित विभिन्न कारकों के आधार पर पैरोल अस्वीकार करने का विवेक रहता है।
✅ कथन 2 – सही: राज्य सरकारों ने जेल अधिनियम, 1894 और कैदी अधिनियम, 1900 के व्यापक ढांचे के भीतर पैरोल पर कैदियों की रिहाई के अपने स्वयं के नियम बनाए हैं, क्योंकि जेल और कानून-व्यवस्था सातवीं अनुसूची के तहत राज्य विषय हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में पैरोल और फरलो
- पैरोल: विशिष्ट आधारों (पारिवारिक आपात स्थिति, चिकित्सा मुद्दों आदि) पर दी जाने वाली अस्थायी रिहाई, जो एक विवेकाधीन विशेषाधिकार है, अधिकार नहीं।
- फरलो: दीर्घकालिक कैदियों को पारिवारिक संबंध बनाए रखने और संस्थागतकरण को रोकने के लिए अधिकार के रूप में दी जाने वाली आवधिक रिहाई।
- कानूनी ढांचा: केंद्रीय स्तर पर जेल अधिनियम, 1894 और कैदी अधिनियम, 1900 द्वारा शासित; राज्य विस्तृत नियम बनाते हैं।
- जेल राज्य विषय के रूप में: सातवीं अनुसूची की सूची II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 4 के तहत, राज्यों को अपने स्वयं के पैरोल नियम बनाने की अनुमति देता है।
- न्यायिक स्थिति: सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि पैरोल विवेकाधीन है और आधार स्थापित होने पर भी इसे अस्वीकार किया जा सकता है (हरियाणा राज्य बनाम मोहिंदर सिंह, 2000)।
भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- न्यायिक हिरासत का अर्थ है कि आरोपी संबंधित मजिस्ट्रेट की हिरासत में है और ऐसे आरोपी को जेल में नहीं, बल्कि पुलिस स्टेशन में बंद रखा जाता है।
- न्यायिक हिरासत के दौरान, मामले के प्रभारी पुलिस अधिकारी को न्यायालय की स्वीकृति के बिना संदिग्ध से पूछताछ करने की अनुमति नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न भारतीय दंड प्रक्रिया के तहत न्यायिक हिरासत और पुलिस हिरासत के बीच अंतर की समझ का परीक्षण करता है। कथन 1 न्यायिक हिरासत का गलत वर्णन करता है, जबकि कथन 2 न्यायिक हिरासत के दौरान पूछताछ प्रतिबंधों की सही व्याख्या करता है।
❌ कथन 1 – गलत: न्यायिक हिरासत का अर्थ है कि आरोपी संबंधित मजिस्ट्रेट की हिरासत में है और उसे पुलिस स्टेशन में नहीं, बल्कि जेल में बंद रखा जाता है। पुलिस हिरासत में आरोपी को पुलिस स्टेशन लॉकअप में रखा जाता है।
✅ कथन 2 – सही: न्यायिक हिरासत के दौरान, प्रभारी पुलिस अधिकारी न्यायालय की स्वीकृति के बिना संदिग्ध से पूछताछ नहीं कर सकता। न्यायालय आवश्यक समझे जाने पर पूछताछ की अनुमति दे सकता है, लेकिन ऐसी अनुमति अनिवार्य है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पुलिस हिरासत बनाम न्यायिक हिरासत
| पहलू | पुलिस हिरासत | न्यायिक हिरासत |
|---|---|---|
| हिरासत प्राधिकरण | आरोपी पुलिस की भौतिक हिरासत में | आरोपी संबंधित मजिस्ट्रेट की हिरासत में |
| स्थान | पुलिस स्टेशन लॉकअप | जेल |
| पूछताछ अधिकार | पुलिस स्वतंत्र रूप से पूछताछ कर सकती है | पुलिस न्यायालय की अनुमति के बिना पूछताछ नहीं कर सकती |
| अधिकतम अवधि | जांच के दौरान 15 दिन (कुल) | मुकदमा पूर्ण होने या जमानत तक विस्तारित हो सकता है |
| कानूनी प्रावधान | धारा 167, सीआरपीसी | धारा 167, सीआरपीसी |
संवैधानिक सरकार का अर्थ है
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — संविधान की शर्तों द्वारा सीमित एक सरकार
