UPSC CSE Prelims
भारतीय कला और संस्कृति Previous Year Questions (PYQs)
Solved Previous Year Questions (PYQs) for भारतीय कला और संस्कृति in UPSC CSE Prelims in English & Hindi Medium.
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कर्नाटक के प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर ने इसका प्रतिनिधित्व किया:
Detailed Explanation:
पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर (1910–1992) कर्नाटक के प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक थे और उन्हें
-
उन्होंने उस्ताद मंजी खान और उस्ताद भुरजी खान से प्रशिक्षण प्राप्त किया, जो इस घराने के संस्थापक उस्ताद अल्लादिया खान के पुत्र थे।
-
वे दुर्लभ और जटिल रागों की प्रस्तुति के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध थे।
-
अतः सही उत्तर विकल्प (D) है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
| घराना | कारण |
|---|---|
| आगरा घराना | मंसूर इससे संबंधित नहीं थे। |
| ग्वालियर घराना | प्रारंभिक प्रशिक्षण मिला था, लेकिन बाद में जयपुर-अतरौली शैली अपनाई। |
| पटियाला घराना | यह घराना मंसूर से संबंधित नहीं है। |
| जयपुर-अतरौली घराना | मंसूर इसी घराने के प्रमुख गायक थे। ✅ |
जयपुर-अतरौली घराना
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| संस्थापक | उस्ताद अल्लादिया खान |
| संगीत परंपरा | हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत |
| विशेषता | दुर्लभ राग, जटिल तानें और लयकारी |
| प्रमुख गायक | पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर |
| गायन शैली | खुली आवाज़ और गहन राग विस्तार |
महत्वपूर्ण तथ्य
-
जयपुर-अतरौली घराना हिंदुस्तानी संगीत के प्रमुख घरानों में से एक है।
-
यह घराना विशेष रूप से दुर्लभ रागों के संरक्षण और प्रस्तुति के लिए प्रसिद्ध है।
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पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर ने इस शैली को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
फिल्म 'बूंग' के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- फिल्म ने हाल ही में बच्चों और पारिवारिक फिल्म श्रेणी में ब्रिटिश एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन आर्ट्स (बाफ्टा) पुरस्कार जीता है।
- फिल्म का निर्देशन लक्ष्मीप्रिया देवी ने किया है।
- बच्चों और पारिवारिक फिल्म श्रेणी में बाफ्टा पुरस्कार जीतने वाली यह पहली भारतीय फिल्म है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
'बूंग (Boong)' एक मणिपुरी भाषा की फिल्म है जिसने BAFTA Awards में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की।
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कथन 1 सही है: Boong ने Best Children's and Family Film श्रेणी में BAFTA पुरस्कार जीता।
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कथन 2 सही है: इस फिल्म का निर्देशन लक्ष्मीप्रिया देवी ने किया है।
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कथन 3 सही है: यह इस श्रेणी में BAFTA जीतने वाली पहली भारतीय फिल्म बनी।
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अतः तीनों कथन सही हैं, इसलिए सही उत्तर विकल्प (A) है।
अमरावती स्तूप और इसकी उभरी हुई मूर्तिकला पर निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- यह निचली कृष्णा घाटी में स्थित था।
- भारत में यह आकार में साँची स्तूप के बाद दूसरे स्थान पर था।
- अमरावती मूर्तिकला शैली ने बाद के दक्षिण भारतीय मूर्तिकला पर स्थायी प्रभाव डाला और इसके उत्पादों को श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया में ले जाया गया।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
अमरावती स्तूप (महा चैत्य) प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण बौद्ध स्मारक था।
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कथन 1 सही है: यह वर्तमान आंध्र प्रदेश के कृष्णा नदी के निचले घाटी क्षेत्र में स्थित था।
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कथन 2 गलत है: अमरावती स्तूप सांची स्तूप से भी बड़ा था, इसलिए यह सांची के बाद दूसरा सबसे बड़ा स्तूप नहीं था।
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कथन 3 सही है: अमरावती कला शैली का प्रभाव दक्षिण भारत, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला।
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अतः कथन 1 और 3 सही हैं, इसलिए सही उत्तर विकल्प (B) है।
