UPSC CSE Prelims
भारतीय कला और संस्कृति Previous Year Questions (PYQs)
Solved Previous Year Questions (PYQs) for भारतीय कला और संस्कृति in UPSC CSE Prelims in English & Hindi Medium.
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प्रधानमंत्री ने हाल ही में वेरावल में सोमनाथ मंदिर के पास नए सर्किट हाउस का उद्घाटन किया।
सोमनाथ मंदिर के संबंध में निम्नलिखित में से कौन से कथन सही हैं?
- सोमनाथ मंदिर ज्योतिर्लिंग तीर्थों में से एक है।
- सोमनाथ मंदिर का विवरण अल-बिरूनी द्वारा दिया गया था।
- सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा (वर्तमान मंदिर की स्थापना) राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन द्वारा की गई थी।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 2
यह प्रश्न सोमनाथ मंदिर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के बारे में ज्ञान का परीक्षण करता है। कथन 3 गलत है क्योंकि प्रतिष्ठा डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी, न कि डॉ. एस. राधाकृष्णन द्वारा।
✅ कथन 1 – सही: सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंग तीर्थों में से एक है, जो इसे हिंदू धर्म में सबसे पूजनीय तीर्थ स्थलों में से एक बनाता है।
✅ कथन 2 – सही: फारसी विद्वान अल-बिरूनी, जो महमूद गजनवी के साथ आए थे, ने अपने लेखन में सोमनाथ मंदिर की भव्यता का दस्तावेजीकरण किया, इसे 10वीं शताब्दी के आसपास निर्मित एक पत्थर की संरचना बताया जो तीन तरफ से समुद्र द्वारा सुरक्षित थी।
❌ कथन 3 – गलत: 1951 में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा (अभिषेक) भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी, न कि डॉ. एस. राधाकृष्णन (जो दूसरे राष्ट्रपति थे) द्वारा।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सोमनाथ मंदिर
- स्थान: वेरावल (प्रभास पाटन), गुजरात, भारत के पश्चिमी तट पर
- धार्मिक महत्व: 12 ज्योतिर्लिंग तीर्थों में से एक, इन्हें पहला माना जाता है
- ऐतिहासिक विनाश: मंदिर को कई बार नष्ट और पुनर्निर्मित किया गया; विशेष रूप से 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी द्वारा
- अल-बिरूनी का विवरण: मंदिर की शानदार वास्तुकला और संपत्ति का वर्णन किया, जिसने आक्रमणों को आकर्षित किया
- आधुनिक पुनर्निर्माण: 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल और के.एम. मुंशी द्वारा शुरू किया गया; 1951 में पूर्ण हुआ
- प्रतिष्ठा (1951): 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा संपन्न
- स्थापत्य शैली: वर्तमान संरचना बलुआ पत्थर का उपयोग करते हुए मंदिर वास्तुकला की चालुक्य शैली में निर्मित
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित ग्रंथों पर विचार कीजिए:
- Nettipakarana
- Parishishtaparvan
- Avadanashataka
- Trishashtilakshana Mahapurana
उपर्युक्त में से कौन-से जैन ग्रंथ हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 4
दिए गए ग्रंथों में से केवल परिशिष्टपर्वन और त्रिषष्टिलक्षण महापुराण जैन ग्रंथ हैं। नेत्तिपकरण थेरवाद बौद्ध शास्त्र है, जबकि अवदानशतक बौद्ध किंवदंतियों का संग्रह है।
❌ कथन 1 – गलत: नेत्तिपकरण थेरवाद परंपरा का एक बौद्ध शास्त्र है जो पाली कैनन की व्याख्या के लिए मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है।
✅ कथन 2 – सही: परिशिष्टपर्वन (स्थविरावलीचरित्र) हेमचंद्र द्वारा लिखित 12वीं सदी का एक जैन ग्रंथ है, जो प्रारंभिक जैन आचार्यों का ऐतिहासिक विवरण प्रदान करता है।
❌ कथन 3 – गलत: अवदानशतक संस्कृत में एक सौ बौद्ध किंवदंतियों (अवदान) का संग्रह है जो पूर्व जन्मों और कार्यों का विवरण देता है।
