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संवैधानिक एवं प्रशासनिक विकास Previous Year Questions (PYQs)
Showing solved Previous Year Questions for Chapter: संवैधानिक एवं प्रशासनिक विकास
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निम्नलिखित दावे पर विचार करें:
समुदाय पर आधारित राजनीतिक गठबंधनों की उत्पत्ति मोंटेग-चेम्सफोर्ड सुधार, 1919 की प्रकृति में निहित थी।
निम्नलिखित में से कौन सा कथन उपरोक्त दावे का समर्थन/समर्थन करता है?
- सुधारों ने अलग निर्वाचन क्षेत्रों के सिद्धांत को बरकरार रखा और बढ़ाया।
- पृथक निर्वाचन क्षेत्रों को भारतीय राष्ट्रवाद का मुकाबला करना था, जो मजबूत हो रहा था।
- वंचित वर्ग अलग निर्वाचन क्षेत्रों में निहित लाभों के इर्द-गिर्द एकजुट हुए।
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
तीनों कथन इस Assertion का समर्थन करते हैं। मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919) ने पृथक निर्वाचन (Separate Electorates) की व्यवस्था को बनाए रखा और कई अन्य समुदायों तक इसका विस्तार किया, जिससे समुदाय आधारित राजनीति को बढ़ावा मिला।
ब्रिटिश सरकार ने इसे फूट डालो और राज करो की नीति के तहत बढ़ते राष्ट्रवादी आंदोलन को कमजोर करने के लिए इस्तेमाल किया। साथ ही, विभिन्न समुदाय और वंचित वर्ग अपने हितों और प्रतिनिधित्व के लिए संगठित होने लगे।
इसलिए विकल्प D (1, 2 और 3) सही उत्तर है।
| पृथक निर्वाचन (Separate Electorates) ऐसी व्यवस्था थी जिसमें किसी समुदाय के मतदाता केवल उसी समुदाय के उम्मीदवार को वोट दे सकते थे। यह व्यवस्था 1909 में मुसलमानों के लिए शुरू हुई और 1919 में इसका विस्तार किया गया। इससे भारत में साम्प्रदायिक राजनीति को बढ़ावा मिला। |
भारत सरकार अधिनियम, 1935 के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- इसमें ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और रियासतों के संघ पर आधारित एक अखिल भारतीय संघ की स्थापना का प्रावधान था।
- रक्षा और विदेशी मामलों को संघीय विधायिका के नियंत्रण में रखा गया।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
सही उत्तर: ✅ केवल 1 (Option A)
भारत शासन अधिनियम, 1935 ब्रिटिश शासन द्वारा लागू किया गया सबसे व्यापक संवैधानिक सुधार था। इसने अखिल भारतीय संघ (All India Federation) का प्रस्ताव दिया, लेकिन महत्वपूर्ण विषयों पर ब्रिटिश नियंत्रण बनाए रखा।
✅ कथन I सही है: इस अधिनियम ने ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और देशी रियासतों के संघ के रूप में All India Federation का प्रावधान किया था। लेकिन पर्याप्त रियासतों के शामिल न होने के कारण यह लागू नहीं हो सका।
❌ कथन II गलत है: रक्षा (Defence) और विदेश मामले (Foreign Affairs) संघीय विधानमंडल के अधीन नहीं थे। ये गवर्नर-जनरल के नियंत्रण में आरक्षित विषय थे।
संक्षिप्त नोट्स: भारत शासन अधिनियम, 1935
-
यह भारत के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा पारित सबसे बड़ा अधिनियम था।
-
इसमें All India Federation का प्रस्ताव दिया गया था।
-
प्रांतों में Provincial Autonomy (प्रांतीय स्वायत्तता) लागू की गई।
-
केंद्र में Dyarchy (द्वैध शासन) का प्रावधान किया गया, लेकिन लागू नहीं हुआ।
-
1937 में Federal Court की स्थापना की गई।
-
शक्तियों को Federal, Provincial और Concurrent Lists में बाँटा गया।
-
Separate Electorates की व्यवस्था को जारी रखा गया।
-
