UPSC CSE Prelims
सतत विकास Previous Year Questions (PYQs)
Showing solved Previous Year Questions for Chapter: सतत विकास
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निम्नलिखित में से कौन सा "100 मिलियन किसानों" का सही विवरण है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 1
100 Million Farmers (100MF) पहल World Economic Forum द्वारा शुरू की गई एक वैश्विक पहल है, जिसका उद्देश्य कृषि और जल प्रणालियों को नेट-ज़ीरो, प्रकृति-अनुकूल (Nature-Positive) और अधिक लचीला (Resilient) बनाना है।
✅ कथन I सही है: यह पहल नेट-ज़ीरो कार्बन, नेचर-पॉजिटिव और टिकाऊ खाद्य एवं जल प्रणालियों को बढ़ावा देती है।
✅ कथन II सही है: इसका उद्देश्य किसानों की जलवायु अनुकूलन क्षमता (Resilience) बढ़ाना और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना है।
❌ विकल्प B गलत है: यह जैविक पशुपालन (Organic Animal Husbandry) से संबंधित नेटवर्क का वर्णन करता है।
❌ विकल्प C गलत है: यह ब्लॉकचेन आधारित उर्वरक व्यापार मंच का विवरण है।
❌ विकल्प D गलत है: यह मुख्य रूप से FPOs या Agribusiness Consortiums बनाने पर केंद्रित नहीं है, बल्कि टिकाऊ कृषि परिवर्तन पर केंद्रित है।
संक्षिप्त नोट्स: 100 मिलियन फार्मर्स पहल
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World Economic Forum (WEF) द्वारा शुरू की गई।
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लक्ष्य: 2030 तक 10 करोड़ किसानों को सहयोग देना।
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Regenerative Agriculture और Climate-Smart Farming को बढ़ावा देती है।
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Net-Zero और Nature-Positive कृषि प्रणालियों पर जोर।
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मृदा स्वास्थ्य, जैव विविधता और जल संरक्षण को बढ़ावा।
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किसानों की आय और जलवायु सहनशीलता बढ़ाने का लक्ष्य।
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सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को प्रोत्साहित करती है।
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वैश्विक जलवायु और सतत विकास लक्ष्यों में योगदान देती है।
पुनर्चक्रण जलकृषि प्रणाली (Recirculating Aquaculture System) में बायोफिल्टर की भूमिका के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- बायोफिल्टर बिना खाए गए मछली चारे को हटाकर अपशिष्ट उपचार प्रदान करते हैं।
- बायोफिल्टर मछली अपशिष्ट में मौजूद अमोनिया को नाइट्रेट में परिवर्तित करते हैं।
- बायोफिल्टर पानी में मछली के लिए पोषक तत्व के रूप में फास्फोरस बढ़ाते हैं।
ऊपर दिए गए कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 - केवल दो
यह प्रश्न रीसर्क्युलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम (आरएएस) में बायोफिल्टर कार्यों की समझ का परीक्षण करता है। अपशिष्ट उपचार और अमोनिया रूपांतरण के संबंध में तीन कथनों में से दो सही हैं, जबकि फॉस्फोरस के बारे में कथन गलत है।
✅ कथन 1 - सही: बायोफिल्टर मछली के अखाद्य भोजन और कार्बनिक पदार्थों को हटाकर अपशिष्ट उपचार प्रदान करते हैं, क्योंकि बायोफिल्टर मीडिया पर लाभकारी बैक्टीरिया इन अपशिष्टों को तोड़ देते हैं।
✅ कथन 2 - सही: बायोफिल्टर मछली के कचरे से विषाक्त अमोनिया को मछली के अपशिष्ट से कम हानिकारक नाइट्रेट में परिवर्तित करते हैं। लाभकारी बैक्टीरिया (अमोनिया → नाइट्राइट → नाइट्रेट) द्वारा निष्पादित नाइट्रीकरण प्रक्रिया।
❌ कथन 3 - गलत: बायोफिल्टर पानी में फास्फोरस के स्तर को नहीं बढ़ाते हैं; उनकी प्राथमिक भूमिका अपशिष्ट निष्कासन और अमोनिया रूपांतरण है, जबकि फॉस्फोरस प्रबंधन को फ़ीड फॉर्मूलेशन और पानी की गुणवत्ता नियंत्रण के माध्यम से नियंत्रित किया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: रीसर्क्युलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम (आरएएस) और बायोफिल्टर
- आरएएस परिभाषा: टैंकों में मछली पालन की एक तकनीक जहां पानी को फ़िल्टर किया जाता है और पुन: प्रसारित किया जाता है, जिससे पानी का उपयोग और अपशिष्ट निर्वहन कम हो जाता है।
- बायोफिल्टर फ़ंक्शन: आरएएस का मुख्य घटक जो जैविक निस्पंदन और अपशिष्ट उपचार के लिए लाभकारी बैक्टीरिया की मेजबानी करता है।
- नाइट्रीकरण प्रक्रिया: दो-चरणीय जीवाणु प्रक्रिया जहां नाइट्रोसोमोनस बैक्टीरिया अमोनिया (NH₃) को नाइट्राइट (NO₂⁻) में परिवर्तित करता है, फिर नाइट्रोबैक्टर बैक्टीरिया नाइट्राइट को नाइट्रेट (NO₃⁻) में परिवर्तित करता है।
- अपशिष्ट निष्कासन: बायोफिल्टर जीवाणु अपघटन के माध्यम से न खाया हुआ चारा, मछली का मल और अन्य कार्बनिक पदार्थ सहित ठोस अपशिष्ट को हटाते हैं।
- फॉस्फोरस प्रबंधन: मछली फ़ीड निर्माण, यांत्रिक निस्पंदन और जल विनिमय के माध्यम से नियंत्रित किया जाता है, बायोफिल्टर के माध्यम से नहीं।
