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लोक वित्त एवं राजकोषीय नीति Previous Year Questions (PYQs)
Showing solved Previous Year Questions for Chapter: लोक वित्त एवं राजकोषीय नीति
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निम्नलिखित में से कौन राजकोषीय नीति के संदर्भ में 'क्राउडिंग आउट इफ़ेक्ट' का सबसे अच्छा वर्णन करता है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: विकल्प 2 — सरकारी उधारी से ब्याज दरें बढ़ती हैं, जिससे निजी निवेश घटता है
सरल व्याख्या:
विकल्प A — गलत। यह विपरीत अवधारणा "Crowding In Effect" का वर्णन करता है — जो मंदी के दौरान होता है जब सरकारी खर्च निजी निवेश को भी बढ़ाता है।
विकल्प B — सही। Crowding Out ऐसे काम करता है:
- सरकार घाटे का बजट बनाती है → बाज़ार से भारी उधार लेती है
- अधिक उधारकर्ता एक ही धन-पूल के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं
- इससे ब्याज दरें बढ़ती हैं
- ऊँची ब्याज दरें निजी व्यवसायों के लिए कर्ज महंगा बनाती हैं
- इसलिए निजी निवेश घट जाता है
विकल्प C — गलत। अधिक कर का मतलब है लोगों के पास कम पैसा → निवेश घटना, बढ़ना नहीं।
विकल्प D — गलत। सरकारी खर्च मांग को बढ़ाता है। Crowding out का मतलब है शुद्ध प्रभाव कम हो सकता है, शून्य नहीं।
याद रखने की तरकीब: सरकार बहुत अधिक उधार लेती है → ब्याज दरें बढ़ती हैं → निजी क्षेत्र कर्ज बाज़ार से "बाहर धकेल दिया जाता है" (crowded out)।
A country’s fiscal deficit stands at ₹50,000 crores. It is receiving ₹10,000 crores through non-debt creating capital receipts. The country’s interest liabilities are ₹1,500 crores. What is the gross primary deficit?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 1 (₹48,500 करोड़)
यह प्रश्न Primary Deficit (प्राथमिक घाटा) की गणना पर आधारित है, जो Fiscal Deficit से ब्याज भुगतान को घटाकर निकाला जाता है।
✅ Fiscal Deficit = ₹50,000 करोड़ (दिया गया है)
✅ Interest Liabilities = ₹1,500 करोड़ (दिया गया है)
✅ सूत्र:
Primary Deficit = Fiscal Deficit − Interest Payments
गणना:
= ₹50,000 करोड़ − ₹1,500 करोड़
= ₹48,500 करोड़
ध्यान दें: ₹10,000 करोड़ के Non-Debt Capital Receipts पहले से ही Fiscal Deficit की गणना में शामिल होते हैं। इसलिए इन्हें दोबारा घटाने की आवश्यकता नहीं होती।
संक्षिप्त नोट्स: Fiscal Deficit और Primary Deficit
-
Fiscal Deficit सरकार की कुल उधारी आवश्यकता को दर्शाता है।
-
Fiscal Deficit = कुल व्यय − कुल प्राप्तियां (उधारी को छोड़कर)।
-
Primary Deficit = Fiscal Deficit − Interest Payments।
-
Primary Deficit वर्तमान वर्ष की वास्तविक वित्तीय स्थिति को दर्शाता है।
-
कम Primary Deficit बेहतर वित्तीय अनुशासन का संकेत है।
-
यदि Primary Deficit शून्य हो, तो नई उधारी केवल पुराने ऋणों के ब्याज भुगतान के लिए ली जा रही है।
-
Non-Debt Capital Receipts में विनिवेश (Disinvestment) और ऋण वसूली (Loan Recovery) शामिल होते हैं।
मान लीजिए कि राजस्व व्यय ₹80,000 करोड़ है और सरकार की राजस्व प्राप्तियाँ ₹60,000 करोड़ है। सरकार के बजट में ₹10,000 करोड़ की उधारी और ₹6,000 करोड़ का ब्याज भुगतान भी दिखाया गया है।
निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
I. राजस्व घाटा ₹20,000 करोड़ है।
II. राजकोषीय घाटा ₹10,000 करोड़ है.
III. प्राथमिक घाटा ₹4,000 करोड़ है।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके सही उत्तर चुनें।
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 4 (I, II और III)
यह प्रश्न सरकारी बजट में प्रयुक्त Revenue Deficit, Fiscal Deficit और Primary Deficit की गणना पर आधारित है।
✅ कथन I सही है: Revenue Deficit = Revenue Expenditure − Revenue Receipts
= ₹80,000 करोड़ − ₹60,000 करोड़
= ₹20,000 करोड़
✅ कथन II सही है: Fiscal Deficit सरकार की कुल उधारी आवश्यकता को दर्शाता है।
दिया गया है: Borrowings = ₹10,000 करोड़
अतः Fiscal Deficit = ₹10,000 करोड़
✅ कथन III सही है: Primary Deficit = Fiscal Deficit − Interest Payments
= ₹10,000 करोड़ − ₹6,000 करोड़
= ₹4,000 करोड़
संक्षिप्त नोट्स: बजट घाटे (Budget Deficits)
-
Revenue Deficit = Revenue Expenditure − Revenue Receipts
-
Revenue Deficit दर्शाता है कि सरकार अपनी नियमित आय से दैनिक खर्च पूरे नहीं कर पा रही है।
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Fiscal Deficit = सरकार की कुल उधारी आवश्यकता
-
Fiscal Deficit कुल व्यय और कुल प्राप्तियों (उधारी को छोड़कर) के बीच का अंतर दर्शाता है।
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Primary Deficit = Fiscal Deficit − Interest Payments
-
Primary Deficit वर्तमान वर्ष की वास्तविक वित्तीय स्थिति को दर्शाता है।
-
शून्य Primary Deficit का अर्थ है कि नई उधारी केवल पुराने ऋणों के ब्याज भुगतान के लिए ली जा रही है।
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निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
कथन I: भारत में, ग्रामीण क्षेत्रों में मुर्गी पालन और ऊन पालन जैसी संबद्ध कृषि गतिविधियों से होने वाली आय को किसी भी कर से छूट दी गई है।
कथन II: भारत में, ग्रामीण कृषि भूमि को आयकर अधिनियम, 1961 के प्रावधानों के तहत पूंजीगत संपत्ति नहीं माना जाता है।
उपरोक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 4
आयकर अधिनियम, 1961 के अनुसार केवल भूमि की खेती जैसी मुख्य कृषि गतिविधियों से प्राप्त आय को कृषि आय माना जाता है और उस पर कर छूट मिलती है। जबकि पोल्ट्री फार्मिंग और ऊन उत्पादन जैसी सहायक गतिविधियों से प्राप्त आय कर योग्य होती है। साथ ही, ग्रामीण कृषि भूमि को पूंजीगत संपत्ति की श्रेणी में नहीं रखा गया है।
❌ कथन I गलत है: पोल्ट्री फार्मिंग, डेयरी, मत्स्य पालन और ऊन उत्पादन जैसी सहायक कृषि गतिविधियों से होने वाली आय कर-मुक्त नहीं होती, बल्कि सामान्यतः कर योग्य होती है।
✅ कथन II सही है: ग्रामीण कृषि भूमि (Rural Agricultural Land) को आयकर अधिनियम की धारा 2(14) के तहत पूंजीगत संपत्ति (Capital Asset) नहीं माना जाता। इसलिए इसकी बिक्री पर सामान्यतः पूंजीगत लाभ कर नहीं लगता।
❌ कथन II, कथन I की व्याख्या नहीं करता: कथन II भूमि की कर स्थिति से संबंधित है, जबकि कथन I सहायक कृषि गतिविधियों की आय से संबंधित है। दोनों का आपस में सीधा संबंध नहीं है।
संक्षिप्त नोट्स: कृषि आय और ग्रामीण कृषि भूमि
-
भूमि की खेती से प्राप्त आय आयकर से मुक्त होती है।
-
पोल्ट्री, डेयरी, मत्स्य पालन और ऊन उत्पादन से प्राप्त आय कर योग्य होती है।
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धारा 2(14) में पूंजीगत संपत्ति की परिभाषा दी गई है।
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ग्रामीण कृषि भूमि को पूंजीगत संपत्ति नहीं माना जाता।
-
ग्रामीण कृषि भूमि की बिक्री पर सामान्यतः Capital Gains Tax नहीं लगता।
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शहरी कृषि भूमि को सामान्यतः पूंजीगत संपत्ति माना जाता है।
-
यह छूट किसानों और कृषि गतिविधियों को संरक्षण देने के लिए दी गई है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
I. पूंजीगत प्राप्तियां देनदारी पैदा करती हैं या सरकार की संपत्ति में कमी का कारण बनती हैं।
II. उधार और विनिवेश पूंजीगत प्राप्तियां हैं।
III. ऋण पर प्राप्त ब्याज सरकार की देनदारी बनाता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा सही है?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ विकल्प 1 (केवल I और II)