संवैधानिक सरकार मूलतः सीमित सरकार के सिद्धांत से विशेषता रखती है, जहाँ राजनीतिक शक्ति का प्रयोग संविधान के प्रावधानों द्वारा नियंत्रित और विनियमित होता है। संविधान नियमों और सिद्धांतों का एक ढाँचा स्थापित करता है जो सभी राजनीतिक अभिकर्ताओं पर बाध्यकारी होते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि सरकारी अधिकार मनमाने ढंग से या बिना संयम के प्रयोग नहीं किया जाता। यह सीमा संवैधानिक सरकार को निरंकुश या असीमित शासन के रूपों से अलग करती है, जो विकल्प 4 को सही उत्तर बनाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संवैधानिक सरकार
- मूल सिद्धांत: संवैधानिक सरकार परिभाषा के अनुसार सीमित सरकार है, जहाँ शक्ति संवैधानिक प्रावधानों और कानून के शासन द्वारा सीमित होती है।
- शक्तियों का पृथक्करण: विभिन्न अंगों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) के बीच शक्ति को विभाजित करके अनियंत्रित शक्ति के प्रयोग को सीमित करता है, जिससे नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था बनती है।
- बाध्यकारी नियम: सरकार ऐसे नियमों और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करती है जो सभी राजनीतिक अभिकर्ताओं पर बाध्यकारी हैं, मनमाने अधिकार के प्रयोग को रोकते हुए।
- अधिकारों की सुरक्षा: सरकारी अतिरेक के विरुद्ध नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक ढाँचा प्रदान करता है।
- जिम्मेदार और प्रतिनिधि: सुनिश्चित करता है कि सरकार लोगों के प्रति जवाबदेह बनी रहे और संघर्षों का प्रबंधन करते हुए नागरिक भागीदारी को बढ़ावा दे।
- विशिष्टता: यह आवश्यक रूप से संघीय संरचना, प्रमुख की नाममात्र/वास्तविक शक्तियों, या केवल प्रतिनिधि चरित्र के बारे में नहीं है—परिभाषित विशेषता सरकारी शक्ति पर संवैधानिक सीमा है।
राष्ट्रीय स्तर पर, अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए कौन सा मंत्रालय नोडल एजेंसी है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — जनजातीय कार्य मंत्रालय
जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नामित नोडल एजेंसी है। जबकि यह अधिनियम वन भूमि और वन अधिकारों से संबंधित है, यह मूल रूप से एक अधिकार-आधारित सामाजिक कल्याण कानून है जिसका उद्देश्य वन-निवासी अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को सुधारना है। कार्यान्वयन, नीति निर्माण और दिशानिर्देश जारी करने की जिम्मेदारी MoTA के पास है ताकि जनजातीय हितों की रक्षा और व्यक्तिगत तथा सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता सुनिश्चित की जा सके, न कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पास, जो मुख्य रूप से वन संरक्षण पर केंद्रित है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वन अधिकार अधिनियम, 2006
- आधिकारिक नाम: अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006
- नोडल मंत्रालय: जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA)
- उद्देश्य: अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को वन अधिकारों और वन भूमि में निवास की मान्यता जो पीढ़ियों से वनों में रह रहे हैं
- मान्यता प्राप्त अधिकार: व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR), सामुदायिक वन अधिकार (CFR), सामुदायिक वन संसाधन अधिकार, और लघु वनोपज पर अधिकार
- कार्यान्वयन तंत्र: त्रि-स्तरीय प्रणाली – ग्राम सभा (गांव स्तर), उप-खंड स्तरीय समिति (SDLC), और जिला स्तरीय समिति (DLC)
- ग्राम सभा की भूमिका: वन अधिकारों के निर्धारण की प्रक्रिया शुरू करने और दावों को स्वीकृत करने के लिए प्राथमिक प्राधिकरण
- ऐतिहासिक संदर्भ: वन-निवासी समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करने और उनकी आजीविका तथा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अधिनियमित