- आरएएस के लाभ: जल संरक्षण, पर्यावरणीय प्रभाव में कमी, रोग नियंत्रण और सीमित स्थान में गहन मछली उत्पादन।
खेती की "System of Rice Intensification" प्रणाली, जिसमें धान के खेतों की एकांतर गीला करने और सुखाने (alternate wetting and drying) की प्रथा अपनाई जाती है, के परिणामस्वरूप:
1. बीज की आवश्यकता में कमी
2. मीथेन उत्पादन में कमी
3. बिजली की खपत में कमी
नीचे दिए गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
System of Rice Intensification (SRI) एक जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धति है जो धान के खेतों की एकांतर गीला करने और सुखाने (AWD) के माध्यम से संसाधन उपयोग को अनुकूलित करती है। यह विधि बीज, जल और ऊर्जा की आवश्यकताओं को काफी कम करती है और साथ ही धान के खेतों से मीथेन उत्सर्जन को न्यूनतम करती है।
✅ कथन 1 – सही: SRI में पारंपरिक विधियों के 60-80 किग्रा/हेक्टेयर की तुलना में केवल 5-8 किग्रा/हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है, क्योंकि एकल युवा पौध को अधिक दूरी पर लगाया जाता है।
✅ कथन 2 – सही: एकांतर गीला करने और सुखाने (AWD) से निरंतर जलभराव नहीं होता, जिससे अवायवीय परिस्थितियाँ कम होती हैं जो मेथनोजेनिक बैक्टीरिया द्वारा मीथेन उत्पन्न करती हैं, जिससे उत्सर्जन में 30-40% की कमी आती है।
✅ कथन 3 – सही: SRI नियंत्रित सिंचाई के माध्यम से जल की आवश्यकता को 30-50% तक कम करता है, जिससे भूजल पंप करने के लिए आवश्यक बिजली/ईंधन की खपत सीधे कम हो जाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: System of Rice Intensification (SRI)
- उत्पत्ति: 1980 के दशक में मेडागास्कर में Fr. Henri de Laulanié द्वारा विकसित; सतत धान की खेती के लिए विश्व स्तर पर प्रचारित।
- मुख्य सिद्धांत: शीघ्र, त्वरित और स्वस्थ पौध स्थापना; कम पौध घनत्व; जैविक पदार्थ के साथ बेहतर मृदा स्थितियाँ; कम और नियंत्रित जल अनुप्रयोग।
- रोपण विधि: एकल पौध (8-12 दिन पुरानी) को 25×25 सेमी की चौड़ी दूरी पर प्रत्यारोपित किया जाता है, पारंपरिक 3-4 पौधों के गुच्छों के विपरीत।
- जल प्रबंधन: निरंतर जलभराव के बजाय एकांतर गीला करना और सुखाना (AWD); खेतों को नम रखा जाता है लेकिन जलमग्न नहीं, जिससे 25-50% पानी की बचत होती है।
- पर्यावरणीय लाभ: मीथेन उत्सर्जन में 30-40% कमी; जल प्रदूषण में कमी; ऊर्जा खपत में कमी; मृदा स्वास्थ्य और जैव विविधता में वृद्धि।
- उपज और अर्थशास्त्र: 80-90% कम बीज आवश्यकता के साथ 20-50% अधिक उपज; अनाज की गुणवत्ता और किसान की आय में सुधार के साथ इनपुट लागत कम करता है।
- चुनौतियाँ: प्रारंभ में श्रम-गहन; ज्ञान और प्रशिक्षण की आवश्यकता; सभी मृदा प्रकारों के लिए उपयुक्त नहीं; अच्छे जल नियंत्रण अवसंरचना की आवश्यकता।
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निम्नलिखित में से कौन सा "ग्रीनवाशिंग" शब्द का सर्वोत्तम वर्णन करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — यह गलत धारणा देना कि किसी कंपनी के उत्पाद पर्यावरण के अनुकूल और पर्यावरणीय रूप से सुदृढ़ हैं
ग्रीनवाशिंग एक भ्रामक विपणन प्रथा है जहां कंपनियां उपभोक्ताओं को यह झूठा प्रदर्शन करके भ्रमित करती हैं कि उनके उत्पाद, सेवाएं या संगठनात्मक प्रथाएं पर्यावरण के अनुकूल हैं जबकि वे ऐसे नहीं हैं। इसमें भ्रामक लेबल, छवियों, अस्पष्ट दावों या पर्यावरणीय लाभों के चयनात्मक प्रकटीकरण का उपयोग करना शामिल है जबकि नकारात्मक प्रभावों को छिपाया जाता है। यह शब्द तेजी से प्रासंगिक हो गया है क्योंकि टिकाऊ उत्पादों की उपभोक्ता मांग बढ़ रही है, जो कुछ कंपनियों को वास्तविक सुधार करने के बजाय अपनी पर्यावरणीय साख को बढ़ा-चढ़ाकर या मनगढ़ंत तरीके से प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: ग्रीनवाशिंग
- परिभाषा: भ्रामक विपणन जो पर्यावरणीय जिम्मेदारी या स्थिरता की झूठी छवि बनाता है
- सामान्य रणनीतियां: अस्पष्ट दावे ("पर्यावरण के अनुकूल", "प्राकृतिक"), भ्रामक लेबल, अप्रासंगिक दावे, छिपे हुए समझौते, झूठे प्रमाणपत्र और हरित छवियों का उपयोग
- उदाहरण: विश्वसनीय ऑफसेट के बिना "कार्बन तटस्थ" का दावा करने वाली कंपनियां, "बायोडिग्रेडेबल" प्लास्टिक जिन्हें विशिष्ट परिस्थितियों की आवश्यकता होती है, या समग्र पर्यावरणीय नुकसान को नजरअंदाज करते हुए एक हरित विशेषता को उजागर करना
- प्रभाव: वास्तविक स्थिरता प्रयासों को कमजोर करता है, उपभोक्ता विश्वास को नष्ट करता है, और वास्तविक पर्यावरणीय प्रगति करने वाली कंपनियों से ध्यान हटाता है
- नियम: कई देश ग्रीनवाशिंग से निपटने के लिए सख्त विज्ञापन मानकों और प्रकटीकरण आवश्यकताओं को विकसित कर रहे हैं
- उपभोक्ता संरक्षण: वास्तविक पर्यावरणीय दावों की पहचान करने के लिए तीसरे पक्ष के प्रमाणपत्रों (एनर्जी स्टार, फेयर ट्रेड, FSC), विस्तृत डेटा और पारदर्शी रिपोर्टिंग की तलाश करें
