UPSC Prelims 2021 Question Paper
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भारत सरकार के बॉण्ड प्रतिफल (Bond Yields) निम्नलिखित में से किससे प्रभावित होते हैं?
- संयुक्त राज्य अमेरिका के फेडरल रिजर्व की कार्रवाइयाँ।
- भारतीय रिजर्व बैंक की कार्रवाइयाँ।
- मुद्रास्फीति और अल्पकालिक ब्याज दरें।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
भारतीय सरकारी बॉण्ड प्रतिफल कई घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कारकों से प्रभावित होते हैं। तीनों कथन भारत में बॉण्ड प्रतिफल के प्रमुख निर्धारकों की सही पहचान करते हैं।
✅ कथन 1 – सही: अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति के निर्णय, विशेष रूप से ब्याज दर में परिवर्तन, वैश्विक पूंजी प्रवाह को प्रभावित करते हैं और भारतीय बॉण्डों की तुलना में अमेरिकी परिसंपत्तियों को अधिक या कम आकर्षक बना सकते हैं, जिससे प्रतिफल प्रभावित होता है।
✅ कथन 2 – सही: भारतीय रिजर्व बैंक रेपो दर समायोजन, खुले बाजार परिचालन (OMOs), और तरलता प्रबंधन उपायों जैसे मौद्रिक नीति उपकरणों के माध्यम से बॉण्ड प्रतिफल को सीधे प्रभावित करता है।
✅ कथन 3 – सही: मुद्रास्फीति की अपेक्षाएँ और अल्पकालिक ब्याज दरें बॉण्ड प्रतिफल के मौलिक निर्धारक हैं, क्योंकि निवेशक मुद्रास्फीति जोखिम की भरपाई के लिए और प्रचलित अल्पकालिक दरों के आधार पर उच्च प्रतिफल की मांग करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सरकारी बॉण्ड प्रतिफल को प्रभावित करने वाले कारक
- मौद्रिक नीति: केंद्रीय बैंक की कार्रवाइयाँ (RBI की रेपो दर, CRR, SLR, OMOs) सीधे तरलता और ब्याज दर वातावरण को प्रभावित करती हैं, जो बॉण्ड मांग और प्रतिफल को प्रभावित करती हैं।
- मुद्रास्फीति: उच्च मुद्रास्फीति अपेक्षाएँ उच्च प्रतिफल की ओर ले जाती हैं क्योंकि निवेशक वास्तविक रिटर्न की क्षति के लिए मुआवजे की मांग करते हैं।
- वैश्विक कारक: अमेरिकी फेड नीति, वैश्विक जोखिम भावना, और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) प्रवाह भारत सहित उभरते बाजार बॉण्ड प्रतिफल को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं।
- राजकोषीय घाटा: सरकार द्वारा उच्च उधारी बॉण्ड आपूर्ति बढ़ाती है, संभावित रूप से प्रतिफल को ऊपर धकेलती है।
- आर्थिक वृद्धि: मजबूत वृद्धि की संभावनाएँ कड़ी मौद्रिक नीति की अपेक्षाओं की ओर ले जा सकती हैं, जो प्रतिफल को प्रभावित करती हैं।
- मुद्रा गति: रुपये के अवमूल्यन की चिंताएँ FPI बहिर्प्रवाह की ओर ले जा सकती हैं, जिससे प्रतिफल बढ़ता है।
निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
1. विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बांड
2. कुछ शर्तों के साथ विदेशी संस्थागत निवेश
3. वैश्विक निक्षेपागार रसीदें
4. अनिवासी बाह्य जमा
उपर्युक्त में से किन्हें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में शामिल किया जा सकता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — 1, 2 और 3
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से तात्पर्य भारत के बाहर निवासी व्यक्ति द्वारा किसी गैर-सूचीबद्ध भारतीय कंपनी में, या किसी सूचीबद्ध भारतीय कंपनी की निर्गमोत्तर चुकता इक्विटी पूंजी के 10% या अधिक में पूंजी उपकरणों के माध्यम से किया गया निवेश है। FCCBs और GDRs को FDI के रूप में माना जाता है क्योंकि वे इक्विटी शेयरों में परिवर्तित होते हैं। अरविंद मायाराम समिति की सिफारिशों के अनुसार 10% सीमा से अधिक विदेशी संस्थागत निवेश को भी FDI के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
✅ कथन 1 – सही: विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बांड (FCCBs) ऋण उपकरण हैं जो इक्विटी शेयरों में परिवर्तनीय हैं और भारत की FDI नीति रूपरेखा के तहत FDI के रूप में माने जाते हैं।
✅ कथन 2 – सही: कुछ शर्तों के साथ विदेशी संस्थागत निवेश (FII), विशेष रूप से जब यह इक्विटी पूंजी के 10% से अधिक हो, तो अरविंद मायाराम समिति की सिफारिश के अनुसार इसे FDI के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
✅ कथन 3 – सही: वैश्विक निक्षेपागार रसीदें (GDRs) विदेशी बाजारों में भारतीय कंपनियों के इक्विटी शेयरों का प्रतिनिधित्व करती हैं और FDI उपकरणों के रूप में वर्गीकृत हैं।
❌ कथन 4 – गलत: अनिवासी बाह्य (NRE) जमा भारतीय बैंकों में NRIs द्वारा रखी गई बैंकिंग पूंजी हैं और इन्हें बाह्य ऋण के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, न कि उत्पादक उद्यमों में FDI के रूप में।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) वर्गीकरण
| उपकरण/श्रेणी | वर्गीकरण | मुख्य विशेषताएं |
|---|---|---|
| विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बांड (FCCBs) | FDI | इक्विटी शेयरों में परिवर्तनीय ऋण उपकरण; विदेशी बाजारों से पूंजी जुटाना |
| वैश्विक निक्षेपागार रसीदें (GDRs) | FDI | विदेशी बाजारों में कारोबार की जाने वाली भारतीय कंपनियों के इक्विटी शेयरों का प्रतिनिधित्व |
| अमेरिकी निक्षेपागार रसीदें (ADRs) | FDI | GDRs के समान लेकिन विशेष रूप से अमेरिकी बाजारों में कारोबार |
| FII/FPI (10% से कम) | पोर्टफोलियो निवेश | नियंत्रक हित के बिना प्रतिभूतियों में अल्पकालिक निवेश |
| FII/FPI (10% से अधिक) | FDI | अरविंद मायाराम समिति के अनुसार; नियंत्रक हित को दर्शाता है |
| NRE जमा | बैंकिंग पूंजी/बाह्य ऋण | NRIs के बैंक खाते; उत्पादक उद्यमों में निवेश नहीं |
- FDI परिभाषा: गैर-निवासी संस्थाओं द्वारा गैर-सूचीबद्ध कंपनी में या सूचीबद्ध कंपनी में 10%+ इक्विटी में निवेश
- 10% सीमा: FDI को पोर्टफोलियो निवेश से अलग करने वाला महत्वपूर्ण मानदंड
- इक्विटी संबंध: इक्विटी शेयरों में परिवर्तनीय या उनका प्रतिनिधित्व करने वाले उपकरण FDI के रूप में योग्य हैं
- बैंकिंग पूंजी बनाम FDI: NRE/NRO जमा बैंकिंग लेनदेन हैं, उत्पादक निवेश नहीं
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के गवर्नर की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।
- भारत के संविधान के कुछ प्रावधान केंद्र सरकार को जनहित में RBI को निर्देश जारी करने का अधिकार देते हैं।
