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भारतीय स्थापत्य कला Previous Year Questions (PYQs)
Showing solved Previous Year Questions for Chapter: भारतीय स्थापत्य कला
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निम्नलिखित में से किस मंदिर में नागर शैली का शिखर है?
- मालेगिट्टी शिवालय, बादामी
- हुचिमल्लीगुडी मंदिर, ऐहोल
- दशावतार मंदिर, देवगढ़
- विरुपाक्ष मंदिर, पत्तदकल
नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके उत्तर चुनें:
Detailed Explanation:
नागर शैली की पहचान इसकी घुमावदार (Curvilinear) शिखर से होती है और यह मुख्यतः उत्तर भारत में विकसित हुई।
-
कथन 1 गलत है: मालेगिट्टी शिवालय, बादामी द्रविड़ शैली का मंदिर है, इसमें नागर शैली का शिखर नहीं है।
-
कथन 2 सही है: हुचिमल्लिगुड़ी मंदिर, ऐहोल में नागर शैली का घुमावदार शिखर पाया जाता है।
-
कथन 3 सही है: दशावतार मंदिर, देवगढ़ नागर शैली के सबसे प्राचीन उदाहरणों में से एक है।
-
कथन 4 गलत है: विरुपाक्ष मंदिर, पट्टडकल द्रविड़ शैली का मंदिर है और इसमें पिरामिडाकार विमाना है।
-
अतः कथन 2 और 3 सही हैं, इसलिए सही उत्तर विकल्प (B) है।
नागर एवं द्रविड़ मंदिर वास्तुकला
| विशेषता | नागर शैली | द्रविड़ शैली |
|---|---|---|
| क्षेत्र | उत्तर भारत | दक्षिण भारत |
| शिखर | घुमावदार (Curvilinear) | पिरामिडाकार (Vimana) |
| शीर्ष भाग | आमलक एवं कलश | स्तूपिका |
| उदाहरण | दशावतार मंदिर, खजुराहो मंदिर | बृहदेश्वर मंदिर, विरुपाक्ष मंदिर |
महत्वपूर्ण तथ्य
-
ऐहोल को "भारतीय मंदिर वास्तुकला की जननी (Cradle of Indian Temple Architecture)" कहा जाता है।
-
पट्टडकल में नागर और द्रविड़ दोनों शैलियों के मंदिर मिलते हैं।
-
दशावतार मंदिर, देवगढ़ गुप्तकालीन नागर शैली का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
याद रखने की ट्रिक:
👉 Nagara = North = Curved Shikhara
👉 Dravida = South = Pyramid Tower
प्राचीन भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- स्तूप की अवधारणा बौद्ध मूल की है।
- स्तूप सामान्यतः अवशेषों का भंडार था।
- स्तूप बौद्ध परंपरा में एक मनौती और स्मारकीय संरचना थी।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो
तीन कथनों में से केवल कथन 2 और 3 सही हैं। जबकि स्तूप वास्तव में अवशेषों के भंडार थे और बौद्ध परंपरा में मनौती और स्मारकीय संरचनाओं के रूप में कार्य करते थे, स्तूप की अवधारणा स्वयं बौद्ध धर्म से पूर्व की है और बौद्ध-पूर्व शवाधान टीलों के रूप में उत्पन्न हुई थी।
❌ कथन 1 – गलत: स्तूप की अवधारणा बौद्ध मूल की नहीं है; यह बौद्ध-पूर्व काल में शवाधान टीलों के रूप में अस्तित्व में थी और बाद में बौद्ध धर्म द्वारा इसे अपनाया गया और एक पवित्र स्मारक में परिवर्तित किया गया।