कथनवार विश्लेषण
| कथन | स्थिति | कारण |
|---|---|---|
| यह कृष्णा घाटी के निचले भाग में स्थित था। | ✅ सही | आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के किनारे स्थित था। |
| आकार में यह केवल सांची स्तूप से छोटा था। | ❌ गलत | अमरावती स्तूप सांची स्तूप से बड़ा था। |
| इसकी कला का प्रभाव दक्षिण भारत, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया पर पड़ा। | ✅ सही | व्यापार और सांस्कृतिक संपर्कों के माध्यम से इसका प्रभाव फैला। |
अमरावती स्तूप एवं अमरावती कला शैली
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| स्थान | अमरावती, आंध्र प्रदेश |
| नदी घाटी | कृष्णा नदी की निचली घाटी |
| काल | मुख्यतः सातवाहन काल |
| अन्य नाम | महा चैत्य |
| निर्माण सामग्री | श्वेत चूना पत्थर |
| कला शैली | अमरावती (आंध्र) कला शैली |
महत्वपूर्ण तथ्य
-
यह अपने सुंदर उत्कीर्णन (Relief Sculptures) के लिए प्रसिद्ध है।
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यहाँ बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं का चित्रण मिलता है।
-
अमरावती कला का प्रभाव बाद की पल्लव, चोल, श्रीलंकाई और दक्षिण-पूर्व एशियाई कला पर पड़ा।
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निम्नलिखित कर्नाटक संगीत रागों में से कौन सा हिंदुस्तानी संगीत में राग बिलावल के समान है?
Detailed Explanation:
भारतीय शास्त्रीय संगीत की दो प्रमुख परंपराएँ हैं—हिंदुस्तानी संगीत और कर्नाटक संगीत। दोनों में कई रागों के समान स्वरक्रम मिलते हैं।
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धीरा शंकराभरणम् कर्नाटक संगीत का राग है, जो हिंदुस्तानी संगीत के राग बिलावल के समकक्ष माना जाता है।
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दोनों में सभी शुद्ध स्वर प्रयुक्त होते हैं।
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यह स्वरक्रम Western Major Scale के समान है।
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Nat Bhairavi, Kamavardhini और Hanumatodi बिलावल के समकक्ष नहीं हैं।
-
अतः सही उत्तर विकल्प (D) है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
| विकल्प | हिंदुस्तानी समकक्ष | कारण |
|---|---|---|
| Nat Bhairavi | आसावरी थाट | बिलावल नहीं |
| Kamavardhini | पूर्वी थाट | अलग स्वरक्रम |
| Hanumatodi | भैरवी थाट | बिलावल से भिन्न |
| Dheera Shankarabharanam | बिलावल थाट | ✅ सही उत्तर |
बाघ गुफाओं में हॉलिसलास्या पेंटिंग दर्शाती है:
Detailed Explanation:
मध्य प्रदेश की बाघ गुफाओं में स्थित हल्लिसालस्य (Hallisalasya) चित्रकला एक आनंदमय लोक नृत्य को दर्शाती है।
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इसमें महिलाओं को गोल घेरे में नृत्य करते हुए और लकड़ी की छोटी छड़ियाँ बजाते हुए दिखाया गया है।
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यह दृश्य आधुनिक डांडिया या गरबा की याद दिलाता है।
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साथ में महिला संगीतकार हुडुक्का (ढोल) और मंजीरे/झांझ बजाती हुई दिखाई गई हैं।
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अतः सही उत्तर विकल्प (A) है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
| विकल्प | कारण |
|---|---|
| बुद्ध की ध्यान मुद्रा | यह धार्मिक चित्र नहीं बल्कि लोक जीवन का दृश्य है। |
| कैलाश पर शिव-पार्वती | यह विषय एलोरा/एलिफेंटा जैसी हिंदू गुफाओं से संबंधित है। |
| समुद्र मंथन | हल्लिसालस्य चित्र में यह दृश्य नहीं दर्शाया गया है। |
| आनंदमय लोक नृत्य | चित्र में महिलाओं का समूह नृत्य दर्शाया गया है। ✅ |
संक्षिप्त नोट्स: बाघ गुफाएँ (Revision)
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| स्थान | धार जिला, मध्य प्रदेश |
| काल | 5वीं–6वीं शताब्दी ई. (गुप्त काल) |
| प्रकार | शैल-कट बौद्ध विहार |
| प्रसिद्ध गुफा | गुफा 4 – रंग महल |
| विशेषता | भित्ति चित्र एवं भित्तिचित्र कला |
| हल्लिसालस्य चित्र | लोक नृत्य का जीवंत दृश्य |
महत्वपूर्ण तथ्य
-
बाघ गुफाएँ अपनी सुंदर भित्ति चित्रकला के लिए प्रसिद्ध हैं।
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यहाँ धार्मिक विषयों के साथ-साथ सामाजिक जीवन के दृश्य भी चित्रित किए गए हैं।
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हल्लिसालस्य चित्र गुप्तकालीन संगीत, नृत्य और समाज की झलक प्रस्तुत करता है।
निम्नलिखित में से किस मंदिर में नागर शैली का शिखर है?
