UPSC Prelims 2022 Question Paper
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भारत सरकार अधिनियम 1919 में, प्रांतीय सरकार के कार्यों को "आरक्षित" और "हस्तांतरित" विषयों में विभाजित किया गया था। निम्नलिखित में से किन्हें "आरक्षित" विषयों के रूप में माना गया था?
- न्याय प्रशासन
- स्थानीय स्वशासन
- भू-राजस्व
- पुलिस
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1, 3 और 4
भारत सरकार अधिनियम 1919 ने प्रांतों में द्वैध शासन की व्यवस्था शुरू की, जिसमें विषयों को 'आरक्षित' (गवर्नर और कार्यकारी परिषद द्वारा नियंत्रित) और 'हस्तांतरित' (भारतीय मंत्रियों द्वारा प्रशासित) में विभाजित किया गया। आरक्षित विषयों को अधिक महत्वपूर्ण माना गया और इनमें न्याय प्रशासन, भू-राजस्व और पुलिस शामिल थे, जबकि स्थानीय स्वशासन एक हस्तांतरित विषय था।
✅ कथन 1 – सही: न्याय प्रशासन गवर्नर के नियंत्रण में एक आरक्षित विषय था।
❌ कथन 2 – गलत: स्थानीय स्वशासन एक हस्तांतरित विषय था, जो भारतीय मंत्रियों द्वारा प्रशासित था।
✅ कथन 3 – सही: भू-राजस्व एक आरक्षित विषय था, क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण वित्तीय मामला था।
✅ कथन 4 – सही: पुलिस एक आरक्षित विषय था, जो कानून और व्यवस्था से संबंधित था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत द्वैध शासन
| श्रेणी | आरक्षित विषय | हस्तांतरित विषय |
|---|---|---|
| नियंत्रण | गवर्नर व कार्यकारी परिषद (ब्रिटिश अधिकारी) | गवर्नर व भारतीय मंत्री (निर्वाचित) |
| प्रकृति | महत्वपूर्ण/संवेदनशील मामले | कम महत्वपूर्ण/राष्ट्र-निर्माण गतिविधियाँ |
| उदाहरण | कानून और व्यवस्था, पुलिस, न्याय, भू-राजस्व, सिंचाई, वित्त | शिक्षा, जनस्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, लोक निर्माण, कृषि, आबकारी |
| मंत्रियों की जवाबदेही | कार्यकारी परिषद विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं | भारतीय मंत्री प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी |
| उद्देश्य | प्रमुख क्षेत्रों पर ब्रिटिश नियंत्रण बनाए रखना | शासन में भारतीयों की क्रमिक भागीदारी |
- द्वैध शासन का शाब्दिक अर्थ है 'दोहरी सरकार' - मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919) के भाग के रूप में शुरू किया गया
- भारतीय नेताओं ने इस व्यवस्था की आलोचना की क्योंकि इसने अधिकार का विभाजन किया और व्यवहार में अकार्यकारी थी
- भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा समाप्त किया गया, जिसने प्रांतीय स्वायत्तता की शुरुआत की
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन "कुलहदरान" के नाम से जाने जाते थे?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — सैय्यद
सैय्यदों को मुस्लिम समाज में पैगंबर मुहम्मद की पुत्री फातिमा के वंशज के रूप में सम्मानित किया जाता था। दिल्ली सल्तनत काल के दौरान, वे 'कुलह' नामक एक विशिष्ट नुकीली टोपी पहनते थे, जिससे उन्हें 'कुलहदरान' (टोपी पहनने वाले) की उपाधि मिली। 1398 में तैमूर के विनाशकारी भारत आक्रमण के दौरान भी, उसने सामान्य नरसंहार की नीति के बावजूद विशेष रूप से सैय्यदों के जीवन को बख्शा, जो इस्लामी समाज में उनकी विशेष स्थिति को प्रदर्शित करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: दिल्ली सल्तनत में सामाजिक वर्ग
- सैय्यद (कुलहदरान): पैगंबर मुहम्मद से फातिमा के माध्यम से वंश का दावा; नुकीली टोपी (कुलह) पहनते थे; विशेष विशेषाधिकार और सम्मान का आनंद लेते थे; तैमूर के आक्रमण के दौरान भी सुरक्षित रहे
- शेख: अरब मुसलमान और उनके वंशज जो भारत में बस गए; सामाजिक पदानुक्रम में उच्च माने जाते थे
- क़लन्दर: मुस्लिम भिक्षु रहस्यवादी जिन्होंने पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं को अस्वीकार किया; अक्सर भटकते हुए तपस्वी
- उलेमा: इस्लामी विद्वान और धार्मिक नेता जो शरिया कानून की व्याख्या करते थे
- खुद्दाम: तुर्की कुलीन जिन्होंने प्रारंभिक दिल्ली सल्तनत में शासक वर्ग का गठन किया
- सामाजिक पदानुक्रम: सैय्यद और शेख → विदेशी मुसलमान (तुर्क, अफगान, फारसी) → भारतीय मुसलमान (धर्मांतरित) → गैर-मुसलमान
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत पर पहला मंगोल आक्रमण जलाल-उद-दीन खिलजी के शासनकाल में हुआ था।
- अला-उद-दीन खिलजी के शासनकाल के दौरान, एक मंगोल सेना दिल्ली तक पहुंची और शहर को घेर लिया।
- मुहम्मद-बिन-तुगलक ने अपने राज्य के उत्तर-पश्चिम के कुछ हिस्से अस्थायी रूप से मंगोलों से खो दिए।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न दिल्ली सल्तनत काल के दौरान मंगोल आक्रमणों के ज्ञान का परीक्षण करता है। केवल कथन 2 सही है, क्योंकि 1303 ई. में दिल्ली की मंगोल घेराबंदी अला-उद-दीन खिलजी के शासनकाल में हुई थी, जबकि अन्य कथनों में समयरेखा और शासकों के संबंध में तथ्यात्मक त्रुटियाँ हैं।
❌ कथन 1 – गलत: भारत पर पहला मंगोल आक्रमण 1221 ई. में चंगेज खान के अधीन इल्तुतमिश (1211-1236 ई.) के शासनकाल में हुआ था, जलाल-उद-दीन खिलजी (1290-1296 ई.) के शासनकाल में नहीं।
✅ कथन 2 – सही: 1303 ई. में, अला-उद-दीन खिलजी के शासनकाल (1296-1316 ई.) के दौरान, तारघी के नेतृत्व में एक विशाल मंगोल सेना ने दिल्ली को घेर लिया, जिससे सुल्तान को कई महीनों तक सीरी किले में शरण लेनी पड़ी।
❌ कथन 3 – गलत: मुहम्मद-बिन-तुगलक (1325-1351 ई.) ने अपने शासनकाल की शुरुआत में मंगोल आक्रमणों को सफलतापूर्वक विफल किया और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों को कभी नहीं खोया; बल्कि, उन्होंने मंगोल क्षेत्रों के खिलाफ एक महत्वाकांक्षी खुरासान अभियान की योजना भी बनाई।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत पर मंगोल आक्रमण (13वीं-14वीं शताब्दी)
| वर्ष/काल | शासक | घटना |
|---|---|---|
| 1221 ई. | इल्तुतमिश | ख्वारिज्म शाह का पीछा करते हुए चंगेज खान के अधीन पहला मंगोल आक्रमण; सिंधु तक पहुंचने के बाद मंगोल वापस लौट गए |
| 1241 ई. | रजिया सुल्तान | पंजाब और लाहौर पर मंगोल छापे |
| 1279-1290 ई. | बलबन | कई मंगोल आक्रमण; बलबन ने उत्तर-पश्चिमी सीमा को मजबूत किया और मजबूत सैन्य उपस्थिति स्थापित की |
