UPSC CSE Prelims
आधुनिक इतिहास Previous Year Questions (PYQs)
Solved Previous Year Questions (PYQs) for आधुनिक इतिहास in UPSC CSE Prelims in English & Hindi Medium.
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उन्होंने मैज़िनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी और श्रीकृष्ण की जीवनियाँ लिखीं; कुछ समय अमेरिका में रहे, और केंद्रीय विधानसभा के लिए भी चुने गए। वे थे
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — लाला लाजपत राय
लाला लाजपत राय एक प्रमुख राष्ट्रवादी नेता थे जिन्होंने भारतीय युवाओं को देशभक्ति और त्याग के आदर्शों से प्रेरित करने के लिए मैज़िनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी और श्रीकृष्ण की जीवनियाँ लिखीं। वे 1914 से 1920 तक संयुक्त राज्य अमेरिका में रहे, जहाँ उन्होंने न्यूयॉर्क में भारतीय होम रूल लीग ऑफ अमेरिका (1917) की स्थापना की, और बाद में 1923 में स्वराज पार्टी के सदस्य के रूप में केंद्रीय विधान सभा के लिए चुने गए।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लाला लाजपत राय
- उपनाम: 'पंजाब केसरी' (पंजाब का शेर) और उग्रवादी लाल-बाल-पाल त्रिमूर्ति के सदस्य (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल)
- साहित्यिक योगदान: मैज़िनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी और श्रीकृष्ण की जीवनियाँ लिखीं; 'यंग इंडिया' (1916) और 'अनहैप्पी इंडिया' (1928) की रचना की
- अमेरिका प्रवास (1914-1920): न्यूयॉर्क में भारतीय होम रूल लीग ऑफ अमेरिका (1917) की स्थापना की; भारत की स्वतंत्रता के लिए अभियान चलाया
- राजनीतिक कैरियर: 1923 में स्वराज पार्टी के सदस्य के रूप में केंद्रीय विधान सभा के लिए चुने गए; साइमन कमीशन का विरोध किया
- शहादत: लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध का नेतृत्व किया (1928); लाठीचार्ज में घायल हुए और 17 नवंबर 1928 को मृत्यु हो गई
- विरासत: उनकी मृत्यु ने स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी; भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को प्रेरित किया
चम्पारण सत्याग्रह का निम्नलिखित में से कौन सा एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — भारत के राष्ट्रीय आंदोलन से किसान असंतोष का जुड़ना
चम्पारण सत्याग्रह (1917) भारत में महात्मा गांधी का सत्याग्रह का पहला बड़ा प्रयोग था, जो बिहार में नील की खेती करने वाले किसानों की शिकायतों को संबोधित करता था जिन्हें यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा दमनकारी तिनकठिया प्रथा के तहत शोषित किया जा रहा था। इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि इसने किसानों के मुद्दों को भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा में ला दिया, इसे एक शहरी, कुलीन वर्ग के संघर्ष से एक जन-आधारित आंदोलन में बदल दिया जिसमें ग्रामीण कृषक जनता शामिल हो गई। यह स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने अहिंसक प्रतिरोध की शक्ति का प्रदर्शन किया और राष्ट्रीय स्तर पर गांधी के नेतृत्व को स्थापित किया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: चम्पारण सत्याग्रह (1917)
- स्थान: चम्पारण जिला, बिहार
- मुद्दा: तिनकठिया प्रथा जो किसानों को उनकी भूमि के 3/20 भाग पर नील की खेती करने के लिए बाध्य करती थी; यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा शोषण