- मालेगिट्टी शिवालय, बादामी
- हुचिमल्लीगुडी मंदिर, ऐहोल
- दशावतार मंदिर, देवगढ़
- विरुपाक्ष मंदिर, पत्तदकल
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
नागर शैली की पहचान इसकी घुमावदार (Curvilinear) शिखर से होती है और यह मुख्यतः उत्तर भारत में विकसित हुई।
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कथन 1 गलत है: मालेगिट्टी शिवालय, बादामी द्रविड़ शैली का मंदिर है, इसमें नागर शैली का शिखर नहीं है।
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कथन 2 सही है: हुचिमल्लिगुड़ी मंदिर, ऐहोल में नागर शैली का घुमावदार शिखर पाया जाता है।
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कथन 3 सही है: दशावतार मंदिर, देवगढ़ नागर शैली के सबसे प्राचीन उदाहरणों में से एक है।
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कथन 4 गलत है: विरुपाक्ष मंदिर, पट्टडकल द्रविड़ शैली का मंदिर है और इसमें पिरामिडाकार विमाना है।
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अतः कथन 2 और 3 सही हैं, इसलिए सही उत्तर विकल्प (B) है।
नागर एवं द्रविड़ मंदिर वास्तुकला
| विशेषता | नागर शैली | द्रविड़ शैली |
|---|---|---|
| क्षेत्र | उत्तर भारत | दक्षिण भारत |
| शिखर | घुमावदार (Curvilinear) | पिरामिडाकार (Vimana) |
| शीर्ष भाग | आमलक एवं कलश | स्तूपिका |
| उदाहरण | दशावतार मंदिर, खजुराहो मंदिर | बृहदेश्वर मंदिर, विरुपाक्ष मंदिर |
महत्वपूर्ण तथ्य
-
ऐहोल को "भारतीय मंदिर वास्तुकला की जननी (Cradle of Indian Temple Architecture)" कहा जाता है।
-
पट्टडकल में नागर और द्रविड़ दोनों शैलियों के मंदिर मिलते हैं।
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दशावतार मंदिर, देवगढ़ गुप्तकालीन नागर शैली का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
याद रखने की ट्रिक:
👉 Nagara = North = Curved Shikhara
👉 Dravida = South = Pyramid Tower
ताई-अहोम साम्राज्य द्वारा निर्मित और यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में अंकित मोइदाम के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है/हैं?
- उन्होंने सेना के किले के रूप में काम किया।
- वे रॉयल्स और नोबल्स के मनोरंजन केंद्र थे।
- वे रॉयल्स और रईसों की कब्रगाह थे।
- वे रॉयल्स और नोबल्स के युद्ध अभ्यास केंद्र थे।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
मोइडम (Moidam/Maidam) असम के ताई-अहोम साम्राज्य के पारंपरिक समाधि-स्थल (Burial Mounds) थे।
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कथन 1 गलत है: मोइडम सैन्य किले नहीं थे।
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कथन 2 गलत है: ये राजाओं और कुलीनों के मनोरंजन केंद्र नहीं थे।
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कथन 3 सही है: मोइडम अहोम राजाओं, रानियों और कुलीनों के दफन स्थल थे।
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कथन 4 गलत है: ये सैन्य प्रशिक्षण या युद्ध अभ्यास केंद्र नहीं थे।
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अतः केवल कथन 3 सही है, इसलिए सही उत्तर विकल्प (C) है।
अन्य कथन गलत क्यों हैं?
