UPSC Prelims 2022
भारतीय अर्थव्यवस्था Previous Year Questions (PYQs)
Explore 17 solved UPSC Prelims 2022 भारतीय अर्थव्यवस्था questions with detailed step-by-step bilingual solutions, option analysis, and answer keys.
निम्नलिखित राज्यों पर विचार कीजिए:
- आंध्र प्रदेश
- केरल
- हिमाचल प्रदेश
- त्रिपुरा
उपर्युक्त में से कितने राज्य सामान्यतः चाय उत्पादक राज्यों के रूप में जाने जाते हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — सभी चार राज्य
उल्लिखित सभी चार राज्य—आंध्र प्रदेश, केरल, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा—भारत में मान्यता प्राप्त चाय उत्पादक राज्य हैं। यह प्रश्न UPSC प्रारंभिक परीक्षा 2022 में पूछा गया था, और आधिकारिक उत्तर कुंजी पुष्टि करती है कि सभी चार राज्य व्यावसायिक रूप से चाय का उत्पादन करते हैं।
✅ आंध्र प्रदेश – सही: पूर्वी घाट में अराकू घाटी और चिंतापल्ली जैसे उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में चाय की खेती होती है, हालांकि कॉफी की तुलना में कम प्रमुख है।
✅ केरल – सही: केरल पश्चिमी घाट में मुन्नार, वायनाड और इडुक्की जिलों में व्यापक बागानों के साथ एक प्रमुख चाय उत्पादक है।
✅ हिमाचल प्रदेश – सही: कांगड़ा चाय (जीआई-टैग युक्त) के लिए प्रसिद्ध, कांगड़ा, मंडी और चंबा जिलों में विशिष्ट स्वाद और गुणवत्ता के साथ उत्पादित।
✅ त्रिपुरा – सही: पूर्वोत्तर भारत में एक महत्वपूर्ण चाय उत्पादक राज्य, देश के शीर्ष चाय उत्पादकों में शामिल।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत के प्रमुख चाय उत्पादक राज्य
- शीर्ष चाय उत्पादक: असम (सबसे बड़ा उत्पादक, भारत की चाय का ~50%), पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग और डूअर्स क्षेत्र), तमिलनाडु (नीलगिरि), और केरल।
- पूर्वोत्तर क्षेत्र: त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड सभी चाय उत्पादन में योगदान करते हैं।
- उत्तर भारत: हिमाचल प्रदेश (कांगड़ा चाय), उत्तराखंड और पंजाब के कुछ हिस्सों में विशेष चाय उगाई जाती है।
- दक्षिण भारत: केरल (मुन्नार, वायनाड), तमिलनाडु (नीलगिरि, कोयंबटूर), कर्नाटक (चिकमगलूर, कूर्ग), और आंध्र प्रदेश (अराकू घाटी)।
- जीआई-टैग युक्त चाय: दार्जिलिंग चाय, असम ऑर्थोडॉक्स चाय, कांगड़ा चाय, नीलगिरि ऑर्थोडॉक्स चाय और मुन्नार चाय को भौगोलिक संकेत टैग प्राप्त हैं।
निम्नलिखित में से कौन सी स्थिति "अप्रत्यक्ष हस्तांतरण (Indirect Transfers)" को सर्वोत्तम रूप से दर्शाती है, जिसकी भारत के संदर्भ में हाल ही में मीडिया में अक्सर चर्चा होती है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — एक विदेशी कंपनी शेयरों का हस्तांतरण करती है और ऐसे शेयर भारत में स्थित संपत्तियों से अपना पर्याप्त मूल्य प्राप्त करते हैं
अप्रत्यक्ष हस्तांतरण उस स्थिति को संदर्भित करता है जहां एक विदेशी कंपनी किसी अन्य विदेशी इकाई (आमतौर पर भारत के बाहर पंजीकृत) के शेयरों का हस्तांतरण करती है, लेकिन ये शेयर भारत में स्थित संपत्तियों से अपना पर्याप्त मूल्य प्राप्त करते हैं। यह भारत सरकार को ऐसे हस्तांतरण पर पूंजीगत लाभ पर कर लगाने की अनुमति देता है, भले ही लेनदेन ऑफशोर होता है, यह सुनिश्चित करता है कि भारतीय संपत्तियों के आर्थिक मूल्य पर उचित रूप से कर लगाया जाए। यह अवधारणा वोडाफोन मामले के बाद प्रमुखता में आई और बाद में भारतीय कर कानूनों में संहिताबद्ध की गई।
❌ विकल्प 1 – गलत: यह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी देश में करों के भुगतान का वर्णन करता है, अप्रत्यक्ष हस्तांतरण कराधान का नहीं।
❌ विकल्प 2 – गलत: यह एक विदेशी कंपनी द्वारा भारतीय निवेशों से लाभ पर अपने गृह देश को कर का भुगतान करने का वर्णन करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय कराधान से संबंधित है लेकिन अप्रत्यक्ष हस्तांतरण से नहीं।
❌ विकल्प 3 – गलत: यह एक भारतीय कंपनी द्वारा विदेशी मूर्त संपत्तियों की प्रत्यक्ष खरीद और बिक्री के साथ आय की प्रत्यावर्तन का वर्णन करता है, अप्रत्यक्ष हस्तांतरण तंत्र का नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारतीय कर कानून में अप्रत्यक्ष हस्तांतरण प्रावधान
- परिभाषा: अप्रत्यक्ष हस्तांतरण तब होता है जब विदेशी कंपनी के शेयरों को ऑफशोर स्थानांतरित किया जाता है, लेकिन ये शेयर भारत में स्थित संपत्तियों से पर्याप्त मूल्य (सामान्यतः >50%) प्राप्त करते हैं।
- उत्पत्ति: यह अवधारणा वोडाफोन-हचिसन कर विवाद (2007) से प्रमुखता में आई, जहां वोडाफोन ने एक भारतीय दूरसंचार कंपनी में हचिसन की हिस्सेदारी एक ऑफशोर शेयर हस्तांतरण के माध्यम से अधिग्रहित की।
- कानूनी ढांचा: आयकर अधिनियम की धारा 9(1)(i) को 2012 में पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ संशोधित किया गया, और बाद में 2015 में अप्रत्यक्ष हस्तांतरण प्रावधानों को शामिल करने के लिए परिष्कृत किया गया।
- सीमा शर्तें: हस्तांतरण भारत में कर योग्य है यदि शेयर/हित भारतीय संपत्तियों से पर्याप्त मूल्य प्राप्त करते हैं और विदेशी कंपनी/इकाई भारत में पर्याप्त मूल्य रखती है (दोनों आमतौर पर >50%)।
- उद्देश्य: ऑफशोर शेयर हस्तांतरण के माध्यम से कर परिहार को रोकना और भारतीय संपत्तियों से प्राप्त आर्थिक मूल्य के कराधान को सुनिश्चित करना, भले ही लेनदेन भारत के बाहर हों।
- सुरक्षित बंदरगाह: छोटे शेयरधारकों (5% से कम शेयरधारिता और ₹10 करोड़ से कम मूल्य) और कुछ शर्तों को पूरा करने वाली सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए छूट मौजूद हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यदि मुद्रास्फीति बहुत अधिक है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) सरकारी प्रतिभूतियां खरीदने की संभावना रखता है।
- यदि रुपया तेजी से अवमूल्यन कर रहा है, तो RBI बाजार में डॉलर बेचने की संभावना रखता है।