- नेतृत्व: महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी और ब्रज किशोर प्रसाद द्वारा समर्थित
- विधि: भारत में सत्याग्रह (अहिंसक सविनय अवज्ञा) का पहला उपयोग
- परिणाम: तिनकठिया प्रथा का उन्मूलन; जमींदारों को किसानों को धन वापस करना पड़ा
- महत्व: किसान शिकायतों से जुड़कर राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आधारित संघर्ष में बदल दिया; गांधी के जन नेतृत्व की स्थापना की
- प्रभाव: अहिंसक तरीकों की प्रभावशीलता का प्रदर्शन किया; पूरे भारत में भविष्य के किसान आंदोलनों को प्रेरित किया
भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा स्थापित संघ में, अवशिष्ट शक्तियाँ किसे दी गई थीं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — गवर्नर जनरल
भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत, अवशिष्ट शक्तियाँ (जो संघीय, प्रांतीय या समवर्ती सूची में शामिल नहीं थीं) गवर्नर जनरल में निहित थीं। उन्हें यह निर्णय लेने का अधिकार था कि ऐसे विषयों पर कौन सा विधानमंडल शक्ति का प्रयोग करेगा। यह 1935 अधिनियम की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी जो वर्तमान संविधान से भिन्न थी, जहाँ अनुच्छेद 248 के तहत अवशिष्ट शक्तियाँ संघ की संसद में निहित हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत सरकार अधिनियम, 1935 - विधायी शक्तियाँ
| विशेषता | भारत सरकार अधिनियम, 1935 | भारत का संविधान (1950) |
|---|---|---|
| विधायी सूचियाँ | तीन सूचियाँ: संघीय, प्रांतीय, समवर्ती | तीन सूचियाँ: संघ, राज्य, समवर्ती |
| अवशिष्ट शक्तियाँ | गवर्नर जनरल में निहित | संघ की संसद में निहित (अनुच्छेद 248) |
| संघीय सूची | 59 विषय (केंद्र) | संघ सूची: प्रारंभ में 97 विषय |
| प्रांतीय सूची | 54 विषय (प्रांत) | राज्य सूची: प्रारंभ में 66 विषय |
| समवर्ती सूची | 36 विषय (दोनों) | समवर्ती सूची: प्रारंभ में 47 विषय |
| संघ की प्रकृति | संघीय प्रणाली प्रस्तावित (पूर्णतः लागू नहीं हुई) | सशक्त केंद्र के साथ अर्ध-संघीय |
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संथाल विद्रोह के शांत होने के बाद, औपनिवेशिक सरकार द्वारा क्या उपाय किए गए थे?
- 'संथाल परगना' नामक क्षेत्र बनाए गए।
- एक संथाल के लिए भूमि को गैर-संथाल को हस्तांतरित करना अवैध हो गया।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद, औपनिवेशिक सरकार ने क्षेत्र को शांत करने और कुछ शिकायतों को दूर करने के लिए प्रशासनिक और कानूनी उपाय किए। दोनों कथन ब्रिटिश प्रशासन द्वारा अपनाए गए उपायों को सही ढंग से दर्शाते हैं।
✅ कथन 1 – सही: संथाल समुदाय को अधिक प्रत्यक्ष रूप से अलग करने और शासन करने के लिए 1855 में संथाल परगना जिले को एक अलग प्रशासनिक इकाई के रूप में बनाया गया था।
✅ कथन 2 – सही: 1876 के संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम ने संथालों के लिए गैर-संथालों (बाहरी लोगों/दिकुओं) को भूमि हस्तांतरित करना अवैध बना दिया, जिससे उन्हें साहूकारों और जमींदारों द्वारा शोषण से बचाया गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संथाल विद्रोह (1855-56)
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| नेता | सिद्धू, कान्हू, चाँद और भैरव मुर्मू |
| क्षेत्र | राजमहल पहाड़ियाँ (वर्तमान झारखंड) |
| कारण | जमींदारों, साहूकारों (दिकुओं) द्वारा शोषण, उत्पीड़नकारी राजस्व नीतियाँ, भूमि हस्तांतरण |