"मियावाकी विधि" किसके लिए प्रसिद्ध है:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — शहरी क्षेत्रों में लघु वनों का निर्माण
मियावाकी विधि जापानी वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. अकिरा मियावाकी द्वारा विकसित एक अनूठी वनीकरण तकनीक है जो छोटे शहरी स्थानों में घने, बहु-स्तरीय देशी वनों का निर्माण करती है। यह विधि पारंपरिक वृक्षारोपण विधियों की तुलना में 10 गुना तेज, 30 गुना सघन और 100 गुना अधिक जैव विविधता के साथ वनों की वृद्धि को सक्षम बनाती है, जो इसे शहरी क्षेत्रों में लघु वन बनाने के लिए आदर्श बनाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: शहरी वनीकरण की मियावाकी विधि
- विकासकर्ता: डॉ. अकिरा मियावाकी, जापानी वनस्पति वैज्ञानिक और प्रोफेसर (1980 से); 2006 में ब्लू प्लैनेट पुरस्कार से सम्मानित
- सिद्धांत: प्राकृतिक वन पारिस्थितिकी तंत्र को दोहराने के लिए बहु-स्तरीय वृक्षारोपण में देशी प्रजातियों के पौधों का उपयोग करता है
- मुख्य विशेषताएं: पारंपरिक तरीकों की तुलना में 10 गुना तेज, 30 गुना सघन, 100 गुना अधिक जैव विविधता के साथ बढ़ता है
- क्षेत्र की आवश्यकता: 20 वर्ग मीटर जितने छोटे क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है
- सफलता दर: इस विधि का उपयोग करके विश्वभर में 2,000 से अधिक वन सफलतापूर्वक निर्मित किए गए हैं
- लाभ: मिट्टी और जलवायु परिस्थितियों की परवाह किए बिना काम करता है; 2-3 वर्षों के बाद न्यूनतम रखरखाव की आवश्यकता होती है; वायु गुणवत्ता और शहरी जैव विविधता में सुधार करता है
- भारतीय संदर्भ: बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली और चंडीगढ़ सहित कई भारतीय शहरों में शहरी हरियाली पहल के लिए अपनाया गया है
पर्माकल्चर खेती पारंपरिक रासायनिक खेती से किस प्रकार भिन्न है?
1. पर्माकल्चर खेती एकल-फसल प्रथाओं को हतोत्साहित करती है लेकिन पारंपरिक रासायनिक खेती में एकल-फसल प्रथाएं प्रमुख हैं।
2. पारंपरिक रासायनिक खेती से मृदा लवणता में वृद्धि हो सकती है लेकिन पर्माकल्चर खेती में ऐसी घटना नहीं देखी जाती है।
3. अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पारंपरिक रासायनिक खेती आसानी से संभव है लेकिन पर्माकल्चर खेती ऐसे क्षेत्रों में इतनी आसानी से संभव नहीं है।
4. पर्माकल्चर खेती में पलवार (mulching) का अभ्यास बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन पारंपरिक रासायनिक खेती में यह आवश्यक नहीं है।
नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करके सही उत्तर चुनें।
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — 1, 2 और 4
यह प्रश्न पर्माकल्चर खेती और पारंपरिक रासायनिक खेती के बीच अंतर की समझ की परीक्षा करता है। पर्माकल्चर जैव विविधता, मृदा स्वास्थ्य और पलवार जैसी सतत प्रथाओं पर जोर देता है, जबकि पारंपरिक खेती एकल-फसल और रासायनिक निवेश पर निर्भर करती है जो मृदा गुणवत्ता को खराब कर सकती है।
✅ कथन 1 – सही: पर्माकल्चर खेती एकल-फसल को हतोत्साहित करती है और विविध फसलों के साथ बहु-फसल प्रणाली को बढ़ावा देती है, जबकि पारंपरिक रासायनिक खेती दक्षता और मशीनीकरण की सुविधा के लिए मुख्य रूप से एकल-फसल का उपयोग करती है।
✅ कथन 2 – सही: पारंपरिक रासायनिक खेती कृत्रिम उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग और खराब सिंचाई प्रथाओं के कारण मृदा लवणता का कारण बनती है, जबकि पर्माकल्चर जैविक पदार्थों के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य बनाए रखता है और लवणीकरण को रोकता है।
❌ कथन 3 – गलत: पर्माकल्चर खेती को जल संचयन, पलवार और सूखा-प्रतिरोधी फसलों का उपयोग करके अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में सफलतापूर्वक अभ्यास किया जा सकता है; यह कथन के अनुसार शुष्कता से सीमित नहीं है।
✅ कथन 4 – सही: पलवार पर्माकल्चर में नमी संरक्षण, खरपतवार दमन और मृदा उर्वरता सुधार के लिए एक मुख्य अभ्यास है, लेकिन पारंपरिक रासायनिक खेती में यह आवश्यक नहीं है जो शाकनाशी और सिंचाई पर निर्भर करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पर्माकल्चर बनाम पारंपरिक खेती
| पहलू | पर्माकल्चर खेती | पारंपरिक रासायनिक खेती |
|---|---|---|
| फसल पैटर्न | बहु-फसल, जैव विविधता को प्रोत्साहित | एकल-फसल प्रमुख |
| मृदा स्वास्थ्य | जैविक पदार्थ से बेहतर, कोई लवणता समस्या नहीं | रसायनों से क्षरण, लवणीकरण |
| जल प्रबंधन | वर्षा जल संचयन, नमी संरक्षण | भारी सिंचाई निर्भरता |
| पलवार | आवश्यक अभ्यास | आवश्यक नहीं, शाकनाशी उपयोग |
| रासायनिक उपयोग | न्यूनतम या कोई नहीं | कीटनाशकों और उर्वरकों पर भारी निर्भरता |
| स्थिरता | दीर्घकालिक पारिस्थितिक संतुलन | अल्पकालिक उत्पादकता फोकस |
| अनुकूलनशीलता | अर्ध-शुष्क सहित विभिन्न जलवायु में अनुकूल | विशिष्ट परिस्थितियों की आवश्यकता |
भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सी/से पर्यावरण-अनुकूल कृषि की प्रथा(एं) मानी जाती है/हैं?