- RBI के गवर्नर अपनी शक्तियां RBI अधिनियम से प्राप्त करते हैं।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न भारतीय रिज़र्व बैंक को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक और वैधानिक ढांचे की समझ का परीक्षण करता है। जबकि RBI गवर्नर की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है और वह RBI अधिनियम से शक्तियां प्राप्त करता है, निर्देश जारी करने की शक्ति वैधानिक प्रावधानों से आती है, संविधान से नहीं।
✅ कथन 1 – सही: RBI के गवर्नर की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा RBI अधिनियम, 1934 की धारा 8 के तहत मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति के माध्यम से की जाती है।
❌ कथन 2 – गलत: भारत के संविधान में केंद्र सरकार को RBI को निर्देश जारी करने का अधिकार देने वाला कोई प्रावधान नहीं है; यह शक्ति RBI अधिनियम, 1934 की धारा 7 से आती है, जो एक वैधानिक प्रावधान है, संवैधानिक नहीं।
✅ कथन 3 – सही: RBI के गवर्नर सभी शक्तियां, कार्य और जिम्मेदारियां भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 से प्राप्त करते हैं, जो मौद्रिक नीति, बैंकिंग विनियमन और समग्र केंद्रीय बैंकिंग कार्यों में गवर्नर की भूमिका को परिभाषित करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारतीय रिज़र्व बैंक – संवैधानिक और वैधानिक ढांचा
- स्थापना: RBI की स्थापना 1 अप्रैल, 1935 को RBI अधिनियम, 1934 के तहत हुई थी। इसका राष्ट्रीयकरण 1949 में किया गया।
- संवैधानिक स्थिति: संविधान में RBI का स्पष्ट उल्लेख नहीं है; यह अपना अधिकार RBI अधिनियम, 1934 से प्राप्त करता है।
- गवर्नर की नियुक्ति: केंद्र सरकार (मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति) द्वारा 4 वर्ष के कार्यकाल के लिए नियुक्त, जो विस्तार योग्य और शीघ्र समाप्ति के अधीन है।
- केंद्रीय बोर्ड: RBI का संचालन अधिनियम की धारा 8 के तहत सरकार द्वारा नियुक्त निदेशक मंडल द्वारा किया जाता है।
- RBI अधिनियम की धारा 7: केंद्र सरकार को गवर्नर से परामर्श के बाद जनहित में RBI को निर्देश जारी करने का अधिकार देती है। यह एक वैधानिक शक्ति है, संवैधानिक प्रावधान नहीं।
- प्रमुख कार्य: मौद्रिक नीति निर्माण, मुद्रा जारी करना, सरकार का बैंकर, बैंकिंग विनियमन और पर्यवेक्षण, विदेशी मुद्रा प्रबंधन, और वित्तीय स्थिरता।
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निम्नलिखित में से कौन सा कदम आर्थिक मंदी के समय उठाए जाने की सर्वाधिक संभावना है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — सार्वजनिक परियोजनाओं पर व्यय में वृद्धि।
आर्थिक मंदी के दौरान, सरकारें मांग को प्रोत्साहित करने और आर्थिक गतिविधि को पुनर्जीवित करने के लिए विस्तारवादी राजकोषीय नीति अपनाती हैं। सार्वजनिक परियोजनाओं पर व्यय बढ़ाना एक क्लासिक कीनेसियन उपाय है जो सीधे अर्थव्यवस्था में धन का निवेश करता है, रोजगार के अवसर पैदा करता है, वस्तुओं और सेवाओं की मांग उत्पन्न करता है, और समग्र आर्थिक विकास पर गुणक प्रभाव डालता है।
अन्य विकल्प कम उपयुक्त क्यों हैं:
❌ विकल्प 1 – ब्याज दर में वृद्धि के साथ कर दरों में कटौती: जबकि कर कटौती प्रयोज्य आय बढ़ाती है, ब्याज दरों को एक साथ बढ़ाना निवेश और उपभोग को हतोत्साहित करता है, जिससे विरोधाभासी प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
❌ विकल्प 3 – ब्याज दर में कमी के साथ कर दरों में वृद्धि: उच्च कर प्रयोज्य आय को कम करते हैं और उपभोक्ता मांग को कम करते हैं, जो कम ब्याज दरों के बावजूद मंदी के दौरान प्रतिकूल है।
❌ विकल्प 4 – सार्वजनिक परियोजनाओं पर व्यय में कमी: यह संकुचनात्मक राजकोषीय नीति का प्रतिनिधित्व करता है, जो समग्र मांग और रोजगार को कम करके मंदी को और गहरा करेगा।
📝 संक्षिप्त नोट्स: आर्थिक मंदी के दौरान राजकोषीय नीति
- विस्तारवादी राजकोषीय नीति: मंदी के दौरान समग्र मांग को बढ़ावा देने के लिए सरकारी खर्च में वृद्धि और/या कर कटौती शामिल है।
- कीनेसियन अर्थशास्त्र: चक्रीय मंदी का मुकाबला करने के लिए सार्वजनिक व्यय के माध्यम से सक्रिय सरकारी हस्तक्षेप की वकालत करता है।
- गुणक प्रभाव: परियोजनाओं पर सरकारी खर्च रोजगार पैदा करता है → श्रमिक आय खर्च करते हैं → व्यवसाय अधिक कमाते हैं → अधिक श्रमिकों को नियुक्त करते हैं, जिससे सकारात्मक प्रभावों की श्रृंखला बनती है।
- स्वचालित स्थिरीकरण: प्रगतिशील कराधान और बेरोजगारी लाभ नीतिगत परिवर्तनों के बिना स्वचालित रूप से अर्थव्यवस्था को स्थिर करते हैं।
- विवेकाधीन उपाय: बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, प्रोत्साहन पैकेज और सार्वजनिक कार्य कार्यक्रमों जैसे जानबूझकर नीतिगत कार्य।
- राजकोषीय घाटा: मंदी के दौरान, सरकारें अल्पकालिक में राजकोषीय समेकन पर विकास को प्राथमिकता देने के लिए उच्च घाटे को स्वीकार करती हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
अन्य बातें अपरिवर्तित रहने पर, किसी वस्तु की बाजार मांग बढ़ सकती है यदि
- इसके प्रतिस्थापन की कीमत बढ़ जाए
- इसके पूरक की कीमत बढ़ जाए
- वस्तु एक निकृष्ट वस्तु है और उपभोक्ताओं की आय बढ़ जाती है
- इसकी कीमत गिर जाती है
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 4
किसी वस्तु की बाजार मांग तब बढ़ती है जब उपभोक्ता समान कीमत पर अधिक खरीदने को तैयार होते हैं। यह तब होता है जब प्रतिस्थापन महंगे हो जाते हैं (कथन 1) या जब वस्तु की कीमत स्वयं गिर जाती है (कथन 4), मांग के नियम के अनुसार।
✅ कथन 1 – सही: जब प्रतिस्थापन की कीमत बढ़ती है, तो वस्तु अपेक्षाकृत सस्ती हो जाती है, जिससे उपभोक्ता इसकी ओर मांग स्थानांतरित करते हैं, जिससे बाजार मांग बढ़ती है।
❌ कथन 2 – गलत: पूरक वस्तुओं का एक साथ उपभोग किया जाता है (जैसे कार और ईंधन)। पूरक की कीमत में वृद्धि से उपभोग की कुल लागत बढ़ती है, जिससे वस्तु की मांग घटती है (बढ़ती नहीं)।
❌ कथन 3 – गलत: निकृष्ट वस्तुओं में आय-मांग का व्युत्क्रम संबंध होता है। जब उपभोक्ता की आय बढ़ती है, तो वे श्रेष्ठ/सामान्य वस्तुओं की ओर स्थानांतरित होते हैं, जिससे निकृष्ट वस्तुओं की मांग घटती है।