✅ कथन 4 – सही: त्रिषष्टिलक्षण महापुराण (महापुराण) दिगंबर भिक्षुओं जिनसेन और गुणभद्र द्वारा 9वीं सदी में रचित एक प्रमुख जैन ग्रंथ है, जो 63 शलाकापुरुषों के जीवन का विवरण देता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: धार्मिक ग्रंथों का वर्गीकरण
| ग्रंथ | धर्म | लेखक/काल | मुख्य विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| नेत्तिपकरण | बौद्ध (थेरवाद) | उत्तर-कैननिकल काल | पाली कैनन की व्याख्या के लिए मार्गदर्शक |
| परिशिष्टपर्वन | जैन | हेमचंद्र (12वीं सदी) | जैन आचार्यों का ऐतिहासिक विवरण; बड़े कार्य का परिशिष्ट |
| अवदानशतक | बौद्ध | संस्कृत साहित्य | 100 बौद्ध किंवदंतियों (अवदान) का संग्रह |
| त्रिषष्टिलक्षण महापुराण | जैन (दिगंबर) | जिनसेन और गुणभद्र (9वीं सदी) | 63 शलाकापुरुषों (महापुरुषों) के जीवन का विवरण |
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
अशोक के प्रमुख शिलालेखों का स्थल — राज्य में स्थान
धौली — ओडिशा
एर्रागुडी — आंध्र प्रदेश
जौगड़ — मध्य प्रदेश
कालसी — कर्नाटक
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो युग्म
यह प्रश्न अशोक के प्रमुख शिलालेखों के भौगोलिक स्थानों के ज्ञान का परीक्षण करता है। दिए गए चार युग्मों में से केवल दो सही सुमेलित हैं: धौली (ओडिशा) और एर्रागुडी (आंध्र प्रदेश)। अन्य दो स्थान गलत सुमेलित हैं।
✅ युग्म 1 – सही: धौली शिलालेख वास्तव में ओडिशा (भुवनेश्वर के पास) में स्थित हैं।
✅ युग्म 2 – सही: एर्रागुडी (येर्रागुडी के रूप में भी लिखा जाता है) शिलालेख आंध्र प्रदेश (कुरनूल जिला) में स्थित हैं।
❌ युग्म 3 – गलत: जौगड़ शिलालेख ओडिशा (गंजाम जिला) में स्थित हैं, मध्य प्रदेश में नहीं।
❌ युग्म 4 – गलत: कालसी शिलालेख उत्तराखंड (देहरादून जिला) में स्थित हैं, कर्नाटक में नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अशोक के प्रमुख शिलालेख
| स्थल | राज्य/स्थान | महत्व |
|---|---|---|
| धौली | ओडिशा (भुवनेश्वर के पास) | कलिंग के बारे में विशेष शिलालेख; धम्म की नीति पर अलग शिलालेख |
| जौगड़ | ओडिशा (गंजाम जिला) | धौली के समान; विशेष कलिंग शिलालेख |
| एर्रागुडी/येर्रागुडी | आंध्र प्रदेश (कुरनूल) | 14 प्रमुख शिलालेख हैं |
| कालसी | उत्तराखंड (देहरादून) | 14 शिलालेख हैं; ब्राह्मी लिपि में लिखे गए |
| गिरनार | गुजरात (जूनागढ़) | सबसे पुराने और सर्वोत्तम संरक्षित में से एक; 14 शिलालेख |
| शाहबाजगढ़ी | पाकिस्तान (खैबर पख्तूनख्वा) | खरोष्ठी लिपि में लिखा गया |
| मानसेहरा | पाकिस्तान (खैबर पख्तूनख्वा) | खरोष्ठी लिपि में लिखा गया |
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भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
ऐतिहासिक व्यक्ति - के रूप में जाने जाते हैं
- आर्यदेव - जैन विद्वान
- दिङ्नाग - बौद्ध विद्वान
- नाथमुनि - वैष्णव विद्वान
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल दो युग्म
यह प्रश्न ऐतिहासिक भारतीय विद्वानों और उनकी दार्शनिक परंपराओं के ज्ञान की परीक्षा करता है। दिए गए तीन युग्मों में से दो सही सुमेलित हैं जबकि एक गलत है।
❌ युग्म 1 – गलत: आर्यदेव एक बौद्ध दार्शनिक और माध्यमक विद्वान थे, जैन विद्वान नहीं। वे नागार्जुन के शिष्य थे और नालंदा मठ से जुड़े थे।
✅ युग्म 2 – सही: दिङ्नाग वास्तव में एक बौद्ध विद्वान थे जो बौद्ध तर्कशास्त्र (प्रमाण) और ज्ञानमीमांसा में अपने अग्रणी कार्य के लिए प्रसिद्ध थे, जिन्होंने धर्मकीर्ति जैसे बाद के दार्शनिकों को प्रभावित किया।
