UPSC Prelims 2012 Question Paper
Explore the complete solved question paper for UPSC Prelims 2012 featuring 100 solved questions with bilingual (English & Hindi) explanations, official answer key, and subject weightage breakdown.
मृग प्रजातियों ओरिक्स (Oryx) और चिरू (Chiru) में क्या अंतर है?
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: ओरिक्स चार बड़ी मृग प्रजातियों का एक वंश है जो अफ्रीका और अरब के गर्म और शुष्क क्षेत्रों के लिए अनुकूलित है, जबकि चिरू (तिब्बती मृग) तिब्बती पठार के ठंडे ऊंचे पहाड़ों के स्टेपी और अर्ध-मरुस्थलीय क्षेत्रों के लिए अनुकूलित है।
❌ कथन 2 – गलत: ओरिक्स के सींग (एंटलर नहीं) होते हैं लेकिन मुख्य रूप से इनके लिए शिकार नहीं किया जाता; चिरू का शिकार इसके महीन अंडरफर (शाहतूश) के लिए किया जाता है, कस्तूरी के लिए नहीं।
❌ कथन 3 – गलत: ओरिक्स प्राकृतिक रूप से पश्चिमी भारत में नहीं पाया जाता (अफ्रीका/अरब में पाया जाता है); चिरू लद्दाख और उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है, उत्तर-पूर्व भारत में नहीं।
भारत में संरक्षित क्षेत्रों की निम्नलिखित श्रेणियों में से किसमें स्थानीय लोगों को जैव भार (biomass) एकत्र करने और उपयोग करने की अनुमति नहीं है?
Detailed Explanation:
भारत में राष्ट्रीय उद्यानों में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अनुसार स्थानीय लोगों को जैव भार एकत्र करने या उपयोग करने की अनुमति नहीं है।
जीवमंडल आरक्षित क्षेत्रों (बफर और संक्रमण क्षेत्रों में), वन्यजीव अभयारण्यों (मुख्य वन्यजीव संरक्षक की अनुमति से), और रामसर आर्द्रभूमि (स्थल-विशिष्ट नियमों के अनुसार) में स्थानीय समुदायों द्वारा नियंत्रित जैव भार संग्रहण की अनुमति है।
भारत सरकार 'सी बकथॉर्न' (sea buckthorn) की खेती को प्रोत्साहित करती है। इस पौधे का क्या महत्व है?
- यह मृदा अपरदन को नियंत्रित करने और मरुस्थलीकरण को रोकने में सहायता करता है।
- यह जैव-डीजल का एक समृद्ध स्रोत है।
- इसमें पोषण मूल्य है और यह उच्च ऊंचाई के ठंडे क्षेत्रों में रहने के लिए अच्छी तरह से अनुकूलित है।
- इसकी लकड़ी बहुत अधिक वाणिज्यिक मूल्य की है।
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: सी बकथॉर्न एक मृदा-बंधक पौधा है जिसकी व्यापक जड़ प्रणाली है जो प्रभावी रूप से मृदा अपरदन को नियंत्रित करती है और मरुस्थलीकरण को रोकती है, विशेषकर नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्रों में।
❌ कथन 2 – गलत: सी बकथॉर्न जैव-डीजल का स्रोत नहीं है; इसकी खेती इसके जामुन, पत्तियों और औषधीय/पोषण उत्पादों के लिए की जाती है, जैव ईंधन उत्पादन के लिए नहीं।
✅ कथन 3 – सही: इस पौधे में उच्च पोषण मूल्य है और इसके जामुन विटामिन C, E, कैरोटीनॉयड और ओमेगा फैटी एसिड से भरपूर हैं, और यह ठंडे, उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों जैसे लद्दाख और स्पीति में पनपता है (-40°C से +40°C सहनशीलता)।
❌ कथन 4 – गलत: सी बकथॉर्न एक झाड़ी है, लकड़ी का पेड़ नहीं; इसका वाणिज्यिक मूल्य फलों, सौंदर्य प्रसाधनों, फार्मास्यूटिकल्स में है, लकड़ी में नहीं।
🧐 Not Sure What to Study Next?
