UPSC Prelims 2020 Question Paper
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भारत में, कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण किसके द्वारा निर्धारित किया गया है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — राज्य की नीति के निदेशक तत्व।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 50, जो राज्य की नीति के निदेशक तत्वों (भाग IV) के अंतर्गत आता है, स्पष्ट रूप से राज्य को निर्देश देता है कि वह राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने के लिए कदम उठाए। यह प्रावधान न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय प्रशासन सुनिश्चित करने का उद्देश्य रखता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण
- अनुच्छेद 50: राज्य की नीति के निदेशक तत्वों (भाग IV) का हिस्सा, लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने का आदेश देता है
- प्रकृति: कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं लेकिन शासन में मौलिक (अनुच्छेद 37)
- उद्देश्य: न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है, कार्यकारी हस्तक्षेप रोकता है, निष्पक्ष न्याय वितरण को बढ़ावा देता है
- कार्यान्वयन: अधिकांश राज्यों ने जिला और अधीनस्थ स्तरों पर न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग कर दिया है
- विधायिका से अंतर: विधायिका से पृथक्करण विशिष्ट संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 121, 122, 211, 212) के माध्यम से सुनिश्चित किया गया है
- ऐतिहासिक संदर्भ: आयरिश संविधान से लिया गया; कानून के शासन के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाता है
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत का संविधान अपनी 'मूल संरचना' को संघवाद, धर्मनिरपेक्षता, मौलिक अधिकारों और लोकतंत्र के रूप में परिभाषित करता है।
- भारत का संविधान नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करने और संविधान जिन आदर्शों पर आधारित है, उनको संरक्षित करने के लिए 'न्यायिक समीक्षा' का प्रावधान करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न तो 1 और न ही 2
दोनों कथन गलत हैं क्योंकि वे 'परिभाषित करता है' और 'प्रावधान करता है' शब्दों का उपयोग करते हैं, जो संविधान में स्पष्ट उल्लेख का सुझाव देते हैं, जो कि वास्तविकता नहीं है। मूल संरचना सिद्धांत और न्यायिक समीक्षा दोनों ही न्यायिक रूप से विकसित अवधारणाएं हैं जो संवैधानिक व्याख्या से व्युत्पन्न हैं, न कि स्पष्ट रूप से परिभाषित प्रावधान।
❌ कथन 1 – गलत: संविधान अपने पाठ में कहीं भी अपनी 'मूल संरचना' को परिभाषित नहीं करता है। मूल संरचना सिद्धांत केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक रूप से विकसित किया गया था, जिसमें संघवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र जैसी अपरिवर्तनीय मूल विशेषताओं की पहचान की गई।
❌ कथन 2 – गलत: संविधान स्पष्ट रूप से न्यायिक समीक्षा का एक नामित शक्ति के रूप में 'प्रावधान नहीं करता'। न्यायिक समीक्षा अनुच्छेद 13, 32, 226 और अन्य प्रावधानों से व्युत्पन्न एक निहित शक्ति है, जो न्यायालयों को कानूनों और कार्यकारी कार्यों की संवैधानिकता की जांच करने में सक्षम बनाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मूल संरचना सिद्धांत और न्यायिक समीक्षा
| अवधारणा | मुख्य विवरण |
|---|---|
| मूल संरचना सिद्धांत | केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में विकसित; यह मानता है कि संविधान की कुछ मौलिक विशेषताओं को अनुच्छेद 368 के तहत संसद द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता |
| मूल तत्व | संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संघवाद, धर्मनिरपेक्षता, शक्तियों का पृथक्करण, संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य |
| न्यायिक समीक्षा | विधायी अधिनियमों और कार्यकारी आदेशों की संवैधानिक वैधता की जांच करने की न्यायालयों की शक्ति |
| संवैधानिक आधार | अनुच्छेद 13 (मौलिक अधिकारों के साथ असंगत कानून शून्य), 32 (SC अधिकार क्षेत्र), 226 (HC अधिकार क्षेत्र), 131-136, 143, 246 |
| प्रकार | संवैधानिक संशोधनों, विधायी कार्यों और कार्यकारी कार्यों की न्यायिक समीक्षा |
निम्नलिखित में से कौन सी मौलिक अधिकार श्रेणी में अस्पृश्यता के विरुद्ध संरक्षण को भेदभाव के एक रूप के रूप में शामिल किया गया है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — समता का अधिकार
समता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18) में अनुच्छेद 17 शामिल है, जो विशेष रूप से अस्पृश्यता को समाप्त करता है और इसके अभ्यास को किसी भी रूप में प्रतिबंधित करता है। अस्पृश्यता मूल रूप से सामाजिक भेदभाव का एक रूप है जो संविधान के तहत सभी नागरिकों को गारंटीकृत समानता के मूल सिद्धांत का उल्लंघन करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: समता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
| अनुच्छेद | प्रावधान |
|---|---|
| अनुच्छेद 14 | विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण |
| अनुच्छेद 15 | धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का प्रतिषेध |
| अनुच्छेद 16 | लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता |
| अनुच्छेद 17 | अस्पृश्यता का उन्मूलन और इसके अभ्यास का किसी भी रूप में प्रतिषेध |
| अनुच्छेद 18 | उपाधियों का उन्मूलन (सैन्य और शैक्षणिक उपाधियों को छोड़कर) |
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भारतीय संविधान का कौन सा भाग कल्याणकारी राज्य के आदर्श की घोषणा करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — राज्य के नीति निदेशक तत्व
राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP) भारतीय संविधान में कल्याणकारी राज्य के आदर्श की घोषणा करते हैं। अनुच्छेद 38(1) यह अनिवार्य करता है कि राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना और संरक्षण करके लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को सूचित करेगा। ये सिद्धांत राज्य को सामाजिक-आर्थिक कल्याण के उद्देश्य से नीतियां स्थापित करने में मार्गदर्शन करते हैं, जिससे ये कल्याणकारी राज्य की अवधारणा की संवैधानिक नींव बनते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कल्याणकारी राज्य और संवैधानिक प्रावधान
- राज्य के नीति निदेशक तत्व (भाग IV): न्यायसंगत समाज और कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए राज्य हेतु गैर-न्यायोचित दिशानिर्देश