| प्रकृति | ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता की घोषणा करते हुए और संथाल शासन स्थापित करते हुए सशस्त्र विद्रोह |
| दमन | ब्रिटिश सेना द्वारा क्रूरतापूर्वक दबाया गया; हजारों संथाल मारे गए |
| विद्रोह के बाद के उपाय | • संथाल परगना जिले का निर्माण (1855) • संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (1876) - गैर-संथालों को भूमि हस्तांतरण प्रतिबंधित • गैर-विनियमन प्रशासनिक प्रणाली की शुरुआत |
| महत्व | पहले संगठित आदिवासी प्रतिरोधों में से एक; बाद के आदिवासी आंदोलनों को प्रेरित किया |
1920 में, निम्नलिखित में से किसने अपना नाम बदलकर "स्वराज्य सभा" कर दिया?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — अखिल भारतीय होम रूल लीग
1920 में, अखिल भारतीय होम रूल लीग ने बाल गंगाधर तिलक के उत्तराधिकारी के नेतृत्व में अपना नाम बदलकर स्वराज्य सभा कर दिया। यह स्वराज (स्व-शासन) प्राप्त करने के लक्ष्य की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव को चिह्नित करता है और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के बदलते राजनीतिक परिदृश्य के साथ संरेखित था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: होम रूल आंदोलन और संबंधित संगठन
| संगठन | संस्थापक/नेता | वर्ष | मुख्य फोकस |
|---|---|---|---|
| अखिल भारतीय होम रूल लीग | बाल गंगाधर तिलक | 1916 | ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्व-शासन; 1920 में स्वराज्य सभा में नाम परिवर्तित |
| होम रूल लीग (एनी बेसेंट) | एनी बेसेंट | 1916 | डोमिनियन दर्जा और स्व-शासन |
| हिन्दू महासभा | मदन मोहन मालवीय | 1915 | हिन्दू पहचान और अधिकारों की रक्षा |
| दक्षिण भारतीय लिबरल फेडरेशन (जस्टिस पार्टी) | सी. एन. मुदलियार, टी. एम. नायर | 1916 | तमिलनाडु में गैर-ब्राह्मण प्रतिनिधित्व |
| द सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी | गोपाल कृष्ण गोखले | 1905 | सामाजिक सुधार, शिक्षा और राष्ट्रीय सेवा |
वुड्स डिस्पैच के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन से कथन सत्य हैं?
- अनुदान-सहायता प्रणाली की शुरुआत की गई थी।
- विश्वविद्यालयों की स्थापना की सिफारिश की गई थी।
- शिक्षा के सभी स्तरों पर शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी की सिफारिश की गई थी।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 2
वुड्स डिस्पैच (1854) को भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्ना कार्टा माना जाता है। इसने निजी शैक्षणिक संस्थानों को प्रोत्साहित करने के लिए अनुदान-सहायता प्रणाली की शुरुआत की और प्रेसीडेंसी नगरों में विश्वविद्यालयों की स्थापना की सिफारिश की, लेकिन शिक्षा के सभी स्तरों पर अंग्रेजी को अनिवार्य नहीं बनाया।
✅ कथन 1 – सही: डिस्पैच ने निजी स्कूलों को समर्थन देने के लिए अनुदान-सहायता प्रणाली की शुरुआत की, जिससे सीमित सरकारी संसाधनों के साथ शैक्षिक अवसरों का विस्तार हुआ।
✅ कथन 2 – सही: इसने बम्बई, कलकत्ता और मद्रास में लंदन विश्वविद्यालय के मॉडल पर विश्वविद्यालयों की स्थापना की सिफारिश की, ताकि उपाधियाँ प्रदान की जा सकें और उच्च शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सके।