- फसल विविधीकरण
- दलहन सघनीकरण
- टेन्सियोमीटर का उपयोग
- ऊर्ध्वाधर खेती
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1, 2 और 3
पर्यावरण-अनुकूल कृषि प्रथाएं उत्पादकता बनाए रखते हुए पर्यावरणीय क्षति को न्यूनतम करती हैं। भारतीय संदर्भ में फसल विविधीकरण, दलहन सघनीकरण और टेन्सियोमीटर का उपयोग करते हुए सटीक सिंचाई सभी सतत प्रथाओं के रूप में योग्य हैं, जबकि ऊर्ध्वाधर खेती की उच्च ऊर्जा मांग इसे अनुपयुक्त बनाती है।
✅ कथन 1 – सही: फसल विविधीकरण मृदा स्वास्थ्य को बढ़ाता है, जैव विविधता बढ़ाता है, कीट चक्रों को तोड़ता है और रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करता है।
✅ कथन 2 – सही: दलहन सघनीकरण राइजोबियम बैक्टीरिया के माध्यम से नाइट्रोजन स्थिरीकरण द्वारा मृदा को प्राकृतिक रूप से समृद्ध करता है, जिससे सिंथेटिक उर्वरक की आवश्यकता कम होती है।
✅ कथन 3 – सही: टेन्सियोमीटर मृदा नमी तनाव को मापते हैं, जो सटीक सिंचाई को सक्षम बनाता है जो जल संरक्षण करता है और अति-सिंचाई से पोषक तत्वों की क्षति को रोकता है।
❌ कथन 4 – गलत: भारत में ऊर्ध्वाधर खेती पर्यावरण-अनुकूल नहीं है क्योंकि यह कृत्रिम प्रकाश और जलवायु नियंत्रण प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भर करती है जो मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली से संचालित होती हैं, जिससे बड़ा कार्बन पदचिह्न बनता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पर्यावरण-अनुकूल कृषि प्रथाएं
- फसल विविधीकरण: बारी-बारी से या एक साथ कई फसल प्रजातियां उगाना; मृदा उर्वरता, कीट नियंत्रण और जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति लचीलापन में सुधार करता है।
- दलहन सघनीकरण: दालों/फलियों की खेती में वृद्धि (जैसे मसूर, चना) जो प्राकृतिक रूप से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करती हैं, रासायनिक उर्वरक के उपयोग को कम करती हैं।
- सटीक सिंचाई: जल उपयोग को अनुकूलित करने और बर्बादी को रोकने के लिए टेन्सियोमीटर, ड्रिप सिंचाई और मृदा नमी संवेदक जैसे उपकरणों का उपयोग।
- जैविक खेती: सिंथेटिक रसायनों से बचती है; खाद, हरी खाद और जैव-कीटनाशकों का उपयोग करती है।
- कृषि वानिकी: फसलों/पशुधन के साथ पेड़ों को एकीकृत करना; कार्बन पृथक्करण और जैव विविधता को बढ़ाता है।
- संरक्षण जुताई: शून्य-जुताई जैसी न्यूनतम मृदा विक्षोभ प्रथाएं जो मृदा संरचना और जैविक पदार्थ को संरक्षित करती हैं।
- एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM): कीटनाशक उपयोग को न्यूनतम करने के लिए जैविक, सांस्कृतिक और यांत्रिक कीट नियंत्रण विधियों को संयुक्त करता है।
- हरी खाद: मृदा जैविक सामग्री को समृद्ध करने के लिए हरी फसलों (जैसे सेस्बानिया, ढैंचा) को उगाना और जोतना।
कृषि में फर्टिगेशन के क्या लाभ हैं?
