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बॉण्ड एवं प्रतिभूतियाँ Previous Year Questions (PYQs)
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Solved Previous Year Questions
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एक बांड जिसकी आय का उपयोग केवल पर्यावरण और सामाजिक दोनों परियोजनाओं के संयोजन को वित्त या पुनर्वित्त करने के लिए किया जाता है, उसे कहा जाता है:
Detailed Explanation:
सस्टेनेबिलिटी बॉन्ड वह बॉन्ड है जिसकी राशि का उपयोग पर्यावरणीय (Green) और सामाजिक (Social) दोनों प्रकार की परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए किया जाता है।
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Green Bond केवल पर्यावरणीय परियोजनाओं के लिए होता है।
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Social Bond केवल सामाजिक परियोजनाओं के लिए होता है।
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Sustainability Bond दोनों प्रकार की परियोजनाओं को वित्त प्रदान करता है।
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Sovereign Bond सरकार द्वारा जारी ऋण-पत्र होता है और इसका उपयोग किसी विशेष पर्यावरणीय या सामाजिक उद्देश्य तक सीमित नहीं होता।
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अतः सही उत्तर विकल्प (C) Sustainability Bond है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
| विकल्प | वास्तविक अर्थ | यह क्यों नहीं? |
|---|---|---|
| Green Bond | केवल पर्यावरणीय परियोजनाओं के लिए धन जुटाता है | सामाजिक परियोजनाएँ शामिल नहीं |
| Social Bond | केवल सामाजिक परियोजनाओं के लिए धन जुटाता है | पर्यावरणीय परियोजनाएँ शामिल नहीं |
| Sustainability Bond | पर्यावरणीय और सामाजिक दोनों परियोजनाओं के लिए | ✅ सही उत्तर |
| Sovereign Bond | सरकार द्वारा जारी ऋण-पत्र | धन का उपयोग किसी विशेष उद्देश्य तक सीमित नहीं |
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
कथन I: जहां तक किसी कंपनी में निवेश से मिलने वाले रिटर्न का संबंध है, आम तौर पर बांडधारकों को स्टॉकधारकों की तुलना में अपेक्षाकृत कम जोखिम वाला माना जाता है।
कथन II: बॉन्डधारक किसी कंपनी के ऋणदाता होते हैं जबकि स्टॉकधारक इसके मालिक होते हैं।
कथन III: पुनर्भुगतान उद्देश्य के लिए, किसी कंपनी द्वारा स्टॉकधारकों की तुलना में बांडधारकों को प्राथमिकता दी जाती है।
उपरोक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 1
किसी कंपनी में निवेश के संदर्भ में बॉण्डधारक (Bondholders) आमतौर पर शेयरधारकों (Stockholders) की तुलना में कम जोखिम का सामना करते हैं, क्योंकि बॉण्ड ऋण साधन होते हैं जबकि शेयर कंपनी में स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।
✅ कथन I सही है: बॉण्डधारकों का जोखिम अपेक्षाकृत कम होता है क्योंकि उन्हें निश्चित ब्याज मिलता है और कंपनी की परिसंपत्तियों पर उनका दावा शेयरधारकों से पहले होता है।
✅ कथन II सही है: बॉण्डधारक कंपनी को ऋण देने वाले (Lenders/Creditors) होते हैं, जबकि शेयरधारक कंपनी के मालिक (Owners) होते हैं।
✅ कथन III सही है: कंपनी के परिसमापन (Liquidation) या दिवालियापन की स्थिति में बॉण्डधारकों को शेयरधारकों से पहले भुगतान किया जाता है।
क्यों II और III, I की व्याख्या करते हैं: क्योंकि बॉण्डधारक लेनदार होते हैं और भुगतान में उन्हें प्राथमिकता मिलती है, इसलिए उनका निवेश अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित माना जाता है।
संक्षिप्त नोट्स: Bonds और Stocks