| कथन | कारण |
|---|---|
| सैन्य किले | मोइडम धार्मिक एवं अंतिम संस्कार से जुड़े स्मारक थे। |
| मनोरंजन केंद्र | इनके ऐसे उपयोग का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। |
| युद्ध अभ्यास केंद्र | ये दफन स्थल थे, सैन्य प्रशिक्षण स्थल नहीं। |
पहला गंधर्व महाविद्यालय, एक संगीत प्रशिक्षण विद्यालय, 1901 में विष्णु दिगंबर पलुस्कर द्वारा स्थापित किया गया था
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 4 (लाहौर)
Vishnu Digambar Paluskar ने 1901 में Lahore में पहला गंधर्व महाविद्यालय स्थापित किया था। उनका उद्देश्य शास्त्रीय संगीत की शिक्षा को आम लोगों तक पहुँचाना था।
✅ कथन I सही है: पहला गंधर्व महाविद्यालय 1901 में लाहौर में स्थापित किया गया था।
✅ कथन II सही है: पलुस्कर ने घराना-आधारित सीमित परंपरा से बाहर निकलकर संगीत शिक्षा को सभी के लिए उपलब्ध कराया।
❌ दिल्ली, ग्वालियर और उज्जैन गलत हैं: इन शहरों में बाद में शाखाएँ स्थापित हुईं, लेकिन पहला संस्थान लाहौर में था।
संक्षिप्त नोट्स: विष्णु दिगंबर पलुस्कर और गंधर्व महाविद्यालय
-
विष्णु दिगंबर पलुस्कर (1872–1931) हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान आचार्य थे।
-
उन्होंने 1901 में लाहौर में पहला गंधर्व महाविद्यालय स्थापित किया।
-
इस संस्थान ने घराना परंपरा से बाहर संगठित संगीत शिक्षा को बढ़ावा दिया।
-
उन्होंने शास्त्रीय संगीत को आम जनता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
-
संगीत शिक्षण के लिए व्यवस्थित पाठ्यक्रम और नोटेशन प्रणाली विकसित की।
-
बाद में गंधर्व महाविद्यालय की शाखाएँ अनेक शहरों में खुलीं।
-
उन्हें आधुनिक हिंदुस्तानी संगीत शिक्षा का प्रमुख निर्माता माना जाता है।
निम्नलिखित में से कौन सा यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में नवीनतम समावेश था?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — गरबा नृत्य
गुजरात का गरबा नृत्य दिसंबर 2023 में कासाने, बोत्सवाना में आयोजित अंतर-सरकारी समिति के 18वें सत्र के दौरान यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में अंकित किया गया था। दिए गए विकल्पों में, यह सबसे हालिया समावेश है, जो इसे सही उत्तर बनाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में भारतीय प्रविष्टियाँ (कालानुक्रमिक)
| वर्ष | सांस्कृतिक विरासत | क्षेत्र/राज्य |
|---|---|---|
| 2008 | रामलीला (रामायण का पारंपरिक प्रदर्शन) | उत्तर प्रदेश |
| 2008 | कूडियाट्टम (संस्कृत रंगमंच) | केरल |
| 2008 | रम्मन (धार्मिक उत्सव और अनुष्ठान रंगमंच) | उत्तराखंड |
| 2009 | मुदियेट्टु (अनुष्ठान रंगमंच और नृत्य नाटक) | केरल |
| 2009 | कालबेलिया लोक गीत और नृत्य | राजस्थान |
| 2010 | छऊ नृत्य | ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल |
| 2010 | लद्दाख का बौद्ध मंत्रोच्चार | लद्दाख |
| 2013 | संकीर्तन (अनुष्ठान गायन, ढोल बजाना और नृत्य) | मणिपुर |
| 2014 | जंडियाला गुरु के ठठेरा (पीतल और तांबा शिल्प) | पंजाब |
| 2016 | योग | पूरे भारत में |
| 2016 | नवरोज (11 देशों के साथ साझा) | साझा विरासत |
| 2017 | कुंभ मेला | उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र |
| 2021 | दुर्गा पूजा | पश्चिम बंगाल |
| 2023 | गरबा नृत्य | गुजरात |