- सिंचाई जल की क्षारीयता को नियंत्रित करना संभव है।
- रॉक फॉस्फेट और अन्य सभी फॉस्फेटिक उर्वरकों का कुशल अनुप्रयोग संभव है।
- पौधों के लिए पोषक तत्वों की बढ़ी हुई उपलब्धता संभव है।
- रासायनिक पोषक तत्वों के निक्षालन में कमी संभव है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1, 3 और 4
फर्टिगेशन सिंचाई प्रणालियों के माध्यम से उर्वरकों को लागू करने की तकनीक है, जो जड़ क्षेत्र में सटीक पोषक तत्व वितरण की अनुमति देती है। यह विधि सिंचाई जल के pH पर नियंत्रण सक्षम बनाती है, पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाती है, और पोषक तत्वों के निक्षालन को कम करती है, लेकिन रॉक फॉस्फेट जैसे जल-अघुलनशील उर्वरकों के लिए उपयोग नहीं की जा सकती।
✅ कथन 1 – सही: फर्टिगेशन सिंचाई जल की क्षारीयता/pH को पोषक तत्व अवशोषण के लिए इष्टतम स्तर पर समायोजित करके नियंत्रित करने की अनुमति देता है।
❌ कथन 2 – गलत: रॉक फॉस्फेट जल में घुलनशील नहीं है और फर्टिगेशन प्रणालियों के माध्यम से कुशलता से लागू नहीं किया जा सकता, जिसके लिए जल-घुलनशील उर्वरकों की आवश्यकता होती है।
✅ कथन 3 – सही: फर्टिगेशन पोषक तत्वों को सीधे जड़ क्षेत्र में पहुंचाता है, जिससे पोषक तत्वों की उपलब्धता और ग्रहण दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
✅ कथन 4 – सही: फर्टिगेशन के माध्यम से सटीक पोषक तत्व अनुप्रयोग अतिरिक्त उर्वरक उपयोग को कम करता है और भूजल में पोषक तत्वों के निक्षालन को न्यूनतम करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: फर्टिगेशन
- परिभाषा: सिंचाई प्रणालियों (ड्रिप, स्प्रिंकलर) के माध्यम से सीधे फसल जड़ क्षेत्र में उर्वरकों का अनुप्रयोग।
- उपयोग किए जाने वाले जल-घुलनशील उर्वरक: यूरिया, पोटेशियम नाइट्रेट, कैल्शियम नाइट्रेट, मोनो-अमोनियम फॉस्फेट (MAP), डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP)।
- प्रमुख लाभ: समान पोषक तत्व वितरण, उच्च पोषक उपयोग दक्षता (30-50% बचत), श्रम में कमी, समय पर पोषक तत्व आपूर्ति।
- pH प्रबंधन: पोषक तत्वों की उपलब्धता को अनुकूलित करने के लिए एसिड इंजेक्शन (फॉस्फोरिक एसिड, सल्फ्यूरिक एसिड) के माध्यम से सिंचाई जल pH के समायोजन की अनुमति देता है।
- निक्षालन में कमी: नियंत्रित अनुप्रयोग अति-निषेचन और भूजल संदूषण को रोकता है।
- सीमाएं: घुलनशील उर्वरकों की आवश्यकता, प्रारंभिक सेटअप लागत, तकनीकी ज्ञान, और सिंचाई प्रणाली का नियमित रखरखाव।
भारत की जैव ईंधन की राष्ट्रीय नीति के अनुसार, निम्नलिखित में से किसका उपयोग जैव ईंधन के उत्पादन के लिए कच्चे माल के रूप में किया जा सकता है?
- कसावा (Cassava)
- क्षतिग्रस्त गेहूं के दाने
- मूंगफली के बीज
- कुलथी (Horse gram)
- सड़े हुए आलू
- चुकंदर (Sugar beet)
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1, 2, 5 और 6
भारत की जैव ईंधन की राष्ट्रीय नीति (2018) अधिशेष खाद्यान्न, क्षतिग्रस्त अनाज, कसावा जैसी स्टार्च युक्त फसलों और चुकंदर जैसी शर्करा युक्त फसलों को इथेनॉल उत्पादन के लिए अनुमति देती है। तिलहन फसलों और मूंगफली के बीज और कुलथी जैसी प्रोटीन युक्त दालों को खाद्य तेल और खाद्य आपूर्ति के साथ प्रतिस्पर्धा से बचने के लिए जैव ईंधन फीडस्टॉक में शामिल नहीं किया गया है।
✅ कथन 1 – सही: कसावा एक स्टार्च युक्त जड़ वाली फसल है जिसे नीति के तहत इथेनॉल उत्पादन के लिए फीडस्टॉक के रूप में स्पष्ट रूप से अनुमति दी गई है।
✅ कथन 2 – सही: क्षतिग्रस्त गेहूं के दाने (अधिशेष या अखाद्य) को बर्बादी रोकने के लिए जैव ईंधन उत्पादन में उपयोग किया जा सकता है।
❌ कथन 3 – गलत: मूंगफली के बीज तिलहन हैं और खाद्य तेल बाजार के साथ प्रतिस्पर्धा से बचने के लिए जैव ईंधन उत्पादन के लिए अनुमति नहीं है।
❌ कथन 4 – गलत: कुलथी एक दाल (प्रोटीन युक्त फसल) है और इसे जैव ईंधन फीडस्टॉक सूची में शामिल नहीं किया गया है।
✅ कथन 5 – सही: सड़े हुए आलू (क्षतिग्रस्त/अधिशेष कंद) को अपशिष्ट उपयोग के रूप में जैव ईंधन उत्पादन के लिए उपयोग किया जा सकता है।
✅ कथन 6 – सही: चुकंदर एक शर्करा युक्त फसल है जिसे नीति के तहत इथेनॉल उत्पादन के लिए अनुमोदित किया गया है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति 2018
- प्रथम पीढ़ी (1G) जैव ईंधन: शर्करा, स्टार्च, वनस्पति तेलों से उत्पादित – इसमें बायोइथेनॉल और बायोडीजल शामिल हैं।
- द्वितीय पीढ़ी (2G) जैव ईंधन: गैर-खाद्य बायोमास जैसे कृषि अवशेष, वन अपशिष्ट, नगरपालिका ठोस अपशिष्ट से उत्पादित।
- इथेनॉल के लिए अनुमत फीडस्टॉक: गन्ना, चुकंदर, कसावा, क्षतिग्रस्त खाद्यान्न, अधिशेष खाद्यान्न, मीठी ज्वार।
- बायोडीजल के लिए अनुमत फीडस्टॉक: गैर-खाद्य तिलहन (जैट्रोफा, करंज, महुआ, आदि), प्रयुक्त खाना पकाने का तेल, पशु वसा।
- अनुमति नहीं: खाद्य सुरक्षा चिंताओं से बचने के लिए खाद्य तिलहन (मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी), दालें और प्रोटीन युक्त फसलें।
- इथेनॉल सम्मिश्रण लक्ष्य: पेट्रोल सम्मिश्रण के लिए 2025 तक 20% (E20)।
- सांकेतिक बायोडीजल सम्मिश्रण लक्ष्य: 2030 तक 5%।
कृषि में शून्य जुताई के क्या लाभ हैं?