- अनुच्छेद 38: राज्य न्याय (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक) के साथ लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक व्यवस्था सुरक्षित करेगा
- अनुच्छेद 39: राज्य को आजीविका के पर्याप्त साधन सुनिश्चित करने, समान कार्य के लिए समान वेतन और संपत्ति के संकेंद्रण को रोकने का निर्देश
- अनुच्छेद 41: बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और अपंगता के मामलों में काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता का अधिकार
- अनुच्छेद 42: काम की न्यायसंगत और मानवीय स्थितियों और मातृत्व राहत का प्रावधान
- अनुच्छेद 43: जीवन निर्वाह मजदूरी और जीवन के सभ्य स्तर को सुनिश्चित करने वाली कार्य स्थितियां
- कल्याणकारी राज्य की अवधारणा: राज्य नागरिकों के सामाजिक और आर्थिक कल्याण को बढ़ावा देने, संसाधनों और अवसरों के समान वितरण को सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करता है
- मौलिक अधिकारों से तुलना: जहां मौलिक अधिकार न्यायोचित व्यक्तिगत अधिकार हैं, वहीं DPSP कल्याणकारी उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य नीति के कार्यक्रमात्मक लक्ष्य हैं
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| नदी | में गिरती है |
|---|---|
| 1. मेकांग | अंडमान सागर |
| 2. टेम्स | आयरिश सागर |
| 3. वोल्गा | कैस्पियन सागर |
| 4. जाम्बेजी | हिंद महासागर |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 3 और 4
यह प्रश्न प्रमुख विश्व नदियों और उनकी जल निकासी प्रणालियों के ज्ञान का परीक्षण करता है। चार युग्मों में से केवल युग्म 3 और 4 सही सुमेलित हैं, जबकि युग्म 1 और 2 में उन जलाशयों के संदर्भ में त्रुटियाँ हैं जिनमें ये नदियाँ गिरती हैं।
❌ युग्म 1 – गलत: मेकांग नदी अंडमान सागर में नहीं, बल्कि दक्षिण चीन सागर में गिरती है। यह तिब्बती पठार से निकलती है और चीन, म्यांमार, लाओस, थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम से होकर गुजरती है।
❌ युग्म 2 – गलत: टेम्स नदी आयरिश सागर में नहीं, बल्कि उत्तरी सागर में गिरती है। यह पूरी तरह से इंग्लैंड के भीतर बहती है।
✅ युग्म 3 – सही: वोल्गा नदी, यूरोप की सबसे लंबी नदी, रूस से निकलती है और सही रूप से कैस्पियन सागर में गिरती है।
✅ युग्म 4 – सही: जाम्बेजी नदी जाम्बिया से निकलती है और कई देशों से होकर मोजाम्बिक के माध्यम से हिंद महासागर में गिरती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख विश्व नदियाँ और उनकी जल निकासी
| नदी | क्षेत्र/देश | में गिरती है | विशेष विशेषताएँ |
|---|---|---|---|
| मेकांग | तिब्बत, चीन, म्यांमार, लाओस, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम | दक्षिण चीन सागर | एशिया की 7वीं सबसे लंबी नदी; दक्षिण पूर्व एशियाई मत्स्य पालन के लिए महत्वपूर्ण |
| टेम्स | इंग्लैंड, यूके | उत्तरी सागर | लंदन से होकर बहती है; ब्रिटिश व्यापार के लिए ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण |
| वोल्गा | रूस | कैस्पियन सागर | यूरोप की सबसे लंबी नदी (3,530 किमी); प्रमुख परिवहन मार्ग |
| जाम्बेजी | जाम्बिया, अंगोला, नामीबिया, बोत्सवाना, जिम्बाब्वे, मोजाम्बिक | हिंद महासागर | अफ्रीका की 4थी सबसे लंबी; इस नदी पर विक्टोरिया जलप्रपात स्थित है |
| अमेज़न | पेरू, ब्राजील, कोलंबिया | अटलांटिक महासागर | निर्वहन मात्रा के हिसाब से विश्व की सबसे बड़ी नदी |
| नील | युगांडा, सूडान, मिस्र | भूमध्य सागर | विश्व की सबसे लंबी नदी (अमेज़न के साथ विवादित) |
भारत में गन्ना की खेती की वर्तमान प्रवृत्तियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- जब 'बड चिप सेटलिंग्स' को नर्सरी में तैयार करके मुख्य खेत में प्रत्यारोपित किया जाता है तो बीज सामग्री में पर्याप्त बचत होती है।
- जब सेटों की सीधी बुवाई की जाती है, तो एकल कलिका वाले सेटों की तुलना में कई कलिकाओं वाले सेटों का अंकुरण प्रतिशत बेहतर होता है।
- यदि सेटों की सीधी बुवाई के समय प्रतिकूल मौसम की स्थिति होती है, तो एकल कलिका वाले सेटों की जीवित रहने की क्षमता बड़े सेटों की तुलना में बेहतर होती है।
- ऊतक संवर्धन से तैयार की गई सेटलिंग्स का उपयोग करके गन्ने की खेती की जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 4
यह प्रश्न भारत में गन्ने की आधुनिक खेती तकनीकों के ज्ञान की परीक्षा करता है। कथन 1 और 4 गन्ने के प्रसारण की लागत-प्रभावी और वैज्ञानिक रूप से उन्नत विधियों का सही वर्णन करते हैं, जबकि कथन 2 और 3 एकल कलिका वाले सेटों के प्रदर्शन को गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं।
✅ कथन 1 – सही: बड चिप विधि में प्रत्यारोपण से पहले व्यक्तिगत कलिकाओं से नर्सरी में सेटलिंग्स तैयार की जाती हैं, जिससे पारंपरिक सेट रोपण की तुलना में बीज सामग्री में पर्याप्त बचत (75-80% तक की कमी) होती है।
❌ कथन 2 – गलत: बहु-कलिका वाले सेटों का अंकुरण प्रतिशत एकल कलिका वाले सेटों की तुलना में बेहतर होता है क्योंकि कई कलिकाएं सफल प्ररोह निकलने की संभावना बढ़ाती हैं, यदि एक कलिका विफल हो जाए तो अन्य के माध्यम से अतिरेक प्रदान करती हैं।
❌ कथन 3 – गलत: प्रतिकूल मौसम की स्थिति में, बड़े बहु-कलिका वाले सेटों की जीवित रहने की दर बेहतर होती है क्योंकि उनमें अधिक संचित पोषक तत्व और नमी भंडार होते हैं, जो उन्हें एकल कलिका वाले सेटों की तुलना में अधिक सहनशील बनाते हैं जो तनाव के प्रति संवेदनशील होते हैं।
✅ कथन 4 – सही: ऊतक संवर्धन प्रौद्योगिकी का सफलतापूर्वक गन्ने की खेती में उपयोग किया जाता है ताकि रोग-मुक्त, आनुवंशिक रूप से समान सेटलिंग्स तैयार की जा सकें जो उच्च उपज सुनिश्चित करती हैं और अभिजात किस्मों के तीव्र गुणन को संभव बनाती हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: आधुनिक गन्ना खेती विधियाँ
| विधि | प्रमुख विशेषताएं | लाभ |
|---|---|---|
| बड चिप विधि | नर्सरी में एकल कलिकाएं तैयार की जाती हैं, फिर प्रत्यारोपित की जाती हैं | बीज सामग्री में 75-80% की कमी; लागत-प्रभावी; बेहतर रोग नियंत्रण |
| ऊतक संवर्धन | रोग-मुक्त पौधों का इन-विट्रो प्रसारण | तीव्र गुणन; आनुवंशिक एकरूपता; रोग-मुक्त रोपण सामग्री |
| पारंपरिक सेट विधि | 3-कलिका वाले सेटों को सीधे खेत में लगाया जाता है | तनाव के तहत बेहतर अंकुरण और जीवित रहना; पारंपरिक और सरल |
| एकल कलिका वाले सेट | व्यक्तिगत कलिकाओं को सीधे लगाया जाता है | कुछ बीज की बचत लेकिन बहु-कलिका वाले सेटों की तुलना में कम अंकुरण और जीवित रहना |