Get a personalised study plan based on your goals, time and revision needs.
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) भारतीय कृषि की रक्षा में किस प्रकार सहायता करता है?
- NBA जैव चोरी की जाँच करता है और स्वदेशी एवं पारंपरिक आनुवंशिक संसाधनों की रक्षा करता है।
- NBA फसली पौधों के आनुवंशिक संशोधन पर वैज्ञानिक अनुसंधान की सीधे निगरानी और पर्यवेक्षण करता है।
- आनुवंशिक/जैविक संसाधनों से संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकारों के लिए आवेदन NBA की स्वीकृति के बिना नहीं किया जा सकता।
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: NBA (राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण) जैव चोरी की जाँच करता है और जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत स्वदेशी एवं पारंपरिक आनुवंशिक संसाधनों की रक्षा करता है।
❌ कथन 2 – गलत: NBA फसलों पर आनुवंशिक संशोधन अनुसंधान की सीधे निगरानी नहीं करता; यह कार्य पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत GEAC (आनुवंशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति) द्वारा किया जाता है।
✅ कथन 3 – सही: जैविक संसाधनों से संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) आवेदनों के लिए जैविक विविधता अधिनियम की धारा 6 के अनुसार NBA से पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।
निम्नलिखित कृषि पद्धतियों पर विचार कीजिए:
- समोच्च बंधन (Contour bunding)
- सतत फसल (Relay cropping)
- शून्य जुताई (Zero Tillage)
वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, उपर्युक्त में से कौन-सा/से मृदा में कार्बन पृथक्करण/संचयन में सहायता करता है/करते हैं?
Detailed Explanation:
कार्बन पृथक्करण वायुमंडलीय CO₂ को पकड़कर मृदा कार्बनिक पदार्थ में संचित करने की प्रक्रिया है, जो जलवायु परिवर्तन को कम करने में सहायक है।
✅ समोच्च बंधन: ढलानों पर मृदा अपरदन रोकता है, कार्बनिक पदार्थ और नमी बनाए रखता है, मृदा में कार्बन संचयन बढ़ाता है।
✅ सतत फसल: पहली फसल की कटाई से पहले दूसरी फसल बोकर निरंतर मृदा आवरण बनाए रखती है, मृदा क्षति कम करती है, जैवभार वापसी और कार्बन पृथक्करण बढ़ाती है।
✅ शून्य जुताई: मृदा क्षति समाप्त करती है, मृदा संरचना संरक्षित करती है, कार्बनिक पदार्थ प्रतिधारण और सूक्ष्मजैविक गतिविधि बढ़ाती है, कार्बन संचयन में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
तीनों पद्धतियाँ मृदा में कार्बन पृथक्करण में सहायक हैं।
किसी भौगोलिक क्षेत्र की जैव विविधता के लिए निम्नलिखित में से कौन-से खतरे हो सकते हैं?
- ग्लोबल वार्मिंग
- आवास का विखंडन
- विदेशी प्रजातियों का आक्रमण
- शाकाहार का प्रोत्साहन
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: ग्लोबल वार्मिंग से जलवायु परिवर्तन होता है, जिससे आवास की हानि, वर्षा पैटर्न में बदलाव और बढ़ते तापमान के अनुकूल न हो पाने के कारण प्रजातियों का विलुप्तीकरण होता है।
✅ कथन 2 – सही: आवास विखंडन बड़े आवासों को छोटे, पृथक टुकड़ों में विभाजित करता है, जिससे आनुवंशिक विविधता कम होती है, प्रवास गलियारे बाधित होते हैं और जनसंख्या विलुप्ति के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है।
✅ कथन 3 – सही: आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (जैसे लैंटाना कैमारा, जल कुंभी) संसाधनों के लिए देशी प्रजातियों से प्रतिस्पर्धा करती हैं, पारिस्थितिक संतुलन को बाधित करती हैं और स्थानीय विलुप्ति का कारण बनती हैं।
❌ कथन 4 – गलत: शाकाहार का प्रोत्साहन पशुपालन की मांग कम करके पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव कम करता है, जो वनों की कटाई और आवास विनाश का कारण बनता है—इसलिए यह जैव विविधता को लाभ पहुंचाता है, खतरा नहीं।
निम्नलिखित में से जानवरों का कौन सा समूह लुप्तप्राय प्रजातियों की श्रेणी से संबंधित है?