✅ कथन 2 – सही: स्तूप सामान्यतः अवशेषों के भंडार के रूप में कार्य करते थे, जिनमें बुद्ध या आदरणीय बौद्ध भिक्षुओं के भौतिक अवशेष या सामान होते थे।
✅ कथन 3 – सही: स्तूप मनौती (भक्ति प्रसाद) और स्मारकीय संरचनाओं के रूप में कार्य करते थे, जो बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को चिह्नित करते थे या धार्मिक भक्ति व्यक्त करते थे।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्राचीन भारत में स्तूप
- बौद्ध-पूर्व उत्पत्ति: स्तूप मूलतः बौद्ध धर्म के उदय से पहले प्राचीन भारत में शवाधान टीलों (चैत्य) के रूप में अस्तित्व में थे।
- बौद्ध अंगीकरण: बौद्ध धर्म ने स्तूप को अपनाया और इसे एक केंद्रीय धार्मिक स्मारक में परिवर्तित किया, विशेष रूप से बुद्ध के परिनिर्वाण (483 ईसा पूर्व) के बाद।
- उद्देश्य: स्तूप तीन कार्य करते थे - पवित्र अवशेषों (शरीर) के भंडार, महत्वपूर्ण बौद्ध घटनाओं को चिह्नित करने वाले स्मारकीय स्मारक, और भक्ति के कृत्यों के रूप में निर्मित मनौती संरचनाएं।
- मुख्य घटक: एक विशिष्ट स्तूप में अर्धगोलाकार गुंबद (अंड), एक वर्गाकार रेलिंग (हर्मिका), और एक छत्र जैसी संरचना (छत्रावली) होती है।
- प्रसिद्ध उदाहरण: सांची स्तूप (मध्य प्रदेश), अमरावती स्तूप (आंध्र प्रदेश), और धामेक स्तूप (सारनाथ) विभिन्न स्थापत्य शैलियों और कालों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- परिक्रमा: भक्तजन पूजा और ध्यान के रूप में स्तूपों के चारों ओर प्रदक्षिणा (दक्षिणावर्त चलना) करते हैं।
निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में धान्यकटक स्थित था, जो महासांघिकों के अधीन एक प्रमुख बौद्ध केंद्र के रूप में समृद्ध हुआ?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — आंध्र
धान्यकटक (आधुनिक अमरावती, आंध्र प्रदेश) दक्षिण भारत के आंध्र क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन नगर था। यह महासांघिक संप्रदाय के अधीन एक प्रमुख बौद्ध केंद्र के रूप में समृद्ध हुआ, जो प्रारंभिक बौद्ध संप्रदायों में से एक था और जिसने बाद में महायान बौद्ध धर्म के विकास को प्रभावित किया। यह स्थल अपने भव्य स्तूप और मूर्तिकला कला के लिए प्रसिद्ध है, जो इसे प्राचीन काल में एक प्रमुख तीर्थ और शिक्षा केंद्र बनाता है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत के प्राचीन बौद्ध केंद्र
| बौद्ध केंद्र | क्षेत्र/स्थान | संबद्ध संप्रदाय/महत्व |
|---|---|---|
| धान्यकटक (अमरावती) | आंध्र प्रदेश | महासांघिक संप्रदाय; विस्तृत मूर्तिकला के साथ प्रसिद्ध स्तूप |
| तक्षशिला | गांधार (पाकिस्तान) | प्रमुख शिक्षा केंद्र; गांधार कला शैली |
| नालंदा | मगध (बिहार) | महान मठवासी विश्वविद्यालय; महायान बौद्ध धर्म |