- बीज सामग्री की आवश्यकता: पारंपरिक विधि में 6-10 टन/हेक्टेयर की आवश्यकता होती है; बड चिप विधि इसे 1.5-2 टन/हेक्टेयर तक कम कर देती है
- अंकुरण कारक: बहु-कलिका वाले सेट अतिरेक प्रदान करते हैं—यदि एक कलिका विफल हो जाए तो अन्य अंकुरित हो सकती हैं
- तनाव सहनशीलता: अधिक कलिकाओं वाले बड़े सेट अधिक पोषक तत्वों और नमी का भंडारण करते हैं, सूखे या कीट हमले के तहत बेहतर जीवित रहना सुनिश्चित करते हैं
- भारतीय संदर्भ: भारत विश्व में दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक है; लागत कम करने और उत्पादकता बढ़ाने के लिए बड चिप और ऊतक संवर्धन जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाने को बढ़ावा दिया जा रहा है
महासागर औसत तापमान (OMT) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- OMT को 26°C समताप रेखा की गहराई तक मापा जाता है जो जनवरी-मार्च के दौरान दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर में 129 मीटर है।
- जनवरी-मार्च के दौरान एकत्रित OMT का उपयोग यह आकलन करने में किया जा सकता है कि मानसून में वर्षा की मात्रा किसी निश्चित दीर्घकालिक औसत से कम होगी या अधिक।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
महासागर औसत तापमान (OMT) को 26°C समताप रेखा की गहराई तक मापा जाता है और यह मानसून पूर्वानुमान के लिए ऊपरी महासागर ऊष्मा सामग्री का एक विश्वसनीय संकेतक है। कथन 1 गलत है क्योंकि जनवरी-मार्च के दौरान दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर में 26°C समताप रेखा की गहराई लगभग 59 मीटर है, 129 मीटर नहीं। कथन 2 सही है क्योंकि जनवरी-मार्च के दौरान एकत्रित OMT डेटा का उपयोग वास्तव में यह आकलन करने के लिए किया जा सकता है कि भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा (ISMR) दीर्घकालिक औसत से अधिक होगी या कम।
❌ कथन 1 – गलत: दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर में जनवरी-मार्च के दौरान 26°C समताप रेखा की गहराई लगभग 59 मीटर है, 129 मीटर नहीं।
✅ कथन 2 – सही: जनवरी-मार्च के दौरान एकत्रित OMT का उपयोग यह भविष्यवाणी करने के लिए किया जाता है कि ISMR दीर्घकालिक औसत से अधिक होगी या कम, जो इसे एक मूल्यवान पूर्वानुमान उपकरण बनाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: महासागर औसत तापमान (OMT)
- परिभाषा: OMT सतह से लेकर 26°C समताप रेखा (D26) की गहराई तक महासागरीय जल स्तंभ का औसत तापमान है।
- महत्व: OMT अकेले समुद्र सतह तापमान (SST) की तुलना में ऊपरी महासागर ऊष्मा सामग्री का अधिक स्थिर और विश्वसनीय संकेतक है।
- मानसून पूर्वानुमान: भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के शोध से पता चलता है कि दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर में जनवरी-मार्च से OMT डेटा अधिक सटीकता के साथ भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा की भविष्यवाणी कर सकता है।
- गहराई माप: 26°C समताप रेखा की गहराई स्थानिक और अस्थायी रूप से भिन्न होती है; जनवरी-मार्च के दौरान दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर में यह लगभग 59 मीटर है।
- SST पर लाभ: SST के विपरीत जो सतही प्रक्रियाओं के कारण तेजी से उतार-चढ़ाव कर सकता है, OMT ऊपरी महासागर परत की एकीकृत ऊष्मा सामग्री का प्रतिनिधित्व करता है।
- भविष्यवाणी मूल्य: उच्च OMT मान आम तौर पर भारत में सामान्य से अधिक मानसून वर्षा के लिए अनुकूल परिस्थितियों का संकेत देते हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- जेट धाराएं केवल उत्तरी गोलार्ध में पाई जाती हैं।
- केवल कुछ चक्रवातों में ही आँख का विकास होता है।
- चक्रवात की आँख के अंदर का तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में लगभग 10°C कम होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 2
केवल कथन 2 सही है। जेट धाराएं दोनों गोलार्द्धों में पाई जाती हैं, न कि केवल उत्तरी गोलार्ध में। चक्रवात की आँख अवतलन वायु से उष्मोत्पादन के कारण अपने आसपास की तुलना में गर्म होती है, ठंडी नहीं। केवल शक्तिशाली उष्णकटिबंधीय चक्रवात ही सुस्पष्ट आँख संरचना का विकास करते हैं।
❌ कथन 1 – गलत: जेट धाराएं उत्तरी और दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में उच्च ऊंचाई (10-15 किमी) पर पाई जाती हैं, न कि केवल उत्तरी गोलार्ध में।
✅ कथन 2 – सही: केवल कुछ चक्रवात, विशेषकर तीव्र उष्णकटिबंधीय चक्रवात (हरिकेन/टाइफून), अपने केंद्र में सुस्पष्ट आँख का विकास करते हैं।
❌ कथन 3 – गलत: चक्रवात की आँख अवतलन वायु से रुद्धोष्म ऊष्मण के कारण आसपास की तुलना में गर्म (2-10°C अधिक) होती है, ठंडी नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: उष्णकटिबंधीय चक्रवात और जेट धाराएं
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| जेट धाराएं | 10-15 किमी की ऊंचाई पर तीव्र गति से चलने वाली वायु धाराएं; दोनों गोलार्द्धों में पाई जाती हैं; क्षोभमंडल और समतापमंडल के बीच की सीमा पर स्थित; मौसम पैटर्न को प्रभावित करती हैं |
| चक्रवात की आँख | शांत, निम्न दाब केंद्र जो केवल तीव्र चक्रवातों में पाया जाता है; स्वच्छ आकाश, हल्की हवाओं और गर्म तापमान द्वारा विशेषित |
| आँख का तापमान | अवतलन वायु के संपीडित होने और रुद्धोष्म रूप से गर्म होने के कारण आसपास की तुलना में 2-10°C अधिक गर्म |
| आँख की दीवार | आँख के चारों ओर गर्जन-तूफान का वलय; सबसे तेज हवाओं और सबसे भारी वर्षा को समाहित करती है |
| चक्रवात निर्माण | समुद्र की सतह का तापमान >27°C, कोरिओलिस बल, कम पवन अपरूपण और वायुमंडलीय अस्थिरता की आवश्यकता होती है |
सियाचिन ग्लेशियर कहाँ स्थित है
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — नुब्रा घाटी के उत्तर में
सियाचिन ग्लेशियर हिमालय की पूर्वी काराकोरम श्रृंखला में स्थित है, जो लद्दाख में नुब्रा घाटी के उत्तर में स्थित है। यह विश्व का सबसे ऊँचा युद्धक्षेत्र है, जहाँ भारत 5,400 मीटर से अधिक की ऊँचाई पर सैन्य उपस्थिति बनाए रखता है।
✅ विकल्प 4 – सही: सियाचिन ग्लेशियर पूर्वी काराकोरम श्रृंखला में नुब्रा घाटी के सीधे उत्तर में स्थित है।
❌ विकल्प 1 – गलत: अक्साई चिन लद्दाख के पूर्व में स्थित है, जबकि सियाचिन इसके उत्तर-पश्चिम में है।
❌ विकल्प 2 – गलत: लेह सियाचिन ग्लेशियर के दक्षिण में स्थित है, न कि इसके पश्चिम में।
❌ विकल्प 3 – गलत: गिलगित, गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में है, सियाचिन ग्लेशियर के पश्चिम में, न कि इसके दक्षिण में।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सियाचिन ग्लेशियर और आसपास का भूगोल