- यदि संयुक्त राज्य अमेरिका या यूरोपीय संघ में ब्याज दरें गिरती हैं, तो इससे RBI को डॉलर खरीदने के लिए प्रेरित होने की संभावना है।
नीचे दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 3
यह प्रश्न RBI के मौद्रिक नीति साधनों और विदेशी मुद्रा बाजार संचालन की समझ का परीक्षण करता है। कथन 1 गलत है क्योंकि RBI उच्च मुद्रास्फीति के दौरान प्रतिभूतियां बेचता है (खरीदता नहीं), जबकि कथन 2 और 3 RBI के विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप का सही वर्णन करते हैं।
❌ कथन 1 – गलत: जब मुद्रास्फीति बहुत अधिक होती है, तो RBI खुले बाजार परिचालन (OMO) के माध्यम से बाजार से अतिरिक्त तरलता को अवशोषित करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियां बेचता है, न कि खरीदता है। प्रतिभूतियां खरीदने से अधिक धन का इंजेक्शन होगा और मुद्रास्फीति बिगड़ेगी।
✅ कथन 2 – सही: जब रुपया तेजी से अवमूल्यन करता है, तो RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर हस्तक्षेप करता है, बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ाता है ताकि विनिमय दर को स्थिर किया जा सके और रुपये को समर्थन दिया जा सके।
✅ कथन 3 – सही: अमेरिका/यूरोपीय संघ में कम ब्याज दरें भारतीय बाजारों को विदेशी निवेश के लिए अधिक आकर्षक बनाती हैं, जिससे डॉलर का प्रवाह होता है और रुपये में मजबूती आती है। RBI इन अतिरिक्त डॉलरों को खरीदता है ताकि अत्यधिक रुपये की मजबूती को रोका जा सके जो निर्यात को नुकसान पहुंचा सकती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: RBI के मौद्रिक और विदेशी मुद्रा संचालन
| आर्थिक स्थिति | RBI की कार्रवाई | उद्देश्य |
|---|---|---|
| उच्च मुद्रास्फीति | सरकारी प्रतिभूतियां बेचता है (OMO) | अतिरिक्त तरलता को अवशोषित करना, मुद्रा आपूर्ति कम करना |
| कम मुद्रास्फीति/मंदी | सरकारी प्रतिभूतियां खरीदता है (OMO) | तरलता का इंजेक्शन, मुद्रा आपूर्ति बढ़ाना |
| रुपये का अवमूल्यन | विदेशी मुद्रा (आमतौर पर डॉलर) बेचता है | विदेशी मुद्रा आपूर्ति बढ़ाना, रुपये को स्थिर करना |
| रुपये में मजबूती | विदेशी मुद्रा (डॉलर) खरीदता है | अत्यधिक मजबूती रोकना, निर्यात की रक्षा करना |
| पूंजी प्रवाह (कम विदेशी दरें) | भंडार बनाने के लिए डॉलर खरीदता है | विनिमय दर प्रबंधन, तेजी से मजबूती रोकना |
- खुले बाजार परिचालन (OMO): अर्थव्यवस्था में तरलता और मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद/बिक्री
- विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप: विनिमय दर में उतार-चढ़ाव को प्रबंधित करने के लिए RBI द्वारा विदेशी मुद्रा की खरीद/बिक्री
- निष्फलीकरण (Sterilization): जब RBI डॉलर खरीदता है, तो वह एक साथ प्रतिभूतियां बेचता है ताकि बनाई गई रुपये की तरलता को बेअसर किया जा सके
- विदेशी मुद्रा भंडार: बाह्य स्थिरता सुनिश्चित करने, आयात आवश्यकताओं को पूरा करने और विनिमय दर प्रबंधित करने के लिए बनाए रखा जाता है
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रैपिड फाइनेंसिंग इंस्ट्रूमेंट और "रैपिड क्रेडिट फैसिलिटी" निम्नलिखित में से किसके द्वारा ऋण देने के प्रावधानों से संबंधित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
रैपिड फाइनेंसिंग इंस्ट्रूमेंट (RFI) और रैपिड क्रेडिट फैसिलिटी (RCF) दोनों अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा सदस्य देशों को प्रदान की जाने वाली आपातकालीन ऋण सुविधाएं हैं जो तत्काल भुगतान संतुलन की आवश्यकताओं का सामना कर रहे हैं। RFI सभी IMF सदस्य देशों के लिए उपलब्ध है जिन्हें पूर्ण कार्यक्रम की आवश्यकता के बिना तेजी से वित्तीय सहायता की आवश्यकता है, जबकि RCF एक रियायती ऋण सुविधा है जो विशेष रूप से निम्न-आय वाले देशों के लिए डिज़ाइन की गई है जो गरीबी न्यूनीकरण और विकास ट्रस्ट (PRGT) के सदस्य हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: IMF आपातकालीन ऋण सुविधाएं
| विशेषता | रैपिड फाइनेंसिंग इंस्ट्रूमेंट (RFI) | रैपिड क्रेडिट फैसिलिटी (RCF) |
|---|---|---|
| पात्रता | सभी IMF सदस्य देश | निम्न-आय वाले देश (PRGT-पात्र) |
| ब्याज दर | बाजार-आधारित (गैर-रियायती) | शून्य ब्याज दर (रियायती) |
| उद्देश्य | तत्काल भुगतान संतुलन की आवश्यकताएं | तत्काल भुगतान संतुलन की आवश्यकताएं |
| शर्तें | न्यूनतम, पूर्ण कार्यक्रम की आवश्यकता नहीं | न्यूनतम, पूर्ण कार्यक्रम की आवश्यकता नहीं |
| वितरण | एकमुश्त, एकल वितरण | एकमुश्त, एकल वितरण |
भारत में, निम्नलिखित में से कौन सी संस्था श्रमिकों को रोजगार देने वाले कारखानों में औद्योगिक विवादों, बंद होने, छंटनी और छुट्टियों पर सूचना संकलित करती है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — श्रम ब्यूरो
श्रम ब्यूरो, श्रम और रोजगार मंत्रालय का एक संलग्न कार्यालय है, जो भारत में श्रमिकों को रोजगार देने वाले कारखानों में औद्योगिक विवादों, बंद होने, छंटनी और छुट्टियों पर सूचना संकलित करने के लिए प्राथमिक एजेंसी है। यह औद्योगिक संबंधों, रोजगार और मजदूरी सहित विभिन्न पहलुओं में व्यापक श्रम सांख्यिकी एकत्र, संकलित और प्रसारित करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में श्रम सांख्यिकी एजेंसियां
- श्रम ब्यूरो: श्रम और रोजगार मंत्रालय के अधीन संलग्न कार्यालय; औद्योगिक विवादों, हड़तालों, तालाबंदी, छंटनी, छुट्टियों, बंद होने, रोजगार सांख्यिकी, मजदूरी और श्रम स्थितियों पर डेटा संकलित करता है
- केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO): अब राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) का हिस्सा; राष्ट्रीय लेखा, औद्योगिक सांख्यिकी और सामाजिक-आर्थिक सांख्यिकी के संकलन के लिए जिम्मेदार
- उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT): वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन; औद्योगिक विकास, एफडीआई और आईपीआर से संबंधित नीतियों को तैयार और लागू करता है
