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जैन धर्म Previous Year Questions (PYQs)
Practice solved questions for जैन धर्म with detailed step-by-step solutions, key insights, and trend analysis for UPSC CSE PRELIMS.
Solved Previous Year Questions
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जैन धर्म में मान्यता प्राप्त जीवन के अस्तित्व के चार मुख्य रूपों में से, निम्नलिखित में से कौन सा शामिल नहीं है?
Detailed Explanation:
जैन धर्म के अनुसार आत्मा अपने कर्मों के आधार पर जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार) में घूमती रहती है। जैन धर्म में चार मुख्य गतियाँ (Four Gatis) मानी गई हैं:
-
देव गति – देवता/स्वर्गीय प्राणी
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मनुष्य गति – मानव
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तिर्यंच गति – पशु, पक्षी, वनस्पति आदि
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नारकी गति – नरक के प्राणी
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यक्ष इन चार गतियों में शामिल नहीं हैं।
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यक्षों को शासन देवता (Attendant Deities) माना जाता है और वे व्यंतर देवों की श्रेणी में आते हैं।
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अतः सही उत्तर विकल्प (B) यक्ष है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
| विकल्प | कारण |
|---|---|
| देव | चार गतियों में शामिल हैं। |
| मनुष्य | चार गतियों में शामिल हैं। |
| तिर्यंच | चार गतियों में शामिल हैं। |
| यक्ष | चार मुख्य गतियों में शामिल नहीं हैं। ✅ |
जैन धर्म की चार गतियाँ
| गति | अर्थ |
|---|---|
| देव गति | स्वर्गीय प्राणी |
| मनुष्य गति | मानव |
| तिर्यंच गति | पशु, पक्षी, वनस्पति आदि |
| नारकी गति | नरक के प्राणी |
महत्वपूर्ण तथ्य
-
मोक्ष केवल मनुष्य जन्म से ही प्राप्त किया जा सकता है।
-
आत्मा कर्मों के अनुसार विभिन्न गतियों में जन्म लेती है।
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जैन धर्म का प्रमुख सिद्धांत अहिंसा है, क्योंकि प्रत्येक जीव में आत्मा होती है।
प्राचीन भारत के संदर्भ में, गौतम बुद्ध को सामान्यतः निम्नलिखित में से किन विशेषणों से जाना जाता था?
नायपुत्त
शाक्यमुनि
तथागत
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2 और 3
गौतम बुद्ध को आमतौर पर कई विशेषणों से जाना जाता था जो उनके मूल और आध्यात्मिक उपलब्धि को दर्शाते थे। शाक्यमुनि का अर्थ है 'शाक्य कुल का मुनि' (उनका जन्म कुल), और तथागत का अर्थ है 'जो इस प्रकार गया/आया' (उनके ज्ञानोदय को दर्शाता है)। हालांकि, नायपुत्त (नाय का पुत्र) जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर के लिए प्रयुक्त विशेषण था, न कि बुद्ध के लिए।
❌ कथन 1 – गलत: नायपुत्त महावीर (जैन धर्म के संस्थापक) का विशेषण था, गौतम बुद्ध का नहीं।
✅ कथन 2 – सही: शाक्यमुनि का अर्थ 'शाक्य कुल का मुनि' है और यह बुद्ध के लिए एक सामान्य विशेषण था जो शाक्य कुल से संबंधित थे।
✅ कथन 3 – सही: तथागत, जिसका अर्थ है 'जो इस प्रकार गया/आया', बुद्ध के सबसे महत्वपूर्ण विशेषणों में से एक है जो उनके ज्ञानोदय को दर्शाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: गौतम बुद्ध के विशेषण और उपाधियाँ
- शाक्यमुनि: शाक्य कुल का मुनि; शाक्य गणराज्य में उनके जन्म को संदर्भित करता है
- तथागत: 'इस प्रकार गया' या 'इस प्रकार आया'; ज्ञान प्राप्त करने वाले को दर्शाता है और बुद्ध की प्रकृति का वर्णन करता है
- बुद्ध: 'जागृत' या 'ज्ञानी'
- सिद्धार्थ गौतम: उनका जन्म नाम; सिद्धार्थ का अर्थ है 'जिसने अपने लक्ष्यों को पूरा किया'
- भगवान/भगवत: 'धन्य' या 'प्रभु'
- सुगत: 'सुगमन' या 'सुभाषित'
- जिन: 'विजेता' (इच्छाओं और अज्ञान का)
- नोट: नायपुत्त (नाय का पुत्र) और महावीर (महान वीर) जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर वर्धमान के विशेषण थे
"आत्माएं केवल पशु और पौधों की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि चट्टानों, बहते पानी और कई अन्य प्राकृतिक वस्तुओं की भी हैं, जिन्हें अन्य धार्मिक संप्रदायों द्वारा जीवित नहीं माना जाता।" उपरोक्त कथन प्राचीन भारत के निम्नलिखित में से किस धार्मिक संप्रदाय की मूल मान्यताओं में से एक को दर्शाता है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — जैन धर्म
यह कथन इस मूलभूत जैन सिद्धांत को दर्शाता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड सजीव है। जैन दर्शन के अनुसार, आत्माएं (जीव) केवल मनुष्यों, पशुओं और पौधों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि चट्टानों (पृथ्वी), बहते पानी, वायु और अग्नि जैसे तत्वों में भी विद्यमान हैं। इन्हें स्थावर जीव (अचल जीवित प्राणी) या एकेंद्रिय (एक-इंद्रिय वाले प्राणी) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यह सत्तामूलक विश्वास जैन धर्म में अहिंसा के कठोर अभ्यास की नींव है, क्योंकि किसी भी प्राकृतिक तत्व को नुकसान पहुंचाना एक जीवित आत्मा को नुकसान पहुंचाना माना जाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: जीव का जैन सिद्धांत
- जीव (आत्मा): जैन धर्म का मानना है कि आत्माएं पदार्थ के सभी रूपों में मौजूद हैं—पारंपरिक मानकों के अनुसार जीवित और निर्जीव दोनों में।
- जीवों का वर्गीकरण: दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित: स्थावर (अचल) और त्रस (चल)।
- एकेंद्रिय (एक-इंद्रिय प्राणी): इसमें पृथ्वी-कायिक, जल-कायिक, अग्नि-कायिक, वायु-कायिक और वनस्पति-कायिक प्राणी शामिल हैं—सभी में केवल स्पर्श की इंद्रिय होती है।
- बहु-इंद्रिय प्राणी: दो-इंद्रिय (कीड़े) से लेकर पांच-इंद्रिय प्राणियों (मनुष्य, पशु) तक जिनमें क्रमशः अधिक इंद्रियां होती हैं।
- अहिंसा (अहिंसा): सार्वभौमिक आत्माओं में यह विश्वास जैन धर्म को अहिंसा के अभ्यास में सबसे कठोर धर्म बनाता है, यहां तक कि सबसे छोटे तत्वों को भी नुकसान पहुंचाने से बचा जाता है।
- अनेकांतवाद: अनेकांतवाद या दृष्टिकोणों की बहुलता का सिद्धांत—यह मानता है कि सत्य के कई पहलू हैं और कोई एक दृष्टिकोण पूर्ण नहीं है।
- अन्य धर्मों से अंतर: बौद्ध धर्म, शैव धर्म और वैष्णव धर्म चट्टानों और पानी जैसी निर्जीव प्राकृतिक वस्तुओं को आत्मा नहीं मानते हैं।
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