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| स्थान | पूर्वी काराकोरम श्रृंखला, उत्तरी लद्दाख |
| लंबाई | लगभग 76 किमी (गैर-ध्रुवीय क्षेत्रों में दूसरा सबसे लंबा ग्लेशियर) |
| ऊँचाई | 5,400 मीटर से 7,000 मीटर से अधिक तक |
| रणनीतिक महत्व | विश्व का सबसे ऊँचा युद्धक्षेत्र; ऑपरेशन मेघदूत (1984) के बाद से भारत द्वारा नियंत्रित |
| आसपास के क्षेत्र | नुब्रा घाटी के उत्तर में, गिलगित-बाल्टिस्तान के पूर्व में, अक्साई चिन के उत्तर-पश्चिम में, लेह के उत्तर में |
| नदी स्रोत | नुब्रा नदी का उद्गम सियाचिन ग्लेशियर से होता है |
निम्नलिखित खनिजों पर विचार कीजिए:
- बेंटोनाइट
- क्रोमाइट
- काइनाइट
- सिलिमेनाइट
भारत में, उपर्युक्त में से किसे/किन्हें आधिकारिक रूप से प्रमुख खनिज के रूप में नामित किया गया है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — केवल 2, 3 और 4
भारत में, प्रमुख खनिज वे हैं जो खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट हैं। बेंटोनाइट को लघु खनिज के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जबकि क्रोमाइट, काइनाइट और सिलिमेनाइट सभी प्रमुख खनिज हैं।
1. बेंटोनाइट – लघु खनिज: बेंटोनाइट एक मृत्तिका खनिज है जिसका उपयोग ड्रिलिंग मड, फाउंड्री रेत और सिविल इंजीनियरिंग अनुप्रयोगों में किया जाता है। यह लघु खनिजों के अंतर्गत सूचीबद्ध है।
2. क्रोमाइट – प्रमुख खनिज ✅: क्रोमाइट क्रोमियम का एकमात्र अयस्क है और स्टेनलेस स्टील तथा विभिन्न मिश्र धातुओं के निर्माण के लिए आवश्यक है। यह एक प्रमुख खनिज है।
3. काइनाइट – प्रमुख खनिज ✅: काइनाइट एक दुर्दम्य खनिज है जिसका उपयोग सिरेमिक और उच्च तापमान औद्योगिक अनुप्रयोगों में किया जाता है। इसे प्रमुख खनिज के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
4. सिलिमेनाइट – प्रमुख खनिज ✅: सिलिमेनाइट एक अन्य दुर्दम्य खनिज है जिसके धातुकर्म और औद्योगिक भट्टियों में अनुप्रयोग हैं। यह एक प्रमुख खनिज है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में प्रमुख बनाम लघु खनिज
| पहलू | प्रमुख खनिज | लघु खनिज |
|---|---|---|
| कानूनी ढांचा | MMDR अधिनियम, 1957 की प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट | MMDR अधिनियम, 1957 की द्वितीय अनुसूची में निर्दिष्ट |
| नियामक प्राधिकरण | केंद्र सरकार | राज्य सरकार |
| उदाहरण | क्रोमाइट, काइनाइट, सिलिमेनाइट, कोयला, लौह अयस्क, मैंगनीज, सोना, हीरा | बेंटोनाइट, चूना पत्थर (सीमेंट को छोड़कर), निर्माण पत्थर, बजरी, रेत, मिट्टी |
| रणनीतिक महत्व | उच्च आर्थिक और औद्योगिक महत्व | स्थानीय महत्व, निर्माण सामग्री |
| संख्या | 64 खनिज सूचीबद्ध | राज्य अधिसूचना के अनुसार भिन्न |
- दुर्दम्य खनिज: काइनाइट और सिलिमेनाइट एल्यूमीनियम सिलिकेट खनिज हैं जिनमें उच्च ऊष्मा प्रतिरोध होता है, जो दुर्दम्य (ऊष्मा-प्रतिरोधी) सामग्री के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- भारत में क्रोमाइट: भारत में महत्वपूर्ण क्रोमाइट भंडार हैं, मुख्य रूप से ओडिशा में (राष्ट्रीय भंडार का लगभग 98%)।
- MMDR संशोधन 2015: प्रमुख खनिजों के लिए नीलामी तंत्र के माध्यम से खनिज आवंटन में अधिक पारदर्शिता प्रदान की गई।
भारत में दलहन उत्पादन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- काला चना (उड़द) खरीफ और रबी दोनों फसलों के रूप में उगाया जा सकता है।
- हरा चना (मूंग) अकेले ही लगभग आधे दलहन उत्पादन के लिए जिम्मेदार है।
- पिछले तीन दशकों में, जबकि खरीफ दलहन का उत्पादन बढ़ा है, रबी दलहन का उत्पादन घटा है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
यह प्रश्न भारत में दलहन की खेती के पैटर्न और उत्पादन के रुझानों के बारे में ज्ञान की परीक्षा करता है। कथन 1 सही है क्योंकि काला चना दोनों मौसमों में उगाई जाने वाली एक बहुमुखी दलहन है, जबकि कथन 2 और 3 में उत्पादन हिस्सेदारी और रुझानों के बारे में तथ्यात्मक अशुद्धियाँ हैं।
✅ कथन 1 – सही: काला चना (उड़द दाल) वास्तव में भारत में खरीफ और रबी दोनों फसलों के रूप में उगाया जाता है, जो विभिन्न मौसमों और कृषि-जलवायु परिस्थितियों के प्रति इसकी अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है।
❌ कथन 2 – गलत: हरा चना दलहन उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा नहीं है; चना (छोला) प्रमुख दलहन है जो भारत में कुल दलहन उत्पादन का लगभग 40% योगदान देता है।
❌ कथन 3 – गलत: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और बेहतर किस्मों जैसी सरकारी पहलों के कारण पिछले तीन दशकों में खरीफ और रबी दोनों दलहन उत्पादन में वृद्धि हुई है; रबी दलहन कुल उत्पादन का 60% से अधिक योगदान देती हैं और इसमें पर्याप्त वृद्धि हुई है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में दलहन उत्पादन
| दलहन प्रकार | प्रमुख मौसम | उत्पादन में हिस्सेदारी | प्रमुख उत्पादक राज्य |
|---|---|---|---|
| चना (छोला) | रबी | ~40% | मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र |
| अरहर (तुअर) | खरीफ | ~15% | महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश |
| काला चना (उड़द) | खरीफ और रबी दोनों | ~10% | मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश |
| हरा चना (मूंग) | खरीफ और रबी दोनों | ~10% | राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक |
| मसूर (लेंटिल) | रबी | ~7% | मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल |
- मौसमी वितरण: रबी दलहन कुल दलहन उत्पादन का लगभग 60-65% हिस्सा बनाती हैं, जबकि खरीफ दलहन 35-40% योगदान देती हैं।
- वृद्धि के रुझान: 1990 के दशक से बेहतर किस्मों, बेहतर कृषि प्रथाओं और सरकारी सहायता योजनाओं के कारण खरीफ और रबी दोनों दलहन उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- भारत की स्थिति: भारत विश्व स्तर पर दलहन का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है, जो विश्व उत्पादन का लगभग 25% है।
- प्रमुख पहल: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन-दलहन (NFSM), राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY), और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ने दलहन उत्पादन को बढ़ावा दिया है।
यह फसल उपोष्णकटिबंधीय प्रकृति की है। कड़ाके की ठंड इसके लिए हानिकारक है। इसकी वृद्धि के लिए कम से कम 210 पाला-मुक्त दिन और 50 से 100 सेंटीमीटर वर्षा की आवश्यकता होती है। नमी बनाए रखने में सक्षम हल्की सुपरिष्कृत मिट्टी इस फसल की खेती के लिए आदर्श रूप से उपयुक्त है। निम्नलिखित में से कौन सी फसल है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — कपास