✅ कथन 4 – सही: मांग के नियम के अनुसार, अन्य बातें समान रहने पर (ceteris paribus), कीमत में गिरावट से मांगी गई मात्रा में वृद्धि होती है, जिससे बाजार मांग बढ़ती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मांग निर्धारक और संबंधित वस्तुएं
- मांग का नियम: कीमत और मांगी गई मात्रा व्युत्क्रमानुपाती होते हैं, अन्य कारक स्थिर रहने पर।
- प्रतिस्थापन वस्तुएं: वस्तुएं जो एक-दूसरे की जगह ले सकती हैं (चाय-कॉफी)। प्रतिस्थापन की कीमत ↑ → वस्तु की मांग ↑
- पूरक वस्तुएं: वस्तुएं जिनका एक साथ उपभोग किया जाता है (कार-पेट्रोल, पेन-स्याही)। पूरक की कीमत ↑ → वस्तु की मांग ↓
- सामान्य वस्तुएं: आय ↑ → मांग ↑ (धनात्मक संबंध)
- निकृष्ट वस्तुएं: आय ↑ → मांग ↓ (व्युत्क्रम संबंध; उदाहरण: मोटे अनाज, निम्न-गुणवत्ता वाले उत्पाद)
- मांग बनाम मांगी गई मात्रा: कीमत में परिवर्तन 'मांगी गई मात्रा' को प्रभावित करता है (वक्र के साथ गति); अन्य कारकों (आय, प्रतिस्थापन कीमतें) में परिवर्तन 'मांग' को प्रभावित करता है (वक्र का स्थानांतरण)
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
किसी मुद्रा के अवमूल्यन का प्रभाव यह है कि यह आवश्यक रूप से:-
1. विदेशी बाजारों में घरेलू निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करता है।
2. घरेलू मुद्रा के विदेशी मूल्य में वृद्धि करता है।
3. व्यापार संतुलन में सुधार करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
मुद्रा अवमूल्यन घरेलू वस्तुओं को विदेशी खरीदारों के लिए सस्ता बनाता है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार होता है। हालांकि, यह घरेलू मुद्रा के विदेशी मूल्य को बढ़ाता नहीं बल्कि घटाता है और आवश्यक रूप से व्यापार संतुलन में सुधार नहीं करता क्योंकि परिणाम आयात निर्भरता और वैश्विक मांग लोच जैसे विभिन्न अन्य कारकों पर निर्भर करते हैं।
✅ कथन 1 – सही: अवमूल्यन विदेशी मुद्रा में निर्यात की कीमत को कम करता है, जिससे घरेलू वस्तुएं विदेशी बाजारों में अधिक प्रतिस्पर्धी बनती हैं और संभावित रूप से निर्यात मांग बढ़ती है।
❌ कथन 2 – गलत: अवमूल्यन घरेलू मुद्रा के विदेशी मूल्य को घटाता है, बढ़ाता नहीं—यह अवमूल्यन का मूल तंत्र है जहां घरेलू मुद्रा विदेशी मुद्राओं की तुलना में सस्ती हो जाती है।
❌ कथन 3 – गलत: यद्यपि अवमूल्यन निर्यात को बढ़ावा देकर व्यापार संतुलन में सुधार कर सकता है, यह सुनिश्चित नहीं है क्योंकि यह आयात लागत (विशेष रूप से आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए) भी बढ़ा सकता है, मुद्रास्फीति का कारण बन सकता है, और अंतिम प्रभाव निर्यात और आयात की मांग की कीमत लोच पर निर्भर करता है (मार्शल-लर्नर शर्त)।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मुद्रा अवमूल्यन
- परिभाषा: निश्चित/अर्ध-निश्चित विनिमय दर व्यवस्था के तहत सरकार या मौद्रिक प्राधिकरण द्वारा विदेशी मुद्राओं के सापेक्ष मुद्रा के मूल्य का जानबूझकर नीचे की ओर समायोजन।
- तत्काल प्रभाव: निर्यात विदेशी बाजारों में सस्ता हो जाता है; आयात घरेलू शर्तों में अधिक महंगा हो जाता है; विदेशी मुद्रा भंडार घरेलू मुद्रा में अधिक मूल्यवान हो जाता है।
- निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता: घरेलू उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में मूल्य लाभ मिलता है, यदि मांग मूल्य-लोचदार है तो संभावित रूप से निर्यात मात्रा बढ़ती है।
- मार्शल-लर्नर शर्त: व्यापार संतुलन में सुधार केवल तभी होता है जब निर्यात और आयात की मांग की मूल्य लोच का योग 1 से अधिक हो; अन्यथा, व्यापार घाटा बिगड़ सकता है।
- J-वक्र प्रभाव: प्रारंभ में व्यापार संतुलन बिगड़ सकता है (मौजूदा अनुबंधों और समय अंतराल के कारण), फिर मध्यम से दीर्घावधि में सुधार होता है क्योंकि निर्यात मात्रा मूल्य परिवर्तनों के प्रति प्रतिक्रिया करती है।
- जोखिम: आयातित मुद्रास्फीति (विशेष रूप से कच्चे माल और ऊर्जा के लिए), व्यापारिक भागीदारों द्वारा संभावित प्रतिस्पर्धी अवमूल्यन, विदेशी वस्तुओं और सेवाओं के लिए क्रय शक्ति में कमी।
'ताड़ के तेल' (palm oil) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- ताड़ के तेल का पेड़ दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल निवासी है।
- ताड़ का तेल लिपस्टिक और इत्र बनाने वाले कुछ उद्योगों के लिए एक कच्चा माल है।
- ताड़ के तेल का उपयोग जैव-डीजल के उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 3
यह प्रश्न ताड़ के तेल की उत्पत्ति, औद्योगिक अनुप्रयोगों और जैव ईंधन के रूप में उपयोग के बारे में ज्ञान का परीक्षण करता है। कथन 1 गलत है क्योंकि तेल ताड़ का पेड़ पश्चिम अफ्रीका का मूल निवासी है, दक्षिण-पूर्व एशिया का नहीं, हालांकि अब प्रमुख उत्पादन इंडोनेशिया और मलेशिया में होता है। कथन 2 और 3 सौंदर्य प्रसाधनों और जैव-डीजल उत्पादन में ताड़ के तेल के उपयोग के संबंध में सही हैं।
❌ कथन 1 – गलत: तेल ताड़ का पेड़ (Elaeis guineensis) पश्चिम अफ्रीका का मूल निवासी है, दक्षिण-पूर्व एशिया का नहीं। हालाँकि, इसे 19वीं शताब्दी में दक्षिण-पूर्व एशिया में लाया गया था, और आज इंडोनेशिया और मलेशिया वैश्विक ताड़ के तेल उत्पादन का लगभग 85% हिस्सा रखते हैं।
✅ कथन 2 – सही: ताड़ का तेल और इसके व्युत्पन्न पदार्थों का व्यापक रूप से सौंदर्य प्रसाधन उद्योगों में लिपस्टिक, इत्र, साबुन और लोशन के निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है, क्योंकि इनमें नमी प्रदान करने वाले गुण और बनावट बढ़ाने की क्षमता होती है।
✅ कथन 3 – सही: ताड़ का तेल जैव-डीजल उत्पादन के लिए एक प्रमुख कच्चा माल है। इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देश पाम मिथाइल एस्टर (PME) का उपयोग नवीकरणीय ईंधन विकल्प के रूप में करते हैं, और इसे पारंपरिक डीजल के साथ मिश्रित किया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: ताड़ का तेल
- वानस्पतिक उत्पत्ति: तेल ताड़ (Elaeis guineensis) पश्चिम और मध्य अफ्रीका का मूल निवासी है, विशेष रूप से अंगोला, बेनिन, कैमरून और नाइजीरिया के तटीय क्षेत्र।
- प्रमुख उत्पादक: इंडोनेशिया (वैश्विक उत्पादन का 58%) और मलेशिया (27%) विश्व के सबसे बड़े उत्पादक हैं, जो कुल वैश्विक उत्पादन का लगभग 85% योगदान करते हैं।