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Bonds ऋण साधन (Debt Instruments) होते हैं; निवेशक ऋणदाता होता है।
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Stocks (Shares) कंपनी में स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।
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बॉण्डधारकों को निश्चित ब्याज (Fixed Interest) प्राप्त होता है।
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शेयरधारकों को लाभांश (Dividend) और पूंजी वृद्धि से लाभ मिलता है।
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परिसमापन की स्थिति में लेनदारों और बॉण्डधारकों को पहले भुगतान किया जाता है।
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बॉण्ड सामान्यतः कम जोखिम और कम प्रतिफल वाले होते हैं।
-
शेयर सामान्यतः अधिक जोखिम और अधिक प्रतिफल की संभावना रखते हैं।
निम्नलिखित पर विचार करें:
1. एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF)
2. मोटर वाहन
3. मुद्रा स्वैप
उपर्युक्त में से किसे/किन्हें वित्तीय साधन (financial instruments) माना जाता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — केवल 1 और 3
वित्तीय साधन ऐसे अनुबंध होते हैं जो एक इकाई की वित्तीय संपत्ति और दूसरी इकाई की वित्तीय देयता या इक्विटी साधन को जन्म देते हैं। ये भौतिक संपत्तियों के बजाय नकदी प्रवाह या स्वामित्व अधिकारों के दावों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
✅ कथन 1 – सही: एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF) वित्तीय साधन हैं क्योंकि वे स्टॉक एक्सचेंजों पर कारोबार की जाने वाली प्रतिभूतियों की टोकरियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो निवेशकों को अंतर्निहित परिसंपत्तियों के दावे प्रदान करते हैं।
❌ कथन 2 – गलत: मोटर वाहन मूर्त भौतिक संपत्तियां हैं, वित्तीय साधन नहीं, क्योंकि वे नकदी प्रवाह या वित्तीय संपत्तियों के स्वामित्व के दावों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।
✅ कथन 3 – सही: मुद्रा स्वैप व्युत्पन्न वित्तीय साधन हैं जिनमें पक्षों के बीच विभिन्न मुद्राओं में मूलधन और ब्याज भुगतान के आदान-प्रदान के संविदात्मक समझौते शामिल होते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वित्तीय साधन
- परिभाषा: वित्तीय साधन पक्षों के बीच मौद्रिक अनुबंध होते हैं जिन्हें बनाया, व्यापार किया, संशोधित किया और निपटाया जा सकता है। ये संपत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनका व्यापार किया जा सकता है या स्वामित्व का प्रमाण हो सकता है।
- वर्गीकरण: वित्तीय साधनों को व्यापक रूप से नकद साधनों (सीधे बाजारों से प्रभावित, जैसे प्रतिभूतियां, ऋण, जमा) और व्युत्पन्न साधनों (अंतर्निहित संपत्तियों से मूल्य प्राप्त करते हैं, जैसे वायदा, विकल्प, स्वैप) में वर्गीकृत किया जाता है।
- प्राथमिक साधन: इनमें इक्विटी प्रतिभूतियां (शेयर), ऋण प्रतिभूतियां (बांड, डिबेंचर), विदेशी मुद्रा अनुबंध, और जमा/ऋण शामिल हैं।
- व्युत्पन्न साधन: इनमें वायदा, फॉरवर्ड, विकल्प, स्वैप (ब्याज दर स्वैप, मुद्रा स्वैप, क्रेडिट डिफ़ॉल्ट स्वैप), और अंतर के लिए अनुबंध शामिल हैं।
- ETF: एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड म्यूचुअल फंड और स्टॉक की विशेषताओं को जोड़ते हैं, सूचकांकों, वस्तुओं, या संपत्तियों की टोकरियों को ट्रैक करते हुए एक्सचेंजों पर सामान्य शेयरों की तरह व्यापार करते हैं।