Detailed Explanation:
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड गंभीर रूप से लुप्तप्राय (IUCN) है, राजस्थान और गुजरात में पाया जाता है; कस्तूरी मृग लुप्तप्राय है, हिमालय में कस्तूरी थैली के लिए शिकार किया जाता है; लाल पांडा लुप्तप्राय है, पूर्वी हिमालय का मूल निवासी; एशियाई जंगली गधा (खुर) निकट संकटग्रस्त (IUCN) है लेकिन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I की प्रजाति है।
विकल्प 2, 3, और 4 गलत हैं क्योंकि इनमें कम चिंता वाली प्रजातियां शामिल हैं: चीतल, नीलगाय, रीसस बंदर, और हनुमान लंगूर। इसके अलावा, सारस क्रेन और दलदली हिरण संवेदनशील हैं, लुप्तप्राय नहीं।
वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा धीरे-धीरे वायुमंडल का तापमान बढ़ा रही है क्योंकि यह अवशोषित करती है -
Detailed Explanation:
कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और अन्य ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी की सतह द्वारा उत्सर्जित अवरक्त विकिरण (ऊष्मा) को अवशोषित करती हैं जब यह सौर ऊर्जा को अवशोषित करती है।
यह फंसा हुआ अवरक्त विकिरण ग्रीनहाउस प्रभाव उत्पन्न करता है, जो वायुमंडलीय तापमान को धीरे-धीरे बढ़ाता है—न कि पराबैंगनी या सभी सौर विकिरण, बल्कि विशेष रूप से पृथ्वी से पुनः उत्सर्जित दीर्घ-तरंग अवरक्त को।
गिद्ध जो कुछ वर्ष पहले भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत आम थे, आजकल शायद ही कभी दिखाई देते हैं। यह किस कारण से है
Detailed Explanation:
डाइक्लोफेनाक, एक गैर-स्टेरॉयडल सूजनरोधी दवा (NSAID) जिसका उपयोग पशुपालक पशुधन के उपचार के लिए करते थे, ने भारत में गिद्धों की आबादी में विनाशकारी गिरावट का कारण बना।
डाइक्लोफेनाक-उपचारित पशुओं की लाशों को खाने वाले गिद्धों को तीव्र गुर्दे की विफलता हुई, जिससे 1990 के दशक और 2000 के दशक की शुरुआत के बीच तीन प्रजातियों (सफेद पीठ वाले, भारतीय, और पतली चोंच वाले गिद्ध) की आबादी में 99% की गिरावट आई। भारत ने 2006 में पशु चिकित्सा डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगाया।
बायोमास गैसीकरण को भारत में बिजली संकट के सतत समाधानों में से एक माना जाता है। इस संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- नारियल के छिलके, मूंगफली के छिलके और चावल की भूसी का उपयोग बायोमास गैसीकरण में किया जा सकता है।
- बायोमास गैसीकरण से उत्पन्न दहनशील गैसों में केवल हाइड्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड होते हैं।
- बायोमास गैसीकरण से उत्पन्न दहनशील गैसों का उपयोग प्रत्यक्ष ताप उत्पादन के लिए किया जा सकता है लेकिन आंतरिक दहन इंजनों में नहीं।
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: नारियल के छिलके, मूंगफली के छिलके और चावल की भूसी उच्च कार्बन सामग्री और कम नमी के कारण गैसीकरण के लिए उत्कृष्ट कृषि अवशेष और बायोमास फीडस्टॉक हैं।
❌ कथन 2 – गलत: बायोमास गैसीकरण से सिंथेसिस गैस (सिनगैस) में मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), हाइड्रोजन (H₂), मीथेन (CH₄), और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) होते हैं, न कि केवल हाइड्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड।
❌ कथन 3 – गलत: बायोमास गैसीकरण से सिनगैस का उपयोग प्रत्यक्ष ताप उत्पादन और टार तथा कणों को हटाने के लिए उचित सफाई और शीतलन के बाद आंतरिक दहन इंजनों दोनों में किया जा सकता है।
यदि किसी कारणवश किसी महासागर का फाइटोप्लांकटन पूरी तरह से नष्ट हो जाए, तो क्या होगा?