✅ युग्म 3 – सही: नाथमुनि एक वैष्णव विद्वान थे जिन्होंने श्री वैष्णव परंपरा को पुनर्जीवित किया और नालायिरा दिव्य प्रबंधम का संकलन किया, जो तमिल भक्ति स्तोत्रों का संग्रह है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख भारतीय दार्शनिक विद्वान
| विद्वान | परंपरा | कालखंड | प्रमुख योगदान |
|---|---|---|---|
| आर्यदेव | बौद्ध (माध्यमक) | दूसरी-तीसरी शताब्दी ईस्वी | नागार्जुन के शिष्य; चतुःशतक (चार सौ श्लोक) लिखे; शून्यवाद का प्रचार किया |
| दिङ्नाग | बौद्ध (योगाचार) | पाँचवीं-छठी शताब्दी ईस्वी | बौद्ध तर्कशास्त्र के संस्थापक; प्रमाणसमुच्चय लिखा; प्रमाण सिद्धांत की स्थापना की |
| नाथमुनि | वैष्णव (श्री वैष्णव) | नौवीं-दसवीं शताब्दी ईस्वी | श्री वैष्णव परंपरा को पुनर्जीवित किया; दिव्य प्रबंधम का संकलन किया; यामुनाचार्य के दादा |
| धर्मकीर्ति | बौद्ध | सातवीं शताब्दी ईस्वी | दिङ्नाग के तर्कशास्त्र को विकसित किया; प्रमाणवार्तिक लिखा |
| रामानुज | वैष्णव | ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी ईस्वी | विशिष्टाद्वैत का प्रतिपादन किया; श्री वैष्णव दर्शन को व्यवस्थित किया |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- सेंट फ्रांसिस जेवियर जेसुइट ऑर्डर के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
- सेंट फ्रांसिस जेवियर की मृत्यु गोवा में हुई थी और वहां उनके लिए एक चर्च समर्पित है।
- सेंट फ्रांसिस जेवियर का पर्व प्रत्येक वर्ष गोवा में मनाया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न सेंट फ्रांसिस जेवियर के बारे में ज्ञान का परीक्षण करता है, जो गोवा में ईसाई धर्म से जुड़े एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं। कथन 1 और 3 सही हैं, जबकि कथन 2 में उनकी मृत्यु के स्थान के बारे में तथ्यात्मक त्रुटि है।
✅ कथन 1 – सही: सेंट फ्रांसिस जेवियर वास्तव में 1534 में इग्नेशियस ऑफ लोयोला के साथ सोसाइटी ऑफ जीसस (जेसुइट ऑर्डर) के सात संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
❌ कथन 2 – गलत: सेंट फ्रांसिस जेवियर की मृत्यु गोवा में नहीं हुई थी; उनकी मृत्यु 1552 में चीन के तट पर शांगचुआन द्वीप (सैंसियन) पर हुई थी। हालांकि, गोवा में बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस में उनके पार्थिव अवशेष रखे गए हैं और यह उन्हें समर्पित है।
✅ कथन 3 – सही: सेंट फ्रांसिस जेवियर का पर्व (गोएन्चो साईब) प्रतिवर्ष 3 दिसंबर को गोवा में मनाया जाता है, और हर दस वर्ष में उनके शरीर को सार्वजनिक दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सेंट फ्रांसिस जेवियर और गोवा में ईसाई धर्म
- सेंट फ्रांसिस जेवियर (1506-1552): स्पेनिश जेसुइट मिशनरी और 1534 में सोसाइटी ऑफ जीसस (जेसुइट ऑर्डर) के सह-संस्थापक।
- भारत में मिशन: 1542 में गोवा पहुंचे और दक्षिण भारत में व्यापक रूप से काम किया, हजारों लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया।
- मृत्यु: 1552 में चीन में प्रवेश करने का प्रयास करते समय शांगचुआन द्वीप (चीन तट से दूर) पर मृत्यु हुई।
- बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस: ओल्ड गोवा में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, 1605 में निर्मित, सेंट फ्रांसिस जेवियर के पवित्र अवशेषों को रखता है।
- सेंट फ्रांसिस जेवियर का पर्व: प्रतिवर्ष 3 दिसंबर को मनाया जाता है; संत के शरीर को हर 10 वर्ष में एक बार सार्वजनिक दर्शन (एक्सपोज़िशन) के लिए प्रदर्शित किया जाता है।
- विरासत: गोवा के संरक्षक संत और एशिया में सबसे प्रभावशाली ईसाई मिशनरियों में से एक।
निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — अजंता की गुफाएं वाघोरा नदी की घाटी में स्थित हैं।