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत में, उम्मीदवारों को एक लोकसभा चुनाव में तीन निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने से रोकने वाला कोई कानून नहीं है।
- 1991 के लोकसभा चुनाव में, श्री देवी लाल ने तीन लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ा था।
- मौजूदा नियमों के अनुसार, यदि कोई उम्मीदवार एक लोकसभा चुनाव में कई निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ता है, तो सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जीतने की स्थिति में उसके/उसकी पार्टी को उसके/उसकी द्वारा खाली किए गए निर्वाचन क्षेत्रों के उपचुनावों की लागत वहन करनी चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न लोकसभा चुनावों में उम्मीदवार कितने निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ सकता है, इसके नियमों के बारे में ज्ञान की जांच करता है। सही उत्तर केवल कथन 2 है, क्योंकि श्री देवी लाल ने वास्तव में 1991 में तीन निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ा था, जो 1996 के संशोधन से पहले अनुमत था जिसने उम्मीदवारों को अधिकतम दो निर्वाचन क्षेत्रों तक सीमित कर दिया।
❌ कथन 1 – गलत: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 33(7) को 1996 में संशोधित किया गया था ताकि उम्मीदवारों को एक आम चुनाव या एक साथ आयोजित उपचुनावों में दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों (तीन नहीं) से चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जा सके।
✅ कथन 2 – सही: 1991 के लोकसभा चुनावों में, श्री देवी लाल ने तीन निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ा: रोहतक (हरियाणा), सीकर (राजस्थान), और फिरोजपुर (पंजाब)। यह उस समय अनुमत था क्योंकि दो-निर्वाचन क्षेत्र की सीमा केवल 1996 में पेश की गई थी।
❌ कथन 3 – गलत: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम या चुनाव नियमों में कोई प्रावधान नहीं है जो उम्मीदवार या उसकी पार्टी को उपचुनावों की लागत वहन करने के लिए बाध्य करता हो। उपचुनाव आयोजित करने का खर्च संबंधित राज्य सरकारों और चुनाव आयोग के माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: एकाधिक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ना
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| कानूनी प्रावधान | जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 33(7) |
| 1996 से पहले | उम्मीदवार कितने निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ सकता है, इस पर कोई सीमा नहीं थी |
| 1996 संशोधन के बाद | एक उम्मीदवार अधिकतम दो निर्वाचन क्षेत्रों से ही चुनाव लड़ सकता है |
| उपचुनावों की लागत | चुनाव आयोग के माध्यम से राज्य/केंद्र सरकार द्वारा वहन की जाती है, उम्मीदवार या पार्टी द्वारा नहीं |
| ऐतिहासिक उदाहरण | श्री देवी लाल ने 1991 में तीन निर्वाचन क्षेत्रों (रोहतक, सीकर, फिरोजपुर) से चुनाव लड़ा |
| प्रतिबंध का तर्क | उपचुनावों के वित्तीय बोझ को कम करना और चुनावी प्रणाली के दुरुपयोग को रोकना |
केंद्र सरकार के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- N. गोपालस्वामी अय्यंगार समिति ने सुझाव दिया कि प्रशासनिक सुधार के विषय को आगे बढ़ाने और इसे बढ़ावा देने के लिए एक मंत्री और एक सचिव को विशेष रूप से नामित किया जाए।