सरकारी प्राप्तियों को मुख्यतः राजस्व प्राप्तियाँ (Revenue Receipts) और पूंजी प्राप्तियाँ (Capital Receipts) में बाँटा जाता है। पूंजी प्राप्तियाँ या तो सरकार की देनदारियाँ बढ़ाती हैं या उसकी परिसंपत्तियों को कम करती हैं।
✅ कथन I सही है: पूंजी प्राप्तियाँ दायित्व (Liability) उत्पन्न करती हैं या सरकारी परिसंपत्तियों में कमी लाती हैं।
✅ कथन II सही है: उधार (Borrowings) और विनिवेश (Disinvestment) दोनों पूंजी प्राप्तियाँ हैं।
-
उधार लेने से देनदारी बढ़ती है।
-
विनिवेश से सरकारी परिसंपत्तियाँ कम होती हैं।
❌ कथन III गलत है: ऋणों पर प्राप्त ब्याज (Interest Received) एक राजस्व प्राप्ति (Revenue Receipt) है। यह सरकार की आय है, कोई देनदारी नहीं बनाता।
संक्षिप्त नोट्स: पूंजी प्राप्तियाँ और राजस्व प्राप्तियाँ
-
सरकारी प्राप्तियाँ पूंजी प्राप्तियाँ और राजस्व प्राप्तियाँ में विभाजित होती हैं।
-
पूंजी प्राप्तियाँ दायित्व बढ़ाती हैं या परिसंपत्तियाँ घटाती हैं।
-
पूंजी प्राप्तियों के उदाहरण: उधार, ऋण वसूली, विनिवेश।
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राजस्व प्राप्तियाँ न तो दायित्व बढ़ाती हैं और न ही परिसंपत्तियाँ घटाती हैं।
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राजस्व प्राप्तियों के उदाहरण: कर, शुल्क, लाभांश, ब्याज प्राप्ति।
-
उधार लेने से सार्वजनिक ऋण (Public Debt) बढ़ता है।
-
विनिवेश में सार्वजनिक उपक्रमों में सरकारी हिस्सेदारी बेची जाती है।
निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
- जनसांख्यिकीय प्रदर्शन
- वन और पारिस्थितिकी
- शासन सुधार
- स्थिर सरकार
- कर और राजकोषीय प्रयास
क्षैतिज कर अंतरण के लिए, पंद्रहवें वित्त आयोग ने जनसंख्या, क्षेत्रफल और आय दूरी के अलावा उपरोक्त में से कितने को मानदंड के रूप में उपयोग किया?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल तीन
पंद्रहवें वित्त आयोग ने क्षैतिज कर अंतरण के लिए छह मानदंडों का उपयोग किया: आय दूरी (45%), जनसंख्या (15%), क्षेत्रफल (15%), वन और पारिस्थितिकी (10%), जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (12.5%), और कर और राजकोषीय प्रयास (2.5%)। उल्लिखित तीन मानदंडों (जनसंख्या, क्षेत्रफल, और आय दूरी) के अलावा, दी गई सूची में से केवल तीन का उपयोग किया गया: जनसांख्यिकीय प्रदर्शन, वन और पारिस्थितिकी, और कर और राजकोषीय प्रयास। शासन सुधार और स्थिर सरकार को क्षैतिज कर अंतरण के लिए मानदंड के रूप में उपयोग नहीं किया गया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पंद्रहवाँ वित्त आयोग - क्षैतिज अंतरण मानदंड
| मानदंड | भार (%) | तर्क |
|---|---|---|
| आय दूरी | 45% | राज्य की प्रति व्यक्ति आय की उच्चतम आय वाले राज्य से दूरी |
| जनसंख्या | 15% | 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित |
| क्षेत्रफल | 15% | बड़े क्षेत्रों में सेवा वितरण की उच्च लागत |
| वन और पारिस्थितिकी | 10% | घने वन आच्छादन का हिस्सा; पर्यावरण संरक्षण प्रोत्साहन |
| जनसांख्यिकीय प्रदर्शन | 12.5% | जनसंख्या वृद्धि नियंत्रण के लिए राज्यों को पुरस्कृत करना (1971 आधार रेखा) |
| कर और राजकोषीय प्रयास | 2.5% | उच्च कर संग्रह दक्षता के लिए प्रोत्साहन |
- अवधि: 2021-2026 (पुरस्कार अवधि)
- प्रमुख परिवर्तन: जनसांख्यिकीय प्रदर्शन ने 14वें वित्त आयोग द्वारा उपयोग किए गए 'जनसांख्यिकीय परिवर्तन' को प्रतिस्थापित किया
- शामिल नहीं: शासन सुधार, स्थिर सरकार, या राजनीतिक स्थिरता
किसी संगठन या कंपनी द्वारा किए गए व्यय के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- नई तकनीक का अधिग्रहण पूंजीगत व्यय है।
- ऋण वित्तपोषण को पूंजीगत व्यय माना जाता है, जबकि इक्विटी वित्तपोषण को राजस्व व्यय माना जाता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
यह प्रश्न संगठनात्मक लेखांकन में पूंजीगत और राजस्व व्यय की समझ का परीक्षण करता है। कथन 1 सही है क्योंकि नई तकनीक का अधिग्रहण एक दीर्घकालिक निवेश है जो संगठन को कई वर्षों तक लाभान्वित करता है, इसलिए यह पूंजीगत व्यय है। कथन 2 गलत है क्योंकि वित्तपोषण का तरीका (ऋण या इक्विटी) व्यय की प्रकृति निर्धारित नहीं करता है; बल्कि, व्यय की प्रकृति और उद्देश्य ही इसे पूंजीगत या राजस्व व्यय के रूप में वर्गीकृत करता है।