❌ कथन 3 – गलत: डिस्पैच ने एक स्तरीय भाषा नीति की वकालत की—प्राथमिक शिक्षा के लिए स्थानीय भाषाएँ, माध्यमिक शिक्षा के लिए अंग्रेजी और स्थानीय भाषाएँ दोनों, और उच्च शिक्षा के लिए मुख्य रूप से अंग्रेजी, न कि सभी स्तरों पर अंग्रेजी।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वुड्स डिस्पैच (1854)
| पहलू | सिफारिश |
|---|---|
| वैकल्पिक नाम | भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्ना कार्टा |
| अनुदान-सहायता प्रणाली | सरकारी स्कूलों के साथ-साथ निजी शैक्षणिक संस्थानों को समर्थन देने के लिए शुरू की गई |
| विश्वविद्यालय | बम्बई, कलकत्ता और मद्रास में स्थापना की सिफारिश (लंदन विश्वविद्यालय के मॉडल पर) |
| भाषा नीति | प्राथमिक: स्थानीय भाषा; माध्यमिक: अंग्रेजी और स्थानीय भाषा; उच्च: मुख्य रूप से अंग्रेजी |
| शिक्षा विभाग | प्रत्येक प्रांत में अलग शिक्षा विभाग के निर्माण की सिफारिश |
| शिक्षक प्रशिक्षण | शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण स्कूलों की स्थापना की वकालत |
| फोकस | जन शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर जोर |
| महिला शिक्षा | महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित किया गया |
भारत में औपनिवेशिक शासन के दौरान शैक्षणिक संस्थानों के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| संस्थान | संस्थापक |
|---|---|
| 1. बनारस में संस्कृत कॉलेज | विलियम जोन्स |
| 2. कलकत्ता मदरसा | वारेन हेस्टिंग्स |
| 3. फोर्ट विलियम कॉलेज | आर्थर वेलेस्ली |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
यह प्रश्न ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत में स्थापित शैक्षणिक संस्थानों और उनके संबंधित संस्थापकों के ज्ञान का परीक्षण करता है। दिए गए विकल्पों में केवल कलकत्ता मदरसा और वारेन हेस्टिंग्स का युग्म सही है।
❌ युग्म 1 – गलत: बनारस में संस्कृत कॉलेज की स्थापना 1791 में जोनाथन डंकन ने की थी, विलियम जोन्स ने नहीं।
✅ युग्म 2 – सही: कलकत्ता मदरसा की स्थापना 1781 में वारेन हेस्टिंग्स ने अरबी, फारसी और इस्लामी कानून के अध्ययन के लिए की थी।
❌ युग्म 3 – गलत: फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना 1800 में लॉर्ड वेलेस्ली (रिचर्ड वेलेस्ली) ने की थी, आर्थर वेलेस्ली (ड्यूक ऑफ वेलिंगटन) ने नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: औपनिवेशिक शासन के दौरान शैक्षणिक संस्थान
| संस्थान | वर्ष | संस्थापक | उद्देश्य |
|---|---|---|---|
| कलकत्ता मदरसा | 1781 | वारेन हेस्टिंग्स | अरबी, फारसी और इस्लामी कानून का अध्ययन |
| संस्कृत कॉलेज, बनारस | 1791 | जोनाथन डंकन | हिंदू कानून और संस्कृत साहित्य का अध्ययन |
| फोर्ट विलियम कॉलेज | 1800 | लॉर्ड वेलेस्ली (रिचर्ड) | भारतीय भाषाओं और रीति-रिवाजों में ब्रिटिश सिविल सेवकों का प्रशिक्षण |
| हिंदू कॉलेज, कलकत्ता | 1817 | डेविड हेयर, राजा राम मोहन राय | पश्चिमी शिक्षा और विज्ञान |
| संस्कृत कॉलेज, कलकत्ता | 1824 | ब्रिटिश सरकार | संस्कृत और हिंदू दर्शन का अध्ययन |
18वीं सदी के मध्य में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बंगाल से निर्यात की जाने वाली मुख्य वस्तुएँ थीं -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कपास, रेशम, शोरा और अफीम
