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विश्व भूगोल Previous Year Questions (PYQs)
Solved Previous Year Questions (PYQs) for विश्व भूगोल in UPSC CSE Prelims in English & Hindi Medium.
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निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- लाल सागर को किसी भी रूप में बहुत कम वर्षण प्राप्त होता है।
- लाल सागर में नदियों से कोई जल प्रवेश नहीं करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
लाल सागर एक शुष्क मरुस्थलीय क्षेत्र में स्थित है जो अत्यधिक उच्च तापमान और कम आर्द्रता की विशेषता रखता है, जिसके परिणामस्वरूप न्यूनतम वर्षण होता है। इसके अतिरिक्त, कोई प्रमुख नदी लाल सागर में नहीं बहती है; इसका जल मुख्य रूप से बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के माध्यम से अदन की खाड़ी से अधिक नमकीन जल के प्रवाह से आता है।
✅ कथन 1 (कम वर्षण) – सही: लाल सागर को मरुस्थलीय क्षेत्र में स्थित होने के कारण उच्च तापमान और कम आर्द्रता के कारण बहुत कम वर्षण प्राप्त होता है।
✅ कथन 2 (नदी प्रवाह नहीं) – सही: लाल सागर में कोई प्रमुख नदी नहीं बहती है; जल मुख्य रूप से बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के माध्यम से अदन की खाड़ी से प्रवेश करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: लाल सागर - समुद्र विज्ञान संबंधी विशेषताएं
- स्थान: लाल सागर हिंद महासागर का एक समुद्री जल प्रवेश द्वार है, जो अफ्रीका (मिस्र, सूडान, इरिट्रिया, जिबूती) और एशिया (सऊदी अरब, यमन) के बीच स्थित है, जो बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के माध्यम से अदन की खाड़ी से अरब सागर से जुड़ा हुआ है।
- जलवायु: अत्यधिक उच्च तापमान, कम आर्द्रता और न्यूनतम वर्षा (वार्षिक 100 मिमी से कम) वाली शुष्क मरुस्थलीय पेटी में स्थित है, जो इसे विश्व स्तर पर सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक बनाता है।
- नदी प्रवाह: अधिकांश सागरों के विपरीत, लाल सागर में कोई महत्वपूर्ण नदी जल निकासी नहीं है, जो इसकी उच्च लवणता में योगदान देने वाली एक अद्वितीय समुद्र विज्ञान विशेषता है।
- उच्च लवणता: लाल सागर में विश्व महासागरों में सबसे अधिक लवणता (लगभग 40-41 पीपीटी) है, जो उच्च वाष्पीकरण दर, कम वर्षण और नदियों से मीठे पानी के प्रवाह की अनुपस्थिति के कारण है।
- जल विनिमय: अदन की खाड़ी से जल प्रवेश करता है (अधिक नमकीन, सघन जल) और सतही जल के रूप में बाहर निकलता है, जो एक अद्वितीय परिसंचरण पैटर्न बनाता है जो लाल सागर की लवणता और तापमान को बनाए रखता है।
- तापमान: सतही जल का तापमान सर्दियों में 20°C से गर्मियों में 30°C से अधिक होता है, जो इसे दुनिया के सबसे गर्म सागरों में से एक बनाता है।
- रणनीतिक महत्व: लाल सागर अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उत्तर में स्वेज नहर से जुड़ता है, जो यूरोप और एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण शिपिंग मार्ग के रूप में कार्य करता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
कथन-I: विशाल तारे बौने तारों की तुलना में अधिक समय तक जीवित रहते हैं।
कथन-II: बौने तारों की तुलना में, विशाल तारों में परमाणु प्रतिक्रियाओं की दर अधिक होती है।
उपरोक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 4 (कथन-I गलत है, लेकिन कथन-II सही है)
किसी तारे का जीवनकाल इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपना नाभिकीय ईंधन कितनी तेजी से खर्च करता है। विशाल (Giant) तारों में ईंधन अधिक होता है, लेकिन वे उसे बहुत तेजी से जला देते हैं।
❌ कथन I गलत है: Giant stars, dwarf stars की तुलना में अधिक समय तक नहीं जीते। वे अपना ईंधन तेजी से समाप्त कर लेते हैं, इसलिए उनका जीवनकाल छोटा होता है।
✅ कथन II सही है: Giant stars के केंद्र में तापमान और दाब बहुत अधिक होते हैं, जिससे नाभिकीय संलयन (fusion) की दर अधिक होती है।
संबंध: कथन II यह समझाता है कि कथन I क्यों गलत है। अधिक तेज़ नाभिकीय अभिक्रियाएँ ईंधन को जल्दी समाप्त कर देती हैं, जिससे तारे का जीवनकाल कम हो जाता है।