- पिछली फसल के अवशेषों को जलाए बिना गेहूं की बुवाई संभव है।
- धान के पौधों की नर्सरी की आवश्यकता के बिना, गीली मिट्टी में धान के बीजों की सीधी बुवाई संभव है।
- मिट्टी में कार्बन प्रच्छादन संभव है।
नीचे दिए गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
शून्य जुताई संरक्षण कृषि की एक पद्धति है जिसमें बीजों को बिना जुताई की गई मिट्टी में सीधे बोया जाता है, फसल अवशेषों को खेत पर छोड़ दिया जाता है। यह विधि श्रम लागत में कमी, मृदा स्वास्थ्य में सुधार और कार्बन भंडारण में वृद्धि सहित कई पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ प्रदान करती है।
✅ कथन 1 – सही: शून्य जुताई गेहूं की बुवाई को पिछली फसल के अवशेषों (जैसे धान की पराली) के साथ सीधे खेतों में करने की अनुमति देती है, जलाने की आवश्यकता को समाप्त करती है, जिससे वायु प्रदूषण कम होता है और मृदा पोषक तत्व संरक्षित होते हैं।
✅ कथन 2 – सही: शून्य जुताई के तहत गीली मिट्टी में धान की सीधी बुवाई (DSR - प्रत्यक्ष बीजित धान) संभव है, पारंपरिक नर्सरी-रोपण विधि को छोड़कर, पानी, श्रम और समय की बचत होती है।
✅ कथन 3 – सही: फसल अवशेषों को अक्षुण्ण छोड़कर और मिट्टी की गड़बड़ी को न्यूनतम करके, शून्य जुताई जैविक पदार्थ प्रतिधारण और मिट्टी में कार्बन प्रच्छादन को बढ़ाती है, जलवायु परिवर्तन को कम करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: शून्य जुताई/संरक्षण कृषि
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| परिभाषा | न्यूनतम मृदा गड़बड़ी के साथ बिना जुताई की मिट्टी में सीधे फसलों की बुवाई |
| अन्य नाम | नो-टिल फार्मिंग, संरक्षण जुताई |
| मुख्य लाभ | • मृदा अपरदन कम करता है • मृदा नमी संरक्षित करता है • ईंधन और श्रम लागत घटाता है • पराली जलाना रोकता है • कार्बन प्रच्छादन बढ़ाता है |
| पर्यावरणीय प्रभाव | CO₂ उत्सर्जन कम करता है, जलाने से वायु प्रदूषण रोकता है, मृदा जैव विविधता में सुधार करता है |
| भारत में अनुप्रयोग | पंजाब, हरियाणा में धान के बाद गेहूं के लिए प्रोत्साहित; पराली जलाना कम करता है |
| चुनौतियाँ | विशेष मशीनरी (शून्य-जुताई बीज ड्रिल) की आवश्यकता, प्रारंभिक निवेश, किसान प्रशिक्षण |
कृषि में बायोचार का उपयोग क्या है?
- बायोचार को ऊर्ध्वाधर कृषि (वर्टिकल फार्मिंग) में उगाने के माध्यम के एक भाग के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
- जब बायोचार उगाने के माध्यम का एक हिस्सा होता है, तो यह नाइट्रोजन-स्थिरीकरण सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को बढ़ावा देता है।
- जब बायोचार उगाने के माध्यम का एक हिस्सा होता है, तो यह उगाने के माध्यम को लंबे समय तक पानी बनाए रखने में सक्षम बनाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
बायोचार एक कार्बन-समृद्ध, छिद्रयुक्त पदार्थ है जो बायोमास के पायरोलिसिस द्वारा उत्पादित होता है। यह मृदा संरचना में सुधार, लाभकारी सूक्ष्मजीवों का समर्थन करने और जल धारण क्षमता बढ़ाने के द्वारा कृषि में कई कार्य करता है। सभी तीन कथन बायोचार के कृषि उपयोगों का सही वर्णन करते हैं।
✅ कथन 1 – सही: बायोचार को ऊर्ध्वाधर कृषि प्रणालियों में उगाने के माध्यम के एक घटक के रूप में उपयोग किया जा सकता है, जहां यह सब्सट्रेट संरचना और पोषक तत्व धारण में सुधार करता है।
✅ कथन 2 – सही: बायोचार की छिद्रयुक्त संरचना और रासायनिक गुण नाइट्रोजन-स्थिरीकरण सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनाते हैं, जो मृदा में जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण को बढ़ाते हैं।
✅ कथन 3 – सही: अपनी उच्च छिद्रता और बड़े सतह क्षेत्र के कारण, बायोचार महत्वपूर्ण मात्रा में पानी को अवशोषित और धारण कर सकता है, जिसे विस्तारित अवधि तक पौधों के लिए उपलब्ध कराया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कृषि में बायोचार
- परिभाषा: बायोचार एक स्थिर, कार्बन-समृद्ध ठोस पदार्थ है जो बायोमास के पायरोलिसिस (ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में थर्मल अपघटन) से प्राप्त होता है।
- मृदा संशोधन: मृदा संरचना, छिद्रता और धनायन विनिमय क्षमता (CEC) में सुधार करता है, जिससे पोषक तत्व धारण बेहतर होता है।
- जल धारण: इसकी छिद्रयुक्त प्रकृति अपने वजन का 2-5 गुना पानी धारण कर सकती है, जिससे सिंचाई आवश्यकताएं कम होती हैं।
- सूक्ष्मजैविक आवास: लाभकारी मृदा सूक्ष्मजीवों, जिनमें नाइट्रोजन-स्थिरीकरण बैक्टीरिया शामिल हैं, के लिए सतह क्षेत्र और सूक्ष्म-आवास प्रदान करता है।
- कार्बन पृथक्करण: सैकड़ों से हजारों वर्षों तक मृदा में कार्बन संग्रहीत करता है, जो जलवायु परिवर्तन शमन में योगदान देता है।
- पोषक तत्व प्रबंधन: पोषक तत्व निक्षालन को कम करता है, उर्वरक दक्षता में सुधार करता है, और प्रदूषकों को अवशोषित कर सकता है।
- अनुप्रयोग: पारंपरिक कृषि, ऊर्ध्वाधर कृषि, कंटेनर बागवानी और मृदा उपचार परियोजनाओं में उपयोग किया जाता है।
भारतीय कृषि की परिस्थितियों के संदर्भ में, "संरक्षण कृषि" की अवधारणा महत्व रखती है। निम्नलिखित में से कौन-से संरक्षण कृषि के अंतर्गत आते हैं?