अजंता की गुफाएं, यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल, जिसमें 29 रॉक-कट बौद्ध गुफा स्मारक शामिल हैं, महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में वाघोरा नदी की घोड़े की नाल के आकार की घाटी में स्थित हैं। आइए प्रत्येक कथन का मूल्यांकन करें:
✅ कथन 1 – सही: अजंता की गुफाएं वास्तव में महाराष्ट्र में वाघोरा नदी की घाटी में स्थित हैं।
❌ कथन 2 – गलत: साँची स्तूप मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में बेतवा नदी के निकट एक पहाड़ी पर स्थित है, चम्बल नदी के निकट नहीं।
❌ कथन 3 – गलत: पांडु-लेना गुफाएं (नासिक गुफाएं) महाराष्ट्र के नासिक के निकट त्रिरश्मि पहाड़ियों में उकेरी गई हैं, नर्मदा नदी की घाटी में नहीं।
❌ कथन 4 – गलत: अमरावती स्तूप आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है, गोदावरी नदी पर नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख बौद्ध स्मारक और उनके स्थान
| स्मारक | स्थान | नदी/भौगोलिक विशेषता | राज्य |
|---|---|---|---|
| अजंता की गुफाएं | औरंगाबाद जिला | वाघोरा नदी की घाटी | महाराष्ट्र |
| साँची स्तूप | रायसेन जिला | बेतवा नदी के निकट | मध्य प्रदेश |
| पांडु-लेना गुफाएं | नासिक | त्रिरश्मि पहाड़ियां | महाराष्ट्र |
| अमरावती स्तूप | गुंटूर जिला | कृष्णा नदी | आंध्र प्रदेश |
| एलोरा की गुफाएं | औरंगाबाद जिला | अजंता के निकट | महाराष्ट्र |
प्राचीन भारत के इतिहास के संदर्भ में, भवभूति, हस्तिमल्ल और क्षेमेश्वर प्रसिद्ध थे
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — नाटककार
भवभूति, हस्तिमल्ल और क्षेमेश्वर प्राचीन और प्रारंभिक मध्यकालीन भारत के प्रसिद्ध नाटककार थे जिन्होंने संस्कृत नाटक में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भवभूति (8वीं शताब्दी) ने कन्नौज के राजा यशोवर्मन के दरबार में सेवा की और मालतीमाधव और उत्तररामचरित जैसे प्रसिद्ध नाटक लिखे। हस्तिमल्ल (13वीं शताब्दी) होयसल काल के एक जैन नाटककार थे जो विक्रांतकौरव जैसी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं, जबकि क्षेमेश्वर (10वीं शताब्दी) ने पाल वंश के राजा महिपाल की सेवा की और चंदकौशिक जैसे नाटकों की रचना की।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्राचीन भारत के प्रसिद्ध संस्कृत नाटककार
| नाटककार | काल | दरबार/संरक्षण | प्रमुख रचनाएँ |
|---|---|---|---|
| भवभूति | 8वीं शताब्दी ईस्वी | कन्नौज के राजा यशोवर्मन | मालतीमाधव, महावीरचरित, उत्तररामचरित |
| हस्तिमल्ल | 13वीं शताब्दी ईस्वी | होयसल काल (जैन नाटककार) | विक्रांतकौरव, मैथिलीकल्याण, अंजनपवनांजय |
| क्षेमेश्वर | 10वीं शताब्दी ईस्वी | राजा महिपाल (पाल वंश) | चंदकौशिक, नैषधानंद |
| कालिदास | 4थी-5वीं शताब्दी ईस्वी | गुप्त काल | अभिज्ञानशाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम्, मालविकाग्निमित्रम् |
| शूद्रक | 3री-4थी शताब्दी ईस्वी | गुप्त काल | मृच्छकटिक (द लिटिल क्ले कार्ट) |
भारत के संदर्भ में, शब्द 'हल्बी, हो और कुई' किससे संबंधित हैं
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — जनजातीय भाषाएँ
हल्बी, हो और कुई भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्वदेशी समुदायों द्वारा बोली जाने वाली जनजातीय भाषाएँ हैं। हल्बी एक इंडो-आर्यन भाषा है जो छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्यों में हल्बा जनजाति द्वारा बोली जाती है, हो एक ऑस्ट्रोएशियाटिक भाषा है जो झारखंड और ओडिशा में हो लोगों द्वारा बोली जाती है, और कुई एक द्रविड़ भाषा है जो मुख्य रूप से ओडिशा में कोंध जनजाति द्वारा बोली जाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत की प्रमुख जनजातीय भाषाएँ
