भारत की काली कपास मिट्टी किसके अपक्षय के कारण बनी है?
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — दरार ज्वालामुखीय चट्टान
भारत में काली कपास मिट्टी (रेगुर मिट्टी के रूप में भी जानी जाती है) मुख्य रूप से दरार ज्वालामुखी विस्फोटों से निकले बेसाल्ट लावा प्रवाह के अपक्षय से बनती है। ये मिट्टियाँ मुख्य रूप से दक्कन पठार क्षेत्र में पाई जाती हैं, जो महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में फैली हैं, जहाँ मूल सामग्री बेसाल्टिक चट्टान है। काला रंग टाइटेनीफेरस मैग्नेटाइट और एल्यूमीनियम युक्त खनिजों की उपस्थिति से आता है, जबकि उच्च मात्रा में मिट्टी की मौजूदगी इसे सूजन और सिकुड़न के गुण प्रदान करती है।
📝 संक्षिप्त नोट्स: काली कपास मिट्टी (रेगुर मिट्टी)
- मूल सामग्री: बेसाल्टिक लावा (दक्कन ट्रैप ज्वालामुखीय चट्टानों) के अपक्षय से निर्मित
- भौगोलिक वितरण: दक्कन पठार, मालवा पठार - मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में
- भौतिक गुण: गहरे काले से गहरे भूरे रंग की; चिकनी मिट्टी, चूना, लोहा, मैग्नीशियम और एल्यूमीनियम से भरपूर लेकिन नाइट्रोजन, फास्फोरस और जैविक पदार्थों की कमी
- विशिष्ट लक्षण: उच्च मिट्टी की मात्रा के कारण गीला होने पर फूलना और सूखने पर सिकुड़ना, गर्मियों में गहरी दरारें विकसित होना
- नमी धारण क्षमता: उच्च मिट्टी की मात्रा के कारण उत्कृष्ट नमी धारण क्षमता, शुष्क खेती के लिए उपयुक्त
- प्रमुख फसलें: कपास की खेती के लिए आदर्श; गन्ना, ज्वार, गेहूं, अलसी और खट्टे फलों के लिए भी उपयुक्त
- अन्य नाम: रेगुर मिट्टी, काली मिट्टी, या उष्णकटिबंधीय काली मृदा
Question 1 of 3 भारत की मृदाएँ
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