संक्षिप्त नोट्स: तारों का जीवन चक्र (Stellar Life Cycle)
-
किसी तारे का जीवनकाल मुख्यतः उसके द्रव्यमान (Mass) पर निर्भर करता है।
-
अधिक द्रव्यमान वाले तारों में अधिक तापमान और दाब होता है।
-
Giant stars अपना ईंधन तेजी से जलाते हैं और केवल लाखों वर्षों तक जीवित रह सकते हैं।
-
Dwarf stars अरबों से खरबों वर्षों तक जीवित रह सकते हैं।
-
सूर्य एक मध्यम आकार का तारा है जिसका अनुमानित जीवनकाल लगभग 10 अरब वर्ष है।
-
Red dwarf तारे ब्रह्मांड के सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाले तारे हैं।
-
तारे ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए नाभिकीय संलयन (Fusion) का उपयोग करते हैं।
-
ईंधन समाप्त होने पर तारे अपने द्रव्यमान के अनुसार White Dwarf, Neutron Star या Black Hole बन सकते हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भूकम्पलेखी में, P तरंगें S तरंगों की तुलना में पहले रिकॉर्ड की जाती हैं।
- P तरंगों में, व्यक्तिगत कण तरंग संचरण की दिशा में आगे-पीछे कंपन करते हैं जबकि S तरंगों में, कण तरंग संचरण की दिशा के समकोण पर ऊपर-नीचे कंपन करते हैं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
भूकंपीय तरंगों के संबंध में दोनों कथन सही हैं। P तरंगें (प्राथमिक तरंगें) S तरंगों (द्वितीयक तरंगों) की तुलना में तेज गति से यात्रा करती हैं और इसलिए भूकम्पलेखी द्वारा पहले रिकॉर्ड की जाती हैं। दोनों तरंग प्रकार अपनी कण गति विशेषताओं में भी मूल रूप से भिन्न हैं।
✅ कथन 1 – सही: P तरंगें वास्तव में भूकम्पलेखी पर S तरंगों की तुलना में पहले रिकॉर्ड की जाती हैं क्योंकि ये सबसे तेज भूकंपीय तरंगें हैं, जो पृथ्वी की भूपर्पटी में 5-8 किमी/सेकंड की गति से यात्रा करती हैं जबकि S तरंगें 3-4.5 किमी/सेकंड की गति से यात्रा करती हैं।
✅ कथन 2 – सही: P तरंगें संपीड़न/अनुदैर्ध्य तरंगें हैं जहाँ कण तरंग संचरण की दिशा के समानांतर कंपन करते हैं (आगे-पीछे गति), जबकि S तरंगें अपरूपण/अनुप्रस्थ तरंगें हैं जहाँ कण तरंग संचरण की दिशा के लंबवत कंपन करते हैं (ऊपर-नीचे या बाएं-दाएं गति)।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भूकंपीय तरंगें
| विशेषता | P तरंगें (प्राथमिक) | S तरंगें (द्वितीयक) |
|---|---|---|
| गति | सबसे तेज (भूपर्पटी में 5-8 किमी/सेकंड) | धीमी (भूपर्पटी में 3-4.5 किमी/सेकंड) |
| आगमन समय | सबसे पहले पहुँचती हैं | दूसरी पहुँचती हैं |
| तरंग प्रकार | अनुदैर्ध्य/संपीड़न | अनुप्रस्थ/अपरूपण |
| कण गति | तरंग दिशा के समानांतर (धक्का-खिंचाव) | तरंग दिशा के लंबवत (ऊपर-नीचे/बाएं-दाएं) |
| माध्यम | ठोस, तरल और गैसों में यात्रा करती हैं | केवल ठोस में यात्रा करती हैं |
| विनाशकारी शक्ति | कम विनाशकारी | अधिक विनाशकारी |
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भारत के कुछ तटीय क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध इल्मेनाइट और रुटाइल, निम्नलिखित में से किसके समृद्ध स्रोत हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — टाइटेनियम
इल्मेनाइट (FeTiO₃) और रुटाइल (TiO₂) टाइटेनियम युक्त खनिज हैं जो भारत के तटीय समुद्री रेत निक्षेपों में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ये खनिज टाइटेनियम के समृद्ध स्रोत हैं और इन्हें टाइटेनियम डाइऑक्साइड निकालने के लिए संसाधित किया जाता है, जिसे आगे परिष्कृत करके धात्विक टाइटेनियम का उत्पादन किया जाता है जिसका उपयोग एयरोस्पेस, चिकित्सा और औद्योगिक अनुप्रयोगों में होता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत के समुद्री रेत खनिज
- भारी खनिज: भारत में समुद्री रेत में सात प्रमुख भारी खनिज होते हैं—इल्मेनाइट, ल्यूकोक्सीन, रुटाइल, जिरकॉन, सिलिमेनाइट, गार्नेट और मोनाजाइट।
- टाइटेनियम खनिज: इल्मेनाइट (FeTiO₃) और रुटाइल (TiO₂) टाइटेनियम के प्राथमिक स्रोत हैं; ल्यूकोक्सीन उच्च TiO₂ सामग्री वाला इल्मेनाइट का परिवर्तित रूप है।
- प्रमुख तटीय निक्षेप: केरल, तमिलनाडु, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटों पर पाए जाते हैं, विशेष रूप से चावरा, मानावलकुरिची और छत्रपुर जैसे क्षेत्रों में।