- औद्योगिक उपयोग: खाद्य उद्योग (खाना पकाने का तेल, मार्जरीन), सौंदर्य प्रसाधन (साबुन, लिपस्टिक, क्रीम), फार्मास्यूटिकल्स, और जैव ईंधन (जैव-डीजल)।
- जैव-डीजल उत्पादन: ताड़ के तेल में उच्च तेल उपज (4-5 टन/हेक्टेयर) होती है, जो इसे जैव-डीजल के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाता है। इसे ट्रांसएस्टरीफिकेशन के माध्यम से पाम मिथाइल एस्टर (PME) में परिवर्तित किया जाता है।
- भारत का संदर्भ: भारत ताड़ के तेल का विश्व का सबसे बड़ा आयातक है (लगभग 8-9 मिलियन टन वार्षिक), मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से, जो इसकी खाद्य तेल आवश्यकताओं का लगभग 40% पूरा करता है।
- पर्यावरणीय चिंताएँ: बड़े पैमाने पर ताड़ के तेल के बागानों ने दक्षिण-पूर्व एशिया में वनों की कटाई, आवास हानि (विशेष रूप से ऑरंगुटान के लिए), और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को जन्म दिया है।
मोरेना के निकट स्थित चौसठ योगिनी मंदिर के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह कच्छपघात वंश के शासनकाल के दौरान निर्मित एक वृत्ताकार मंदिर है।
- यह भारत में निर्मित एकमात्र वृत्ताकार मंदिर है।
- इसका उद्देश्य इस क्षेत्र में वैष्णव पंथ को बढ़ावा देना था।
- इसके डिज़ाइन ने एक लोकप्रिय धारणा को जन्म दिया है कि यह भारतीय संसद भवन के पीछे प्रेरणा था।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 4
मोरेना के निकट चौसठ योगिनी मंदिर 11वीं शताब्दी ईस्वी में कच्छपघात वंश के दौरान निर्मित एक वृत्ताकार मंदिर है। इसके अनूठे वृत्ताकार डिज़ाइन ने लोकप्रिय धारणा को प्रेरित किया है कि इसने भारतीय संसद भवन की वास्तुकला को प्रभावित किया, हालांकि इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
✅ कथन 1 – सही: मंदिर वास्तव में वृत्ताकार है और 11वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास कच्छपघात वंश के शासनकाल के दौरान निर्मित किया गया था।
❌ कथन 2 – गलत: यह भारत में एकमात्र वृत्ताकार मंदिर नहीं है; अन्य उदाहरणों में खजुराहो, जबलपुर और भेड़ाघाट में समान चौसठ योगिनी मंदिर शामिल हैं।
❌ कथन 3 – गलत: मंदिर 64 योगिनियों (तांत्रिक देवियों) की पूजा के लिए समर्पित था और इसका उद्देश्य शक्ति/तांत्रिक पंथ को बढ़ावा देना था, न कि वैष्णव पंथ को।
✅ कथन 4 – सही: एक लोकप्रिय धारणा है कि इस मंदिर के वृत्ताकार, खुले आकाश वाले डिज़ाइन ने भारतीय संसद भवन के वास्तुकारों को प्रेरित किया, हालांकि ऐतिहासिक रूप से पुष्टि नहीं की गई है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: चौसठ योगिनी मंदिर
- अर्थ: चौसठ का अर्थ है 64; ये मंदिर 64 योगिनियों (देवी दुर्गा/शक्ति की महिला परिचारिकाओं) को समर्पित थे।
- काल: अधिकतर 9वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच भारत में तांत्रिक प्रथाओं के उदय के दौरान निर्मित।
- वास्तुकला: आमतौर पर वृत्ताकार या आयताकार, हाइपेथ्रल (आकाश के लिए खुला), एक केंद्रीय आंगन के चारों ओर व्यवस्थित छोटे मंदिरों के साथ।
- प्रमुख मंदिर: मोरेना (मध्य प्रदेश), हीरापुर (ओडिशा), खजुराहो (मप्र), भेड़ाघाट (मप्र), जबलपुर (मप्र), और रानीपुर-झारियाल (ओडिशा)।
- धार्मिक महत्व: शक्ति और तांत्रिक पूजा से जुड़ा हुआ, वैष्णव या शैव परंपराओं से नहीं।
- मोरेना मंदिर विशिष्टताएं: कच्छपघात शासकों द्वारा निर्मित; 64 कक्षों के साथ वृत्ताकार; माना जाता है कि इसने भारतीय संसद के वृत्ताकार डिज़ाइन को प्रेरित किया।
भारत के संदर्भ में, शब्द 'हल्बी, हो और कुई' किससे संबंधित हैं
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — जनजातीय भाषाएँ
हल्बी, हो और कुई भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्वदेशी समुदायों द्वारा बोली जाने वाली जनजातीय भाषाएँ हैं। हल्बी एक इंडो-आर्यन भाषा है जो छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्यों में हल्बा जनजाति द्वारा बोली जाती है, हो एक ऑस्ट्रोएशियाटिक भाषा है जो झारखंड और ओडिशा में हो लोगों द्वारा बोली जाती है, और कुई एक द्रविड़ भाषा है जो मुख्य रूप से ओडिशा में कोंध जनजाति द्वारा बोली जाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत की प्रमुख जनजातीय भाषाएँ
| भाषा | भाषा परिवार | प्राथमिक बोलने वाले | मुख्य क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| हल्बी | इंडो-आर्यन | हल्बा जनजाति | छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र |
| हो | ऑस्ट्रोएशियाटिक (मुंडा) | हो लोग | झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल |
| कुई | द्रविड़ | कंध/खोंड जनजाति | ओडिशा, आंध्र प्रदेश |
| गोंडी | द्रविड़ | गोंड जनजाति | मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना |
| संताली | ऑस्ट्रोएशियाटिक (मुंडा) | संताल लोग | झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार (आठवीं अनुसूची में शामिल) |
| बोडो | तिब्बती-बर्मन | बोडो लोग | असम (आठवीं अनुसूची में शामिल) |
प्राचीन भारत के इतिहास के संदर्भ में, भवभूति, हस्तिमल्ल और क्षेमेश्वर प्रसिद्ध थे
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — नाटककार
भवभूति, हस्तिमल्ल और क्षेमेश्वर प्राचीन और प्रारंभिक मध्यकालीन भारत के प्रसिद्ध नाटककार थे जिन्होंने संस्कृत नाटक में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भवभूति (8वीं शताब्दी) ने कन्नौज के राजा यशोवर्मन के दरबार में सेवा की और मालतीमाधव और उत्तररामचरित जैसे प्रसिद्ध नाटक लिखे। हस्तिमल्ल (13वीं शताब्दी) होयसल काल के एक जैन नाटककार थे जो विक्रांतकौरव जैसी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं, जबकि क्षेमेश्वर (10वीं शताब्दी) ने पाल वंश के राजा महिपाल की सेवा की और चंदकौशिक जैसे नाटकों की रचना की।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्राचीन भारत के प्रसिद्ध संस्कृत नाटककार
| नाटककार | काल | दरबार/संरक्षण | प्रमुख रचनाएँ |
|---|---|---|---|
| भवभूति | 8वीं शताब्दी ईस्वी | कन्नौज के राजा यशोवर्मन | मालतीमाधव, महावीरचरित, उत्तररामचरित |