- राष्ट्रीय तकनीकी जनशक्ति सूचना प्रणाली (NTMIS): शिक्षा मंत्रालय के अधीन; तकनीकी जनशक्ति संसाधनों और आवश्यकताओं पर जानकारी प्रदान करती है
- श्रम ब्यूरो द्वारा प्रमुख प्रकाशन: भारतीय श्रम सांख्यिकी, भारतीय श्रम जर्नल, त्रैमासिक रोजगार सर्वेक्षण, और श्रम पर वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण डेटा
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- घरेलू वित्तीय बचत का एक हिस्सा सरकारी उधारी की ओर जाता है।
- नीलामी में बाजार से संबंधित दरों पर जारी दिनांकित प्रतिभूतियाँ आंतरिक ऋण का एक बड़ा घटक बनती हैं;
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
दोनों कथन घरेलू बचत और सरकारी उधारी के बीच संबंध, और भारत में सरकारी ऋण जारी करने की प्रक्रिया का सटीक वर्णन करते हैं। घरेलू वित्तीय बचत विभिन्न साधनों के माध्यम से सरकारी उधारी में प्रवाहित होती है, जबकि बाजार नीलामी के माध्यम से जारी दिनांकित प्रतिभूतियाँ आंतरिक ऋण के सबसे बड़े घटक का निर्माण करती हैं।
✅ कथन 1 – सही: घरेलू वित्तीय बचत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के माध्यम से सरकार के पास जाता है, या तो प्रत्यक्ष रूप से या बैंकों और वित्तीय संस्थानों के माध्यम से जो सरकारी ऋण साधनों में निवेश करते हैं।
✅ कथन 2 – सही: दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियाँ (जी-सेक), जो आरबीआई द्वारा आयोजित नीलामी के माध्यम से बाजार-निर्धारित दरों पर जारी की जाती हैं, भारत के आंतरिक ऋण का सबसे बड़ा घटक बनती हैं, जो कुल आंतरिक देनदारियों का 80% से अधिक हिस्सा है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सरकारी उधारी और आंतरिक ऋण
| घटक | विवरण |
|---|---|
| आंतरिक ऋण के स्रोत | बाजार ऋण (दिनांकित प्रतिभूतियाँ), ट्रेजरी बिल, लघु बचत के विरुद्ध प्रतिभूतियाँ, राज्य भविष्य निधि, आरक्षित निधि, और जमा |
| दिनांकित प्रतिभूतियाँ | निश्चित परिपक्वता तिथियों वाले दीर्घकालिक सरकारी बॉन्ड (5 से 40 वर्ष तक); आरबीआई द्वारा नीलामी के माध्यम से जारी; द्वितीयक बाजार में व्यापार योग्य; आंतरिक ऋण का सबसे बड़ा घटक |
| घरेलू बचत प्रवाह | घरेलू क्षेत्र → बैंक जमा → बैंक जी-सेक में निवेश करते हैं; या घरेलू क्षेत्र → जी-सेक, एनएससी, पीपीएफ आदि की प्रत्यक्ष खरीद |
| ट्रेजरी बिल | अल्पकालिक साधन (91-दिन, 182-दिन, 364-दिन); अंकित मूल्य से छूट पर जारी; अल्पकालिक सरकारी वित्तपोषण के लिए उपयोग |
| बाजार उधारी प्रक्रिया | आरबीआई सरकार की ओर से नीलामी आयोजित करता है; प्राथमिक डीलर और बैंक भाग लेते हैं; ब्याज दरें बाजार की मांग-आपूर्ति द्वारा निर्धारित होती हैं |
भारत में कोयला नियंत्रक संगठन (CCO) की क्या भूमिका है?
- CCO भारत सरकार में कोयला सांख्यिकी का प्रमुख स्रोत है।
- यह कैप्टिव कोयला/लिग्नाइट खंडों के विकास की प्रगति की निगरानी करता है।
- यह कोयला-धारण क्षेत्रों के अधिग्रहण से संबंधित सरकार की अधिसूचना के किसी भी आपत्ति को सुनता है।
- यह सुनिश्चित करता है कि कोयला खनन कंपनियां निर्धारित समय में अंतिम उपयोगकर्ताओं को कोयला वितरित करें।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके सही उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — 1, 2 और 3
कोयला नियंत्रक संगठन (CCO) कोयला मंत्रालय का एक अधीनस्थ कार्यालय है जो भारत में कोयला सांख्यिकी के प्राथमिक स्रोत के रूप में कार्य करता है, कैप्टिव कोयला खंड विकास की निगरानी करता है, और कोयला धारण क्षेत्र अधिनियम, 1957 के तहत भूमि अधिग्रहण से संबंधित आपत्तियों को सुनने के लिए सक्षम प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है। हालांकि, अंतिम उपयोगकर्ताओं को समय पर कोयला वितरण सुनिश्चित करना इसके जनादेश का हिस्सा नहीं है।
✅ कथन 1 – सही: सांख्यिकी संग्रह अधिनियम, 2008 के तहत, CCO कोयला और लिग्नाइट के लिए नामित सांख्यिकीय प्राधिकरण है, जो वार्षिक कोयला और लिग्नाइट सर्वेक्षण आयोजित करने और अनंतिम कोयला सांख्यिकी और भारत की कोयला निर्देशिका प्रकाशित करने के लिए जिम्मेदार है।
✅ कथन 2 – सही: CCO कैप्टिव कोयला/लिग्नाइट खंडों के विकास की प्रगति की निगरानी करता है और कोयला खानों को खोलने और फिर से खोलने के लिए अनुमति प्रदान करता है।
✅ कथन 3 – सही: कोयला धारण क्षेत्र (अधिग्रहण और विकास) अधिनियम, 1957 के तहत, कोयला नियंत्रक कोयला-धारण क्षेत्रों के अधिग्रहण से संबंधित केंद्र सरकार की अधिसूचनाओं पर आपत्तियों को सुनने और केंद्र सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए सक्षम प्राधिकारी है।
❌ कथन 4 – गलत: यह सुनिश्चित करना कि कोयला खनन कंपनियां निर्धारित समय सीमा में अंतिम उपयोगकर्ताओं को कोयला वितरित करें, CCO का कार्य नहीं है; यह उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच एक वाणिज्यिक/संविदात्मक मामला है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कोयला नियंत्रक संगठन (CCO)
- स्थापना: कोयला मंत्रालय का अधीनस्थ कार्यालय जिसका मुख्यालय कोलकाता में है और क्षेत्रीय कार्यालय धनबाद, रांची, बिलासपुर, नागपुर, संबलपुर, कोठागुडेम और आसनसोल में हैं।
- सांख्यिकीय प्राधिकरण: सांख्यिकी संग्रह अधिनियम, 2008 के तहत कोयला और लिग्नाइट सांख्यिकी के लिए नामित; सभी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कोयला खानों से मासिक उत्पादन डेटा एकत्र करता है।
- मुख्य प्रकाशन: अनंतिम कोयला सांख्यिकी और भारत की कोयला निर्देशिका।
- कैप्टिव खान निगरानी: विभिन्न उद्योगों को आवंटित कैप्टिव कोयला/लिग्नाइट खंडों की विकास प्रगति की निगरानी करता है।
- नियामक भूमिका: कोयला खानों को खोलने/फिर से खोलने के लिए अनुमति प्रदान करता है; कोयला धारण क्षेत्र (अधिग्रहण और विकास) अधिनियम, 1957 के तहत सक्षम प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है।
- न्यायनिर्णयन: कोयला-धारण भूमि के अधिग्रहण के लिए सरकारी अधिसूचनाओं पर आपत्तियों को सुनता है और केंद्र सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत करता है।
