निम्नलिखित में से किस एक स्थिति में "बायोरॉक प्रौद्योगिकी" के बारे में चर्चा की जाती है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — क्षतिग्रस्त प्रवाल भित्तियों की बहाली
बायोरॉक प्रौद्योगिकी (जिसे खनिज संचयन प्रौद्योगिकी के रूप में भी जाना जाता है) समुद्री जल के माध्यम से कम-वोल्टेज प्रत्यक्ष विद्युत धारा का उपयोग करती है जो घुलित खनिजों को अवक्षेपित करती है, जलमग्न धातु संरचनाओं पर चूना पत्थर जैसी संरचना बनाती है। यह प्रवाल लार्वा के स्थापित होने और बढ़ने के लिए एक आदर्श आधार बनाता है, जो प्राकृतिक वृद्धि दर की तुलना में 3-5 गुना तेजी से प्रवाल भित्ति बहाली में तेजी लाता है। यह प्रौद्योगिकी प्रवालों को समुद्री तापन और अम्लीकरण जैसे पर्यावरणीय तनावों के प्रति अधिक लचीला बनाती है, जिससे यह समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र बहाली के लिए एक मूल्यवान उपकरण बन जाती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: बायोरॉक प्रौद्योगिकी
- सिद्धांत: कम-वोल्टेज DC धारा (1.2-6 वोल्ट) का उपयोग करके समुद्री जल का विद्युत अपघटन कैथोड संरचनाओं पर कैल्शियम कार्बोनेट और मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड का अवक्षेपण करता है
- संरचना: धातु के फ्रेम (आमतौर पर इस्पात) पानी के नीचे रखे जाते हैं और कम-वोल्टेज विद्युत स्रोत (सौर पैनल या ज्वारीय ऊर्जा) से जुड़े होते हैं
- प्रवाल बहाली के लिए लाभ: त्वरित प्रवाल वृद्धि (3-5 गुना तेज), प्रवाल जीवित रहने की दर में वृद्धि (50 गुना तक अधिक), विरंजन और बीमारियों के प्रति बढ़ी हुई प्रतिरोधक क्षमता
- अनुप्रयोग: प्रवाल भित्ति बहाली, कृत्रिम भित्ति निर्माण, तटरेखा संरक्षण, समुद्री कृषि समर्थन
- विकासकर्ता: 1970 के दशक में वास्तुकार वुल्फ हिल्बर्ट्ज़ और समुद्री जीवविज्ञानी थॉमस गोरो द्वारा प्रवर्तित
- वैश्विक उदाहरण: मालदीव, इंडोनेशिया, थाईलैंड, सेशेल्स और क्षतिग्रस्त प्रवाल भित्तियों वाले अन्य उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में परियोजनाएं
- भारत संदर्भ: प्रवाल बहाली के लिए मन्नार की खाड़ी, लक्षद्वीप और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में संभावित अनुप्रयोग
Question 1 of 3 प्रवाल भित्तियाँ
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