- बहिष्करण: भौतिक/मूर्त संपत्तियां जैसे अचल संपत्ति, वस्तुएं (सोना, तेल), मशीनरी, वाहन, और इन्वेंट्री वित्तीय साधन नहीं हैं क्योंकि वे नकदी प्रवाह के संविदात्मक दावों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।
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निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत में, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां भारतीय रिज़र्व बैंक की तरलता समायोजन सुविधा विंडो का उपयोग कर सकती हैं।
- भारत में, विदेशी संस्थागत निवेशक सरकारी प्रतिभूतियां (जी-सेक) रख सकते हैं।
- भारत में, स्टॉक एक्सचेंज ऋण के लिए अलग ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म प्रदान कर सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1, 2 और 3
तीनों कथन सही हैं। प्राथमिक व्यापारियों के रूप में पंजीकृत NBFC भारतीय रिज़र्व बैंक की तरलता समायोजन सुविधा का उपयोग कर सकती हैं, और तरलता संकट के दौरान NBFCs के लिए विशेष विंडो खोली जाती हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII/FPI) को नियामक ढांचे के तहत सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने और रखने की अनुमति है। भारत में स्टॉक एक्सचेंज थोक ऋण बाजार और खुदरा ऋण बाजार खंडों जैसे समर्पित ऋण ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म संचालित करते हैं।
✅ कथन 1 – सही: प्राथमिक व्यापारियों के रूप में पंजीकृत NBFC के पास RBI की LAF विंडो तक सीधी पहुंच है, और संकट अवधि के दौरान NBFCs के लिए विशेष तरलता सुविधाएं प्रदान की गई हैं।
✅ कथन 2 – सही: विदेशी संस्थागत निवेशक (अब FPI ढांचे के तहत) नियामक सीमाओं और पूर्ण रूप से सुलभ मार्ग जैसे रूटों के अधीन G-Secs और ट्रेजरी बिल रख सकते हैं।
✅ कथन 3 – सही: NSE और BSE जैसे भारतीय स्टॉक एक्सचेंज थोक ऋण बाजार (WDM) और खुदरा ऋण बाजार (RDM) जैसे खंडों के माध्यम से ऋण उपकरणों के लिए अलग ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म प्रदान करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में वित्तीय बाजार अवसंरचना
- तरलता समायोजन सुविधा (LAF): RBI का मौद्रिक नीति साधन जो दैनिक तरलता प्रबंधन के लिए है; मुख्य रूप से अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा रेपो और रिवर्स रेपो संचालन के माध्यम से उपयोग किया जाता है।
- प्राथमिक व्यापारी (PD): RBI के साथ पंजीकृत विशिष्ट वित्तीय संस्थान जो सरकारी प्रतिभूतियों में अंडरराइट और बाजार बनाते हैं; कुछ NBFC को PD के रूप में पंजीकृत किया जा सकता है।
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI): विदेशी निवेशकों के लिए समेकित श्रेणी (FII/FDI को प्रतिस्थापित करते हुए); SEBI द्वारा ऋण और इक्विटी बाजारों में विशिष्ट निवेश सीमाओं के साथ नियमित।
- G-Secs निवेश मार्ग: सामान्य मार्ग (सीमाओं के साथ) और विदेशी निवेशकों के लिए निर्दिष्ट प्रतिभूतियों के लिए बिना किसी सीमा के पूर्ण रूप से सुलभ मार्ग (FAR)।
- ऋण बाजार खंड: स्टॉक एक्सचेंज संस्थागत निवेशकों के लिए WDM और खुदरा निवेशकों के लिए RDM संचालित करते हैं ताकि सरकारी प्रतिभूतियों, कॉर्पोरेट बॉन्ड और अन्य ऋण उपकरणों का व्यापार किया जा सके।
Financial Markets and Institutions
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, "मुद्रास्फीति-सूचकांकित बांड (IIBs)" के क्या लाभ हैं?
- सरकार IIBs के माध्यम से अपने उधार पर कूपन दरों को कम कर सकती है।
- IIBs निवेशकों को मुद्रास्फीति के संबंध में अनिश्चितता से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