| विक्रमशिला | मगध (बिहार) | धर्मपाल द्वारा स्थापित; तांत्रिक बौद्ध धर्म |
| सांची | मध्य प्रदेश | अशोक द्वारा निर्मित प्रसिद्ध स्तूप |
| धौली | कलिंग (ओडिशा) | अशोक के शिलालेख; कलिंग युद्ध का स्थल |
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निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए :
स्थल : प्रसिद्धि
- बेसनगर : शैव गुफा मंदिर
- भाजा : बौद्ध गुफा मंदिर
- सित्तनवासल : जैन गुफा मंदिर
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो
दिए गए तीन युग्मों में से दो सही सुमेलित हैं। भाजा बौद्ध गुफा मंदिरों (पुणे के पास 2री शताब्दी ईसा पूर्व की शैलकृत गुफाएं) से सही रूप से जुड़ा है, और सित्तनवासल जैन गुफा मंदिरों (तमिलनाडु में प्राचीन जैन स्मारक) के लिए सही रूप से जाना जाता है। हालांकि, बेसनगर (विदिशा, मध्य प्रदेश) विशेष रूप से शैव गुफा मंदिर के लिए नहीं जाना जाता है; यह हेलिओडोरस स्तंभ के लिए अधिक प्रसिद्ध है, जो भगवान विष्णु को समर्पित एक प्राचीन गरुड़ स्तंभ है, साथ ही बौद्ध, जैन और हिंदू मंदिरों के अवशेष भी हैं।
❌ युग्म 1 (बेसनगर : शैव गुफा मंदिर) – गलत: बेसनगर (विदिशा) मुख्य रूप से हेलिओडोरस स्तंभ (विष्णु को समर्पित गरुड़ स्तंभ) के लिए जाना जाता है, शैव गुफा मंदिर के लिए नहीं।
✅ युग्म 2 (भाजा : बौद्ध गुफा मंदिर) – सही: महाराष्ट्र में भाजा गुफाएं 2री शताब्दी ईसा पूर्व की प्रसिद्ध शैलकृत बौद्ध गुफाएं हैं।
✅ युग्म 3 (सित्तनवासल : जैन गुफा मंदिर) – सही: तमिलनाडु में सित्तनवासल सुंदर भित्तिचित्रों वाले प्राचीन जैन गुफा मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: भारत के प्रसिद्ध गुफा मंदिर
| स्थल | स्थान | धार्मिक संबद्धता | प्रमुख विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| भाजा गुफाएं | महाराष्ट्र (पुणे के पास) | बौद्ध | 22 शैलकृत गुफाएं, 2री शताब्दी ईसा पूर्व, हीनयान वास्तुकला |
| सित्तनवासल | तमिलनाडु (पुदुक्कोट्टई) | जैन | भित्तिचित्रों वाला प्राचीन जैन गुफा मंदिर, अर्धनारी गुफा |
| एलिफेंटा गुफाएं | महाराष्ट्र (मुंबई) | शैव (हिंदू) | यूनेस्को स्थल, शिव की प्रसिद्ध त्रिमूर्ति मूर्ति |
| अजंता गुफाएं | महाराष्ट्र (औरंगाबाद) | बौद्ध | यूनेस्को स्थल, चित्रों और मूर्तियों वाली 30 गुफाएं |
| एलोरा गुफाएं | महाराष्ट्र (औरंगाबाद) | बौद्ध, हिंदू, जैन | 34 गुफाएं, कैलास मंदिर (गुफा 16), यूनेस्को स्थल |
| बादामी गुफाएं | कर्नाटक | हिंदू और जैन | 4 गुफाएं, चालुक्य वास्तुकला, 6ठी शताब्दी |
| उदयगिरि गुफाएं | मध्य प्रदेश (विदिशा) | हिंदू (वैष्णव) | गुप्त काल, वराह मूर्ति |
प्रधानमंत्री ने हाल ही में वेरावल में सोमनाथ मंदिर के पास नए सर्किट हाउस का उद्घाटन किया।
सोमनाथ मंदिर के संबंध में निम्नलिखित में से कौन से कथन सही हैं?