इसके कई प्रावधान बाद में भारतीय संविधान, 1950 का आधार बने।
निम्नलिखित में से किस एक अधिनियम द्वारा बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल नामित किया गया?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1833 का चार्टर अधिनियम
1833 का चार्टर अधिनियम एक ऐतिहासिक कानून था जिसने ब्रिटिश भारत में प्रशासनिक नियंत्रण को केंद्रीकृत किया। इसने बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत के गवर्नर जनरल के रूप में पुनः नामित किया, जिससे उन्हें भारत में ब्रिटिश क्षेत्रीय अधिकारों पर एकीकृत नागरिक और सैन्य शक्तियों के साथ संपूर्ण अधिकार प्रदान किया गया। लॉर्ड विलियम बेंटिंक इस अधिनियम के तहत भारत के पहले गवर्नर जनरल बने, जिसने बॉम्बे और मद्रास के गवर्नरों की विधायी शक्तियों को भी समाप्त कर दिया और संपूर्ण ब्रिटिश भारत के लिए विशेष विधायी अधिकार गवर्नर जनरल में निहित कर दिया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: चार्टर अधिनियम और संवैधानिक विकास
| अधिनियम | वर्ष | प्रमुख प्रावधान |
|---|---|---|
| रेगुलेटिंग एक्ट | 1773 | बंगाल के गवर्नर जनरल का पद सृजित (वारेन हेस्टिंग्स); कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना |
| पिट्स इंडिया एक्ट | 1784 | दोहरी सरकार प्रणाली की स्थापना; बोर्ड ऑफ कंट्रोल का गठन |
| चार्टर अधिनियम | 1793 | कंपनी के व्यापार एकाधिकार को 20 वर्षों के लिए विस्तारित; बोर्ड ऑफ कंट्रोल सदस्यों के वेतन में वृद्धि |
| चार्टर अधिनियम | 1813 | चाय और चीन व्यापार को छोड़कर कंपनी के व्यापार एकाधिकार की समाप्ति; शिक्षा को बढ़ावा |
| चार्टर अधिनियम | 1833 | बंगाल का गवर्नर जनरल भारत का गवर्नर जनरल बना; कंपनी के वाणिज्यिक कार्यों की समाप्ति; भारतीयों के लिए सिविल सेवाएं खोली गईं |
| चार्टर अधिनियम | 1853 | विधायी और कार्यकारी कार्यों को पृथक किया; सिविल सेवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षा की शुरुआत |
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भारत सरकार अधिनियम 1919 में, प्रांतीय सरकार के कार्यों को "आरक्षित" और "हस्तांतरित" विषयों में विभाजित किया गया था। निम्नलिखित में से किन्हें "आरक्षित" विषयों के रूप में माना गया था?
- न्याय प्रशासन
- स्थानीय स्वशासन
- भू-राजस्व
- पुलिस
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1, 3 और 4
भारत सरकार अधिनियम 1919 ने प्रांतों में द्वैध शासन की व्यवस्था शुरू की, जिसमें विषयों को 'आरक्षित' (गवर्नर और कार्यकारी परिषद द्वारा नियंत्रित) और 'हस्तांतरित' (भारतीय मंत्रियों द्वारा प्रशासित) में विभाजित किया गया। आरक्षित विषयों को अधिक महत्वपूर्ण माना गया और इनमें न्याय प्रशासन, भू-राजस्व और पुलिस शामिल थे, जबकि स्थानीय स्वशासन एक हस्तांतरित विषय था।
✅ कथन 1 – सही: न्याय प्रशासन गवर्नर के नियंत्रण में एक आरक्षित विषय था।
❌ कथन 2 – गलत: स्थानीय स्वशासन एक हस्तांतरित विषय था, जो भारतीय मंत्रियों द्वारा प्रशासित था।
✅ कथन 3 – सही: भू-राजस्व एक आरक्षित विषय था, क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण वित्तीय मामला था।
✅ कथन 4 – सही: पुलिस एक आरक्षित विषय था, जो कानून और व्यवस्था से संबंधित था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत द्वैध शासन
| श्रेणी | आरक्षित विषय | हस्तांतरित विषय |
|---|---|---|
| नियंत्रण | गवर्नर व कार्यकारी परिषद (ब्रिटिश अधिकारी) | गवर्नर व भारतीय मंत्री (निर्वाचित) |