- IIBs पर प्राप्त ब्याज के साथ-साथ पूंजीगत लाभ कर योग्य नहीं हैं।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 2
मुद्रास्फीति-सूचकांकित बांड (IIBs) सरकारी प्रतिभूतियां हैं जो मुद्रास्फीति सूचकांकों के आधार पर मूलधन और ब्याज भुगतान दोनों को समायोजित करके निवेशकों को मुद्रास्फीति से बचाने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। सरकार को कम नाममात्र कूपन दरों से लाभ होता है क्योंकि मुद्रास्फीति समायोजन बांड संरचना में निर्मित होता है, जबकि निवेशकों को क्रय शक्ति के क्षरण से सुरक्षा मिलती है।
✅ कथन 1 – सही: IIBs सरकार को कम कूपन दरें प्रदान करने की अनुमति देते हैं क्योंकि वास्तविक रिटर्न मुद्रास्फीति समायोजन के माध्यम से सुनिश्चित होता है, जो उच्च निश्चित दरों वाले पारंपरिक बांड की तुलना में उधार लागत को कम करता है।
✅ कथन 2 – सही: IIBs निवेशकों को मुद्रास्फीति की अनिश्चितता से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं क्योंकि मूलधन और ब्याज भुगतान दोनों मुद्रास्फीति (आमतौर पर WPI या CPI) के लिए सूचकांकित होते हैं, जो वास्तविक क्रय शक्ति को संरक्षित करते हैं।
❌ कथन 3 – गलत: आयकर अधिनियम के अनुसार भारत में IIBs पर ब्याज आय और पूंजीगत लाभ दोनों कर योग्य हैं; कुछ अन्य निर्दिष्ट प्रतिभूतियों के विपरीत IIBs के लिए कोई विशेष कर छूट नहीं है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मुद्रास्फीति-सूचकांकित बांड (IIBs)
- परिचय: IIBs पहली बार 1997 में भारत में पेश किए गए और 2013 में RBI द्वारा निवेशकों को मुद्रास्फीति सुरक्षा प्रदान करने के लिए पुनः पेश किए गए।
- सूचकांकन: मूलधन और ब्याज (कूपन) भुगतान दोनों को मुद्रास्फीति सूचकांक (WPI या CPI-संयुक्त) के आधार पर समायोजित किया जाता है।
- वास्तविक रिटर्न: निवेशकों को एक निश्चित वास्तविक रिटर्न दर और मुद्रास्फीति समायोजन प्राप्त होता है, जो क्रय शक्ति सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
- सरकार को लाभ: कम नाममात्र कूपन दरें सरकार की उधार लागत को कम करती हैं क्योंकि मुद्रास्फीति जोखिम बांड संरचना में स्थानांतरित हो जाता है।
- कराधान: ब्याज आय लागू आयकर स्लैब के अनुसार कर योग्य है; पूंजीगत लाभ धारण अवधि (LTCG/STCG नियम लागू) के आधार पर कर योग्य हैं।
- बाजार स्थिति: जटिलता, कराधान मुद्दों और अन्य साधनों की तुलना में कम निवेशक जागरूकता के कारण भारत में IIBs को सीमित सफलता मिली है।
परिवर्तनीय बॉन्ड (Convertible Bonds) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. चूंकि बॉन्ड को इक्विटी में बदलने का विकल्प होता है, परिवर्तनीय बॉन्ड कम ब्याज दर का भुगतान करते हैं।
2. इक्विटी में परिवर्तित करने का विकल्प बॉन्डधारक को बढ़ती उपभोक्ता कीमतों के लिए एक निश्चित स्तर का सूचीकरण (indexation) प्रदान करता है।
उपरोक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
परिवर्तनीय बॉन्ड एक संकर ऋण प्रतिभूति है जो बॉन्डधारक को जारीकर्ता कंपनी के पूर्वनिर्धारित संख्या में इक्विटी शेयरों में बॉन्ड को परिवर्तित करने का अधिकार देती है। इस मूल्यवान परिवर्तन सुविधा के कारण, परिवर्तनीय बॉन्ड आम तौर पर नियमित बॉन्ड की तुलना में कम कूपन दर प्रदान करते हैं, जो जारीकर्ताओं के लिए ब्याज खर्च कम करने में आकर्षक होते हैं। इसके अतिरिक्त, परिवर्तन विकल्प बॉन्डधारकों को मुद्रास्फीति के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है, क्योंकि इक्विटी कीमतें मुद्रास्फीति के साथ बढ़ती हैं, जो उपभोक्ता कीमतों के लिए एक निश्चित स्तर का सूचीकरण प्रदान करती हैं।