- एकल फसल प्रथाओं से बचना
- न्यूनतम जुताई को अपनाना
- बागान फसलों की खेती से बचना
- मिट्टी की सतह को ढकने के लिए फसल अवशेषों का उपयोग करना
- स्थानिक और लौकिक फसल अनुक्रमण/फसल चक्र को अपनाना
नीचे दिए गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 2, 4 और 5
संरक्षण कृषि तीन मुख्य सिद्धांतों पर आधारित है: न्यूनतम मृदा क्षोभ (न्यूनतम/शून्य जुताई), स्थायी मृदा आवरण (फसल अवशेषों या मल्च का उपयोग), और फसल विविधीकरण (फसल चक्र और अंतरफसल के माध्यम से)। विकल्प 2, 4 और 5 इन सिद्धांतों के साथ सीधे संरेखित हैं, जबकि विकल्प 1 और 3 संरक्षण कृषि के मान्यता प्राप्त घटक नहीं हैं।
✅ कथन 2 – सही: न्यूनतम जुताई संरक्षण कृषि का एक मौलिक सिद्धांत है जो मृदा क्षोभ और अपरदन को कम करता है।
❌ कथन 1 – गलत: हालांकि फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित किया जाता है, एकल फसल से बचना स्पष्ट रूप से संरक्षण कृषि प्रथा के रूप में परिभाषित नहीं है।
❌ कथन 3 – गलत: संरक्षण कृषि बागान फसलों को बाहर नहीं करती है; इन्हें संरक्षण प्रथाओं का उपयोग करके उगाया जा सकता है।
✅ कथन 4 – सही: फसल अवशेषों का उपयोग करके स्थायी मृदा आवरण बनाए रखना संरक्षण कृषि का एक मुख्य सिद्धांत है।
✅ कथन 5 – सही: फसल चक्र और अनुक्रमण संरक्षण कृषि के अंतर्गत फसल विविधीकरण के लिए आवश्यक हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संरक्षण कृषि
- परिभाषा: तीन परस्पर जुड़े सिद्धांतों पर आधारित एक सतत कृषि प्रणाली जो पर्यावरण की रक्षा करते हुए कृषि उत्पादकता को बढ़ाती है।
- तीन मुख्य सिद्धांत:
- न्यूनतम मृदा क्षोभ: शून्य-जुताई या न्यूनतम जुताई कृषि मृदा अपरदन को कम करती है और मृदा संरचना में सुधार करती है।
- स्थायी मृदा आवरण: मृदा को अपरदन से बचाने और नमी बनाए रखने के लिए फसल अवशेषों, मल्च, या आवरण फसलों का उपयोग।
- फसल विविधीकरण: मृदा उर्वरता में सुधार और कीट चक्रों को तोड़ने के लिए फसल चक्र, अंतरफसल, और फसल अनुक्रमण।
- लाभ: मृदा अपरदन को कम करता है, जल धारण में सुधार करता है, मृदा कार्बनिक पदार्थ बढ़ाता है, निवेश लागत कम करता है, और जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति लचीलापन बढ़ाता है।
- FAO समर्थन: खाद्य और कृषि संगठन (FAO) वैश्विक स्तर पर संरक्षण कृषि को जलवायु-स्मार्ट प्रथा के रूप में सक्रिय रूप से बढ़ावा देता है।
- भारत में अनुप्रयोग: विशेष रूप से जल-तनावग्रस्त क्षेत्रों और घटती मृदा स्वास्थ्य वाले क्षेत्रों में प्रासंगिक; विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से प्रचारित।
निम्नलिखित में से कौन सी प्रथाएं कृषि में जल संरक्षण में सहायक हो सकती हैं?