| 1292 ई. | जलाल-उद-दीन खिलजी | अब्दुल्लाह के नेतृत्व में मंगोल आक्रमण को पराजित किया; मंगोल कैदियों पर दया दिखाई (उन्हें दिल्ली के पास 'नव मुसलमानों' के रूप में बसाया) |
| 1299-1308 ई. | अला-उद-दीन खिलजी | बार-बार मंगोल आक्रमण; 1303 ई. में तारघी की सेना द्वारा दिल्ली की घेराबंदी; अला-उद-दीन ने बाद में मंगोलों को निर्णायक रूप से कुचल दिया |
| 1327-1328 ई. | मुहम्मद-बिन-तुगलक | तरमाशिरीन के नेतृत्व में मंगोल आक्रमण को पराजित किया; उत्तर-पश्चिमी सीमाओं को प्रभावी ढंग से सुरक्षित किया |
- अला-उद-दीन खिलजी के प्रति-उपाय: सीरी किले का निर्माण, 4,75,000 घुड़सवारों की बड़ी स्थायी सेना बनाए रखी, गाजी मलिक (बाद में गयासुद्दीन तुगलक) को सीमा गवर्नर नियुक्त किया
- प्रभाव: मंगोल खतरे ने दिल्ली सल्तनत की सैन्य नीतियों, किलेबंदी रणनीतियों और आर्थिक सुधारों (विशेष रूप से अला-उद-दीन के मूल्य नियंत्रण और सैन्य सुधारों) को आकार दिया
- बस्तियाँ: कुछ मंगोल समूहों को धर्मांतरित कर भारत में बसाया गया ('नव मुसलमान' या नव-मुसलमान कहलाए), हालांकि विद्रोह की आशंका के कारण अला-उद-दीन ने बाद में कई का नरसंहार किया
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मध्यकालीन भारत में, "फणम" शब्द का अर्थ था:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — सिक्के
मध्यकालीन भारत में "फणम" शब्द एक स्वर्ण या रजत सिक्के को संदर्भित करता था जो दक्षिण भारत में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था, विशेष रूप से विजयनगर साम्राज्य, मदुरै के नायक और विभिन्न दक्कन राज्यों जैसे क्षेत्रों में। यह एक छोटी मूल्यवर्ग की मुद्रा थी जिसका उपयोग मध्यकाल से लेकर 19वीं शताब्दी तक व्यापार और वाणिज्य में व्यापक रूप से किया जाता था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मध्यकालीन भारतीय मुद्रा
- फणम: एक स्वर्ण/रजत सिक्का जो मुख्य रूप से दक्षिण भारत में उपयोग किया जाता था (विजयनगर साम्राज्य, मदुरै नायक, त्रावणकोर, मैसूर); कुछ क्षेत्रों में ब्रिटिश काल तक जारी रहा
- टंका: दिल्ली सल्तनत के इल्तुतमिश द्वारा प्रस्तुत रजत सिक्का; उत्तर भारत में मानक मुद्रा बन गया
- जीतल: दिल्ली सल्तनत काल में छोटे लेनदेन के लिए उपयोग किया जाने वाला ताम्र सिक्का
- हून: विभिन्न क्षेत्रीय राज्यों में उपयोग किया जाने वाला छोटा ताम्र सिक्का; 1 टंका = 48 जीतल या कई हून
- पगोडा (वराह): दक्षिण भारत, विशेष रूप से विजयनगर साम्राज्य का स्वर्ण सिक्का; हिंदू देवताओं की छवि वाला
- रुपया: शेरशाह सूरी (1540-1545) द्वारा प्रस्तुत रजत सिक्का; अकबर द्वारा मानकीकृत; आधुनिक रुपये की नींव बना
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- डच ने गजपति शासकों द्वारा उन्हें दी गई भूमि पर पूर्वी तट पर अपनी फैक्ट्रियाँ/गोदाम स्थापित किए।
- अल्फांसो डी अल्बुकर्क ने बीजापुर सल्तनत से गोवा पर कब्जा किया।
- अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने विजयनगर साम्राज्य के एक प्रतिनिधि से पट्टे पर ली गई भूमि पर मद्रास में एक फैक्ट्री स्थापित की।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 3
यह प्रश्न मध्यकाल और प्रारंभिक आधुनिक काल के दौरान भारत में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों की स्थापना के ज्ञान का परीक्षण करता है। कथन 2 और 3 ऐतिहासिक रूप से सटीक हैं, जबकि कथन 1 में कालानुक्रमिक असंभवता है।
❌ कथन 1 – गलत: डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) का गठन 1602 में हुआ था, जबकि ओडिशा का गजपति राजवंश 1541 तक पहले ही पतन हो चुका था। डचों ने गोलकुंडा सल्तनत और स्थानीय नायकों जैसे अन्य शासकों से भूमि अनुदान प्राप्त किया, गजपति शासकों से नहीं।
✅ कथन 2 – सही: अल्फांसो डी अल्बुकर्क ने 1510 में बीजापुर सल्तनत के युसूफ आदिल शाह से गोवा पर कब्जा किया, जिससे इस क्षेत्र में 450 से अधिक वर्षों तक पुर्तगाली प्रभुत्व स्थापित हुआ।
✅ कथन 3 – सही: 1639 में, फ्रांसिस डे ने चंद्रगिरि के दमरला वेंकटपति नायक से मद्रास (मद्रासपट्टनम) में भूमि के लिए पट्टा प्राप्त किया, जो पतनशील विजयनगर साम्राज्य के प्रतिनिधि थे। इसके बाद यहाँ फोर्ट सेंट जॉर्ज का निर्माण किया गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियाँ
| कंपनी/शक्ति | स्थापना वर्ष | प्रमुख बस्तियाँ | अनुदान/क्षेत्र प्राप्तकर्ता |
|---|---|---|---|
| पुर्तगाली | सर्वप्रथम आगमन (1498) | गोवा (1510), दमन, दीव | गोवा बीजापुर सल्तनत से कब्जा |
| डच (VOC) | 1602 | पुलिकट, नागपट्टिनम, कोच्चि | गोलकुंडा सल्तनत, स्थानीय नायक |
| अंग्रेज (EIC) | 1600 | मद्रास (1639), बंबई (1668), कलकत्ता (1690) | चंद्रगिरि नायक, पुर्तगाली, बंगाल नवाब |
| फ्रांसीसी | 1664 | पांडिचेरी (1674), चंदननगर | बीजापुर, बंगाल शासक |
| डेनिश | 1616 | ट्रैंकेबार (1620), सेरामपुर | तंजावुर के नायक |
- गजपति राजवंश: ओडिशा और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों पर शासन; 16वीं शताब्दी के मध्य तक पतन (अंतिम शासक काखरुआ देव, 1541)।
- विजयनगर साम्राज्य: तालीकोटा के युद्ध (1565) के बाद, चंद्रगिरि, मदुरै और तंजावुर सहित नायक राज्यों में विखंडित हो गया।
- अल्फांसो डी अल्बुकर्क: भारत में पुर्तगाली गवर्नर (1509-1515); रणनीतिक मास्टरमाइंड जिन्होंने गोवा, मलक्का और होर्मुज पर कब्जा किया।
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| राजा | राजवंश |
| 1. नन्नुक | चंदेल |
| 2. जयशक्ति | परमार |
| 3. नागभट द्वितीय | गुर्जर-प्रतिहार |
| 4. भोज | राष्ट्रकूट |
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो युग्म
यह प्रश्न भारतीय मध्यकालीन राजवंशों और उनके शासकों के ज्ञान का परीक्षण करता है। दिए गए चार युग्मों में से केवल युग्म 1 (नन्नुक-चंदेल) और युग्म 3 (नागभट द्वितीय-गुर्जर-प्रतिहार) सही सुमेलित हैं, जबकि युग्म 2 और 4 में गलत राजवंश संबद्धता है।
✅ युग्म 1 – सही: नन्नुक 9वीं शताब्दी ईस्वी में चंदेल राजवंश के संस्थापक थे, जिन्होंने बुंदेलखंड क्षेत्र पर शासन किया।
❌ युग्म 2 – गलत: जयशक्ति चंदेल राजवंश (वह कीर्तिवर्मन के पुत्र थे) से संबंधित थे, परमार राजवंश से नहीं।