- कार्बन सिंक के रूप में महासागर प्रतिकूल रूप से प्रभावित होगा।
- महासागर में खाद्य श्रृंखलाएं प्रतिकूल रूप से प्रभावित होंगी।
- महासागरीय जल का घनत्व अत्यधिक कम हो जाएगा।
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: फाइटोप्लांकटन प्रकाश संश्लेषण करते हैं और वायुमंडलीय CO₂ को अवशोषित करके कार्बन संग्रहण के माध्यम से कार्बनिक कार्बन में परिवर्तित करते हैं। इनके विनाश से महासागर की कार्बन सिंक की भूमिका गंभीर रूप से प्रभावित होगी।
✅ कथन 2 – सही: फाइटोप्लांकटन समुद्री खाद्य श्रृंखलाओं का आधार हैं, जो प्राथमिक उत्पादक के रूप में जूप्लांकटन और छोटी मछलियों द्वारा उपभोग किए जाते हैं, जो बड़े समुद्री जीवों का समर्थन करते हैं। इनके पूर्ण विनाश से महासागरीय खाद्य जाल ध्वस्त हो जाएगा।
❌ कथन 3 – गलत: महासागरीय जल का घनत्व तापमान और लवणता द्वारा निर्धारित होता है, न कि सूक्ष्म फाइटोप्लांकटन की उपस्थिति से। इनके हटने से जल घनत्व पर नगण्य प्रभाव होगा।
निम्नलिखित प्रकार के जीवों पर विचार कीजिए:
- चमगादड़
- मधुमक्खी
- पक्षी
उपर्युक्त में से कौन परागणकारी एजेंट है/हैं?
Detailed Explanation:
परागणकारी एजेंट वे जीव हैं जो फूलों के नर भाग से मादा भाग तक परागकणों का स्थानांतरण करते हैं, जिससे निषेचन और बीज उत्पादन संभव होता है।
चमगादड़ (विशेष रूप से फल और मकरंद खाने वाली प्रजातियाँ) उष्णकटिबंधीय और रेगिस्तानी पौधों का परागण करते हैं, जब वे मकरंद पर भोजन करते हैं तो परागकण उनके फर पर चिपक जाते हैं।
मधुमक्खियाँ सबसे कुशल परागणकर्ता हैं, जो भोजन के लिए मकरंद और पराग एकत्र करती हैं और चारागाह के दौरान फूलों के बीच परागकणों का स्थानांतरण करती हैं।
पक्षी (जैसे हमिंगबर्ड, सनबर्ड और हनीईटर) चमकीले रंग के नलिकाकार फूलों का परागण करते हैं जब वे मकरंद पर भोजन करते हैं, तो परागकण उनकी चोंच और पंखों पर चिपक जाते हैं।
तीनों जीव — चमगादड़, मधुमक्खी और पक्षी — विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में महत्वपूर्ण परागणकारी एजेंट हैं।
निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
- काली गर्दन वाली सारस
- चीता
- उड़न गिलहरी
- हिम तेंदुआ
उपर्युक्त में से कौन से भारत में प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं?