निम्नलिखित में से कौन सी रचना नाटककार भास को आरोपित की जाती है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — मध्यम-व्यायोग
मध्यम-व्यायोग भास को आरोपित एक प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है, जो कालिदास से पूर्ववर्ती प्राचीन भारत के सबसे प्रतिष्ठित नाटककारों में से एक थे। यह नाटक, जिसका अर्थ है 'मध्यम वाला', महाभारत पर आधारित त्रयी का हिस्सा है और भास की विशिष्ट नाटकीय तीव्रता और भावनात्मक गहराई को प्रदर्शित करता है।
आइए देखें कि अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
❌ विकल्प 1 – काव्यालंकार: यह संस्कृत काव्यशास्त्र (अलंकार शास्त्र) पर एक ग्रंथ है जिसे विद्वान भामह ने रचा था, भास ने नहीं।
❌ विकल्प 2 – नाट्यशास्त्र: यह भारतीय नाट्यकला, नृत्य और प्रदर्शन कलाओं पर मूलभूत ग्रंथ है जो ऋषि भरत मुनि को आरोपित है, भास को नहीं।
❌ विकल्प 4 – महाभाष्य: यह पाणिनि के अष्टाध्यायी व्याकरण पर महान भाष्य है जिसे व्याकरणविद् पतंजलि ने रचा था, यह भास का नाटकीय कार्य नहीं है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भास और शास्त्रीय संस्कृत नाटक
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| भास का काल | तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी (संभवतः पहले); कालिदास से पूर्ववर्ती |
| प्रमुख रचनाएँ | उन्हें 13 नाटक आरोपित हैं जिनमें स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिज्ञायौगन्धरायण, पंचरात्र, मध्यम-व्यायोग, दूतवाक्य, कर्णभार, उरुभंग शामिल हैं |
| विषय | अधिकतर महाभारत, रामायण और बौद्ध कथाओं पर आधारित; भावनात्मक तीव्रता और वीर पात्रों के लिए जाने जाते हैं |
| शैली | सरल लेकिन शक्तिशाली संवाद; प्राकृत भाषाओं का विशेषज्ञ उपयोग; क्रिया और भाव (रस) पर ध्यान |
| मध्यम-व्यायोग | महाभारत की घटनाओं को दर्शाने वाली त्रयी का हिस्सा; 'मध्यम' पांडव भाई भीम पर केंद्रित |
| खोज | भास के नाटकों की पुनः खोज 20वीं सदी की शुरुआत में केरल में पंडित गणपति शास्त्री द्वारा की गई |
यूनेस्को द्वारा जारी विश्व धरोहर सूची में शामिल निम्नलिखित संपत्तियों पर विचार करें:
- शांतिनिकेतन
- रानी-की-वाव
- होयसलों के पवित्र समूह
- बोधगया में महाबोधि मंदिर परिसर
उपरोक्त में से कितनी संपत्तियाँ 2023 में शामिल की गई थीं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो
सूचीबद्ध चार यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों में से केवल दो को 2023 में अंकित किया गया था: शांतिनिकेतन (सितंबर 2023 में अंकित) और होयसलों के पवित्र समूह (सितंबर 2023 में अंकित)। अन्य दो स्थल बहुत पहले अंकित किए गए थे: रानी-की-वाव को 2014 में सूची में जोड़ा गया था, और बोधगया में महाबोधि मंदिर परिसर को 2002 में अंकित किया गया था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल - हाल के परिवर्धन
- शांतिनिकेतन (2023): 1863 में महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित और रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा 1921 में विश्व-भारती विश्वविद्यालय में विस्तारित; पारंपरिक भारतीय और आधुनिक पश्चिमी शैक्षिक दर्शन के अनूठे मिश्रण का प्रतिनिधित्व करता है।