✅ युग्म 3 – सही: नागभट द्वितीय (लगभग 805-833 ईस्वी) गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के एक प्रमुख शासक थे जिन्होंने अरब आक्रमणों के खिलाफ सफलतापूर्वक रक्षा की।
❌ युग्म 4 – गलत: भोज (लगभग 1010-1055 ईस्वी) मालवा के परमार राजवंश के सबसे प्रतिष्ठित शासक थे, राष्ट्रकूट राजवंश के नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख मध्यकालीन भारतीय राजवंश
| राजवंश | काल | राजधानी/क्षेत्र | उल्लेखनीय शासक |
|---|---|---|---|
| चंदेल | 9वीं-13वीं शताब्दी ईस्वी | खजुराहो, बुंदेलखंड | नन्नुक (संस्थापक), यशोवर्मन, धंग, विद्याधर |
| परमार | 9वीं-14वीं शताब्दी ईस्वी | धार/धारा, मालवा | उपेन्द्र (संस्थापक), भोज, सिंधुराज |
| गुर्जर-प्रतिहार | 6वीं-11वीं शताब्दी ईस्वी | कन्नौज | नागभट प्रथम, नागभट द्वितीय, मिहिर भोज, महेन्द्रपाल प्रथम |
| राष्ट्रकूट | 6वीं-10वीं शताब्दी ईस्वी | मान्यखेत (दक्कन) | दन्तिदुर्ग, कृष्ण प्रथम, गोविंद तृतीय, अमोघवर्ष प्रथम, कृष्ण तृतीय |
संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- एक तटीय राज्य को अपने प्रादेशिक सागर की चौड़ाई 12 समुद्री मील से अधिक न होने की सीमा तक स्थापित करने का अधिकार है, जो सम्मेलन के अनुसार निर्धारित आधार रेखा से मापी जाती है।
- सभी राज्यों के जहाजों, चाहे वे तटीय हों या भू-आबद्ध, को प्रादेशिक सागर से निर्दोष मार्ग का अधिकार प्राप्त है।
- अनन्य आर्थिक क्षेत्र उस आधार रेखा से 200 समुद्री मील से आगे नहीं बढ़ेगा जिससे प्रादेशिक सागर की चौड़ाई मापी जाती है।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
तीनों कथन संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) के प्रमुख प्रावधानों का सही वर्णन करते हैं। यह सम्मेलन समुद्री क्षेत्रों, नौवहन अधिकारों और विश्व के महासागरों में संसाधन प्रबंधन को नियंत्रित करने वाले व्यापक नियम स्थापित करता है।
✅ कथन 1 – सही: UNCLOS अनुच्छेद 3 तटीय राज्यों को आधार रेखा से 12 समुद्री मील तक प्रादेशिक सागर स्थापित करने की अनुमति देता है, जो इस समुद्री क्षेत्र पर संप्रभुता का प्रतिनिधित्व करता है।
✅ कथन 2 – सही: UNCLOS अनुच्छेद 17-19 सभी जहाजों (तटीय और भू-आबद्ध राज्यों) के लिए प्रादेशिक सागर से निर्दोष मार्ग के अधिकार की गारंटी देते हैं, बशर्ते मार्ग निरंतर, त्वरित हो और तटीय राज्य की शांति और सुरक्षा के लिए हानिकारक न हो।
✅ कथन 3 – सही: UNCLOS अनुच्छेद 57 यह निर्धारित करता है कि अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) आधार रेखा से 200 समुद्री मील से आगे नहीं बढ़ सकता, जो तटीय राज्यों को इस क्षेत्र के भीतर प्राकृतिक संसाधनों पर संप्रभु अधिकार प्रदान करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: UNCLOS समुद्री क्षेत्र
| समुद्री क्षेत्र | आधार रेखा से दूरी | तटीय राज्य के प्रमुख अधिकार | अन्य राज्यों के अधिकार |
|---|---|---|---|
| आंतरिक जल | आधार रेखा के भूमि की ओर | पूर्ण संप्रभुता | मार्ग का कोई अधिकार नहीं |
| प्रादेशिक सागर | 12 समुद्री मील तक | पूर्ण संप्रभुता (निर्दोष मार्ग के अधीन) | निर्दोष मार्ग का अधिकार |
| सन्निहित क्षेत्र | 24 समुद्री मील तक | प्रवर्तन अधिकार क्षेत्र (सीमा शुल्क, राजकोषीय, आप्रवासन, स्वच्छता कानून) | नौवहन की स्वतंत्रता |
| अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) | 200 समुद्री मील तक | प्राकृतिक संसाधनों पर संप्रभु अधिकार; कृत्रिम संरचनाओं, समुद्री अनुसंधान, पर्यावरण संरक्षण पर अधिकार क्षेत्र | नौवहन, उड़ान, पनडुब्बी केबल/पाइपलाइन बिछाने की स्वतंत्रता |
| महाद्वीपीय शेल्फ | 200 समुद्री मील तक (कुछ मामलों में 350 nm या उससे अधिक तक विस्तार योग्य) | समुद्र तल और उपमृदा संसाधनों पर संप्रभु अधिकार | केबल/पाइपलाइन बिछाने की स्वतंत्रता (सहमति के साथ) |
| उच्च सागर | EEZ से परे | कोई संप्रभुता नहीं | नौवहन, उड़ान, मछली पकड़ने, वैज्ञानिक अनुसंधान की स्वतंत्रता (साझा विरासत) |
- आधार रेखा: सामान्य आधार रेखा तट के साथ निम्न-जल रेखा है; सीधी आधार रेखाओं का उपयोग तब किया जा सकता है जब तटरेखा गहराई से खुदी हुई हो या द्वीपों की सीमा हो।
- निर्दोष मार्ग: निरंतर, त्वरित होना चाहिए; हथियार अभ्यास, मछली पकड़ने, अनुसंधान, या तटीय राज्य की सुरक्षा के लिए हानिकारक कार्यों को शामिल नहीं करता।
- UNCLOS स्वीकृति: 1982 में मोंटेगो बे, जमैका में हस्ताक्षरित; 1994 में लागू हुआ; अक्सर "महासागरों के लिए संविधान" कहा जाता है।
- भारत और UNCLOS: भारत ने 1995 में UNCLOS की पुष्टि की; 12 nm प्रादेशिक सागर और 200 nm EEZ का दावा करता है।
निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
- एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक
- मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था
- शंघाई सहयोग संगठन
भारत उपर्युक्त में से किसका सदस्य है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
भारत प्रश्न में उल्लिखित तीनों संगठनों का सदस्य है। भारत 2015 में एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (AIIB) में संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल हुआ और चीन के बाद इसका दूसरा सबसे बड़ा शेयरधारक है। भारत 27 जून 2016 को मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (MTCR) का 35वां भागीदार देश बनकर पूर्ण सदस्य बना। भारत 2017 में पाकिस्तान के साथ शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का पूर्ण सदस्य बना।
✅ कथन 1 – सही: भारत AIIB का संस्थापक सदस्य (2015) है और चीन के बाद दूसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखता है।
✅ कथन 2 – सही: भारत जून 2016 में MTCR का 35वां सदस्य बना, जिससे महत्वपूर्ण मिसाइल और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों तक पहुंच मिली।
✅ कथन 3 – सही: भारत 2017 में SCO का पूर्ण सदस्य बना, अपनी पूर्व पर्यवेक्षक स्थिति से उन्नत होकर।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में भारत की सदस्यता
| संगठन | भारत की सदस्यता का वर्ष | प्रमुख विवरण |
|---|---|---|
| एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (AIIB) | 2015 (संस्थापक सदस्य) | मुख्यालय बीजिंग में; भारत 7.6% मतदान अधिकार के साथ दूसरा सबसे बड़ा शेयरधारक; 2024 तक 109 सदस्य |
| मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (MTCR) | 2016 (35वां सदस्य) | सामूहिक विनाश के हथियारों के लिए मानव रहित वितरण प्रणालियों के प्रसार को रोकने के उद्देश्य से अनौपचारिक राजनीतिक साझेदारी; 35 सदस्य |
| शंघाई सहयोग संगठन (SCO) | 2017 (पूर्ण सदस्य) | यूरेशियाई राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संगठन; 10 पूर्ण सदस्य; भारत 2005 से पर्यवेक्षक था; पाकिस्तान के साथ शामिल हुआ |
संयुक्त राष्ट्र महासभा के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- संयुक्त राष्ट्र महासभा गैर-सदस्य राज्यों को पर्यवेक्षक का दर्जा प्रदान कर सकती है।
- अंतर-सरकारी संगठन संयुक्त राष्ट्र महासभा में पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र महासभा में स्थायी पर्यवेक्षक संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में मिशन बनाए रख सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
संयुक्त राष्ट्र महासभा के पर्यवेक्षक दर्जा प्रावधानों से संबंधित तीनों कथन सही हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा को गैर-सदस्य राज्यों, अंतर-सरकारी संगठनों और अन्य संस्थाओं को पर्यवेक्षक का दर्जा प्रदान करने का अधिकार है, जिससे वे सत्रों में भाग ले सकते हैं और संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में स्थायी मिशन बनाए रख सकते हैं।
✅ कथन 1 – सही: संयुक्त राष्ट्र महासभा गैर-सदस्य राज्यों को पर्यवेक्षक का दर्जा प्रदान कर सकती है, जैसे फिलिस्तीन और होली सी (वेटिकन सिटी), जिन्होंने फिलिस्तीन के उन्नत दर्जे से पहले यह स्थिति धारण की थी।
✅ कथन 2 – सही: अफ्रीकी संघ, यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति जैसे अंतर-सरकारी संगठनों को उनकी योग्यता के क्षेत्रों में मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में पर्यवेक्षक का दर्जा प्रदान किया गया है।
✅ कथन 3 – सही: स्थायी पर्यवेक्षकों को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में स्थायी मिशन बनाए रखने और महासभा सत्रों में भाग लेने की अनुमति है, हालांकि वे प्रस्तावों पर मतदान नहीं कर सकते।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षक दर्जा
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| परिभाषा | संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा गैर-सदस्य राज्यों और अंतर-सरकारी संगठनों को संयुक्त राष्ट्र गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रदान किया गया विशेषाधिकार |
| पर्यवेक्षकों के अधिकार | सत्रों में भाग लेना, बहसों के दौरान बोलना, संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में मिशन बनाए रखना, दस्तावेज प्रस्तुत करना |
| सीमाएं | प्रस्तावों पर मतदान नहीं कर सकते, स्वतंत्र रूप से एजेंडा आइटम प्रस्तावित नहीं कर सकते |
| गैर-सदस्य राज्य पर्यवेक्षक | होली सी (वेटिकन सिटी) - 1964 से; फिलिस्तीन - 2012 से उन्नत पर्यवेक्षक दर्जा |
| अंतर-सरकारी संगठन पर्यवेक्षक | यूरोपीय संघ, अफ्रीकी संघ, अरब लीग, इस्लामी सहयोग संगठन, अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति, अन्य |
| प्रदान करने का अधिकार | बहुमत मत द्वारा संयुक्त राष्ट्र महासभा |
निम्नलिखित में से कौन सा कथन 'पोलर कोड' का सबसे अच्छा वर्णन करता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — यह ध्रुवीय जल में संचालित होने वाले जहाजों के लिए अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा संहिता है।
पोलर कोड अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) द्वारा अपनाया गया एक अंतर्राष्ट्रीय समुद्री नियमन है जो विशेष रूप से आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में संचालित होने वाले जहाजों के लिए अनिवार्य सुरक्षा और पर्यावरणीय मानक स्थापित करता है। यह ध्रुवीय नेविगेशन की अनूठी चुनौतियों को संबोधित करता है जिसमें जहाज डिजाइन, चालक दल प्रशिक्षण, संचालन प्रक्रियाएं और प्रदूषण निवारण उपाय शामिल हैं।
✅ विकल्प 1 – सही: ध्रुवीय जल में जहाजों के लिए अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा संहिता के रूप में पोलर कोड का सटीक वर्णन करता है।
❌ विकल्प 2 – गलत: पोलर कोड क्षेत्रीय सीमांकन के बारे में नहीं है; यह जहाजों पर लागू एक समुद्री सुरक्षा नियमन है।
❌ विकल्प 3 – गलत: यह संहिता वाणिज्यिक शिपिंग सुरक्षा से संबंधित है, न कि वैज्ञानिकों के लिए अनुसंधान मानदंडों से।
❌ विकल्प 4 – गलत: यह आर्कटिक परिषद का व्यापार और सुरक्षा समझौता नहीं है, बल्कि एक IMO समुद्री सुरक्षा नियमन है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पोलर कोड
- पूरा नाम: ध्रुवीय जल में संचालित जहाजों के लिए अंतर्राष्ट्रीय संहिता
- द्वारा अपनाया गया: अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) द्वारा 2014 में; 1 जनवरी, 2017 को लागू हुआ
- दायरा: आर्कटिक और अंटार्कटिक दोनों जल को कवर करता है, ध्रुवीय वातावरण में मौजूद जोखिमों को संबोधित करता है
- प्रमुख आवश्यकताएं: जहाज डिजाइन और निर्माण मानक, उपकरण आवश्यकताएं, चालक दल प्रशिक्षण और प्रमाणन, संचालन सुरक्षा प्रक्रियाएं, पर्यावरण संरक्षण उपाय
- उद्देश्य: सुरक्षित जहाज संचालन सुनिश्चित करना और शिपिंग-संबंधित प्रदूषण और दुर्घटनाओं से प्राचीन ध्रुवीय पर्यावरण की रक्षा करना
- कवरेज: 2017 के बाद निर्मित नए जहाजों और ध्रुवीय यात्राओं में लगे मौजूदा जहाजों पर लागू होता है
- पर्यावरणीय फोकस: तेल, रसायन, सीवेज और कचरे के निर्वहन पर प्रतिबंध; अंटार्कटिक जल में भारी ईंधन तेल के उपयोग और परिवहन पर प्रतिबंध
निम्नलिखित में से कौन सा कथन सेनकाकू द्वीपों से संबंधित मुद्दे को सर्वोत्तम रूप से दर्शाता है, जिनका समाचारों में कभी-कभी उल्लेख होता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — चीन और जापान पूर्वी चीन सागर में इन द्वीपों पर समुद्री विवादों में संलग्न हैं
सेनकाकू द्वीप (चीन में दियाओयू कहा जाता है) पूर्वी चीन सागर में निर्जन द्वीपों का एक समूह है जो जापान और चीन के बीच क्षेत्रीय विवाद के केंद्र में है। जापान 1972 से इन द्वीपों का प्रशासन कर रहा है, लेकिन चीन भी उन पर संप्रभुता का दावा करता है, जिससे दोनों देशों के बीच निरंतर समुद्री तनाव है।