Detailed Explanation:
✅ काली गर्दन वाली सारस – सही: प्राकृतिक रूप से लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश (ट्रांस-हिमालयी क्षेत्रों) में पाई जाती है; सर्दियों में भारत में प्रवास करती है।
❌ चीता – गलत: 1952 से भारत में विलुप्त घोषित; अंतिम तीन चीतों को 1947 में छत्तीसगढ़ (तब मध्य प्रदेश का हिस्सा) में मार दिया गया था। कूनो राष्ट्रीय उद्यान (2022) में हाल ही में पुनः प्रवेश कराई गई आबादी प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली नहीं है।
✅ उड़न गिलहरी – सही: भारत में कई प्रजातियाँ प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं, जिनमें भारतीय विशाल उड़न गिलहरी (पश्चिमी घाट) और लाल विशाल उड़न गिलहरी (पूर्वोत्तर के जंगल) शामिल हैं।
✅ हिम तेंदुआ – सही: उच्च-ऊंचाई वाले हिमालयी और ट्रांस-हिमालयी क्षेत्रों (लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश) में 3,000–5,500 मीटर से ऊपर की ऊंचाई पर पाया जाता है।
महासागरों का अम्लीकरण बढ़ रहा है। यह घटना चिंता का कारण क्यों है?
- चूनेदार फाइटोप्लांकटन की वृद्धि और उत्तरजीविता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
- प्रवाल भित्तियों की वृद्धि और उत्तरजीविता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
- कुछ जानवरों की उत्तरजीविता जिनमें फाइटोप्लांकटोनिक लार्वा होते हैं, प्रतिकूल रूप से प्रभावित होगी।
- मेघ बीजन और बादलों के निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: चूनेदार फाइटोप्लांकटन (जैसे कोक्कोलिथोफोर्स) को कैल्शियम कार्बोनेट कवच बनाने के लिए कार्बोनेट आयनों की आवश्यकता होती है; महासागर अम्लीकरण इन आयनों को कम करता है, जिससे उनका कैल्सीकरण, वृद्धि और उत्तरजीविता बाधित होती है।
✅ कथन 2 – सही: प्रवाल भित्तियाँ कैल्शियम कार्बोनेट से बनी होती हैं; बढ़ी हुई अम्लता संतृप्ति अवस्था को कम करती है, जिससे प्रवालों के लिए कंकाल बनाना कठिन हो जाता है और भित्ति विघटन हो सकता है।
✅ कथन 3 – सही: कई समुद्री अकशेरुकी (मोलस्क, इकाइनोडर्म) में फाइटोप्लांकटोनिक लार्वा होते हैं जो समुद्री जल रसायन परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील होते हैं; अम्लीकरण उनके विकास और कवच निर्माण को बाधित करता है, जिससे मृत्यु दर बढ़ती है।
❌ कथन 4 – गलत: यद्यपि अम्लीकरण डाइमिथाइल सल्फाइड (DMS) उत्पादन को कम कर सकता है जो मेघ संघनन नाभिक को प्रभावित करता है, यह एक अप्रत्यक्ष जलवायु प्रतिक्रिया है, महासागर पारिस्थितिकी तंत्र के लिए प्राथमिक प्रत्यक्ष चिंता नहीं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: क्लोरोफ्लोरोकार्बन, जिन्हें ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के रूप में जाना जाता है, का उपयोग किया जाता है
- प्लास्टिक फोम के उत्पादन में
- ट्यूबलेस टायरों के उत्पादन में
- कुछ इलेक्ट्रॉनिक घटकों की सफाई में
- एयरोसोल कैन में दबाव बनाने वाले एजेंटों के रूप में
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: CFCs का व्यापक रूप से प्लास्टिक फोम (पॉलीस्टाइरीन, पॉलीयूरेथेन) के उत्पादन में ब्लोइंग एजेंट के रूप में इन्सुलेशन और पैकेजिंग के लिए उपयोग किया जाता था।
❌ कथन 2 – गलत: ट्यूबलेस टायरों का निर्माण सल्फर का उपयोग करते हुए वल्कनीकरण प्रक्रिया से होता है; CFCs की टायर उत्पादन में कोई भूमिका नहीं है।
✅ कथन 3 – सही: CFC-113 का व्यापक उपयोग इलेक्ट्रॉनिक घटकों और सर्किट बोर्डों की सफाई के लिए विलायक के रूप में किया जाता था क्योंकि यह गैर-ज्वलनशील और अवशेष-मुक्त है।
✅ कथन 4 – सही: CFCs का उपयोग एयरोसोल कैन (हेयरस्प्रे, डियोडरेंट) में प्रणोदक/दबाव बनाने वाले एजेंट के रूप में किया जाता था जो मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत चरणबद्ध रूप से समाप्त किए गए।
मिलेनियम इकोसिस्टम असेसमेंट पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की निम्नलिखित प्रमुख श्रेणियों का वर्णन करता है: प्रावधानिक, सहायक, नियामक, संरक्षणकारी और सांस्कृतिक। निम्नलिखित में से कौन सी एक सहायक सेवा है?