- सोमनाथ मंदिर ज्योतिर्लिंग तीर्थों में से एक है।
- सोमनाथ मंदिर का विवरण अल-बिरूनी द्वारा दिया गया था।
- सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा (वर्तमान मंदिर की स्थापना) राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन द्वारा की गई थी।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1 और 2
यह प्रश्न सोमनाथ मंदिर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के बारे में ज्ञान का परीक्षण करता है। कथन 3 गलत है क्योंकि प्रतिष्ठा डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी, न कि डॉ. एस. राधाकृष्णन द्वारा।
✅ कथन 1 – सही: सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंग तीर्थों में से एक है, जो इसे हिंदू धर्म में सबसे पूजनीय तीर्थ स्थलों में से एक बनाता है।
✅ कथन 2 – सही: फारसी विद्वान अल-बिरूनी, जो महमूद गजनवी के साथ आए थे, ने अपने लेखन में सोमनाथ मंदिर की भव्यता का दस्तावेजीकरण किया, इसे 10वीं शताब्दी के आसपास निर्मित एक पत्थर की संरचना बताया जो तीन तरफ से समुद्र द्वारा सुरक्षित थी।
❌ कथन 3 – गलत: 1951 में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा (अभिषेक) भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी, न कि डॉ. एस. राधाकृष्णन (जो दूसरे राष्ट्रपति थे) द्वारा।
📝 संक्षिप्त नोट्स: सोमनाथ मंदिर
- स्थान: वेरावल (प्रभास पाटन), गुजरात, भारत के पश्चिमी तट पर
- धार्मिक महत्व: 12 ज्योतिर्लिंग तीर्थों में से एक, इन्हें पहला माना जाता है
- ऐतिहासिक विनाश: मंदिर को कई बार नष्ट और पुनर्निर्मित किया गया; विशेष रूप से 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी द्वारा
- अल-बिरूनी का विवरण: मंदिर की शानदार वास्तुकला और संपत्ति का वर्णन किया, जिसने आक्रमणों को आकर्षित किया
- आधुनिक पुनर्निर्माण: 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल और के.एम. मुंशी द्वारा शुरू किया गया; 1951 में पूर्ण हुआ
- प्रतिष्ठा (1951): 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा संपन्न
- स्थापत्य शैली: वर्तमान संरचना बलुआ पत्थर का उपयोग करते हुए मंदिर वास्तुकला की चालुक्य शैली में निर्मित
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
अशोक के प्रमुख शिलालेखों का स्थल — राज्य में स्थान
धौली — ओडिशा
एर्रागुडी — आंध्र प्रदेश
जौगड़ — मध्य प्रदेश
कालसी — कर्नाटक
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल दो युग्म
यह प्रश्न अशोक के प्रमुख शिलालेखों के भौगोलिक स्थानों के ज्ञान का परीक्षण करता है। दिए गए चार युग्मों में से केवल दो सही सुमेलित हैं: धौली (ओडिशा) और एर्रागुडी (आंध्र प्रदेश)। अन्य दो स्थान गलत सुमेलित हैं।
✅ युग्म 1 – सही: धौली शिलालेख वास्तव में ओडिशा (भुवनेश्वर के पास) में स्थित हैं।
✅ युग्म 2 – सही: एर्रागुडी (येर्रागुडी के रूप में भी लिखा जाता है) शिलालेख आंध्र प्रदेश (कुरनूल जिला) में स्थित हैं।
❌ युग्म 3 – गलत: जौगड़ शिलालेख ओडिशा (गंजाम जिला) में स्थित हैं, मध्य प्रदेश में नहीं।
❌ युग्म 4 – गलत: कालसी शिलालेख उत्तराखंड (देहरादून जिला) में स्थित हैं, कर्नाटक में नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: अशोक के प्रमुख शिलालेख