| हस्तिमल्ल | 13वीं शताब्दी ईस्वी | होयसल काल (जैन नाटककार) | विक्रांतकौरव, मैथिलीकल्याण, अंजनपवनांजय |
| क्षेमेश्वर | 10वीं शताब्दी ईस्वी | राजा महिपाल (पाल वंश) | चंदकौशिक, नैषधानंद |
| कालिदास | 4थी-5वीं शताब्दी ईस्वी | गुप्त काल | अभिज्ञानशाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम्, मालविकाग्निमित्रम् |
| शूद्रक | 3री-4थी शताब्दी ईस्वी | गुप्त काल | मृच्छकटिक (द लिटिल क्ले कार्ट) |
वर्ष 2000 में स्थापित लॉरियस वर्ल्ड स्पोर्ट्स अवार्ड के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- अमेरिकी गोल्फर टाइगर वुड्स इस पुरस्कार के पहले विजेता थे।
- यह पुरस्कार अब तक अधिकतर 'फॉर्मूला वन' खिलाड़ियों द्वारा प्राप्त किया गया।
- रोजर फेडरर ने अन्य की तुलना में अधिकतम बार यह पुरस्कार प्राप्त किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
वर्ष 2000 में स्थापित लॉरियस वर्ल्ड स्पोर्ट्स अवार्ड्स ने विभिन्न खेलों में असाधारण एथलीटों को सम्मानित किया है। कथन 2 गलत है क्योंकि फॉर्मूला वन ड्राइवरों के बजाय टेनिस खिलाड़ियों ने पुरस्कारों पर हावी रहे हैं।
✅ कथन 1 – सही: टाइगर वुड्स ने मोंटे कार्लो में 2000 में उद्घाटन लॉरियस वर्ल्ड स्पोर्ट्समैन ऑफ द ईयर पुरस्कार जीता, जो इस प्रतिष्ठित सम्मान के पहले प्राप्तकर्ता बने।
❌ कथन 2 – गलत: टेनिस खिलाड़ियों ने स्पोर्ट्समैन ऑफ द ईयर पुरस्कार 11 बार जीता है (रोजर फेडरर-5, राफेल नडाल-2, नोवाक जोकोविच-4), जबकि फॉर्मूला वन ड्राइवरों ने केवल 4 बार जीता (माइकल शूमाकर-2, सेबेस्टियन वेट्टल-1, लुईस हैमिल्टन-1), जो टेनिस को प्रमुख खेल बनाता है, फॉर्मूला वन को नहीं।
✅ कथन 3 – सही: रोजर फेडरर पांच लॉरियस वर्ल्ड स्पोर्ट्समैन ऑफ द ईयर पुरस्कारों (2005, 2006, 2007, 2008, 2018) के साथ रिकॉर्ड रखते हैं, जो उन्हें इस श्रेणी में सबसे सम्मानित व्यक्ति बनाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लॉरियस वर्ल्ड स्पोर्ट्स अवार्ड्स
- स्थापना: विश्वभर में खेल उत्कृष्टता को सम्मानित करने के लिए डेमलर और रिचेमोंट द्वारा 2000 में स्थापित
- पहला समारोह: 2000 में मोंटे कार्लो, मोनाको में आयोजित
- मुख्य श्रेणियां: स्पोर्ट्समैन ऑफ द ईयर, स्पोर्ट्सवुमन ऑफ द ईयर, टीम ऑफ द ईयर, ब्रेकथ्रू ऑफ द ईयर, कमबैक ऑफ द ईयर, स्पोर्टिंग मोमेंट ऑफ द ईयर
- रिकॉर्ड धारक: रोजर फेडरर (5 स्पोर्ट्समैन पुरस्कार), सेरेना विलियम्स (5 स्पोर्ट्सवुमन पुरस्कार)
- मतदान: 70 से अधिक महान एथलीटों वाली लॉरियस वर्ल्ड स्पोर्ट्स अकादमी द्वारा विजेता चुने जाते हैं
- भारतीय विजेता: सचिन तेंदुलकर (2011 में भारतीय क्रिकेट टीम की विश्व कप जीत के लिए), विश्वनाथन आनंद (कई बार नामांकित)
प्राचीन भारत के इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- मिताक्षरा उच्च जातियों के लिए नागरिक कानून था और दायभाग निम्न जातियों के लिए नागरिक कानून था।
- मिताक्षरा प्रणाली में, पुत्र पिता के जीवनकाल के दौरान संपत्ति पर अधिकार का दावा कर सकते हैं, जबकि दायभाग प्रणाली में, केवल पिता की मृत्यु के बाद ही पुत्र संपत्ति पर अधिकार का दावा कर सकते हैं।
- मिताक्षरा प्रणाली केवल परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा धारित संपत्ति से संबंधित मामलों से संबंधित है, जबकि दायभाग प्रणाली परिवार के पुरुष और महिला दोनों सदस्यों द्वारा धारित संपत्ति से संबंधित मामलों से संबंधित है।
नीचे दिए गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनें।
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न प्राचीन और मध्यकालीन भारत में हिंदू कानून के दो प्रमुख स्कूलों: मिताक्षरा और दायभाग के ज्ञान का परीक्षण करता है। केवल कथन 2 उत्तराधिकार अधिकारों के संबंध में इन प्रणालियों के बीच सही ढंग से अंतर करता है।
❌ कथन 1 – गलत: मिताक्षरा और दायभाग दोनों स्कूल उच्च जातियों पर लागू होते थे और जाति के आधार पर विभाजित नहीं थे। मिताक्षरा अधिकांश भारत में प्रचलित था, जबकि दायभाग मुख्य रूप से बंगाल और असम में प्रचलित था।
✅ कथन 2 – सही: मिताक्षरा में, पुत्र जन्म से सहदायिक अधिकार प्राप्त करते हैं और पिता के जीवनकाल में संपत्ति का दावा कर सकते हैं। दायभाग में, पुत्र केवल पिता की मृत्यु के बाद संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त करते हैं।
❌ कथन 3 – गलत: दोनों प्रणालियाँ पुरुष और महिला दोनों सदस्यों की संपत्ति (स्त्रीधन - महिलाओं की संपत्ति) से संबंधित थीं। हालांकि, मिताक्षरा ने महिलाओं के अधिकारों पर अधिक प्रतिबंध लगाए और उन्हें सहदायिकता से बाहर रखा, जबकि दायभाग अधिक उदार था, विधवाओं को उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता देता था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मिताक्षरा बनाम दायभाग हिंदू कानून के स्कूल
| पहलू | मिताक्षरा स्कूल | दायभाग स्कूल |
|---|---|---|
| भौगोलिक क्षेत्र | अधिकांश भारत (बंगाल और असम को छोड़कर) | बंगाल और असम |
| पुत्रों द्वारा उत्तराधिकार | पुत्र जन्म से सहदायिक अधिकार प्राप्त करते हैं; पिता के जीवनकाल में संपत्ति का दावा कर सकते हैं | पुत्र केवल पिता की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार प्राप्त करते हैं |
| उत्तराधिकार का आधार | परिवार में जन्म पर आधारित (सहदायिकता) | मृत्यु के बाद उत्तराधिकार पर आधारित |
| महिलाओं के अधिकार | स्त्रीधन को मान्यता दी लेकिन प्रतिबंध लगाए; महिलाओं को सहदायिकता से बाहर रखा गया | अधिक उदार; विधवाओं को संपत्ति पर अधिक नियंत्रण के साथ उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता दी गई |
| प्राधिकरण | याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर की टीका | जीमूतवाहन की टीका |
निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — अजंता की गुफाएं वाघोरा नदी की घाटी में स्थित हैं।
अजंता की गुफाएं, यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल, जिसमें 29 रॉक-कट बौद्ध गुफा स्मारक शामिल हैं, महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में वाघोरा नदी की घोड़े की नाल के आकार की घाटी में स्थित हैं। आइए प्रत्येक कथन का मूल्यांकन करें:
✅ कथन 1 – सही: अजंता की गुफाएं वास्तव में महाराष्ट्र में वाघोरा नदी की घाटी में स्थित हैं।
❌ कथन 2 – गलत: साँची स्तूप मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में बेतवा नदी के निकट एक पहाड़ी पर स्थित है, चम्बल नदी के निकट नहीं।
❌ कथन 3 – गलत: पांडु-लेना गुफाएं (नासिक गुफाएं) महाराष्ट्र के नासिक के निकट त्रिरश्मि पहाड़ियों में उकेरी गई हैं, नर्मदा नदी की घाटी में नहीं।
❌ कथन 4 – गलत: अमरावती स्तूप आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है, गोदावरी नदी पर नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख बौद्ध स्मारक और उनके स्थान
| स्मारक | स्थान | नदी/भौगोलिक विशेषता | राज्य |
|---|---|---|---|
| अजंता की गुफाएं | औरंगाबाद जिला | वाघोरा नदी की घाटी | महाराष्ट्र |
| साँची स्तूप | रायसेन जिला | बेतवा नदी के निकट | मध्य प्रदेश |
| पांडु-लेना गुफाएं | नासिक | त्रिरश्मि पहाड़ियां | महाराष्ट्र |
| अमरावती स्तूप | गुंटूर जिला | कृष्णा नदी | आंध्र प्रदेश |
| एलोरा की गुफाएं | औरंगाबाद जिला | अजंता के निकट | महाराष्ट्र |
भारत रत्न और पद्म पुरस्कारों के संबंध में निम्नलखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत रत्न और पद्म पुरस्कार भारत के संविधान के अनुच्छेद 18(1) के अंतर्गत उपाधियाँ हैं।
- पद्म पुरस्कार, जो वर्ष 1954 में स्थापित किए गए थे, केवल एक बार निलंबित किए गए थे।
- किसी विशेष वर्ष में भारत रत्न पुरस्कारों की संख्या अधिकतम पाँच तक सीमित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही नहीं हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
प्रश्न उन कथनों की पहचान करने के लिए कहता है जो सही नहीं हैं। भारत रत्न और पद्म पुरस्कारों के संबंध में तीनों कथनों में अशुद्धियाँ हैं। कथन 1 इन पुरस्कारों को अनुच्छेद 18(1) के अंतर्गत उपाधियों के रूप में गलत तरीके से वर्गीकृत करता है, कथन 2 एकल निलंबन का गलत उल्लेख करता है, और कथन 3 पाँच पुरस्कारों की अधिकतम सीमा को गलत तरीके से बताता है।
❌ कथन 1 – गलत: भारत रत्न और पद्म पुरस्कार संविधान के अनुच्छेद 18(1) के अंतर्गत उपाधियाँ नहीं हैं; ये नागरिक सम्मान हैं जो कोई कानूनी विशेषाधिकार या स्थिति प्रदान नहीं करते हैं, जैसा कि न्यायिक व्याख्या द्वारा स्पष्ट किया गया है।
❌ कथन 2 – गलत: पद्म पुरस्कार एक बार नहीं बल्कि चार बार निलंबित किए गए थे—1978, 1979, 1993 और 1997 में—विभिन्न विवादों और सरकारी निर्णयों के कारण।
❌ कथन 3 – गलत: सामान्य दिशानिर्देश भारत रत्न को प्रति वर्ष अधिकतम तीन प्राप्तकर्ताओं तक सीमित करता है, पाँच नहीं; यह सीमा 1999 में (चार पुरस्कार) और 2024 में (पाँच पुरस्कार) पार की गई।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत रत्न और पद्म पुरस्कार
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक स्थिति | अनुच्छेद 18(1) के अंतर्गत उपाधियाँ नहीं; ये नागरिक सम्मान हैं जो प्राप्तकर्ताओं को उपसर्ग के रूप में उपयोग करने से नहीं रोकते लेकिन कोई कानूनी विशेषाधिकार प्रदान नहीं करते |
| भारत रत्न | सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार; 1954 में स्थापित; सामान्यतः प्रति वर्ष 3 तक सीमित (1999 में 4 और 2024 में 5 पुरस्कारों के साथ पार किया गया) |
| पद्म पुरस्कार श्रेणियाँ | पद्म विभूषण (असाधारण सेवा), पद्म भूषण (विशिष्ट सेवा), पद्म श्री (किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट सेवा) |
| स्थापना वर्ष | 1954 (भारत रत्न और पद्म पुरस्कार दोनों) |
| निलंबन | पद्म पुरस्कार 1978, 1979, 1993 और 1997 में निलंबित किए गए |
| शामिल क्षेत्र | कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा, खेल, चिकित्सा, समाज सेवा, नागरिक सेवा, व्यापार और उद्योग |
| मौद्रिक अनुदान | भारत रत्न: कोई मौद्रिक अनुदान नहीं; पद्म पुरस्कार: कोई मौद्रिक अनुदान नहीं (केवल प्रमाण पत्र और पदक) |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- सेंट फ्रांसिस जेवियर जेसुइट ऑर्डर के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
- सेंट फ्रांसिस जेवियर की मृत्यु गोवा में हुई थी और वहां उनके लिए एक चर्च समर्पित है।
- सेंट फ्रांसिस जेवियर का पर्व प्रत्येक वर्ष गोवा में मनाया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न सेंट फ्रांसिस जेवियर के बारे में ज्ञान का परीक्षण करता है, जो गोवा में ईसाई धर्म से जुड़े एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं। कथन 1 और 3 सही हैं, जबकि कथन 2 में उनकी मृत्यु के स्थान के बारे में तथ्यात्मक त्रुटि है।
✅ कथन 1 – सही: सेंट फ्रांसिस जेवियर वास्तव में 1534 में इग्नेशियस ऑफ लोयोला के साथ सोसाइटी ऑफ जीसस (जेसुइट ऑर्डर) के सात संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
❌ कथन 2 – गलत: सेंट फ्रांसिस जेवियर की मृत्यु गोवा में नहीं हुई थी; उनकी मृत्यु 1552 में चीन के तट पर शांगचुआन द्वीप (सैंसियन) पर हुई थी। हालांकि, गोवा में बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस में उनके पार्थिव अवशेष रखे गए हैं और यह उन्हें समर्पित है।
✅ कथन 3 – सही: सेंट फ्रांसिस जेवियर का पर्व (गोएन्चो साईब) प्रतिवर्ष 3 दिसंबर को गोवा में मनाया जाता है, और हर दस वर्ष में उनके शरीर को सार्वजनिक दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सेंट फ्रांसिस जेवियर और गोवा में ईसाई धर्म
- सेंट फ्रांसिस जेवियर (1506-1552): स्पेनिश जेसुइट मिशनरी और 1534 में सोसाइटी ऑफ जीसस (जेसुइट ऑर्डर) के सह-संस्थापक।
- भारत में मिशन: 1542 में गोवा पहुंचे और दक्षिण भारत में व्यापक रूप से काम किया, हजारों लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया।
- मृत्यु: 1552 में चीन में प्रवेश करने का प्रयास करते समय शांगचुआन द्वीप (चीन तट से दूर) पर मृत्यु हुई।
- बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस: ओल्ड गोवा में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, 1605 में निर्मित, सेंट फ्रांसिस जेवियर के पवित्र अवशेषों को रखता है।
- सेंट फ्रांसिस जेवियर का पर्व: प्रतिवर्ष 3 दिसंबर को मनाया जाता है; संत के शरीर को हर 10 वर्ष में एक बार सार्वजनिक दर्शन (एक्सपोज़िशन) के लिए प्रदर्शित किया जाता है।