- होयसलों के पवित्र समूह (2023): तीन भव्य मंदिरों का समूह - चेन्नाकेशव मंदिर (बेलूर), होयसलेश्वर मंदिर (हलेबिडु), और केशव मंदिर (सोमनाथपुर); 12वीं-13वीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित; तारे के आकार के मंचों (जगतियों) और जटिल पत्थर की नक्काशी के लिए प्रसिद्ध।
- रानी-की-वाव (2014): पाटन, गुजरात में 11वीं शताब्दी की बावड़ी; सोलंकी वंश की रानी उदयमति द्वारा राजा भीमदेव प्रथम की स्मृति में निर्मित; जटिल मूर्तियों के साथ असाधारण बावड़ी वास्तुकला को प्रदर्शित करती है।
- महाबोधि मंदिर परिसर (2002): बोधगया, बिहार में स्थित; मूल रूप से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित; उस स्थान को चिह्नित करता है जहां गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया; पूरी तरह से ईंट में निर्मित सबसे पहले बौद्ध मंदिरों में से एक।
- भारत की यूनेस्को गणना: 2023 तक, भारत में 42 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं (34 सांस्कृतिक, 7 प्राकृतिक, और 1 मिश्रित), जो इसे विश्व स्तर पर सबसे अधिक स्थलों वाला छठा देश बनाता है।
प्राचीन भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- स्तूप की अवधारणा बौद्ध मूल की है।
- स्तूप सामान्यतः अवशेषों का भंडार था।
- स्तूप बौद्ध परंपरा में एक मनौती और स्मारकीय संरचना थी।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो
तीन कथनों में से केवल कथन 2 और 3 सही हैं। जबकि स्तूप वास्तव में अवशेषों के भंडार थे और बौद्ध परंपरा में मनौती और स्मारकीय संरचनाओं के रूप में कार्य करते थे, स्तूप की अवधारणा स्वयं बौद्ध धर्म से पूर्व की है और बौद्ध-पूर्व शवाधान टीलों के रूप में उत्पन्न हुई थी।
❌ कथन 1 – गलत: स्तूप की अवधारणा बौद्ध मूल की नहीं है; यह बौद्ध-पूर्व काल में शवाधान टीलों के रूप में अस्तित्व में थी और बाद में बौद्ध धर्म द्वारा इसे अपनाया गया और एक पवित्र स्मारक में परिवर्तित किया गया।
✅ कथन 2 – सही: स्तूप सामान्यतः अवशेषों के भंडार के रूप में कार्य करते थे, जिनमें बुद्ध या आदरणीय बौद्ध भिक्षुओं के भौतिक अवशेष या सामान होते थे।
✅ कथन 3 – सही: स्तूप मनौती (भक्ति प्रसाद) और स्मारकीय संरचनाओं के रूप में कार्य करते थे, जो बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को चिह्नित करते थे या धार्मिक भक्ति व्यक्त करते थे।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्राचीन भारत में स्तूप
- बौद्ध-पूर्व उत्पत्ति: स्तूप मूलतः बौद्ध धर्म के उदय से पहले प्राचीन भारत में शवाधान टीलों (चैत्य) के रूप में अस्तित्व में थे।
- बौद्ध अंगीकरण: बौद्ध धर्म ने स्तूप को अपनाया और इसे एक केंद्रीय धार्मिक स्मारक में परिवर्तित किया, विशेष रूप से बुद्ध के परिनिर्वाण (483 ईसा पूर्व) के बाद।
- उद्देश्य: स्तूप तीन कार्य करते थे - पवित्र अवशेषों (शरीर) के भंडार, महत्वपूर्ण बौद्ध घटनाओं को चिह्नित करने वाले स्मारकीय स्मारक, और भक्ति के कृत्यों के रूप में निर्मित मनौती संरचनाएं।
- मुख्य घटक: एक विशिष्ट स्तूप में अर्धगोलाकार गुंबद (अंड), एक वर्गाकार रेलिंग (हर्मिका), और एक छत्र जैसी संरचना (छत्रावली) होती है।
- प्रसिद्ध उदाहरण: सांची स्तूप (मध्य प्रदेश), अमरावती स्तूप (आंध्र प्रदेश), और धामेक स्तूप (सारनाथ) विभिन्न स्थापत्य शैलियों और कालों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- परिक्रमा: भक्तजन पूजा और ध्यान के रूप में स्तूपों के चारों ओर प्रदक्षिणा (दक्षिणावर्त चलना) करते हैं।
निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में धान्यकटक स्थित था, जो महासांघिकों के अधीन एक प्रमुख बौद्ध केंद्र के रूप में समृद्ध हुआ?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — आंध्र
धान्यकटक (आधुनिक अमरावती, आंध्र प्रदेश) दक्षिण भारत के आंध्र क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन नगर था। यह महासांघिक संप्रदाय के अधीन एक प्रमुख बौद्ध केंद्र के रूप में समृद्ध हुआ, जो प्रारंभिक बौद्ध संप्रदायों में से एक था और जिसने बाद में महायान बौद्ध धर्म के विकास को प्रभावित किया। यह स्थल अपने भव्य स्तूप और मूर्तिकला कला के लिए प्रसिद्ध है, जो इसे प्राचीन काल में एक प्रमुख तीर्थ और शिक्षा केंद्र बनाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत के प्राचीन बौद्ध केंद्र
| बौद्ध केंद्र | क्षेत्र/स्थान | संबद्ध संप्रदाय/महत्व |
|---|---|---|
| धान्यकटक (अमरावती) | आंध्र प्रदेश | महासांघिक संप्रदाय; विस्तृत मूर्तिकला के साथ प्रसिद्ध स्तूप |
| तक्षशिला | गांधार (पाकिस्तान) | प्रमुख शिक्षा केंद्र; गांधार कला शैली |
| नालंदा | मगध (बिहार) | महान मठवासी विश्वविद्यालय; महायान बौद्ध धर्म |
| विक्रमशिला | मगध (बिहार) | धर्मपाल द्वारा स्थापित; तांत्रिक बौद्ध धर्म |
| सांची | मध्य प्रदेश | अशोक द्वारा निर्मित प्रसिद्ध स्तूप |
| धौली | कलिंग (ओडिशा) | अशोक के शिलालेख; कलिंग युद्ध का स्थल |
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए :
स्थल : प्रसिद्धि
- बेसनगर : शैव गुफा मंदिर
- भाजा : बौद्ध गुफा मंदिर
- सित्तनवासल : जैन गुफा मंदिर
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो
दिए गए तीन युग्मों में से दो सही सुमेलित हैं। भाजा बौद्ध गुफा मंदिरों (पुणे के पास 2री शताब्दी ईसा पूर्व की शैलकृत गुफाएं) से सही रूप से जुड़ा है, और सित्तनवासल जैन गुफा मंदिरों (तमिलनाडु में प्राचीन जैन स्मारक) के लिए सही रूप से जाना जाता है। हालांकि, बेसनगर (विदिशा, मध्य प्रदेश) विशेष रूप से शैव गुफा मंदिर के लिए नहीं जाना जाता है; यह हेलिओडोरस स्तंभ के लिए अधिक प्रसिद्ध है, जो भगवान विष्णु को समर्पित एक प्राचीन गरुड़ स्तंभ है, साथ ही बौद्ध, जैन और हिंदू मंदिरों के अवशेष भी हैं।
❌ युग्म 1 (बेसनगर : शैव गुफा मंदिर) – गलत: बेसनगर (विदिशा) मुख्य रूप से हेलिओडोरस स्तंभ (विष्णु को समर्पित गरुड़ स्तंभ) के लिए जाना जाता है, शैव गुफा मंदिर के लिए नहीं।
✅ युग्म 2 (भाजा : बौद्ध गुफा मंदिर) – सही: महाराष्ट्र में भाजा गुफाएं 2री शताब्दी ईसा पूर्व की प्रसिद्ध शैलकृत बौद्ध गुफाएं हैं।
✅ युग्म 3 (सित्तनवासल : जैन गुफा मंदिर) – सही: तमिलनाडु में सित्तनवासल सुंदर भित्तिचित्रों वाले प्राचीन जैन गुफा मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत के प्रसिद्ध गुफा मंदिर
| स्थल | स्थान | धार्मिक संबद्धता | प्रमुख विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| भाजा गुफाएं | महाराष्ट्र (पुणे के पास) | बौद्ध | 22 शैलकृत गुफाएं, 2री शताब्दी ईसा पूर्व, हीनयान वास्तुकला |
| सित्तनवासल | तमिलनाडु (पुदुक्कोट्टई) | जैन | भित्तिचित्रों वाला प्राचीन जैन गुफा मंदिर, अर्धनारी गुफा |