- टाइटेनियम के उपयोग: उच्च शक्ति-से-भार अनुपात और संक्षारण प्रतिरोध के लिए जाना जाता है; एयरोस्पेस घटकों, चिकित्सा प्रत्यारोपण, वर्णक (TiO₂), और रक्षा अनुप्रयोगों में उपयोग किया जाता है।
- अन्य आर्थिक खनिज: जिरकॉन (जिरकोनियम स्रोत), मोनाजाइट (थोरियम और दुर्लभ मृदा), गार्नेट (अपघर्षक), और सिलिमेनाइट (अपवर्तक)।
- निष्कर्षण विधि: समुद्री रेत खनन में ड्रेजिंग शामिल है, जिसके बाद भारी खनिजों को केंद्रित करने के लिए गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय पृथक्करण किया जाता है।
विश्व के लगभग तीन-चौथाई कोबाल्ट, जो इलेक्ट्रिक मोटर वाहनों के लिए बैटरी के निर्माण हेतु आवश्यक धातु है, का उत्पादन किसके द्वारा किया जाता है
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य
कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) विश्व का प्रमुख कोबाल्ट उत्पादक है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 70% हिस्सा रखता है और विश्व के ज्ञात कोबाल्ट भंडार का आधा हिस्सा अपने पास रखता है। कोबाल्ट एक महत्वपूर्ण खनिज है जो इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में उपयोग की जाने वाली रिचार्जेबल बैटरी के निर्माण के लिए आवश्यक है, जिससे स्वच्छ ऊर्जा की ओर वैश्विक संक्रमण के लिए DRC का वर्चस्व रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: वैश्विक कोबाल्ट उत्पादन और रणनीतिक महत्व
- प्राथमिक उपयोग: कोबाल्ट इलेक्ट्रिक वाहनों, स्मार्टफोन, लैपटॉप और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में लिथियम-आयन बैटरी के साथ-साथ सुपरएलॉय, उत्प्रेरक, चुंबक और रंगद्रव्य में महत्वपूर्ण है।
- शीर्ष उत्पादक: कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (70%), इंडोनेशिया, रूस, ऑस्ट्रेलिया और मेडागास्कर विश्व स्तर पर शीर्ष पांच कोबाल्ट उत्पादक देश हैं।
- DRC का वर्चस्व: DRC के पास विश्व के ज्ञात कोबाल्ट भंडार का लगभग 50% है और यह वैश्विक उत्पादन का तीन-चौथाई हिस्सा रखता है, जिससे यह स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन गया है।
- रणनीतिक खनिज की स्थिति: भारत सहित कई सरकारों ने भविष्य की प्रौद्योगिकियों और ऊर्जा सुरक्षा के लिए इसके महत्व के कारण कोबाल्ट को एक महत्वपूर्ण खनिज के रूप में वर्गीकृत किया है।
- भारतीय संदर्भ: ओडिशा और झारखंड में कोबाल्ट के छोटे भंडार मौजूद हैं, हालांकि भारत अपनी कोबाल्ट आवश्यकताओं के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है।
- भू-राजनीतिक चिंताएं: एक ही देश में कोबाल्ट उत्पादन का केंद्रीकरण आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियों, नैतिक खनन प्रथाओं और वैश्विक बाजार में मूल्य अस्थिरता के बारे में चिंताएं बढ़ाता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
कथन-I: महाद्वीपों और महासागरों के बीच तापमान का अंतर शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में अधिक होता है।
कथन-II: जल की विशिष्ट ऊष्मा स्थल सतह की तुलना में अधिक होती है।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कथन-I गलत है लेकिन कथन-II सही है
कथन-I में दावा किया गया है कि महाद्वीपों और महासागरों के बीच तापमान का अंतर ग्रीष्म ऋतु में अधिक होता है, जो गलत है। वास्तव में, यह अंतर शीत ऋतु में अधिक होता है क्योंकि स्थल तेजी से ठंडा होता है जबकि महासागर ऊष्मा को बनाए रखते हैं, जिससे बड़ा तापमान अंतर उत्पन्न होता है। ग्रीष्म ऋतु में, स्थल और महासागर दोनों गर्म होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप तापमान का अंतर कम होता है।
❌ कथन-I – गलत: महाद्वीपों और महासागरों के बीच तापमान का अंतर ग्रीष्म ऋतु में नहीं बल्कि शीत ऋतु में अधिक होता है, क्योंकि स्थल शीत ऋतु में तेजी से ऊष्मा खो देता है जबकि महासागर अपेक्षाकृत गर्म बने रहते हैं।
✅ कथन-II – सही: जल की विशिष्ट ऊष्मा धारिता स्थल की तुलना में अधिक होती है, जिसका अर्थ है कि यह धीरे-धीरे गर्म और ठंडा होता है, जो तापमान पर महासागरों के नियामक प्रभाव की व्याख्या करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: स्थल और जल का विभेदी तापन