भारत में कार्यरत विदेशी स्वामित्व वाली ई-कॉमर्स फर्मों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- वे अपने प्लेटफॉर्म को बाजार-स्थल के रूप में प्रदान करने के अलावा अपना स्वयं का माल बेच सकते हैं।
- उनके प्लेटफॉर्म पर बड़े विक्रेताओं का वे किस हद तक स्वामित्व रख सकते हैं, यह सीमित है।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न भारत में विदेशी ई-कॉमर्स फर्मों को नियंत्रित करने वाले FDI नियमों की समझ का परीक्षण करता है। कथन 1 गलत है क्योंकि मार्केटप्लेस मॉडल के तहत काम करने वाली विदेशी स्वामित्व वाली ई-कॉमर्स कंपनियों को अपना स्वयं का सामान बेचने से प्रतिबंधित किया गया है। कथन 2 सही है क्योंकि नियम उनके प्लेटफॉर्म पर विक्रेताओं के स्वामित्व और नियंत्रण को सीमित करते हैं।
❌ कथन 1 – गलत: मार्केटप्लेस मॉडल के तहत संचालित विदेशी स्वामित्व वाली ई-कॉमर्स फर्में अपना स्वयं का सामान नहीं बेच सकतीं; वे केवल खरीदारों और विक्रेताओं को जोड़ने वाला एक मंच प्रदान कर सकती हैं। इन्वेंटरी-आधारित मॉडल में FDI प्रतिबंधित है।
✅ कथन 2 – सही: प्रेस नोट 2 (2018) प्लेटफॉर्म द्वारा विक्रेताओं के स्वामित्व को सीमित करता है—यदि किसी विक्रेता की 25% से अधिक खरीद मार्केटप्लेस इकाई या उसकी समूह कंपनियों से होती है, तो विक्रेता को प्लेटफॉर्म द्वारा नियंत्रित माना जाता है, जो अनुमत नहीं है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: ई-कॉमर्स में FDI नीति
| पहलू | मार्केटप्लेस मॉडल | इन्वेंटरी-आधारित मॉडल |
|---|---|---|
| FDI की अनुमति | स्वचालित मार्ग के तहत 100% FDI की अनुमति | FDI की अनुमति नहीं |
| व्यवसाय मॉडल | खरीदारों और विक्रेताओं के बीच सुविधाकर्ता/मंच के रूप में कार्य करता है | इन्वेंटरी का स्वामित्व रखता है और सीधे उपभोक्ताओं को बेचता है |
| इन्वेंटरी स्वामित्व | इन्वेंटरी का स्वामित्व या नियंत्रण नहीं कर सकते | इन्वेंटरी का स्वामित्व और नियंत्रण रखता है |
| स्वयं का सामान बेचना | अपना स्वयं का सामान बेचने से प्रतिबंधित | अपना सामान बेच सकते हैं (लेकिन FDI की अनुमति नहीं) |
| विक्रेताओं पर नियंत्रण | विक्रेताओं को नियंत्रित नहीं कर सकते; 25% खरीद सीमा (प्रेस नोट 2, 2018) | इन्वेंटरी और बिक्री पर पूर्ण नियंत्रण |
| उदाहरण | अमेज़न इंडिया, फ्लिपकार्ट (मार्केटप्लेस के रूप में) | पारंपरिक खुदरा ई-कॉमर्स |
- प्रेस नोट 2 (2018): परिहार को रोकने के लिए कड़े मानदंड—मार्केटप्लेस या उसकी समूह कंपनियों से 25% से अधिक खरीद करने वाले विक्रेताओं को नियंत्रित इकाइयां माना जाता है।
- उद्देश्य: छोटे खुदरा विक्रेताओं की रक्षा करना और समान अवसर सुनिश्चित करना; शिकारी मूल्य निर्धारण और भारी छूट को रोकना।
- एकल विक्रेता प्रतिबंध: मार्केटप्लेस इकाइयां और उनकी समूह कंपनियां किसी एक विक्रेता के माध्यम से 25% से अधिक बिक्री नहीं कर सकतीं।
- अनुमत सेवाएं: गोदाम, रसद, ऑर्डर पूर्ति, कॉल सेंटर और भुगतान संग्रह सेवाएं प्रदान कर सकते हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
भारत में, ऋण रेटिंग एजेंसियों को भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विनियमित किया जाता है।
लोकप्रिय रूप से ICRA के नाम से जानी जाने वाली रेटिंग एजेंसी एक सार्वजनिक सीमित कंपनी है।
ब्रिकवर्क रेटिंग एक भारतीय ऋण रेटिंग एजेंसी है।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 3
यह प्रश्न भारत में ऋण रेटिंग एजेंसियों के नियामक ढांचे और प्रकृति के बारे में ज्ञान का परीक्षण करता है। कथन 1 गलत है क्योंकि ऋण रेटिंग एजेंसियों को सेबी द्वारा विनियमित किया जाता है, RBI द्वारा नहीं। कथन 2 और 3 सार्वजनिक सीमित कंपनी के रूप में ICRA की स्थिति और ब्रिकवर्क रेटिंग्स के भारतीय ऋण रेटिंग एजेंसी होने के संबंध में सही हैं।
❌ कथन 1 – गलत: भारत में ऋण रेटिंग एजेंसियों को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा SEBI (ऋण रेटिंग एजेंसियां) विनियम, 1999 के तहत विनियमित किया जाता है, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नहीं।
✅ कथन 2 – सही: ICRA लिमिटेड (पूर्व में इन्वेस्टमेंट इनफार्मेशन एंड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ऑफ इंडिया लिमिटेड) वास्तव में एक सार्वजनिक सीमित कंपनी है, जिसे 1991 में स्थापित किया गया था और BSE तथा NSE दोनों पर सूचीबद्ध है।
✅ कथन 3 – सही: ब्रिकवर्क रेटिंग्स (BWR) एक सेबी-पंजीकृत भारतीय ऋण रेटिंग एजेंसी है जिसे 2007 में स्थापित किया गया था, केनरा बैंक द्वारा प्रोत्साहित, और RBI द्वारा बाह्य ऋण मूल्यांकन संस्थान (ECAI) के रूप में मान्यता प्राप्त है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में ऋण रेटिंग एजेंसियां
- नियामक प्राधिकरण: सेबी ऋण रेटिंग एजेंसियों को SEBI (ऋण रेटिंग एजेंसियां) विनियम, 1999 के माध्यम से विनियमित करता है
- भारत में प्रमुख CRA: CRISIL, CARE, ICRA, इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च, ब्रिकवर्क रेटिंग्स, SMERA, इन्फोमेरिक्स
- ICRA: 1991 में स्थापित, सार्वजनिक सीमित कंपनी, स्टॉक एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध, मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस की सहायक कंपनी
- ब्रिकवर्क रेटिंग्स: 2007 में स्थापित, केनरा बैंक द्वारा प्रोत्साहित, सेबी-पंजीकृत और RBI द्वारा ECAI के रूप में मान्यता प्राप्त
- कार्य: CRA ऋण साधनों, कंपनियों और सरकारों की साख का मूल्यांकन करती हैं; रेटिंग निवेशकों को सूचित निर्णय लेने में मदद करती हैं
- RBI की भूमिका: जबकि RBI CRA को विनियमित नहीं करता है, वह बैंक पूंजी पर्याप्तता गणना के लिए कुछ एजेंसियों को ECAI के रूप में मान्यता देता है
Financial Markets and Institutions
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, "मुद्रास्फीति-सूचकांकित बांड (IIBs)" के क्या लाभ हैं?
