भारत में कृषि के संदर्भ में, अक्सर समाचारों में देखी जाने वाली 'जीनोम अनुक्रमण' तकनीक का निकट भविष्य में किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है?
- जीनोम अनुक्रमण का उपयोग विभिन्न फसल पौधों में रोग प्रतिरोध और सूखा सहनशीलता के लिए आनुवंशिक चिह्नकों की पहचान करने के लिए किया जा सकता है।
- यह तकनीक फसल पौधों की नई किस्मों को विकसित करने में लगने वाले समय को कम करने में मदद करती है।
- इसका उपयोग फसलों में पोषक-रोगजनक संबंधों को समझने के लिए किया जा सकता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
Detailed Explanation:
उत्तर: विकल्प 4 — 1, 2 और 3
✅ कथन 1 – सही: जीनोम अनुक्रमण रोग प्रतिरोध और सूखा सहनशीलता जैसे वांछनीय गुणों से जुड़े विशिष्ट आनुवंशिक चिह्नकों की पहचान करता है। यह बेहतर लचीलेपन वाली फसल किस्मों को विकसित करने के लिए लक्षित प्रजनन कार्यक्रमों को सक्षम बनाता है।
✅ कथन 2 – सही: पारंपरिक फसल प्रजनन में वर्षों या दशकों का समय लगता है। जीनोम अनुक्रमण लाभकारी जीनों की सटीक पहचान की अनुमति देकर इस प्रक्रिया को तेज करता है, जिससे चिह्नक-सहायता चयन संभव होता है और नई किस्में विकसित करने का समय 10-15 वर्ष से घटकर केवल 3-5 वर्ष हो जाता है।
✅ कथन 3 – सही: जीनोम अनुक्रमण पोषक पौधों और रोगजनकों के बीच आनुवंशिक अंतःक्रियाओं को समझने में मदद करता है। इन पोषक-रोगजनक संबंधों को समझने से वैज्ञानिक लक्षित रोग प्रबंधन रणनीतियाँ विकसित कर सकते हैं और बेहतर प्रतिरोध तंत्र वाली फसलें तैयार कर सकते हैं।
तीनों कथन भारतीय कृषि में जीनोम अनुक्रमण के तत्काल अनुप्रयोगों का सही वर्णन करते हैं, जो इसे फसल सुधार और खाद्य सुरक्षा के लिए एक शक्तिशाली उपकरण बनाता है।
Question 3 of 4 जीएम फसलें एवं जैव सुरक्षा
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