- विरासत: गोवा के संरक्षक संत और एशिया में सबसे प्रभावशाली ईसाई मिशनरियों में से एक।
32वें ग्रीष्मकालीन ओलंपिक के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- इस ओलंपिक का आधिकारिक आदर्श वाक्य 'ए न्यू वर्ल्ड' है।
- स्पोर्ट क्लाइम्बिंग, सर्फिंग, स्केटबोर्डिंग, कराटे और बेसबॉल इस ओलंपिक में शामिल किए गए हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न टोक्यो में 2021 में आयोजित 32वें ग्रीष्मकालीन ओलंपिक के बारे में ज्ञान का परीक्षण करता है। कथन 1 गलत है क्योंकि आधिकारिक आदर्श वाक्य अलग था, जबकि कथन 2 खेलों में जोड़े गए नए खेलों की सही पहचान करता है।
❌ कथन 1 – गलत: 32वें ग्रीष्मकालीन ओलंपिक (टोक्यो 2020) का आधिकारिक आदर्श वाक्य "United by Emotion" था, न कि "A New World"। आदर्श वाक्य "A New World" का उपयोग रियो ओलंपिक 2016 के लिए किया गया था।
✅ कथन 2 – सही: नए IOC नियमों के तहत, टोक्यो ओलंपिक में छह नए खेल शामिल किए गए: बेसबॉल/सॉफ्टबॉल, सर्फिंग, स्केटबोर्डिंग, कराटे, और स्पोर्ट क्लाइम्बिंग, साथ ही पारंपरिक खेलों में नई मिश्रित-टीम स्पर्धाएं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: टोक्यो 2020 ओलंपिक (32वां ग्रीष्मकालीन ओलंपिक)
- वर्ष और स्थान: टोक्यो, जापान में 2021 में आयोजित (COVID-19 महामारी के कारण 2020 से स्थगित)
- आधिकारिक आदर्श वाक्य: "United by Emotion"
- नए खेल जोड़े गए: स्पोर्ट क्लाइम्बिंग, सर्फिंग, स्केटबोर्डिंग, कराटे, बेसबॉल, और सॉफ्टबॉल (6 नए खेल)
- नवाचार: नए IOC लचीलेपन नियमों के तहत मेजबान शहरों को अतिरिक्त खेलों का प्रस्ताव करने की अनुमति देने वाला पहला ओलंपिक
- अन्य परिवर्धन: एथलेटिक्स, तैराकी और जूडो जैसे पारंपरिक खेलों में नई मिश्रित-टीम स्पर्धाएं; बास्केटबॉल (3x3) और साइकिलिंग (BMX फ्रीस्टाइल) के नए रूप
- संदर्भ: रियो 2016 ओलंपिक ने "A New World" आदर्श वाक्य का उपयोग किया था और यह 31वां ग्रीष्मकालीन ओलंपिक था
आईसीसी विश्व टेस्ट चैंपियनशिप के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- फाइनलिस्टों का निर्णय उनके द्वारा जीते गए मैचों की संख्या के आधार पर किया गया।
- न्यूजीलैंड को इंग्लैंड से आगे रखा गया क्योंकि उसने इंग्लैंड की तुलना में अधिक मैच जीते।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न तो 1 और न ही 2
आईसीसी विश्व टेस्ट चैंपियनशिप (2019-2021) के लिए फाइनलिस्टों का निर्धारण अर्जित अंकों के प्रतिशत (PCT) के आधार पर किया गया, न कि जीते गए मैचों की पूर्ण संख्या के आधार पर। यह प्रणाली COVID-19 व्यवधानों के कारण विभिन्न टीमों द्वारा खेले गए मैचों की भिन्न संख्या को देखते हुए निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए अपनाई गई थी।
❌ कथन 1 – गलत: फाइनलिस्टों का निर्णय कुल प्रतिस्पर्धित अंकों से अर्जित अंकों के प्रतिशत (PCT) के आधार पर किया गया, न कि जीते गए मैचों की संख्या के आधार पर।
❌ कथन 2 – गलत: न्यूजीलैंड को इंग्लैंड से आगे उच्च PCT (70.0% बनाम 64.1%) के कारण रखा गया, हालांकि इंग्लैंड ने टूर्नामेंट चक्र के दौरान न्यूजीलैंड (7) की तुलना में अधिक मैच (11) जीते थे।
📝 संक्षिप्त नोट्स: आईसीसी विश्व टेस्ट चैंपियनशिप
- प्रारूप: आईसीसी विश्व टेस्ट चैंपियनशिप टेस्ट क्रिकेट के लिए एक लीग प्रतियोगिता है, जिसमें शीर्ष नौ टेस्ट खेलने वाले राष्ट्र दो साल के चक्र में प्रतिस्पर्धा करते हैं।
- अंक प्रणाली (2019-2021): प्रत्येक टेस्ट श्रृंखला में टीमों को जीत के लिए 120 अंक, ड्रॉ के लिए 60, टाई के लिए 40, और हार के लिए 0 अंक मिलते थे।
- अंकों का प्रतिशत (PCT): PCT = (अर्जित अंक / प्रतिस्पर्धित अंक) × 100। रैंकिंग के लिए इस मीट्रिक का उपयोग असमान खेले गए मैचों को ध्यान में रखने के लिए किया गया।
- COVID-19 प्रभाव: महामारी के कारण श्रृंखलाओं के रद्दीकरण और स्थगन हुए, जिससे PCT को पूर्ण अंकों या जीत के बजाय सबसे निष्पक्ष रैंकिंग मानदंड बनाया गया।
- उद्घाटन फाइनल (2021): न्यूजीलैंड ने साउथैम्प्टन में भारत को हराकर पहली बार विश्व टेस्ट चैंपियन बना।
- योग्य टीमें (2019-2021): भारत (PCT 72.2%) और न्यूजीलैंड (PCT 70.0%) फाइनल के लिए योग्य हुए।
गुप्तों के पतन से लेकर सातवीं शताब्दी के प्रारंभ में हर्षवर्धन के उदय तक, निम्नलिखित में से कौन से राज्य उत्तरी भारत में सत्ता में थे?
- मगध के गुप्त
- मालवा के परमार
- थानेसर के पुष्यभूति
- कन्नौज के मौखरि
- देवगिरि के यादव
- वलभी के मैत्रक
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — 1, 3, 4 और 6
साम्राज्यवादी गुप्तों के पतन (लगभग 550 ईस्वी) और हर्षवर्धन के उदय (606 ईस्वी) के बीच की अवधि के दौरान, उत्तरी भारत में कई क्षेत्रीय शक्तियों का उदय हुआ। मगध के उत्तर गुप्त, थानेसर के पुष्यभूति, कन्नौज के मौखरि और वलभी के मैत्रक सभी प्रमुख राज्य थे जो इस संक्रमणकालीन अवधि के दौरान सत्ता में थे।
✅ कथन 1 – सही: उत्तर गुप्त (साम्राज्यवादी गुप्तों से भिन्न) 6वीं से 8वीं शताब्दी ईस्वी तक मगध और बिहार के कुछ हिस्सों पर शासन करते थे।
❌ कथन 2 – गलत: मालवा के परमार बहुत बाद में, लगभग 9वीं शताब्दी ईस्वी में उभरे, जो हर्ष के समय के काफी बाद था।
✅ कथन 3 – सही: पुष्यभूति वंश (वर्धन वंश) ने 6वीं-7वीं शताब्दी में थानेसर पर शासन किया; हर्षवर्धन इसी वंश से संबंधित थे।
✅ कथन 4 – सही: मौखरि ने 6वीं शताब्दी में कन्नौज पर शासन किया और पतनशील गुप्तों के महत्वपूर्ण समकालीन थे।
❌ कथन 5 – गलत: देवगिरि के यादव 12वीं-13वीं शताब्दी ईस्वी में प्रमुखता में आए, जो प्रश्न में दी गई अवधि से बहुत बाद का समय है।
✅ कथन 6 – सही: मैत्रकों ने गुप्त पतन के बाद 5वीं-6वीं शताब्दी ईस्वी में वलभी (गुजरात) में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।
📝 संक्षिप्त नोट्स: गुप्तोत्तर क्षेत्रीय राज्य (550-606 ईस्वी)
| वंश | क्षेत्र/राजधानी | काल | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|---|
| उत्तर गुप्त | मगध | 6वीं-8वीं शताब्दी ईस्वी | साम्राज्यवादी गुप्तों से अलग; बिहार और मगध के कुछ हिस्सों पर शासन किया |