- सरकार IIBs के माध्यम से अपने उधार पर कूपन दरों को कम कर सकती है।
- IIBs निवेशकों को मुद्रास्फीति के संबंध में अनिश्चितता से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
- IIBs पर प्राप्त ब्याज के साथ-साथ पूंजीगत लाभ कर योग्य नहीं हैं।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 2
मुद्रास्फीति-सूचकांकित बांड (IIBs) सरकारी प्रतिभूतियां हैं जो मुद्रास्फीति सूचकांकों के आधार पर मूलधन और ब्याज भुगतान दोनों को समायोजित करके निवेशकों को मुद्रास्फीति से बचाने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। सरकार को कम नाममात्र कूपन दरों से लाभ होता है क्योंकि मुद्रास्फीति समायोजन बांड संरचना में निर्मित होता है, जबकि निवेशकों को क्रय शक्ति के क्षरण से सुरक्षा मिलती है।
✅ कथन 1 – सही: IIBs सरकार को कम कूपन दरें प्रदान करने की अनुमति देते हैं क्योंकि वास्तविक रिटर्न मुद्रास्फीति समायोजन के माध्यम से सुनिश्चित होता है, जो उच्च निश्चित दरों वाले पारंपरिक बांड की तुलना में उधार लागत को कम करता है।
✅ कथन 2 – सही: IIBs निवेशकों को मुद्रास्फीति की अनिश्चितता से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं क्योंकि मूलधन और ब्याज भुगतान दोनों मुद्रास्फीति (आमतौर पर WPI या CPI) के लिए सूचकांकित होते हैं, जो वास्तविक क्रय शक्ति को संरक्षित करते हैं।
❌ कथन 3 – गलत: आयकर अधिनियम के अनुसार भारत में IIBs पर ब्याज आय और पूंजीगत लाभ दोनों कर योग्य हैं; कुछ अन्य निर्दिष्ट प्रतिभूतियों के विपरीत IIBs के लिए कोई विशेष कर छूट नहीं है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मुद्रास्फीति-सूचकांकित बांड (IIBs)
- परिचय: IIBs पहली बार 1997 में भारत में पेश किए गए और 2013 में RBI द्वारा निवेशकों को मुद्रास्फीति सुरक्षा प्रदान करने के लिए पुनः पेश किए गए।
- सूचकांकन: मूलधन और ब्याज (कूपन) भुगतान दोनों को मुद्रास्फीति सूचकांक (WPI या CPI-संयुक्त) के आधार पर समायोजित किया जाता है।
- वास्तविक रिटर्न: निवेशकों को एक निश्चित वास्तविक रिटर्न दर और मुद्रास्फीति समायोजन प्राप्त होता है, जो क्रय शक्ति सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
- सरकार को लाभ: कम नाममात्र कूपन दरें सरकार की उधार लागत को कम करती हैं क्योंकि मुद्रास्फीति जोखिम बांड संरचना में स्थानांतरित हो जाता है।
- कराधान: ब्याज आय लागू आयकर स्लैब के अनुसार कर योग्य है; पूंजीगत लाभ धारण अवधि (LTCG/STCG नियम लागू) के आधार पर कर योग्य हैं।
- बाजार स्थिति: जटिलता, कराधान मुद्दों और अन्य साधनों की तुलना में कम निवेशक जागरूकता के कारण भारत में IIBs को सीमित सफलता मिली है।
निम्नलिखित में से कौन-सी गतिविधियाँ अर्थव्यवस्था में वास्तविक क्षेत्र का गठन करती हैं?
- किसान अपनी फसल की कटाई कर रहे हैं।
- टेक्सटाइल मिलें कच्चे कपास को कपड़े में परिवर्तित कर रही हैं
- एक वाणिज्यिक बैंक एक व्यापारिक कंपनी को धन उधार दे रहा है
- एक कॉर्पोरेट निकाय विदेशों में रुपया अंकित बॉन्ड जारी कर रहा है
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 2
अर्थव्यवस्था का वास्तविक क्षेत्र उन गतिविधियों से बना है जिनमें वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन शामिल है, जबकि वित्तीय क्षेत्र मौद्रिक लेन-देन और वित्तीय साधनों से संबंधित है। गतिविधियाँ 1 और 2 क्रमशः कृषि और विनिर्माण में वास्तविक उत्पादन प्रक्रियाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो वास्तविक क्षेत्र का गठन करती हैं।
✅ कथन 1 – सही: किसानों द्वारा फसल की कटाई एक प्राथमिक क्षेत्र की गतिविधि है जिसमें कृषि वस्तुओं का वास्तविक उत्पादन शामिल है, जो वास्तविक क्षेत्र का हिस्सा है।
✅ कथन 2 – सही: टेक्सटाइल मिलों द्वारा कच्चे कपास को कपड़े में परिवर्तित करना एक विनिर्माण/द्वितीयक क्षेत्र की गतिविधि है जिसमें भौतिक वस्तुओं का उत्पादन शामिल है, जो वास्तविक क्षेत्र का हिस्सा है।
❌ कथन 3 – गलत: वाणिज्यिक बैंक द्वारा धन उधार देना एक वित्तीय मध्यस्थता गतिविधि है जिसमें वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन शामिल नहीं है; यह वित्तीय क्षेत्र से संबंधित है।
❌ कथन 4 – गलत: विदेशों में बॉन्ड जारी करना पूंजी जुटाने के लिए एक वित्तीय बाजार गतिविधि है; यह वित्तीय क्षेत्र का हिस्सा है, वास्तविक क्षेत्र का नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वास्तविक क्षेत्र बनाम वित्तीय क्षेत्र
| पहलू | वास्तविक क्षेत्र | वित्तीय क्षेत्र |
|---|---|---|
| परिभाषा | वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन से संबंधित | मौद्रिक लेन-देन और वित्तीय सेवाओं से संबंधित |
| घटक | प्राथमिक (कृषि), द्वितीयक (विनिर्माण), तृतीयक (गैर-वित्तीय सेवाएं) | बैंकिंग, बीमा, शेयर बाजार, बॉन्ड, डेरिवेटिव |
| उदाहरण | खेती, कारखाना उत्पादन, खुदरा व्यापार, परिवहन सेवाएं | बैंक ऋण, बीमा पॉलिसी, शेयर ट्रेडिंग, म्यूचुअल फंड |
| जीडीपी योगदान | मूल्य संवर्धन के माध्यम से जीडीपी में प्रत्यक्ष योगदान | वास्तविक क्षेत्र को सुविधा प्रदान करता है लेकिन वित्तीय सेवाएं प्रदान करता है |
| उत्पाद | मूर्त वस्तुएं या वास्तविक सेवाएं | वित्तीय साधन और मध्यस्थता सेवाएं |
किसी संगठन या कंपनी द्वारा किए गए व्यय के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- नई तकनीक का अधिग्रहण पूंजीगत व्यय है।
- ऋण वित्तपोषण को पूंजीगत व्यय माना जाता है, जबकि इक्विटी वित्तपोषण को राजस्व व्यय माना जाता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
यह प्रश्न संगठनात्मक लेखांकन में पूंजीगत और राजस्व व्यय की समझ का परीक्षण करता है। कथन 1 सही है क्योंकि नई तकनीक का अधिग्रहण एक दीर्घकालिक निवेश है जो संगठन को कई वर्षों तक लाभान्वित करता है, इसलिए यह पूंजीगत व्यय है। कथन 2 गलत है क्योंकि वित्तपोषण का तरीका (ऋण या इक्विटी) व्यय की प्रकृति निर्धारित नहीं करता है; बल्कि, व्यय की प्रकृति और उद्देश्य ही इसे पूंजीगत या राजस्व व्यय के रूप में वर्गीकृत करता है।
✅ कथन 1 – सही: नई तकनीक का अधिग्रहण पूंजीगत व्यय है क्योंकि यह दीर्घकालिक परिसंपत्तियां (सॉफ्टवेयर, मशीनरी, उपकरण) बनाता है जिन्हें बैलेंस शीट पर पूंजीकृत किया जाता है और उनके उपयोगी जीवन पर मूल्यह्रास किया जाता है।
❌ कथन 2 – गलत: ऋण और इक्विटी वित्तपोषण पूंजी जुटाने के तरीके हैं, व्यय के प्रकार नहीं; दोनों का उपयोग पूंजीगत या राजस्व व्यय के लिए किया जा सकता है, और वर्गीकरण व्यय की प्रकृति पर निर्भर करता है, न कि उसके वित्तपोषण स्रोत पर।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पूंजीगत बनाम राजस्व व्यय
| पहलू | पूंजीगत व्यय | राजस्व व्यय |
|---|---|---|
| परिभाषा | दीर्घकालिक लाभ प्रदान करने वाली स्थिर परिसंपत्तियों के अधिग्रहण/सुधार के लिए व्यय | अल्पकालिक लाभ प्रदान करने वाले नियमित संचालन और रखरखाव के लिए व्यय |
| उद्देश्य | परिसंपत्तियों (भवन, मशीनरी, उपकरण) का अधिग्रहण, संवर्धन या जीवन विस्तार | दैनिक परिचालन आवश्यकताओं (वेतन, उपयोगिताएं, रखरखाव) को पूरा करना |
| परिसंपत्तियों पर प्रभाव | परिसंपत्ति मूल्य बढ़ाता है या नई परिसंपत्तियां बनाता है | परिसंपत्ति मूल्य नहीं बढ़ाता है |
| लेखांकन उपचार | बैलेंस शीट पर परिसंपत्ति के रूप में दर्ज और समय के साथ मूल्यह्रास | वर्तमान अवधि के लिए लाभ और हानि विवरण में व्यय के रूप में दर्ज |
| समय सीमा | दीर्घकालिक लाभ (कई वर्ष) | अल्पकालिक लाभ (वर्तमान वर्ष) |
| उदाहरण | मशीनरी की खरीद, भवन निर्माण, भूमि अधिग्रहण, तकनीक अधिग्रहण | वेतन, मजदूरी, किराया, मरम्मत, रखरखाव, कार्यालय आपूर्ति |
भारत में, मुद्रास्फीति को नियंत्रित करके मूल्य स्थिरता बनाए रखने के लिए निम्नलिखित में से कौन उत्तरदायी है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — भारतीय रिज़र्व बैंक
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत का केंद्रीय बैंक है और विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखने के लिए वैधानिक रूप से अधिदेशित है। RBI अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति और ऋण स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न मौद्रिक नीति उपकरणों जैसे रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, नकद आरक्षित अनुपात (CRR), और सांविधिक तरलता अनुपात (SLR) का उपयोग करता है, जिससे मुद्रास्फीति के दबावों का प्रबंधन होता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: RBI और मूल्य स्थिरता
- प्राथमिक अधिदेश: संशोधित RBI अधिनियम, 1934 RBI को विकास को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखने को अपने प्राथमिक उद्देश्य के रूप में अधिदेशित करता है।
- मौद्रिक नीति समिति (MPC): RBI अधिनियम की धारा 45ZB के तहत गठित, MPC एक छह सदस्यीय समिति है जो मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक नीति ब्याज दर (रेपो दर) निर्धारित करती है।
- मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचा: 2016 में शुरू किया गया, RBI लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण का पालन करता है जिसमें उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति को +/- 2% की सहनशीलता बैंड के साथ 4% पर बनाए रखने का अधिदेश है।
- मौद्रिक नीति उपकरण: रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, CRR, SLR, खुले बाजार परिचालन (OMO), और सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) प्रमुख साधन हैं।
- अन्य एजेंसियां: उपभोक्ता मामलों का विभाग कीमतों और आवश्यक वस्तुओं की निगरानी करता है; व्यय प्रबंधन आयोग सरकारी व्यय की समीक्षा करता है; वित्तीय स्थिरता और विकास परिषद (FSDC) वित्तीय स्थिरता का समन्वय करती है लेकिन सीधे मुद्रास्फीति को नियंत्रित नहीं करती है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यूएस फेडरल रिजर्व की कड़ी मौद्रिक नीति से पूंजी पलायन हो सकता है।
- पूंजी पलायन से मौजूदा बाह्य वाणिज्यिक उधार (ECBs) वाली फर्मों की लागत बढ़ सकती है।
- घरेलू मुद्रा के अवमूल्यन से ECBs से जुड़ा मुद्रा जोखिम कम होता है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 1 और 2
यूएस फेडरल रिजर्व द्वारा कड़ी मौद्रिक नीति में ब्याज दरें बढ़ाना शामिल है, जो वैश्विक निवेशकों के लिए अमेरिकी परिसंपत्तियों को अधिक आकर्षक बनाता है, जिससे उभरते बाजारों से पूंजी पलायन होता है। यह पूंजी बहिर्वाह घरेलू मुद्रा के अवमूल्यन का कारण बनता है और फर्मों के लिए बाह्य वाणिज्यिक उधार (ECBs) की सेवा लागत बढ़ाता है, क्योंकि उन्हें विदेशी मुद्रा-मूल्यवर्गित ऋण चुकाने के लिए घरेलू मुद्रा में अधिक भुगतान करना पड़ता है।
✅ कथन 1 – सही: कड़ी अमेरिकी मौद्रिक नीति (उच्च ब्याज दरें) अमेरिका की ओर पूंजी आकर्षित करती है, जिससे भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी पलायन होता है क्योंकि निवेशक बेहतर रिटर्न चाहते हैं।
✅ कथन 2 – सही: पूंजी पलायन से मुद्रा अवमूल्यन होता है, जिससे विदेशी मुद्रा (जैसे USD) में मूल्यवर्गित ECBs को चुकाने की रुपये लागत बढ़ जाती है, जिससे फर्मों पर वित्तीय बोझ बढ़ता है।