❌ विकल्प 1 – गलत: सेनकाकू द्वीप पूर्वी चीन सागर में प्राकृतिक द्वीप हैं, न कि दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप।
✅ विकल्प 2 – सही: यह पूर्वी चीन सागर में इन द्वीपों पर जापान-चीन क्षेत्रीय विवाद का सटीक वर्णन करता है।
❌ विकल्प 3 – गलत: सेनकाकू द्वीपों पर कोई स्थायी अमेरिकी सैन्य अड्डा नहीं है; वे निर्जन हैं।
❌ विकल्प 4 – गलत: अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने उन्हें निर्जन भूमि घोषित नहीं किया है, और दक्षिण पूर्व एशियाई देश इन द्वीपों के दावेदार नहीं हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सेनकाकू/दियाओयू द्वीप विवाद
- स्थान: पूर्वी चीन सागर, ताइवान के लगभग 120 समुद्री मील उत्तर-पूर्व में
- जापानी नाम: सेनकाकू द्वीप; चीनी नाम: दियाओयू द्वीप
- स्थिति: लगभग 7 वर्ग किमी में फैले 8 निर्जन द्वीपों और चट्टानों का समूह
- वर्तमान प्रशासन: जापान (1972 से, अमेरिकी नियंत्रण से वापसी के बाद)
- विवाद में पक्ष: जापान, चीन और ताइवान सभी संप्रभुता का दावा करते हैं
- रणनीतिक महत्व: महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों, समृद्ध मछली पकड़ने के क्षेत्रों और संभावित तेल और गैस भंडार के निकट स्थित
- हालिया तनाव: 2012 में जापान द्वारा तीन द्वीपों के राष्ट्रीयकरण के बाद से द्वीपों के आसपास के जल क्षेत्र में चीनी तटरक्षक जहाजों की बार-बार घुसपैठ बढ़ी है
"संयुक्त राष्ट्र साख समिति" के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा स्थापित एक समिति है और इसकी देखरेख में कार्य करती है।
- यह परंपरागत रूप से प्रत्येक वर्ष मार्च, जून और सितंबर में बैठक करती है।
- यह अनुमोदन के लिए महासभा को रिपोर्ट प्रस्तुत करने से पहले सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्यों की साख का आकलन करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 3
संयुक्त राष्ट्र साख समिति संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक समिति है, सुरक्षा परिषद की नहीं। यह प्रत्येक नियमित सत्र की शुरुआत में नियुक्त की जाती है (मार्च, जून, सितंबर जैसे विशिष्ट महीनों में नहीं)। केवल कथन 3 सही है क्योंकि समिति सदस्य राज्यों के प्रतिनिधियों की साख की जांच करती है और अनुमोदन के लिए महासभा को रिपोर्ट करती है।
❌ कथन 1 – गलत: साख समिति संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपने अध्यक्ष के प्रस्ताव पर स्थापित की जाती है, सुरक्षा परिषद द्वारा नहीं।
❌ कथन 2 – गलत: समिति महासभा के प्रत्येक नियमित सत्र की शुरुआत में (आमतौर पर सितंबर में) नियुक्त की जाती है, न कि वर्ष भर मार्च, जून और सितंबर में।
✅ कथन 3 – सही: समिति सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्य राज्यों के प्रतिनिधियों की साख की जांच करती है (जो राज्य/सरकार के प्रमुख या विदेश मंत्री द्वारा प्रस्तुत की जाती है) और प्रक्रिया के नियम 27 और 28 के अनुसार महासभा को अनुमोदन के लिए रिपोर्ट करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संयुक्त राष्ट्र साख समिति
- प्रकृति: संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक समिति, जिसमें अध्यक्ष के प्रस्ताव पर नियुक्त 9 सदस्य होते हैं
- नियुक्ति: महासभा के प्रत्येक नियमित सत्र की शुरुआत में स्थापित की जाती है
- अधिदेश: सदस्य राज्यों के प्रतिनिधियों की साख की जांच करती है और महासभा को रिपोर्ट करती है (नियम 28)
- साख प्रस्तुति: साख राज्य/सरकार के प्रमुख या विदेश मंत्री द्वारा महासचिव को प्रस्तुत की जाती है (नियम 27)
- कार्य: राजनयिक साख सत्यापित करके महासभा में सदस्य राज्यों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है
- महत्व: जब किसी राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रतिस्पर्धी दावे होते हैं तो यह राजनीतिक रूप से विवादास्पद हो सकती है (जैसे 2021 के तख्तापलट के बाद म्यांमार, तालिबान अधिग्रहण के बाद अफगानिस्तान)
निम्नलिखित देशों पर विचार कीजिए:
- आर्मेनिया
- अज़रबैजान
- क्रोएशिया
- रोमानिया
- उज़्बेकिस्तान
उपर्युक्त में से कौन तुर्किक राज्यों के संगठन के सदस्य हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 2 और 5
तुर्किक राज्यों का संगठन (OTS), जिसे पूर्व में तुर्किक काउंसिल के नाम से जाना जाता था, तुर्किक भाषी राष्ट्रों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने वाला एक अंतर-सरकारी संगठन है। सूचीबद्ध देशों में से केवल अज़रबैजान (संस्थापक सदस्य) और उज़्बेकिस्तान (2019 में शामिल हुआ) OTS के पूर्ण सदस्य हैं।
✅ कथन 2 – सही: अज़रबैजान 2009 में स्थापित तुर्किक राज्यों के संगठन का एक संस्थापक सदस्य है।
✅ कथन 5 – सही: उज़्बेकिस्तान 2019 में तुर्किक राज्यों के संगठन का पूर्ण सदस्य बना।
❌ कथन 1 – गलत: आर्मेनिया तुर्किक राज्यों के संगठन का सदस्य नहीं है; यह मुख्य रूप से अर्मेनियाई जातीयता वाला एक इंडो-यूरोपीय राष्ट्र है।
❌ कथन 3 – गलत: क्रोएशिया तुर्किक राज्यों के संगठन का सदस्य नहीं है; यह एक स्लाविक यूरोपीय राष्ट्र और EU सदस्य है।
❌ कथन 4 – गलत: रोमानिया तुर्किक राज्यों के संगठन का सदस्य नहीं है; यह एक रोमांस भाषा बोलने वाला यूरोपीय राष्ट्र है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: तुर्किक राज्यों का संगठन
- स्थापना: अक्टूबर 2009 में तुर्किक काउंसिल के रूप में; नवंबर 2021 में तुर्किक राज्यों का संगठन के रूप में नामकरण
- पूर्ण सदस्य (5): अज़रबैजान, कज़ाकिस्तान, किर्गिज़स्तान, तुर्की और उज़्बेकिस्तान
- पर्यवेक्षक राज्य (3): हंगरी, तुर्कमेनिस्तान और उत्तरी साइप्रस तुर्की गणराज्य
- उद्देश्य: तुर्किक भाषी राज्यों के बीच राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा क्षेत्रों में व्यापक सहयोग को बढ़ावा देना
- सचिवालय: इस्तांबुल, तुर्की में स्थित
- साझा विरासत: साझा तुर्किक भाषाई, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों पर आधारित
"G20 सामान्य रूपरेखा (G20 Common Framework)" के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह पेरिस क्लब के साथ मिलकर G20 द्वारा समर्थित एक पहल है।