✅ कथन 1 – सही: नई तकनीक का अधिग्रहण पूंजीगत व्यय है क्योंकि यह दीर्घकालिक परिसंपत्तियां (सॉफ्टवेयर, मशीनरी, उपकरण) बनाता है जिन्हें बैलेंस शीट पर पूंजीकृत किया जाता है और उनके उपयोगी जीवन पर मूल्यह्रास किया जाता है।
❌ कथन 2 – गलत: ऋण और इक्विटी वित्तपोषण पूंजी जुटाने के तरीके हैं, व्यय के प्रकार नहीं; दोनों का उपयोग पूंजीगत या राजस्व व्यय के लिए किया जा सकता है, और वर्गीकरण व्यय की प्रकृति पर निर्भर करता है, न कि उसके वित्तपोषण स्रोत पर।
📝 संक्षिप्त नोट्स: पूंजीगत बनाम राजस्व व्यय
| पहलू | पूंजीगत व्यय | राजस्व व्यय |
|---|---|---|
| परिभाषा | दीर्घकालिक लाभ प्रदान करने वाली स्थिर परिसंपत्तियों के अधिग्रहण/सुधार के लिए व्यय | अल्पकालिक लाभ प्रदान करने वाले नियमित संचालन और रखरखाव के लिए व्यय |
| उद्देश्य | परिसंपत्तियों (भवन, मशीनरी, उपकरण) का अधिग्रहण, संवर्धन या जीवन विस्तार | दैनिक परिचालन आवश्यकताओं (वेतन, उपयोगिताएं, रखरखाव) को पूरा करना |
| परिसंपत्तियों पर प्रभाव | परिसंपत्ति मूल्य बढ़ाता है या नई परिसंपत्तियां बनाता है | परिसंपत्ति मूल्य नहीं बढ़ाता है |
| लेखांकन उपचार | बैलेंस शीट पर परिसंपत्ति के रूप में दर्ज और समय के साथ मूल्यह्रास | वर्तमान अवधि के लिए लाभ और हानि विवरण में व्यय के रूप में दर्ज |
| समय सीमा | दीर्घकालिक लाभ (कई वर्ष) | अल्पकालिक लाभ (वर्तमान वर्ष) |
| उदाहरण | मशीनरी की खरीद, भवन निर्माण, भूमि अधिग्रहण, तकनीक अधिग्रहण | वेतन, मजदूरी, किराया, मरम्मत, रखरखाव, कार्यालय आपूर्ति |
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- घरेलू वित्तीय बचत का एक हिस्सा सरकारी उधारी की ओर जाता है।
- नीलामी में बाजार से संबंधित दरों पर जारी दिनांकित प्रतिभूतियाँ आंतरिक ऋण का एक बड़ा घटक बनती हैं;
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 2 दोनों
दोनों कथन घरेलू बचत और सरकारी उधारी के बीच संबंध, और भारत में सरकारी ऋण जारी करने की प्रक्रिया का सटीक वर्णन करते हैं। घरेलू वित्तीय बचत विभिन्न साधनों के माध्यम से सरकारी उधारी में प्रवाहित होती है, जबकि बाजार नीलामी के माध्यम से जारी दिनांकित प्रतिभूतियाँ आंतरिक ऋण के सबसे बड़े घटक का निर्माण करती हैं।
✅ कथन 1 – सही: घरेलू वित्तीय बचत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के माध्यम से सरकार के पास जाता है, या तो प्रत्यक्ष रूप से या बैंकों और वित्तीय संस्थानों के माध्यम से जो सरकारी ऋण साधनों में निवेश करते हैं।
✅ कथन 2 – सही: दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियाँ (जी-सेक), जो आरबीआई द्वारा आयोजित नीलामी के माध्यम से बाजार-निर्धारित दरों पर जारी की जाती हैं, भारत के आंतरिक ऋण का सबसे बड़ा घटक बनती हैं, जो कुल आंतरिक देनदारियों का 80% से अधिक हिस्सा है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सरकारी उधारी और आंतरिक ऋण
| घटक | विवरण |
|---|---|
| आंतरिक ऋण के स्रोत | बाजार ऋण (दिनांकित प्रतिभूतियाँ), ट्रेजरी बिल, लघु बचत के विरुद्ध प्रतिभूतियाँ, राज्य भविष्य निधि, आरक्षित निधि, और जमा |
| दिनांकित प्रतिभूतियाँ | निश्चित परिपक्वता तिथियों वाले दीर्घकालिक सरकारी बॉन्ड (5 से 40 वर्ष तक); आरबीआई द्वारा नीलामी के माध्यम से जारी; द्वितीयक बाजार में व्यापार योग्य; आंतरिक ऋण का सबसे बड़ा घटक |
| घरेलू बचत प्रवाह | घरेलू क्षेत्र → बैंक जमा → बैंक जी-सेक में निवेश करते हैं; या घरेलू क्षेत्र → जी-सेक, एनएससी, पीपीएफ आदि की प्रत्यक्ष खरीद |
| ट्रेजरी बिल | अल्पकालिक साधन (91-दिन, 182-दिन, 364-दिन); अंकित मूल्य से छूट पर जारी; अल्पकालिक सरकारी वित्तपोषण के लिए उपयोग |
| बाजार उधारी प्रक्रिया | आरबीआई सरकार की ओर से नीलामी आयोजित करता है; प्राथमिक डीलर और बैंक भाग लेते हैं; ब्याज दरें बाजार की मांग-आपूर्ति द्वारा निर्धारित होती हैं |
निम्नलिखित में से कौन सी स्थिति "अप्रत्यक्ष हस्तांतरण (Indirect Transfers)" को सर्वोत्तम रूप से दर्शाती है, जिसकी भारत के संदर्भ में हाल ही में मीडिया में अक्सर चर्चा होती है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — एक विदेशी कंपनी शेयरों का हस्तांतरण करती है और ऐसे शेयर भारत में स्थित संपत्तियों से अपना पर्याप्त मूल्य प्राप्त करते हैं