- विशिष्ट ऊष्मा धारिता: जल की विशिष्ट ऊष्मा धारिता स्थल की तुलना में लगभग 4 गुना अधिक होती है, जिससे इसके तापमान को बदलने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
- ग्रीष्म ऋतु का पैटर्न: स्थल तेजी से गर्म होता है और महासागरों से अधिक गर्म हो जाता है; तापमान अंतर मध्यम होता है (सामान्यतः 5-10°C)।
- शीत ऋतु का पैटर्न: स्थल तेजी से ठंडा होता है और महासागरों की तुलना में बहुत अधिक ठंडा हो जाता है; तापमान अंतर बड़ा होता है (20-30°C से अधिक हो सकता है), जिससे अधिकतम अंतर उत्पन्न होता है।
- महाद्वीपीयता प्रभाव: महासागरों से दूर के क्षेत्र नियामक महासागरीय प्रभाव की कमी के कारण चरम तापमान भिन्नता का अनुभव करते हैं।
- सामुद्रिक जलवायु: तटीय क्षेत्रों में महासागरीय प्रभाव के कारण वार्षिक तापमान परिसर छोटा होता है।
- मानसून का निर्माण: स्थल और महासागर के बीच विभेदी तापन मानसूनी परिसंचरण को संचालित करता है, विशेष रूप से शीत ऋतु में जब अंतर अधिकतम होता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
कथन-I : उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों की मिट्टी पोषक तत्वों से समृद्ध होती है।
कथन-II : उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों के उच्च तापमान और नमी के कारण मिट्टी में मृत कार्बनिक पदार्थ शीघ्रता से विघटित हो जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कथन I गलत है लेकिन कथन II सही है
यह प्रश्न उष्णकटिबंधीय वर्षा वन की मिट्टी की विशेषताओं और पोषक चक्र की समझ का परीक्षण करता है। कथन I गलत रूप से दावा करता है कि उष्णकटिबंधीय वर्षा वन की मिट्टी पोषक तत्वों से समृद्ध होती है, जबकि वास्तव में भारी वर्षा द्वारा तीव्र निक्षालन के कारण वे पोषक तत्वों से गरीब होती हैं। कथन II सही ढंग से बताता है कि उच्च तापमान और नमी कार्बनिक पदार्थ के अपघटन को तेज करते हैं।
❌ कथन I – गलत: उष्णकटिबंधीय वर्षा वन की मिट्टी वास्तव में पोषक तत्वों से गरीब (समृद्ध नहीं) होती है क्योंकि भारी वर्षा तीव्र निक्षालन का कारण बनती है, जो मिट्टी में जमा होने से पहले पोषक तत्वों को बहा देती है।
✅ कथन II – सही: उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में उच्च तापमान और नमी बैक्टीरिया और कवक द्वारा मृत कार्बनिक पदार्थ के तीव्र अपघटन के लिए आदर्श परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं, जो पोषक तत्वों को शीघ्रता से पारिस्थितिकी तंत्र में वापस पुनर्चक्रित करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: उष्णकटिबंधीय वर्षा वन की मिट्टी और पोषक चक्र
- मिट्टी की विशेषताएँ: उष्णकटिबंधीय वर्षा वन की मिट्टी सामान्यतः पोषक तत्वों से गरीब, अम्लीय और कम उर्वरता वाली होती है, फिर भी घनी वनस्पति का समर्थन करती है।
- तीव्र निक्षालन: भारी वर्षा (वार्षिक 2000-10000 मिमी) ऊपरी मिट्टी से घुलनशील पोषक तत्वों को बहा देती है, उनके संचय को रोकती है।
- पोषक विरोधाभास: खराब मिट्टी के बावजूद, वर्षा वन घनी वृद्धि का समर्थन करते हैं क्योंकि पोषक तत्व मिट्टी के बजाय जैव भार (जीवित पौधों और जीवों) में बंद होते हैं।
- तीव्र अपघटन: उच्च तापमान (25-30°C) और आर्द्रता (>80%) अपघटकों द्वारा कुछ सप्ताहों के भीतर कार्बनिक पदार्थ के शीघ्र टूटने की सुविधा देते हैं।
- बंद पोषक चक्र: अपघटन से मुक्त पोषक तत्वों को पौधों की जड़ों और माइकोराइजल कवक द्वारा तुरंत अवशोषित कर लिया जाता है, निक्षालन के माध्यम से हानि को रोकते हुए।
- उथली जड़ प्रणाली: अधिकांश वर्षा वन के पेड़ों में उथली, फैली हुई जड़ें होती हैं जो निक्षालित होने से पहले पोषक तत्वों को शीघ्रता से ग्रहण करती हैं।
- कृषि निहितार्थ: जब वर्षा वनों को कृषि के लिए साफ किया जाता है, तो पतली पोषक परत शीघ्रता से समाप्त हो जाती है, जिससे 2-3 वर्षों के भीतर भूमि बंजर हो जाती है।
निम्नलिखित वृक्षों पर विचार कीजिए:
- कटहल (Artocarpus heterophyllus)
- महुआ (Madhuca indica)
- सागौन (Tectona grandis)
उपर्युक्त में से कितने पर्णपाती वृक्ष हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो
उल्लिखित तीन वृक्षों में से केवल महुआ (Madhuca indica) और सागौन (Tectona grandis) पर्णपाती वृक्ष हैं जो शुष्क मौसम में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। कटहल एक सदाबहार वृक्ष है जो पूरे वर्ष अपनी पत्तियाँ बनाए रखता है।
❌ कटहल (Artocarpus heterophyllus) – सदाबहार: यह उष्णकटिबंधीय वृक्ष पश्चिमी घाट का मूल निवासी है और पूरे वर्ष हरा-भरा रहता है, जो उच्च वर्षा क्षेत्रों के सदाबहार वनों का विशिष्ट लक्षण है।
✅ महुआ (Madhuca indica) – पर्णपाती: मध्य और उत्तरी भारत के उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों में पाया जाता है, यह फरवरी-अप्रैल (शुष्क मौसम) में पत्तियाँ गिरा देता है।
✅ सागौन (Tectona grandis) – पर्णपाती: भारत के उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों की प्रमुख प्रजाति, यह नमी संरक्षण के लिए शुष्क महीनों में पत्तियाँ गिरा देता है और इमारती लकड़ी के लिए अत्यधिक मूल्यवान है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पर्णपाती बनाम सदाबहार वृक्ष
- पर्णपाती वृक्ष: वे वृक्ष जो मौसमी रूप से अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं, आमतौर पर शुष्क मौसम में जल संरक्षण के लिए। स्पष्ट आर्द्र और शुष्क अवधि वाली मानसूनी जलवायु में सामान्य।
- सदाबहार वृक्ष: वे वृक्ष जो पूरे वर्ष पत्तियाँ बनाए रखते हैं, निरंतर वर्षा और गंभीर शुष्क अवधि रहित क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- भारत में उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन: इन्हें मानसून वन भी कहा जाता है, ये भारत में सबसे व्यापक वन प्रकार हैं, जो 100-200 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में फैले हैं।
- प्रमुख पर्णपाती प्रजातियाँ: सागौन, साल, शीशम, चंदन, महुआ, कुसुम, अर्जुन, शहतूत।
- प्रमुख सदाबहार प्रजातियाँ: शीशम, महोगनी, आबनूस, कटहल, जामुन, बाँस।
- सागौन (Tectona grandis): व्यावसायिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण पर्णपाती वृक्ष; मध्यम वर्षा के साथ अच्छी जल-निकासी वाली मिट्टी में पनपता है; फर्नीचर और जहाज निर्माण में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
पृथ्वी के वायुमंडल के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — अवरक्त तरंगें जलवाष्प द्वारा बड़े पैमाने पर अवशोषित होती हैं जो निचले वायुमंडल में संकेंद्रित है।
जलवाष्प, क्षोभमंडल (निचला वायुमंडल) में संकेंद्रित एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस होने के कारण, पृथ्वी की सतह से उत्सर्जित अवरक्त विकिरण को प्रभावी रूप से अवशोषित करती है। यह अवशोषण पृथ्वी पर ग्रीनहाउस प्रभाव और तापमान नियमन के लिए महत्वपूर्ण है।
❌ विकल्प 1 – गलत: भूमध्य रेखा ध्रुवों की तुलना में लगभग 2.5 गुना अधिक सूर्यातप प्राप्त करती है, 10 गुना नहीं। यह अंतर आपतन कोण और पृथ्वी की वक्रता के कारण है।
❌ विकल्प 2 – गलत: दृश्य प्रकाश सूर्यातप का लगभग 44%, अवरक्त लगभग 49%, और पराबैंगनी लगभग 7% बनाता है। अवरक्त सूर्यातप का दो-तिहाई भाग नहीं बनाता।
✅ विकल्प 3 – सही: निचले वायुमंडल (क्षोभमंडल) में जलवाष्प अवरक्त विकिरण का प्राथमिक अवशोषक है, जो इसे सही कथन बनाता है।
❌ विकल्प 4 – गलत: अवरक्त तरंगों की तरंगदैर्ध्य दृश्य प्रकाश (700 nm से 1 mm) से अधिक होती है और ये दृश्य स्पेक्ट्रम (380-700 nm) का भाग नहीं हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सौर विकिरण और वायुमंडल
- सूर्यातप संरचना: पराबैंगनी किरणें (7%), दृश्य प्रकाश (44%), अवरक्त किरणें (49%)
- वायुमंडलीय अवशोषण: ओजोन समताप मंडल में अधिकांश UV विकिरण को अवशोषित करता है; जलवाष्प और CO₂ क्षोभमंडल में अवरक्त विकिरण को अवशोषित करते हैं
- अक्षांशीय विविधता: भूमध्यरेखीय क्षेत्र आपतन कोण के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों की तुलना में 2-2.5 गुना अधिक सूर्यातप प्राप्त करते हैं
- ग्रीनहाउस गैसें: जलवाष्प (सबसे महत्वपूर्ण), CO₂, मीथेन, और ओजोन बाहर जाने वाले पार्थिव अवरक्त विकिरण को अवशोषित करती हैं
- विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम: दृश्य प्रकाश (380-700 nm), अवरक्त (700 nm-1 mm), छोटी तरंगदैर्ध्य में अधिक ऊर्जा होती है
