UPSC Prelims 2017
भारतीय राजव्यवस्था Previous Year Questions (PYQs)
Explore 22 solved UPSC Prelims 2017 भारतीय राजव्यवस्था questions with detailed step-by-step bilingual solutions, option analysis, and answer keys.
लोकतंत्र की श्रेष्ठ विशेषता इस तथ्य में निहित है कि यह क्रियाशीलता में बुलाता है
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — साधारण स्त्री-पुरुषों की बुद्धि और चरित्र को।
लोकतंत्र की श्रेष्ठ विशेषता इसकी क्षमता में निहित है कि यह साधारण स्त्री-पुरुषों की बुद्धि और चरित्र को क्रियाशीलता में बुलाता है, उन्हें शासन में निष्क्रिय प्रजा के बजाय सक्रिय भागीदार बनाता है। लोकतंत्र मूल रूप से नागरिक भागीदारी के सिद्धांत पर निर्मित है, जहां सूचित और संलग्न लोगों की सामूहिक बुद्धि बेहतर निर्णय लेने की ओर ले जाती है और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देती है। जबकि मजबूत नेतृत्व और समर्पित दलीय कार्यकर्ताओं की अपनी भूमिकाएं हैं, लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति नागरिकों को सशक्त बनाने में निहित है, यह सुनिश्चित करते हुए कि शासन कुछ चुनिंदा लोगों के बजाय आम लोगों की इच्छा, मूल्यों और चरित्र को प्रतिबिंबित करे।
भारत में, न्यायिक समीक्षा का तात्पर्य है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — न्यायपालिका की वह शक्ति जो कानूनों और कार्यकारी आदेशों की संवैधानिकता पर निर्णय देती है।
भारत में न्यायिक समीक्षा से तात्पर्य न्यायपालिका की उस शक्ति से है जिसके द्वारा वह यह जांच और निर्धारण करती है कि विधायिका द्वारा पारित कानून और कार्यपालिका द्वारा किए गए कार्य संविधान के अनुरूप हैं या नहीं। यदि कोई कानून या कार्यकारी आदेश संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो न्यायालय उन्हें अवैध या असंवैधानिक घोषित कर सकते हैं। यह शक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13, 32, 136, 142 और 226 से प्राप्त होती है और नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो संविधान की सर्वोच्चता और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
विकल्प 1 सही क्यों है:
विकल्प 1 न्यायिक समीक्षा को विधायी अधिनियमों और कार्यकारी कार्यों की संवैधानिकता का आकलन करने की न्यायपालिका की शक्ति के रूप में सटीक रूप से परिभाषित करता है, जो भारत में इस सिद्धांत का मूल सार है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
❌ विकल्प 2 – गलत: न्यायपालिका कानूनों के पीछे की बुद्धिमत्ता या नीति पर प्रश्न नहीं उठा सकती; यह केवल उनकी संवैधानिक वैधता की जांच कर सकती है।
❌ विकल्प 3 – गलत: न्यायिक समीक्षा पूर्व-अधिनियमन जांच तंत्र नहीं है; न्यायालय कानूनों की समीक्षा केवल उनके अधिनियमित होने और चुनौती दिए जाने के बाद करते हैं।
❌ विकल्प 4 – गलत: यह निर्णयों की पुनर्विचार या समीक्षा की शक्ति का वर्णन करता है, संवैधानिक अर्थ में न्यायिक समीक्षा का नहीं।
निम्नलिखित में से कौन सी भारतीय संघवाद की विशेषता नहीं है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — यह संघीय इकाइयों के बीच एक समझौते का परिणाम है।
भारतीय संघवाद संघीय इकाइयों के बीच समझौते का परिणाम नहीं है, जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका या स्विट्जरलैंड जैसे शास्त्रीय संघों में होता है। भारतीय संविधान को संविधान सभा द्वारा अपनाया गया था, न कि पूर्व-मौजूदा संप्रभु राज्यों के बीच किसी समझौते या संधि के माध्यम से। भारतीय संघीय ढांचे को संविधान द्वारा ही बनाया गया था, जो इसे संघीय इकाइयों के पारस्परिक समझौते के बजाय संविधान सभा के एक अधिनियम द्वारा निर्मित संघ बनाता है।
✅ विकल्प 1 – सही: भारत में एक स्वतंत्र न्यायपालिका है जो संविधान की संरक्षक और केंद्र-राज्य विवादों में मध्यस्थ के रूप में कार्य करती है।
✅ विकल्प 2 – सही: संविधान सातवीं अनुसूची में संघ, राज्य और समवर्ती सूचियों के माध्यम से केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों को स्पष्ट रूप से विभाजित करता है।
✅ विकल्प 3 – सही: राज्यों को राज्यसभा में उनकी जनसंख्या के आधार पर असमान प्रतिनिधित्व मिलता है, जो शास्त्रीय संघों में समान प्रतिनिधित्व के विपरीत है।
❌ विकल्प 4 – गलत: भारतीय संघवाद संघीय इकाइयों के बीच समझौते से नहीं बनाया गया था, बल्कि संविधान सभा द्वारा संविधान के माध्यम से स्थापित किया गया था।
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निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — अधिकार राज्य के विरुद्ध नागरिकों के दावे हैं।
अधिकार मौलिक हकदारी हैं जो नागरिकों को राज्य के विरुद्ध वैध दावे करने के लिए सशक्त बनाते हैं, जिससे उनकी स्वतंत्रता की रक्षा और आवश्यक सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित होती है। राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है कि वह इन अधिकारों का सम्मान करे, उनकी रक्षा करे और उन्हें पूरा करे, जो मनमानी राज्य कार्रवाई के खिलाफ सुरक्षा के रूप में कार्य करते हैं।
❌ विकल्प 1 – गलत: अधिकार नागरिकों के विरुद्ध राज्य के दावे नहीं हैं; बल्कि राज्य का दायित्व है कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे।
❌ विकल्प 2 – गलत: अधिकार केवल विशेषाधिकार नहीं हैं बल्कि सभी नागरिकों को गारंटीकृत मौलिक हकदारी हैं, हालांकि कई संविधान में समाहित हैं।
✅ विकल्प 3 – सही: अधिकार वैध दावों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो नागरिक राज्य के विरुद्ध यह सुनिश्चित करने के लिए कर सकते हैं कि उनकी स्वतंत्रता और हकदारी की रक्षा और पूर्ति की जाए।
❌ विकल्प 4 – गलत: अधिकार सभी नागरिकों के लिए सार्वभौमिक हकदारी हैं, न कि कुछ लोगों तक सीमित विशेषाधिकार, जो समानता के सिद्धांत को दर्शाते हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: भारत के संविधान के संदर्भ में, राज्य की नीति के निदेशक तत्व निम्नलिखित पर सीमाएँ हैं:
- विधायी कार्य।
- कार्यकारी कार्य।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न तो 1 और न ही 2
संविधान के भाग IV में निहित राज्य की नीति के निदेशक तत्व (DPSPs) सीमाएँ नहीं हैं बल्कि राज्य के लिए सकारात्मक दिशानिर्देश हैं। अनुच्छेद 37 के तहत ये न्यायोचित नहीं हैं, अर्थात् इन्हें न्यायालयों में लागू नहीं किया जा सकता लेकिन ये शासन के लिए मौलिक सिद्धांतों के रूप में कार्य करते हैं। DPSPs विधायी और कार्यकारी दोनों कार्यों को सामाजिक-आर्थिक न्याय प्राप्त करने की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं, न कि इन कार्यों को बाधित या सीमित करते हैं।
❌ कथन 1 – गलत: DPSPs विधायी कार्य पर सीमाएँ नहीं हैं; ये सकारात्मक निर्देश और मार्गदर्शक सिद्धांत हैं जिन्हें विधायिका को कानून बनाते समय लागू करने का प्रयास करना चाहिए।
❌ कथन 2 – गलत: DPSPs कार्यकारी कार्य पर सीमाएँ नहीं हैं; न्यायोचित न होने के कारण, ये नीतिगत लक्ष्यों और मार्गदर्शक आदर्शों के रूप में कार्य करते हैं जिन्हें कार्यपालिका को शासन और प्रशासन में अपनाना चाहिए।
भारत के संविधान में शोषण के विरुद्ध अधिकार द्वारा निम्नलिखित में से किसकी परिकल्पना की गई है?
- मानव के दुर्व्यापार और बलात् श्रम का प्रतिषेध
- अस्पृश्यता का उन्मूलन
- अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण
- कारखानों और खानों में बच्चों के नियोजन का प्रतिषेध
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 4
शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24) विशेष रूप से व्यक्तियों को बलात् श्रम, मानव तस्करी और खतरनाक व्यवसायों में बाल शोषण से सुरक्षा प्रदान करता है। अनुच्छेद 23 और 24 क्रमशः कथन 1 और 4 से सीधे संबंधित हैं, जो उन्हें इस मौलिक अधिकार के एकमात्र सही घटक बनाता है।
✅ कथन 1 – सही: अनुच्छेद 23 स्पष्ट रूप से मानव के दुर्व्यापार, बेगार (बलात् श्रम), और इसी प्रकार के बलात् श्रम के रूपों को प्रतिषिद्ध करता है।
❌ कथन 2 – गलत: अस्पृश्यता का उन्मूलन अनुच्छेद 17 के तहत आता है, जो समानता के अधिकार के अंतर्गत आता है, न कि शोषण के विरुद्ध अधिकार के अंतर्गत।
❌ कथन 3 – गलत: अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण अनुच्छेद 29-30 के माध्यम से सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों के तहत सुनिश्चित किया जाता है, न कि शोषण के विरुद्ध अधिकार के तहत।
✅ कथन 4 – सही: अनुच्छेद 24, 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के नियोजन को कारखानों, खानों या किसी खतरनाक व्यवसाय में प्रतिषिद्ध करता है, जो सीधे बाल शोषण को संबोधित करता है।
इस प्रकार, भारतीय संविधान के तहत शोषण के विरुद्ध अधिकार के अंतर्गत केवल कथन 1 और 4 ही आते हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत निर्वाचन आयोग एक पांच सदस्यीय निकाय है।
- केंद्रीय गृह मंत्रालय आम चुनावों और उप-चुनावों दोनों के संचालन के लिए चुनाव कार्यक्रम तय करता है।
- निर्वाचन आयोग मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवादों का समाधान करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — केवल 3
भारत निर्वाचन आयोग एक तीन-सदस्यीय निकाय है (एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त), पांच-सदस्यीय नहीं। ईसीआई स्वयं अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव कार्यक्रम तय करता है, गृह मंत्रालय नहीं। केवल कथन 3 सही है क्योंकि ईसीआई के पास मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन और विलय से संबंधित विवादों को हल करने और तदनुसार चुन्ह आवंटित करने की वैधानिक शक्ति है।
❌ कथन 1 – गलत: ईसीआई एक तीन-सदस्यीय निकाय है जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त शामिल हैं, पांच सदस्य नहीं।
❌ कथन 2 – गलत: भारत निर्वाचन आयोग, केंद्रीय गृह मंत्रालय नहीं, संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आम चुनावों और उप-चुनावों का चुनाव कार्यक्रम तय करता है।
✅ कथन 3 – सही: निर्वाचन आयोग के पास मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन और विलय से संबंधित विवादों को हल करने और दल चिन्हों के आवंटन पर निर्णय लेने का अधिकार है।
संसदीय शासन प्रणाली का मुख्य लाभ यह है कि -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनी रहती है।
संसदीय शासन प्रणाली की मौलिक विशेषता सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत है, जहाँ कार्यपालिका (मंत्रिपरिषद) विधायिका के प्रति प्रत्यक्ष रूप से जवाबदेह होती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार, मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है और केवल तभी तक सत्ता में रह सकती है जब तक उसे सदन का विश्वास प्राप्त हो। यह लोकतांत्रिक जवाबदेही और निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण सुनिश्चित करता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
❌ विकल्प 1 – गलत: संसदीय प्रणाली में, कार्यपालिका और विधायिका परस्पर निर्भर होती हैं, स्वतंत्र नहीं। शक्तियों का पृथक्करण राष्ट्रपति प्रणाली की विशेषता है।
❌ विकल्प 2 – गलत: राष्ट्रपति प्रणाली, न कि संसदीय प्रणाली, निश्चित कार्यकाल के कारण नीति की निरंतरता के लिए जानी जाती है। संसदीय सरकारें अविश्वास प्रस्तावों के माध्यम से बार-बार बदल सकती हैं।
❌ विकल्प 4 – गलत: संसदीय प्रणाली में, सरकार के प्रमुख (प्रधानमंत्री) को अविश्वास प्रस्ताव या दल नेतृत्व परिवर्तन के माध्यम से आम चुनाव के बिना बदला जा सकता है, राष्ट्रपति प्रणाली के विपरीत।
भारत की संसद के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- गैर-सरकारी सदस्य विधेयक वह विधेयक है जो संसद के ऐसे सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जो निर्वाचित नहीं है बल्कि केवल भारत के राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत है।
- हाल ही में, भारत की संसद में अपने इतिहास में पहली बार एक गैर-सरकारी सदस्य विधेयक पारित किया गया है।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न तो 1 और न ही 2
भारतीय संसद में गैर-सरकारी सदस्य विधेयकों के बारे में दोनों कथन गलत हैं। गैर-सरकारी सदस्य विधेयक किसी भी ऐसे सांसद द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जो मंत्री नहीं है, चाहे वे निर्वाचित हों या मनोनीत, न कि विशेष रूप से केवल मनोनीत सदस्यों द्वारा। इसके अतिरिक्त, संसद के इतिहास में गैर-सरकारी सदस्य विधेयक पारित किए गए हैं, 1952 से अब तक ऐसे 14 विधेयक अधिनियमित किए गए हैं, हालांकि अंतिम विधेयक 1970 में पारित हुआ था।
❌ कथन 1 – गलत: गैर-सरकारी सदस्य विधेयक किसी भी सांसद (निर्वाचित या मनोनीत) द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है जो मंत्री नहीं है, न कि केवल मनोनीत सदस्यों द्वारा।
❌ कथन 2 – गलत: संसद के इतिहास में गैर-सरकारी सदस्य विधेयक पारित किए गए हैं; 1952 और 1970 के बीच ऐसे 14 विधेयक अधिनियमित किए गए, जिनमें अंतिम विधेयक सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अपीलीय अधिकार क्षेत्र का विस्तार) विधेयक, 1970 था।
समाज में समानता के निहितार्थों में से एक है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — विशेषाधिकार
समाज में समानता का तात्पर्य है कि सभी व्यक्तियों को बिना किसी वरीयता के समान अधिकार, अवसर और स्थिति प्राप्त हो। विशेषाधिकारों की उपस्थिति—कुछ समूहों या व्यक्तियों द्वारा प्राप्त अनर्जित लाभ या विशेष अधिकार—समानता के सिद्धांत का सीधे खंडन करती है, क्योंकि यह पदानुक्रम और विभेदक व्यवहार उत्पन्न करती है। इसलिए, विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति वास्तव में समान समाज का एक मूलभूत निहितार्थ है।
विकल्पों का विश्लेषण:
✅ विशेषाधिकार – सही: विशेषाधिकार चुनिंदा समूहों को दिए गए विशेष लाभों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो समानता के सिद्धांत के साथ असंगत हैं जो सभी के लिए समान अधिकारों और अवसरों की मांग करता है।
❌ प्रतिबंध – गलत: उचित प्रतिबंध (जैसे कानून और नियम) समानता सुनिश्चित करने और भेदभाव को रोकने के लिए आवश्यक हैं, इस प्रकार वे समानता के साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हैं।
❌ प्रतिस्पर्धा – गलत: योग्यता के आधार पर निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा समानता के अनुकूल है, बशर्ते कि सभी व्यक्तियों को प्रतिस्पर्धा करने के समान अवसर मिलें।
❌ विचारधारा – गलत: विभिन्न विचारधाराएं समानता का समर्थन या विरोध कर सकती हैं; विचारधारा स्वयं समान समाज में अनुपस्थित नहीं होती।
निम्नलिखित में से कौन सा सिद्धांत 42वें संविधान संशोधन द्वारा राज्य के नीति निदेशक तत्वों में जोड़ा गया था?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी
अनुच्छेद 43A, जो उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी को अनिवार्य करता है, को 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा राज्य के नीति निदेशक तत्वों में जोड़ा गया था। यह प्रावधान औद्योगिक लोकतंत्र को बढ़ावा देने और यह सुनिश्चित करने के लिए पेश किया गया था कि श्रमिकों की औद्योगिक प्रतिष्ठानों में निर्णय लेने में सार्थक भूमिका हो। अन्य विकल्प—समान कार्य के लिए समान वेतन (अनुच्छेद 39(घ)), काम और शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 41), और निर्वाह मजदूरी को सुरक्षित करना (अनुच्छेद 43)—सभी 1950 में अपनाए गए मूल संविधान का हिस्सा थे।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
❌ विकल्प 1 – समान कार्य के लिए समान वेतन: यह पहले से ही मूल संविधान के अनुच्छेद 39(घ) में मौजूद था।
❌ विकल्प 3 – काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता का अधिकार: यह मूल संविधान के अनुच्छेद 41 में शामिल था।
❌ विकल्प 4 – निर्वाह मजदूरी और मानवीय परिस्थितियों को सुरक्षित करना: यह मूल संविधान में अनुच्छेद 43 का हिस्सा था।
निम्नलिखित कथनों में से उस कथन को चुनिए जो मंत्रिमंडलीय शासन प्रणाली के अंतर्निहित सिद्धांत को व्यक्त करता है:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — लोगों के प्रति सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए संसदीय लोकतंत्र की एक प्रणाली।
मंत्रिमंडलीय शासन प्रणाली संसदीय लोकतंत्र की एक परिभाषित विशेषता है जहाँ मंत्रिपरिषद विधायिका (संसद) के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। यह सिद्धांत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(3) में निहित है, जो यह अनिवार्य करता है कि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी।
विकल्प 3 सही क्यों है:
सामूहिक उत्तरदायित्व का अर्थ है कि मंत्रिमंडल के निर्णय सभी मंत्रियों को बाध्य करते हैं, जिन्हें व्यक्तिगत असहमति के बावजूद सार्वजनिक रूप से उनका समर्थन करना होता है। यदि संसद अविश्वास प्रस्ताव पारित करती है, तो संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होगा, जो लोकतांत्रिक जवाबदेही सुनिश्चित करता है और मनमानी कार्यपालिका शासन को रोकता है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
❌ विकल्प 1 – गलत: मंत्रिमंडल प्रणाली आलोचना को कम करने के लिए नहीं बल्कि संसद के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है।
❌ विकल्प 2 – गलत: यद्यपि दक्षता एक लाभ हो सकता है, अंतर्निहित सिद्धांत सामूहिक उत्तरदायित्व और जवाबदेही है, केवल सरकारी गतिविधियों को तेज करना नहीं।
❌ विकल्प 4 – गलत: मंत्रिमंडल प्रणाली सरकार के प्रमुख की लोगों पर पकड़ मजबूत करने का उपाय नहीं है, बल्कि विधायिका के प्रति सामूहिक निर्णय लेने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए है।
भारत के संविधान की प्रस्तावना में निम्नलिखित में से कौन सा उद्देश्य सन्निहित नहीं है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — आर्थिक स्वतंत्रता
भारत के संविधान की प्रस्तावना अपने सभी नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता स्पष्ट रूप से प्रदान करती है। हालांकि, आर्थिक स्वतंत्रता का प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है। यद्यपि संविधान मौलिक अधिकारों (भाग III) और राज्य के नीति निदेशक तत्वों (भाग IV) के माध्यम से आर्थिक स्वतंत्रता को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देता है, किंतु 'आर्थिक स्वतंत्रता' शब्द प्रस्तावना में प्रकट नहीं होता है।
विकल्पों का विश्लेषण:
✅ विकल्प 1 – विचार की स्वतंत्रता: प्रस्तावना में 'स्वतंत्रता' के अंतर्गत स्पष्ट रूप से उल्लिखित है।
❌ विकल्प 2 – आर्थिक स्वतंत्रता: प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से सन्निहित नहीं है, जो इसे सही उत्तर बनाता है।
✅ विकल्प 3 – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: प्रस्तावना में 'स्वतंत्रता' के अंतर्गत स्पष्ट रूप से उल्लिखित है।
✅ विकल्प 4 – विश्वास की स्वतंत्रता: प्रस्तावना में 'स्वतंत्रता' के अंतर्गत स्पष्ट रूप से उल्लिखित है।
भारत की संसद मंत्रिपरिषद के कार्यों पर निम्नलिखित के माध्यम से नियंत्रण रखती है -
- स्थगन प्रस्ताव
- प्रश्नकाल
- अनुपूरक प्रश्न
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग करके सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
भारत की संसद कार्यकारिणी की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न तंत्रों के माध्यम से मंत्रिपरिषद पर नियंत्रण रखती है। उल्लिखित सभी तीन साधन—स्थगन प्रस्ताव, प्रश्नकाल और अनुपूरक प्रश्न—कार्यपालिका की जांच और नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण संसदीय उपकरण हैं।
✅ कथन 1 – सही: स्थगन प्रस्ताव सार्वजनिक महत्व के तत्काल मामलों पर चर्चा की अनुमति देता है और सरकार की निंदा के लिए उपयोग किया जा सकता है, जिससे मंत्रिपरिषद पर नियंत्रण रखा जा सकता है।
✅ कथन 2 – सही: प्रश्नकाल एक दैनिक तंत्र है जिसके दौरान सांसद नीतियों और प्रशासनिक कार्यों पर मंत्रियों से प्रश्न पूछते हैं, जिससे शासन में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
✅ कथन 3 – सही: अनुपूरक प्रश्न प्रश्नकाल के दौरान प्रारंभिक उत्तर के बाद पूछे जाते हैं, जो सांसदों को गहराई से जांच करने और स्पष्टीकरण मांगने की अनुमति देते हैं, जिससे मंत्रिस्तरीय कार्यों पर संसदीय नियंत्रण बढ़ता है।
किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा के निम्नलिखित में से कौन से आवश्यक रूप से परिणाम नहीं हैं?
- राज्य विधान सभा का विघटन
- राज्य में मंत्रिपरिषद को हटाना
- स्थानीय निकायों का विघटन
उपर्युक्त दिए गए कथनों में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 1 और 3
जब अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की घोषणा की जाती है, तो मंत्रिपरिषद को हटाना अनिवार्य है, लेकिन राज्य विधान सभा और स्थानीय निकायों का विघटन स्वचालित परिणाम नहीं हैं। विधानसभा को निलंबित अवस्था में रखा जा सकता है या भंग किया जा सकता है, और स्थानीय निकाय संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्य करते रहते हैं जब तक कि अलग से भंग न किए जाएं।
✅ कथन 1 – सही: राज्य विधान सभा का विघटन अनिवार्य नहीं है; राष्ट्रपति शासन के दौरान इसे भंग किया जा सकता है या निलंबित अवस्था में रखा जा सकता है।
❌ कथन 2 – गलत: जब राष्ट्रपति शासन लागू होता है तो मंत्रिपरिषद को हटाना हमेशा एक आवश्यक परिणाम होता है, क्योंकि राज्यपाल राष्ट्रपति की ओर से कार्यकारी शक्तियां संभाल लेता है।
✅ कथन 3 – सही: स्थानीय निकायों का विघटन राष्ट्रपति शासन का स्वचालित परिणाम नहीं है; वे 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों के तहत स्वतंत्र रूप से कार्य करते रहते हैं।
स्थानीय स्व-शासन को सर्वोत्तम रूप से किस प्रकार समझाया जा सकता है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण
स्थानीय स्व-शासन को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के रूप में सबसे अच्छे ढंग से समझा जाता है, जिसमें शक्तियों, कार्यों और संसाधनों का सरकार के उच्च स्तरों से स्थानीय निकायों को हस्तांतरण शामिल है, साथ ही निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से सक्रिय नागरिक भागीदारी भी। यह जमीनी स्तर पर लोकतंत्र सुनिश्चित करता है, समुदायों को स्थानीय मुद्दों को हल करने के लिए सशक्त बनाता है, और सबसे निचले प्रशासनिक स्तर पर कुशल सेवा वितरण सक्षम करता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
❌ विकल्प 1 – संघवाद: हालांकि स्थानीय स्व-शासन एक संघीय संरचना के भीतर काम करता है, संघवाद मुख्य रूप से संघ और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों के विभाजन को संदर्भित करता है, न कि स्थानीय निकायों को हस्तांतरण को।
❌ विकल्प 3 – प्रशासनिक प्रत्यायोजन: प्रशासनिक प्रत्यायोजन में संवैधानिक समर्थन या लोकतांत्रिक भागीदारी के बिना अधिकार का अस्थायी हस्तांतरण शामिल है, जबकि स्थानीय स्व-शासन की संवैधानिक स्थिति है (73वां और 74वां संशोधन) और इसमें निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल हैं।
❌ विकल्प 4 – प्रत्यक्ष लोकतंत्र: प्रत्यक्ष लोकतंत्र का अर्थ है कि नागरिक सभी निर्णयों में सीधे भाग लेते हैं (जैसे जनमत संग्रह), जबकि स्थानीय स्व-शासन निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से कार्य करता है (जमीनी स्तर पर प्रतिनिधि लोकतंत्र)।
लोकसभा के चुनाव के लिए, नामांकन पत्र किसके द्वारा दाखिल किया जा सकता है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — भारत का कोई भी नागरिक जिसका नाम किसी निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 84 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए, व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए, कम से कम 25 वर्ष की आयु का होना चाहिए, और उसका नाम भारत के किसी भी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज होना चाहिए। उम्मीदवार को उस निर्वाचन क्षेत्र का निवासी होना आवश्यक नहीं है जहां से वे चुनाव लड़ना चाहते हैं; वे किसी भी निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ सकते हैं बशर्ते वे भारत में कहीं भी मतदाता के रूप में पंजीकृत हों। यह सुनिश्चित करता है कि केवल पंजीकृत मतदाता जिनकी चुनावी प्रक्रिया में हिस्सेदारी है, चुनाव लड़ सकते हैं।
भारत के संविधान के निर्माताओं का मन निम्नलिखित में से किसमें प्रतिबिंबित होता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — प्रस्तावना
भारत के संविधान की प्रस्तावना एक प्रारंभिक कथन के रूप में कार्य करती है जो संविधान के निर्माताओं की दृष्टि, दर्शन और उद्देश्यों को समाहित करती है। यह संविधान सभा द्वारा परिकल्पित आकांक्षाओं और आदर्शों को प्रतिबिंबित करती है, जिसमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व शामिल हैं, और संप्रभुता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और गणतंत्रवाद के मूलभूत सिद्धांतों को परिभाषित करती है। जबकि मौलिक अधिकार, निदेशक तत्व और मौलिक कर्तव्य शासन और नागरिक जिम्मेदारियों के विशिष्ट पहलुओं पर विस्तार से बताते हैं, प्रस्तावना संक्षिप्त रूप से मूल उद्देश्य और दार्शनिक आधार को व्यक्त करती है जिसने संविधान निर्माताओं का मार्गदर्शन किया, जिससे यह उनके मन और दृष्टि का सच्चा प्रतिबिंब बन जाती है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- लोकसभा या राज्य विधानसभा के चुनाव में, विजयी उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित होने के लिए डाले गए मतों का कम से कम 50 प्रतिशत प्राप्त करना आवश्यक है।
- भारत के संविधान में निर्धारित प्रावधानों के अनुसार, लोकसभा में अध्यक्ष का पद बहुमत दल को और उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — न तो 1, न ही 2
दोनों कथनों में भारत की चुनावी और संसदीय प्रक्रियाओं के बारे में गलत जानकारी है। भारत में फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) प्रणाली लागू है जहां सरल बहुमत (सर्वाधिक मत) विजेता निर्धारित करता है, न कि पूर्ण बहुमत (50%+)। संविधान में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों के बहुमत और विपक्षी दलों के बीच आवंटन का प्रावधान नहीं है; दोनों का चुनाव सदन के सदस्यों द्वारा किया जाता है।
❌ कथन 1 – गलत: भारत में FPTP प्रणाली का उपयोग होता है जहां सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार विजयी होता है, चाहे उसे कुल डाले गए मतों का 50% या अधिक प्राप्त हो या नहीं।
❌ कथन 2 – गलत: संविधान यह निर्धारित नहीं करता कि अध्यक्ष का पद बहुमत दल को और उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को जाता है; दोनों पदों के लिए लोकसभा सदस्यों द्वारा चुनाव किया जाता है, यद्यपि परंपरा से उपाध्यक्ष अक्सर विपक्ष से होता है।
भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा अधिकारों और कर्तव्यों के बीच सही संबंध है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — अधिकार कर्तव्यों के साथ सहसंबद्ध हैं।
भारतीय संवैधानिक ढांचे में, अधिकार और कर्तव्य परस्पर निर्भर और एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां मौलिक अधिकार (भाग III) व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वतंत्रताओं की रक्षा करते हैं, वहीं मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A) राष्ट्र, समाज और सह-नागरिकों के प्रति नागरिकों की नैतिक और नागरिक जिम्मेदारियों पर जोर देते हैं। अधिकारों का प्रयोग शून्य में नहीं किया जा सकता; सामाजिक सद्भाव और सामूहिक कल्याण सुनिश्चित करने के लिए उन्हें संबंधित कर्तव्यों के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को भारत के सभी लोगों के बीच सद्भाव और सामान्य भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने के कर्तव्य के साथ संतुलित किया गया है।
विकल्पों का मूल्यांकन:
✅ विकल्प 1 – सही: अधिकार और कर्तव्य सहसंबद्ध और परस्पर निर्भर हैं, जैसा कि भारतीय संविधान में मान्यता प्राप्त है जहां मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य दोनों सह-अस्तित्व में हैं ताकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाया जा सके।
❌ विकल्प 2 – गलत: अधिकार समाज और कर्तव्यों से स्वतंत्र नहीं हैं; वे एक सामाजिक ढांचे के भीतर मौजूद हैं और दूसरों के प्रति संबंधित कर्तव्यों की जागरूकता के साथ जिम्मेदारी से प्रयोग किए जाने चाहिए।
❌ विकल्प 3 – गलत: व्यक्तित्व विकास के लिए अधिकार और कर्तव्य दोनों महत्वपूर्ण हैं; कर्तव्य यह सुनिश्चित करते हैं कि व्यक्तिगत उन्नति सामाजिक कल्याण और सद्भाव की कीमत पर न हो।
❌ विकल्प 4 – गलत: राज्य की स्थिरता के लिए अधिकार और कर्तव्य दोनों आवश्यक हैं; अधिकार नागरिकों की वैधता और सहमति सुनिश्चित करते हैं, जबकि कर्तव्य जिम्मेदार नागरिकता सुनिश्चित करते हैं।
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UPSC Prelims 2017 - भारतीय राजव्यवस्था Chapter-wise Distribution
संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
3 Qs (13.6%)मौलिक अधिकार
3 Qs (13.6%)निर्वाचन एवं चुनाव प्रणाली
3 Qs (13.6%)संसद
2 Qs (9.1%)राज्य के नीति निदेशक तत्व
2 Qs (9.1%)मौलिक कर्तव्य
2 Qs (9.1%)संविधान की प्रस्तावना
2 Qs (9.1%)स्थानीय स्वशासन
1 Qs (4.5%)आपातकालीन उपबंध
1 Qs (4.5%)संविधान संशोधन
1 Qs (4.5%)संवैधानिक निकाय
1 Qs (4.5%)उच्चतम न्यायालय
1 Qs (4.5%)UPSC Prelims 2017 - भारतीय राजव्यवस्था Questions FAQs
Q1 How many भारतीय राजव्यवस्था questions were asked in UPSC Prelims 2017?
Q2 What is the chapter-wise question distribution for भारतीय राजव्यवस्था in UPSC Prelims 2017?
- संविधान की प्रमुख विशेषताएँ: 3 questions (13.6%)
- मौलिक अधिकार: 3 questions (13.6%)
- निर्वाचन एवं चुनाव प्रणाली: 3 questions (13.6%)
- संसद: 2 questions (9.1%)
- राज्य के नीति निदेशक तत्व: 2 questions (9.1%)
- मौलिक कर्तव्य: 2 questions (9.1%)
- संविधान की प्रस्तावना: 2 questions (9.1%)
- स्थानीय स्वशासन: 1 questions (4.5%)
- आपातकालीन उपबंध: 1 questions (4.5%)
- संविधान संशोधन: 1 questions (4.5%)
- संवैधानिक निकाय: 1 questions (4.5%)
- उच्चतम न्यायालय: 1 questions (4.5%)