अप्रत्यक्ष हस्तांतरण उस स्थिति को संदर्भित करता है जहां एक विदेशी कंपनी किसी अन्य विदेशी इकाई (आमतौर पर भारत के बाहर पंजीकृत) के शेयरों का हस्तांतरण करती है, लेकिन ये शेयर भारत में स्थित संपत्तियों से अपना पर्याप्त मूल्य प्राप्त करते हैं। यह भारत सरकार को ऐसे हस्तांतरण पर पूंजीगत लाभ पर कर लगाने की अनुमति देता है, भले ही लेनदेन ऑफशोर होता है, यह सुनिश्चित करता है कि भारतीय संपत्तियों के आर्थिक मूल्य पर उचित रूप से कर लगाया जाए। यह अवधारणा वोडाफोन मामले के बाद प्रमुखता में आई और बाद में भारतीय कर कानूनों में संहिताबद्ध की गई।
❌ विकल्प 1 – गलत: यह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी देश में करों के भुगतान का वर्णन करता है, अप्रत्यक्ष हस्तांतरण कराधान का नहीं।
❌ विकल्प 2 – गलत: यह एक विदेशी कंपनी द्वारा भारतीय निवेशों से लाभ पर अपने गृह देश को कर का भुगतान करने का वर्णन करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय कराधान से संबंधित है लेकिन अप्रत्यक्ष हस्तांतरण से नहीं।
❌ विकल्प 3 – गलत: यह एक भारतीय कंपनी द्वारा विदेशी मूर्त संपत्तियों की प्रत्यक्ष खरीद और बिक्री के साथ आय की प्रत्यावर्तन का वर्णन करता है, अप्रत्यक्ष हस्तांतरण तंत्र का नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारतीय कर कानून में अप्रत्यक्ष हस्तांतरण प्रावधान
- परिभाषा: अप्रत्यक्ष हस्तांतरण तब होता है जब विदेशी कंपनी के शेयरों को ऑफशोर स्थानांतरित किया जाता है, लेकिन ये शेयर भारत में स्थित संपत्तियों से पर्याप्त मूल्य (सामान्यतः >50%) प्राप्त करते हैं।
- उत्पत्ति: यह अवधारणा वोडाफोन-हचिसन कर विवाद (2007) से प्रमुखता में आई, जहां वोडाफोन ने एक भारतीय दूरसंचार कंपनी में हचिसन की हिस्सेदारी एक ऑफशोर शेयर हस्तांतरण के माध्यम से अधिग्रहित की।
- कानूनी ढांचा: आयकर अधिनियम की धारा 9(1)(i) को 2012 में पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ संशोधित किया गया, और बाद में 2015 में अप्रत्यक्ष हस्तांतरण प्रावधानों को शामिल करने के लिए परिष्कृत किया गया।
- सीमा शर्तें: हस्तांतरण भारत में कर योग्य है यदि शेयर/हित भारतीय संपत्तियों से पर्याप्त मूल्य प्राप्त करते हैं और विदेशी कंपनी/इकाई भारत में पर्याप्त मूल्य रखती है (दोनों आमतौर पर >50%)।
- उद्देश्य: ऑफशोर शेयर हस्तांतरण के माध्यम से कर परिहार को रोकना और भारतीय संपत्तियों से प्राप्त आर्थिक मूल्य के कराधान को सुनिश्चित करना, भले ही लेनदेन भारत के बाहर हों।
- सुरक्षित बंदरगाह: छोटे शेयरधारकों (5% से कम शेयरधारिता और ₹10 करोड़ से कम मूल्य) और कुछ शर्तों को पूरा करने वाली सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए छूट मौजूद हैं।
निम्नलिखित में से कौन सा कदम आर्थिक मंदी के समय उठाए जाने की सर्वाधिक संभावना है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — सार्वजनिक परियोजनाओं पर व्यय में वृद्धि।
आर्थिक मंदी के दौरान, सरकारें मांग को प्रोत्साहित करने और आर्थिक गतिविधि को पुनर्जीवित करने के लिए विस्तारवादी राजकोषीय नीति अपनाती हैं। सार्वजनिक परियोजनाओं पर व्यय बढ़ाना एक क्लासिक कीनेसियन उपाय है जो सीधे अर्थव्यवस्था में धन का निवेश करता है, रोजगार के अवसर पैदा करता है, वस्तुओं और सेवाओं की मांग उत्पन्न करता है, और समग्र आर्थिक विकास पर गुणक प्रभाव डालता है।
अन्य विकल्प कम उपयुक्त क्यों हैं:
❌ विकल्प 1 – ब्याज दर में वृद्धि के साथ कर दरों में कटौती: जबकि कर कटौती प्रयोज्य आय बढ़ाती है, ब्याज दरों को एक साथ बढ़ाना निवेश और उपभोग को हतोत्साहित करता है, जिससे विरोधाभासी प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
❌ विकल्प 3 – ब्याज दर में कमी के साथ कर दरों में वृद्धि: उच्च कर प्रयोज्य आय को कम करते हैं और उपभोक्ता मांग को कम करते हैं, जो कम ब्याज दरों के बावजूद मंदी के दौरान प्रतिकूल है।
❌ विकल्प 4 – सार्वजनिक परियोजनाओं पर व्यय में कमी: यह संकुचनात्मक राजकोषीय नीति का प्रतिनिधित्व करता है, जो समग्र मांग और रोजगार को कम करके मंदी को और गहरा करेगा।
📝 संक्षिप्त नोट्स: आर्थिक मंदी के दौरान राजकोषीय नीति
- विस्तारवादी राजकोषीय नीति: मंदी के दौरान समग्र मांग को बढ़ावा देने के लिए सरकारी खर्च में वृद्धि और/या कर कटौती शामिल है।
- कीनेसियन अर्थशास्त्र: चक्रीय मंदी का मुकाबला करने के लिए सार्वजनिक व्यय के माध्यम से सक्रिय सरकारी हस्तक्षेप की वकालत करता है।