निम्नलिखित में से कौन सा कांगो बेसिन का हिस्सा है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — कैमरून
कांगो बेसिन मध्य अफ्रीका में स्थित एक विशाल अवसादी बेसिन है जो कांगो नदी के चारों ओर केंद्रित है। यह मुख्य रूप से छह देशों में फैला है: कैमरून, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, कांगो गणराज्य, भूमध्यरेखीय गिनी और गैबॉन। दिए गए विकल्पों में से केवल कैमरून ही कांगो बेसिन का हिस्सा है, जबकि नाइजीरिया इसके पश्चिम में स्थित है, और दक्षिण सूडान तथा युगांडा बेसिन के पूर्व में स्थित हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कांगो बेसिन
- स्थान: मध्य अफ्रीका, पश्चिम भूमध्यरेखीय अफ्रीका क्षेत्र में
- मुख्य विशेषता: कांगो नदी का अवसादी बेसिन, क्षेत्रफल के हिसाब से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा नदी बेसिन
- देश: छह मुख्य देश — कैमरून, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, कांगो गणराज्य, भूमध्यरेखीय गिनी और गैबॉन
- महत्व: विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षावन (अमेज़न के बाद), वैश्विक जलवायु नियमन के लिए महत्वपूर्ण
- जैव विविधता: 10,000 से अधिक पादप प्रजातियों, 1,000 पक्षी प्रजातियों और 400 स्तनपायी प्रजातियों का घर, जिनमें गोरिल्ला, चिंपांजी और वन हाथी शामिल हैं
- जलवायु: वर्ष भर उच्च वर्षा के साथ भूमध्यरेखीय जलवायु
निम्नलिखित में से कौन सा समुद्र तल में बार-बार गिरावट का सबसे अच्छा उदाहरण है, जिससे वर्तमान में व्यापक दलदली भूमि का निर्माण हुआ है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कच्छ का रण
कच्छ का रण समुद्र तल में बार-बार गिरावट से व्यापक दलदली भूमि के निर्माण का सबसे अच्छा उदाहरण है। भूगर्भीय साक्ष्य बताते हैं कि गुजरात में स्थित यह विशाल नमकीन दलदल कभी अरब सागर का उथला विस्तार था, लेकिन विवर्तनिक गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र तल में बार-बार गिरावट आई, जिससे नमकीन पदार्थों का जमाव हुआ और वर्तमान मौसमी दलदली भूमि का निर्माण हुआ। मानसून के दौरान, यह पानी से भर जाता है और एक उथली झील बन जाती है, और गर्मियों में, यह सूखकर विस्तृत सफेद नमक के मैदानों में बदल जाता है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
विकल्प 1 – भितरकणिका मैंग्रोव: यह ओडिशा में एक डेल्टाई मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र है जो नदी की तलछट जमाव से बना है, समुद्र तल में बार-बार गिरावट से नहीं।
विकल्प 2 – मरक्कनम नमक के खेत: ये तमिलनाडु में तटीय नमक उत्पादन क्षेत्र हैं, जो नमक निष्कर्षण के लिए मानवीय हस्तक्षेप से बनाए गए हैं, प्राकृतिक समुद्र तल प्रतिगमन से नहीं।
विकल्प 3 – नौपाड़ा दलदल: यह आंध्र प्रदेश में एक मीठे पानी का आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र है, जो समुद्र तल परिवर्तन से असंबंधित है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: कच्छ के रण का निर्माण
- स्थान: उत्तर-पश्चिमी गुजरात, पाकिस्तान तक विस्तारित; थार मरुस्थल क्षेत्र का हिस्सा
- प्रकार: ग्रेट रण (बड़ा, उत्तरी) और लिटिल रण (छोटा, दक्षिणी)
- भूगर्भीय इतिहास: कभी अरब सागर का हिस्सा था; प्लीस्टोसीन युग के दौरान विवर्तनिक उत्थान और समुद्र तल के उतार-चढ़ाव ने इसे समुद्र से अलग कर दिया
- मौसमी परिवर्तन: मानसून के दौरान जलमग्न (जून-सितंबर); गर्मियों में नमक की परत वाले रेगिस्तान में सूख जाता है
- पारिस्थितिक महत्व: लिटिल रण में जंगली गधा अभयारण्य; राजहंस के लिए प्रजनन स्थल; अनूठी लवणरागी (नमक-सहिष्णु) वनस्पति
- आर्थिक महत्व: प्रमुख नमक उत्पादन क्षेत्र; अगरिया समुदाय द्वारा पारंपरिक नमक खेती
- सांस्कृतिक विरासत: रण उत्सव महोत्सव के लिए प्रसिद्ध; कच्छी समुदायों के पारंपरिक हस्तशिल्प
निम्नलिखित में से किस एक स्थिति में "बायोरॉक प्रौद्योगिकी" के बारे में चर्चा की जाती है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — क्षतिग्रस्त प्रवाल भित्तियों की बहाली