कपास एक उपोष्णकटिबंधीय फसल है जिसे कम से कम 210 पाला-मुक्त दिन, 50-100 सेमी वर्षा और नमी बनाए रखने में सक्षम हल्की सुपरिष्कृत मिट्टी की आवश्यकता होती है। कड़ाके की ठंड कपास के पौधों के लिए अत्यधिक हानिकारक होती है, जो उन्हें ठंडे क्षेत्रों के लिए अनुपयुक्त बनाती है। ये विशिष्ट जलवायु और मृदा आवश्यकताएं कपास को अन्य फसलों जैसे जूट (जिसे गर्म आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है), गन्ना (जिसे 150-250 सेमी की भारी वर्षा की आवश्यकता होती है), और चाय (जो उष्णकटिबंधीय से उपोष्णकटिबंधीय उच्च भूमि में उगती है) से स्पष्ट रूप से अलग करती हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख नकदी फसलें और उनकी उगाने की स्थितियाँ
| फसल | जलवायु | पाला-मुक्त दिन | वर्षा (सेमी) | मृदा प्रकार |
|---|---|---|---|---|
| कपास | उपोष्णकटिबंधीय | 210+ दिन | 50-100 | हल्की, सुपरिष्कृत, नमी बनाए रखने वाली (काली मिट्टी आदर्श) |
| जूट | उष्णकटिबंधीय (गर्म और आर्द्र) | पाला-सहिष्णु नहीं | 150-250 | डेल्टाई क्षेत्रों में जलोढ़ मिट्टी |
| गन्ना | उष्णकटिबंधीय/उपोष्णकटिबंधीय | पाला-संवेदनशील | 150-250 | गहरी, उपजाऊ दोमट मिट्टी |
| चाय | उष्णकटिबंधीय से उपोष्णकटिबंधीय (उच्च भूमि) | पाला-संवेदनशील | 150-250 | अच्छी ह्यूमस के साथ सुपरिष्कृत अम्लीय मिट्टी |
निम्नलिखित बाघ अभयारण्यों में से किसके पास "क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट" के अंतर्गत सबसे बड़ा क्षेत्र है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — नागार्जुनसागर-श्रीशैलम
नागार्जुनसागर-श्रीशैलम बाघ अभयारण्य, जो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के पांच जिलों में फैला हुआ है, दिए गए विकल्पों में सबसे बड़ा क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) है, जिसका कुल क्षेत्रफल लगभग 3,728 वर्ग किमी है। क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत अधिसूचित बाघ अभयारण्यों के मुख्य क्षेत्र हैं, जिन्हें वैज्ञानिक साक्ष्य के आधार पर बाघ संरक्षण के लिए अनुल्लंघनीय रखा जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख बाघ अभयारण्य और उनके क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट क्षेत्र
| बाघ अभयारण्य | राज्य | अनुमानित CTH क्षेत्र | उल्लेखनीय विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| नागार्जुनसागर-श्रीशैलम | आंध्र प्रदेश और तेलंगाना | ~3,728 वर्ग किमी (सबसे बड़ा) | कृष्णा और गोदावरी बेसिन में फैला; भारत का सबसे बड़ा बाघ अभयारण्य |
| कॉर्बेट | उत्तराखंड | ~1,318 वर्ग किमी | भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान (1936); सबसे पुराना बाघ अभयारण्य (1973) |
| रणथंभौर | राजस्थान | ~1,113 वर्ग किमी | दिन के समय बाघ देखने के लिए प्रसिद्ध; ऐतिहासिक रणथंभौर किला |
| सुंदरबन | पश्चिम बंगाल | ~1,330 वर्ग किमी | सबसे बड़ा मैंग्रोव वन; यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल; अद्वितीय तैराक बाघ |
- क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH): इन्हें मुख्य क्षेत्र भी कहा जाता है, ये वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 38V के तहत अधिसूचित अनुल्लंघनीय क्षेत्र हैं, जहां मानव गतिविधियां प्रतिबंधित या गंभीर रूप से सीमित हैं।
- बफर जोन: CTH के आसपास के क्षेत्र जहां संरक्षण-उन्मुख प्रबंधन के साथ सीमित मानव गतिविधि की अनुमति है।
- भारत में 18 राज्यों में लगभग 75,000 वर्ग किमी में फैले 53 बाघ अभयारण्य हैं (2023 तक)।
- प्रोजेक्ट टाइगर 1973 में 9 बाघ अभयारण्यों के साथ शुरू किया गया था; कॉर्बेट पहला था।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- कोयला राख में आर्सेनिक, सीसा और पारा होता है।
- कोयला आधारित विद्युत संयंत्र वातावरण में सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन के ऑक्साइड छोड़ते हैं।
- भारतीय कोयले में उच्च राख सामग्री देखी जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
कोयला दहन और भारतीय कोयले की विशेषताओं के बारे में तीनों कथन सही हैं। कोयला राख में भारी धातुएँ होती हैं, कोयला आधारित विद्युत संयंत्र सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड छोड़ते हैं, और भारतीय कोयले की विशेषता उच्च राख सामग्री है।
✅ कथन 1 – सही: कोयला राख, कोयला दहन का एक उप-उत्पाद है, जिसमें आर्सेनिक, सीसा और पारा सहित विषाक्त भारी धातुएँ होती हैं, जो जल निकायों में रिस सकती हैं और मिट्टी को दूषित कर सकती हैं, जिससे पर्यावरणीय और स्वास्थ्य खतरे उत्पन्न होते हैं।
✅ कथन 2 – सही: कोयला आधारित विद्युत संयंत्र दहन के दौरान सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ) छोड़ते हैं, जो अम्लीय वर्षा, श्वसन संबंधी समस्याओं, धुंध निर्माण और समग्र वायु प्रदूषण में योगदान करते हैं।
✅ कथन 3 – सही: भारतीय कोयला, विशेष रूप से पूर्वी और मध्य क्षेत्रों से, उच्च राख सामग्री (30-50%) वाला है, जो इसके ऊष्मीय मान को कम करता है, प्रदूषण स्तर बढ़ाता है, और ताप विद्युत संयंत्रों में बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश उत्पन्न करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कोयला दहन और पर्यावरणीय प्रभाव
- कोयला राख की संरचना: इसमें भारी धातुएँ (आर्सेनिक, सीसा, पारा, क्रोमियम, कैडमियम) होती हैं जो विषाक्त और कार्सिनोजेनिक हैं; अनुचित निपटान से भूजल और मिट्टी दूषित हो सकती है।
- कोयला संयंत्रों से वायु प्रदूषक: SO₂ (अम्लीय वर्षा का कारण), NOₓ (भू-स्तरीय ओजोन और धुंध बनाता है), कणीय पदार्थ (PM2.5, PM10), CO₂ (ग्रीनहाउस गैस), और पारा उत्सर्जन छोड़ते हैं।
- भारतीय कोयले की विशेषताएँ: उच्च राख सामग्री (आयातित कोयले में 10-15% की तुलना में 30-50%), कम ऊष्मीय मान (3000-4000 किलो कैलोरी/किलोग्राम), और उच्च नमी सामग्री।
- फ्लाई ऐश का उपयोग: भारत सालाना 200 मिलियन टन से अधिक फ्लाई ऐश उत्पन्न करता है; सीमेंट निर्माण, ईंट बनाने, सड़क निर्माण और भूमि भराव में उपयोग किया जाता है।
- पर्यावरणीय नियम: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय 100% फ्लाई ऐश उपयोग अनिवार्य करता है; ताप विद्युत संयंत्रों को इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रिसिपिटेटर और FGD (फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन) सिस्टम बनाए रखने चाहिए।
भारत के डेजर्ट नेशनल पार्क के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन से कथन सही हैं?