✅ कथन 1 – सही: परिवर्तनीय बॉन्ड कम ब्याज दर का भुगतान करते हैं क्योंकि निवेशक बॉन्ड को इक्विटी शेयरों में परिवर्तित करने के मूल्यवान विकल्प के बदले में कम कूपन भुगतान स्वीकार करने को तैयार होते हैं, जो संभावित रूप से काफी मूल्यवृद्धि कर सकते हैं।
✅ कथन 2 – सही: परिवर्तन विकल्प एक मुद्रास्फीति बचाव के रूप में कार्य करता है क्योंकि इक्विटी कीमतें आम तौर पर मुद्रास्फीति के साथ बढ़ती हैं, जो बॉन्डधारकों को बढ़ती उपभोक्ता कीमतों के लिए सूचीकरण प्रदान करती हैं जो निश्चित-ब्याज बॉन्ड प्रदान नहीं कर सकते।
📝 संक्षिप्त नोट्स: परिवर्तनीय बॉन्ड
- परिभाषा: ऋण (निश्चित ब्याज) और इक्विटी (परिवर्तन विकल्प) की विशेषताओं को मिलाने वाली संकर प्रतिभूतियां।
- कम कूपन दर: परिवर्तन सुविधा के कारण निवेशक नियमित बॉन्ड की तुलना में 1-2% कम ब्याज स्वीकार करते हैं।
- परिवर्तन अनुपात: परिवर्तन पर बॉन्डधारक को प्राप्त होने वाले शेयरों की पूर्वनिर्धारित संख्या।
- जारीकर्ता को लाभ: कम ब्याज लागत और परिवर्तन तक इक्विटी कमजोरी में देरी।
- निवेशक को लाभ: यदि कंपनी के स्टॉक मूल्य में वृद्धि होती है तो ऊपर की संभावना के साथ निश्चित आय; इक्विटी एक्सपोजर के माध्यम से मुद्रास्फीति सुरक्षा।
- परिवर्तन मूल्य: आमतौर पर जारी करने के समय स्टॉक मूल्य से प्रीमियम (15-30%) पर निर्धारित किया जाता है।
- प्रकार: वेनिला परिवर्तनीय (बॉन्डधारक का विकल्प), अनिवार्य परिवर्तनीय (स्वचालित परिवर्तन), और रिवर्स परिवर्तनीय।
भारत सरकार के बॉण्ड प्रतिफल (Bond Yields) निम्नलिखित में से किससे प्रभावित होते हैं?
- संयुक्त राज्य अमेरिका के फेडरल रिजर्व की कार्रवाइयाँ।
- भारतीय रिजर्व बैंक की कार्रवाइयाँ।
- मुद्रास्फीति और अल्पकालिक ब्याज दरें।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
भारतीय सरकारी बॉण्ड प्रतिफल कई घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कारकों से प्रभावित होते हैं। तीनों कथन भारत में बॉण्ड प्रतिफल के प्रमुख निर्धारकों की सही पहचान करते हैं।
✅ कथन 1 – सही: अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति के निर्णय, विशेष रूप से ब्याज दर में परिवर्तन, वैश्विक पूंजी प्रवाह को प्रभावित करते हैं और भारतीय बॉण्डों की तुलना में अमेरिकी परिसंपत्तियों को अधिक या कम आकर्षक बना सकते हैं, जिससे प्रतिफल प्रभावित होता है।
✅ कथन 2 – सही: भारतीय रिजर्व बैंक रेपो दर समायोजन, खुले बाजार परिचालन (OMOs), और तरलता प्रबंधन उपायों जैसे मौद्रिक नीति उपकरणों के माध्यम से बॉण्ड प्रतिफल को सीधे प्रभावित करता है।
✅ कथन 3 – सही: मुद्रास्फीति की अपेक्षाएँ और अल्पकालिक ब्याज दरें बॉण्ड प्रतिफल के मौलिक निर्धारक हैं, क्योंकि निवेशक मुद्रास्फीति जोखिम की भरपाई के लिए और प्रचलित अल्पकालिक दरों के आधार पर उच्च प्रतिफल की मांग करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सरकारी बॉण्ड प्रतिफल को प्रभावित करने वाले कारक
- मौद्रिक नीति: केंद्रीय बैंक की कार्रवाइयाँ (RBI की रेपो दर, CRR, SLR, OMOs) सीधे तरलता और ब्याज दर वातावरण को प्रभावित करती हैं, जो बॉण्ड मांग और प्रतिफल को प्रभावित करती हैं।
- मुद्रास्फीति: उच्च मुद्रास्फीति अपेक्षाएँ उच्च प्रतिफल की ओर ले जाती हैं क्योंकि निवेशक वास्तविक रिटर्न की क्षति के लिए मुआवजे की मांग करते हैं।
- वैश्विक कारक: अमेरिकी फेड नीति, वैश्विक जोखिम भावना, और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) प्रवाह भारत सहित उभरते बाजार बॉण्ड प्रतिफल को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं।