- 1970 में, प्रशासनिक सुधार आयोग, 1966 की सिफारिश पर कार्मिक विभाग का गठन किया गया था, और इसे प्रधानमंत्री के प्रभार में रखा गया था।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न प्रशासनिक सुधार सिफारिशों और कार्मिक विभाग की स्थापना के बारे में ज्ञान की परीक्षा करता है। कथन 1 गलत तरीके से एक सिफारिश को N. गोपालस्वामी अय्यंगार समिति के साथ जोड़ता है जो वास्तव में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा की गई थी, जबकि कथन 2 सही ढंग से 1970 में प्रधानमंत्री के प्रभार में कार्मिक विभाग की स्थापना का वर्णन करता है।
❌ कथन 1 – गलत: प्रशासनिक सुधार के लिए विशेष रूप से एक मंत्री और सचिव को नामित करने की सिफारिश प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) द्वारा की गई थी, न कि N. गोपालस्वामी अय्यंगार समिति (1949) द्वारा, जो केंद्र सरकार की मशीनरी के पुनर्गठन और O&M प्रभाग की स्थापना पर केंद्रित थी।
✅ कथन 2 – सही: कार्मिक विभाग की स्थापना वास्तव में 1970 में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) की सिफारिशों के आधार पर की गई थी और इसे मंत्रिमंडल सचिवालय के अधीन रखा गया था, जो प्रधानमंत्री के सीधे प्रभार में कार्य करता है; इसे बाद में 1985 में कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय में पुनर्गठित किया गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रशासनिक सुधार और कार्मिक विभाग
| समिति/आयोग | वर्ष | मुख्य सिफारिशें/फोकस |
|---|---|---|
| N. गोपालस्वामी अय्यंगार समिति | 1949 | केंद्र सरकार की मशीनरी का पुनर्गठन; मंत्रालयों का समूहीकरण; संगठन और विधियां (O&M) प्रभाग की स्थापना |
| प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) | 1966 | प्रशासनिक सुधारों के लिए मंत्री और सचिव का पदनाम; कार्मिक विभाग की स्थापना (1970 में कार्यान्वित) |
| कार्मिक विभाग | 1970 | मंत्रिमंडल सचिवालय के अधीन स्थापित; प्रधानमंत्री के प्रभार में |
| कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय | 1985 | कार्मिक विभाग से पुनर्गठित; प्रधानमंत्री के प्रभार में जारी |
UPSC Prelims 2021 - भारतीय राजव्यवस्था Chapter-wise Distribution
मौलिक अधिकार
3 Qs (17.6%)संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
3 Qs (17.6%)संवैधानिक एवं राजनीतिक समसामयिकी
2 Qs (11.8%)संघ एवं उसका राज्य क्षेत्र
1 Qs (5.9%)उच्चतम न्यायालय
1 Qs (5.9%)संविधान की प्रस्तावना
1 Qs (5.9%)नागरिकता
1 Qs (5.9%)संघीय कार्यपालिका
1 Qs (5.9%)केंद्र-राज्य संबंध
1 Qs (5.9%)निर्वाचन एवं चुनाव प्रणाली
1 Qs (5.9%)विशेष संवैधानिक प्रावधान
1 Qs (5.9%)राज्य के नीति निदेशक तत्व
1 Qs (5.9%)UPSC Prelims 2021 - भारतीय राजव्यवस्था Questions FAQs
Q1 How many भारतीय राजव्यवस्था questions were asked in UPSC Prelims 2021?
Q2 What is the chapter-wise question distribution for भारतीय राजव्यवस्था in UPSC Prelims 2021?
- मौलिक अधिकार: 3 questions (17.6%)
- संविधान की प्रमुख विशेषताएँ: 3 questions (17.6%)
- संवैधानिक एवं राजनीतिक समसामयिकी: 2 questions (11.8%)
- संघ एवं उसका राज्य क्षेत्र: 1 questions (5.9%)
- उच्चतम न्यायालय: 1 questions (5.9%)
- संविधान की प्रस्तावना: 1 questions (5.9%)
- नागरिकता: 1 questions (5.9%)
- संघीय कार्यपालिका: 1 questions (5.9%)
- केंद्र-राज्य संबंध: 1 questions (5.9%)
- निर्वाचन एवं चुनाव प्रणाली: 1 questions (5.9%)
- विशेष संवैधानिक प्रावधान: 1 questions (5.9%)
- राज्य के नीति निदेशक तत्व: 1 questions (5.9%)