| स्थल | राज्य/स्थान | महत्व |
|---|---|---|
| धौली | ओडिशा (भुवनेश्वर के पास) | कलिंग के बारे में विशेष शिलालेख; धम्म की नीति पर अलग शिलालेख |
| जौगड़ | ओडिशा (गंजाम जिला) | धौली के समान; विशेष कलिंग शिलालेख |
| एर्रागुडी/येर्रागुडी | आंध्र प्रदेश (कुरनूल) | 14 प्रमुख शिलालेख हैं |
| कालसी | उत्तराखंड (देहरादून) | 14 शिलालेख हैं; ब्राह्मी लिपि में लिखे गए |
| गिरनार | गुजरात (जूनागढ़) | सबसे पुराने और सर्वोत्तम संरक्षित में से एक; 14 शिलालेख |
| शाहबाजगढ़ी | पाकिस्तान (खैबर पख्तूनख्वा) | खरोष्ठी लिपि में लिखा गया |
| मानसेहरा | पाकिस्तान (खैबर पख्तूनख्वा) | खरोष्ठी लिपि में लिखा गया |
निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — अजंता की गुफाएं वाघोरा नदी की घाटी में स्थित हैं।
अजंता की गुफाएं, यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल, जिसमें 29 रॉक-कट बौद्ध गुफा स्मारक शामिल हैं, महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में वाघोरा नदी की घोड़े की नाल के आकार की घाटी में स्थित हैं। आइए प्रत्येक कथन का मूल्यांकन करें:
✅ कथन 1 – सही: अजंता की गुफाएं वास्तव में महाराष्ट्र में वाघोरा नदी की घाटी में स्थित हैं।
❌ कथन 2 – गलत: साँची स्तूप मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में बेतवा नदी के निकट एक पहाड़ी पर स्थित है, चम्बल नदी के निकट नहीं।
❌ कथन 3 – गलत: पांडु-लेना गुफाएं (नासिक गुफाएं) महाराष्ट्र के नासिक के निकट त्रिरश्मि पहाड़ियों में उकेरी गई हैं, नर्मदा नदी की घाटी में नहीं।
❌ कथन 4 – गलत: अमरावती स्तूप आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है, गोदावरी नदी पर नहीं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: प्रमुख बौद्ध स्मारक और उनके स्थान
| स्मारक | स्थान | नदी/भौगोलिक विशेषता | राज्य |
|---|---|---|---|
| अजंता की गुफाएं | औरंगाबाद जिला | वाघोरा नदी की घाटी | महाराष्ट्र |
| साँची स्तूप | रायसेन जिला | बेतवा नदी के निकट | मध्य प्रदेश |
| पांडु-लेना गुफाएं | नासिक | त्रिरश्मि पहाड़ियां | महाराष्ट्र |
| अमरावती स्तूप | गुंटूर जिला | कृष्णा नदी | आंध्र प्रदेश |
| एलोरा की गुफाएं | औरंगाबाद जिला | अजंता के निकट | महाराष्ट्र |
मोरेना के निकट स्थित चौसठ योगिनी मंदिर के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह कच्छपघात वंश के शासनकाल के दौरान निर्मित एक वृत्ताकार मंदिर है।
- यह भारत में निर्मित एकमात्र वृत्ताकार मंदिर है।
- इसका उद्देश्य इस क्षेत्र में वैष्णव पंथ को बढ़ावा देना था।
- इसके डिज़ाइन ने एक लोकप्रिय धारणा को जन्म दिया है कि यह भारतीय संसद भवन के पीछे प्रेरणा था।
उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 3 — 1 और 4
मोरेना के निकट चौसठ योगिनी मंदिर 11वीं शताब्दी ईस्वी में कच्छपघात वंश के दौरान निर्मित एक वृत्ताकार मंदिर है। इसके अनूठे वृत्ताकार डिज़ाइन ने लोकप्रिय धारणा को प्रेरित किया है कि इसने भारतीय संसद भवन की वास्तुकला को प्रभावित किया, हालांकि इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