| पुष्यभूति (वर्धन) | थानेसर (हरियाणा) | 6वीं-7वीं शताब्दी ईस्वी | हर्षवर्धन इसी वंश से थे; उत्तरी भारत में सत्ता को समेकित किया |
| मौखरि | कन्नौज | 6वीं शताब्दी ईस्वी | रणनीतिक शहर कन्नौज को नियंत्रित किया; विवाह के माध्यम से पुष्यभूतियों के साथ गठबंधन किया |
| मैत्रक | वलभी (गुजरात) | 5वीं-8वीं शताब्दी ईस्वी | पूर्व गुप्त सामंत जो स्वतंत्र हो गए; बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया |
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| ऐतिहासिक स्थल | किसके लिए प्रसिद्ध |
|---|---|
| बुर्जहोम | शैलकृत मंदिर |
| चंद्र-केतुगढ़ | टेराकोटा कला |
| गणेश्वर | ताम्र कलाकृतियाँ |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 2 और 3
यह प्रश्न पुरातात्विक स्थलों और उनकी विशिष्ट विशेषताओं के ज्ञान की परीक्षा करता है। तीनों युग्मों में से केवल चंद्र-केतुगढ़ (टेराकोटा कला) और गणेश्वर (ताम्र कलाकृतियाँ) सही सुमेलित हैं, जबकि बुर्जहोम को शैलकृत मंदिरों से गलत तरीके से संबद्ध किया गया है।
❌ युग्म 1 – गलत: बुर्जहोम (कश्मीर घाटी) एक नवपाषाण स्थल है जो गर्त-आवासों और अस्थि उपकरणों के लिए प्रसिद्ध है, न कि शैलकृत मंदिरों के लिए जो बाद की बौद्ध/जैन परंपराओं से संबंधित हैं।
✅ युग्म 2 – सही: चंद्र-केतुगढ़ (पश्चिम बंगाल) अपनी उत्कृष्ट टेराकोटा कला के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईस्वी तक की पट्टिकाएँ और मूर्तियाँ शामिल हैं।
✅ युग्म 3 – सही: गणेश्वर (राजस्थान) एक ताम्रपाषाणिक स्थल (4000-2000 ईसा पूर्व) है जो ताम्र कलाकृतियों जैसे उपकरण, हथियार और आभूषणों के लिए प्रसिद्ध है, जो प्रारंभिक धातुकर्म परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल
| स्थल | स्थान | काल | किसके लिए प्रसिद्ध |
|---|---|---|---|
| बुर्जहोम | कश्मीर घाटी | नवपाषाण (3000-1500 ईसा पूर्व) | गर्त-आवास, अस्थि उपकरण, घिसे हुए पत्थर की कुल्हाड़ियाँ |
| चंद्र-केतुगढ़ | पश्चिम बंगाल | तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व - तीसरी शताब्दी ईस्वी | टेराकोटा कला, पट्टिकाएँ, मूर्तियाँ |
| गणेश्वर | राजस्थान | ताम्रपाषाण (4000-2000 ईसा पूर्व) | ताम्र कलाकृतियाँ, उपकरण, हथियार, आभूषण |
| बागोर | राजस्थान | मध्यपाषाण | सूक्ष्म पाषाण उपकरण, पशु अस्थियाँ |
| आहड़ | राजस्थान | ताम्रपाषाण | काले-और-लाल मृद्भांड |
| कोल्डिहवा | उत्तर प्रदेश | नवपाषाण | धान की खेती का प्रारंभिक साक्ष्य |
निम्नलिखित में से कौन सा प्राचीन नगर बांधों की एक श्रृंखला बनाकर और जल को जुड़े हुए जलाशयों में प्रवाहित करके जल संचयन और प्रबंधन की अपनी विस्तृत प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — धोलावीरा
गुजरात में स्थित धोलावीरा, पाँच सबसे बड़े हड़प्पा स्थलों में से एक है और अपनी असाधारण रूप से परिष्कृत जल संचयन और प्रबंधन प्रणाली के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस नगर ने वर्षा जल को संचित और संग्रहीत करने के लिए बांधों, जलाशयों (कुल 16), नहरों और परस्पर जुड़े जल भंडारण संरचनाओं की एक श्रृंखला का निर्माण किया, जो इसे सिंधु घाटी सभ्यता के स्थलों में अद्वितीय बनाता है। यह विस्तृत जलीय अभियांत्रिकी लगभग 4500 वर्ष पुरानी उन्नत नगर नियोजन और जल संरक्षण तकनीकों को प्रदर्शित करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख हड़प्पा स्थल और उनकी विशिष्ट विशेषताएँ
| स्थल | स्थान | विशिष्ट विशेषताएँ |
|---|---|---|
| धोलावीरा | गुजरात (खादिर द्वीप, कच्छ) | • 16 जलाशयों के साथ विस्तृत जल संचयन प्रणाली • तीन-भागीय नगर विभाजन (दुर्ग, मध्य नगर, निचला नगर) • बड़ा स्टेडियम/सार्वजनिक सभा क्षेत्र • हड़प्पा लिपि के साथ सबसे प्राचीन ज्ञात साइनबोर्ड • अद्वितीय बांध और नहर प्रणाली |
| कालीबंगन | राजस्थान (घग्गर नदी) | • जुते हुए कृषि क्षेत्र का पहला साक्ष्य • अनुष्ठानिक प्रथाओं को दर्शाने वाली अग्निवेदियाँ • मिट्टी की ईंटों की स्थापत्य कला • पूर्व-हड़प्पा और हड़प्पा चरण |
| राखीगढ़ी | हरियाणा | • भारत में सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल • उन्नत आभूषण निर्माण का साक्ष्य • बहु-कक्षीय घर और नियोजित बस्ती • आनुवंशिक निरंतरता दर्शाने वाले कंकाल |
| रोपड़ (रूपनगर) | पंजाब (सतलुज नदी) | • स्वतंत्रता के बाद उत्खनित पहला हड़प्पा स्थल (1953) • हड़प्पा और बाद की संस्कृतियों का अतिव्यापन • मिट्टी के बर्तनों और आभूषणों के साथ दफनाने की प्रथाएँ • नदी आधारित बस्ती पैटर्न |
| लोथल | गुजरात | • गोदीबाड़ा और समुद्री व्यापार केंद्र • चावल की खेती का साक्ष्य • मनका निर्माण कारखाना • अग्निवेदियाँ |
| हड़प्पा | पाकिस्तान (पंजाब) | • खोजा जाने वाला पहला स्थल (1921) • अन्नागार और किलेबंदी • विभिन्न दफन प्रकारों के साथ कब्रिस्तान R-37 • पत्थर की मूर्तियाँ और मुहरें |
UPSC Prelims 2021 Questions Paper - Subject-wise Question Distribution
पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
18 Qs (18%)भारतीय राजव्यवस्था
17 Qs (17%)भारतीय अर्थव्यवस्था
15 Qs (15%)विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
11 Qs (11%)आधुनिक इतिहास
7 Qs (7%)विश्व भूगोल
7 Qs (7%)समसामयिकी
6 Qs (6%)भारत का भूगोल
5 Qs (5%)भारतीय कला और संस्कृति
5 Qs (5%)मध्यकालीन इतिहास
4 Qs (4%)प्राचीन इतिहास
4 Qs (4%)अंतरराष्ट्रीय संबंध
1 Qs (1%)UPSC Prelims 2021 Question Paper - FAQs & Analysis
Q1 How many total questions were asked in UPSC Prelims 2021?
Q2 What is the subject-wise question breakdown for UPSC Prelims 2021?
- पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी: 18 questions (18%)
- भारतीय राजव्यवस्था: 17 questions (17%)
- भारतीय अर्थव्यवस्था: 15 questions (15%)
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: 11 questions (11%)
- आधुनिक इतिहास: 7 questions (7%)
- विश्व भूगोल: 7 questions (7%)
- समसामयिकी: 6 questions (6%)
- भारत का भूगोल: 5 questions (5%)
- भारतीय कला और संस्कृति: 5 questions (5%)
- मध्यकालीन इतिहास: 4 questions (4%)
- प्राचीन इतिहास: 4 questions (4%)
- अंतरराष्ट्रीय संबंध: 1 questions (1%)