- गुणक प्रभाव: परियोजनाओं पर सरकारी खर्च रोजगार पैदा करता है → श्रमिक आय खर्च करते हैं → व्यवसाय अधिक कमाते हैं → अधिक श्रमिकों को नियुक्त करते हैं, जिससे सकारात्मक प्रभावों की श्रृंखला बनती है।
- स्वचालित स्थिरीकरण: प्रगतिशील कराधान और बेरोजगारी लाभ नीतिगत परिवर्तनों के बिना स्वचालित रूप से अर्थव्यवस्था को स्थिर करते हैं।
- विवेकाधीन उपाय: बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, प्रोत्साहन पैकेज और सार्वजनिक कार्य कार्यक्रमों जैसे जानबूझकर नीतिगत कार्य।
- राजकोषीय घाटा: मंदी के दौरान, सरकारें अल्पकालिक में राजकोषीय समेकन पर विकास को प्राथमिकता देने के लिए उच्च घाटे को स्वीकार करती हैं।
भारत में काले धन के सृजन के निम्नलिखित में से किस प्रभाव को भारत सरकार के लिए चिंता का मुख्य कारण माना गया है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — कर चोरी के कारण राज्य कोष को राजस्व की हानि।
काले धन के संबंध में भारत सरकार की प्राथमिक चिंता कर राजस्व की पर्याप्त हानि है, जो सीधे तौर पर आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं, बुनियादी ढांचे के विकास और कल्याण कार्यक्रमों को वित्तपोषित करने की राज्य कोष की क्षमता को प्रभावित करती है। जबकि अन्य प्रभाव जैसे अचल संपत्ति में निवेश, अनुत्पादक परिसंपत्तियों या राजनीतिक दान चिंताजनक हैं, सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव व्यवस्थित कर चोरी के कारण सरकार की राजकोषीय क्षमता का क्षरण है। काला धन, अपनी प्रकृति से ही, अघोषित आय का प्रतिनिधित्व करता है जो राज्य को राष्ट्रीय विकास और शासन के लिए आवश्यक संसाधनों से वंचित करता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: काला धन और इसका आर्थिक प्रभाव
- काले धन की परिभाषा: अवैध साधनों से अर्जित आय या वैध साधनों से अर्जित लेकिन कराधान से बचने के लिए कर अधिकारियों को रिपोर्ट नहीं की गई आय।
- प्राथमिक सरकारी चिंता: कर चोरी के माध्यम से राजस्व हानि सीधे सार्वजनिक व्यय को निधि देने की राजकोषीय क्षमता को कमजोर करती है।
- द्वितीयक प्रभाव: संसाधन आवंटन में विकृति, परिसंपत्ति बाजारों (अचल संपत्ति, सोना) में मुद्रास्फीति, और औपचारिक अर्थव्यवस्था को कमजोर करना शामिल है।
- सरकारी उपाय: विमुद्रीकरण (2016), आय घोषणा योजनाएं, बेनामी लेनदेन अधिनियम, काला धन अधिनियम (2015), और संधियों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग।
- आर्थिक प्रभाव: जीडीपी सटीकता कम करता है, समानांतर अर्थव्यवस्था बनाता है, आय असमानता बढ़ाता है, और नियोजित विकास में बाधा डालता है।
- अनुमान चुनौतियां: सटीक रूप से मापना कठिन; विभिन्न अध्ययनों ने ऐतिहासिक रूप से काली अर्थव्यवस्था को जीडीपी के 20-40% पर अनुमानित किया है।
निम्नलिखित में से कौन सा अपने प्रभावों में सबसे अधिक मुद्रास्फीतिकारी होने की संभावना है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — बजट घाटे को वित्तपोषित करने के लिए नई मुद्रा का सृजन।
नई मुद्रा का सृजन (ऋण का मुद्रीकरण) बजट घाटे को वित्तपोषित करने की सबसे अधिक मुद्रास्फीतिकारी विधि है क्योंकि यह वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में बिना किसी संगत वृद्धि के सीधे मौद्रिक आधार को बढ़ाती है। जब केंद्रीय बैंक सरकारी व्यय को वित्तपोषित करने के लिए नई मुद्रा छापता है, तो यह अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति का विस्तार करता है, जिससे अतिरिक्त तरलता वस्तुओं की समान मात्रा का पीछा करती है, जिसके परिणामस्वरूप मूल्य स्तरों में तीव्र वृद्धि होती है। अन्य विधियों के विपरीत जो केवल अर्थव्यवस्था के भीतर मौजूदा धन को स्थानांतरित करती हैं, मुद्रा सृजन शुद्ध नई क्रय शक्ति जोड़ता है, जिससे यह स्वाभाविक रूप से मुद्रास्फीतिकारी बन जाता है।
❌ विकल्प 1 – सार्वजनिक ऋण की अदायगी: यह जनता के हाथों में तरलता बढ़ाती है लेकिन कम मुद्रास्फीतिकारी है क्योंकि धन आमतौर पर कर राजस्व से आते हैं, जो कहीं और प्रयोज्य आय को कम करते हैं।
❌ विकल्प 2 – जनता से उधार लेना: यह सबसे कम मुद्रास्फीतिकारी विधि है क्योंकि यह कुल मुद्रा आपूर्ति को बदले बिना जनता से सरकार को मौजूदा धन के हस्तांतरण को शामिल करती है।