Detailed Explanation:
मिलेनियम इकोसिस्टम असेसमेंट (2005) पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को चार श्रेणियों में वर्गीकृत करता है: प्रावधानिक, नियामक, सहायक और सांस्कृतिक।
सहायक सेवाएं वे बुनियादी सेवाएं हैं जो अन्य सभी पारिस्थितिकी सेवाओं के उत्पादन के लिए आवश्यक हैं, जिनमें पोषक तत्व चक्रण, मृदा निर्माण, प्राथमिक उत्पादन और प्रकाश संश्लेषण शामिल हैं।
प्रावधानिक सेवाओं में भोजन, जल, लकड़ी और रेशे का उत्पादन शामिल है (विकल्प 1)।
नियामक सेवाओं में जलवायु नियमन, रोग नियंत्रण, जल शोधन और फसल परागण शामिल हैं (विकल्प 2 और विकल्प 3 का एक भाग)।
सांस्कृतिक सेवाओं में आध्यात्मिक, मनोरंजक, सौंदर्यात्मक और शैक्षिक लाभ शामिल हैं (विकल्प 4 की विविधता रखरखाव भी सहायक से जुड़ती है)।
विकल्प 3 सही है क्योंकि पोषक तत्व चक्रण निश्चित रूप से सहायक सेवा है, यद्यपि परागण को मूल MA ढांचे में तकनीकी रूप से नियामक सेवा के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
भारत की आर्द्रभूमियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- आर्द्रभूमि श्रेणी के अंतर्गत देश का कुल भौगोलिक क्षेत्र अन्य राज्यों की तुलना में गुजरात में अधिक दर्ज किया गया है।
- भारत में, तटीय आर्द्रभूमियों का कुल भौगोलिक क्षेत्र अंतर्देशीय आर्द्रभूमियों की तुलना में बड़ा है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: गुजरात में भारत में आर्द्रभूमियों के अंतर्गत सबसे बड़ा भौगोलिक क्षेत्र है, जो देश के कुल आर्द्रभूमि क्षेत्र का लगभग 17.56% है, इसके बाद पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश का स्थान है।
❌ कथन 2 – गलत: अंतर्देशीय आर्द्रभूमियाँ भारत के कुल आर्द्रभूमि क्षेत्र का 69% हैं, जबकि तटीय आर्द्रभूमियाँ केवल 27% हैं, जिससे अंतर्देशीय आर्द्रभूमियाँ तटीय आर्द्रभूमियों से काफी बड़ी हैं।
भारत में कानून के प्रावधानों के तहत उपभोक्ताओं के अधिकारों/विशेषाधिकारों के संदर्भ में, निम्नलिखित में कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- उपभोक्ताओं को खाद्य परीक्षण के लिए नमूने लेने का अधिकार है।
- जब कोई उपभोक्ता किसी उपभोक्ता मंच में शिकायत दर्ज करता है, तो कोई शुल्क देना आवश्यक नहीं होता है।
- किसी उपभोक्ता की मृत्यु के मामले में, उसका/उसकी कानूनी उत्तराधिकारी उसकी ओर से उपभोक्ता मंच में शिकायत दर्ज कर सकता है।
नीचे दिए गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत, उपभोक्ताओं को गुणवत्ता, शुद्धता और सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करने के लिए खाद्य परीक्षण हेतु नमूने लेने का अधिकार है।
❌ कथन 2 – गलत: उपभोक्ता मंचों में फाइलिंग शुल्क देना आवश्यक है – ₹5 लाख तक के दावों के लिए ₹200, ₹5-10 लाख के लिए ₹400, और ₹10 लाख से ऊपर के दावों के लिए ₹5,000 (उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अनुसार)। केवल ₹5 लाख तक के दावों को न्यायालय शुल्क से छूट है, फाइलिंग शुल्क से नहीं।