18वीं सदी के मध्य में, बंगाल मुगल साम्राज्य का सबसे समृद्ध प्रांत था और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक संचालन का प्राथमिक केंद्र था। इस अवधि के दौरान बंगाल से मुख्य निर्यात वस्तुएँ कपास और रेशम के वस्त्र (बंगाल के विश्व-प्रसिद्ध मलमल और रेशमी कपड़े), शोरा (यूरोपीय युद्धों के दौरान बारूद निर्माण के लिए आवश्यक), और अफीम (मुख्य रूप से चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया को निर्यात) थीं। ये चार वस्तुएँ बंगाल से कंपनी के अत्यधिक लाभकारी व्यापार की रीढ़ थीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: बंगाल से ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार (18वीं सदी के मध्य)
- कपास और रेशम के वस्त्र: बंगाल के उत्कृष्ट मलमल, रेशमी कपड़े और अन्य वस्त्र यूरोपीय और एशियाई बाजारों में सबसे मूल्यवान निर्यात थे। मुर्शिदाबाद, ढाका और कासिमबाजार जैसे शहर प्रमुख वस्त्र केंद्र थे।
- शोरा (पोटैशियम नाइट्रेट): बारूद उत्पादन में प्रयुक्त एक महत्वपूर्ण रणनीतिक वस्तु। बंगाल 18वीं सदी के बार-बार होने वाले युद्धों के दौरान यूरोप की अधिकांश शोरा आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। कंपनी का शोरा व्यापार पर वस्तुतः एकाधिकार था।
- अफीम: मुख्य रूप से बिहार और बंगाल में उत्पादित, अफीम चीन के साथ व्यापार के लिए तेजी से महत्वपूर्ण हो गई। यद्यपि कंपनी ने 1773 में अपना अफीम एकाधिकार औपचारिक किया, लेकिन यह मध्य-सदी तक पहले से ही एक महत्वपूर्ण निर्यात था।
- व्यापार की दिशा: भारत कीमती धातुओं (सोना, चाँदी, ताँबा) का शुद्ध आयातक था क्योंकि यूरोपीय लोग भारतीय वस्तुओं के लिए सिक्कों से भुगतान करते थे। इससे विकल्प 3 गलत हो जाता है—धातुएँ भारत से बाहर नहीं, बल्कि भारत में आती थीं।
- अन्य वस्तुएँ: चीनी और नील का भी निर्यात किया जाता था लेकिन वे चार मुख्य वस्तुओं जितने प्रभावी नहीं थे। कच्ची कपास (विकल्प 1) 19वीं सदी में औद्योगीकरण के दौरान अधिक महत्वपूर्ण हो गई।
निम्नलिखित में से कौन 1948 में स्थापित "हिन्द मजदूर सभा" के संस्थापक थे?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — अशोक मेहता, टी.एस. रामानुजम और जी.जी. मेहता
हिन्द मजदूर सभा (HMS) की स्थापना 1948 में समाजवादियों, फॉरवर्ड ब्लॉक अनुयायियों और स्वतंत्र ट्रेड यूनियनवादियों के एक समूह द्वारा की गई थी। प्रमुख संस्थापकों में अशोक मेहता (जो पहले महासचिव बने), टी.एस. रामानुजम और जी.जी. मेहता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे विकल्प 4 सही उत्तर है। आर.एस. रुइकर को HMS के पहले अध्यक्ष के रूप में चुना गया था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: हिन्द मजदूर सभा (HMS)
- स्थापना वर्ष: 1948
- संस्थापक: समाजवादियों, फॉरवर्ड ब्लॉक अनुयायियों और स्वतंत्र यूनियनवादियों का समूह जिसमें बसावन सिंह (सिन्हा), अशोक मेहता, आर.एस. रुइकर, मणिबेन कारा, शिबनाथ बनर्जी, आर.ए. खेड़गीकर, टी.एस. रामानुजम, वी.एस. माथुर और जी.जी. मेहता शामिल थे
- प्रथम अध्यक्ष: आर.एस. रुइकर
- प्रथम महासचिव: अशोक मेहता
- विचारधारा: लोकतांत्रिक समाजवाद और गैर-साम्यवादी ट्रेड यूनियनवाद
- संबद्धता: प्रारंभ में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) से जुड़ी, बाद में स्वतंत्रता बनाए रखी
- महत्व: भारत में प्रमुख केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों में से एक, जो श्रमिकों के अधिकारों और कल्याण का प्रतिनिधित्व करता है
निम्नलिखित में से किसने भारत में अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत की?