| प्रकृति | महत्वपूर्ण/संवेदनशील मामले | कम महत्वपूर्ण/राष्ट्र-निर्माण गतिविधियाँ |
| उदाहरण | कानून और व्यवस्था, पुलिस, न्याय, भू-राजस्व, सिंचाई, वित्त | शिक्षा, जनस्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, लोक निर्माण, कृषि, आबकारी |
| मंत्रियों की जवाबदेही | कार्यकारी परिषद विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं | भारतीय मंत्री प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी |
| उद्देश्य | प्रमुख क्षेत्रों पर ब्रिटिश नियंत्रण बनाए रखना | शासन में भारतीयों की क्रमिक भागीदारी |
- द्वैध शासन का शाब्दिक अर्थ है 'दोहरी सरकार' - मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919) के भाग के रूप में शुरू किया गया
- भारतीय नेताओं ने इस व्यवस्था की आलोचना की क्योंकि इसने अधिकार का विभाजन किया और व्यवहार में अकार्यकारी थी
- भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा समाप्त किया गया, जिसने प्रांतीय स्वायत्तता की शुरुआत की
क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- संविधान सभा में प्रांतीय विधानसभाओं के साथ-साथ रियासतों द्वारा मनोनीत सदस्य होंगे।
- कोई भी प्रांत, जो नए संविधान को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, उसे अपनी भावी स्थिति के संबंध में ब्रिटेन के साथ एक अलग समझौता करने का अधिकार होगा।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
क्रिप्स मिशन (1942) ने संवैधानिक व्यवस्थाओं का प्रस्ताव दिया था जिसमें नए संविधान को स्वीकार न करने वाले प्रांतों के लिए प्रावधान शामिल थे। कथन 2 सही है क्योंकि यह इस प्रस्ताव को सटीक रूप से दर्शाता है, जबकि कथन 1 में संविधान सभा की संरचना के संबंध में एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण त्रुटि है।
❌ कथन 1 – गलत: क्रिप्स मिशन ने प्रस्ताव दिया था कि संविधान सभा के सदस्य प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा निर्वाचित होंगे, लेकिन रियासतों के मामले में शासकों द्वारा मनोनीत होंगे। कथन में दोनों के लिए "मनोनीत" शब्द का उपयोग किया गया है, जो प्रांतीय विधानसभाओं के लिए तथ्यात्मक रूप से गलत है।
✅ कथन 2 – सही: मिशन ने स्पष्ट रूप से उन प्रांतों को अनुमति दी जो नए संविधान को स्वीकार नहीं करते, उन्हें अपनी भावी स्थिति के संबंध में ब्रिटेन के साथ अलग समझौते पर हस्ताक्षर करने का अधिकार था, जिससे उन्हें बाहर निकलने का प्रावधान मिला।
📝 संक्षिप्त नोट्स: क्रिप्स मिशन (1942)
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| पृष्ठभूमि | ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल द्वारा मार्च 1942 में भेजा गया, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सहयोग सुरक्षित करने के लिए |
| मुख्य प्रस्ताव | • युद्ध के बाद भारत के लिए डोमिनियन स्टेटस • प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा निर्वाचित और रियासती शासकों द्वारा मनोनीत सदस्यों के साथ संविधान निर्माण निकाय • प्रांत बाहर निकल सकते थे और अलग संघ बना सकते थे • युद्ध के दौरान रक्षा पर ब्रिटिश नियंत्रण |
| अस्वीकृति का कारण | • कांग्रेस युद्ध के बाद के वादों के बजाय तत्काल सत्ता हस्तांतरण चाहती थी • मुस्लिम लीग ने समूहीकरण सूत्र पर आपत्ति की • युद्ध के दौरान सत्ता का कोई वास्तविक हस्तांतरण नहीं • बाहर निकलने के खंड में विभाजन का अंतर्निहित प्रावधान |