✅ कथन 3 – सही: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(7) के तहत, कानूनी उत्तराधिकारी/प्रतिनिधि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए मृत उपभोक्ता की ओर से शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
लीड बैंक योजना का मूल उद्देश्य यह है कि:
Detailed Explanation:
लीड बैंक योजना की शुरुआत भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा दिसंबर 1969 में ग्रामीण क्षेत्रों में समन्वित बैंकिंग और ऋण सुविधाओं को सुनिश्चित करने के लिए की गई थी।
इस योजना के तहत, प्रत्येक जिले को एक लीड बैंक सौंपा जाता है जो गहन बैंकिंग विकास को बढ़ावा देने, ऋण प्रवाह का समन्वय करने और कम बैंकिंग वाले क्षेत्रों में शाखा विस्तार सुनिश्चित करने में अग्रणी भूमिका निभाता है।
मुख्य उद्देश्य जिला-स्तरीय केंद्रित विकास है, न कि बैंकों के बीच प्रतिस्पर्धा या केवल कार्यालय खोलना।
हाल ही में, 'दुर्लभ मृदा धातुओं' (rare earth metals) नामक तत्वों के समूह की कम आपूर्ति को लेकर चिंता रही है। क्यों?
- चीन, जो इन तत्वों का सबसे बड़ा उत्पादक है, ने इनके निर्यात पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं
- चीन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और चिली के अलावा, ये तत्व किसी भी देश में नहीं पाए जाते हैं
- दुर्लभ मृदा धातुएं विभिन्न प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के निर्माण के लिए आवश्यक हैं और इन तत्वों की बढ़ती मांग है
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: चीन सबसे बड़ा उत्पादक है (वैश्विक उत्पादन का ~70% नियंत्रित करता है) और उसने दुर्लभ मृदा धातुओं पर निर्यात प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे आपूर्ति श्रृंखला में चिंता है।
❌ कथन 2 – गलत: दुर्लभ मृदा धातुएं कई देशों में पाई जाती हैं जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, ब्राजील, वियतनाम, रूस, और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं, न कि केवल चीन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, और चिली में।
✅ कथन 3 – सही: दुर्लभ मृदा धातुएं स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन, पवन टरबाइन, LED स्क्रीन, रक्षा उपकरण, और अन्य उच्च-तकनीक इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण के लिए आवश्यक हैं, जिनकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
UPSC Prelims 2012 Questions Paper - Subject-wise Question Distribution
UPSC Prelims 2012 Question Paper - FAQs & Analysis
Q1 How many total questions were asked in UPSC Prelims 2012?
Q2 What is the subject-wise question breakdown for UPSC Prelims 2012?
- पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी: 19 questions (19%)
- भारतीय राजव्यवस्था: 19 questions (19%)
- भारतीय अर्थव्यवस्था: 12 questions (12%)
- आधुनिक इतिहास: 11 questions (11%)
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: 10 questions (10%)
- भारत का भूगोल: 8 questions (8%)
- विश्व भूगोल: 6 questions (6%)
- समसामयिकी: 6 questions (6%)
- भारतीय कला और संस्कृति: 6 questions (6%)
- प्राचीन इतिहास: 3 questions (3%)