- 1813 का चार्टर अधिनियम
- लोक शिक्षा की सामान्य समिति, 1823
- प्राच्यवादी और आंग्लवादी विवाद
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — 1, 2 और 3
तीनों कारकों ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1813 के चार्टर अधिनियम ने वित्तीय आधार प्रदान किया, लोक शिक्षा की सामान्य समिति (1823) शैक्षिक नीति को लागू करने के लिए स्थापित की गई, और प्राच्यवादी-आंग्लवादी विवाद अंततः मैकाले के विवरण (1835) के माध्यम से अंग्रेजी शिक्षा के पक्ष में हल हुआ।
✅ कथन 1 – सही: 1813 का चार्टर अधिनियम भारत में शिक्षा और आधुनिक विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये स्वीकृत करने वाला पहला आधिकारिक उपाय था, जिसने ब्रिटिश शैक्षिक हस्तक्षेप की वित्तीय नींव रखी।
✅ कथन 2 – सही: लोक शिक्षा की सामान्य समिति 1823 में 1813 के शैक्षिक अनुदान को लागू करने और भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की शैक्षिक नीति का मार्गदर्शन करने के लिए स्थापित की गई थी।
✅ कथन 3 – सही: पारंपरिक भारतीय शिक्षा और पश्चिमी शिक्षा के समर्थकों के बीच प्राच्यवादी-आंग्लवादी विवाद लॉर्ड मैकाले के विवरण (1835) में समाप्त हुआ, जिसने अंग्रेजी को शिक्षा के माध्यम के रूप में स्थापित किया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत में अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत
| वर्ष/घटना | महत्व |
|---|---|
| 1813 का चार्टर अधिनियम | भारत में शिक्षा और आधुनिक विज्ञान के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये की पहली आधिकारिक स्वीकृति; भारतीय शिक्षा में राज्य की भागीदारी की शुरुआत |
| लोक शिक्षा की सामान्य समिति (1823) | 1813 के अनुदान को लागू करने के लिए स्थापित; शैक्षिक नीति पर प्राच्यवादी-आंग्लवादी बहस का मंच बना |
| प्राच्यवादी-आंग्लवादी विवाद | प्राच्यवादी (एच.एच. विल्सन, एच.टी. प्रिन्सेप) संस्कृत/अरबी शिक्षा के पक्षधर थे; आंग्लवादी (मैकाले, बेंटिक) अंग्रेजी में पश्चिमी शिक्षा के पक्षधर थे |
| मैकाले का विवरण (1835) | अंग्रेजी शिक्षा के पक्ष में विवाद का समाधान; "रक्त और रंग में भारतीय, लेकिन रुचि, विचार और बुद्धि में अंग्रेज" वर्ग बनाने की वकालत की |
| लॉर्ड बेंटिक का संकल्प (1835) | आधिकारिक रूप से अंग्रेजी को शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाया और इसे प्रशासन की भाषा बनाया |
आर्थिक रूप से, 19वीं शताब्दी में भारत में ब्रिटिश शासन के परिणामों में से एक था -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — भारतीय कृषि का व्यावसायीकरण
19वीं शताब्दी में भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति ने जानबूझकर पारंपरिक निर्वाह कृषि को वाणिज्यिक कृषि में परिवर्तित कर दिया, जो नील, कपास, चाय और अफीम जैसी नकदी फसलों पर केंद्रित थी, ताकि ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल के रूप में सेवा की जा सके। इस व्यावसायीकरण ने भारतीय कृषि को वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में एकीकृत करके ब्रिटिश साम्राज्य के आर्थिक हितों की सेवा की, जबकि साथ ही पारंपरिक हस्तशिल्प को नष्ट किया और भारत में औद्योगिक विकास को रोका।
❌ विकल्प 1 – गलत: ब्रिटिश नीतियों के कारण भारतीय हस्तशिल्प में भारी गिरावट आई जो मशीन-निर्मित वस्तुओं का पक्ष लेती थी, जिससे निर्यात में कमी आई।
❌ विकल्प 2 – गलत: 19वीं शताब्दी में भारतीय स्वामित्व वाले कारखानों में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई; ब्रिटिश नीतियों ने भारतीय औद्योगीकरण को सक्रिय रूप से हतोत्साहित किया।