| गांधी की टिप्पणी | इसे "दिवालिया बैंक पर पोस्ट-डेटेड चेक" कहा |
| महत्व | भारत की स्वतंत्रता के अधिकार की पहली ब्रिटिश स्वीकृति; रियासतों के महत्व को मान्यता; विभाजन के सिद्धांत को स्वीकार किया |
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने 21 वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाओं को मताधिकार देने की सिफारिश की।
- 1935 के भारत सरकार अधिनियम ने महिलाओं को विधानमंडल में आरक्षित सीटें प्रदान कीं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने सीमित निर्वाचन सुधार शुरू किए लेकिन 21 वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाओं को सार्वभौमिक मताधिकार प्रदान नहीं किया। हालांकि, 1935 के भारत सरकार अधिनियम ने स्पष्ट रूप से प्रांतीय और केंद्रीय विधानमंडलों दोनों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का प्रावधान किया, जो महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
❌ कथन 1 – गलत: मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने 21 वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाओं को मताधिकार देने की सिफारिश नहीं की; मताधिकार संपत्ति, आय और शिक्षा योग्यताओं के आधार पर प्रतिबंधित रहा।
✅ कथन 2 – सही: 1935 के भारत सरकार अधिनियम ने महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए प्रांतीय और केंद्रीय विधानमंडलों में उनके लिए आरक्षित सीटें शुरू कीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: संवैधानिक सुधार (1919-1935)
| विशेषता | भारत सरकार अधिनियम, 1919 | भारत सरकार अधिनियम, 1935 |
|---|---|---|
| निर्वाचन सुधार | प्रतिबंधित आधार पर मताधिकार का विस्तार (संपत्ति, आय, शिक्षा); महिलाओं के लिए सार्वभौमिक मताधिकार नहीं | प्रांतीय और केंद्रीय विधानमंडलों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें |
| प्रांतीय प्रशासन | द्वैध शासन की शुरुआत (हस्तांतरित और आरक्षित विषय) | द्वैध शासन समाप्त; प्रांतीय स्वायत्तता की शुरुआत |
| केंद्रीय विधानमंडल | द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना | संघीय संरचना का प्रस्ताव (कभी लागू नहीं हुआ) |
| विषयों का विभाजन | केंद्रीय और प्रांतीय सूचियाँ | संघीय, प्रांतीय और समवर्ती सूचियाँ |
| सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व | पृथक निर्वाचक मंडल जारी | महिलाओं सहित अधिक समुदायों तक विस्तारित |
| न्यायिक पहलू | - | भारत के संघीय न्यायालय की स्थापना |
'1813 के चार्टर अधिनियम' के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- इसने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार एकाधिकार को समाप्त कर दिया, चाय के व्यापार और चीन के साथ व्यापार को छोड़कर।
- इसने कंपनी द्वारा धारित भारतीय क्षेत्रों पर ब्रिटिश राजशाही की संप्रभुता की पुष्टि की।
- भारत के राजस्व अब ब्रिटिश संसद द्वारा नियंत्रित किए जाते थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 2
1813 का चार्टर अधिनियम एक ऐतिहासिक कानून था जिसने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार एकाधिकार को समाप्त कर दिया (चाय और चीन व्यापार को छोड़कर) और भारतीय क्षेत्रों पर ब्रिटिश राजशाही की संप्रभुता की स्पष्ट रूप से पुष्टि की। हालांकि, भारतीय राजस्व पर प्रत्यक्ष संसदीय नियंत्रण इस अधिनियम द्वारा स्थापित नहीं किया गया था।