- भूमि की कम या शून्य जुताई
- खेत की सिंचाई से पहले जिप्सम का प्रयोग करना
- फसल अवशेषों को खेत में रहने देना
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
कृषि में जल संरक्षण में ऐसी प्रथाएं शामिल हैं जो वाष्पीकरण के माध्यम से जल हानि को कम करती हैं, मृदा जल धारण क्षमता में सुधार करती हैं, और अंतःस्यंदन को बढ़ाती हैं। कम या शून्य जुताई और खेतों में फसल अवशेष छोड़ना प्रभावी जल संरक्षण तकनीकें हैं, जबकि जिप्सम का प्रयोग मुख्य रूप से मृदा संरचना में सुधार करता है न कि सीधे जल संरक्षण करता है।
✅ कथन 1 – सही: कम या शून्य जुताई मृदा में न्यूनतम गड़बड़ी पैदा करती है, जिससे एक अधिक संहत सतह बनती है जो वाष्पीकरण को कम करती है और मृदा में बेहतर जल अंतःस्यंदन और धारण की अनुमति देती है।
❌ कथन 2 – गलत: जिप्सम (कैल्शियम सल्फेट) एक मृदा संशोधक है जो मृदा संरचना में सुधार करता है और सोडिकता को कम करता है, लेकिन यह सीधे जल संरक्षण में योगदान नहीं देता है; कुछ मामलों में यह निक्षालन को भी बढ़ा सकता है।
✅ कथन 3 – सही: खेत में छोड़े गए फसल अवशेष मल्च का काम करते हैं, जो मृदा वाष्पीकरण को कम करते हैं, खरपतवार को दबाते हैं, कटाव को रोकते हैं, और लंबी अवधि के लिए मृदा नमी बनाए रखते हैं।
FAO 'वैश्विक रूप से महत्वपूर्ण कृषि विरासत प्रणाली (GIAHS)' का दर्जा पारंपरिक कृषि प्रणालियों को प्रदान करता है। इस पहल का समग्र लक्ष्य क्या है?
- पहचानी गई GIAHS की स्थानीय समुदायों को आधुनिक तकनीक, आधुनिक कृषि विधियों में प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान करना ताकि उनकी कृषि उत्पादकता में बहुत वृद्धि हो
- पर्यावरण-अनुकूल पारंपरिक कृषि प्रथाओं और उनसे जुड़े परिदृश्यों, कृषि जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की ज्ञान प्रणालियों की पहचान करना और उनकी रक्षा करना
- ऐसी पहचानी गई GIAHS में कृषि उत्पादन की सभी किस्मों को भौगोलिक संकेत की स्थिति प्रदान करना
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
❌ कथन 1 – गलत: GIAHS का उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक या आधुनिक कृषि विधियों में प्रशिक्षण प्रदान करना नहीं है। इसका लक्ष्य पारंपरिक कृषि प्रणालियों और देशज ज्ञान का संरक्षण और समर्थन करना है, न कि उन्हें आधुनिक गहन प्रथाओं से बदलना।
✅ कथन 2 – सही: GIAHS का मुख्य उद्देश्य ऐसी पारंपरिक कृषि प्रणालियों की पहचान करना, उनकी रक्षा करना और उन्हें बढ़ावा देना है जो स्थायी प्रथाओं को प्रदर्शित करती हैं, कृषि जैव विविधता का संरक्षण करती हैं, पारंपरिक परिदृश्यों को संरक्षित करती हैं, और स्थानीय समुदायों की देशज ज्ञान प्रणालियों की रक्षा करती हैं। यह इन प्रणालियों को जीवित, विकसित होती विरासत के रूप में मान्यता देता है।
❌ कथन 3 – गलत: GIAHS पदनाम स्वचालित रूप से कृषि उत्पादों को भौगोलिक संकेत (GI) की स्थिति प्रदान नहीं करता है। GI एक अलग बौद्धिक संपदा अधिकार है जो विभिन्न कानूनी ढांचे और मानदंडों के तहत दिया जाता है। हालांकि कुछ GIAHS उत्पाद स्वतंत्र रूप से GI के लिए योग्य हो सकते हैं, यह GIAHS पहल की अंतर्निहित विशेषता नहीं है।
ड्रिप सिंचाई (बूंद-बूंद सिंचाई) के अभ्यास का/के निम्नलिखित में से कौन सा/से लाभ है/हैं?
- खरपतवार में कमी
- मृदा लवणता में कमी
- मृदा अपरदन में कमी
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग करके सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
✅ कथन 1 – सही: ड्रिप सिंचाई पौधों की जड़ों के क्षेत्र में सीधे पानी पहुंचाती है, जिससे मिट्टी की सतह अपेक्षाकृत सूखी रहती है। चूंकि खरपतवार को अंकुरित होने और बढ़ने के लिए नम ऊपरी मिट्टी की आवश्यकता होती है, इसलिए सतही पानी की उपलब्धता को सीमित करने से बाढ़ या फव्वारा सिंचाई विधियों की तुलना में खरपतवार की वृद्धि में काफी कमी आती है।
❌ कथन 2 – गलत: ड्रिप सिंचाई सीधे तौर पर मृदा लवणता को कम नहीं करती है। वास्तव में, चूंकि पानी विशिष्ट बिंदुओं पर छोटी मात्रा में लगाया जाता है, इसलिए गीले क्षेत्र के किनारों पर लवण जमा हो सकते हैं। हालांकि उचित प्रबंधन प्रथाएं (जैसे समय-समय पर निक्षालन) लवणता को नियंत्रित करने में मदद कर सकती हैं, लेकिन ड्रिप सिंचाई स्वयं मौजूदा मृदा लवणता को कम करने का तरीका नहीं है।
✅ कथन 3 – सही: जड़ क्षेत्र में धीरे-धीरे और सीधे पानी छोड़कर, ड्रिप सिंचाई सतही अपवाह और मिट्टी की सतह पर पानी के प्रवाह को कम करती है। यह नियंत्रित जल अनुप्रयोग ऊपरी मिट्टी के बह जाने को रोकता है, जिससे मृदा अपरदन कम होता है और मिट्टी की संरचना और उर्वरता बनी रहती है।
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