❌ कथन 3 – गलत: घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन ECBs के लिए मुद्रा जोखिम को बढ़ाता है (घटाता नहीं), क्योंकि फर्मों को समान मात्रा के विदेशी मुद्रा ऋण को चुकाने के लिए अधिक रुपये की आवश्यकता होती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: बाह्य वाणिज्यिक उधार (ECBs)
- परिभाषा: ECBs भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशी ऋणदाताओं से विदेशी मुद्राओं में लिए गए वाणिज्यिक ऋण हैं, आमतौर पर आयात, बुनियादी ढांचे या विस्तार परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए।
- मुद्रा जोखिम: चूंकि ECBs विदेशी मुद्रा (आमतौर पर USD या यूरो) में मूल्यवर्गित होते हैं, रुपये के किसी भी अवमूल्यन से रुपये के संदर्भ में पुनर्भुगतान का बोझ बढ़ जाता है।
- पूंजी पलायन का प्रभाव: जब भारत से पूंजी बाहर जाती है (जैसे, कड़ी अमेरिकी मौद्रिक नीति के कारण), तो रुपया अवमूल्यित होता है, जिससे भारतीय फर्मों के लिए ECB पुनर्भुगतान अधिक महंगा हो जाता है।
- ब्याज दर अंतर: ECBs आकर्षक होते हैं जब विदेशी ब्याज दरें घरेलू दरों से कम होती हैं, लेकिन यह लाभ समाप्त हो जाता है यदि मुद्रा अवमूल्यन होता है।
- विनियमन: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) बाह्य ऋण जोखिमों को प्रबंधित करने के लिए अनुमत अंत-उपयोग, उधार सीमा और परिपक्वता अवधि पर दिशानिर्देशों के माध्यम से ECBs को विनियमित करता है।
परिवर्तनीय बॉन्ड (Convertible Bonds) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. चूंकि बॉन्ड को इक्विटी में बदलने का विकल्प होता है, परिवर्तनीय बॉन्ड कम ब्याज दर का भुगतान करते हैं।
2. इक्विटी में परिवर्तित करने का विकल्प बॉन्डधारक को बढ़ती उपभोक्ता कीमतों के लिए एक निश्चित स्तर का सूचीकरण (indexation) प्रदान करता है।
उपरोक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
परिवर्तनीय बॉन्ड एक संकर ऋण प्रतिभूति है जो बॉन्डधारक को जारीकर्ता कंपनी के पूर्वनिर्धारित संख्या में इक्विटी शेयरों में बॉन्ड को परिवर्तित करने का अधिकार देती है। इस मूल्यवान परिवर्तन सुविधा के कारण, परिवर्तनीय बॉन्ड आम तौर पर नियमित बॉन्ड की तुलना में कम कूपन दर प्रदान करते हैं, जो जारीकर्ताओं के लिए ब्याज खर्च कम करने में आकर्षक होते हैं। इसके अतिरिक्त, परिवर्तन विकल्प बॉन्डधारकों को मुद्रास्फीति के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है, क्योंकि इक्विटी कीमतें मुद्रास्फीति के साथ बढ़ती हैं, जो उपभोक्ता कीमतों के लिए एक निश्चित स्तर का सूचीकरण प्रदान करती हैं।
✅ कथन 1 – सही: परिवर्तनीय बॉन्ड कम ब्याज दर का भुगतान करते हैं क्योंकि निवेशक बॉन्ड को इक्विटी शेयरों में परिवर्तित करने के मूल्यवान विकल्प के बदले में कम कूपन भुगतान स्वीकार करने को तैयार होते हैं, जो संभावित रूप से काफी मूल्यवृद्धि कर सकते हैं।
✅ कथन 2 – सही: परिवर्तन विकल्प एक मुद्रास्फीति बचाव के रूप में कार्य करता है क्योंकि इक्विटी कीमतें आम तौर पर मुद्रास्फीति के साथ बढ़ती हैं, जो बॉन्डधारकों को बढ़ती उपभोक्ता कीमतों के लिए सूचीकरण प्रदान करती हैं जो निश्चित-ब्याज बॉन्ड प्रदान नहीं कर सकते।
📝 संक्षिप्त नोट्स: परिवर्तनीय बॉन्ड
- परिभाषा: ऋण (निश्चित ब्याज) और इक्विटी (परिवर्तन विकल्प) की विशेषताओं को मिलाने वाली संकर प्रतिभूतियां।
- कम कूपन दर: परिवर्तन सुविधा के कारण निवेशक नियमित बॉन्ड की तुलना में 1-2% कम ब्याज स्वीकार करते हैं।
- परिवर्तन अनुपात: परिवर्तन पर बॉन्डधारक को प्राप्त होने वाले शेयरों की पूर्वनिर्धारित संख्या।
- जारीकर्ता को लाभ: कम ब्याज लागत और परिवर्तन तक इक्विटी कमजोरी में देरी।
- निवेशक को लाभ: यदि कंपनी के स्टॉक मूल्य में वृद्धि होती है तो ऊपर की संभावना के साथ निश्चित आय; इक्विटी एक्सपोजर के माध्यम से मुद्रास्फीति सुरक्षा।
- परिवर्तन मूल्य: आमतौर पर जारी करने के समय स्टॉक मूल्य से प्रीमियम (15-30%) पर निर्धारित किया जाता है।
- प्रकार: वेनिला परिवर्तनीय (बॉन्डधारक का विकल्प), अनिवार्य परिवर्तनीय (स्वचालित परिवर्तन), और रिवर्स परिवर्तनीय।
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- नाममात्र प्रभावी विनिमय दर (NEER) में वृद्धि रुपये की प्रशंसा को इंगित करती है।
- वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (REER) में वृद्धि व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार को इंगित करती है।
- अन्य देशों में मुद्रास्फीति के सापेक्ष घरेलू मुद्रास्फीति में बढ़ती प्रवृत्ति NEER और REER के बीच बढ़ते विचलन का कारण बनने की संभावना है।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न विनिमय दर सूचकांकों और मुद्रास्फीति तथा व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता के साथ उनके संबंध की समझ का परीक्षण करता है। कथन 2 गलत है क्योंकि REER में वृद्धि मुद्रा के अधिमूल्यन को इंगित करती है, जो वास्तव में व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार नहीं बल्कि खराब करती है।
✅ कथन 1 – सही: NEER व्यापारिक साझेदार मुद्राओं की एक टोकरी के विरुद्ध किसी देश की मुद्रा का भारित औसत है। NEER में वृद्धि इंगित करती है कि घरेलू मुद्रा विदेशी मुद्राओं की टोकरी के सापेक्ष प्रशंसित हुई है।
❌ कथन 2 – गलत: REER में वृद्धि इंगित करती है कि घरेलू मुद्रा वास्तविक रूप में (मुद्रास्फीति अंतर के लिए समायोजन के बाद) अधिमूल्यित हो रही है, जो निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को कम करती है और व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता को खराब करती है, सुधार नहीं करती।