- यह दो जिलों में फैला हुआ है।
- पार्क के अंदर कोई मानव आवास नहीं है।
- यह ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के प्राकृतिक आवासों में से एक है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
डेजर्ट नेशनल पार्क भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है, जो राजस्थान के जैसलमेर और बाड़मेर जिलों में फैला हुआ है और थार मरुस्थल पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतिनिधित्व करता है। यह गंभीर रूप से संकटग्रस्त ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का एक महत्वपूर्ण आवास है, हालांकि पार्क की सीमाओं के भीतर मानव बस्तियां मौजूद हैं।
✅ कथन 1 – सही: यह पार्क राजस्थान के जैसलमेर और बाड़मेर जिलों में फैला हुआ है, जो लगभग 3,162 किमी² में विस्तृत है।
❌ कथन 2 – गलत: पार्क के भीतर मानव आवास मौजूद है; पशुधन पालन में लगे कई गाँव और समुदाय अंदर स्थित हैं।
✅ कथन 3 – सही: यह गंभीर रूप से संकटग्रस्त ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Ardeotis nigriceps) के अंतिम शेष प्राकृतिक आवासों में से एक है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: डेजर्ट नेशनल पार्क
- स्थान: जैसलमेर और बाड़मेर जिले, राजस्थान
- क्षेत्रफल: लगभग 3,162 किमी², भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय उद्यानों में से एक
- पारिस्थितिकी तंत्र: रेत के टीलों (20%), चट्टानी इलाकों, नमक झील के तल और विरल वनस्पति के साथ थार मरुस्थल पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतिनिधित्व करता है
- प्रमुख वन्यजीव: ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गंभीर रूप से संकटग्रस्त), चिंकारा, डेजर्ट फॉक्स, डेजर्ट कैट, भेड़िया
- मानव उपस्थिति: सख्त संरक्षित क्षेत्रों के विपरीत, पार्क के भीतर गाँव और चरवाहा समुदाय मौजूद हैं
- संरक्षण महत्व: ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का अंतिम गढ़; बंदी प्रजनन कार्यक्रम जारी हैं
- पक्षी विविधता: प्रवासी और स्थानीय प्रजातियों सहित 140 से अधिक पक्षी प्रजातियां दर्ज की गई हैं
भारत की जैव विविधता के संदर्भ में, सीलोन फ्रॉगमाउथ, कॉपरस्मिथ बार्बेट, ग्रे-चिन्ड मिनिवेट और व्हाइट-थ्रोटेड रेडस्टार्ट हैं
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — पक्षी
उल्लिखित सभी चार प्रजातियाँ—सीलोन फ्रॉगमाउथ, कॉपरस्मिथ बार्बेट, ग्रे-चिन्ड मिनिवेट और व्हाइट-थ्रोटेड रेडस्टार्ट—भारत और पड़ोसी क्षेत्रों में पाए जाने वाले पक्षी हैं। सीलोन फ्रॉगमाउथ पश्चिमी घाट का एक निशाचर पक्षी है, कॉपरस्मिथ बार्बेट का नाम इसकी धातु जैसी आवाज़ के कारण पड़ा है, ग्रे-चिन्ड मिनिवेट अपने रंगीन पंखों के लिए जाना जाता है, और व्हाइट-थ्रोटेड रेडस्टार्ट अपनी विशिष्ट लाल पूंछ के लिए जाना जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारतीय पक्षी प्रजातियाँ
- सीलोन फ्रॉगमाउथ (Batrachostomus moniliger): पश्चिमी घाट और श्रीलंका का एक निशाचर पक्षी; अपने चौड़े मुँह और छलावरण वाले पंखों के कारण मेंढक जैसा दिखता है; घने उष्णकटिबंधीय वनों में निवास करता है।
- कॉपरस्मिथ बार्बेट (Psilopogon haemacephalus): भारतीय उपमहाद्वीप में स्थायी रूप से रहने वाला पक्षी; इसका नाम इसकी बार-बार की जाने वाली धातु जैसी 'टुक-टुक-टुक' आवाज़ से पड़ा है जो तांबे के कारीगर के हथौड़े की आवाज़ जैसी होती है; इसमें लाल माथा और गला तथा हरा शरीर होता है।
- ग्रे-चिन्ड मिनिवेट (Pericrocotus solaris): हिमालय और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है; नर नारंगी-लाल पंखों और मादाएँ पीले रंग के साथ यौन द्विरूपता प्रदर्शित करते हैं; उपोष्णकटिबंधीय और समशीतोष्ण वनों में निवास करता है।
- व्हाइट-थ्रोटेड रेडस्टार्ट (Phoenicurus schisticeps): हिमालय, नेपाल, भूटान और चीन के कुछ हिस्सों में पाया जाने वाला एक छोटा गौरैया पक्षी; नर में सफेद गले और चमकदार लाल-भूरी पूंछ के साथ काला पंख होता है; उच्च-ऊंचाई वाले झाड़ीदार और चट्टानी क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है।
- जैव विविधता का महत्व: ये प्रजातियाँ विभिन्न पारिस्थितिक क्षेत्रों—उष्णकटिबंधीय वनों से लेकर उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक—में भारत की समृद्ध पक्षी विविधता का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो आवास संरक्षण के महत्व को रेखांकित करती हैं।
कृषि में बायोचार का उपयोग क्या है?