| एलिफेंटा गुफाएं | महाराष्ट्र (मुंबई) | शैव (हिंदू) | यूनेस्को स्थल, शिव की प्रसिद्ध त्रिमूर्ति मूर्ति |
| अजंता गुफाएं | महाराष्ट्र (औरंगाबाद) | बौद्ध | यूनेस्को स्थल, चित्रों और मूर्तियों वाली 30 गुफाएं |
| एलोरा गुफाएं | महाराष्ट्र (औरंगाबाद) | बौद्ध, हिंदू, जैन | 34 गुफाएं, कैलास मंदिर (गुफा 16), यूनेस्को स्थल |
| बादामी गुफाएं | कर्नाटक | हिंदू और जैन | 4 गुफाएं, चालुक्य वास्तुकला, 6ठी शताब्दी |
| उदयगिरि गुफाएं | मध्य प्रदेश (विदिशा) | हिंदू (वैष्णव) | गुप्त काल, वराह मूर्ति |
प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
साहित्यिक कृति: लेखक
- देवीचंद्रगुप्त: बिल्हण
- हम्मीर-महाकाव्य: नयचंद्र सूरि
- मिलिंद-पन्ह: नागार्जुन
- नीतिवाक्यामृत: सोमदेव सूरि
उपर्युक्त युग्मों में से कितने सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो
यह प्रश्न प्राचीन भारतीय साहित्यिक कृतियों को उनके संबंधित लेखकों के साथ सही युग्मन की जांच करता है। दिए गए चार युग्मों में से केवल दो सही सुमेलित हैं—हम्मीर-महाकाव्य नयचंद्र सूरि के साथ और नीतिवाक्यामृत सोमदेव सूरि के साथ।
❌ युग्म 1 – गलत: देवीचंद्रगुप्तम् की रचना विशाखदत्त ने की थी, जो एक प्रसिद्ध संस्कृत नाटककार थे, न कि बिल्हण ने, जो विक्रमांकदेवचरित के लिए प्रसिद्ध बाद के कश्मीरी कवि थे।
✅ युग्म 2 – सही: हम्मीर-महाकाव्य वास्तव में नयचंद्र सूरि द्वारा रचित था, जो एक जैन विद्वान और कवि थे, जिन्होंने चौहान शासक हम्मीरदेव की वीरता का गुणगान किया।
❌ युग्म 3 – गलत: मिलिंद-पन्ह (राजा मिलिंद के प्रश्न) बौद्ध भिक्षु नागसेन और इंडो-ग्रीक राजा मिनांडर (मिलिंद) के बीच संवादों को दर्ज करता है, न कि नागार्जुन को, जो बाद के महायान दार्शनिक थे।
✅ युग्म 4 – सही: नीतिवाक्यामृत, राजनीतिक नीति और ज्ञान पर एक कृति, सोमदेव सूरि द्वारा लिखी गई थी, जो एक जैन विद्वान थे।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्राचीन भारतीय साहित्यिक कृतियाँ और लेखक
| साहित्यिक कृति | वास्तविक लेखक | काल/परंपरा | प्रमुख विशेषताएँ |
|---|---|---|---|
| देवीचंद्रगुप्तम् | विशाखदत्त | 5वीं-6वीं शताब्दी ई. | चंद्रगुप्त द्वितीय और ध्रुवदेवी पर संस्कृत नाटक |
| हम्मीर-महाकाव्य | नयचंद्र सूरि | 15वीं शताब्दी ई., जैन | चौहान शासक हम्मीरदेव की वीरता पर महाकाव्य |
| मिलिंद-पन्ह | अज्ञात (नागसेन के संवादों का अभिलेख) | 2री शताब्दी ई.पू.-1ली शताब्दी ई., थेरवाद बौद्ध धर्म | बौद्ध अवधारणाओं पर दार्शनिक संवाद |
| नीतिवाक्यामृत | सोमदेव सूरि | 10वीं शताब्दी ई., जैन | नैतिक सूक्तियाँ और राजनीतिक ज्ञान |
- बिल्हण: 11वीं शताब्दी के कश्मीरी कवि, विक्रमांकदेवचरित और चौरपंचाशिका के रचयिता
- नागार्जुन: 2री शताब्दी ई. के महायान बौद्ध दार्शनिक, माध्यमक संप्रदाय के संस्थापक; मूलमाध्यमककारिका के रचयिता
- नागसेन बनाम नागार्जुन: अक्सर भ्रमित किए जाते हैं—नागसेन एक थेरवाद भिक्षु थे (2री शताब्दी ई.पू.), जबकि नागार्जुन एक महायान दार्शनिक थे (2री शताब्दी ई.)
- विशाखदत्त: मुद्राराक्षस के भी रचयिता, चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य पर एक राजनीतिक नाटक
- जैन साहित्यिक योगदान: नयचंद्र सूरि और सोमदेव सूरि दोनों नैतिकता, राजनीति और साहित्य में जैन विद्वता की समृद्ध परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं