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प्राचीन इतिहास Previous Year Questions (PYQs)
Solved Previous Year Questions (PYQs) for प्राचीन इतिहास in UPSC CSE Prelims in English & Hindi Medium.
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भारत के इतिहास के संदर्भ में, शब्द "कुल्यवाप" और "द्रोणवाप" निरूपित करते हैं
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — भूमि का मापन
शब्द कुल्यवाप और द्रोणवाप प्राचीन भारत में, विशेष रूप से गुप्त काल के दौरान, भूमि मापन की इकाइयाँ थीं। ये मापन एक निर्दिष्ट भूमि क्षेत्र में बोने के लिए आवश्यक बीज की मात्रा पर आधारित थे—'वाप' का अर्थ है 'बोना', जबकि 'कुल्य' और 'द्रोण' अनाज के आयतन के माप थे।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्राचीन भारतीय भूमि मापन प्रणाली
| शब्द | अर्थ | संदर्भ |
|---|---|---|
| कुल्यवाप | वह भूमि क्षेत्र जिसमें बोने के लिए एक कुल्य (बड़ा माप) अनाज की आवश्यकता होती है | सामान्यतः गुप्तकालीन ताम्रपत्र अभिलेखों (दामोदरपुर पट्टिकाएँ आदि) में भूमि अनुदान और लेन-देन के रिकॉर्ड में पाए जाते हैं |
| द्रोणवाप | वह भूमि क्षेत्र जिसमें बोने के लिए एक द्रोण (छोटा माप) अनाज की आवश्यकता होती है | |
| आढवाप | वह भूमि क्षेत्र जिसमें बोने के लिए एक आढ अनाज की आवश्यकता होती है | |
| पाटक | भूमि मापन की एक अन्य इकाई |
- वाप का शाब्दिक अर्थ है 'बोना', जो दर्शाता है कि ये बीज-आधारित मापन थे
- ये इकाइयाँ एक कृषि अर्थव्यवस्था को प्रतिबिंबित करती हैं जहाँ भूमि का मूल्य उत्पादकता से जुड़ा था
- गुप्त काल (लगभग 320-550 ईस्वी) में इन मापों का उपयोग करके व्यवस्थित भूमि राजस्व प्रशासन देखा गया
- ब्राह्मणों और मंदिरों को भूमि अनुदान अक्सर इन इकाइयों का उपयोग करके दर्ज किए जाते थे
- यह प्रणाली आधुनिक क्षेत्रफल-आधारित मापों से भिन्न थी, इसके बजाय कार्यात्मक कृषि क्षमता का उपयोग करती थी
भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा 'पारमिता' शब्द का सही विवरण है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — पूर्णताएं जिनकी प्राप्ति बोधिसत्व पथ की ओर ले जाती है
बौद्ध दर्शन में 'पारमिता' शब्द उन अतिक्रामक गुणों या पूर्णताओं को संदर्भित करता है जिन्हें बोधिसत्वों को अपने ज्ञानोदय के मार्ग पर विकसित करना आवश्यक है। महायान बौद्ध धर्म में, ये पूर्णताएं आम तौर पर छह गुणों को शामिल करती हैं: दान (उदारता), शील (नैतिक आचरण), क्षांति (धैर्य), वीर्य (परिश्रम), ध्यान (चित्त एकाग्रता), और प्रज्ञा (ज्ञान)। इन गुणों का अभ्यास और पूर्णता बोधिसत्वों को बुद्धत्व की ओर बढ़ने में सक्षम बनाती है जबकि दूसरों को दुख से मुक्ति प्राप्त करने में मदद करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: बौद्ध धर्म में पारमिता
- पारमिता (पूर्णताएं): महायान बौद्ध धर्म में अतिक्रामक गुण जो ज्ञानोदय और बोधिसत्व स्थिति प्राप्त करने के लिए अभ्यास किए जाते हैं।
- छह पारंपरिक पारमिताएं: (1) दान (उदारता), (2) शील (नैतिक आचरण/नीतिशास्त्र), (3) क्षांति (धैर्य/सहनशीलता), (4) वीर्य (ऊर्जा/परिश्रम), (5) ध्यान (चित्त एकाग्रता), (6) प्रज्ञा (ज्ञान/अंतर्दृष्टि)।
- विस्तारित सूची: कुछ ग्रंथों में दस पारमिताओं का उल्लेख है, जिसमें उपाय (कुशल साधन), प्रणिधान (संकल्प), बल (आध्यात्मिक शक्ति), और ज्ञान (विवेक) शामिल हैं।
- बोधिसत्व मार्ग: बोधिसत्व वह है जो केवल अपने लिए नहीं बल्कि सभी संवेदनशील प्राणियों की सहायता के लिए ज्ञानोदय की खोज करता है; पारमिताएं इस मार्ग पर आवश्यक अभ्यास हैं।
- महायान परंपरा: पारमिता की अवधारणा महायान बौद्ध धर्म के केंद्र में है और बोधिसत्व आदर्श पर जोर देने में इसे थेरवाद परंपरा से अलग करती है।
भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- स्थविरवादी महायान बौद्ध धर्म से संबंधित हैं।
- लोकोत्तरवादी संप्रदाय बौद्ध धर्म के महासांघिक संप्रदाय की एक शाखा थी।
- महासांघिकों द्वारा बुद्ध के देवीकरण ने महायान बौद्ध धर्म को बढ़ावा दिया।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 3
यह प्रश्न प्रारंभिक बौद्ध सांप्रदायिक विकास के ज्ञान की परीक्षा करता है जिसने महायान बौद्ध धर्म के उद्भव को जन्म दिया। महासांघिक संप्रदाय ने अपने उदार सिद्धांतात्मक दृष्टिकोण और बुद्ध के देवीकरण के माध्यम से महायान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
❌ कथन 1 – गलत: स्थविरवादी (थेरवादी) थेरवाद बौद्ध धर्म से संबंधित हैं, महायान बौद्ध धर्म से नहीं। वे रूढ़िवादी परंपरावादी स्कूल का प्रतिनिधित्व करते हैं जो मठवासी अनुशासन और मूल शिक्षाओं के सख्त पालन पर बल देते थे।
✅ कथन 2 – सही: लोकोत्तरवादी संप्रदाय वास्तव में महासांघिक स्कूल की एक शाखा थी। 'लोकोत्तरवाद' शब्द का अर्थ है 'अतिलौकिक सिद्धांत', जो मानते थे कि बुद्ध अतिलौकिक (लोकोत्तर) थे और सांसारिक नियमों से बंधे नहीं थे।
✅ कथन 3 – सही: महासांघिकों के प्रगतिशील विचार, जिसमें बुद्ध का देवीकरण और अतिलौकिक स्वरूप शामिल है, ने सीधे तौर पर महायान बौद्ध धर्म की सिद्धांतात्मक नींव में योगदान दिया, जो बोधिसत्व आदर्श और अनेक बुद्धों पर बल देता था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रारंभिक बौद्ध स्कूल और महायान विकास
| पहलू | स्थविरवादी (थेरवाद) | महासांघिक |
|---|---|---|
| अर्थ | 'वृद्धों का सिद्धांत' | 'महान सभा' |
| प्रकृति | रूढ़िवादी, परंपरावादी | उदारवादी, प्रगतिशील |
| बुद्ध का दृष्टिकोण | मानव शिक्षक जिन्होंने ज्ञान प्राप्त किया | अतिलौकिक, अतींद्रिय सत्ता |
| मठवासी नियम | विनय का सख्त पालन | अधिक लचीली व्याख्या |
| योगदान | प्रारंभिक शिक्षाओं का संरक्षण; थेरवाद की ओर ले गया | सिद्धांतात्मक नवाचार; महायान को बढ़ावा दिया |
| प्रमुख शाखाएं | विभिन्न थेरवाद स्कूल | लोकोत्तरवादी, प्रज्ञप्तिवादी |
- प्रथम बौद्ध संगीति (483 ईसा पूर्व): बुद्ध की मृत्यु के बाद राजगृह में आयोजित; शिक्षाओं का संकलन किया लेकिन असहमति के बीज उभरे।
- द्वितीय बौद्ध संगीति (383 ईसा पूर्व): वैशाली में आयोजित; मठवासी अनुशासन को लेकर स्थविरवादियों और महासांघिकों के बीच प्रमुख विभाजन।
- लोकोत्तरवादी: मानते थे कि बुद्ध के पास अनंत शक्तियां, अनंत आयु थी, और वे वास्तव में कभी भी भौतिक सीमाओं से बंधे नहीं थे।
- महायान विकास: लगभग 1ली शताब्दी ईसा पूर्व-ईस्वी के आसपास उभरा, बुद्ध की अतिलौकिकता, अनेक बुद्धों, और बोधिसत्व मार्ग की महासांघिक अवधारणाओं पर निर्मित।
- आज का थेरवाद: श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया और लाओस में प्रारंभिक बौद्ध धर्म के एकमात्र जीवित स्कूल के रूप में जीवित है।
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भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
- परिव्राजक — संन्यासी और भ्रमणकारी
- श्रमण — उच्च स्थिति वाला पुजारी
- उपासक — बौद्ध धर्म का गृहस्थ अनुयायी
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न प्राचीन भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक शब्दावली के ज्ञान का परीक्षण करता है। युग्म 1 और युग्म 3 सही सुमेलित हैं, जबकि युग्म 2 श्रमणों को उच्च स्थिति वाले पुजारियों के रूप में गलत तरीके से वर्णित करता है, जबकि वे वास्तव में तपस्वी साधक थे जिन्होंने ब्राह्मणवादी रूढ़िवाद को अस्वीकार कर दिया था।
✅ युग्म 1 – सही: परिव्राजक का शाब्दिक अर्थ 'भ्रमणकारी' है और यह उन संन्यासियों को संदर्भित करता है जिन्होंने सांसारिक जीवन त्यागकर यात्रा की और आध्यात्मिक ज्ञान की खोज की।
❌ युग्म 2 – गलत: श्रमण का अर्थ है 'जो प्रयास करता है' और यह तपस्वी परंपराओं (बौद्ध धर्म, जैन धर्म, आजीविक) को संदर्भित करता है जिन्होंने वैदिक पुरोहित पदानुक्रम का विरोध किया, न कि उच्च स्थिति वाले पुजारी।
✅ युग्म 3 – सही: उपासक बौद्ध धर्म के गृहस्थ अनुयायियों को संदर्भित करता है जिन्होंने मठवासी संघ में शामिल हुए बिना धर्म का अभ्यास किया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्राचीन भारतीय धार्मिक शब्दावली
| शब्द | अर्थ | संदर्भ |
|---|---|---|
| परिव्राजक | भ्रमणशील तपस्वी/संन्यासी | धार्मिक भिक्षु जिन्होंने सांसारिक जीवन त्याग दिया और आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए यात्रा की |
| श्रमण | जो प्रयास करता है/तपस्या करता है | तपस्वी परंपराएं (बौद्ध धर्म, जैन धर्म, आजीविक) जिन्होंने वैदिक कर्मकांड और जाति पदानुक्रम को अस्वीकार किया |
| उपासक (पुरुष) / उपासिका (स्त्री) | गृहस्थ अनुयायी | बौद्ध और जैन धर्म के गैर-मठवासी अनुयायी जो बुनियादी नियमों का पालन करते थे |
| भिक्षु (पुरुष) / भिक्षुणी (स्त्री) | साधु/साध्वी | बौद्ध मठवासी संघ के सदस्य जिन्होंने पूर्ण दीक्षा ली |
| ब्राह्मण | वैदिक पुजारी | उच्च जाति के पुजारी जो वैदिक अनुष्ठान और यज्ञ करते थे |
निम्नलिखित में से किस शासक ने अपनी प्रजा को इस अभिलेख के माध्यम से सलाह दी थी? "जो कोई अपने धार्मिक संप्रदाय की प्रशंसा करता है या अन्य संप्रदायों की निंदा करता है, अपने स्वयं के संप्रदाय के प्रति अत्यधिक भक्ति के कारण, अपने स्वयं के संप्रदाय को महिमामंडित करने के उद्देश्य से, वह वास्तव में अपने स्वयं के संप्रदाय को गंभीर रूप से हानि पहुंचाता है।"
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — अशोक
यह अभिलेख अशोक के वृहद शिलालेख XII से है, जो विभिन्न संप्रदायों के बीच धार्मिक सहिष्णुता और सद्भाव पर जोर देता है। मौर्य सम्राट अशोक (268-232 ईसा पूर्व) ने कलिंग युद्ध के बाद अपने परिवर्तन के पश्चात धम्म (धार्मिकता) और धार्मिक बहुलवाद को बढ़ावा दिया। यह अभिलेख विशेष रूप से सांप्रदायिक असहिष्णुता के खिलाफ चेतावनी देता है और सभी धार्मिक परंपराओं का सम्मान करने की वकालत करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अशोक के अभिलेख
| अभिलेख का प्रकार | प्रमुख विशेषताएं | महत्वपूर्ण उदाहरण |
|---|---|---|
| वृहद शिलालेख (14) | बड़ी चट्टानों पर उत्कीर्ण; धम्म, धार्मिक सहिष्णुता, कल्याणकारी उपायों से संबंधित | शिलालेख XII (धार्मिक सहिष्णुता), XIII (कलिंग युद्ध के लिए पश्चाताप) |
| लघु शिलालेख | छोटे अभिलेख; बौद्ध सिद्धांतों और व्यक्तिगत आस्था पर केंद्रित | बुद्ध, धम्म और संघ में विश्वास की घोषणा |
| स्तंभ लेख (7) | पॉलिश किए गए बलुआ पत्थर के स्तंभों पर उत्कीर्ण; प्रशासनिक और नैतिक निर्देश | स्तंभ लेख VII (धार्मिक सहिष्णुता और कल्याण) |
| लघु स्तंभ लेख | बौद्ध भिक्षुओं और प्रशासकों को विशिष्ट निर्देश | मतभेद अभिलेख, रानी का अभिलेख |
- भाषाएं: मुख्य रूप से प्राकृत (ब्राह्मी लिपि), उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों में यूनानी और अरामाइक
- मुख्य विषय: धम्म (धार्मिकता), अहिंसा, धार्मिक सहिष्णुता, पशु कल्याण, सामाजिक सद्भाव
- शिलालेख XII विशेष रूप से: सांप्रदायिक अहंकार की आलोचना करता है, धर्मों के बीच पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा देता है, अन्य संप्रदायों के बारे में वाणी में संयम के माध्यम से विकास पर जोर देता है
- ऐतिहासिक महत्व: भारत में सबसे प्रारंभिक पाठ्य अभिलेख; मौर्य प्रशासन और अशोक की विचारधारा में अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं
- भौगोलिक विस्तार: अफगानिस्तान से कर्नाटक तक भारतीय उपमहाद्वीप में पाए गए, जो विशाल साम्राज्य की सीमा को इंगित करते हैं
प्राचीन भारत के विद्वानों/साहित्यकारों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- पाणिनि पुष्यमित्र शुंग से संबंधित हैं।
- अमरसिंह हर्षवर्धन से संबंधित हैं।
- कालिदास चंद्रगुप्त-II से संबंधित हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 3
यह प्रश्न प्राचीन भारतीय विद्वानों के अपने समकालीन शासकों के साथ संबंध का परीक्षण करता है। केवल कालिदास का चंद्रगुप्त II के साथ संबंध ऐतिहासिक रूप से सटीक है, जबकि पाणिनि और अमरसिंह को दिए गए शासकों के साथ गलत तरीके से जोड़ा गया है।
❌ कथन 1 – गलत: पाणिनि (5वीं-4थी शताब्दी ईसा पूर्व), अष्टाध्यायी के रचयिता, पुष्यमित्र शुंग (2री शताब्दी ईसा पूर्व) से सदियों पहले रहते थे। पतंजलि, पाणिनि नहीं, पुष्यमित्र शुंग के समकालीन थे।
❌ कथन 2 – गलत: अमरसिंह, अमरकोश के लेखक, चंद्रगुप्त II (गुप्त काल) के दरबार में नवरत्नों में से एक थे, न कि हर्षवर्धन (7वीं शताब्दी ईस्वी, पुष्यभूति वंश) के।
✅ कथन 3 – सही: कालिदास, महानतम संस्कृत कवि और नाटककार, वास्तव में चंद्रगुप्त II (विक्रमादित्य, शा. 375-415 ईस्वी) के दरबार में नवरत्नों में से एक थे।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विद्वान और उनके संरक्षक
| विद्वान/साहित्यकार | काल/शताब्दी | संबद्ध शासक/वंश | प्रमुख कृति(याँ) |
|---|---|---|---|
| पाणिनि | 5वीं-4थी शताब्दी ईसा पूर्व | मौर्य-पूर्व काल | अष्टाध्यायी (संस्कृत व्याकरण) |
| पतंजलि | 2री शताब्दी ईसा पूर्व | पुष्यमित्र शुंग | महाभाष्य (पाणिनि पर टीका) |
| कालिदास | 4थी-5वीं शताब्दी ईस्वी | चंद्रगुप्त II (गुप्त) | अभिज्ञानशाकुंतलम्, मेघदूत, रघुवंश |
| अमरसिंह | 4थी-5वीं शताब्दी ईस्वी | चंद्रगुप्त II (गुप्त) | अमरकोश (संस्कृत कोश) |
| बाणभट्ट | 7वीं शताब्दी ईस्वी | हर्षवर्धन | हर्षचरित, कादंबरी |
- चंद्रगुप्त II के नवरत्न: कालिदास, अमरसिंह, धन्वंतरि, वराहमिहिर, वररुचि, क्षपणक, शंकु, वेताल भट्ट, और घटकर्पर शामिल थे।
- गुप्त स्वर्णयुग: चंद्रगुप्त II (375-415 ईस्वी) का काल शास्त्रीय संस्कृत साहित्य और शिक्षा का चरम था।
- हर्ष का दरबार: यद्यपि हर्षवर्धन (शा. 606-647 ईस्वी) विद्या के संरक्षक थे, उनके दरबार के साहित्यकारों में बाणभट्ट और मयूर शामिल थे, अमरसिंह नहीं।
निम्नलिखित में से कौन सी हड़प्पा स्थल नहीं है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — सोहगौरा
सोहगौरा एक हड़प्पा स्थल नहीं है; यह उत्तर प्रदेश में स्थित है और ब्राह्मी लिपि में प्राकृत भाषा में लिखे गए ताम्र-पत्र अभिलेख के लिए प्रसिद्ध है, जो मौर्य काल का है। अन्य तीन स्थल—चन्हूदड़ो और कोट दीजी (सिंध, पाकिस्तान में) और देसलपुर (गुजरात, भारत में)—सभी प्रामाणिक हड़प्पा स्थल हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: हड़प्पा स्थल
| स्थल | स्थान | प्रमुख विशेषताएँ |
|---|---|---|
| चन्हूदड़ो | सिंध, पाकिस्तान | मनका-निर्माण, खिलौना गाड़ियाँ, कुत्तों के पैरों के निशान; कोई दुर्ग नहीं मिला |
| कोट दीजी | सिंध, पाकिस्तान | पूर्व-हड़प्पा और हड़प्पा चरण; किलेबंदी की दीवार |
| देसलपुर | गुजरात, भारत | तटीय हड़प्पा स्थल; व्यापार के साक्ष्य |
| सोहगौरा | उत्तर प्रदेश, भारत | ब्राह्मी लिपि में मौर्य ताम्र-पत्र अभिलेख; हड़प्पा स्थल नहीं है |
गुप्त काल के दौरान भारत में बेगार (विष्टि) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — इसे राज्य के लिए आय का एक स्रोत माना जाता था, जो लोगों द्वारा दिए जाने वाले एक प्रकार का कर था।
गुप्त काल के दौरान, विष्टि (बेगार) को एक वैध राजकोषीय दायित्व के रूप में मान्यता प्राप्त थी जहाँ प्रजा कर भुगतान के बदले राज्य को अनिवार्य श्रम सेवाएं प्रदान करती थी। जूनागढ़ अभिलेख स्पष्ट रूप से विष्टि को बलि (कर) और भाग (उपज का हिस्सा) जैसे अन्य राजस्व स्रोतों के साथ सूचीबद्ध करता है, जो गुप्त प्रशासन के दौरान राज्य की आय तंत्र के रूप में इसकी स्थिति की पुष्टि करता है।
✅ विकल्प 1 – सही: विष्टि को वास्तव में वस्तु-कर के रूप में माना जाता था, एक अनिवार्य श्रम सेवा जो गुप्त प्रशासन के दौरान राज्य के लिए राजस्व स्रोत का गठन करती थी।
❌ विकल्प 2 – गलत: विष्टि पूरे गुप्त साम्राज्य में प्रचलित थी, जिसमें मध्य प्रदेश और काठियावाड़ क्षेत्र भी शामिल थे, जैसा कि जूनागढ़ (काठियावाड़) के अभिलेखीय अभिलेखों से प्रमाणित होता है।
❌ विकल्प 3 – गलत: बलात् निष्कर्षण का एक रूप होने के कारण, विष्टि श्रमिकों को किसी मजदूरी का अधिकार नहीं था; यह एक अवैतनिक अनिवार्य सेवा दायित्व था।
❌ विकल्प 4 – गलत: ऐसा कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है जो यह सुझाव देता हो कि विष्टि का भार विशेष रूप से सबसे बड़े पुत्र को सौंपा गया था; यह प्रजा जनसंख्या पर लगाया गया एक सामान्य दायित्व था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: गुप्त काल में कराधान प्रणाली
| कर/राजस्व प्रकार | विवरण |
|---|---|
| भाग | कृषि उपज में राजा का हिस्सा (आमतौर पर उपज का 1/6वां भाग) |
| बलि | राजा को दी जाने वाली धार्मिक श्रद्धांजलि या भेंट |
| विष्टि/विस्ति | बेगार सेवा; राज्य के लिए अनिवार्य अवैतनिक कार्य |
| हिरण्य | वस्तु के बजाय नकद में दिया जाने वाला कर |
| उद्रंग | आवधिक कर या अतिरिक्त उपकर |
| उपरिकर | भूमि पर अतिरिक्त उपकर या अतिरिक्त कर |
- गुप्त राजस्व प्रणाली मुख्य रूप से कृषि-आधारित थी, भू-राजस्व राज्य की आय का प्राथमिक स्रोत था।
- क्षेत्रीय प्रथाओं के आधार पर कर वस्तु (अनाज, उपज) और नकद दोनों में एकत्र किए जाते थे।
- बेगार (विष्टि) विशेष रूप से निम्न सामाजिक वर्ग और किसान समुदायों पर बोझ थी।
- इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख और विभिन्न भूमि अनुदान अभिलेख गुप्त राजकोषीय प्रशासन में विस्तृत अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं।
निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
- बुद्ध का देवीकरण
- बोधिसत्वों के मार्ग पर चलना
- मूर्ति पूजा और अनुष्ठान
उपर्युक्त में से कौन-सा/से महायान बौद्ध धर्म की विशेषता/विशेषताएँ है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
तीनों कथन महायान बौद्ध धर्म की परिभाषित विशेषताएँ हैं, जो सार्वभौमिक मुक्ति और करुणामय बोधिसत्वों पर बल देने वाले एक उदार और सुधार आंदोलन के रूप में उभरा।
✅ कथन 1 – सही: महायान बौद्ध धर्म ने बुद्ध का देवीकरण किया, उन्हें एक अतिक्रामी, ब्रह्मांडीय अस्तित्व के रूप में चित्रित किया जिनके अनेक रूप हैं, थेरवाद के ऐतिहासिक मानव बुद्ध के विपरीत।
✅ कथन 2 – सही: बोधिसत्व आदर्श महायान के केंद्र में है, जहाँ प्रबुद्ध प्राणी सभी संवेदनशील प्राणियों को मुक्ति प्राप्त करने में सहायता के लिए अपने स्वयं के निर्वाण को स्थगित कर देते हैं।
✅ कथन 3 – सही: महायान ने बुद्ध और बोधिसत्व की मूर्तियों के इर्द-गिर्द विस्तृत मूर्ति पूजा, अनुष्ठान और भक्ति प्रथाओं की शुरुआत की, जिससे बौद्ध धर्म सामान्य अनुयायियों के लिए अधिक सुलभ हो गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: महायान बनाम थेरवाद बौद्ध धर्म
| विशेषता | महायान बौद्ध धर्म | थेरवाद बौद्ध धर्म |
|---|---|---|
| अर्थ | महायान (बड़ा वाहन) | स्थविरवाद (वयोवृद्धों का मार्ग) |
| बुद्ध की प्रकृति | अतिक्रामी, दिव्य अस्तित्व जिनके अनेक रूप हैं | ऐतिहासिक मानव शिक्षक जिन्होंने ज्ञान प्राप्त किया |
| लक्ष्य | सभी प्राणियों के लिए सार्वभौमिक मुक्ति | व्यक्तिगत ज्ञानोदय (अर्हत) |
| आदर्श | बोधिसत्व मार्ग (सभी के लिए करुणा) | अर्हत मार्ग (व्यक्तिगत मुक्ति) |
| पूजा | विस्तृत अनुष्ठान, मूर्ति पूजा, भक्ति प्रथाएँ | ध्यान-केंद्रित, न्यूनतम अनुष्ठान |
| धर्मग्रंथ | लोटस सूत्र जैसे सूत्रों सहित विस्तारित संग्रह | पालि कैनन (त्रिपिटक) |
| भौगोलिक विस्तार | तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया | श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया |
निम्नलिखित में से किस उत्कीर्ण शिलालेख में अशोक के पाषाण चित्र के साथ 'रण्यो अशोक' (राजा अशोक) का उल्लेख है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — कनगनहल्ली
कनगनहल्ली, कर्नाटक के सन्नति के निकट एक पुरातात्विक स्थल है, जो सम्राट अशोक के नाम के साथ उत्कीर्णित पहले और एकमात्र ज्ञात पाषाण चित्र को धारण करने के लिए प्रसिद्ध है। इस स्थल पर एक उत्कीर्ण शिल्प में एक राजसी आकृति को परिचारकों के साथ दर्शाया गया है और उस पर ब्राह्मी लिपि में 'रण्यो अशोक' (राजा अशोक) लिखा है, जो इसे एक अद्वितीय पुरातात्विक खोज बनाता है जो सम्राट का दृश्य प्रतिनिधित्व प्रदान करती है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
• साँची: अशोक द्वारा निर्मित महान स्तूप के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन इसमें सम्राट का कोई उत्कीर्णित पाषाण चित्र नहीं है।
• शाहबाजगढ़ी: खरोष्ठी लिपि में अशोक के शिलालेखों का स्थल है जो धम्म को बढ़ावा देते हैं, लेकिन किसी भी चित्र शिल्प का अभाव है।
• सोहगौरा: मौर्य काल के अकाल राहत के बारे में एक ताम्रपत्र अभिलेख के लिए जाना जाता है, न कि अशोक के उत्कीर्ण शिल्प के लिए।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कनगनहल्ली और अशोक की प्रतिमा-विद्या
- स्थान: कनगनहल्ली कर्नाटक के कलबुर्गी जिले के चित्तापुर तालुक में सन्नति के निकट स्थित है।
- अद्वितीय विशेषता: इसमें सम्राट अशोक का एकमात्र ज्ञात पाषाण चित्र है जिस पर ब्राह्मी लिपि में 'रण्यो अशोक' के रूप में उनका नाम उत्कीर्णित है।
- ऐतिहासिक महत्व: इस खोज से पहले, अशोक को कभी भी उनके नाम के साथ शिल्प में चित्रित नहीं किया गया था; बौद्ध कला परंपरागत रूप से बुद्ध और प्रमुख व्यक्तियों को सीधे चित्रित करने से बचती थी।
- अन्य शिल्प: इस स्थल में जातक कथाओं, बुद्ध के जीवन के दृश्यों और साँची के महास्तूप को दर्शाने वाली उत्कीर्ण शिल्पकृतियाँ भी हैं।
- काल: स्तूप और शिल्पकृतियाँ पहली-तीसरी शताब्दी ईस्वी की हैं, हालांकि यह स्थल मूल रूप से अशोक के शासनकाल (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) के दौरान स्थापित किया गया था।
- पुरातात्विक खोज: उत्खनन से अभिलेखों और शिल्प पट्टिकाओं वाले चूना पत्थर के स्लैब प्रकट हुए, जो प्रारंभिक बौद्ध कला और मौर्य इतिहास में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं।
ऋग्वैदिक आर्यों की संस्कृति और सिंधु घाटी के लोगों के बीच अंतर के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- ऋग्वैदिक आर्य युद्ध में कवच और हेलमेट का उपयोग करते थे जबकि सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने इनके उपयोग का कोई साक्ष्य नहीं छोड़ा।
- ऋग्वैदिक आर्य सोना, चाँदी और ताँबे को जानते थे जबकि सिंधु घाटी के लोग केवल ताँबा और लोहे को जानते थे।
- ऋग्वैदिक आर्यों ने घोड़े को पालतू बनाया था जबकि सिंधु घाटी के लोगों के इस जानवर के बारे में जानकार होने का कोई साक्ष्य नहीं है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न ऋग्वैदिक आर्य संस्कृति और सिंधु घाटी सभ्यता की तुलनात्मक समझ का परीक्षण करता है। कथन 1 और कथन 3 सही हैं, जबकि कथन 2 में धातुकर्म ज्ञान के संबंध में तथ्यात्मक त्रुटि है।
✅ कथन 1 – सही: ऋग्वैदिक आर्य 'वर्मन' (कवच) और हेलमेट जैसे सुरक्षात्मक युद्ध उपकरणों का उपयोग करते थे, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता, जो मुख्य रूप से एक शांतिपूर्ण शहरी समाज थी, ने ऐसे सैन्य उपकरणों के पुरातात्विक साक्ष्य नहीं दिए हैं।
❌ कथन 2 – गलत: सिंधु घाटी के लोग कांस्य युग की सभ्यता के भाग थे और सोना, चाँदी, ताँबा और कांस्य (लोहा नहीं) जानते थे। ऋग्वैदिक आर्य भी सोना, चाँदी और ताँबा जानते थे लेकिन प्रारंभ में लोहा नहीं। यह कथन गलत तरीके से दावा करता है कि सिंधु घाटी के लोग केवल ताँबा और लोहा जानते थे, जो दोनों ही मामलों में तथ्यात्मक रूप से गलत है।
✅ कथन 3 – सही: ऋग्वैदिक आर्य संस्कृति में घोड़ा केंद्रीय था और ऋग्वेद में इसका व्यापक उल्लेख है, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता में घोड़े के पालतूकरण या जागरूकता का कोई स्पष्ट, व्यापक साक्ष्य नहीं है।
भारत के इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| शब्द | विवरण |
|---|---|
| 1. एरिपट्टी | भूमि राजस्व जिसे गाँव के तालाब के रखरखाव के लिए अलग रखा गया था |
| 2. तनियूर | एकल ब्राह्मण या ब्राह्मणों के समूह को दान किए गए गाँव |
| 3. घटिका | सामान्यतः मंदिरों से संलग्न महाविद्यालय |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन सा/से सही सुमेलित है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — केवल 1 और 3
✅ युग्म 1 – सही: एरिपट्टी दक्षिण भारत में पल्लव और चोल काल के दौरान गाँव की सिंचाई टंकियों (एरी) के रखरखाव और मरम्मत के लिए विशेष रूप से आवंटित भूमि राजस्व था। यह कृषि बुनियादी ढाँचे के प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण घटक था।
❌ युग्म 2 – गलत: तनियूर ब्राह्मणों को दान किए गए गाँव नहीं थे। वे चोल साम्राज्य में बड़ी, स्वतंत्र प्रशासनिक इकाइयाँ थीं जो नियमित नाडुओं (जिलों) के अधिकार क्षेत्र से बाहर अलग राजस्व इकाइयों के रूप में कार्य करती थीं। ब्राह्मणों को दान किए गए गाँवों को ब्रह्मदेय या अग्रहार कहा जाता था।
✅ युग्म 3 – सही: घटिका प्राचीन और मध्यकालीन दक्षिण भारत में उच्च शिक्षा की संस्थाएँ थीं, जो आमतौर पर मंदिरों से जुड़ी होती थीं। वे वैदिक अध्ययन, धर्मशास्त्र और ज्ञान की अन्य शाखाओं के केंद्र के रूप में कार्य करती थीं। कांचीपुरम की घटिका विशेष रूप से प्रसिद्ध थी।
निम्नलिखित में से किसने सम्राट अशोक के शिलालेखों को सबसे पहले समझा था?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — जेम्स प्रिंसेप
जेम्स प्रिंसेप (1799-1840), जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ एक अंग्रेज विद्वान और पुरातत्वविद् थे, ने 1837 में सम्राट अशोक के शिलालेखों को समझने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने ब्राह्मी लिपि को सफलतापूर्वक समझा, जिसमें अशोक के अधिकांश शिलालेख लिखे गए थे, जिससे विद्वान इन प्राचीन शिलालेखों की विषय-वस्तु और ऐतिहासिक महत्व को समझ सके। यह खोज अशोक की पहचान और मौर्य साम्राज्य के विस्तार को स्थापित करने में महत्वपूर्ण थी, क्योंकि प्रिंसेप के काम से पहले, शिलालेख अनसुलझे थे और अशोक आधुनिक ऐतिहासिक अभिलेखों में काफी हद तक अज्ञात थे।
भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, इतिवृत्त, राजवंशीय इतिहास और महाकाव्यात्मक कथाओं को कंठस्थ करना निम्नलिखित में से किसका पेशा था?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — मागध
मागध प्राचीन भारत में भाटों और इतिहासकारों का एक पेशेवर वर्ग था जो राजवंशीय इतिहास, वंशावली, इतिवृत्त और महाकाव्यात्मक कथाओं को कंठस्थ करने और सुनाने में विशेषज्ञ थे। वे राजदरबारों से जुड़े होते थे और लिखित अभिलेख व्यापक होने से पहले मौखिक परंपराओं को संरक्षित रखने का महत्वपूर्ण कार्य करते थे। अन्य विकल्प अलग-अलग पेशों को दर्शाते हैं: श्रमण जैन धर्म और बौद्ध धर्म में तपस्वी साधु थे जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग किया था; परिव्राज (परिव्राजक) आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में भटकने वाले संन्यासी थे; और अग्रहारिक ब्राह्मणों को दी गई भूमि अनुदान (अग्रहार) के प्रशासक थे, जिनका ऐतिहासिक संरक्षण से कोई संबंध नहीं था।
निम्नलिखित में से कौन से राज्य बुद्ध के जीवन से जुड़े थे?
- अवन्ति
- गांधार
- कोसल
- मगध
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
❌ कथन 1 – गलत: अवन्ति पर राजा प्रद्योत का शासन था जो बुद्ध के समकालीन थे, परन्तु बुद्ध ने स्वयं कभी अवन्ति की यात्रा नहीं की; उन्होंने अपने शिष्य महाकच्चान को वहाँ प्रचार के लिए भेजा।
❌ कथन 2 – गलत: गांधार सुदूर उत्तर-पश्चिम (आधुनिक पाकिस्तान-अफगानिस्तान) में स्थित था; बुद्ध का जीवन और शिक्षाएँ मध्य गंगा के मैदानों तक सीमित थीं, और उन्होंने कभी गांधार की यात्रा नहीं की।
✅ कथन 3 – सही: कोसल बुद्ध के जीवन में केंद्रीय था; उन्होंने इसकी राजधानी श्रावस्ती में जेतवन विहार में उपदेश देते हुए महत्वपूर्ण समय बिताया, और उनका जन्मस्थान लुम्बिनी कोसल के क्षेत्र में था।
✅ कथन 4 – सही: मगध बुद्ध के जीवन से गहराई से जुड़ा था; उन्होंने बोध गया में ज्ञान प्राप्त किया, राजगृह (राजधानी) में अक्सर उपदेश दिए, और राजा बिम्बिसार और अजातशत्रु से संरक्षण प्राप्त किया।