❌ विकल्प 3 – बैंकों से उधार लेना: जबकि यह ऋण सृजन और कुछ मुद्रा आपूर्ति विस्तार का कारण बन सकता है, इसका मुद्रास्फीतिकारी प्रभाव प्रत्यक्ष मुद्रा सृजन की तुलना में काफी कम है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: घाटे के वित्तपोषण की विधियाँ और मुद्रास्फीतिकारी प्रभाव
| विधि | तंत्र | मुद्रा आपूर्ति पर प्रभाव | मुद्रास्फीतिकारी दबाव |
|---|---|---|---|
| जनता से उधार लेना | सरकार बॉन्ड के माध्यम से व्यक्तियों/संस्थानों से उधार लेती है | कोई परिवर्तन नहीं (मौजूदा धन का हस्तांतरण) | न्यूनतम मुद्रास्फीतिकारी |
| बैंकों से उधार लेना | सरकार वाणिज्यिक बैंकों से उधार लेती है | मध्यम वृद्धि (ऋण सृजन के माध्यम से) | मध्यम मुद्रास्फीतिकारी |
| नई मुद्रा का सृजन | केंद्रीय बैंक नई मुद्रा छापता है (मुद्रीकरण) | मौद्रिक आधार में प्रत्यक्ष वृद्धि | सर्वाधिक मुद्रास्फीतिकारी |
| ऋण की अदायगी | सरकार लेनदारों को धन वापस स्थानांतरित करती है | सार्वजनिक तरलता बढ़ाती है | हल्की मुद्रास्फीतिकारी |
- उच्च-शक्ति मुद्रा: इसे आरक्षित मुद्रा या मौद्रिक आधार भी कहा जाता है, जिसमें प्रचलन में मुद्रा और केंद्रीय बैंक के पास वाणिज्यिक बैंकों द्वारा रखे गए आरक्षित शामिल हैं।
- घाटे का वित्तपोषण: जब सरकारी व्यय राजस्व से अधिक हो जाता है और घाटे को उधार लेने के बजाय नई मुद्रा छापकर वित्तपोषित किया जाता है।
- ऋण का मुद्रीकरण: वह प्रक्रिया जिसमें केंद्रीय बैंक सरकारी बॉन्ड सीधे खरीदता है, प्रभावी रूप से सरकारी खर्च को वित्तपोषित करने के लिए मुद्रा छापता है।
- मुद्रास्फीतिकारी प्रभाव सिद्धांत: मुद्रास्फीति तब होती है जब मुद्रा आपूर्ति अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन की तुलना में तेजी से बढ़ती है।
- भीड़ बाहर प्रभाव: जब सरकार जनता से उधार लेती है, तो यह निजी निवेश के लिए उपलब्ध धन को कम कर सकती है, लेकिन सीधे मुद्रास्फीति का कारण नहीं बनती।
बजट के साथ, वित्त मंत्री संसद के समक्ष अन्य दस्तावेज भी प्रस्तुत करते हैं जिनमें "मैक्रो इकोनॉमिक फ्रेमवर्क स्टेटमेंट" शामिल है। उक्त दस्तावेज प्रस्तुत किया जाता है क्योंकि यह निम्नलिखित द्वारा अनिवार्य है:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — राजकीय वित्तीय दायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 के प्रावधान
मैक्रो इकोनॉमिक फ्रेमवर्क स्टेटमेंट को संसद के समक्ष प्रस्तुत करना राजकीय वित्तीय दायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003 द्वारा अनिवार्य किया जाता है। यह अधिनियम एक कानूनी ढांचा स्थापित करता है जिसके अनुसार सरकार को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में संसद के समक्ष तीन प्रमुख नीति विवरण प्रस्तुत करने होते हैं: मध्यम अवधि के राजकीय नीति विवरण, राजकीय नीति रणनीति विवरण, और मैक्रो इकोनॉमिक फ्रेमवर्क विवरण। ये विवरण राजकीय संचालन में पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं, पीढ़ी के बीच समानता को बढ़ावा देते हैं, और दीर्घकालीन मैक्रो इकोनॉमिक स्थिरता तथा राजकीय और मौद्रिक नीतियों के बीच बेहतर समन्वय का समर्थन करते हैं।
निम्नलिखित वस्तुओं पर विचार कीजिए:
- छिलके निकाले गए अनाज
- पके हुए मुर्गी के अंडे
- संसाधित और डिब्बाबंद मछली
- विज्ञापन सामग्री युक्त समाचार पत्र
उपर्युक्त में से कौन सी वस्तु/वस्तुएं GST (वस्तु एवं सेवा कर) के अंतर्गत छूट प्राप्त है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — केवल 1, 2 और 4
यह प्रश्न विभिन्न वस्तुओं पर GST छूट के ज्ञान का परीक्षण करता है। वस्तु 1 (छिलके निकाले गए अनाज), 2 (पके हुए मुर्गी के अंडे), और 4 (विज्ञापन युक्त समाचार पत्र) GST के अंतर्गत छूट प्राप्त हैं, जबकि वस्तु 3 (संसाधित और डिब्बाबंद मछली) एक मूल्य-वर्धित उत्पाद के रूप में कर योग्य है।
✅ कथन 1 – सही: छिलके निकाले गए अनाज (HSN 1104) GST से छूट प्राप्त हैं जब वे ब्रांडेड इकाई कंटेनरों में नहीं बेचे जाते, जिससे बुनियादी खाद्य पदार्थ सस्ते रहते हैं।
✅ कथन 2 – सही: पक्षियों के अंडे (पके हुए मुर्गी के अंडे सहित) HSN 0407 के तहत विशेष रूप से छूट प्राप्त हैं, चाहे वे ताजे हों, संरक्षित हों या पके हुए हों।
❌ कथन 3 – गलत: जबकि ताजी मछली GST-मुक्त है, संसाधित और डिब्बाबंद मछली (HSN 1604) एक मूल्य-वर्धित उत्पाद है जो 5% की दर से GST के अधीन है।
