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सविनय अवज्ञा आंदोलन Previous Year Questions (PYQs)
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Solved Previous Year Questions
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गांधी-इरविन समझौते में निम्नलिखित में से क्या शामिल था?
- गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए कांग्रेस को आमंत्रण
- सविनय अवज्ञा आंदोलन के संबंध में जारी अध्यादेशों की वापसी
- पुलिस ज्यादतियों की जांच के लिए गांधीजी के सुझाव की स्वीकृति
- केवल उन कैदियों की रिहाई जिन पर हिंसा का आरोप नहीं था
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 2 — केवल 1, 2 और 4
गांधी-इरविन समझौता (मार्च 1931) महात्मा गांधी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच एक ऐतिहासिक समझौता था जिसके कारण सविनय अवज्ञा आंदोलन को निलंबित कर दिया गया। इस समझौते में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की भागीदारी, अध्यादेशों की वापसी और अहिंसक राजनीतिक कैदियों की रिहाई शामिल थी, लेकिन पुलिस ज्यादतियों की जांच के लिए गांधी की मांग को स्वीकार नहीं किया गया।
✅ कथन 1 – सही: समझौते के तहत ब्रिटिश सरकार ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को लंदन में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित करने पर सहमति जताई।
✅ कथन 2 – सही: समझौते में सविनय अवज्ञा आंदोलन के संबंध में जारी दमनकारी अध्यादेशों की वापसी का प्रावधान किया गया।
❌ कथन 3 – गलत: यद्यपि गांधी ने बातचीत के दौरान पुलिस ज्यादतियों का मुद्दा उठाया, ब्रिटिश सरकार ने पुलिस क्रूरता की जांच के लिए उनके सुझाव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिससे यह विवाद का विषय बन गया।
✅ कथन 4 – सही: समझौते में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान गिरफ्तार राजनीतिक कैदियों की रिहाई का प्रावधान था, सिवाय उनके जिन्हें हिंसा के लिए दोषी ठहराया गया था।
📝 संक्षिप्त नोट्स: गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च, 1931)
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| अन्य नाम | दिल्ली समझौता |
| पक्षकार | महात्मा गांधी और वायसराय लॉर्ड इरविन |
| मुख्य प्रावधान |
|
| ब्रिटिश इनकार |
|
| महत्व | कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच समान स्तर पर पहला द्विपक्षीय समझौता; हालांकि, सीमित लाभों के लिए आलोचना की गई |
| परिणाम | गांधी ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में भाग लिया लेकिन यह विफल रहा; सविनय अवज्ञा आंदोलन 1932 में फिर से शुरू हुआ |
निम्नलिखित में से किसने अप्रैल 1930 में नमक कानून तोड़ने के लिए तंजौर तट पर मार्च का आयोजन किया?
Detailed Explanation:
सी. राजगोपालाचारी ने अप्रैल 1930 में तंजौर तट पर वेदारण्यम नमक सत्याग्रह का आयोजन किया, जो गांधी के दांडी मार्च से प्रेरित था।
यह मार्च मद्रास प्रेसीडेंसी में सविनय अवज्ञा आंदोलन का हिस्सा था, जहाँ राजाजी ने स्वयंसेवकों को त्रिचिनोपोली से वेदारण्यम तक ले जाकर नमक कानून तोड़ा।
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