| भाषा | भाषा परिवार | प्राथमिक बोलने वाले | मुख्य क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| हल्बी | इंडो-आर्यन | हल्बा जनजाति | छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र |
| हो | ऑस्ट्रोएशियाटिक (मुंडा) | हो लोग | झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल |
| कुई | द्रविड़ | कंध/खोंड जनजाति | ओडिशा, आंध्र प्रदेश |
| गोंडी | द्रविड़ | गोंड जनजाति | मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना |
| संताली | ऑस्ट्रोएशियाटिक (मुंडा) | संताल लोग | झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार (आठवीं अनुसूची में शामिल) |
| बोडो | तिब्बती-बर्मन | बोडो लोग | असम (आठवीं अनुसूची में शामिल) |
मोरेना के निकट स्थित चौसठ योगिनी मंदिर के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह कच्छपघात वंश के शासनकाल के दौरान निर्मित एक वृत्ताकार मंदिर है।
- यह भारत में निर्मित एकमात्र वृत्ताकार मंदिर है।
- इसका उद्देश्य इस क्षेत्र में वैष्णव पंथ को बढ़ावा देना था।
- इसके डिज़ाइन ने एक लोकप्रिय धारणा को जन्म दिया है कि यह भारतीय संसद भवन के पीछे प्रेरणा था।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 4
मोरेना के निकट चौसठ योगिनी मंदिर 11वीं शताब्दी ईस्वी में कच्छपघात वंश के दौरान निर्मित एक वृत्ताकार मंदिर है। इसके अनूठे वृत्ताकार डिज़ाइन ने लोकप्रिय धारणा को प्रेरित किया है कि इसने भारतीय संसद भवन की वास्तुकला को प्रभावित किया, हालांकि इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
✅ कथन 1 – सही: मंदिर वास्तव में वृत्ताकार है और 11वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास कच्छपघात वंश के शासनकाल के दौरान निर्मित किया गया था।
❌ कथन 2 – गलत: यह भारत में एकमात्र वृत्ताकार मंदिर नहीं है; अन्य उदाहरणों में खजुराहो, जबलपुर और भेड़ाघाट में समान चौसठ योगिनी मंदिर शामिल हैं।
❌ कथन 3 – गलत: मंदिर 64 योगिनियों (तांत्रिक देवियों) की पूजा के लिए समर्पित था और इसका उद्देश्य शक्ति/तांत्रिक पंथ को बढ़ावा देना था, न कि वैष्णव पंथ को।
✅ कथन 4 – सही: एक लोकप्रिय धारणा है कि इस मंदिर के वृत्ताकार, खुले आकाश वाले डिज़ाइन ने भारतीय संसद भवन के वास्तुकारों को प्रेरित किया, हालांकि ऐतिहासिक रूप से पुष्टि नहीं की गई है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: चौसठ योगिनी मंदिर
- अर्थ: चौसठ का अर्थ है 64; ये मंदिर 64 योगिनियों (देवी दुर्गा/शक्ति की महिला परिचारिकाओं) को समर्पित थे।
- काल: अधिकतर 9वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच भारत में तांत्रिक प्रथाओं के उदय के दौरान निर्मित।
- वास्तुकला: आमतौर पर वृत्ताकार या आयताकार, हाइपेथ्रल (आकाश के लिए खुला), एक केंद्रीय आंगन के चारों ओर व्यवस्थित छोटे मंदिरों के साथ।
- प्रमुख मंदिर: मोरेना (मध्य प्रदेश), हीरापुर (ओडिशा), खजुराहो (मप्र), भेड़ाघाट (मप्र), जबलपुर (मप्र), और रानीपुर-झारियाल (ओडिशा)।
- धार्मिक महत्व: शक्ति और तांत्रिक पूजा से जुड़ा हुआ, वैष्णव या शैव परंपराओं से नहीं।
- मोरेना मंदिर विशिष्टताएं: कच्छपघात शासकों द्वारा निर्मित; 64 कक्षों के साथ वृत्ताकार; माना जाता है कि इसने भारतीय संसद के वृत्ताकार डिज़ाइन को प्रेरित किया।
किसी राज्य में मंदिर निर्माण में 'कल्याण मंडप' का निर्माण एक उल्लेखनीय विशेषता थी
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — विजयनगर