बायोरॉक प्रौद्योगिकी (जिसे खनिज संचयन प्रौद्योगिकी के रूप में भी जाना जाता है) समुद्री जल के माध्यम से कम-वोल्टेज प्रत्यक्ष विद्युत धारा का उपयोग करती है जो घुलित खनिजों को अवक्षेपित करती है, जलमग्न धातु संरचनाओं पर चूना पत्थर जैसी संरचना बनाती है। यह प्रवाल लार्वा के स्थापित होने और बढ़ने के लिए एक आदर्श आधार बनाता है, जो प्राकृतिक वृद्धि दर की तुलना में 3-5 गुना तेजी से प्रवाल भित्ति बहाली में तेजी लाता है। यह प्रौद्योगिकी प्रवालों को समुद्री तापन और अम्लीकरण जैसे पर्यावरणीय तनावों के प्रति अधिक लचीला बनाती है, जिससे यह समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र बहाली के लिए एक मूल्यवान उपकरण बन जाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: बायोरॉक प्रौद्योगिकी
- सिद्धांत: कम-वोल्टेज DC धारा (1.2-6 वोल्ट) का उपयोग करके समुद्री जल का विद्युत अपघटन कैथोड संरचनाओं पर कैल्शियम कार्बोनेट और मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड का अवक्षेपण करता है
- संरचना: धातु के फ्रेम (आमतौर पर इस्पात) पानी के नीचे रखे जाते हैं और कम-वोल्टेज विद्युत स्रोत (सौर पैनल या ज्वारीय ऊर्जा) से जुड़े होते हैं
- प्रवाल बहाली के लिए लाभ: त्वरित प्रवाल वृद्धि (3-5 गुना तेज), प्रवाल जीवित रहने की दर में वृद्धि (50 गुना तक अधिक), विरंजन और बीमारियों के प्रति बढ़ी हुई प्रतिरोधक क्षमता
- अनुप्रयोग: प्रवाल भित्ति बहाली, कृत्रिम भित्ति निर्माण, तटरेखा संरक्षण, समुद्री कृषि समर्थन
- विकासकर्ता: 1970 के दशक में वास्तुकार वुल्फ हिल्बर्ट्ज़ और समुद्री जीवविज्ञानी थॉमस गोरो द्वारा प्रवर्तित
- वैश्विक उदाहरण: मालदीव, इंडोनेशिया, थाईलैंड, सेशेल्स और क्षतिग्रस्त प्रवाल भित्तियों वाले अन्य उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में परियोजनाएं
- भारत संदर्भ: प्रवाल बहाली के लिए मन्नार की खाड़ी, लक्षद्वीप और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में संभावित अनुप्रयोग
पश्चिम अफ्रीका की निम्नलिखित में से कौन सी झील सूख गई है और रेगिस्तान में बदल गई है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — फागुइबाइन झील
माली, पश्चिम अफ्रीका में स्थित फागुइबाइन झील कभी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी झीलों में से एक थी, जो मौसमी बाढ़ के दौरान नाइजर नदी द्वारा पोषित होती थी और 1974 में लगभग 590 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई थी। 1980 के दशक के अंत से घटती वर्षा, बढ़ती शुष्कता और बदलते जलवायु पैटर्न के कारण, यह झील धीरे-धीरे सूख गई और 1990 के दशक के अंत से लगभग सूखी बनी हुई है, जिससे यह क्षेत्र रेगिस्तान में बदल गया है, हालांकि 2000 के बाद सामान्य वर्षा फिर से शुरू हुई।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
- विक्टोरिया झील: पूर्वी अफ्रीका में स्थित (पश्चिम अफ्रीका में नहीं), यह अफ्रीका की सबसे बड़ी झील है और पानी से भरी हुई है।
- ओगुटा झील: नाइजीरिया, पश्चिम अफ्रीका में स्थित, यह अभी भी एक कार्यशील मीठे पानी की झील है और रेगिस्तान में नहीं बदली है।
- वोल्टा झील: घाना, पश्चिम अफ्रीका में स्थित, यह सतह क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया के सबसे बड़े कृत्रिम जलाशयों में से एक है और वोल्टा नदी से पानी से भरी हुई है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अफ्रीका में मरुस्थलीकरण और झील सूखना
- फागुइबाइन झील: माली, पश्चिम अफ्रीका में स्थित; एक बार 590 वर्ग किमी (1974) में फैली थी; कम वर्षा और जलवायु परिवर्तन के कारण 1990 के दशक के अंत तक सूख गई।
- साहेल में मरुस्थलीकरण: माली सहित साहेल क्षेत्र ने जलवायु परिवर्तनशीलता, अत्यधिक चराई और भूमि क्षरण के कारण गंभीर मरुस्थलीकरण का अनुभव किया है।
- आजीविका पर प्रभाव: फागुइबाइन झील के सूखने से पारंपरिक मछली पकड़ने, कृषि और पशुपालन गतिविधियाँ नष्ट हो गईं।
- जलवायु पैटर्न: 2000 के बाद सामान्य वर्षा की वापसी के बावजूद, झील ठीक नहीं हुई है, जो अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय परिवर्तनों को दर्शाता है।
- खतरे में अन्य अफ्रीकी झीलें: चाड झील भी 1960 के दशक से समान जलवायु और मानवजनित कारकों के कारण 90% से अधिक सिकुड़ गई है।