✅ कथन 3 – सही: जब घरेलू मुद्रास्फीति विदेशी मुद्रास्फीति से अधिक होती है, तो मुद्रा का वास्तविक मूल्य नाममात्र मूल्य की तुलना में तेजी से अवमूल्यित होता है। यह REER को NEER की तुलना में घटने या धीमी गति से बढ़ने का कारण बनता है, जिससे दोनों सूचकांकों के बीच विचलन उत्पन्न होता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: NEER और REER
- NEER (नाममात्र प्रभावी विनिमय दर): विदेशी मुद्राओं की एक टोकरी के विरुद्ध घरेलू मुद्रा की द्विपक्षीय नाममात्र विनिमय दरों का भारित औसत; मुद्रास्फीति पर विचार किए बिना नाममात्र प्रशंसा/अवमूल्यन को मापता है।
- REER (वास्तविक प्रभावी विनिमय दर): सापेक्ष मूल्य स्तरों (मुद्रास्फीति अंतर) के लिए समायोजित NEER; वास्तविक प्रशंसा/अवमूल्यन और वास्तविक प्रतिस्पर्धात्मकता को मापता है।
- सूत्र संबंध: REER = NEER × (घरेलू मूल्य सूचकांक / विदेशी मूल्य सूचकांक)
- प्रशंसा बनाम प्रतिस्पर्धात्मकता: यदि REER बढ़ता है → मुद्रा अधिमूल्यित → निर्यात महंगे होते हैं → व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता खराब होती है; यदि REER घटता है → मुद्रा अवमूल्यित → निर्यात सस्ते होते हैं → व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता सुधरती है।
- मुद्रास्फीति प्रभाव: व्यापारिक साझेदारों के सापेक्ष अधिक घरेलू मुद्रास्फीति REER को NEER की तुलना में तेजी से बढ़ने (वास्तविक प्रशंसा) का कारण बनती है, जिससे प्रतिस्पर्धात्मकता कम होती है।
- नीति निहितार्थ: RBI NEER और REER दोनों की निगरानी करता है; बढ़ता REER निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता के नुकसान का संकेत देता है और नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता हो सकती है।
'बैंक बोर्ड ब्यूरो (BBB)' के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन से कथन सही हैं?
- RBI के गवर्नर BBB के अध्यक्ष होते हैं।
- BBB सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुखों के चयन की अनुशंसा करता है।
- BBB सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को रणनीतियाँ और पूंजी जुटाने की योजनाएँ विकसित करने में सहायता करता है।
नीचे दिए गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 3
बैंक बोर्ड ब्यूरो (BBB) 2016 में स्थापित एक स्वायत्त निकाय था, जो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति की अनुशंसा करने और रणनीतिक योजना में उनकी सहायता करने के लिए बनाया गया था। कथन 1 गलत है क्योंकि BBB का नेतृत्व सरकार द्वारा नियुक्त एक स्वतंत्र अध्यक्ष करते थे, न कि RBI गवर्नर। कथन 2 और 3 सही हैं क्योंकि ये BBB के मुख्य उद्देश्य थे।
❌ कथन 1 – गलत: BBB का नेतृत्व केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक स्वतंत्र अध्यक्ष करते थे, न कि RBI गवर्नर।
✅ कथन 2 – सही: BBB सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और वित्तीय संस्थानों के प्रमुखों (पूर्णकालिक निदेशक और गैर-कार्यकारी अध्यक्ष) के चयन के लिए उम्मीदवारों की अनुशंसा करता था।
✅ कथन 3 – सही: BBB PSBs को व्यावसायिक रणनीतियाँ, पूंजी जुटाने की योजनाएँ तैयार करने और कॉर्पोरेट प्रशासन में सुधार में सहायता करता था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: बैंक बोर्ड ब्यूरो (BBB) और FSIB
- बैंक बोर्ड ब्यूरो (BBB): सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रशासन को व्यावसायिक बनाने के लिए फरवरी 2016 में एक स्वायत्त निकाय के रूप में स्थापित किया गया।
- अध्यक्ष: सरकार द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञ (प्रथम अध्यक्ष: विनोद राय, पूर्व CAG)।
- मुख्य कार्य: PSBs के CMD और पूर्णकालिक निदेशकों के चयन की अनुशंसा; बैंकों को रणनीति निर्माण, पूंजी जुटाने और प्रशासन सुधार में सहायता; प्रदर्शन सुधार पर PSB बोर्डों से संवाद।
- FSIB द्वारा प्रतिस्थापित: जुलाई 2022 में, सरकार ने BBB को विस्तृत अधिदेश के साथ वित्तीय सेवा संस्थान ब्यूरो (FSIB) से प्रतिस्थापित किया।
- FSIB के कार्य: PSBs, सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों और वित्तीय संस्थानों के लिए नियुक्तियों की अनुशंसा; प्रदर्शन मैट्रिक्स तैयार करना; बोर्ड संरचना पर अनुशंसा।
- FSIB की संरचना: अध्यक्ष (स्वतंत्र विशेषज्ञ) और सदस्य जिनमें सरकारी अधिकारी और स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल हैं।
UPSC Prelims 2022 - भारतीय अर्थव्यवस्था Chapter-wise Distribution
मुद्रा, बैंकिंग एवं वित्तीय प्रणाली
3 Qs (17.6%)बाह्य क्षेत्र
3 Qs (17.6%)वित्तीय बाज़ार और संस्थान
3 Qs (17.6%)लोक वित्त एवं राजकोषीय नीति
3 Qs (17.6%)राष्ट्रीय आय एवं आर्थिक विकास
1 Qs (5.9%)अवसंरचना
1 Qs (5.9%)उद्योग
1 Qs (5.9%)अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक संगठन
1 Qs (5.9%)कृषि
1 Qs (5.9%)UPSC Prelims 2022 - भारतीय अर्थव्यवस्था Questions FAQs
Q1 How many भारतीय अर्थव्यवस्था questions were asked in UPSC Prelims 2022?
Q2 What is the chapter-wise question distribution for भारतीय अर्थव्यवस्था in UPSC Prelims 2022?
- मुद्रा, बैंकिंग एवं वित्तीय प्रणाली: 3 questions (17.6%)
- बाह्य क्षेत्र: 3 questions (17.6%)
- वित्तीय बाज़ार और संस्थान: 3 questions (17.6%)
- लोक वित्त एवं राजकोषीय नीति: 3 questions (17.6%)
- राष्ट्रीय आय एवं आर्थिक विकास: 1 questions (5.9%)
- अवसंरचना: 1 questions (5.9%)
- उद्योग: 1 questions (5.9%)
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक संगठन: 1 questions (5.9%)
- कृषि: 1 questions (5.9%)