- राजकोषीय घाटा: सरकार द्वारा उच्च उधारी बॉण्ड आपूर्ति बढ़ाती है, संभावित रूप से प्रतिफल को ऊपर धकेलती है।
- आर्थिक वृद्धि: मजबूत वृद्धि की संभावनाएँ कड़ी मौद्रिक नीति की अपेक्षाओं की ओर ले जा सकती हैं, जो प्रतिफल को प्रभावित करती हैं।
- मुद्रा गति: रुपये के अवमूल्यन की चिंताएँ FPI बहिर्प्रवाह की ओर ले जा सकती हैं, जिससे प्रतिफल बढ़ता है।
भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- डीमैट खाते के माध्यम से खुदरा निवेशक प्राथमिक बाजार में 'ट्रेजरी बिल' और 'भारत सरकार के ऋण बांडों' में निवेश कर सकते हैं।
- भारतीय रिजर्व बैंक का 'नेगोशिएटेड डीलिंग सिस्टम-ऑर्डर मैचिंग' सरकारी प्रतिभूति व्यापार मंच है।
- 'सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड' को भारतीय रिजर्व बैंक और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज द्वारा संयुक्त रूप से प्रवर्तित किया गया है।
नीचे दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — 1 और 2
कथन 1 और 2 सही हैं क्योंकि वे खुदरा निवेशकों के लिए आरबीआई रिटेल डायरेक्ट योजना और सरकारी प्रतिभूति व्यापार के लिए एनडीएस-ओएम प्लेटफॉर्म का सटीक वर्णन करते हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि सीडीएसएल को बीएसई द्वारा वाणिज्यिक बैंकों के साथ प्रवर्तित किया गया था, आरबीआई द्वारा नहीं।
✅ कथन 1 – सही: नवंबर 2021 में शुरू की गई आरबीआई रिटेल डायरेक्ट योजना के तहत, खुदरा निवेशक अपने डीमैट खाते के माध्यम से या रिटेल डायरेक्ट गिल्ट (आरडीजी) खाता खोलकर प्राथमिक बाजार में ट्रेजरी बिल और भारत सरकार के ऋण बांडों में निवेश कर सकते हैं।
✅ कथन 2 – सही: नेगोशिएटेड डीलिंग सिस्टम-ऑर्डर मैचिंग (एनडीएस-ओएम) सरकारी प्रतिभूतियों के लिए एक अनाम, इलेक्ट्रॉनिक, स्क्रीन-आधारित व्यापार मंच है जो भारतीय रिजर्व बैंक के स्वामित्व में है और क्लियरिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (सीसीआईएल) द्वारा संचालित है।
❌ कथन 3 – गलत: सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (सीडीएसएल) को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) द्वारा भारतीय स्टेट बैंक, बैंक ऑफ इंडिया और एचडीएफसी बैंक जैसे प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों के साथ मिलकर प्रवर्तित किया गया था, आरबीआई द्वारा नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सरकारी प्रतिभूति बाजार अवसंरचना
- आरबीआई रिटेल डायरेक्ट योजना: नवंबर 2021 में ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से सरकारी प्रतिभूति बाजारों में प्रत्यक्ष खुदरा भागीदारी सक्षम करने के लिए शुरू की गई।
- एनडीएस-ओएम प्लेटफॉर्म: 2005 से संचालित जी-सेक के लिए इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म; प्राथमिक डीलरों, बैंकों और अन्य पात्र प्रतिभागियों के लिए अनाम ऑर्डर मिलान प्रदान करता है।
- भारत में केंद्रीय डिपॉजिटरी: दो डिपॉजिटरी - एनएसडीएल (एनएसई, आईडीबीआई बैंक और यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया द्वारा प्रवर्तित) और सीडीएसएल (बीएसई द्वारा वाणिज्यिक बैंकों के साथ प्रवर्तित)।
- ट्रेजरी बिल: 91 दिन, 182 दिन और 364 दिनों की परिपक्वता वाली अल्पकालिक सरकारी प्रतिभूतियां; छूट पर जारी की जाती हैं और अंकित मूल्य पर भुनाई जाती हैं।
- भारत सरकार के बांड: केंद्र सरकार द्वारा जारी दीर्घकालिक ऋण साधन जिनकी परिपक्वता 5 से 40 वर्ष तक होती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, गैर-वित्तीय ऋण में निम्नलिखित में से कौन सा शामिल है?