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
समाचारों में अक्सर उल्लिखित क्षेत्र - देश
- अनातोलिया – तुर्की
- अम्हारा – इथियोपिया
- काबो डेलगाडो – स्पेन
- कातालोनिया – इटली
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो युग्म
यह प्रश्न भौगोलिक क्षेत्रों और उनके संबंधित देशों के ज्ञान का परीक्षण करता है। दिए गए चार युग्मों में से केवल अनातोलिया–तुर्की और अम्हारा–इथियोपिया सही सुमेलित हैं, जबकि काबो डेलगाडो मोजाम्बिक (स्पेन नहीं) से संबंधित है और कातालोनिया स्पेन (इटली नहीं) में है।
✅ युग्म 1 (अनातोलिया – तुर्की) – सही: अनातोलिया तुर्की का एशियाई भाग है, जो एशिया और यूरोप के चौराहे पर स्थित एक ऐतिहासिक प्रायद्वीप है।
✅ युग्म 2 (अम्हारा – इथियोपिया) – सही: अम्हारा उत्तर-पश्चिमी इथियोपिया में एक क्षेत्र है, जो अम्हारा लोगों की जन्मभूमि और झील टाना का स्थान है।
❌ युग्म 3 (काबो डेलगाडो – स्पेन) – गलत: काबो डेलगाडो मोजाम्बिक का सबसे उत्तरी प्रांत है, स्पेन का नहीं; यह 2017 से अल-शबाब चरमपंथी हमलों से प्रभावित रहा है।
❌ युग्म 4 (कातालोनिया – इटली) – गलत: कातालोनिया उत्तर-पूर्वी स्पेन में एक स्वायत्त समुदाय है, इटली में नहीं; यह अलगाववादी आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों के कारण समाचारों में रहा है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: महत्वपूर्ण वैश्विक क्षेत्र
| क्षेत्र | देश | प्रमुख विशेषताएं |
|---|---|---|
| अनातोलिया | तुर्की | तुर्की का एशियाई भाग; सभ्यताओं का ऐतिहासिक चौराहा |
| अम्हारा | इथियोपिया | उत्तर-पश्चिमी इथियोपिया; झील टाना युक्त; जातीय संघर्ष |
| काबो डेलगाडो | मोजाम्बिक | सबसे उत्तरी प्रांत; 2017 से अल-शबाब विद्रोह |
| कातालोनिया | स्पेन | उत्तर-पूर्वी स्पेन; अलगाववादी आंदोलन; फ्रांस और अंडोरा से सीमा |
| कुर्दिस्तान | इराक, ईरान, तुर्की, सीरिया | इराक में स्वायत्त क्षेत्र; चार देशों में कुर्द आबादी |
| शिनजियांग | चीन | स्वायत्त क्षेत्र; उइगर आबादी; मानवाधिकार चिंताएं |
निम्नलिखित देशों पर विचार कीजिए:
- अज़रबैजान
- किर्गिज़स्तान
- ताजिकिस्तान
- तुर्कमेनिस्तान
- उज़्बेकिस्तान
उपर्युक्त में से किनकी सीमाएँ अफगानिस्तान से लगती हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 3, 4 और 5
अफगानिस्तान मध्य एशिया में एक भू-आबद्ध देश है जो छह देशों के साथ सीमाएँ साझा करता है। दिए गए मध्य एशियाई गणराज्यों में से, केवल ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान ही अफगानिस्तान के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में इसके साथ सीमाएँ साझा करते हैं।
❌ कथन 1 – गलत: अज़रबैजान कैस्पियन सागर के पश्चिमी तट पर काकेशस क्षेत्र में स्थित है और अफगानिस्तान के साथ सीमा साझा नहीं करता है।
❌ कथन 2 – गलत: किर्गिज़स्तान ताजिकिस्तान के उत्तर में स्थित है और अफगानिस्तान के साथ सीमा साझा नहीं करता है।
✅ कथन 3 – सही: ताजिकिस्तान अफगानिस्तान के साथ उत्तर और उत्तर-पूर्व में एक लंबी सीमा (लगभग 1,357 किमी) साझा करता है।
✅ कथन 4 – सही: तुर्कमेनिस्तान अफगानिस्तान के साथ उत्तर-पश्चिम में सीमा (लगभग 804 किमी) साझा करता है।
✅ कथन 5 – सही: उज़्बेकिस्तान अफगानिस्तान के साथ उत्तर में एक छोटी सीमा (लगभग 144 किमी) साझा करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अफगानिस्तान के पड़ोसी
| देश | सीमा की लंबाई (लगभग) | अफगानिस्तान से दिशा |
|---|---|---|
| पाकिस्तान | 2,670 किमी | पूर्व और दक्षिण |
| ईरान | 921 किमी | पश्चिम |
| ताजिकिस्तान | 1,357 किमी | उत्तर और उत्तर-पूर्व |
| तुर्कमेनिस्तान | 804 किमी | उत्तर-पश्चिम |
| उज़्बेकिस्तान | 144 किमी | उत्तर |
| चीन | 91 किमी | उत्तर-पूर्व (वाखान गलियारा) |
- अफगानिस्तान पूरी तरह से भू-आबद्ध है और इसकी समुद्र तक कोई पहुँच नहीं है।
- वाखान गलियारा एक संकीर्ण क्षेत्र है जो अफगानिस्तान को चीन से जोड़ता है।
- मध्य एशियाई गणराज्यों में, कजाकिस्तान और किर्गिज़स्तान अफगानिस्तान के साथ सीमाएँ साझा नहीं करते हैं।
- डूरंड रेखा अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच विवादित सीमा को चिह्नित करती है।