मंदिर परिसरों में विस्तृत 'कल्याण मंडप' (विवाह कक्ष) का निर्माण विजयनगर साम्राज्य (14वीं-17वीं शताब्दी) की एक विशिष्ट स्थापत्य विशेषता थी। ये अलंकृत मंडप विशेष रूप से देवताओं के औपचारिक विवाह अनुष्ठानों के लिए डिज़ाइन किए गए थे और विजयनगर मंदिर वास्तुकला की पहचान बन गए, जो इसे पूर्व दक्षिण भारतीय शैलियों से अलग करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विजयनगर मंदिर स्थापत्य
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| कल्याण मंडप | देवता के औपचारिक विवाह के लिए विस्तृत विवाह कक्ष; जटिल नक्काशी से अत्यधिक सजाया गया |
| राय गोपुरम | विशाल प्रवेश द्वार (अक्सर मुख्य गर्भगृह से भी ऊँचे) |
| अम्मन मंदिर | मुख्य देवता की पत्नी को समर्पित अलग मंदिर |
| स्तंभयुक्त हॉल | याली (पौराणिक प्राणी) और दौड़ते घोड़ों की विशेषता वाले विशाल स्तंभ |
| उदाहरण | हम्पी में विट्ठल मंदिर और विरुपाक्ष मंदिर; कांचीपुरम में वरदराज मंदिर |
भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- अधिकांश त्यागराज कृतियाँ भगवान कृष्ण की प्रशंसा में भक्ति गीत हैं।
- त्यागराज ने कई नए रागों की रचना की।
- अन्नमाचार्य और त्यागराज समकालीन हैं।
- अन्नमाचार्य के कीर्तन भगवान वेंकटेश्वर की प्रशंसा में भक्ति गीत हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 4
यह प्रश्न दो प्रमुख कर्नाटक संगीत संगीतकारों और उनके योगदान के ज्ञान का परीक्षण करता है। त्यागराज की रचनात्मक नवीनताओं और अन्नमाचार्य की भक्ति केंद्रितता के संबंध में केवल कथन 2 और 4 तथ्यात्मक रूप से सही हैं।
❌ कथन 1 – गलत: त्यागराज की अधिकांश कृतियाँ भगवान राम की प्रशंसा में भक्ति रचनाएँ हैं, भगवान कृष्ण की नहीं।
✅ कथन 2 – सही: त्यागराज को कई नए रागों की रचना और अपनी नवीन रचनाओं से कर्नाटक संगीत को समृद्ध करने का श्रेय दिया जाता है।
❌ कथन 3 – गलत: अन्नमाचार्य (1408-1503 ई.) और त्यागराज (1767-1847 ई.) समकालीन नहीं थे; वे लगभग तीन शताब्दियों के अंतराल पर जीवित रहे।
✅ कथन 4 – सही: अन्नमाचार्य के कीर्तन मुख्य रूप से तिरुपति के भगवान वेंकटेश्वर (बालाजी) की प्रशंसा में भक्ति गीत हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कर्नाटक संगीत के संत संगीतकार
| संगीतकार | काल | देवता | प्रमुख योगदान |
|---|---|---|---|
| अन्नमाचार्य | 1408-1503 ई. (15वीं शताब्दी) | भगवान वेंकटेश्वर (तिरुपति) | 32,000 से अधिक संकीर्तनों की रचना; संकीर्तन नामक गीत रचने वाले प्रथम ज्ञात भारतीय संगीतकार माने जाते हैं; कर्नाटक भक्ति संगीत के अग्रदूत |
| त्यागराज | 1767-1847 ई. (18वीं-19वीं शताब्दी) | भगवान राम | कर्नाटक संगीत की त्रिमूर्ति का हिस्सा (मुथुस्वामी दीक्षितर और श्यामा शास्त्री के साथ); नए रागों की रचना की; 700 से अधिक कृतियों की रचना; उनके पंचरत्न कृतियाँ उत्कृष्ट कृतियाँ मानी जाती हैं |
| मुथुस्वामी दीक्षितर | 1775-1835 ई. | विभिन्न देवता | संस्कृत में रचनाओं के लिए प्रसिद्ध; जटिल रागों की खोज की; त्रिमूर्ति में से एक |
| श्यामा शास्त्री | 1762-1827 ई. | देवी (मुख्य रूप से कामाक्षी) | लयबद्ध पैटर्न के मास्टर; मुख्य रूप से तेलुगु में रचना की; त्रिमूर्ति में से एक |
| पुरंदर दास | 1484-1564 ई. | भगवान कृष्ण (विट्ठल) | कर्नाटक संगीत के पिता; शिक्षण पद्धति को व्यवस्थित किया; 475,000 से अधिक गीतों की रचना की |
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| परंपरा | राज्य |
|---|---|
| 1. चापचार कुट महोत्सव | मिजोरम |
| 2. खोंगजोम परबा गाथागीत | मणिपुर |
| 3. थांग-टा नृत्य | सिक्किम |
उपर्युक्त में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — 1 और 2