✅ कथन 1 – सही: मंदिर वास्तव में वृत्ताकार है और 11वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास कच्छपघात वंश के शासनकाल के दौरान निर्मित किया गया था।
❌ कथन 2 – गलत: यह भारत में एकमात्र वृत्ताकार मंदिर नहीं है; अन्य उदाहरणों में खजुराहो, जबलपुर और भेड़ाघाट में समान चौसठ योगिनी मंदिर शामिल हैं।
❌ कथन 3 – गलत: मंदिर 64 योगिनियों (तांत्रिक देवियों) की पूजा के लिए समर्पित था और इसका उद्देश्य शक्ति/तांत्रिक पंथ को बढ़ावा देना था, न कि वैष्णव पंथ को।
✅ कथन 4 – सही: एक लोकप्रिय धारणा है कि इस मंदिर के वृत्ताकार, खुले आकाश वाले डिज़ाइन ने भारतीय संसद भवन के वास्तुकारों को प्रेरित किया, हालांकि ऐतिहासिक रूप से पुष्टि नहीं की गई है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: चौसठ योगिनी मंदिर
- अर्थ: चौसठ का अर्थ है 64; ये मंदिर 64 योगिनियों (देवी दुर्गा/शक्ति की महिला परिचारिकाओं) को समर्पित थे।
- काल: अधिकतर 9वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच भारत में तांत्रिक प्रथाओं के उदय के दौरान निर्मित।
- वास्तुकला: आमतौर पर वृत्ताकार या आयताकार, हाइपेथ्रल (आकाश के लिए खुला), एक केंद्रीय आंगन के चारों ओर व्यवस्थित छोटे मंदिरों के साथ।
- प्रमुख मंदिर: मोरेना (मध्य प्रदेश), हीरापुर (ओडिशा), खजुराहो (मप्र), भेड़ाघाट (मप्र), जबलपुर (मप्र), और रानीपुर-झारियाल (ओडिशा)।
- धार्मिक महत्व: शक्ति और तांत्रिक पूजा से जुड़ा हुआ, वैष्णव या शैव परंपराओं से नहीं।
- मोरेना मंदिर विशिष्टताएं: कच्छपघात शासकों द्वारा निर्मित; 64 कक्षों के साथ वृत्ताकार; माना जाता है कि इसने भारतीय संसद के वृत्ताकार डिज़ाइन को प्रेरित किया।
किसी राज्य में मंदिर निर्माण में 'कल्याण मंडप' का निर्माण एक उल्लेखनीय विशेषता थी
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — विजयनगर
मंदिर परिसरों में विस्तृत 'कल्याण मंडप' (विवाह कक्ष) का निर्माण विजयनगर साम्राज्य (14वीं-17वीं शताब्दी) की एक विशिष्ट स्थापत्य विशेषता थी। ये अलंकृत मंडप विशेष रूप से देवताओं के औपचारिक विवाह अनुष्ठानों के लिए डिज़ाइन किए गए थे और विजयनगर मंदिर वास्तुकला की पहचान बन गए, जो इसे पूर्व दक्षिण भारतीय शैलियों से अलग करते हैं।
📝 संक्षिप्त नोट्स: विजयनगर मंदिर स्थापत्य
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| कल्याण मंडप | देवता के औपचारिक विवाह के लिए विस्तृत विवाह कक्ष; जटिल नक्काशी से अत्यधिक सजाया गया |
| राय गोपुरम | विशाल प्रवेश द्वार (अक्सर मुख्य गर्भगृह से भी ऊँचे) |
| अम्मन मंदिर | मुख्य देवता की पत्नी को समर्पित अलग मंदिर |
| स्तंभयुक्त हॉल | याली (पौराणिक प्राणी) और दौड़ते घोड़ों की विशेषता वाले विशाल स्तंभ |
| उदाहरण | हम्पी में विट्ठल मंदिर और विरुपाक्ष मंदिर; कांचीपुरम में वरदराज मंदिर |
भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- फतेहपुर सीकरी में बुलंद दरवाजा और खानकाह के निर्माण में सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया था।
- लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा और रूमी दरवाजा के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का उपयोग किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — कोई नहीं
इन ऐतिहासिक स्मारकों के निर्माण में उपयोग की गई सामग्रियों के संबंध में दोनों कथन गलत हैं।
❌ कथन 1 – गलत: फतेहपुर सीकरी में बुलंद दरवाजा और खानकाह का निर्माण मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर से किया गया था, सफेद संगमरमर से नहीं। हालांकि कुछ सजावटी तत्वों में सफेद संगमरमर की जड़ाई का काम हो सकता है, लेकिन प्रमुख सामग्री लाल बलुआ पत्थर है जो फतेहपुर सीकरी में मुगल वास्तुकला की विशेषता है।
❌ कथन 2 – गलत: लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण मुख्य रूप से लखौरी ईंटों, चूने के मोर्टार और स्टुको प्लास्टर से किया गया था, न कि लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से। रूमी दरवाजा भी इसी प्रकार ईंटों और चूने के प्लास्टर से बना है। ये संरचनाएं अवधी स्थापत्य शैली का उदाहरण हैं जो पत्थर के बजाय ईंट निर्माण पर निर्भर थी।
📝 संक्षिप्त नोट्स: मुगल और अवधी स्थापत्य सामग्री
| स्मारक | स्थान | प्रमुख सामग्री | काल/शासक |
|---|---|---|---|
| बुलंद दरवाजा | फतेहपुर सीकरी | संगमरमर की जड़ाई के साथ लाल बलुआ पत्थर | अकबर (1571-1585) |
| खानकाह (सलीम चिश्ती का मकबरा) | फतेहपुर सीकरी | सफेद संगमरमर | अकबर (1580-81) |
| बड़ा इमामबाड़ा | लखनऊ | लखौरी ईंटें, चूने का मोर्टार, स्टुको | आसफ-उद-दौला (1784) |
| रूमी दरवाजा | लखनऊ | ईंटें और चूने का प्लास्टर | आसफ-उद-दौला (1784) |
| ताजमहल | आगरा | सफेद संगमरमर | शाहजहाँ (1632-1653) |
| लाल किला | दिल्ली | लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर | शाहजहाँ (1639-1648) |
निम्नलिखित में से कौन सूर्य मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है/हैं?
- अरसावल्ली
- अमरकंटक
- ओंकारेश्वर
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 1 — केवल 1
दिए गए विकल्पों में से, केवल अरसावल्ली अपने सूर्य मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। आंध्र प्रदेश के अरसावल्ली में स्थित सूर्यनारायण मंदिर पूर्वी गंग वंश द्वारा निर्मित एक प्रसिद्ध 7वीं शताब्दी का सूर्य मंदिर है, जो वास्तुकला की दृष्टि से इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि सूर्य की किरणें वर्ष में दो बार देवता के चरणों पर पड़ती हैं।
✅ कथन 1 – सही: आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में स्थित अरसावल्ली में पूर्वी गंग वंश के राजा देवेंद्र वर्मा द्वारा निर्मित प्रसिद्ध 7वीं शताब्दी का सूर्यनारायण सूर्य मंदिर है।
❌ कथन 2 – गलत: मध्य प्रदेश में अमरकंटक नर्मदा नदी के उद्गम स्थल के रूप में जाना जाता है और यहाँ कलचुरी वंश के मंदिर हैं, लेकिन यह सूर्य मंदिर के लिए प्रसिद्ध नहीं है।
❌ कथन 3 – गलत: मध्य प्रदेश में ओंकारेश्वर भगवान शिव को समर्पित 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यह एक शैव तीर्थ केंद्र है, सूर्य मंदिर के लिए नहीं जाना जाता है।
अजंता और महाबलीपुरम के नाम से जाने जाने वाले दो ऐतिहासिक स्थलों में क्या समानता है?