✅ कथन 4 – सही: समाचार पत्र, पत्रिकाएं और सामयिक पत्रिकाएं (HSN 4902) GST से छूट प्राप्त हैं, चाहे उनमें विज्ञापन सामग्री हो या नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: आवश्यक वस्तुओं पर GST छूट
- शून्य-दर बनाम छूट: शून्य-दर आपूर्ति इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुमति देती है, जबकि छूट प्राप्त आपूर्ति नहीं देती; अधिकांश खाद्य वस्तुएं छूट श्रेणी में आती हैं।
- छूट प्राप्त खाद्य वस्तुएं: ताजी सब्जियां, फल, दूध, दही, लस्सी, गैर-ब्रांडेड अनाज, ताजी मछली/मांस, गुड़, शहद और अंडे GST से मुक्त हैं।
- कर योग्य खाद्य वस्तुएं: संसाधित, पैकेज्ड या ब्रांडेड खाद्य पदार्थ GST आकर्षित करते हैं; संसाधित मछली/मांस उत्पाद (5%), आइसक्रीम (18%), और ब्रांडेड पैकेज्ड खाद्य पदार्थ (5-18%) कर योग्य हैं।
- मुद्रित मीडिया: सभी समाचार पत्र, पत्रिकाएं और सामयिक पत्रिकाएं HSN 4902 के तहत छूट प्राप्त हैं, जो विज्ञापन सामग्री की परवाह किए बिना सूचना तक सस्ती पहुंच सुनिश्चित करती हैं।
- HSN वर्गीकरण: हार्मोनाइज्ड सिस्टम ऑफ नोमेनक्लेचर (HSN) कोड GST लागू होने का निर्धारण करते हैं; समान उत्पादों पर प्रसंस्करण स्तर के आधार पर अलग-अलग कर उपचार हो सकता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए
- राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) समीक्षा समिति रिपोर्ट ने 2023 तक सामान्य (संयुक्त) सरकार के लिए GDP के 60% के ऋण-से-GDP अनुपात की अनुशंसा की है, जिसमें केंद्र सरकार के लिए 40% और राज्य सरकारों के लिए 20% शामिल है।
- केंद्र सरकार पर GDP के 21% के घरेलू दायित्व हैं जबकि राज्य सरकारों पर GDP के 49% के घरेलू दायित्व हैं।
- भारत के संविधान के अनुसार, यदि किसी राज्य पर केंद्र सरकार के प्रति कोई बकाया देनदारी है, तो उस राज्य के लिए कोई भी ऋण लेने से पहले केंद्र सरकार की सहमति लेना अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — केवल 1 और 3
यह प्रश्न राजकोषीय संघवाद, FRBM समीक्षा समिति की अनुशंसाओं और राज्यों की उधारी से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के ज्ञान का परीक्षण करता है। कथन 1 सही रूप से FRBM समिति के ऋण-से-GDP लक्ष्यों को दर्शाता है, और कथन 3 अनुच्छेद 293 के प्रावधानों का सटीक वर्णन करता है, जबकि कथन 2 घरेलू देनदारियों के लिए गलत आंकड़े प्रदान करता है।
✅ कथन 1 – सही: FRBM समीक्षा समिति (एन.के. सिंह समिति, 2017) ने 2023 तक संयुक्त ऋण-से-GDP अनुपात 60% की अनुशंसा की, जिसमें केंद्र के लिए 40% और राज्यों के लिए 20% शामिल है, ताकि राजकोषीय स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
❌ कथन 2 – गलत: केंद्र सरकार की घरेलू देनदारियां GDP के लगभग 46.1% थीं (2016-17), 21% नहीं, जबकि राज्य सरकारों की देनदारियां GDP के लगभग 23.2% थीं, 49% नहीं — आंकड़े उलटे और गलत हैं।
✅ कथन 3 – सही: संविधान का अनुच्छेद 293(3) अनिवार्य करता है कि यदि किसी राज्य पर केंद्र के प्रति बकाया देनदारी है तो कोई भी ऋण लेने के लिए उसे केंद्र सरकार की सहमति लेनी होगी।
📝 संक्षिप्त नोट्स: राजकोषीय उत्तरदायित्व और राज्य उधारी
- FRBM अधिनियम, 2003: संस्थागत तंत्र के माध्यम से राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करने और राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए अधिनियमित किया गया।
- FRBM समीक्षा समिति (2017): एन.के. सिंह की अध्यक्षता में; 2023 तक सामान्य सरकार के लिए 60% के ऋण-से-GDP अनुपात (40% केंद्र + 20% राज्य) की अनुशंसा की, और संरचनात्मक सुधारों, मंदी या राष्ट्रीय आपदा के दौरान विचलन के लिए एक पलायन खंड प्रस्तुत किया।
- अनुच्छेद 293(1): राज्य सरकारों को राज्य की संचित निधि की सुरक्षा पर भारत के भीतर उधार लेने का अधिकार देता है, जो राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित सीमाओं के अधीन है।
- अनुच्छेद 293(3): यदि किसी राज्य पर केंद्र के प्रति बकाया देनदारी है तो कोई भी ऋण लेने से पहले केंद्र सरकार की सहमति लेना आवश्यक है, जो राजकोषीय प्रबंधन में समन्वय सुनिश्चित करता है।
- अनुच्छेद 292: केंद्र सरकार को भारत की संचित निधि की सुरक्षा पर उधार लेने का अधिकार देता है, जो संसद द्वारा निर्धारित सीमाओं के अधीन है।
- राजकोषीय घाटा: सरकार के कुल राजस्व और कुल व्यय के बीच का अंतर; FRBM लक्ष्य केंद्र के लिए GDP के 3% को लक्षित करते हैं।
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