✅ कथन 1 – सही: इस अधिनियम ने भारत में कंपनी के व्यापार एकाधिकार को समाप्त कर दिया, सभी ब्रिटिश व्यापारियों के लिए व्यापार खोल दिया, लेकिन चाय और चीन के साथ व्यापार पर एकाधिकार को अगले 20 वर्षों के लिए बरकरार रखा।
✅ कथन 2 – सही: इस अधिनियम ने कंपनी द्वारा धारित भारतीय क्षेत्रों पर ब्रिटिश राजशाही की संप्रभुता की स्पष्ट रूप से पुष्टि की, जो ब्रिटिश-भारत संबंधों में एक संवैधानिक मील का पत्थर था।
❌ कथन 3 – गलत: अधिनियम ने वाणिज्यिक और क्षेत्रीय राजस्व के लिए अलग खाते बनाए रखने की आवश्यकता रखी, लेकिन भारतीय राजस्व पर प्रत्यक्ष संसदीय नियंत्रण केवल 1858 के भारत सरकार अधिनियम के माध्यम से कंपनी के शासन की समाप्ति के बाद स्थापित किया गया था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: चार्टर अधिनियम और कंपनी शासन
| अधिनियम/वर्ष | प्रमुख प्रावधान |
|---|---|
| नियामक अधिनियम 1773 | गवर्नर-जनरल का पद सृजित; कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना; कंपनी के मामलों को ब्रिटिश सरकार की जांच के अधीन किया |
| पिट्स इंडिया एक्ट 1784 | दोहरी नियंत्रण प्रणाली: निदेशक मंडल (वाणिज्यिक) और नियंत्रण बोर्ड (राजनीतिक); वाणिज्यिक और राजनीतिक कार्यों को अलग किया |
| चार्टर अधिनियम 1813 | व्यापार एकाधिकार समाप्त (चाय और चीन व्यापार को छोड़कर); राजशाही की संप्रभुता की पुष्टि; शिक्षा के लिए धन आवंटित; ईसाई मिशनरियों को अनुमति |
| चार्टर अधिनियम 1833 | कंपनी की सभी वाणिज्यिक गतिविधियां समाप्त; बंगाल का गवर्नर-जनरल भारत का गवर्नर-जनरल बना; केंद्रीकृत प्रशासन |
| चार्टर अधिनियम 1853 | विधायी और कार्यकारी कार्यों को अलग किया; सिविल सेवाओं के लिए खुली प्रतियोगिता शुरू की; ब्रिटिश संसद का नियंत्रण विस्तारित |
| भारत सरकार अधिनियम 1858 | कंपनी से क्राउन को सत्ता हस्तांतरित; भारत के लिए राज्य सचिव का पद सृजित; कंपनी शासन पूर्णतः समाप्त |
भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा स्थापित संघ में, अवशिष्ट शक्तियाँ किसे दी गई थीं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — गवर्नर जनरल
भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत, अवशिष्ट शक्तियाँ (जो संघीय, प्रांतीय या समवर्ती सूची में शामिल नहीं थीं) गवर्नर जनरल में निहित थीं। उन्हें यह निर्णय लेने का अधिकार था कि ऐसे विषयों पर कौन सा विधानमंडल शक्ति का प्रयोग करेगा। यह 1935 अधिनियम की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी जो वर्तमान संविधान से भिन्न थी, जहाँ अनुच्छेद 248 के तहत अवशिष्ट शक्तियाँ संघ की संसद में निहित हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत सरकार अधिनियम, 1935 - विधायी शक्तियाँ
| विशेषता | भारत सरकार अधिनियम, 1935 | भारत का संविधान (1950) |
|---|---|---|
| विधायी सूचियाँ | तीन सूचियाँ: संघीय, प्रांतीय, समवर्ती | तीन सूचियाँ: संघ, राज्य, समवर्ती |
| अवशिष्ट शक्तियाँ | गवर्नर जनरल में निहित | संघ की संसद में निहित (अनुच्छेद 248) |
| संघीय सूची | 59 विषय (केंद्र) | संघ सूची: प्रारंभ में 97 विषय |
| प्रांतीय सूची | 54 विषय (प्रांत) | राज्य सूची: प्रारंभ में 66 विषय |
| समवर्ती सूची | 36 विषय (दोनों) | समवर्ती सूची: प्रारंभ में 47 विषय |
| संघ की प्रकृति | संघीय प्रणाली प्रस्तावित (पूर्णतः लागू नहीं हुई) | सशक्त केंद्र के साथ अर्ध-संघीय |
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, "द्वैध शासन (Dyarchy)" का सिद्धांत किसे संदर्भित करता है -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — प्रांतों को सौंपे गए विषयों का दो श्रेणियों में विभाजन।