- दोनों एक ही काल में बनाए गए थे।
- दोनों एक ही धार्मिक संप्रदाय से संबंधित हैं।
- दोनों में शैलकृत स्मारक हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 3
❌ कथन 1 – गलत: अजंता की गुफाएं दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी ईस्वी के बीच बनाई गई थीं (मुख्यतः वाकाटक और गुप्त काल में), जबकि महाबलीपुरम के स्मारक सातवीं-आठवीं शताब्दी ईस्वी में पल्लव वंश के शासनकाल में बनाए गए थे। ये अलग-अलग कालखंड से संबंधित हैं जिनके बीच कम से कम एक शताब्दी का अंतर है।
❌ कथन 2 – गलत: अजंता की गुफाएं बौद्ध स्मारक हैं जो मठों और प्रार्थना कक्षों (चैत्य और विहार) के रूप में काम करते थे, जबकि महाबलीपुरम के स्मारक मुख्यतः हिंदू हैं, जो शिव और विष्णु को समर्पित हैं जैसे शोर मंदिर और पंच रथ।
✅ कथन 3 – सही: दोनों स्थलों में शैलकृत वास्तुकला मौजूद है। अजंता में बेसाल्ट चट्टानों में तराशी गई 30 शैलकृत गुफा मंदिर हैं, जबकि महाबलीपुरम में ग्रेनाइट के एक ही पत्थर से तराशे गए रथ, मंडप और उभरी हुई मूर्तियां हैं।
भारत की कला और पुरातात्विक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सबसे पहले बनाया गया था?
Detailed Explanation:
धौली में शिला-कटित हाथी का निर्माण सम्राट अशोक के अधीन मौर्य साम्राज्य के दौरान तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 260 ईसा पूर्व) में हुआ था, जो इसे विकल्पों में सबसे प्राचीन स्मारक बनाता है।
उदयगिरि में वराह प्रतिमा का काल गुप्त काल (लगभग 401-402 ईस्वी) है, महाबलीपुरम में शिला-कटित स्मारक का निर्माण पल्लव वंश द्वारा 7वीं-8वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ था, और भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ था।
भारत में बौद्ध इतिहास, परंपरा और संस्कृति के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| प्रसिद्ध मंदिर | स्थान |
|---|---|
| 1. ताबो मठ और मंदिर परिसर | स्पीति घाटी |
| 2. ल्होत्सावा ल्हाखांग मंदिर | नाको जांस्कर घाटी |
| 3. अलची मंदिर परिसर | लद्दाख |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
Detailed Explanation:
✅ युग्म 1 – सही: ताबो मठ और मंदिर परिसर ताबो गांव, स्पीति घाटी, हिमाचल प्रदेश में स्थित है, 996 ईस्वी में स्थापित, जिसे 'हिमालय का अजंता' कहा जाता है।
❌ युग्म 2 – गलत: ल्होत्सावा ल्हाखांग मंदिर नाको गांव, किन्नौर जिले में स्थित है, जांस्कर घाटी में नहीं। नाको किन्नौर के ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में है, जहां नाको झील और नाको मठ (1025 ईस्वी) है।
✅ युग्म 3 – सही: अलची मंदिर परिसर (अलची गोम्पा) एक बौद्ध मठ परिसर है जो अलची गांव, लेह जिला, लद्दाख में स्थित है, जो अपनी 11वीं-12वीं सदी की भित्ति चित्रकला और भारत-हिमालयी कला के लिए प्रसिद्ध है।
भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, 'पंचायतन' शब्द किसे संदर्भित करता है
Detailed Explanation:
पंचायतन (संस्कृत से: पंच = पाँच + आयतन = निवास स्थान) एक मंदिर स्थापत्य शैली है जिसमें मुख्य गर्भगृह के चारों कोनों पर चार सहायक मंदिर होते हैं, जो कुल मिलाकर पाँच मंदिर बनाते हैं।
यह शैली गुप्त काल (4th–6th शताब्दी ईस्वी) में लोकप्रिय हुई और उत्तर भारत में नागर शैली की मंदिर स्थापत्य की पहचान बनी, जो पाँच देवताओं (पंचदेवता) की पूजा का प्रतीक है: शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश/स्कंद।
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