✅ विकल्प 3 – सही: कृषि का व्यावसायीकरण कच्चे माल निकालने के लिए ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण का प्रत्यक्ष परिणाम था।
❌ विकल्प 4 – गलत: 19वीं शताब्दी में भारत में तेजी से शहरी विकास के बजाय विऔद्योगीकरण और ग्रामीणीकरण देखा गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन का आर्थिक प्रभाव
| पहलू | प्रभाव |
|---|---|
| कृषि का व्यावसायीकरण | खाद्य फसलों से नकदी फसलों (नील, कपास, चाय, अफीम) में बदलाव; किसानों को वाणिज्यिक फसलें उगाने के लिए मजबूर किया गया; भूमि राजस्व की मांग में वृद्धि; अकालों के प्रति संवेदनशीलता पैदा की |
| विऔद्योगीकरण | पारंपरिक हस्तशिल्प और कारीगर उद्योगों का विनाश; भारतीय वस्त्रों को ब्रिटिश मशीन-निर्मित वस्तुओं द्वारा प्रतिस्थापित किया गया; कारीगरों ने अपनी आजीविका खो दी |
| धन का निष्कासन | भारत से ब्रिटेन में संसाधनों का व्यवस्थित स्थानांतरण; संबंधित आयात के बिना निर्यात अधिशेष; गृह शुल्क और श्रद्धांजलि भुगतान |
| भूमि राजस्व प्रणालियाँ | स्थायी बंदोबस्त (1793), रैयतवाड़ी, महलवाड़ी प्रणालियाँ; उच्च राजस्व मांगों के कारण किसानों का कर्ज बढ़ा; साहूकारों और अनुपस्थित जमींदारी का विकास |
| बुनियादी ढांचे का विकास | रेलवे मुख्य रूप से कच्चे माल निष्कर्षण और सैनिकों की आवाजाही के लिए बनाई गई; सीमित औद्योगिक विकास; निर्यात व्यापार के लिए बंदरगाहों का विकास |
निम्नलिखित में से कौन सा कथन लॉर्ड वेलेजली द्वारा प्रस्तुत सहायक संधि (Subsidiary Alliance) की प्रणाली पर लागू नहीं होता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — कंपनी के लिए एक निश्चित आय सुरक्षित करना
सहायक संधि एक सैन्य-राजनीतिक प्रणाली थी जिसे लॉर्ड वेलेजली (1798–1805) ने प्रत्यक्ष भू-राजस्व प्रशासन के बजाय रणनीतिक गठबंधनों के माध्यम से भारतीय रियासतों पर ब्रिटिश नियंत्रण विस्तारित करने के लिए प्रस्तुत किया था। कंपनी के लिए एक निश्चित आय सुरक्षित करना लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा प्रस्तुत स्थायी बंदोबस्त (1793) जैसी भू-राजस्व प्रणालियों का प्राथमिक उद्देश्य था, न कि सहायक संधि का।
✅ विकल्प 1 – लागू होता है: भारतीय शासकों को अपने क्षेत्र में ब्रिटिश सेना बनाए रखनी होती थी और इसके लिए सब्सिडी देनी होती थी, जिससे कंपनी भारतीय राज्यों के खर्च पर एक बड़ी स्थायी सेना बनाए रख सकती थी।
❌ विकल्प 2 – लागू नहीं होता है: सहायक संधि सैन्य और राजनयिक नियंत्रण पर केंद्रित थी, न कि कंपनी के लिए निश्चित भू-राजस्व आय सुरक्षित करने पर।
✅ विकल्प 3 – लागू होता है: इस प्रणाली के तहत भारतीय शासकों को अपने क्षेत्रों से सभी फ्रांसीसी अधिकारियों और सैनिकों को निष्कासित करना होता था, जिससे यूरोपीय युद्धों के दौरान भारत को नेपोलियन के फ्रांसीसी प्रभाव से बचाया जा सके।
✅ विकल्प 4 – लागू होता है: बाहरी संबंधों, रक्षा को नियंत्रित करके और शाही दरबारों में ब्रिटिश रेजिडेंट तैनात करके, कंपनी ने भारतीय रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित की।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सहायक संधि प्रणाली
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| प्रस्तुतकर्ता | लॉर्ड वेलेजली (गवर्नर-जनरल, 1798–1805) |
| प्राथमिक उद्देश्य | अप्रत्यक्ष सैन्य और राजनयिक साधनों के माध्यम से ब्रिटिश नियंत्रण का विस्तार |
| प्रमुख विशेषताएं | • भारतीय शासक को ब्रिटिश सैनिकों को रखना और सब्सिडी देनी होती थी • दरबार में ब्रिटिश रेजिडेंट तैनात किया जाता था • शासक गैर-ब्रिटिश यूरोपीय लोगों को नियुक्त नहीं कर सकता था • शासक ब्रिटिश अनुमोदन के बिना विदेशी संबंधों में संलग्न नहीं हो सकता था • ब्रिटिश बाहरी खतरों से सुरक्षा प्रदान करते थे |
