निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- एच.एन. सान्याल समिति की रिपोर्ट के अनुसरण में, न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 पारित किया गया था।
- भारत का संविधान सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को स्वयं की अवमानना के लिए दंडित करने का अधिकार देता है।
- भारत का संविधान सिविल अवमानना और आपराधिक अवमानना को परिभाषित करता है।
- भारत में, संसद को न्यायालय की अवमानना पर कानून बनाने की शक्ति प्रदान की गई है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — 1, 2 और 4
न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 एच.एन. सान्याल समिति की सिफारिशों के बाद अधिनियमित किया गया था। संविधान सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 129) और उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 215) को स्वयं की अवमानना के लिए दंडित करने का अधिकार देता है, और संसद के पास संघ सूची की प्रविष्टि 77 के तहत न्यायालय की अवमानना पर कानून बनाने की विधायी क्षमता है।
✅ कथन 1 – सही: न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 एच.एन. सान्याल समिति की रिपोर्ट के अनुसरण में पारित किया गया था, जिसने न्यायालयों की अवमानना से संबंधित कानून की जांच की थी।
✅ कथन 2 – सही: संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को स्वयं की अवमानना के लिए दंडित करने का स्पष्ट अधिकार देते हैं।
❌ कथन 3 – गलत: संविधान सिविल अवमानना और आपराधिक अवमानना को परिभाषित नहीं करता है; ये परिभाषाएं न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2 में प्रदान की गई हैं।
✅ कथन 4 – सही: संसद के पास संघ सूची (सातवीं अनुसूची) की प्रविष्टि 77 के तहत न्यायालय की अवमानना पर कानून बनाने की शक्ति है, जिसने न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के अधिनियमन को सक्षम बनाया।
📝 संक्षिप्त नोट्स: न्यायालय की अवमानना
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 129 (सर्वोच्च न्यायालय) और अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय) स्वयं की अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति प्रदान करते हैं |
| विधायी क्षमता | प्रविष्टि 77, संघ सूची (सातवीं अनुसूची) - सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों का संविधान और संगठन; ऐसे न्यायालयों की अवमानना |
| एच.एन. सान्याल समिति | न्यायालयों की अवमानना से संबंधित कानून की जांच की; न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के अधिनियमन का कारण बना |
| सिविल अवमानना | किसी न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, निर्देश, आदेश, रिट या अन्य प्रक्रिया की जानबूझकर अवज्ञा (धारा 2(ख), 1971 अधिनियम) |
| आपराधिक अवमानना | किसी भी ऐसे विषय का प्रकाशन या कोई ऐसा कार्य करना जो किसी न्यायालय को बदनाम करे या बदनाम करने की प्रवृत्ति रखता हो, या किसी न्यायालय के अधिकार को कम करे या कम करने की प्रवृत्ति रखता हो (धारा 2(ग), 1971 अधिनियम) |
| अनुच्छेद 19(2) | न्यायालय की अवमानना के संबंध में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं |
Question 2 of 6 अधिकार क्षेत्र एवं शक्तियाँ
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