यह प्रश्न पूर्वोत्तर भारत की पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं और उनसे संबंधित राज्यों के ज्ञान का परीक्षण करता है। युग्म 1 और 2 सही सुमेलित हैं, जबकि युग्म 3 में थांग-टा को मणिपुर के बजाय गलती से सिक्किम से जोड़ा गया है।
✅ युग्म 1 – सही: चापचार कुट मिजोरम के मिजो लोगों द्वारा मनाया जाने वाला एक जीवंत वसंत उत्सव है, जो झूम खेती (स्लैश-एंड-बर्न खेती) के पूर्ण होने का प्रतीक है।
✅ युग्म 2 – सही: खोंगजोम परबा एक अनुष्ठानिक गाथागीत प्रदर्शन है जो 1891 के एंग्लो-मणिपुरी युद्ध, विशेष रूप से खोंगजोम की लड़ाई की याद दिलाता है जहां मणिपुरी सैनिकों ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।
❌ युग्म 3 – गलत: थांग-टा मणिपुर की एक पारंपरिक मार्शल आर्ट है, सिक्किम की नहीं। यह सशस्त्र ('थांग' - तलवार/भाला) और निहत्थे ('टा' - हाथों से लड़ाई) युद्ध तकनीकों को जोड़ता है और मणिपुरी संस्कृति का अभिन्न अंग है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक परंपराएँ
| राज्य | सांस्कृतिक परंपरा | विवरण |
|---|---|---|
| मिजोरम | चापचार कुट | झूम संचालन के अंत का जश्न मनाने वाला वसंत उत्सव; बांस नृत्य प्रस्तुत करता है |
| मणिपुर | खोंगजोम परबा | खोंगजोम की लड़ाई (1891) का वर्णन करने वाला गाथागीत-नाटक; वार्षिक रूप से प्रस्तुत किया जाता है |
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भारत में धार्मिक प्रथाओं के संदर्भ में, "स्थानकवासी" संप्रदाय किससे संबंधित है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — जैन धर्म
स्थानकवासी संप्रदाय जैन धर्म के भीतर एक सुधारवादी उप-संप्रदाय है जो 17वीं शताब्दी में मूर्ति पूजा और मंदिर अनुष्ठानों के विरोध में उभरा। 'स्थानकवासी' नाम का शाब्दिक अर्थ है 'जो हॉल में निवास करते हैं' (स्थानक), जो सुसज्जित मंदिरों के बजाय सरल प्रार्थना कक्षों में पूजा करने की उनकी प्रथा को संदर्भित करता है। यह संप्रदाय कर्मकांडी पूजा के बजाय तपस्या, शास्त्रीय अध्ययन और आध्यात्मिक अनुशासन पर जोर देता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख जैन संप्रदाय
| संप्रदाय | प्रमुख विशेषताएँ | उत्पत्ति काल |
|---|---|---|
| दिगंबर | आकाश-वस्त्र (नग्न) साधु; मानते हैं कि महिलाएं सीधे मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं; अधिक कठोर अभ्यास | प्राचीन विभाजन (लगभग 300 ईसा पूर्व) |
| श्वेतांबर | सफेद वस्त्र धारण करने वाले साधु; स्वीकार करते हैं कि महिलाएं मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं; मुख-आवरण का उपयोग करते हैं | प्राचीन विभाजन (लगभग 300 ईसा पूर्व) |
| स्थानकवासी | मूर्ति पूजा को अस्वीकार करते हैं; सरल कक्षों (स्थानकों) में पूजा करते हैं; ध्यान और शास्त्रों पर जोर देते हैं; श्वेतांबर का उप-संप्रदाय | 17वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग 1653 में उभरा) |
| तेरापंथी | और अधिक सुधारवादी संप्रदाय; एक आचार्य के अधीन केंद्रीकृत नेतृत्व; कठोर अहिंसा; स्थानकवासी का उप-संप्रदाय | 18वीं शताब्दी ईस्वी (1760) |
- स्थानकवासी आंदोलन की स्थापना गुजरात में लवजी नामक एक व्यापारी द्वारा मूर्तिपूजक (मूर्ति-पूजा करने वाली) परंपरा के विरोध में की गई थी।
- स्थानकवासी और तेरापंथी दोनों संप्रदाय बाहरी कर्मकांड के बजाय आंतरिक आध्यात्मिकता पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- ये सुधारवादी आंदोलन महावीर की मूल शिक्षाओं और जैन सिद्धांतों के कठोर पालन पर जोर देते हैं।
भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- फतेहपुर सीकरी में बुलंद दरवाजा और खानकाह के निर्माण में सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया था।
- लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा और रूमी दरवाजा के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का उपयोग किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — कोई नहीं
इन ऐतिहासिक स्मारकों के निर्माण में उपयोग की गई सामग्रियों के संबंध में दोनों कथन गलत हैं।
❌ कथन 1 – गलत: फतेहपुर सीकरी में बुलंद दरवाजा और खानकाह का निर्माण मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर से किया गया था, सफेद संगमरमर से नहीं। हालांकि कुछ सजावटी तत्वों में सफेद संगमरमर की जड़ाई का काम हो सकता है, लेकिन प्रमुख सामग्री लाल बलुआ पत्थर है जो फतेहपुर सीकरी में मुगल वास्तुकला की विशेषता है।
❌ कथन 2 – गलत: लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण मुख्य रूप से लखौरी ईंटों, चूने के मोर्टार और स्टुको प्लास्टर से किया गया था, न कि लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से। रूमी दरवाजा भी इसी प्रकार ईंटों और चूने के प्लास्टर से बना है। ये संरचनाएं अवधी स्थापत्य शैली का उदाहरण हैं जो पत्थर के बजाय ईंट निर्माण पर निर्भर थी।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मुगल और अवधी स्थापत्य सामग्री
| स्मारक | स्थान | प्रमुख सामग्री | काल/शासक |
|---|---|---|---|
| बुलंद दरवाजा | फतेहपुर सीकरी | संगमरमर की जड़ाई के साथ लाल बलुआ पत्थर | अकबर (1571-1585) |
| खानकाह (सलीम चिश्ती का मकबरा) | फतेहपुर सीकरी | सफेद संगमरमर | अकबर (1580-81) |
| बड़ा इमामबाड़ा | लखनऊ | लखौरी ईंटें, चूने का मोर्टार, स्टुको | आसफ-उद-दौला (1784) |
| रूमी दरवाजा | लखनऊ | ईंटें और चूने का प्लास्टर | आसफ-उद-दौला (1784) |
| ताजमहल | आगरा | सफेद संगमरमर | शाहजहाँ (1632-1653) |
| लाल किला | दिल्ली | लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर | शाहजहाँ (1639-1648) |
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| शिल्प | विरासत |
|---|---|
| 1. पुथुक्कुली शॉल | तमिलनाडु |
| 2. सुजनी कढ़ाई | महाराष्ट्र |
| 3. उप्पाडा जामदानी साड़ियाँ | कर्नाटक |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
यह प्रश्न पारंपरिक भारतीय शिल्पों और उनके भौगोलिक मूल के ज्ञान का परीक्षण करता है। केवल पहला युग्म सही रूप से सुमेलित है, जबकि अन्य दो युग्म शिल्पों को गलत राज्यों से जोड़ते हैं।
✅ युग्म 1 – सही: पुथुक्कुली शॉल वास्तव में तमिलनाडु के नीलगिरि पहाड़ियों में तोडा जनजाति द्वारा पारंपरिक रूप से बनाए गए कढ़ाईदार वस्त्र हैं।
❌ युग्म 2 – गलत: सुजनी कढ़ाई बिहार (विशेष रूप से भुसुरा गाँव) का पारंपरिक शिल्प है, महाराष्ट्र का नहीं।
❌ युग्म 3 – गलत: उप्पाडा जामदानी साड़ियाँ आंध्र प्रदेश के उप्पाडा की प्रसिद्ध रेशमी साड़ियाँ हैं, कर्नाटक की नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पारंपरिक भारतीय शिल्प और उनके राज्य
| शिल्प | राज्य | प्रमुख विशेषताएँ |
|---|---|---|
| पुथुक्कुली शॉल | तमिलनाडु | तोडा जनजाति द्वारा कढ़ाईदार वस्त्र, नीलगिरि पहाड़ियाँ |
| सुजनी कढ़ाई | बिहार | पारंपरिक रनिंग स्टिच कढ़ाई, भुसुरा गाँव में उत्पन्न |
| उप्पाडा जामदानी साड़ियाँ | आंध्र प्रदेश | जटिल बुनाई वाली पारदर्शी रेशमी साड़ियाँ, जीआई टैग प्राप्त |
| पैठणी साड़ियाँ | महाराष्ट्र | सोने/चाँदी के जरी काम वाली रेशमी साड़ियाँ |
| इलकल साड़ियाँ | कर्नाटक | विशिष्ट बॉर्डर डिजाइन के साथ कपास-रेशम मिश्रण |
| चंदेरी कपड़ा | मध्य प्रदेश | रेशम और सुनहरी जरी के साथ हल्का कपड़ा |