- बायोचार को ऊर्ध्वाधर कृषि (वर्टिकल फार्मिंग) में उगाने के माध्यम के एक भाग के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
- जब बायोचार उगाने के माध्यम का एक हिस्सा होता है, तो यह नाइट्रोजन-स्थिरीकरण सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को बढ़ावा देता है।
- जब बायोचार उगाने के माध्यम का एक हिस्सा होता है, तो यह उगाने के माध्यम को लंबे समय तक पानी बनाए रखने में सक्षम बनाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
बायोचार एक कार्बन-समृद्ध, छिद्रयुक्त पदार्थ है जो बायोमास के पायरोलिसिस द्वारा उत्पादित होता है। यह मृदा संरचना में सुधार, लाभकारी सूक्ष्मजीवों का समर्थन करने और जल धारण क्षमता बढ़ाने के द्वारा कृषि में कई कार्य करता है। सभी तीन कथन बायोचार के कृषि उपयोगों का सही वर्णन करते हैं।
✅ कथन 1 – सही: बायोचार को ऊर्ध्वाधर कृषि प्रणालियों में उगाने के माध्यम के एक घटक के रूप में उपयोग किया जा सकता है, जहां यह सब्सट्रेट संरचना और पोषक तत्व धारण में सुधार करता है।
✅ कथन 2 – सही: बायोचार की छिद्रयुक्त संरचना और रासायनिक गुण नाइट्रोजन-स्थिरीकरण सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनाते हैं, जो मृदा में जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण को बढ़ाते हैं।
✅ कथन 3 – सही: अपनी उच्च छिद्रता और बड़े सतह क्षेत्र के कारण, बायोचार महत्वपूर्ण मात्रा में पानी को अवशोषित और धारण कर सकता है, जिसे विस्तारित अवधि तक पौधों के लिए उपलब्ध कराया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कृषि में बायोचार
- परिभाषा: बायोचार एक स्थिर, कार्बन-समृद्ध ठोस पदार्थ है जो बायोमास के पायरोलिसिस (ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में थर्मल अपघटन) से प्राप्त होता है।
- मृदा संशोधन: मृदा संरचना, छिद्रता और धनायन विनिमय क्षमता (CEC) में सुधार करता है, जिससे पोषक तत्व धारण बेहतर होता है।
- जल धारण: इसकी छिद्रयुक्त प्रकृति अपने वजन का 2-5 गुना पानी धारण कर सकती है, जिससे सिंचाई आवश्यकताएं कम होती हैं।
- सूक्ष्मजैविक आवास: लाभकारी मृदा सूक्ष्मजीवों, जिनमें नाइट्रोजन-स्थिरीकरण बैक्टीरिया शामिल हैं, के लिए सतह क्षेत्र और सूक्ष्म-आवास प्रदान करता है।
- कार्बन पृथक्करण: सैकड़ों से हजारों वर्षों तक मृदा में कार्बन संग्रहीत करता है, जो जलवायु परिवर्तन शमन में योगदान देता है।
- पोषक तत्व प्रबंधन: पोषक तत्व निक्षालन को कम करता है, उर्वरक दक्षता में सुधार करता है, और प्रदूषकों को अवशोषित कर सकता है।
- अनुप्रयोग: पारंपरिक कृषि, ऊर्ध्वाधर कृषि, कंटेनर बागवानी और मृदा उपचार परियोजनाओं में उपयोग किया जाता है।
ग्रामीण सड़क निर्माण में, पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने या कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए निम्नलिखित में से किसका उपयोग पसंद किया जाता है?
- कॉपर स्लैग
- कोल्ड मिक्स डामर प्रौद्योगिकी
- जियोटेक्सटाइल
- हॉट मिक्स डामर प्रौद्योगिकी
- पोर्टलैंड सीमेंट
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1, 2 और 3
ग्रामीण सड़क निर्माण में पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने और कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए, कॉपर स्लैग (एक उप-उत्पाद जो प्राकृतिक संसाधन मांग को कम करता है), कोल्ड मिक्स डामर (कम तापमान प्रसंस्करण के साथ कम उत्सर्जन), और जियोटेक्सटाइल (खुदाई और संसाधन उपयोग को कम करने वाली सिंथेटिक सामग्री) को प्राथमिकता दी जाती है। हॉट मिक्स डामर को उच्च ऊर्जा खपत की आवश्यकता होती है, और पोर्टलैंड सीमेंट उत्पादन कार्बन-गहन है, जिससे ये कम पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ विकल्प बन जाते हैं।
✅ कथन 1 – सही: कॉपर स्लैग, तांबा शोधन का उप-उत्पाद, कंक्रीट में रेत को प्रतिस्थापित कर सकता है, रेत खनन और पर्यावरणीय प्रभाव को कम करता है।
✅ कथन 2 – सही: कोल्ड मिक्स डामर प्रौद्योगिकी कम तापमान पर संचालित होती है, हॉट मिक्स की तुलना में कम ऊर्जा की खपत करती है और कम ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती है।
✅ कथन 3 – सही: जियोटेक्सटाइल मिट्टी का स्थिरीकरण और जल निकासी प्रदान करते हैं जबकि अत्यधिक खुदाई और प्राकृतिक संसाधन खपत की आवश्यकता को कम करते हैं।
❌ कथन 4 – गलत: हॉट मिक्स डामर प्रौद्योगिकी को उच्च तापमान की आवश्यकता होती है और इस प्रकार उच्च ऊर्जा खपत होती है, जिससे यह कम पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ है।
❌ कथन 5 – गलत: पोर्टलैंड सीमेंट उत्पादन अत्यधिक ऊर्जा-गहन है और महत्वपूर्ण CO₂ उत्सर्जित करता है, जो कार्बन फुटप्रिंट में काफी योगदान देता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सतत सड़क निर्माण सामग्री
| सामग्री/प्रौद्योगिकी | पर्यावरणीय लाभ | कार्बन फुटप्रिंट प्रभाव |
|---|---|---|
| कॉपर स्लैग | उप-उत्पाद उपयोग; रेत खनन कम करता है; अपशिष्ट पुनर्चक्रण | कम - औद्योगिक अपशिष्ट को मोड़ता है |
| कोल्ड मिक्स डामर | कम उत्पादन तापमान (60-100°C बनाम 150-180°C); पुनर्नवीनीकृत सामग्री की अनुमति देता है; साइट पर उत्पादित किया जा सकता है | हॉट मिक्स की तुलना में 30-50% कम |
| जियोटेक्सटाइल | खुदाई की गहराई कम करता है; मिट्टी की स्थिरता में सुधार करता है; सड़क जीवन बढ़ाता है; बजरी/पत्थर की आवश्यकता कम करता है | कम - सामग्री परिवहन और निष्कर्षण को कम करता है |
| हॉट मिक्स डामर | अच्छा प्रदर्शन लेकिन उच्च ऊर्जा मांग | उच्च - 150-180°C प्रसंस्करण की आवश्यकता |
| पोर्टलैंड सीमेंट | सीमित - ऊर्जा-गहन उत्पादन | बहुत उच्च - 0.8-0.9 किग्रा CO₂ प्रति किग्रा सीमेंट |
- हरित सड़क निर्माण: औद्योगिक उप-उत्पादों, पुनर्नवीनीकृत सामग्रियों और कम-ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के उपयोग पर ध्यान
- ग्रामीण सड़क संदर्भ: PMGSY (प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना) टिकाऊ सामग्री और स्थानीय संसाधनों के उपयोग को प्रोत्साहित करती है
- जियोटेक्सटाइल अनुप्रयोग: सड़क निर्माण में पृथक्करण, निस्पंदन, जल निकासी, सुदृढीकरण और कटाव नियंत्रण
- फ्लाई ऐश और स्लैग: अन्य औद्योगिक उप-उत्पाद जो सड़क निर्माण में टिकाऊ विकल्पों के रूप में तेजी से उपयोग किए जा रहे हैं
निम्नलिखित में से कौन से स्थान कस्तूरी मृग को इसके प्राकृतिक आवास में पाए जाने की सर्वाधिक संभावना वाले स्थान हैं?
- अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य
- गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान
- किशनपुर वन्यजीव अभयारण्य
- मानस राष्ट्रीय उद्यान
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 2
कस्तूरी मृग उच्च-ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाते हैं, आम तौर पर 2,500 मीटर से ऊपर। अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य और गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान, दोनों उत्तराखंड की हिमालयी श्रृंखलाओं में स्थित हैं, जो कस्तूरी मृग के लिए आदर्श अल्पाइन और सबअल्पाइन आवास प्रदान करते हैं। किशनपुर वन्यजीव अभयारण्य में तराई घास के मैदान हैं जो कस्तूरी मृग के लिए अनुपयुक्त हैं, जबकि असम में मानस राष्ट्रीय उद्यान एक निचली भूमि का उष्णकटिबंधीय वन पारिस्थितिकी तंत्र है जो कस्तूरी मृग की आबादी का समर्थन नहीं करता है।
✅ कथन 1 – सही: उत्तराखंड में अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य विशेष रूप से उच्च-ऊंचाई वाले हिमालयी आवास में कस्तूरी मृग संरक्षण के लिए जाना जाता है।
✅ कथन 2 – सही: उत्तराखंड में गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान एक उच्च-ऊंचाई वाला क्षेत्र है जहां कस्तूरी मृग स्वाभाविक रूप से पाए जाते हैं।
❌ कथन 3 – गलत: उत्तर प्रदेश में किशनपुर वन्यजीव अभयारण्य में तराई घास के मैदान हैं, न कि कस्तूरी मृग के लिए आवश्यक उच्च-ऊंचाई वाला आवास।
❌ कथन 4 – गलत: असम में मानस राष्ट्रीय उद्यान एक निचली भूमि का उष्णकटिबंधीय वन है जो कस्तूरी मृग के लिए अनुपयुक्त है, जिन्हें अल्पाइन आवास की आवश्यकता होती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कस्तूरी मृग
- वैज्ञानिक नाम: मोस्कस प्रजाति (हिमालयी कस्तूरी मृग - मोस्कस ल्यूकोगैस्टर)
- आवास: उच्च-ऊंचाई वाले हिमालयी वन (2,500-4,500 मीटर), अल्पाइन घास के मैदान और झाड़ी क्षेत्र
- भारत में वितरण: उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश
- संरक्षण स्थिति: संकटग्रस्त (IUCN); अनुसूची I (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972)
- मुख्य विशेषता: नर में कस्तूरी ग्रंथि (पॉड) होती है जो मूल्यवान कस्तूरी उत्पन्न करती है, जिससे अवैध शिकार होता है
- संरक्षित क्षेत्र: अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य, गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान, केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य, ग्रेट हिमालयन राष्ट्रीय उद्यान, नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान
- खतरे: आवास हानि, कस्तूरी के लिए शिकार, अल्पाइन आवासों को प्रभावित करने वाला जलवायु परिवर्तन
भारतीय हाथियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- हाथियों के समूह का नेता एक मादा होती है।
- अधिकतम गर्भधारण अवधि 22 महीने हो सकती है।
- एक हाथी सामान्यतः केवल 40 वर्ष की आयु तक ही बच्चे जन सकती है।
- भारत के राज्यों में, सर्वाधिक हाथी जनसंख्या केरल में है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 2
भारतीय हाथी मातृसत्तात्मक समाजों में रहते हैं जहां सबसे बुजुर्ग और अनुभवी मादा झुंड का नेतृत्व करती है, जबकि नर आमतौर पर एकाकी जीवन जीते हैं या कुंवारों के समूह बनाते हैं। हाथियों की गर्भधारण अवधि स्थलीय स्तनधारियों में सबसे लंबी है, जो 18 से 22 महीने तक होती है।
✅ कथन 1 – सही: हाथियों के झुंड मातृसत्तात्मक होते हैं, जिनका नेतृत्व सबसे बुजुर्ग और अनुभवी मादा (मातृसत्ताधारी) करती है, जबकि वयस्क नर आमतौर पर अकेले या कुंवारों के समूह में रहते हैं।
✅ कथन 2 – सही: हाथियों की गर्भधारण अवधि स्तनधारियों में सबसे लंबी है, जो 18 से 22 महीने तक होती है, औसतन लगभग 22 महीने।
❌ कथन 3 – गलत: मादा हाथी 40 वर्ष की आयु से अधिक भी प्रजनन कर सकती हैं, अक्सर 50 के दशक में और कभी-कभी 60 के प्रारंभ तक बच्चे जन सकती हैं, हालांकि उम्र के साथ प्रजनन क्षमता कम हो सकती है।
❌ कथन 4 – गलत: कर्नाटक में भारत में सर्वाधिक हाथी जनसंख्या है (लगभग 6,000), इसके बाद असम और केरल का स्थान है। केरल तीसरे स्थान पर है, पहले नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारतीय हाथी
- वैज्ञानिक नाम: एलिफस मैक्सिमस इंडिकस (एशियाई हाथी की उप-प्रजाति)
- संरक्षण स्थिति: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I; CITES के परिशिष्ट I; IUCN रेड लिस्ट - संकटग्रस्त
- सामाजिक संरचना: सबसे बुजुर्ग मादा के नेतृत्व में 6-12 व्यक्तियों के मातृसत्तात्मक झुंड; वयस्क नर एकाकी या अस्थायी कुंवारों के समूह बनाते हैं
- प्रजनन: गर्भधारण अवधि 18-22 महीने (स्तनधारियों में सबसे लंबी); मादाएं 10-12 वर्ष की आयु में यौन परिपक्वता प्राप्त करती हैं; 50-60 वर्ष की आयु तक प्रजनन कर सकती हैं; आमतौर पर हर 4-5 साल में एक बच्चे को जन्म देती हैं
- भारत में वितरण: कर्नाटक (सर्वाधिक जनसंख्या ~6,000), असम (~5,700), केरल (~3,000), तमिलनाडु, और उत्तर-पूर्वी राज्य
- प्रोजेक्ट एलीफेंट: 1992 में हाथियों, उनके आवासों और प्रवास गलियारों की रक्षा के लिए शुरू किया गया; 16 राज्यों में 33 हाथी रिजर्व स्थापित
- प्रमुख खतरे: आवास हानि और विखंडन, मानव-हाथी संघर्ष, हाथीदांत के लिए अवैध शिकार (हालांकि भारतीय हाथियों के दांत अफ्रीकी हाथियों की तुलना में छोटे होते हैं), रेलवे और सड़क दुर्घटनाएं
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UPSC Prelims 2020 Question Paper - FAQs & Analysis
Q1 How many total questions were asked in UPSC Prelims 2020?
Q2 What is the subject-wise question breakdown for UPSC Prelims 2020?
- भारतीय अर्थव्यवस्था: 23 questions (23%)
- पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी: 19 questions (19%)
- भारतीय राजव्यवस्था: 17 questions (17%)
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: 13 questions (13%)
- आधुनिक इतिहास: 9 questions (9%)
- प्राचीन इतिहास: 8 questions (8%)
- विश्व भूगोल: 4 questions (4%)
- अंतरराष्ट्रीय संबंध: 3 questions (3%)
- भारत का भूगोल: 2 questions (2%)
- मध्यकालीन इतिहास: 2 questions (2%)