- यह असंधारणीय ऋण वाले निम्न आय वाले देशों का समर्थन करने की एक पहल है।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
ऋण सेवा निलंबन पहल (DSSI) से परे ऋण उपचार के लिए G20 सामान्य रूपरेखा नवंबर 2020 में निम्न आय वाले देशों में असंधारणीय ऋण को संबोधित करने के लिए एक समन्वित तंत्र के रूप में स्थापित की गई थी। यह व्यापक ऋण उपचार समाधान प्रदान करने के लिए G20 और पेरिस क्लब लेनदारों द्वारा एक संयुक्त प्रयास का प्रतिनिधित्व करती है।
✅ कथन 1 – सही: G20 सामान्य रूपरेखा वास्तव में पेरिस क्लब के साथ मिलकर G20 द्वारा समर्थित एक पहल है, जो आधिकारिक द्विपक्षीय लेनदारों के बीच एक समन्वित दृष्टिकोण बनाती है।
✅ कथन 2 – सही: यह रूपरेखा विशेष रूप से असंधारणीय ऋण वाले निम्न आय वाले देशों (LICs) को लक्षित करती है, जो ऋण पुनर्गठन और राहत के लिए संरचित तंत्र प्रदान करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: G20 सामान्य रूपरेखा
- शुभारंभ: नवंबर 2020 में सऊदी अरब की G20 अध्यक्षता के दौरान, COVID-19 ऋण संकट के जवाब में
- उद्देश्य: लंबे समय तक ऋण संवेदनशीलता का सामना करने वाले देशों के लिए अस्थायी DSSI (ऋण सेवा निलंबन पहल) से परे ऋण उपचार प्रदान करना
- प्रतिभागी: आधिकारिक द्विपक्षीय लेनदारों के रूप में G20 देश और पेरिस क्लब लेनदार, निजी लेनदारों से तुलनीय उपचार की अपेक्षा के साथ
- पात्रता: DSSI-योग्य देश (विश्व बैंक वर्गीकरण के अनुसार 73 निम्न आय वाले देश)
- मुख्य विशेषताएँ: केस-दर-केस ऋण उपचार, लेनदार समन्वय, ऋण संधारणीयता विश्लेषण, और सभी लेनदार प्रकारों में तुलनीय उपचार
- कार्यान्वयन: चाड, इथियोपिया और जाम्बिया इस रूपरेखा के तहत उपचार का अनुरोध करने वाले पहले देशों में से थे
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- वियतनाम हाल के वर्षों में विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक रहा है।
- वियतनाम में बहुदलीय राजनीतिक प्रणाली है।
- वियतनाम की आर्थिक वृद्धि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के साथ इसके एकीकरण और निर्यात पर ध्यान केंद्रित करने से जुड़ी है।
- लंबे समय से, वियतनाम की कम श्रम लागत और स्थिर विनिमय दरों ने वैश्विक निर्माताओं को आकर्षित किया है।
- वियतनाम में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का सबसे उत्पादक ई-सेवा क्षेत्र है।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1, 3 और 4
वियतनाम वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपने रणनीतिक एकीकरण और निर्यात-उन्मुख विकास मॉडल द्वारा संचालित, विश्व स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में उभरा है। देश के प्रतिस्पर्धी लाभों में कम श्रम लागत और स्थिर विनिमय दर शामिल हैं, जिन्होंने वैश्विक निर्माताओं से महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया है। हालाँकि, वियतनाम एकल-दलीय साम्यवादी राजनीतिक प्रणाली के तहत काम करता है, बहुदलीय लोकतंत्र नहीं, और इसका ई-सेवा क्षेत्र, हालांकि बढ़ रहा है, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सबसे उत्पादक नहीं है।
✅ कथन 1 – सही: वियतनाम हाल के वर्षों में विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक रहा है, 2020 महामारी के दौरान भी निरंतर GDP वृद्धि के साथ।
❌ कथन 2 – गलत: वियतनाम वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में एक एकल-दलीय साम्यवादी राज्य है, बहुदलीय राजनीतिक प्रणाली नहीं।
✅ कथन 3 – सही: वियतनाम की आर्थिक सफलता सीधे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के साथ इसके एकीकरण और निर्यात-आधारित विकास रणनीति से जुड़ी है।
✅ कथन 4 – सही: कम श्रम लागत और स्थिर विनिमय दरें वियतनाम में वैश्विक निर्माताओं को आकर्षित करने वाले प्रमुख कारक रहे हैं, विशेष रूप से जब अन्य पूर्वी एशियाई देशों में मजदूरी बढ़ी।
❌ कथन 5 – गलत: एशियाई विकास बैंक के अनुसार, डिजिटल वित्तीय सेवाओं सहित ई-सेवाएं वियतनाम में प्रारंभिक अवस्था में हैं, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सबसे उत्पादक नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वियतनाम का आर्थिक विकास मॉडल
- राजनीतिक प्रणाली: 1976 में पुनर्एकीकरण के बाद से वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शासित एकल-दलीय समाजवादी गणराज्य।
- आर्थिक सुधार: 1986 में शुरू की गई डोई मोई (नवीकरण) नीति ने वियतनाम को केंद्रीय रूप से नियोजित से समाजवादी-उन्मुख बाजार अर्थव्यवस्था में बदल दिया।
- विकास चालक: निर्यात-उन्मुख विनिर्माण, एफडीआई आकर्षण, वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकरण, और CPTPP और RCEP जैसे व्यापार समझौतों में सदस्यता।
- विनिर्माण केंद्र: कम श्रम लागत, राजनीतिक स्थिरता और रणनीतिक स्थान के कारण वैश्विक निर्माताओं के लिए चीन के विकल्प के रूप में उभरा।
- व्यापार संबंध: प्रमुख व्यापारिक भागीदारों में चीन, अमेरिका, यूरोपीय संघ, आसियान सदस्य शामिल हैं; अमेरिका-चीन व्यापार तनाव का महत्वपूर्ण लाभार्थी।
- डिजिटल अर्थव्यवस्था: दक्षिण पूर्व एशिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली इंटरनेट अर्थव्यवस्था होने का अनुमान है, हालांकि ई-सेवा क्षेत्र अभी भी सिंगापुर जैसे क्षेत्रीय नेताओं की तुलना में विकासशील है।
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
देश - हाल ही में समाचारों में रहने का महत्वपूर्ण कारण
- चाड – चीन द्वारा स्थायी सैन्य अड्डे की स्थापना।
- गिनी – सेना द्वारा संविधान और सरकार का निलंबन
- लेबनान – गंभीर और लंबे समय तक आर्थिक मंदी
- ट्यूनीशिया – राष्ट्रपति द्वारा संसद का निलंबन
ऊपर दिए गए कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल तीन युग्म
यह प्रश्न हाल के अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों के ज्ञान का परीक्षण करता है। चार युग्मों में से तीन सही सुमेलित हैं जबकि चाड के बारे में पहला युग्म गलत है क्योंकि चीन ने वहां कोई स्थायी सैन्य अड्डा स्थापित नहीं किया है।
✅ युग्म 1 – गलत: चीन ने चाड में कोई स्थायी सैन्य अड्डा स्थापित नहीं किया है। चीन का एकमात्र विदेशी सैन्य अड्डा जिबूती में है।
✅ युग्म 2 – सही: गिनी में सितंबर 2021 में सैन्य तख्तापलट हुआ जिसमें विशेष बलों ने राष्ट्रपति अल्फा कोंडे को बंदी बना लिया और संविधान को निलंबित कर सरकार को भंग कर दिया।