द्वैध शासन को भारत सरकार अधिनियम, 1919 द्वारा प्रांतीय स्तर पर दोहरे शासन की व्यवस्था के रूप में लागू किया गया था। इस व्यवस्था के तहत, प्रांतीय विषयों को दो श्रेणियों में बांटा गया: 'आरक्षित' विषय (गवर्नर और उनकी कार्यकारी परिषद द्वारा नियंत्रित) और 'हस्तांतरित' विषय (विधानमंडल के प्रति जवाबदेह भारतीय मंत्रियों द्वारा नियंत्रित)। यह उत्तरदायी सरकार का एक प्रयोग था, हालांकि इसे सीमित सफलता मिली।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- फैक्टरी एक्ट, 1881 औद्योगिक श्रमिकों की मजदूरी तय करने और श्रमिकों को ट्रेड यूनियन बनाने की अनुमति देने के उद्देश्य से पारित किया गया था।
- N.M. लोखंडे ब्रिटिश भारत में श्रम आंदोलन के संगठन में अग्रणी थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 2
❌ कथन 1 – गलत: फैक्टरी एक्ट, 1881 मुख्य रूप से फैक्ट्रियों में बच्चों की कार्य स्थितियों को नियंत्रित करने से संबंधित था, न कि मजदूरी तय करने या ट्रेड यूनियनों की अनुमति देने से। इसने 7 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के रोजगार को प्रतिबंधित किया, बच्चों (7-12 वर्ष) के लिए काम के घंटे प्रति दिन 9 घंटे तक सीमित किए, और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी अनिवार्य की। इस अधिनियम में मजदूरी निर्धारण या ट्रेड यूनियन गठन को संबोधित नहीं किया गया—ये पहलू बाद के श्रम कानूनों में आए।
✅ कथन 2 – सही: N.M. लोखंडे (नारायण मेघाजी लोखंडे) को ब्रिटिश भारत में श्रम आंदोलन के अग्रणी के रूप में मान्यता प्राप्त है। उन्होंने 1890 में बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन की स्थापना की, जो भारत में पहले श्रम संगठनों में से एक था। उन्होंने श्रमिकों के अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से अभियान चलाया, जिसमें ठेका प्रथा का उन्मूलन, साप्ताहिक छुट्टियाँ और कम काम के घंटे शामिल थे। उनके प्रयासों से बॉम्बे में औद्योगिक श्रमिकों की कार्य स्थितियों में महत्वपूर्ण सुधार हुए।
1927 की बटलर समिति का उद्देश्य क्या था?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — भारत सरकार और भारतीय रियासतों के बीच संबंधों में सुधार करना।
बटलर समिति की नियुक्ति दिसंबर 1927 में सर हार्कोर्ट बटलर की अध्यक्षता में की गई थी ताकि ब्रिटिश भारत सरकार और भारतीय रियासतों के बीच संबंधों की जांच की जा सके। समिति का उद्देश्य परमोच्चता (रियासतों पर ब्रिटिश क्राउन का सर्वोच्च अधिकार) की प्रकृति को स्पष्ट करना और शासकों की शिकायतों को दूर करना था। इसने सिफारिश की कि भारतीय रियासतें वायसराय के माध्यम से सीधे क्राउन से संबंध रखें, न कि भारत सरकार के माध्यम से। यह समिति ब्रिटिश राज के दौरान परमोच्च शक्ति और देशी रियासतों के बीच राजनीतिक संबंधों को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण थी।
मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड प्रस्ताव किससे संबंधित थे -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — संवैधानिक सुधार
मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड प्रस्ताव (1918) ब्रिटिश भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए सिफारिशें थीं, जो एडविन मांटेग्यू (भारत के राज्य सचिव) और लॉर्ड चेम्सफोर्ड (भारत के वायसराय) द्वारा प्रस्तुत की गई थीं। इन प्रस्तावों ने भारत सरकार अधिनियम 1919 का आधार बनाया, जिसने प्रांतों में द्वैध शासन प्रणाली (विषयों को हस्तांतरित और आरक्षित श्रेणियों में विभाजित करना) शुरू की, केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल (राज्य परिषद और विधान सभा) स्थापित किया, पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव शुरू किए (हालांकि सीमित मताधिकार के साथ), और प्रांतीय तथा केंद्रीय बजट को अलग किया। इन सुधारों का उद्देश्य भारत में उत्तरदायी सरकार की क्रमिक शुरुआत करना था।
सर स्टैफोर्ड क्रिप्स की योजना में परिकल्पना की गई थी कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद -
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — भारत को डोमिनियन का दर्जा दिया जाना चाहिए
मार्च 1942 के क्रिप्स मिशन, जिसका नेतृत्व सर स्टैफोर्ड क्रिप्स ने किया था, में प्रस्तावित किया गया कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन का दर्जा दिया जाएगा और संविधान सभा के माध्यम से अपना संविधान बनाने का अधिकार दिया जाएगा। योजना में यह परिकल्पना थी कि जो प्रांत भारतीय संघ में शामिल नहीं होना चाहते, वे अपने संविधान के साथ अलग संघ बना सकते हैं। हालांकि, योजना में तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता या विभाजन का वादा नहीं था; बल्कि युद्ध के बाद कनाडा या ऑस्ट्रेलिया जैसा डोमिनियन दर्जा दिया गया, जिससे भारत ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में रह सके। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया—कांग्रेस ने तत्काल स्वतंत्रता की मांग की, जबकि लीग को अलग संघों से संबंधित प्रावधान अपर्याप्त लगे। मिशन अंततः युद्ध प्रयासों के लिए भारतीय सहयोग सुरक्षित करने में विफल रहा।
कैबिनेट मिशन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- इसने एक संघीय सरकार की सिफारिश की।
- इसने भारतीय न्यायालयों की शक्तियों का विस्तार किया।
- इसने ICS में अधिक भारतीयों का प्रावधान किया।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
✅ कथन 1 – सही: कैबिनेट मिशन (1946) ने एक संघीय ढांचे की सिफारिश की जिसमें केवल रक्षा, विदेशी मामले और संचार को नियंत्रित करने वाला कमज़ोर केंद्र हो, जबकि प्रांतों को अन्य मामलों में स्वायत्तता हो।
❌ कथन 2 – गलत: मिशन ने भारतीय न्यायालयों की शक्तियों के बारे में कोई बदलाव प्रस्तावित नहीं किया; यह केवल सत्ता हस्तांतरण के लिए संवैधानिक ढांचे पर केंद्रित था।
❌ कथन 3 – गलत: मिशन ने भारतीय सिविल सेवा (ICS) या इसमें भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने के बारे में कोई सिफारिश नहीं की।
भारत सरकार अधिनियम 1919 ने स्पष्ट रूप से परिभाषित किया -
Detailed Explanation:
भारत सरकार अधिनियम 1919 (जिसे मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है) ने विषयों को केंद्रीय सूची और प्रांतीय सूची में विभाजित करके केंद्र और प्रांतीय सरकारों के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया, जिससे प्रांतों पर केंद्रीय नियंत्रण कम हुआ।
इस अधिनियम ने प्रांतीय स्तर पर द्वैध शासन की शुरुआत की, जिसमें प्रांतीय विषयों को हस्तांतरित विषयों (गवर्नर द्वारा विधान परिषद के प्रति जवाबदेह मंत्रियों के साथ प्रशासित) और आरक्षित विषयों (गवर्नर द्वारा कार्यकारी परिषद के साथ प्रशासित) में विभाजित किया गया।
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