| स्वीकार करने वाली पहली रियासत | हैदराबाद (1798) |
| गठबंधन के तहत प्रमुख रियासतें | हैदराबाद, मैसूर (1799 के बाद), अवध, पेशवा, भोंसले, सिंधिया, जोधपुर, जयपुर, माछेरी, बरार |
| प्रतिरोध करने वाली रियासतें | त्रावणकोर ने शुरू में प्रतिरोध किया लेकिन बाद में स्वीकार कर लिया |
| स्थायी बंदोबस्त से अंतर | सहायक संधि: सैन्य-राजनयिक नियंत्रण स्थायी बंदोबस्त: निश्चित आय के लिए भू-राजस्व प्रणाली |
1929 के व्यापार विवाद अधिनियम (Trade Disputes Act) ने किसके लिए प्रावधान किया -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न्यायाधिकरणों की एक प्रणाली और हड़तालों पर प्रतिबंध।
1929 के व्यापार विवाद अधिनियम को ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा भारत में औद्योगिक विवादों को विनियमित करने के लिए अधिनियमित किया गया था। इसने नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच संघर्षों की जांच और मध्यस्थता के लिए जांच न्यायालयों और सुलह बोर्डों (न्यायाधिकरणों) के माध्यम से एक औपचारिक तंत्र स्थापित किया। महत्वपूर्ण रूप से, अधिनियम ने हड़तालों पर कठोर प्रतिबंध लगाए: इसने सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं (रेलवे, डाक सेवाएं, जल आपूर्ति, आदि) में 14 दिनों की पूर्व सूचना के बिना हड़तालों पर प्रतिबंध लगा दिया, और आम हड़तालों और राजनीतिक हड़तालों को अवैध घोषित कर दिया। यह कानून मुख्य रूप से बढ़ते ट्रेड यूनियन आंदोलन को नियंत्रित करने और बड़े पैमाने पर श्रम अशांति को रोकने के उद्देश्य से था जो ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दे सकती थी।
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में रैयतवाड़ी बंदोबस्त की शुरुआत के साथ निम्नलिखित में से कौन संबद्ध था/थे?
- लॉर्ड कॉर्नवालिस
- अलेक्जेंडर रीड
- थॉमस मुनरो
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 2 और 3
रैयतवाड़ी बंदोबस्त ब्रिटिश भारत में एक भू-राजस्व प्रणाली थी जिसमें सीधे कृषकों (रैयतों) के साथ बंदोबस्त किया जाता था। अलेक्जेंडर रीड ने पहली बार 1792 में मद्रास प्रेसीडेंसी के बारामहल जिले में इस प्रणाली को प्रायोगिक रूप से शुरू किया, और थॉमस मुनरो ने बाद में इसे परिष्कृत किया और मद्रास प्रेसीडेंसी में विस्तारित किया, जिससे वे इस प्रणाली के प्रमुख वास्तुकार बने।
❌ कथन 1 – गलत: लॉर्ड कॉर्नवालिस ने 1793 में बंगाल और बिहार में स्थायी बंदोबस्त (जमींदारी प्रणाली) की शुरुआत की, रैयतवाड़ी बंदोबस्त की नहीं।
✅ कथन 2 – सही: कैप्टन अलेक्जेंडर रीड ने तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद 1792 में बारामहल जिले (मद्रास प्रेसीडेंसी) में पहली बार रैयतवाड़ी प्रणाली शुरू की।
✅ कथन 3 – सही: थॉमस मुनरो ने रैयतवाड़ी प्रणाली को परिष्कृत और अधिकांश मद्रास प्रेसीडेंसी में विस्तारित किया और बाद में मद्रास के गवर्नर (1820–1827) बने, इस भू-राजस्व प्रणाली के प्रमुख वास्तुकार के रूप में स्थापित हुए।
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, "द्वैध शासन (Dyarchy)" का सिद्धांत किसे संदर्भित करता है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — प्रांतों को सौंपे गए विषयों का दो श्रेणियों में विभाजन।
द्वैध शासन को भारत सरकार अधिनियम, 1919 द्वारा प्रांतीय स्तर पर दोहरे शासन की व्यवस्था के रूप में लागू किया गया था। इस व्यवस्था के तहत, प्रांतीय विषयों को दो श्रेणियों में बांटा गया: 'आरक्षित' विषय (गवर्नर और उनकी कार्यकारी परिषद द्वारा नियंत्रित) और 'हस्तांतरित' विषय (विधानमंडल के प्रति जवाबदेह भारतीय मंत्रियों द्वारा नियंत्रित)। यह उत्तरदायी सरकार का एक प्रयोग था, हालांकि इसे सीमित सफलता मिली।