✅ युग्म 3 – सही: लेबनान 2019 से गंभीर और लंबी आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है, जो राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और सुधारों की कमी के कारण है, जिससे लगभग 74% आबादी प्रभावित है।
✅ युग्म 4 – सही: ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति कैस सैयद ने जुलाई 2021 में संसद को निलंबित किया और बाद में मार्च 2022 में इसे भंग कर दिया जब सांसदों ने ऑनलाइन सत्र आयोजित कर उनके फरमानों को निरस्त करने के लिए मतदान किया, जिसे उन्होंने असफल तख्तापलट का प्रयास बताया।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- बिडिबिडी उत्तर-पश्चिमी केन्या में एक बड़ा शरणार्थी बस्ती है।
- दक्षिण सूडान गृहयुद्ध से भागे कुछ लोग बिडिबिडी में रहते हैं।
- सोमालिया में गृहयुद्ध से भागे कुछ लोग केन्या में दादाब शरणार्थी परिसर में रहते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 2 और 3
यह प्रश्न पूर्वी अफ्रीका में प्रमुख शरणार्थी बस्तियों के बारे में ज्ञान का परीक्षण करता है। कथन 1 बिडिबिडी को गलती से केन्या में स्थित बताता है, जबकि कथन 2 और 3 बिडिबिडी (युगांडा) और दादाब (केन्या) में शरणार्थी आबादी की सही पहचान करते हैं।
❌ कथन 1 – गलत: बिडिबिडी उत्तर-पश्चिमी युगांडा में स्थित एक बड़ी शरणार्थी बस्ती है, केन्या में नहीं।
✅ कथन 2 – सही: युगांडा में बिडिबिडी शरणार्थी बस्ती उन लोगों को आश्रय देती है जो 2013 के बाद से तीव्र हुए दक्षिण सूडान गृहयुद्ध से भागे थे।
✅ कथन 3 – सही: केन्या में दादाब शरणार्थी परिसर विश्व के सबसे बड़े शरणार्थी शिविरों में से एक है और मुख्य रूप से उन शरणार्थियों को आश्रय देता है जो सोमालिया में गृहयुद्ध और अस्थिरता से भागे थे।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पूर्वी अफ्रीका में प्रमुख शरणार्थी बस्तियाँ
- बिडिबिडी, युगांडा: विश्व की सबसे बड़ी शरणार्थी बस्तियों में से एक, दक्षिण सूडान सीमा के पास उत्तर-पश्चिमी युगांडा में स्थित; मुख्य रूप से गृहयुद्ध से भागे दक्षिण सूडानी शरणार्थियों को आश्रय देती है।
- दादाब, केन्या: सोमालिया सीमा के पास उत्तर-पूर्वी केन्या में स्थित; 1991-92 में स्थापित; मुख्य रूप से सोमाली शरणार्थियों को आश्रय देता है; अपने चरम पर 400,000 से अधिक शरणार्थियों को आश्रय दिया।
- काकुमा, केन्या: उत्तर-पश्चिमी केन्या में एक अन्य प्रमुख शरणार्थी शिविर; दक्षिण सूडान, सोमालिया, लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो और अन्य देशों के शरणार्थियों को आश्रय देता है।
- दक्षिण सूडान गृहयुद्ध: संघर्ष दिसंबर 2013 में शुरू हुआ, जिससे बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और 2 मिलियन से अधिक शरणार्थी युगांडा, केन्या, इथियोपिया और सूडान सहित पड़ोसी देशों में भाग गए।
- सोमालिया गृहयुद्ध: 1991 से जारी संघर्ष; लाखों लोगों के आंतरिक और बाहरी विस्थापन के साथ विश्व के सबसे लंबे समय तक चलने वाले शरणार्थी संकटों में से एक का निर्माण किया है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
भारत के महान्यायवादी और भारत के सालिसिटर जनरल सरकार के एकमात्र अधिकारी हैं जिन्हें भारत की संसद की बैठकों में भाग लेने की अनुमति है।
भारत के संविधान के अनुसार, भारत के महान्यायवादी अपना त्यागपत्र प्रस्तुत करते हैं जब उन्हें नियुक्त करने वाली सरकार इस्तीफा दे देती है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न तो 1, न ही 2
दोनों कथनों में संसदीय भागीदारी अधिकारों और महान्यायवादी के कार्यकाल के संबंध में संवैधानिक अशुद्धियाँ हैं। कथन 1 गलत तरीके से सालिसिटर जनरल को शामिल करता है, जबकि कथन 2 महान्यायवादी के त्यागपत्र के संबंध में संवैधानिक प्रावधानों को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है।
❌ कथन 1 – गलत: अनुच्छेद 88 संसद में भाग लेने का अधिकार केवल मंत्रियों और भारत के महान्यायवादी को प्रदान करता है, भारत के सालिसिटर जनरल को नहीं। इसके अतिरिक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक जैसे अन्य अधिकारियों को भी विशिष्ट संदर्भों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जा सकता है।
❌ कथन 2 – गलत: अनुच्छेद 76 कहता है कि महान्यायवादी राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, सरकार के कार्यकाल से जुड़ा नहीं है। सरकार बदलने पर स्वचालित त्यागपत्र की कोई संवैधानिक आवश्यकता नहीं है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत के महान्यायवादी (अनुच्छेद 76)
- नियुक्ति: राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त; सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने की योग्यता होनी चाहिए
- कार्यकाल: राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं (कोई निश्चित कार्यकाल नहीं); राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं
- अधिकार (अनुच्छेद 88): दोनों सदनों, संयुक्त बैठकों और संसदीय समितियों में बोल और भाग ले सकते हैं लेकिन मतदान नहीं कर सकते
- कर्तव्य: कानूनी मामलों पर सरकार को सलाह देना, राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए कानूनी कर्तव्यों का निर्वहन करना और सर्वोच्च न्यायालय में सरकार का प्रतिनिधित्व करना
- सालिसिटर जनरल: महान्यायवादी की सहायता करते हैं लेकिन संसदीय भागीदारी के लिए कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है
- निजी प्रैक्टिस: महान्यायवादी निजी प्रैक्टिस कर सकते हैं लेकिन सरकार के विरुद्ध सलाह नहीं दे सकते या उसके खिलाफ पेश नहीं हो सकते
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत का संविधान मंत्रियों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत करता है अर्थात् कैबिनेट मंत्री, स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री, राज्य मंत्री और उप मंत्री।
- प्रधानमंत्री सहित केंद्र सरकार में मंत्रियों की कुल संख्या लोक सभा में सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न मंत्रियों के वर्गीकरण और मंत्रिपरिषद के आकार पर संवैधानिक सीमाओं के बारे में ज्ञान का परीक्षण करता है।
❌ कथन 1 – गलत: भारत का संविधान मंत्रियों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत नहीं करता है। कैबिनेट मंत्री, स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री, राज्य मंत्री और उप मंत्री में वर्गीकरण संसदीय परंपरा और व्यवहार पर आधारित है, संवैधानिक प्रावधानों पर नहीं। संविधान केवल 'मंत्रियों' और 'प्रधानमंत्री' का उल्लेख करता है, विशिष्ट श्रेणियों का निर्धारण नहीं करता।
✅ कथन 2 – सही: 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने अनुच्छेद 75(1A) सम्मिलित किया जिसमें कहा गया है कि प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की कुल संख्या लोक सभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं होगी।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मंत्रिपरिषद
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक आधार | अनुच्छेद 74 और 75 मंत्रिपरिषद से संबंधित हैं |
| वर्गीकरण (परंपरा) | कैबिनेट मंत्री, स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री, राज्य मंत्री, उप मंत्री (संवैधानिक नहीं) |
| आकार सीमा | लोक सभा की सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं (91वां संशोधन, 2003) |
| सामूहिक उत्तरदायित्व | मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी (अनुच्छेद 75(3)) |
| नियुक्ति | मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर (अनुच्छेद 75(1)) |
| अयोग्यता | एक अयोग्य सांसद को मंत्री नियुक्त नहीं किया जा सकता (91वां संशोधन) |
लोकसभा के उपसभापति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- लोकसभा में प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों के अनुसार, उपसभापति का निर्वाचन ऐसी तिथि को होगा जो सभापति निर्धारित करे।
- यह एक अनिवार्य प्रावधान है कि लोकसभा के उपसभापति के रूप में किसी उम्मीदवार का चुनाव या तो मुख्य विपक्षी दल या सत्तारूढ़ दल से होगा।
- सदन की बैठक की अध्यक्षता करते समय उपसभापति के पास सभापति के समान ही शक्तियां होती हैं और उनके निर्णयों के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती।
- उपसभापति की नियुक्ति के संबंध में सुस्थापित संसदीय प्रथा यह है कि प्रस्ताव सभापति द्वारा प्रस्तुत किया जाता है और प्रधानमंत्री द्वारा विधिवत समर्थन किया जाता है।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न लोकसभा के उपसभापति के पद के संवैधानिक और प्रक्रियात्मक पहलुओं का परीक्षण करता है। कथन 1 और 3 उपसभापति की चुनाव प्रक्रिया और शक्तियों के संबंध में सही हैं, जबकि कथन 2 और 4 गलत हैं क्योंकि वे अस्तित्वहीन अनिवार्य प्रावधानों और प्रथाओं का संदर्भ देते हैं।
✅ कथन 1 – सही: लोकसभा में प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों के अनुसार, उपसभापति के चुनाव की तिथि सभापति द्वारा निर्धारित की जाती है, जबकि सभापति के चुनाव की तिथि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है।
❌ कथन 2 – गलत: कोई अनिवार्य संवैधानिक या वैधानिक प्रावधान नहीं है कि उपसभापति विपक्ष या सत्तारूढ़ दल से होना चाहिए; यह केवल एक परंपरा (हमेशा नहीं निभाई जाती) है कि यह पद विपक्ष को प्रदान किया जाता है।
✅ कथन 3 – सही: सदन की अध्यक्षता करते समय, उपसभापति को सभापति के समान शक्तियां और गरिमा प्राप्त होती है, और उस अवधि के दौरान उनके निर्णयों के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती।
❌ कथन 4 – गलत: कोई सुस्थापित संसदीय प्रथा नहीं है कि उपसभापति के लिए प्रस्ताव सभापति द्वारा प्रस्तुत किया जाए और प्रधानमंत्री द्वारा समर्थन किया जाए; उपसभापति का चुनाव सदन द्वारा सदस्यों द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव के माध्यम से किया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लोकसभा के उपसभापति
- चुनाव: सभापति के चुनाव के बाद लोकसभा सदस्यों द्वारा निर्वाचित; तिथि सभापति द्वारा निर्धारित (राष्ट्रपति द्वारा नहीं)।
- कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं: संविधान में उपसभापति के पद का विशेष रूप से उल्लेख नहीं है; यह प्रक्रिया नियमों के तहत बनाया गया है।
- परंपरा (अनिवार्य नहीं): आमतौर पर एक परंपरा के रूप में विपक्षी दल को प्रदान किया जाता है, लेकिन कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।
- शक्तियां: अध्यक्षता करते समय सभापति के समान शक्तियां प्राप्त होती हैं; अनुपस्थिति में सभापति के कर्तव्यों का निर्वहन करता है।
- हटाना: लोकसभा के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है; 14 दिन की सूचना आवश्यक।
- पद की समाप्ति: सदस्य न रहने पर, त्यागपत्र देने पर, या हटाए जाने पर पद खाली हो जाता है।
- कोई अपील नहीं: सदन की अध्यक्षता करते समय उपसभापति द्वारा दिए गए निर्णयों के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती।
UPSC Prelims 2022 Questions Paper - Subject-wise Question Distribution
भारतीय अर्थव्यवस्था
17 Qs (17%)पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
17 Qs (17%)विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
14 Qs (14%)अंतरराष्ट्रीय संबंध
11 Qs (11%)भारतीय राजव्यवस्था
11 Qs (11%)विश्व भूगोल
7 Qs (7%)मध्यकालीन इतिहास
6 Qs (6%)आधुनिक इतिहास
4 Qs (4%)भारतीय कला और संस्कृति
4 Qs (4%)भारत का भूगोल
4 Qs (4%)समसामयिकी
3 Qs (3%)प्राचीन इतिहास
2 Qs (2%)UPSC Prelims 2022 Question Paper - FAQs & Analysis
Q1 How many total questions were asked in UPSC Prelims 2022?
Q2 What is the subject-wise question breakdown for UPSC Prelims 2022?
- भारतीय अर्थव्यवस्था: 17 questions (17%)
- पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी: 17 questions (17%)
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: 14 questions (14%)
- अंतरराष्ट्रीय संबंध: 11 questions (11%)
- भारतीय राजव्यवस्था: 11 questions (11%)
- विश्व भूगोल: 7 questions (7%)
- मध्यकालीन इतिहास: 6 questions (6%)
- आधुनिक इतिहास: 4 questions (4%)
- भारतीय कला और संस्कृति: 4 questions (4%)
- भारत का भूगोल: 4 questions (4%)
- समसामयिकी: 3 questions (3%)
- प्राचीन इतिहास: 2 questions (2%)