- घरों द्वारा लिए गए आवास ऋण
- क्रेडिट कार्ड पर बकाया राशि
- ट्रेजरी बिल
नीचे दिए गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
गैर-वित्तीय ऋण अर्थव्यवस्था के गैर-वित्तीय क्षेत्रों द्वारा लिए गए सभी ऋण दायित्वों को शामिल करता है, जिसमें घर, व्यवसाय और सरकार शामिल हैं। तीनों कथन गैर-वित्तीय ऋण के वैध घटक हैं।
✅ कथन 1 – सही: घरों द्वारा लिए गए आवास ऋण गैर-वित्तीय क्षेत्र के ऋण दायित्व हैं और गैर-वित्तीय ऋण का गठन करते हैं।
✅ कथन 2 – सही: क्रेडिट कार्ड की बकाया राशि घरों (गैर-वित्तीय क्षेत्र) द्वारा वित्तीय संस्थानों को लिया गया उपभोक्ता ऋण है और गैर-वित्तीय ऋण में शामिल है।
✅ कथन 3 – सही: भारत सरकार द्वारा जारी ट्रेजरी बिल सरकार के उधार का प्रतिनिधित्व करते हैं; चूंकि सरकार गैर-वित्तीय क्षेत्र का हिस्सा है, ट्रेजरी बिल और इसी तरह की सरकारी प्रतिभूतियों को गैर-वित्तीय ऋण के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारतीय रिज़र्व बैंक भारत सरकार की प्रतिभूतियों का प्रबंधन और सेवा करता है, लेकिन किसी भी राज्य सरकार की प्रतिभूतियों का नहीं।
- ट्रेजरी बिल भारत सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं और राज्य सरकारों द्वारा जारी कोई ट्रेजरी बिल नहीं होते हैं।
- ट्रेजरी बिल सममूल्य से छूट पर जारी किए जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 2 और 3
केवल कथन 2 और 3 सही हैं। RBI केंद्र और राज्य सरकारों दोनों के लिए प्रतिभूतियों का प्रबंधन करता है, जिससे कथन 1 गलत हो जाता है। ट्रेजरी बिल विशेष रूप से भारत सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं (राज्यों द्वारा नहीं), और वे शून्य-कूपन साधन हैं जो अंकित मूल्य से छूट पर जारी किए जाते हैं और परिपक्वता पर सममूल्य पर मोचित किए जाते हैं।
❌ कथन 1 – गलत: RBI भारत सरकार की प्रतिभूतियों और राज्य सरकार की प्रतिभूतियों (राज्य विकास ऋण) दोनों का प्रबंधन और सेवा करता है।
✅ कथन 2 – सही: ट्रेजरी बिल केवल भारत सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं; राज्य सरकारें इसके बजाय राज्य विकास ऋण (SDLs) जारी करती हैं।
✅ कथन 3 – सही: ट्रेजरी बिल शून्य-कूपन साधन हैं जो सममूल्य से छूट पर जारी किए जाते हैं और परिपक्वता पर सममूल्य पर मोचित किए जाते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सरकारी प्रतिभूतियाँ और ट्रेजरी बिल
- ऋण प्रबंधक के रूप में RBI: RBI समझौतों के तहत केंद्र सरकार और राज्य सरकारों दोनों के लिए बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है।
- ट्रेजरी बिल (T-Bills): RBI के माध्यम से केवल भारत सरकार द्वारा जारी अल्पकालिक मुद्रा बाजार साधन। परिपक्वता: 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन।
- शून्य-कूपन साधन: T-Bills कोई ब्याज भुगतान नहीं करते हैं; वे छूट पर जारी किए जाते हैं और अंकित मूल्य पर मोचित किए जाते हैं। अंतर निहित ब्याज को दर्शाता है।
- राज्य सरकार का उधार: राज्य ट्रेजरी बिल जारी नहीं कर सकते। वे अपनी उधार आवश्यकताओं के लिए राज्य विकास ऋण (SDLs) जारी करते हैं, जो कूपन भुगतान के साथ दिनांकित प्रतिभूतियाँ हैं।
- सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Secs): केंद्र और राज्य सरकारों दोनों द्वारा जारी दीर्घकालिक ऋण साधन। केंद्रीय G-Secs और SDLs का प्रबंधन RBI द्वारा किया जाता है।
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